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महिलाओं की सुरक्षा और रोजगार पर बड़ा कदम, जबलपुर में 100 महिला ई-रिक्शा चालक बनेंगी

जबलपुर  नगर निगम और यूएन वूमेन के सांझा प्रयास से "सेफ सिटीज एंड सेफ पब्लिक स्पेसेज फॉर वूमेन" परियोजना की पहली वार्षिक समीक्षा बैठक का आयोजन जबलपुर में किया गया. जिसमें यूएन की महिलाएं शामिल हुईं. महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू की अध्यक्षता में आयोजित हुई. बैठक में जिला प्रशासन, पुलिस, सेना, रेलवे, नगर निगम, विभिन्न शासकीय विभागों के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।  यूएन के साथ जबलपुर नगर निगम का करार जबलपुर नगर निगम ने 1 साल पहले यूनाइटेड नेशंस के वूमेंस सेफ सिटी कार्यक्रम में यूनाइटेड नेशन से करार किया था. इसके तहत जबलपुर को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित शहर बनाने की कोशिश करने के लिए कदम उठाने की बात कही गई थी. इस कार्यक्रम को शुरू हुए 1 साल हो गए हैं।  महिला सुरक्षा में जबलपुर पुलिस ने दिखाई मुस्तैदी जबलपुर के महापौर जगत बहादुर सिंह अनु ने बताया कि, ''बीते 1 साल में उन्होंने जबलपुर शहर में महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने के पहले की है. हमने शहर की सड़कों को लाइट से रोशन किया है, ताकि रात में महिलाओं को अंधेरे में भी निकलने में डर ना लगे.'' उन्होंने बताया कि, ''जबलपुर पुलिस ने भी बड़ी मुस्तैदी से काम किया. जहां पर भी महिलाओं को जरूरत हुई पुलिस नजर आई।  100 महिलाओं को मिलेंगे ई-रिक्शा जगत बहादुर सिंह अनु का कहना है कि, ''इसी वजह से जबलपुर में अब कुछ ऐसे काम जो पहले केवल पुरुष करते थे पर महिलाएं भी करती हुई नजर आ रही हैं जबलपुर में कई महिलाएं स्ट्रीट वेंडर हैं, महिलाएं ऑटो रिक्शा चला रही हैं.'' महापौर ने घोषणा की की आने वाले साल में वे 100 महिलाओं को ऑटो रिक्शा दिलवाने में मदद करेंगे. इसमें कुछ पैसा सब्सिडी के माध्यम से और कुछ लोन के माध्यम से महिलाओं को दिया जाएगा।  महिलाओं की सुरक्षा पर यूएन ने मिलाया हाथ बैठक का उद्देश्य परियोजना के एक वर्ष के कार्यों की समीक्षा करना, उसकी उपलब्धियों और अनुभवों को साझा करना तथा महिलाओं और बालिकाओं के लिए शहर को और अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक बनाने की आगामी योजना तैयार करना था. कार्यक्रम में यूएन वूमेन की कंट्री रिप्रेजेंटेटिव शोको इशिकावा और डिप्टी कंट्री रिप्रेजेंटेटिव कांता सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए मिलकर काम करने पर जोर दिया।  इस समीक्षा बैठक में आने वाले साल को लेकर भी रोड मेंप बनाया गया है और शहर को महिलाओं के लिए और बेहतर करने के दिशा में और प्रयास किए जाएंगे. समीक्षा बैठक में पुलिस विभाग, जिला प्रशासन, पश्चिम मध्य रेलवे, धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और भारतीय सेना के प्रतिनिधियों ने भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए किए गए कार्यों की जानकारी दी और भविष्य में बेहतर समन्वय के साथ काम करने की बात कही. कार्यक्रम के अंत में सभी विभागों और संस्थाओं ने मिलकर जबलपुर को महिलाओं और बालिकाओं के लिए सुरक्षित, समान अवसरों वाला और समावेशी शहर बनाने का संकल्प लिया। 

रायसेन में पेड़ों की कटाई पर बवाल, 680 की मंजूरी लेकर हजारों पेड़ काटने का आरोप; विधानसभा में उठेगा मुद्दा

