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25‑50% से घटकर 18% और अब 10%: अमेरिकी टैरिफ में बदलाव, भारत को मिली राहत

नई दिल्ली अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दुनिया के तमाम देशों के खिलाफ लगाए गए टैरिफ को अवैध करार दिया है. इसके बाद भारत को भी बड़ी राहत मिली है. इस टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक अन्य नियम के तहत तमाम देशों पर 10 फीसदी टैरिफ की घोषणा की. ऐसे में यह सवाल उठ रहा था कि भारत जैसे देश जो अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर सहमति बना चुके हैं, उनके प्रोडक्ट को इस नए टैरिफ में जगह मिलेगी या नहीं. लेकिन, कुछ ही देर बाद अमेरिका प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ट्रेड डील कर चुके या इस पर सहमति बना चुके तमाम देशों पर भी अब एक समान 10 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा. इससे पहले ट्रेड डील के तहत भारतीय प्रोडक्ट पर अमेरिका ने 18 फीसदी टैरिफ लगाने की बात कही थी. व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने हमारी सहयोगी बिजनेस न्यूज टीबी चैनल ‘सीएनबीसी’ को स्पष्ट किया कि भारत पर टैरिफ दर 18 से घटकर 10 फीसदी हो गई है. यह ट्रंप के नए 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ की व्याख्या करता है. सीएनबीसी के संवाददाता एमॉन जावेर्स ने भारत समेत तमाम ट्रेड डील वाले देशों का 10 फीसदी टैरिफ पर विवरण दिया है. वियतनाम को सबसे ज्यादा फायदा ट्रेड डील के तहत अमेरिका ने यूरोपीय संघ पर 15 फीसदी, जापान पर 15 फीसदी, ब्रिटेन पर 10 फीसदी और भारत पर 18 फीसदी टैरिफ लगाया था. स्विट्जरलैंड पर 15 फीसदी, दक्षिण कोरिया पर 15 फीसदी और वियतनाम पर 20 फीसदी टैरिफ की बात कही गई थी. इन सभी देशों या संघों के साथ अमेरिका ने ट्रेड डील कर ली है या फिर डील पर सहमति बन गई है. लेकिन, अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रंप के नए आदेश में सभी देशों पर 10 फीसदी टैरिफ की बात कही है. ऐसे में इस आदेश का सबसे ज्यादा फायदा वियतनाम को मिलने वाला है जिसको 20 फीसदी टैरिफ देना था. भारत के प्रोडक्ट्स के खिलाफ टैरिफ 18 से घटकर 10 फीसदी पर आ गया है. भारत अब कितना टैरिफ देगा भारत की करें, तो पहले अमेरिका ने 25% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया था और फिर इसे 50% किया था, लेकिन India-US Trade Deal पर बात बनते ही इसे 18% पर ला दिया गया. अब जबकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने Trump Tariff को गैरकानूनी करार दिया है, तो ट्रंप ने 10% ग्लोबल टैरिफ का ऐलान कर दिया, ऐसे में भारत पर अब कितना टैरिफ लागू होगा, इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. ये 18% रहेगा, 10% होगा या फिर 13.5% आइए समझते हैं?  भारत पर ऐसे बढ़ता-घटता रहा US टैरिफ US Supreme Court द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ को रद्द करने के बाद, भारत को अपने अमेरिकी निर्यात पर कितना टैरिफ देना होगा, इसे लेकर असमंजस बना हुआ है. भारत पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ता घटता रहा है. Donald Trump ने बीते साल अप्रैल में जब दुनिया पर टैरिफ अटैक (Trump Tariff Attack) की शुरुआत की थी, तो शुरुआत में भारत पर 25% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया था. इसके बाद अचानक ट्रंप ने भारत पर लागू टैरिफ को दोगुना करते हुए अगस्त में 50% कर दिया था और इसके पीछे कारण भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद (India Russian Oil Import) को बताया था. ऐसा करके यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद की बात कहते हुए भारत पर जुर्माने के तौर पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया गया था.  अमेरिका में हलचल हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारत के साथ ट्रेड डील है और उसके प्रोडक्ट पर 18 फीसदी टैरिफ लगता रहेगा. लेकिन, अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि 10 फीसदी टैरिफ वाला नया आदेश सभी देशों पर लागू होगा. इसमें वे देश भी शामिल हैं जिनके साथ हमारा ट्रेड डील है.  डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ लगाने के फैसले को अवैध करार दिए जाने के बाद अमेरिका में हलचल तेज है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पूरी दुनिया के कारोबार जगह में उथल-पुथल मच गया है. पूरी रात अमेरिका से डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर रिएक्शन आते रहे. अब 18%, 10% या फिर 13.5%?  अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा Trump Reciprocal Tariff को रद्द किया गया है और अदालत ने साफ कहा है कि ट्रंप करीब 50 साल पुराने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) का इस्तेमाल करते हुए शांति काल में टैरिफ नहीं लगा सकते. इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को 18% या फिर 10% टैरिफ देना होगा. या फिर देश पर लागू US Tariff 13.5% होगा. तो बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत पर लगाए गए 18% के पारस्परिक टैरिफ का कानूनी आधार प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है. कानूनी फेरबदल के बाद 18% टैरिफ रद्द होने की स्थिति में भारत पर US Tariff महज 3.5% रह जाता है, जो कि ट्रंप के फैसलों से पहले भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा प्राप्त होने के कारण चुकाना पड़ रहा था. हालांकि, दूसरी ओर कोर्ट के फैसले से भड़के ट्रंप ने आनन-फानन में 10% के ग्लोबल टैरिफ को तत्काल लागू करने के लिए धारा 122 का इस्तेमाल किया, जो रद्द किए गए टैरिफ की जगह लेगा. ऐसे में देखा जाए तो 10% का अतिरिक्त टैरिफ जुड़ने के बाद ये US Tariff On India 13.5% हो जाता है.  ट्रंप ने भारत पर टैरिफ को लेकर क्या कहा?  बता दें कि Donald Trump ने सुप्रीम कोर्ट में मिली हार के बाद जिस धारा 122 का इस्तेमाल करते हुए 10% Global Tariff लागू किया है, वह अमेरिकी राष्ट्रपति को 150 दिनों के लिए 15% तक का शुल्क लगाने का अधिकार देती है, लेकिन इस टाइमलाइन के बाद उन्हें कांग्रेस की मंजूरी लेनी होती है. भारत को लेकर ट्रंप ने एक बयान में कहा है कि India पर टैरिफ पहले से तय ट्रेड डील के अनुसार 18% ही रहेगी, लेकिन उनके इस दावे पर व्हाइट हाउस ने बाद में स्पष्ट कर दिया कि कानूनी तौर पर फिलहाल भारत पर 10% टैरिफ लगाया जाएगा.

