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ऊर्जा मंत्री तोमर बोले: समाधान योजना के तहत ₹653 करोड़ से ज्यादा जमा, ₹281 करोड़ सरचार्ज माफ

समाधान योजना में 653 करोड़ 60 लाख मूल राशि हुई जमा, 281 करोड़ 54 लाख सरचार्ज हुआ माफ : ऊर्जा मंत्री तोमर अब 31 जनवरी 2026 तक मिलेगी योजना में सौ फीसदी तक सरचार्ज में छूट भोपाल  समाधान योजना 2025-26 के प्रथम चरण में अब तक 653 करोड़ 60 लाख रूपये मूल राशि जमा हुई है। साथ ही 281 करोड़ 54 लाख रूपये का सरचार्ज माफ किया गया है। योजना में 12 लाख 77 हजार 753 उपभोक्ताओं ने पंजीयन कराया है। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने बताया है कि बकायादार उपभोक्ताओं की सतत भागीदारी और उनके उत्साह को देखते हुए समाधान योजना के प्रथम चरण की अवधि में 31 जनवरी 2026 तक विस्तार किया गया है। पिछले साल 3 नवंबर से शुरू हुई समाधान योजना 2025-26 में शामिल होकर लाखों बकायादार उपभोक्ताओं ने सौ फीसदी तक छूट का लाभ लिया। उन्होंने उपभोक्ताओं से अपील की है कि तीन माह से अधिक के बकायादार उपभोक्ता योजना के प्रथम चरण में शामिल होकर अपना बकाया बिल एकमुश्त जमा कर 100 फीसदी तक सरचार्ज माफी का लाभ उठायें। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के 4 लाख 2 हजार 593 बकायादार उपभोक्ताओं ने पंजीयन कराकर लाभ लिया है। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के खाते में 411 करोड़ 49 लाख से अधिक की मूल राशि जमा हुई है, जबकि 218 करोड़ 44 लाख रूपए का सरचार्ज माफ किया गया है। इसी तरह पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी में 4 लाख 39 हजार 397 उपभोक्ताओं ने पंजीयन कराया है। मूल राशि 130 करोड़ 50 लाख रूपये जमा हुई है तथा 45 करोड़ 41 लाख रूपये का सरचार्ज माफ किया गया है। पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी क्षेत्रान्तर्गत 4 लाख 35 हजार 763 उपभोक्ताओं ने पंजीयन कराया है। कुल मूल राशि 111 करोड़ 61 लाख रूपये जमा हुई है। साथ ही 17 करोड़ 69 लाख रूपये का सरचार्ज माफ किया गया है। समाधान योजना 2025-26 : एक नजर में समाधान योजना 2025-26 का उद्देश्य 3 माह से अधिक अवधि के उपभोक्ताओं को बकाया विलंबित भुगतान के सरचार्ज पर छूट प्रदान करना है। यह योजना 'जल्दी आएं, एकमुश्त भुगतान कर ज्यादा लाभ पाएं' के सिद्धांत पर आधारित है। इस योजना में उपभोक्ता को प्रथम चरण में एकमुश्त भुगतान करने पर सबसे अधिक लाभ हो रहा है जबकि द्वितीय चरण के दौरान छूट का प्रतिशत क्रमशः कुछ कम हो जाएगा। दो चरणों में प्रारंभ हुई योजना को प्रथम चरण की शुरुआत 3 नवंबर 2025 से हुई जो 31 जनवरी 2026 तक चलेगी। इसमें बकाया बिल एकमुश्त जमा करने पर 60 से लेकर 100 प्रतिशत तक सरचार्ज माफ किया जा रहा। इसके बाद द्वितीय और अंतिम चरण शुरू होगा जो 01 फरवरी से 28 फरवरी 2026 तक चलेगा। दूसरे चरण में 50 से 90 फ़ीसदी तक सरचार्ज माफ किया जाएगा। समाधान योजना 2025-26 का लाभ उठाने उपभोक्ताओं के लिए कंपनी के ऐप एवं कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) तथा एमपी ऑनलाइन पर भी पंजीयन की सुविधा उपलब्ध है। पंजीयन के दौरान अलग-अलग उपभोक्ता श्रेणी के लिए पंजीयन राशि निर्धारित की गई है। घरेलू एवं कृषि उपभोक्ता कुल बकाया राशि का 10 प्रतिशत तथा गैर घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ता कुल बकाया राशि का 25 प्रतिशत भुगतान कर पंजीयन कराकर योजना में शामिल होकर लाभ उठा सकते हैं। विस्तृत विवरण तीनों कंपनियों की वेबसाइटों पर भी देखा जा सकता है। साथ ही विद्युत वितरण केंद्र में पहुंचकर भी योजना के संबंध में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।  

