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बिना गारंटी और बिना ब्याज के 5 लाख रुपये तक का आसान लोन, सरकार की नई योजना

लखनऊ  केंद्र और राज्‍य की सरकारें गरीब और मध्‍यम वर्ग को आगे बढ़ाने के लिए कई सरकारी योजनाएं चलाती हैं. कुछ योजना वित्तीय सहायत देती हैं, तो कुछ योजना के तहत कारोबार शुरू करने के लिए लोन दिया जाता है. आज इसी तरह की एक योजना के बारे में बता रहे हैं, जिसके तहत आप लोन लेकर कोई भी कारोबार शुरू कर सकते हैं.  यह योजना बिना ब्‍याज और बिना गारंटी पर लोन देती है और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित है. योगी सरकार युवाओं और गरीब परिवारों को आगे बढ़ाने के लिए यह लोन योजना चला रही है. इस योजना का नाम 'मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान (MYUVA)' है. यह योजना 5 लाख रुपये तक का लोन बिना ब्‍याज और बिना गारंटी पर देती है.  8वीं पास भी ले सकता है ये लोन?  अगर कोई युवा इस योजना के तहत अप्‍लाई करता है और 5 लाख रुपये तक का लोन लेना चाहते हैं तो उसकी आयु 21 से 40 वर्ष की आयु के बीच होनी चाहिए . इसके तहत न्‍यूनतम शिक्षा योग्‍यता 8वीं पास होनी चाहिए और मान्‍यता प्राप्‍त संस्‍थान से स्किल ट्रेनिंग सर्टिफिकेट या डिग्री प्राप्‍त होना चाहिए. पीएम स्वनिधि योजना को छोड़कर आवेदक को किसी अन्य केंद्र या राज्‍य सरकार की योजना (जिसमें ब्याज या पूंजी शामिल हो) का लाभ नही मिल रहा होना चाहिए.  क्‍या है इस योजना का उद्देश्‍य?  इस योजना का उद्देश्‍य 21 से 40 साल की आयु वाले युवक और युवतियों को आत्‍मनिर्भर बनाना और उन्‍हें अपने कारोबार शुरू करने के लिए प्रेरित करना है और  उन्‍हें अपने कारोबार शुरू करने के लिए प्रेरित करना है. इसका मकसद राज्‍य से ज्‍यादा से ज्‍यादा उद्यमी उभरकर निकलें. मुख्यमंत्री युवा उद्यमी अभियान योजना के तहत 10 साल में 10 लाख युवाओं को स्‍वरोजगार देना है. कैसे कर सकते हैं अप्‍लाई?  सबसे पहले आपको MSME पोर्टल msme.up.gov.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होगा. फिर जिला उद्योग प्रोत्‍साहन और उद्यमिता विकास केंद्र पर इस ऑनलाइन आवेदन की जांच की जाएगी और जांच के बाद बैंक को ये फॉर्म भेजा जाएगा. इसके बाद बैंक की ओर से इस आवेदन की जांच और लोन अप्रूव किया जाएगा, जिसके बाद लोन देने की व्‍यवस्‍था की जाएगी.  5 लाख योजना लेने के लिए क्‍या-क्‍या देना हेागा?  इस लोन के बदले कोई भी ब्‍याज देने की आवश्‍यकता नहीं है. 4 साल तक इस लोन को जमा करना होगा. अगर आप यह लोन लेते हैं तो किसी भी तरह की गारंटी भी देने की आवश्‍यकता नहीं है. लेकिन इसके बदले आपको कुछ डिपॉजिट करना होगा. जनरल को 15 फीसदी, OBC को 12.5 फीसदी, SC/ST और दिव्‍यांग को 10 फीसदी का कंट्रीब्‍यूशन देना होगा. सब्सिडी भी मिलेगी उत्तर प्रदेश सरकार की यह योजना प्रोजेक्‍ट के तहत 10 फीसदी मार्जिन मनी भी दी जाएगी. अगर 2 साल तक बिजनेस का सफल संचालन होगा तो यह मार्जिन मनी सब्सिडी में बदल जाएगी. इसका मतलब है कि आपको यह पैसा लौटाने की जरूरत नहीं है. 

एयरफोर्स की ताकत: पहाड़ हो या रेगिस्तान, 24,000 फीट की ऊंचाई से करेगा प्रहार

नई दिल्ली  भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. रक्षा मंत्रालय (MoD) भारतीय सेना के लिए 20 टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम (RPAS) खरीदने की तैयारी में है. यह पूरी परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत होगी, जिससे देश में ही अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक का विकास और निर्माण संभव हो सकेगा. इन मानवरहित एयर सिस्‍टम्‍स (UAV) को खासतौर पर भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाएगा. ये ड्रोन दिन और रात, दोनों समय मिशन को अंजाम देने में सक्षम होंगे. तेज हवा, बारिश और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी ये प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगे. भारत के पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों, घने जंगलों और सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों में आर्मी को इन ड्रोन से बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये ड्रोन मॉड्यूलर प्लेटफॉर्म पर आधारित होंगे. इसका मतलब यह है कि भविष्य में जरूरत के हिसाब से इनमें नए सिस्टम और तकनीक जोड़ी जा सकेंगी. इनमें अलग-अलग तरह के आधुनिक पेलोड लगाए जा सकेंगे जैसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड (EO/IR) कैमरे, संचार खुफिया (COMINT), इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT), सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) और फॉरेन ओपन रडार (FOPEN). इससे निगरानी, टोही और खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी. होश उड़ाने वाली खासियत बताया जा रहा है कि इन ड्रोन की उड़ान क्षमता भी काफी प्रभावशाली होगी. ये कम से कम 8 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकेंगे. लाइन ऑफ साइट (LOS) के जरिए इनकी रेंज लगभग 120 किलोमीटर होगी, जबकि सैटेलाइट कम्युनिकेशन (SATCOM) के जरिए यह दूरी करीब 400 किलोमीटर तक पहुंच जाएगी. साथ ही ये ड्रोन 24,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर भी ऑपरेट कर सकेंगे, जो ऊंचे पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में बेहद अहम है. सबसे अहम बात यह है कि ये ड्रोन पूरी तरह हथियारबंद होंगे. इनमें न्यूनतम 200 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने की क्षमता होगी. ये हवा से जमीन पर सटीक हमला करने वाले हथियार, ग्लाइड बम और लोइटरिंग म्यूनिशन से लैस किए जा सकेंगे. इससे भारतीय सेना की मारक क्षमता और जवाबी कार्रवाई की ताकत में बड़ा इजाफा होगा. इलेक्‍ट्रॉनिक वॉरफेयर का सिकंदर ड्रोन को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वे दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जीएनएसएस-डिनाइड (GNSS से वंचित) माहौल में भी काम कर सकें. इनमें सुरक्षित ड्यूल-बैंड डेटा लिंक और सैटेलाइट कम्युनिकेशन बैकअप होगा, जिससे मिशन के दौरान संपर्क बना रहे. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ाएगी, बल्कि देश में ड्रोन और रक्षा तकनीक से जुड़े उद्योगों को भी नई ऊंचाई देगी. ‘मेक इन इंडिया’ के तहत यह सौदा भारत को आधुनिक युद्ध तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और मजबूत कदम माना जा रहा है.