कुआलालंपुर में साइन हुआ चीन-ASEAN FTA 3.0, व्यापार पर अमेरिकी टैरिफ का दबाव घटेगा

नई दिल्ली अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ के असर को कम करने के लिए तमाम देश अपने-अपने तरीके से प्रयास कर रहे हैं. इस बीच दुनिया के लिए टेंशन की सबसे बड़ी वजह US-China Tariff War बना दिखाई दिया. हालांकि, दुनिया की इन दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तनाव घटने के संकेत भी मिले हैं और इसी हफ्ते के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं. लेकिन इससे पहले ही China ने एक बड़ी डील कर डाली है और उसने आसियान के साथ अपने मुक्त व्यापार समझौते पर साइन किए हैं. US Tariff के असर को कम करने के लिए ये डील कुआलालंपुर में हुई है.  चीन-आसियान के बीच बड़ा कारोबार रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पूर्व एशियाई ब्लॉक आसियान और चीन ने मंगलवार को अपने मुक्त व्यापार समझौते पर आगे बढ़ने के लिए हस्ताक्षर किए. इसमें डिजिटल, ग्रीन इकोनॉमी और अन्य नए उद्योगों पर फोकस किया जाएगा. आसियान के आंकड़ों के अनुसार, 11 सदस्यीय दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. बीते साल दोनों देशों के बीच कुल 771 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ. चीन लगातार बढ़ा रहा व्यापारिक संबंध अमेरिका के टैरिफ अटैक के बीच चीन लगातार आसियान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जो 3.8 ट्रिलियन डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद वाला क्षेत्र है. ऐसा इसलिए ताकि दुनिया भर के देशों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा लगाए गए भारी आयात शुल्क का मुकाबला किया जा सके. गौरतलब है कि रेयर अर्थ मिनरल्स और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्यात प्रतिबंधों को लेकर प्रमुख शक्तियों की आलोचना के बावजूद चीन खुद को अधिक एक ओपन इकोनॉमी के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है. 2022 में बात शुरू, अब हो गई डील ASEAN के साथ चीन के FTA 3.0 पर मलेशिया में इस समूह के नेताओं के शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए. इसमें ट्रंप ने रविवार को एशिया की अपनी यात्रा की शुरुआत में भाग लिया था. रिपोर्ट के मुताबिक, इस उन्नत आसियान-चीन समझौते पर बातचीत नवंबर 2022 में शुरू हुई थी और इस साल मई में समाप्त हुई. ये वो समय था जबकि डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ के साथ आक्रामक रुख अपनाए नजर आए. इससे पहले दोनों के बीच पहला मुक्त व्यापार समझौता 2010 में लागू हुआ था. क्यों खास हैं चीन-ASEAN?  चीन और आसियान दोनों क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) का हिस्सा हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है. दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी और वैश्विक GDP के लगभग 30% को ये कवर करता है. मलेशिया ने सोमवार को कुआलालंपुर में आरसीईपी शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, जो पिछले पांच सालों में पहली बार थी. चीन ने इससे पहले कहा था कि यह समझौता चीन और आसियान के बीच कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में बेहतर बाजार पहुंच की राह आसान बनाएगा.  कुछ एनालिस्ट इस ब्लॉक को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के विरुद्ध एक संभावित बफर के रूप में देखते हैं, लेकिन इसके सदस्यों के बीच प्रतिस्पर्धी हितों के कारण इसके प्रावधानों को कुछ अन्य क्षेत्रीय व्यापार समझौतों की तुलना में कमजोर माना जाता है.