भोपाल  रायसेन जिले की ग्राम पंचायत समनापुर कला में कथित रूप से हजारों हरे-भरे पेड़ों की कटाई का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का विषय बन गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मामले का संज्ञान लिया है और कहा है कि इसे आगामी विधानसभा के मानसून सत्र में प्रमुखता से उठाया जाएगा। 680 पेड़ों की अनुमति, हजारों की कटाई का आरोप ग्राम पंचायत के जिम्मेदारों के अनुसार पंचायत ने सुनील मालवीय को 680 पेड़ काटने की अनुमति दी थी। वहीं, समीप स्थित भूमि स्वामी अशोक वासवानी को पंचायत द्वारा कोई अनुमति जारी नहीं की गई। इसके बावजूद दोनों क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होने के आरोप लगे हैं। अधिकारियों पर भी उठे सवाल पंचायत सचिव का कहना है कि अनुमति संबंधित अधिकारियों के निर्देश पर दी गई थी। वहीं, राजस्व विभाग इस पूरे मामले की जिम्मेदारी पंचायत पर डाल रहा है। आरोप है कि कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार और वन विभाग को जानकारी होने के बावजूद बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होती रही। 5 हजार से अधिक सागौन के पेड़ काटने का दावा स्थानीय ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध कराए गए पुराने फोटो बताते हैं कि क्षेत्र पहले घने जंगल से आच्छादित था। सूत्रों का दावा है कि रातापानी टाइगर रिजर्व के बफर जोन में 5 हजार से अधिक सागौन सहित अन्य इमारती पेड़ों की कटाई की गई। हालांकि वन विभाग का कहना है कि लकड़ी परिवहन के लिए कोई ट्रांजिट परमिट (टीपी) जारी नहीं किया गया। बिना सत्यापन के अनुमति देने का आरोप जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत समनापुर ने 23 दिसंबर 2023 को खसरा क्रमांक 132/372/2, 132/372/3, 132/372/4 और 132/372/5 (कुल 7.450 हेक्टेयर) में 450 सागौन, 82 साज और 98 सतकुट के पेड़ काटने की अनुमति जारी की थी। आरोप है कि यह अनुमति बिना उचित सत्यापन और नियमानुसार प्रक्रिया पूरी किए दे दी गई। खनन और कटाई दोनों पर सवाल सबसे चौकाने वाली बात तो यह है कि रसूख के दम पर यह अनुमति इतनी आसानी से मिल गई, जिसे प्राप्त करने के लिए साधारण आदमी के पसीने छूट जाते हैं। दूसरी ओर इसी से लगे हुए एक दूसरा खसरा क्रमांक 132/1-3 रकबा 10 एकड़ पर अशोक वासवानी का बोर्ड लगा है, वहाँ भी सागौन, साज, महुआ एवं सतकुट के हजारों पेड़ काटे गए। साथ ही मशीनों से चट्टानें काट कर उत्खनन किया जा रहा है। मामले में खनिज विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।  

MP Green Mission: चोरल वन में विलुप्त होती प्रजातियों के पौधे लगाए जा रहे, बढ़ेगी जैव विविधता

 इंदौर  मानसून सक्रिय होते ही जंगलों को हरा-भरा बनाने करने की कवायद तेज हो गई है। इंदौर वनमंडल के जंगलों में पौधे रोपे जा रहे है। सामान्य पौधों के साथ उन दुर्लभ और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों को भी प्राथमिकता दी जा रही है, जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक इन पौधों के संरक्षण से जंगलों की जैव विविधता मजबूत होगी और प्राकृतिक संतुलन भी बेहतर रहेगा। जून अंतिम सप्ताह से जंगलों में सागौन, नीम, आवला सहित अंजन, कल्लू, बीजा, दहीमन, तिनसा और बेहड़ा जैसी दुर्लभ प्रजातियों के पौधे रोपे जा रहे है। इंदौर वनमंडल की चारों रेंज में करीब 10 से 15 हजार सलाई की कलमें भी रोप रहे है। प्रत्येक रेंज में तीन से चार हजार कलमें लगाई जा रही है। चोरल क्षेत्र में एक बार फिर सागौन के पौधों रोपने पर जोर दिया जा रहा है। लगभग 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा सागौन का होगा। वनमंडलाधिकारी लाल सुधाकर सिंह का कहना है कि जिन विलुप्त प्रजातियों के पौधे नर्सरियों में तैयार हुए है। उन्हें जंगलों में विशेष तौर पर लगाया जा रहा है। इसके अलावा सलाई गोंद को बढ़ावा देने के लिए कलमें लगा रहे है। करीब तीन लाख लगाएंगे पौधे इंदौर वनमंडल में इस वर्ष इंदौर, चोरल, महू और मानपुर क्षेत्र के जंगलों में लगभग 2 लाख 81 हजार पौधे लगाने का टारगेट रखा है। जुलाई और अगस्त के बीच बीस पौधारोपण स्थल चुने गए है। यहां सिर्फ पौधे लगाने पर ही नहीं। बल्कि उनकी सुरक्षा और बेहतर विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पानी रोकने के लिए बनाए चेकडैम पौधों को पर्याप्त पानी मिल सके, इसके लिए जंगलों में छोटे-छोटे तालाब, चेकडैम, कंटूर ट्रेंच और अन्य जल संरचनाएं तैयार की गई हैं। पहले से बने तालाबों का गहरीकरण भी कराया गया है। ताकि अधिक से अधिक वर्षा जल संग्रहित हो सके। इससे गर्मियों में वन्य जीवों और पौधों के लिए पानी की उपलब्धता बनी रहेगी। वन विभाग पिछले वर्ष लगाए गए पौधों की भी लगातार निगरानी कर रहा है। समीक्षा में सामने आया कि करीब 20 से 22 प्रतिशत पौधे विभिन्न कारणों से सूख गए हैं। ऐसे लगभग 84 हजार पौधों की पहचान कर ली गई है। अब उनकी जगह नए पौधे लगाने का काम चल रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में 8 जुलाई को होगा समझौता, लगभग 10 लाख शिक्षक एवं कर्मचारी होंगे लाभान्वित