खदान विवाद में संजय पाठक की मुश्किलें बढ़ीं, 443 करोड़ की वसूली मामले में बड़ी कार्रवाई तय

जबलपुर  कटनी के विजयराघवगढ़ से भाजपा विधायक संजय पाठक से जुड़ी खनन कंपनियों के खिलाफ खनिज विभाग ने 443 करोड़ रुपये की रिकवरी को लेकर सख्त रुख अपना लिया है। जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील में संचालित तीन लौह अयस्क खदानों में निर्धारित सीमा से अधिक खनन के मामले में विभाग द्वारा जारी दो नोटिस और अंतिम चेतावनी के बावजूद कंपनियों ने न तो कोई जवाब दिया है और न ही राशि जमा की है। खनिज विभाग ने 4 दिसंबर को अंतिम नोटिस जारी किया था, जिसकी समय-सीमा 23 दिसंबर की शाम को समाप्त हो गई। विभागीय सूत्रों के अनुसार अब रिकवरी आरोपित कर दी गई है और वसूली के लिए अधिकृत कार्रवाई शुरू कर दी गई है। तय राशि जमा नहीं होने पर नियमों के तहत खदान या उतनी ही कीमत की संपत्ति को सीज किया जा सकता है। यह मामला सिहोरा क्षेत्र की निर्मला मिनरल, आनंद मिनरल और पैसिफिक मिनरल नामक तीन लौह अयस्क खदानों से जुड़ा है। भले ही विधायक संजय पाठक इनके प्रत्यक्ष मालिक न हों, लेकिन विभागीय रिकॉर्ड में इन पर उनका आधिपत्य दर्ज है। जांच में अनुमति से अधिक खनन की पुष्टि हुई है, जिसके आधार पर 443 करोड़ रुपये की पेनल्टी तय की गई है। अब खनिज विभाग डिमांड नोटिस जारी करेगा। साथ ही, जियोमाइन बेनिफिकेशन प्लांट सहित अन्य खदानों को लेकर केंद्रीय पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जांच में भी कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है।  अधिकारियों का कहना है कि नोटिस का जवाब मिलने के बाद ही अगला कदम तय किया जाएगा, लेकिन यदि निर्धारित समय सीमा में संतोषजनक उत्तर नहीं मिला तो कुर्की की कार्रवाई शुरू की जाएगी। माइनिंग विभाग जल्द ही RRC जारी करने की भी तैयारी में है। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पाई गई अनियमितताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस कार्रवाई ने खनन कारोबार से जुड़े कई व्यापारियों में भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि पहली बार सत्तारूढ़ दल के किसी विधायक की कंपनियों पर इतना बड़ा दंड लगाया गया है। विधायक संजय पाठक ने अब तक इस मामले पर चुप्पी साध रखी है, जिससे अटकलें और बढ़ गई हैं। सरकार द्वारा अपने ही पार्टी विधायक के खिलाफ इतनी कड़ी कार्रवाई करने से यह मामला और भी सुर्खियों में है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन आगे की कार्रवाई कितनी तेजी और निष्पक्षता से करता है। यह मामला न सिर्फ राजनीतिक वाद-विवाद का केंद्र बना हुआ है बल्कि प्रदेश में खनन गतिविधियों की निगरानी और नियमन पर भी नए सवाल खड़े कर रहा है।

AERB लाइसेंस के बाद रीवा अस्पताल में शुरू होगी कैंसर यूनिट, इलाज होगा आसान और नजदीकी

रीवा  नए साल से पहले रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल को बड़ी राहत मिली है। अस्पताल में बनने वाली कैंसर यूनिट को चलाने की मंजूरी मिल गई है। अब AERB से लाइसेंस मिलने के बाद कैंसर के इलाज में काम आने वाली मशीनें चालू की जा सकेंगी।  अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा ने बताया कि अब रेडिएशन थेरेपी जैसी नई और जरूरी मशीनें इस्तेमाल में लाई जा सकेंगी। अगर सब कुछ ठीक रहा, तो मार्च या अप्रैल 2026 तक विंध्य इलाके में कैंसर का अच्छा इलाज शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अस्पताल काफी समय से इस मंजूरी का इंतजार कर रहा था। मशीनें पहले ही लग चुकी थीं, लेकिन लाइसेंस न मिलने की वजह से उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा था। अब यह परेशानी खत्म हो गई है और कैंसर मरीजों को बड़ा फायदा मिलेगा। संजय गांधी अस्पताल में कैंसर के इलाज के लिए अलग से एक नई और आधुनिक यूनिट बनाई जा रही है। इसके शुरू होने से विंध्य क्षेत्र के लाखों लोगों को राहत मिलेगी। अब मरीजों को इलाज के लिए भोपाल, जबलपुर या दिल्ली जैसे दूर शहरों में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये अस्पताल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे इलाके के लिए एक बड़ी और अच्छी खबर है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे मरीजों के लिए यह उम्मीद की नई शुरुआत मानी जा रही है।  