1 अप्रैल से टोल टैक्स में बदलाव, Fastag के जरिए अब बिना रुके होगा कटाव

नई दिल्ली अगर आप अक्सर हाईवे पर सफर करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 1 अप्रैल 2026 से नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा पर नकद (Cash) भुगतान गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। केंद्र सरकार ने टोल प्लाजा पर कैश लेन-देन को पूरी तरह बंद करने का फैसला किया है। सिर्फ FASTag और UPI से होगा भुगतान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने और टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों को खत्म करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। 1 अप्रैल के बाद टोल प्लाजा पर केवल FASTag और UPI ही भुगतान के मान्य माध्यम होंगे। खत्म होंगी लंबी लाइनें, हटेगी 'कैश लेन' वर्तमान में कई टोल प्लाजा पर FASTag होने के बावजूद लोग कैश लेन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे जाम की स्थिति बनी रहती है। नए नियम के लागू होने के बाद:     टोल प्लाजा से कैश लेन पूरी तरह हटा दी जाएगी।     वाहन चालकों को जाम से निजात मिलेगी और यात्रा समय की बचत होगी।     पारदर्शिता बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था पूरी तरह डिजिटल होगी। MLFF: बिना बैरियर के सरपट दौड़ेंगे वाहन सरकार 'मल्टी लेन फ्री फ्लो' (MLFF) टोलिंग सिस्टम लाने की तैयारी में है। इसके तहत…     बिना बैरियर के टोल: शुरुआत में देशभर के 25 टोल प्लाजा पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसे लागू किया जाएगा।     सेंसर तकनीक: इस सिस्टम में कोई बैरियर नहीं होगा। वाहन बिना रुके गुजरेंगे और ऊपर लगे कैमरे व सेंसर FASTag के जरिए अपने आप टोल काट लेंगे।     सुगम यात्रा: पायलट प्रोजेक्ट सफल होने के बाद इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा, जिससे हाईवे पर वाहनों की गति बाधित नहीं होगी।  

शुक्रवार को बसंत पंचमी: दिनभर पूजा की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इंदौर  उत्तर प्रदेश के ज्ञानवापी की तरह ही मध्य प्रदेश के धार में मौजूद भोजशाल भी विवादों में है. वहीं बसंत पंचमी आते ही मध्य प्रदेश की 800 साल पुरानी भोजशाला की चर्चा शुरू हो जाती है, खासकर बसंत पंचमी अगर शुक्रवार को पड़े तो प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था का खास ख्याल रखना पड़ता है. इसकी वजह है कि भोजशाला को लेकर दो पक्षों के बीच स्वामित्व का विवाद चल रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट में है. शुक्रवार को बसंत पंचमी होने पर सांप्रदायिक तनाव न बने इसे लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर रहता है. इस बार भी बसंत पंचमी 23 जनवरी यानि शुक्रवार को है, जिसे लेकर भारी संख्या में भोजशाला में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है. कई सालों से इस स्थिति का सामना इस साल फिर बसंत पंचमी शुक्रवार को है और इसी दिन जुमा भी पड़ रहा है. पूजा और नमाज के दौरान यहां किसी तरह का सप्रदायिक तनाव न हो, इसके लिए 20 जनवरी से ही धार शहर में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाएगा. करीब ढाई हजार पुलिस अधिकारी, कर्मचारी यहां मोर्चा संभालेंगे. जो फुल सिक्योरिटी प्लान के तहत बसंत पंचमी के दिन किसी भी तरह के हालात बिगड़ने पर तत्काल कार्रवाई करेंगे. एक ही दिन पूजा और नमाज वाली ऐसी ही स्थिति यहां साल 2006, 2013 और 