लखनऊ  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षकों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। 8 जुलाई को वाराणसी में मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना के शुभारंभ के अवसर पर बेसिक शिक्षा विभाग और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस समझौते का उद्देश्य विभाग के स्थायी एवं संविदा कार्मिकों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा को और मजबूत करना है। महानिदेशक, स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में वाराणसी के हस्तकला संकुल (ट्रेड फैसिलिटेशन सेंटर) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एमओयू पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना का शुभारंभ भी होगा। जिलों में भी होगा व्यापक प्रचार-प्रसार निर्देशों में कहा गया है कि राज्य स्तरीय कार्यक्रम के समानांतर सभी जनपदों में जिलाधिकारी तथा तहसील मुख्यालयों पर उपजिलाधिकारी की अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में भारतीय स्टेट बैंक और बेसिक शिक्षा विभाग के बीच होने वाले एमओयू का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक शिक्षक और कर्मचारी इस पहल से अवगत हो सकें। बैंक अधिकारियों की सहभागिता सुनिश्चित करने के निर्देश महानिदेशक ने सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे भारतीय स्टेट बैंक के स्थानीय अधिकारियों से समन्वय स्थापित कर उनकी जनपद स्तरीय कार्यक्रमों में सहभागिता सुनिश्चित करें। साथ ही एमओयू के उद्देश्यों और उससे मिलने वाले लाभों का प्रभावी प्रचार-प्रसार भी कराया जाए। यह पहल शिक्षकों और विभागीय कार्मिकों के कल्याण को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना के साथ बैंकिंग क्षेत्र के सहयोग को जोड़ते हुए प्रदेश सरकार शिक्षक हितों को और अधिक मजबूत तथा संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

समुद्री कटाव से दहला ओडिशा: गंजाम के 17 गांवों का अस्तित्व खतरे में, हजारों परिवार दहशत में

भुवनेश्वर ओडिशा के गंजाम जिले में समुद्री कटाव ने विकराल रूप धारण कर लिया है। समुद्र के लगातार आगे बढ़ने से गंजाम ब्लॉक के पोड़मपेटा गांव समेत दो ग्राम पंचायतों के 17 गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। शुक्रवार को एक पक्का मकान समुद्र में समा जाने की घटना ने स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ वर्ष पहले तक समुद्र गांव से करीब एक किलोमीटर दूर था, लेकिन लगातार कटाव के कारण अब वह गांव की सीमा तक पहुंच चुका है। हालात ऐसे हैं कि पोड़मपेटा का बड़ा हिस्सा समुद्र में विलीन हो चुका है। कभी करीब 500 घरों वाला यह गांव अब कुछ गिने-चुने मकानों तक सिमट गया है। रोज निगल रहा जमीन स्थानीय लोगों का कहना है कि समुद्र प्रतिदिन कुछ न कुछ जमीन अपने आगोश में ले रहा है। कटाव वाले क्षेत्र से अधिकांश परिवार पलायन कर चुके हैं, लेकिन शेष भूमि भी तेजी से खत्म होती जा रही है। इससे आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। 17 गांवों पर संकट स्थानीय सर्वेक्षण के मुताबिक पालिबंधा ग्राम पंचायत के नौ और रामगड़ा ग्राम पंचायत के आठ गांव समुद्री कटाव की जद में हैं। इन गांवों के हजारों लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। ग्रामीणों ने सरकार से तट सुरक्षा दीवार, बोल्डर पैकिंग और अन्य स्थायी उपाय करने की मांग की है। आंदोलन और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी प्रशासन की ओर से प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। प्रभावित गांवों के लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन शुरू करेंगे और आगामी चुनावों का बहिष्कार भी कर सकते हैं। मुख्यमंत्री को लिखा पत्र छत्रपुर विधायक कृष्ण चंद्र नायक ने मामले को गंभीर बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखा है। उन्होंने प्रभावित गांवों को बचाने के लिए तत्काल विशेष पैकेज, तकनीकी सहायता और स्थायी तटीय सुरक्षा परियोजनाएं शुरू करने का आग्रह किया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कई गांवों का नामोनिशान मिट सकता है। समुद्र का बढ़ता कहर अब गंजाम तट के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

