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‘पहले अपना हाल देखे रूस’ – ईरान मुद्दे पर जेलेंस्की का बड़ा बयान

यूक्रेन ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच जारी जंग दिन-ब-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा है कि मौजूदा समय में रूस खुलकर ईरान का सहयोगी की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है। उन्होंने इसके पीछे की वजह बताते हुए तंज कसा है कि रूस तो खुद ही खल्लास हो चुका है तो वह दोस्त ईरान की क्या खाक मदद करेगा। जेलेंस्की का दावा है कि रूस की सैन्य क्षमता कमजोर पड़ चुकी है क्योंकि चार साल से यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में उसके सैनिक न सिर्फ उलझे हुए हैं बल्कि हताश हैं। जेलेंस्की के मुताबिक इसी कारण रूस चाहकर भी ईरान की मदद करने की स्थिति में नहीं है। रूस की सैन्य क्षमता पर सवाल एक इंटरव्यू में जेलेंस्की ने कहा, "मेरा मानना ​​है कि उनके पास इसकी काबिलियत ही नहीं है। उनकी सारी सेनाएँ या तो यूक्रेन की जमीन में दबी हुई हैं या यूक्रेन के खिलाफ जंग में लगी हुई हैं। यानी, रूस की अधिकांश सैन्य ताकत या तो यूक्रेन की जमीन पर भारी नुकसान झेल रही है या फिर उसी युद्ध में व्यस्त है। उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसा ही परिदृश्य सीरिया में देखने को मिला था और अब ईरान के मामले में भी रूस सीमित भूमिका निभाता दिखाई दे रहा है। रूस द्वारा ईरान को हथियार देने का आरोप इसके साथ ही यूक्रेनी राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि रूस ईरान को हथियार और तकनीकी सहायता दे रहा है। उनका कहना है कि ईरानी ड्रोन “शाहेद” (Shahed) के मलबे में रूसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सबूत मिलते हैं। ज़ेलेंस्की ने कहा कि यह भी संभव है कि रूस ईरान को वायु रक्षा प्रणालियाँ (Air Defence Systems) उपलब्ध करा सकता है, क्योंकि रूस के पास ऐसे हथियारों का पर्याप्त भंडार है। जेलेंस्की ने कहा, "मुझे पूरा यकीन है कि रूस ईरानी सरकार को हथियार सप्लाई कर रहा है। हम समझते हैं कि वे “शाहेद” के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स दे रहे होंगे। मुझे लगता है कि यह सब आज मिडिल ईस्ट पर हमला करने वाले “शाहेद” के टुकड़ों में मिला है। अगर हमारे पार्टनर की इंटेलिजेंस सर्विस अपनी जानकारी शेयर करती हैं, तो इसकी पुष्टि हो जाएगी क्योंकि ईरानी “शाहेद” में रूस में बने पार्ट्स होते हैं। यह कुछ ऐसा है जो हम पक्के तौर पर जानते हैं। ईरान-रूस सैन्य सहयोग ज़ेलेंस्की ने यह भी कहा कि पहले ईरान ने रूस को हथियार उपलब्ध कराए थे जिनका इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ किया गया। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में ईरान के लिए रूस को हथियार भेजना कठिन हो सकता है, लेकिन रूस अब ईरान से मिली तकनीकी लाइसेंस के आधार पर मिसाइल और ड्रोन का उत्पादन खुद कर रहा है। ज़ेलेंस्की ने यह चिंता भी जताई कि यदि पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा चलता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका अपने और अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए अधिक संसाधन लगाएगा। इस स्थिति में अमेरिकी पैट्रियट (Patriot) वायु रक्षा प्रणाली के इंटरसेप्टर मिसाइलों—PAC-2 और PAC-3—के उत्पादन और उपयोग को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिससे यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता कम हो सकती है। तेल और ऊर्जा संकट का असर उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया के संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। ज़ेलेंस्की के अनुसार, तेल उत्पादों के आयात में कमी और युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों में तेजी देखी जा रही है। उन्होंने कहा कि यूरोप सहित पूरी दुनिया इस ऊर्जा संकट का सामना कर रही है और सभी देशों को मिलकर इसका समाधान तलाशना होगा। यूक्रेन का मानना है कि पश्चिम एशिया का युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी पड़ सकता है।  

जेलेंस्की का तंज- ‘हंगरी के प्रधानमंत्री केवल पेट बढ़ा रहे हैं’