2016 में भी बनी थी. उस दौरान पहले भी यहां तीनों मौके पर आगजनी पथराव और कर्फ्यू की स्थिति बन गई थी. हालांकि जिला प्रशासन द्वारा दोनों ही पक्षों को समझाकर इस आयोजन को शांतिपूर्ण रूप से संपन्न कराया था. इस बार फिर यहां हिंदू फ्रेंड फॉर जस्टिस नामक संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है कि बसंत पंचमी पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के आदेश के आधार पर दिनभर पूजा की अनुमति दी जाए. एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के मुताबिक "सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई यचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है, क्योंकि बसंत पंचमी 23 जनवरी को है." आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया भी बेबस भोजशाला को लेकर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 7 अप्रैल 2003 को जो आदेश दिया था, उसमें हिंदू समाज को बसंत पंचमी पर भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने की अनुमति दी थी, लेकिन बसंत पंचमी पर शुक्रवार होने की स्थिति में इस आदेश में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था. लिहाजा बसंत पंचमी पर जुम्मा होने के कारण यहां विवाद की स्थिति बनने की आशंका रहती है. इस स्थिति के चलते इस मामले से जुड़ी याचिका की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने भोजशाला के पुरातात्विक सर्वेक्षण के आदेश दिए थे. इसके बाद यहां किए गए सर्वे की 2000 पेज वाली रिपोर्ट में आर्कियोलॉजिकल सर्वे में स्पष्ट किया गया है कि गौशाला परिसर से विभिन्न धातुओं के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो दसवीं से 16वीं शताब्दी के बीच के हैं. इसके अलावा यहां 94 मूर्तियों के टुकड़े मिले जो मूर्तियां गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव की है. वहीं पशु-पक्षियों की प्रतिकृतियों के अवशेष भी मिले हैं. हालांकि इसके स्वामित्व पर फैसला कोर्ट में ही लंबित है. यह है गौशाला को लेकर पुराना विवाद धार में पुरातात्विक इमारत को हिंदू समाज माता सरस्वती वाग्देवी का मंदिर मानकर यहां बसंत पंचमी पर पूजा अर्चना करता है. वही मुस्लिम समाज इसी स्थान को मौलाना कमाल अहमद की दरगाह मानता रहा है. 1935 में धार रियासत के दीवान ने भोजशाला में मुस्लिम समाज को शुक्रवार के दिन नमाज की अनुमति दी थी. इसके बाद से ही धार के गौशाला विवाद की शुरुआत हुई. लिहाजा बसंत पंचमी के दिन जब भी शुक्रवार अथवा जुम्मे का दिन आता है, तो यहां एक ही दिन पूजा और नमाज होने की मजबूरी के चलते पूरा शहर सांप्रदायिक हिंसा की आशंका में पुलिस छावनी में तब्दील हो जाता है. इसके बाद यहां भोजशाला परिसर पूजा और नमाज के अलग-अलग समय के निर्धारण के बाद पूजा और फिर नमाज अता कराई जाती है. यह है इस स्थान का महत्व और इतिहास धार जिला प्रशासन के मुताबिक 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने भोजशाला का निर्माण कराया था, इस दौरान यहां माता सरस्वती वाग्देवी की प्रतिमा की स्थापना का भी उल्लेख बताया जाता है. परमार काल के बाद यह स्थान राजपूत शासकों की राजधानी और मालवा की राजधानी भी रहा. मुगल काल में अलाउद्दीन खिलजी ने 1305 में भोजशाला को ध्वस्त कर दिया. इसी दौरान यहां अन्य मुगलकालीन शासकों ने परिसर में मस्जिद का निर्माण कराया. मुगल काल समाप्त होने के बाद 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश मेजर किन केड यहां स्थापित वाग्देवी की मूर्ति को लेकर लंदन चले गए, जो आज भी लंदन के म्यूजियम में मौजूद है.