देश का पहला ‘रेड कार्पेट’ रोड एमपी में, वाहनों की गति पर नियंत्रण और जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए तैयार

 जबलपुर  मध्य प्रदेश में भोपाल-जबलपुर नेशनल हाईवे के जंगली इलाके से गुजरने वाले हिस्से पर एनएचएआई ने देश का पहला वाइल्डलाइफ-सुरक्षित रोड कॉरिडोर बनाया है। यह 12 किलोमीटर का खास हिस्सा वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से होकर निकलता है। यहां स्पीड कंट्रोल डिजाइन, फेंसिंग, एनिमल अंडरपास और इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग का पूरा इंतजाम है। इसका मकसद जानवरों की सड़क हादसों में मौत को कम करना है।  एनएचएआई ने भारत का पहला 'वाइल्डलाइफ-सेफ' रोड कॉरिडोर बनाया है। यह कॉरिडोर खास तौर पर जानवरों को सड़क पार करते समय होने वाली मौतों को रोकने के लिए बनाया गया है। यह NH-45 के 12 किलोमीटर लंबे हिस्से पर है, जो मध्य प्रदेश के एक महत्वपूर्ण बाघ अभयारण्य, वीरंगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है। इस कॉरिडोर में स्पीड कम करने वाले डिजाइन, फेंसिंग, जानवरों के लिए अंडरपास और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी जैसी कई चीजें शामिल हैं। इसका मकसद सिर्फ यह देखना नहीं है कि जानवर कहां से सड़क पार करते हैं, बल्कि यह भी देखना है कि गाड़ियां कैसे चलती हैं। गाड़ियों की स्पीड है अधिक इस सड़क पर गाड़ियों की संख्या और रफ्तार काफी बढ़ गई है। पहले यह दो-लेन वाली सड़क थी, जिसे अब चार-लेन का बना दिया गया है। इस पर तेज रफ्तार वाली गाड़ियां, भारी सामान ले जाने वाले ट्रक और ऐसे वाहन चलते हैं जो रास्ते में रुकना पसंद नहीं करते। इसी को ध्यान में रखते हुए एनएचआई ने इसे देश की पहली 'वाइल्डलाइफ-सेंसिटिव' 'रेड रोड' बताया है। दो किमी है रेड रोड इस नई डिजाइन के बीचों-बीच एक 2 किलोमीटर का जोन है, जो पहली नजर में सजावटी लगता है। इस जोन में सड़क के ऊपर लाल रंग की थर्मोप्लास्टिक मार्किंग की गई है। यह 5mm मोटी है और सड़क पर एक लगातार पट्टी की तरह बिछाई गई है। एनएचआई के क्षेत्रीय अधिकारी एसके सिंह ने बताया कि इस खतरे को कम करने के लिए, NHAI ने टाइगर रिजर्व के अंदर खतरे वाले जोन में सड़क पर 5mm मोटी लाल सतह वाली परत 'टेबल-टॉप' बिछाई है। यह चमकीला लाल रंग ड्राइवरों को संकेत देता है कि वे एक ऐसे हिस्से में प्रवेश कर रहे हैं, जहां वन्यजीवों का ध्यान रखना जरूरी है। साथ ही, इसकी थोड़ी उठी हुई सतह अपने आप ही गाड़ी की रफ्तार कम कर देती है। उन्होंने आगे कहा कि मेरी जानकारी के अनुसार, यह देश में लागू किया गया पहला ऐसा कॉन्सेप्ट है। मार्किंग के हैं दो फायदे इस प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इन मार्किंग के दो फायदे हैं। पहला, यह देखने में ड्राइवरों को यह बताता है कि वे जंगल वाले हिस्से में जा रहे हैं, जहां सड़क के नियम थोड़े बदल जाते हैं। दूसरा, यह सड़क पर एक हल्का कंपन पैदा करता है, जो ड्राइवरों को स्पीड ब्रेकर की तरह अचानक झटका दिए बिना, धीरे-धीरे अपनी गाड़ी की रफ्तार कम करने के लिए प्रेरित करता है। स्पीड ब्रेकर को तेज रफ्तार वाली हाईवे पर असुरक्षित माना जाता है। यह तरीका दूसरे देशों में काफी इस्तेमाल होता है, लेकिन भारत के नेशनल हाईवे पर, खासकर वन्यजीवों वाले इलाकों में, यह बहुत कम देखने को मिलता है। जानवरों के लिए है यह सुरक्षित वन्यजीव संरक्षण वैज्ञानिक लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि गाड़ी की रफ्तार ही यह तय करती है कि सड़क पार कर रहे जानवर को समय पर देखा जा सकेगा या नहीं, और ड्राइवर के पास रुकने या मुड़ने के लिए पर्याप्त दूरी होगी या नहीं। अंडरपास और फेंसिंग यह तय करते हैं कि जानवर कहां से सड़क पार करेंगे, लेकिन जब कुछ गलत होता है तो रफ्तार ही सब कुछ तय करती है. NH-45 पर, लाल रंग से चिह्नित यह हिस्सा गाड़ियों को उन जगहों पर पहुंचने से काफी पहले धीरे-धीरे धीमा करने के लिए बनाया गया है, जहां जानवरों के निकलने की सबसे ज्यादा संभावना होती है। लाल पट्टी का अनोखा आइडिया इस कॉरिडोर में सबसे खास है 2 किलोमीटर की लाल रंग वाली सड़क। यहां एस्फाल्ट पर 5 मिलीमीटर मोटी लाल थर्मोप्लास्टिक लेयर बिछाई गई है। यह पट्टी दूर से चमकती दिखती है और ड्राइवर को अलर्ट करती है कि वे वाइल्डलाइफ जोन में प्रवेश कर रहे हैं। एनएचएआई के रीजनल ऑफिसर एस.के. सिंह कहते हैं, "यह लाल सरफेस हल्की ऊंचाई वाली है। इससे गाड़ी के टायरों में हल्का कंपन होता है, जिससे स्पीड अपने आप कम हो जाती है। स्पीड ब्रेकर जैसा झटका नहीं लगता, जो हाई-स्पीड हाईवे पर सुरक्षित नहीं होता।" उनका दावा है कि देश में यह पहला ऐसा प्रयोग है। विदेशों में यह तरीका काफी इस्तेमाल होता है। यह डिजाइन दो काम करता है। एक तो विजुअल अलर्ट देता है, दूसरा स्पीड को धीरे-धीरे कम करता है। इससे ड्राइवर को जानवर दिखने पर ब्रेक लगाने या स्वर्व करने का मौका मिल जाता है। दो किमी है रेड रोड इस नई डिजाइन के बीचों-बीच एक 2 किलोमीटर का जोन है, जो पहली नजर में सजावटी लगता है। इस जोन में सड़क के ऊपर लाल रंग की थर्मोप्लास्टिक मार्किंग की गई है। यह 5mm मोटी है और सड़क पर एक लगातार पट्टी की तरह बिछाई गई है। एनएचआई के क्षेत्रीय अधिकारी एसके सिंह ने बताया कि इस खतरे को कम करने के लिए, NHAI ने टाइगर रिजर्व के अंदर खतरे वाले जोन में सड़क पर 5mm मोटी लाल सतह वाली परत 'टेबल-टॉप' बिछाई है। यह चमकीला लाल रंग ड्राइवरों को संकेत देता है कि वे एक ऐसे हिस्से में प्रवेश कर रहे हैं, जहां वन्यजीवों का ध्यान रखना जरूरी है। साथ ही, इसकी थोड़ी उठी हुई सतह अपने आप ही गाड़ी की रफ्तार कम कर देती है। उन्होंने आगे कहा कि मेरी जानकारी के अनुसार, यह देश में लागू किया गया पहला ऐसा कॉन्सेप्ट है। मार्किंग के हैं दो फायदे इस प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इन मार्किंग के दो फायदे हैं। पहला, यह देखने में ड्राइवरों को यह बताता है कि वे जंगल वाले हिस्से में जा रहे हैं, जहां सड़क के नियम थोड़े बदल जाते हैं। दूसरा, यह सड़क पर एक हल्का कंपन पैदा करता है, जो ड्राइवरों को स्पीड ब्रेकर की तरह अचानक झटका दिए बिना, धीरे-धीरे अपनी गाड़ी की रफ्तार कम करने के … Read more