अमेरिकी टैरिफ के बीच भारत का अचूक खेल, दुनिया ने देखा चौंकाने वाला मोड़

नई दिल्ली  भारत ने अमेरिकी टैरिफ की परवाह किए बिना ऐसा गेम खेला कि पूरी दुनिया देखती रह गई। रूस से सस्ते दाम पर तेल खरीदकर भारत ने न सिर्फ अमेरिका के 25% अतिरिक्त टैक्स को ठेंगा दिखाया, बल्कि उस तेल को प्रोसेस करके अंतरराष्ट्रीय बाजार में जमकर बेचा और भारी मुनाफा भी कमाया। अब भारत का डीजल यूरोप तक में धड़ल्ले से बिक रहा है। आंकड़े बताते हैं कि भारत ने अगस्त 2025 में डीजल शिपमेंट के मामले में यूरोप को चौंका दिया है। भारत की तेल नीति से बदला ग्लोबल गेमप्लान रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल और ऊर्जा संसाधनों पर सख्त प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने रणनीतिक चतुराई दिखाते हुए रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया। इसे घरेलू रिफाइनरियों में प्रोसेस कर भारत ने वैश्विक बाजार, खासकर यूरोप, में डीजल की आपूर्ति तेज कर दी। एक्सपोर्ट में ऐतिहासिक उछाल आंकड़ों की बात करें तो भारत का डीजल निर्यात अगस्त 2025 में सालाना आधार पर 137% की जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ प्रतिदिन 2,42,000 बैरल तक पहुंच गया। ग्लोबल रियल टाइम डेटा एंड एनालिटिक्स प्रोवाइडर Kpler के अनुसार, सिर्फ यूरोप को भारत ने अगस्त में 73% अधिक डीजल भेजा, जबकि सालाना आंकड़ा 124% की ग्रोथ दिखाता है। वहीं, Vortexa की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त में यूरोप को भारत का डीजल एक्सपोर्ट 228,316 बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले साल की तुलना में 166% अधिक है और जुलाई 2025 के मुकाबले 36% ज्यादा। रिलायंस जैसी कंपनियों को झटका लग सकता है भले ही फिलहाल भारत की ऊर्जा नीति फायदेमंद नजर आ रही हो, लेकिन 2026 की शुरुआत में यूरोपीय यूनियन के प्रस्तावित प्रतिबंधों के चलते रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी प्रमुख कंपनियों को बड़ा धक्का लग सकता है, जो रूस के तेल पर आधारित रिफाइनिंग करती हैं और यूरोप को सप्लाई देती हैं।   क्यों बढ़ा भारत का डीजल निर्यात? इस बूम के पीछे कई कारण हैं:- -यूरोप में शीतकालीन मांग (Winter Demand) की तेजी। -रिफाइनरियों द्वारा की गई अन्यतम मेंटेनेंस। -रूस पर प्रतिबंधों से उत्पन्न आपूर्ति की कमी। -भारत की गंभीर सप्लाई चेन क्षमताएं और लो-कोस्ट रिफाइनिंग। -इन सभी कारकों ने भारत को यूरोपीय ऊर्जा संकट के बीच एक प्रमुख सप्लायर बना दिया है। पश्चिमी आलोचना और भारत का जवाब भारत की इस ऊर्जा रणनीति पर अमेरिका और उसके सहयोगी तीखी आलोचना कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया है कि भारत, रूस से सस्ता तेल खरीदकर उसे प्रोसेस करने के बाद यूरोप को ऊंचे दाम पर बेच रहा है- और ऐसा करके मॉस्को को यूक्रेन युद्ध के लिए अप्रत्यक्ष फंडिंग मिल रही है। भारत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए साफ कहा है: “हम बाजार से खरीदते हैं और उसे वैश्विक बाजार में बेचते हैं। यदि किसी देश को इससे आपत्ति है, तो वे खरीद बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं।” क्या डीजल की मांग बनी रहेगी? ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि 2025 के अंत तक डीजल की वैश्विक मांग मजबूत बनी रहेगी। विशेषकर यूरोप जैसे बाजार, जो वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश में हैं, फिलहाल भारतीय सप्लायर्स पर निर्भर रह सकते हैं।