साइबर अटैक से लेकर प्राकृतिक आपदा तक, MP में पावर सप्लाई रहेगी सुरक्षित

भोपाल  बिजली की ग्रिडों पर साइबर अटैक या युद्ध जैसे हालातों में भी मध्य प्रदेश की बिजली गायब नहीं होगी. मध्यप्रदेश के जबलपुर, भोपाल और इंदौर समेत अन्य शहरों में इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग नाम की एक रणनीतिक बिजली व्यवस्था पर काम शुरू हो चुका है. यह सिस्टम ग्रिड से कटते ही शहर को खुद का पावर स्टेशन बना देता है. इसके लिए सबसे पहले जबलपुर को चुना गया है, जहां सेना से जुड़े बड़े रक्षा प्रतिष्ठान मौजूद हैं. इसके बाद भोपाल और इंदौर को भी इसी सुरक्षा कवच से जोड़ा जाएगा. जानें क्या होता है इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग क्या है इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग? इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिजली सिस्टम के एक हिस्से को जानबूझकर मुख्य ग्रिड से अलग कर दिया जाता है. जब राष्ट्रीय या क्षेत्रीय ग्रिड में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो यह हिस्सा स्वतः आइलैंड मोड में चला जाता है. उस स्थिति में स्थानीय बिजली उत्पादन स्रोतों से शहर की जरूरी सेवाओं को बिजली मिलती रहती है. सरल शब्दों में कहें तो पूरा शहर कुछ समय के लिए खुद का स्वतंत्र पावर ग्रिड बन जाता है. आइलैंडिंग के लिए जबलपुर क्यों बना पहली पसंद? जबलपुर देश के रणनीतिक शहरों में शामिल है. यहां आर्मी प्रोडक्शन यूनिट्स, गोला-बारूद निर्माण इकाइयां और रक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थान मौजूद हैं. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब देश रणनीतिक मोर्चे पर सक्रिय था, उसी समय जबलपुर में इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग परियोजना को स्वीकृति दी गई. इसके जरिए सरकार ने संदेश दिया कि अब युद्ध के हालात और आपातकालीन परिस्थितियों में भी शहर अंधेरे में नहीं डूबना चाहिए. ऐसे काम करेगा यह सिस्टम जबलपुर में पहले से एक थर्मल पावर स्टेशन से सीधी ट्रांसमिशन लाइन उपलब्ध है. आपात स्थिति में उस पावर स्टेशन की एक यूनिट सक्रिय की जाएगी और शहर को ग्रिड से अलग कर बिजली सप्लाई दी जाएगी. इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 7 करोड़ रु खर्च होंगे. इसमें 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार वहन कर रही है. फिलहाल टेंडर जारी हो चुके हैं और काम तेजी से चल रहा है. अगले तीन से चार महीनों में यह सिस्टम पूरी तरह तैयार हो जाएगा. भोपाल और इंदौर में क्या तैयारी? भोपाल और इंदौर में फिलहाल किसी बिजली उत्पादन केंद्र से सीधी ट्रांसमिशन लाइन नहीं है. इसलिए यहां नजदीकी थर्मल पावर स्टेशनों से समर्पित ट्रांसमिशन लाइनें बिछानी होंगी. दोनों शहरों के लिए प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं. बिजली कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि मंजूरी मिलते ही इन महानगरों में भी इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग लागू कर दी जाएगी. 2012 का ब्लैकआउट, जो चेतावनी बन गया विशेषज्ञ बताते हैं कि जुलाई 2012 में भारत ने अब तक का सबसे बड़ा बिजली संकट देखा. 30 और 31 जुलाई को ग्रिड ओवरलोड के कारण देश के 22 राज्य अंधेरे में डूब गए थे. उसी घटना के बाद यह समझ आया कि केवल एक राष्ट्रीय ग्रिड पर निर्भर रहना, जोखिम भरा हो सकता है. तभी से इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग जैसे विकल्पों पर गंभीरता से काम शुरू हुआ. इलेक्ट्रिकल ग्रिड क्या होती है? ग्रिड, जनरेटर और ट्रांसमिशन लाइनों की आपस में जुड़ी प्रणाली होती है. सभी जनरेटर एक साथ काम करते हैं. लेकिन यदि किसी एक हिस्से में बड़ी गड़बड़ी होती है, तो उसका असर पूरी प्रणाली पर पड़ सकता है. यही श्रृंखला प्रभाव पूरे देश में ब्लैकआउट की वजह बनता है. पावर आइलैंड क्यों हैं जरूरी? इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग से अस्पताल, रक्षा प्रतिष्ठान, ट्रैफिक सिग्नल, जलापूर्ति और संचार सेवाएं सुरक्षित रहती हैं. यह सिस्टम अपने आप ग्रिड से अलग होकर स्थानीय उत्पादन से बिजली देता है. इसी कारण इसे पावर आइलैंड या वोल्टेज आइलैंड भी कहा जाता है. शहरों को सुरक्षित रखेंगे पावर आईलैंड मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी के प्रबंध निदेशक सुनील तिवारी ने बताया, '' इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग परियोजना पूरी होने के बाद किसी भी आपात स्थिति में शहर की बिजली आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी. जबलपुर में काम तेजी से चल रहा है और तीन से चार महीनों में इसे पूरा कर लिया जाएगा. भोपाल और इंदौर के लिए भी प्रस्ताव भेजे गए हैं. स्वीकृति मिलते ही वहां भी काम शुरू होगा.'' उन्होंने आगे बताया, '' इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग न सिर्फ युद्ध बल्कि साइबर अटैक, तकनीकी खराबी और प्राकृतिक आपदा के समय भी शहरों को सुरक्षित रखेगी.''