बेमेतरा में अवैध उर्वरक भंडारण पर बड़ी कार्रवाई, 275 बोरी यूरिया जब्त; किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकार सजग

रायपुर  मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को समय पर, उचित मूल्य पर और गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। खरीफ सीजन 2026 के दौरान किसानों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार के निर्देश पर पूरे प्रदेश में उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी और अवैध भंडारण के विरुद्ध सघन अभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़ी में बेमेतरा जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए अवैध रूप से भंडारित 275 बोरी यूरिया जब्त कर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि किसानों के अधिकारों से खिलवाड़ करने वालों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी सु प्रतिष्ठा ममगाईं के निर्देश तथा कृषि विभाग के उप संचालक  मोरध्वज डडसेना के मार्गदर्शन में गठित जिला स्तरीय उड़नदस्ता दल द्वारा जिलेभर में लगातार औचक निरीक्षण और छापामार कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को निर्धारित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण उर्वरक उपलब्ध हो तथा कृत्रिम अभाव उत्पन्न कर अनुचित लाभ कमाने के प्रयासों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। इसी अभियान के तहत प्राप्त गोपनीय सूचना के आधार पर उड़नदस्ता दल ने ग्राम जानो, तहसील देवकर में अँजोर वर्मा के परिसर में औचक निरीक्षण किया। जांच के दौरान उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए 275 बोरी यूरिया का अवैध भंडारण पाया गया। मौके पर संपूर्ण उर्वरक को विधिवत जब्त कर लिया गया तथा संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। प्राप्त जवाब के परीक्षण के बाद नियमानुसार आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। कृषि विभाग ने जब्त किए गए उर्वरकों के नमूने गुणवत्ता परीक्षण के लिए अधिकृत प्रयोगशाला भेजने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को केवल मानक गुणवत्ता वाले उर्वरक ही उपलब्ध कराए जाएं और किसी भी प्रकार की मिलावट अथवा निम्न गुणवत्ता की सामग्री बाजार में न पहुंचे। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी, अवैध भंडारण तथा निर्धारित मूल्य से अधिक दर पर बिक्री करने वालों के विरुद्ध अभियान निरंतर जारी रहेगा। यदि कोई निजी कृषि केंद्र, उर्वरक विक्रेता अथवा सहकारी संस्था इस प्रकार की अनियमितता करते हुए पाई जाती है, तो उसके विरुद्ध उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। आवश्यक होने पर पुलिस में एफआईआर दर्ज कर प्रकरण न्यायालय में भी प्रस्तुत किया जाएगा। कलेक्टर सु प्रतिष्ठा ममगाईं ने कहा है कि किसानों के हितों की रक्षा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी परिस्थिति में उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी अथवा कृत्रिम अभाव उत्पन्न करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। प्रशासन पूरे जिले में लगातार निगरानी कर रहा है और शिकायत प्राप्त होते ही बिना पूर्व सूचना के तत्काल जांच एवं छापामार कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों के हितों की सुरक्षा, कृषि व्यवस्था में पारदर्शिता तथा कृषि आदानों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठा रही है। प्रदेश में चल रही इस तरह की सतत कार्रवाई न केवल कालाबाजारी और जमाखोरी पर अंकुश लगाने में सहायक होगी, बल्कि किसानों का विश्वास भी मजबूत करेगी कि सरकार उनकी मेहनत, उनकी फसल और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। जिला प्रशासन ने किसानों एवं आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि कहीं उर्वरकों की कालाबाजारी, अवैध भंडारण, अधिक मूल्य पर बिक्री अथवा अन्य किसी प्रकार की अनियमितता की जानकारी मिले तो तत्काल कृषि विभाग अथवा जिला प्रशासन को सूचित करें। प्रशासन ने आश्वस्त किया है कि शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी तथा प्रत्येक शिकायत पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी।