वाशिंगटन. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को लगभग तीन साल पूरे हो गए हैं। जेलेंस्की लगातार यूरोपीय देशों को रूस के प्रति आगाह करते हुए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए चेतावनी देते नजर आ रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने चेतावनी नजर अंदाज करने के लिए हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन पर तीखा हमला बोला है। जेलेंस्की ने कहा कि विक्टर क्षेत्रीय सुरक्षा पर ध्यान देने की बजाय घरेलू राजनीति को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। 'वह केवल अपना पेट बढ़ा रहे हैं, सेना नहीं।' जेलेंस्की का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब हंगरी की तरफ से यूक्रेन की मदद करने की अनिच्छा व्यक्त की गई है। तीन साल से जारी यूक्रेन और रूस के युद्ध ने यूरोपीय संघ के देशों के भीतर भी कलह को बढ़ा दिया है। ज्यादातर देश रूस के खिलाफ यूक्रेन को राहत पैकेज देने और मॉस्को पर प्रतिबंध का समर्थन करते हैं, लेकिन हंगरी बार-बार इन उपायों को किसी न किसी वजह से या बातचीत के बहाने से धीमा करता हुआ नजर आता है। हंगरी लगातार इस युद्ध को आगे न बढ़ाने के लिए भी चेतावनी देता हुआ नजर आता है। दरअसल, विक्टर ओर्बन को रूसी राष्ट्रपति पुतिन का करीबी माना जाता है, जिसकी वजह से उन्हें कीव समेत कई यूरोपीय देशों से आलोचना का सामना करना पड़ता है। यूक्रेन युद्ध में किसके साथ हंगरी? हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने शुरुआत से ही यूरोपीय देशों द्वारा यूक्रेन को दिए जा रहे अतिरिक्त फंडिंग का विरोध किया है। इतना ही नहीं उन्होंने सीधे हथियारों की आपूर्ति का भी विरोध किया है। ओर्बान ने हंगरी के हथियारों को यूक्रेन को देने से इनकार करते हुए कहा था कि बुडापेस्ट को अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को ज्यादा प्राथमिकता देनी है। इसके अलावा उन्होंने पश्चिमी यूक्रेन में रहने वाले हंगेरियाई मूल के लोगों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को लेकर भी यूक्रेनी सरकार पर सवाल उठाया था। हालांकि, यूक्रेन और हंगरी के बीच यह खींचतान पिछले काफी समय से चली आ रही है। हालिया विवाद उस समय सामने आया, जब यूरोपीय संघ के देशों की तरफ से यूक्रेन के लिए एक दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी और रूस के ऊपर आर्थिक प्रतिबंधों पर विचार कर रहे हैं। हंगरी ने इन प्रस्तावों का खुले तौर पर विरोध किया है। गौरलतब है कि रूस और यूक्रेन युद्ध पिछले तीन साल से जारी है। अमेरिका समेत तमाम देश इसे खत्म करवाने के लिए कोशिश कर चुके हैं, लेकिन यह बदस्तूर जारी है। दोनों देशों की तरफ से कई लाख सैनिक इस युद्ध में अपनी जान गंवा चुके हैं। युद्ध के पहले यूक्रेन जिस नाटो की सदस्यता लेने की जिद किए बैठा था, अब वह भी उससे दूर जा चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा साफ कह दिया गया है कि यूक्रेन को नाटो की सदस्यता नहीं मिलेगी। अभी रूस और यूक्रेन के बीच में विवाद जमीन को लेकर फंसा हुआ है। रूस युद्ध में कब्जाई जमीन को छोड़ने के लिए राजी नहीं है, ऐसे में युद्ध लगातार जारी है।