छत्तीसगढ़वासियों के लिए खुशखबरी: पीएम आवास योजना में मिलने वाली राहत पर राज्य सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा

रायपुर  राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) की अवधि एक वर्ष बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव में योजना को 26 दिसंबर 2026 तक विस्तारित करने का अनुरोध किया गया है, जिसे लेकर मंजूरी मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। राज्य पर विशेष प्रभाव नहीं अधिकारियों का कहना है कि यदि योजना बंद भी होती है, तो राज्य पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि अधिकांश आवासों का कार्य प्रारंभ हो चुका है। वर्तमान स्थिति में योजना के तहत स्वीकृत कुल आवासों में से केवल 481 आवासों का निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है, जबकि 25,758 आवास प्रगतिरत हैं। यदि नगर निगम और नगर पालिकाएं प्रगतिरत आवासों का निर्माण 31 दिसंबर 2025 तक पूर्ण कर उसका क्लेम प्रस्तुत करती हैं, तो संबंधित राशि जारी कर दी जाएगी। योजना के अंतर्गत घटक लाभार्थी आधारित व्यक्तिगत आवास निर्माण (बीएलसी) के तहत 2,06,118 और भागीदारी में किफायती आवास निर्माण (एएचपी) के तहत 27,475 आवास स्वीकृत किए गए थे। 2,17,022 आवास पूरे दोनों घटकों के तहत स्वीकृत आवासों में से 2,17,022 आवास पूरे कर लिए गए हैं। कुल मिलाकर 89 प्रतिशत आवास पूर्ण किए जा चुके हैं। नगरीय प्रशासन विभाग को नवंबर में केंद्रीय आवासन व शहरी कार्य मंत्रालय से पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि पीएम आवास योजना (शहरी) की अवधि दिसंबर 2025 में समाप्त हो रही है। पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि अप्रारंभ आवासों के लिए किसी प्रकार की राशि जारी नहीं की जाएगी और ऐसे आवासों को दिसंबर 2025 तक पूर्ण किया जाना संभव नहीं होने की स्थिति में निर्माण कार्य शुरू न किया जाए। केंद्र से मिले निर्देशों के आधार पर नगरीय प्रशासन विभाग ने सभी नगरीय निकायों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए थे। साथ ही, राज्य सरकार की ओर से योजना की समयावधि बढ़ाने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा गया है, ताकि प्रगतिरत आवासों का निर्माण पूरा कराया जा सके। आवासों की स्थिति घटक का नाम- स्वीकृत- पूर्ण – प्रगतिरत – अप्रारंभ बीएलसी- 2,06,118 – 1,89,547 – 16,264 – 307 एएचपी- 37,143 – 27,475 – 9,494 – 174 छत्तीसगढ़ में इंतजार की लंबी कतार राजस्थान के दौसा जिले में नवल किशोर मीणा और संतोष मीणा पिछले सात साल से अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं. कड़ाके की ठंड में यह परिवार खेतों के बीच तिरपाल और बांस-बल्लियों के सहारे जिंदगी गुजार रहा है. जिला कलेक्टर का कहना है कि तकनीकी कारणों से मकान नहीं मिल पाए हैं.  वहीं, छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में अनु जैसी महिलाएं फॉर्म भरकर सालों से बैठी हैं, उन्हें पीएम मोदी के वादे पर भरोसा तो है, लेकिन सिस्टम की सुस्ती से उनके पक्के घर की उम्मीद अब दम तोड़ रही है. पंजाब में अधिकारियों की गलती का भारी खामियाजा पंजाब के फरीदकोट में प्रशासन की एक गलत सलाह ने गरीबों को सड़क पर ला दिया है. नगर पालिका ने 284 परिवारों से कहा कि अगर योजना का लाभ चाहिए तो पुराने मकान तोड़ने होंगे. लोगों ने पैसे की उम्मीद में अपने आशियाने उजाड़ दिए, लेकिन अब अधिकारी वेरिफिकेशन में गलती की दलील देकर राशि देने से इनकार कर रहे हैं. आज ये परिवार धर्मशालाओं में रहने को मजबूर हैं और अपने हक के लिए नगर पालिका के बाहर धरना दे रहे हैं. सात करोड़ से अधिक की राशि अब भी अधर में है. हरियाणा और महाराष्ट्र में अटकी दूसरी किस्त हरियाणा के करनाल में श्यामलाल जैसे लाभार्थियों ने पहली किस्त मिलने के बाद उधार लेकर मकान का काम शुरू करवाया, लेकिन दूसरी किस्त साल भर से नहीं आई. अब वे आधे-अधूरे घर को छोड़कर दूसरों के मकानों में किराए पर रह रहे हैं. महाराष्ट्र के पुणे में भी देवराम कडाले को दो साल पहले अर्जी देने के बाद सिर्फ 85 हजार रुपये मिले हैं, जबकि डेढ़ लाख का वादा था. देश के कई हिस्सों में लाभार्थी अफसरों के चक्कर काटकर थक चुके हैं, पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है. सिस्टम के पेच में फंसा गरीबों का आशियाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संकल्प है कि जब तक हर गरीब को पक्का घर नहीं मिल जाता, वे रुकने वाले नहीं हैं. उन्होंने पिछले 11 साल में 4 करोड़ घर बनाने और अगले 3 करोड़ नए घर बनाने का टारगेट रखा है. हालांकि, आजतक की पड़ताल बताती है कि सरकारी बाबू और फंड की कमी इस नेक योजना के रास्ते में रोड़ा बन रहे हैं. जब तक ग्राउंड लेवल पर किस्तों का भुगतान समय पर नहीं होगा और भ्रष्टाचार कम नहीं होगा, तब तक गरीबों की किस्मत नहीं बदलेगी.

मंगल पर कभी बहती थीं नदियां! वैज्ञानिकों ने खोजे 16 प्राचीन नदी मार्ग, पूरा मैप तैयार

कैलिफोर्निया  नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने मंगल पर गंगा जैसी विशाल प्राचीन नदियों की खोज की है. पहली बार 16 बड़े ड्रेनेज बेसिन का पूरा नक्शा तैयार हुआ, जो बताता है कि मंगल कभी गर्म, नम और जीवन योग्य था. यह खोज भविष्य के जीवन-खोज मिशनों के लिए अहम साबित होगी.  भारत में बहने वाली गंगा नदी की तरह ही, ऑस्टिन स्थित Texas University ने, मंगल ग्रह पर मौजूद बहुत बड़ी और पुरानी नदी प्रणालियों का नक्शा बनाया है. इससे वैज्ञानिकों को मंगल के प्राचीन जल नेटवर्क के बारे में नई बातें पता चली हैं. उनका यह नया अध्ययन PNAS नाम की पत्रिका में छपा है. उन्होंने 16 बड़ी नई नदी घाटियों की पहचान की है. यह पहली बार है कि मंगल ग्रह की इतनी बड़ी जल निकासी प्रणालियों का पूरा नक्शा तैयार किया गया है. इन खोजों से उन जगहों के बारे में पता चलता है जहां पहले जीवन की संभावना सबसे अधिक रही होगी.  कैसे बनी मंगल पर नदियां? अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर बारिश होती थी जिस वजह से घाटियां और नदियां बन गईं. यह पानी बहकर बड़ी घाटियों और शायद बहुत बड़े पुराने महासागरों तक पहुंचता था. पानी की इस प्रणालियों ने ऐसा माहौल बनाया जो धरती पर जीवन से भरा होता है जैसे कि अमेजन नदी का इलाका. ये बड़ी जल प्रणालियां संभावित मंगल ग्रह के जीवन के लिए एक जन्मस्थान का काम कर सकती थीं.  किसने बनाया ये नक्शा? इन मैप को बनाने का काम यूटी जैक्सन स्कूल ऑफ जियोसाइंसेज के सहायक प्रोफेसर टिमोथी ए. गौडगे और पोस्टडॉक्टरल फेलो अब्दुल्ला एक.जकी ने किया. उन्होंने पहले से मौजूद मंगल ग्रह की घाटियों, झीलों और नदियों के डेटा को एक साथ मिलाया. ऐसा करके उन्होंने पूरे ग्रह के पानी के बहाव के रास्ते का पूरा नक्शा तैयार किया.  कैसे की गई ये खोज? वैज्ञानिकों ने 19 प्रमुख समूह खोजे जिसमें घाटियां, नदियां झीलें और जमा हुई मिट्टी शामिल हैं. इनमें से 16 समूहों का जलग्रहण इलाका 1 लाख वर्ग किमी से भी बड़ा था. यह आकार लगभग धरती पर मौजूद बड़ी नदी घाटियों जितना ही है. अब्दुल्ला एक.जकी ने कहा, 'हमने सबसे आसान काम किया जो किया जा सकता था और हमने बस उनका नक्शा बनाया और उन्हें एक साथ जोड़ दिया'. क्या ऐसा होना आम बात है? धरती पर इतनी बड़ी बेसिन का होना आम बात है. धरती पर 91 पानी इकट्ठा करने वाले क्षेत्र हैं जिसमें 62 लाख वर्ग किमी का अमेजन नदी बेसिन भी शामिल है जो बहुत बड़ा है. लेकिन इसके उलट मंगल ग्रह पर कम बड़े दल निकासी प्रणालियां हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका कारण यह है कि मंगल ग्रह पर अलग-अलग तरह की जमीन बनाती है जिससे बड़ी नदी प्रणालियों को सहारा मिलता है. मंगल ग्रह पर यह गतिविधि नहीं है इसलिए वहां कम बड़ी नदियां हैं.  क्यों हैं ये 16 बड़ी नदियां सबसे अहम? मंगल ग्रह पर ये बड़ी नदी प्रणालियां उसके पुराने भूभाह का सिर्फ 5% हिस्सा ही कवर करती हैं. लेकिन, वैज्ञानिकों ने पाया कि ग्रह पर नदियों से जो मिट्टी और तलछट जमा हुई है उसका लगभग 42% हिस्सा इन्हीं 16 बड़ी प्रणालियों से आया है. जकी ने कहा, तलछट में महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं इसलिए यह जानने के लिए और शोध करना होगा कि तलछट आखिर कहां जाकर जमा हुई.   पहली बार बना मंगल का ग्लोबल नदी नक्शा वैज्ञानिकों ने मंगल का यह नक्शा नासा के मिशनों की मदद से बनाया. उन्होंने इस्तेमाल किया Mars Orbiter Laser Altimeter (MOLA) का डाटा, CTX कैमरा, Mars Reconnaissance Orbiter और फिर ArcGIS Pro सॉफ्टवेयर में नदियों, घाटियों, झीलों और तलछट के निशान ट्रेस किए. कुल 19 समूह मिले, जिनमें से 16 को बड़े ड्रेनेज बेसिन माना गया. हर बेसिन 1 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा फैला था. डॉ गौड्ज कहते हैं कि हमें पता था कि मंगल पर नदियां थीं, लेकिन वे कितनी बड़ी और कितनी संगठित थीं, ये पहली बार साफ दिखा. पांच प्रतिशत जमीन पर बने बेसिन  अध्ययन के अनुसार, ये 16 बेसिन मंगल की प्राचीन सतह के सिर्फ 5% हिस्से में फैले थे. लेकिन इन्होंने कुल नदी-जनित क्षरण (erosion) का लगभग 42% हिस्सा किया और करीब 28,000 क्यूबिक किलोमीटर तलछट (sediment) बहाकर ले गए. तलछट में जीवन के पोषक तत्व सबसे अच्छे से बचते हैं. इसलिए इन जगहों को वैज्ञानिक जीवन की खोज के लिए अहम जगह मान रहे हैं. धरती पर बड़ी नदियां इसलिए बनती हैं क्योंकि यहां टेक्टोनिक प्लेट्स पहाड़ और घाटियां बनाती रहती हैं. लेकिन मंगल पर ऐसी प्लेट्स नहीं हैं. इसी वजह से मंगल पर केवल 16 बड़े नदी बेसिन मिले, जबकि धरती पर 91 से ज्यादा हैं. जैसे 62 लाख वर्ग किमी वाला अमेजन बेसिन. मंगल पर कब आया पानी, कब गया पानी? पुराने अध्ययनों के अनुसार, मंगल लगभग 4.5 अरब साल पहले बना. सतह पर पानी करीब 2 अरब साल तक रहा. बाद में ग्रह का वातावरण और चुंबकीय ढाल कमजोर पड़ गई और सूर्य की किरणों ने धीरे-धीरे इसका पानी छीन लिया. आज जो सूखा मंगल दिखता है, वह कभी पानी और नदियों से भरा ग्रह था. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये 16 बड़े नदी बेसिन अब उन जगहों में शामिल होंगे, जहां भावी मंगल मिशन जीवन के संकेत ढूंढेंगे. डॉ गौड्ज कहते हैं कि अगर कभी मंगल पर जीवन रहा होगा, तो उसके निशान इन बेसिनों में मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है. यह खोज मंगल के मौसम और उसके पिछले इतिहास के बारे में हमारी समझ बदल देती है. अब यह साफ हो रहा है कि मंगल पर कभी धरती जैसा पानी का बड़ा चक्र चलता था.