पुतिन की यात्रा समाप्त, जेलेंस्की के आगमन से पहले भारत की कूटनीति सक्रिय

 नई दिल्ली रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सफल दिल्ली दौरे के बाद भारत ने कूटनीति की दूसरी सधी हुई चाल चली है. भारत अब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को दिल्ली में होस्ट करने की योजना पर काम कर रहा है. कूटनीतिक हलकों में इसे भारत की विदेश नीति का बैलेंसिंग एक्ट माना जा रहा है. माना जा रहा है कि जनवरी 2026 में जेलेंस्की का दिल्ली दौरा हो सकता है, हालांकि अभी इस दौरे की तारीख तय नहीं हो सकी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत कई हफ्तों से यूक्रेन के राष्ट्रपति कार्यालय से संपर्क में है. भारत की य़े कोशिश राष्ट्रपति पुतिन के नई दिल्ली दौरे से पहले से ही चल रही है. इस बाबत भारतीय और यूक्रेनी अधिकारियों के बीच कई हफ़्तों से बातचीत चल रही है, और पुतिन के भारत आने से पहले ही नई दिल्ली ज़ेलेंस्की के ऑफिस के संपर्क में थी.  जेलेंस्की की यात्रा से भारत को रूस-यूक्रेन युद्ध के दोनों पक्षों के साथ जुड़े रहने की कोशिशों को बल मिलेगा. भारत इस नीति पर कई महीनों से चल रही है. यही वजह है कि जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मॉस्को गए और पुतिन से मिले, तो इसके एक महीने बाद ही अगस्त में पीएम मोदी ने यूक्रेन का दौरा किया था.  यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के प्रस्तावित दौरे का समय और दायरा कई बातों पर निर्भर करेगा. इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शांति योजना कैसे आगे बढ़ती है और युद्ध के मैदान में क्या होता है.  यूक्रेन की घरेलू राजनीति, जहां ज़ेलेंस्की की सरकार अभी एक बड़े भ्रष्टाचार घोटाले में फंसी होने के कारण दबाव में है. उसका भी इस प्रस्तावित दौरे पर असर पड़ सकता है.  खास बात यह है कि यूक्रेन का राष्ट्रपति अबतक सिर्फ तीन बार भारत आया है. ये मौके थे. 1992, 2002 और 2012.  पुतिन की यात्रा पर यूरोप की कड़ी नजर रही है. कई यूरोपीय दूतों ने भारत से मॉस्को पर युद्ध खत्म करने का दबाव डालने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने का आग्रह किया है. भारत ने लगातार कहा है कि बातचीत और कूटनीति ही आगे बढ़ने का एकमात्र सही रास्ता है.  इस बार भी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत तटस्थ नहीं है, भारत शांति के पक्ष में है. यूक्रेन युद्ध पर भारत की नीति काफी पहले से रही है.  फरवरी 2022 में यूक्रेन- रूस के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से भारत पुतिन और ज़ेलेंस्की दोनों के संपर्क में रहा है. मोदी ने ज़ेलेंस्की से कम से कम आठ बार फोन पर बात की है, दोनों नेता अलग अलग प्लेटफॉर्म पर कम से कम चार बार मिल चुके हैं.  अगस्त 2024 में यूक्रेन दौरे पर गए पीएम मोदी ने ज़ेलेंस्की से कहा था, “हम युद्ध से दूर रहे हैं, लेकिन हम न्यूट्रल नहीं हैं, हम शांति के पक्ष में हैं. हम बुद्ध और गांधी की धरती से शांति का संदेश लेकर आए हैं.” भारत से हजारों सैकड़ों किलोमीटर दूर चल रहे यूक्रेन-रूस की लड़ाई की सीधा असर भारत की इकोनॉमी पर भी पड़ा है.  भारत की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदने की वजह से अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी पेनाल्टी टैरिफ लगा दिया है. 

यूक्रेन ने थामा भारत का हाथ, ज़ेलेंस्की बोले- मोदी दुनिया में शांति ला सकते हैं

यूक्रेन यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने देश के स्वतंत्रता दिवस पर बधाई देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मंगलवार को आभार व्यक्त किया और कहा कि कीव को रूस के साथ युद्ध समाप्त कराने संबंधी ‘‘भारत के योगदान'' पर भरोसा है। जेलेंस्की ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि यूक्रेन ‘‘शांति और संवाद'' के प्रति भारत के समर्पण की सराहना करता है। यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘अब, जब पूरी दुनिया इस भयानक युद्ध को गरिमामय तरीके से और स्थायी शांति के साथ समाप्त कराने का प्रयास कर रही है, हमें भारत के योगदान पर भरोसा है।'' उन्होंने कहा, ‘‘कूटनीति को मजबूत करने वाला प्रत्येक निर्णय न केवल यूरोप में, बल्कि हिंद-प्रशांत और उससे परे भी बेहतर सुरक्षा की ओर ले जाता है।'' प्रधानमंत्री मोदी ने 16 अगस्त को यूक्रेन के लोगों के लिए शांति और प्रगति से भरे भविष्य की कामना की तथा स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के लिए ज़ेलेंस्की को धन्यवाद दिया था। इससे पहले जेलेंस्की ने 15 अगस्त को भारत को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दी थीं और कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को समाप्त कराने के प्रयासों में भारत योगदान देगा।