तीन नई एयरलाइंस को NOC जारी, जानें क्यों जरूरी थी नई कंपनियों की एंट्री, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

नई दिल्ली  भारत सरकार ने देश में एविएशन सेक्टर को और मजबूती देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने तीन नई एयरलाइंस-शंख एयर, अलहिंद एयर और फ्लाई एक्सप्रेस को परिचालन के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इन एयरलाइंस के शुरू होने से न सिर्फ इंडिगो और एयर इंडिया पर निर्भरता कम होगी, बल्कि देशभर में हवाई कनेक्टिविटी को भी नया विस्तार मिलेगा। सरकार ने इन तीनों कंपनियों को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया है। इंडिगो से जुड़ी हालिया परिचालन चुनौतियों और बढ़ती यात्रियों की संख्या को देखते हुए यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है।  कब से शुरू होंगी नई एयरलाइंस? NOC मिलने का मतलब यह नहीं है कि ये एयरलाइंस तुरंत उड़ानें शुरू कर देंगी। इसका अर्थ केवल इतना है कि अब ये कंपनियां एयरलाइंस स्थापित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती हैं। यात्रियों को इन सेवाओं का लाभ मिलने में अभी कुछ समय लगेगा। एयरलाइंस शुरू करने के लिए क्या प्रक्रियाएं होंगी पूरी? NOC मिलने के बाद एयरलाइंस कंपनियों को DGCA से एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट (AOC) प्राप्त करना होगा। इसके अलावा विमानों की व्यवस्था, पायलट और केबिन क्रू की नियुक्ति, रूट नेटवर्क की योजना और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। यह पूरी प्रक्रिया आमतौर पर कई महीनों में पूरी होती है, जिसके दौरान एयरलाइंस की वित्तीय स्थिति और परिचालन क्षमता की भी जांच होती है। अल हिंद एयर और फ्लाईएक्सप्रेस परिचालन बेड़े में शामिल होने को तैयार  अल हिंद एयर को केरल-स्थित अलहिंद ग्रुप का समर्थन प्राप्त है। फ्लाईएक्सप्रेस ऐसे इच्छुक एयरलाइंस समूह में शामिल हो रही है, क्योंकि भारत दुनिया के तेजी से बढ़ते एयरलाइन बाजारों में व्यापक भागीदारी के लिए प्रयास कर रहा है।   यह कदम अक्टूबर में क्षेत्रीय खिलाड़ी फ्लाई बिग के निलंबन के बाद आया, जिससे परिचालन घरेलू कैरियरों की संख्या घटकर 9 रह गई। इन 3 एयरलाइंस की मंजूरी हाल के दिनों में प्रमुख एयरलाइंस, खासकर इंडिगो में हुए परिचालन व्यवधानों से उत्पन्न बाजार चिंताओं के बीच आई है।  क्षेत्रीय भागीदारी आकर्षित करने के लिए सरकारी प्रोत्साहन  नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने उड़ान योजना के तहत, विशेषकर कम-सेवा वाले क्षेत्रों में एयरलाइन भागीदारी बढ़ाने पर अपना केन्द्रित रखा है।   इस योजना के माध्यम से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में विस्तार हुआ है, जहां स्टार एयर, फ्लाई91, और इंडियावन एयर जैसे छोटे कैरियर कम-ज्ञात मार्गों पर सेवाएँ दे रहे हैं।   नवमंजूर एयरलाइंस संभवतः ऐसे मार्गों का उपयोग करके बड़े पैमाने पर केंद्रीकृत उद्योग में अपने परिचालन स्थापित करेंगी।  हालिया बाजार रुझान और पिछली एयरलाइन विफलताएँ  नए कैरियरों का प्रवेश उस अवधि के बाद हो रहा है जब जेट एयरवेज और गो फर्स्ट जैसी एयरलाइंस वित्तीय चुनौतियों के कारण परिचालन से बाहर हो गईं।   नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अस्थिरता ने स्थिरता और लागत प्रबंधन को प्रमुख परिचालन प्राथमिकताएँ बना दिया है।   वर्तमान में, भारत की अनुसूचित एयरलाइंस में इंडिगो, एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस, एलायंस एयर, अकासा एयर, स्पाइसजेट, स्टार एयर, फ्लाई91, और इंडियावन एयर शामिल हैं।  निष्कर्ष  अल हिंद एयर, फ्लाईएक्सप्रेस, और शंख एयर का जुड़ना भारत के काफी केंद्रीकृत एयरलाइन उद्योग में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। ये अनुमोदन मौजूदा प्रमुख कैरियरों पर यात्रियों की निर्भरता कम करने में सहायक हो सकते हैं।  नई एयरलाइंस की ज़रूरत क्यों पड़ी? भारत का एविएशन बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। नई एयरलाइंस के जुड़ने से यात्रियों को ज़्यादा सीटें, बेहतर कनेक्टिविटी और प्रतिस्पर्धी किराए मिलेंगे। साथ ही बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सेवा की गुणवत्ता में भी सुधार होगा और यात्रियों के पास फ्लाइट चुनने के अधिक विकल्प होंगे। ये हैं नई एयरलाइंस जो होंगी शुरू शंख एयरः उत्तर प्रदेश स्थित शंख एयर की उड़ानें 2026 की शुरुआत में शुरू होने की संभावना है। कंपनी अगले तीन वर्षों में अपने बेड़े में 20 से 25 विमान शामिल करने की योजना बना रही है। इसका लक्ष्य देश के प्रमुख शहरों और राज्यों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करना है। अलहिंद एयरः अलहिंद एयर केरल स्थित अलहिंद ग्रुप की पहल है, जिसे ट्रैवल और टूरिज़्म सेक्टर का लंबा अनुभव है। यह एयरलाइन क्षेत्रीय और लो-कॉस्ट उड़ानों पर फोकस करेगी, ताकि आम लोग भी किफायती दरों पर हवाई सफर कर सकें। फ्लाई एक्सप्रेसः फ्लाई एक्सप्रेस का उद्देश्य यात्रियों के साथ-साथ एयर-कार्गो सेवाओं को भी बढ़ावा देना है। कच्चे माल से लेकर तैयार उत्पादों की ढुलाई को आसान बनाते हुए यह एयरलाइन घरेलू कार्गो सेक्टर की बढ़ती मांग को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकती है। विमानन क्षेत्र में एकाधिकार खत्म करने की कवायद वर्तमान में भारतीय आसमान पर टाटा समूह की एअर इंडिया और इंडिगो का एकछत्र राज है। डीजीसीए  के आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू बाजार का 90% से अधिक हिस्सा इन्हीं दो समूहों के पास है। इसमें भी करीब 65% हिस्सेदारी अकेले इंडिगो के पास है। इस 'डुओपोली' के कारण अक्सर यात्रियों को सीमित विकल्पों और मनमाने किरायों का दंश झेलना पड़ता है। हाल ही में इंडिगो एयरलाइन में आई तकनीकी खामियों ने यह साबित कर दिया कि बाजार का एक ही खिलाड़ी पर अत्यधिक निर्भर होना कितना जोखिम भरा हो सकता है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि सरकार का उद्देश्य विमानन बाजार में नए खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना है ताकि बाजार में संतुलन बना रहे और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। कौन हैं विमानन बाजार के नए खिलाड़ी? 1. अल-हिंद एयर  केरल स्थित अल-हिंद ग्रुप द्वारा प्रवर्तित यह एयरलाइन दक्षिण भारत से अपनी शुरुआत करने जा रही है। अल-हिंद ग्रुप पहले से ही ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर में एक बड़ा नाम है, जिसका टर्नओवर लगभग 20,000 करोड़ रुपये बताया जाता है। कंपनी की योजना शुरुआत में एटीआर-72 (ATR-72) विमानों के साथ क्षेत्रीय मार्गों पर उड़ान भरने की है, और भविष्य में एयरबस A320 विमानों के साथ अंतरराष्ट्रीय मार्गों, विशेषकर खाड़ी देशों (Gulf countries) को जोड़ने का लक्ष्य है। अल हिन्द एयर का प्रवर्तक केरल स्थित अल हिन्द ग्रुप है। इस समूह की जड़ें 1990 के दशक की शुरुआत में जमी थीं, जब इसने एक छोटी ट्रैवल एजेंसी के रूप में शुरुआत की थी।  मीडिया रिपोर्ट्स और कंपनी के दावों के अनुसार, समूह का कुल टर्नओवर 20,000 करोड़ रुपये से अधिक है ।  ट्रैक्सन (Tracxn) के आंकड़ों के अनुसार, … Read more

महिला यात्रियों के लिए नया नियम: कैब बुक करते समय चुन सकेंगी महिला ड्राइवर

नई दिल्ली देश में अब बहुत से लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बजाय ओला, उबर और रैपिड जैसी कैब सर्विसेज का सहारा ले रहे हैं. लेकिन इन कैब में कई बार कुछ ऐसी घटनाएं भी हो जाती है. जो यात्रियों को असहज और असुरक्षित महसूस करवा देती हैं. खासतौर पर महिला यात्रियों के साथ ऐसा होता ज्यादा देखा गया है. यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने  ने मोटर व्हीकल एग्रीगेटर्स गाइडलाइंस 2025 में बदलाव किए हैं.  इन नए नियमों का सीधा असर कैब बुकिंग के तरीके पर पड़ेगा. खास बात यह है कि महिला यात्रियों को अब राइड बुक करते समय महिला ड्राइवर चुनने का ऑप्शन मिल सकता है. लंबे समय से महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच इसे एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है.  कब से लागू होंगे नए नियम? सरकार की ओर से नोटिफिकेशन के जारी होने के बाद अब महिला यात्रियों के मन में सवाल आ रहा है आखिर यह नियम कब से लागू होगा. तो बता दें नोटिफिकेशन में किसी तय तारीख का साफ तौर पर जिक्र नहीं किया गया है. आमतौर पर ऐसी गाइडलाइंस जारी होते ही प्रभावी मानी जाती हैं. लेकिन इन्हें जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी राज्यों की होती है. इससे पहले जब जुलाई 2025 में एग्रीगेटर गाइडलाइंस लागू की गई थीं. तब राज्यों को तीन महीने का समय दिया गया था.  माना जा रहा है कि संशोधित नियमों के लिए भी राज्यों को इसी तरह का वक्त मिल सकता है. राज्य सरकारें अपने स्तर पर लाइसेंसिंग नियमों में बदलाव करेंगी और उसके बाद ही यह नियम पूरी तरह लागू हो पाएंगे. जब तक राज्य इन गाइडलाइंस को अपनाकर नोटिफिकेशन जारी नहीं करते. तब तक अलग अलग जगहों पर इसकी टाइमलाइन अलग हो सकती है. कब से लागू होगा नया नियम नए नोटिफिकेशन में किसी खास तारीख का जिक्र नहीं किया गया है. आमतौर पर ऐसी गाइडलाइंस जारी होने की तारीख से ही प्रभावी मानी जाती हैं. इससे पहले जुलाई 2025 में जब गाइडलाइंस आई थीं, तब राज्यों को उन्हें लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था. हालांकि अभी कोई तय समय-सीमा घोषित नहीं की गई है, लेकिन संशोधित नियमों के लिए भी कुछ ऐसा ही समय मिल सकता है. जेंडर चॉइस फीचर: कैसे होगा लागू ये नियम केंद्र सरकार ने बनाए हैं, लेकिन इन्हें जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी. राज्य अपने लाइसेंसिंग सिस्टम में इन बदलावों को शामिल करेंगे. कैब कंपनियों को अपने ऐप्स में जरूरी बदलाव करने होंगे, ताकि यात्रियों को ड्राइवर का जेंडर चुनने का विकल्प मिल सके. यह फीचर गाइडलाइंस के क्लॉज के तहत अनिवार्य किया गया है. अगर कोई एग्रीगेटर इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसका लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है. हालांकि, ऐप अपडेट और सिस्टम में बदलाव करने में कंपनियों को कुछ समय लग सकता है. महिला ड्राइवरों की कम संख्या बनी चुनौती इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस नियम को पूरी तरह लागू करना आसान नहीं होगा. फिलहाल देश में कुल कैब ड्राइवरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 5 फीसदी से भी कम है. ऐसे में हर समय महिला ड्राइवर उपलब्ध कराना मुश्किल हो सकता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इससे ऑन-डिमांड सर्विस प्रभावित हो सकती है और वेटिंग टाइम बढ़ सकता है, खासकर रात के समय जब डिमांड ज्यादा और ड्राइवर कम होते हैं. इस मुद्दे पर फिलहाल Ola, Uber और Rapido ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है. टिपिंग सिस्टम में भी बदलाव सरकार ने टिप देने के नियमों को भी पारदर्शी बना दिया है. अब यात्री सफर पूरा होने के बाद ड्राइवर को अपनी मर्जी से टिप दे सकेंगे.     टिप देने का विकल्प सिर्फ ट्रिप खत्म होने के बाद ही मिलेगा.     पूरी टिप ड्राइवर को ही मिलेगी, इसमें से कोई कटौती नहीं होगी.     कंपनियां टिप के लिए किसी भी तरह के भ्रामक या दबाव बनाने वाले तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी. कुल मिलाकर, नए नियमों से यात्रियों की सुरक्षा और ड्राइवरों की कमाई दोनों को बेहतर बनाने की कोशिश की गई है. जेंडर चॉइस फीचर कैसे होगा लागू? यह नियम केंद्र सरकार ने बनाए हैं. लेकिन इनका क्रियान्वयन राज्य सरकारों के हाथ में होगा. राज्यों को अपने कैब एग्रीगेटर लाइसेंस सिस्टम में इस जेंडर चॉइस फीचर को शामिल करना होगा. इसके बाद Ola, Uber और Rapido जैसी कंपनियों को अपने ऐप्स में जरूरी तकनीकी बदलाव करने पड़ेंगे. राइड बुक करते समय यात्रियों को ड्राइवर का जेंडर चुनने का ऑप्शन दिखेगा. यह फीचर गाइडलाइंस के एक मैंडेटरी क्लॉज के तहत रखा गया है. अगर कोई एग्रीगेटर इन नियमों का पालन नहीं करता है. तो उस पर जुर्माना लग सकता है या लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई भी हो सकती है. हालांकि ऐप अपडेट और सिस्टम इंटीग्रेशन में कंपनियों को कुछ वक्त लगना तय माना जा रहा है. तो कह सकते हैं फिलहाल इसमें वक्त लग सकता है और लागू होने के बाद भी महिला ड्राइवरों की कमी इस कदम को थोड़ा कमजोर कर सकती है.