Punjab News: सरकार के फैसले का असर, कश्मीरी परिवारों ने शादी के कार्ड बांटना किया बंद; जानें वजह

चंडीगढ़  पंजाब सरकार के एक फैसले से कश्मीरी लोगों की चिंता बढ़ गई है. यहां शादी-विवाहों के लिए पूरी तैयारी कर चुके लोगों ने अचानक इनविटेशन कार्ड तक बांटना बंद कर दिया है. दरअसल पंजाब में पशु ले जाने वाले वाहनों पर शुल्क बढ़ा दिया गया है, इससे कश्मीर में मटन की कमी हो गई है, जिससे लोग परेशान हैं, जबकि मटन कश्मीर में होने वाली शादियों में दिया जाने वाला प्रमुख भोजन है।  इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक श्रीनगर में ऐसे कई परिवार हैं जहां आने वाले हफ्तों में शादियां होनी हैं लेकिन कश्मीर में मटन की कमी हो गई है. लिहाजा कुछ लोगों ने शादी के कार्ड बांटना रोक दिया है और कुछ दिन के लिए शादियां पोस्टपोन कर दी हैं. यहां के लोग उम्मीद जता रहे हैं कि कुछ दिनों में मटन की सप्लाई ठीक रहे।  बता दें कि कश्मीर में मटन की कमी की मुख्य वजह पंजाब में लगाया जा रहा अतिरिक्त शुल्क है. मटन व्यापारियों ने आरोप लगाया कि पंजाब सीमा पर भेड़ ले जाने वाले हर ट्रक से 25,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं. इसका असर कीमतों पर भी पड़ा है. ऐसे में मटन 700 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 750 रुपये प्रति किलो हो गया है।  एक-दो किलो पर देखें तो यह कोई बड़ा अंतर नहीं दिखाई देता है लेकिन शादियों में जहां 200-400 किलो मटन की जरूरत एक साथ होती है तो वहां यह कीमत कई हजार का अंतर डाल रही है. कई जगहों पर देखा जा रहा है कि मटन की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है।  यह समस्या ऐसे समय आई है जब कश्मीर में अप्रैल से अक्टूबर तक शादी का सीजन चलता है. इसका असर कश्मीरी पारंपरिक दावत वाजवान पर भी पड़ा है, जिसमें मटन का एक नहीं बल्कि कई व्यंजन शामिल होते हैं. अब इन व्यंजनों की संख्या कम हो रही है।  बता दें कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस शुल्क को गैरकानूनी और मनमाना बताया है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मामले में पंजाब के सीएम भगवंत मान को पत्र लिखकर पशु ढोने वाले वाहनों की आवाजाही बिना रुकावट जारी रखने की मांग की है. वहीं कश्मीर मटन डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव मेहराज-उद-दीन गनी ने बताया कि भेड़ मंडियां लगातार नौ दिनों से बंद हैं. उन्होंने कहा कि शादी का मौसम है, लेकिन व्यापारी मजबूर हैं।  कश्मीर में 90 फीसदी लोग मांसाहारी बता दें कि कश्मीर का मुख्य भोजन ही मांस है. यहां लगभग 90 फीसदी लोग मांसाहारी हैं और यहां मटन की खपत देश में सबसे ज्यादा है. हर साल यहां 600 लाख किलो से ज्यादा मटन खाया जाता है. इसका आधे से ज्यादा हिस्सा हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान से आने वाली भेड़ों से पूरा होता है।  व्यापारियों के अनुसार सामान्य दिनों में रोज 40–50 ट्रक (करीब 8,000 भेड़) कश्मीर आते हैं. शादी के सीजन में यह संख्या 60–70 ट्रक (करीब 11,000 भेड़) तक पहुंच जाती है।  पंजाब सरकार ने दिया जबाव वहीं इस मुद्दे पर पंजाब सरकार का कहना है कि यह कोई नया टैक्स नहीं है, बल्कि पशु मंडी शुल्क है. अधिकारियों के मुताबिक कुछ व्यापारी नियमों का पालन किए बिना पशु बाहर ले जा रहे हैं, जिससे राजस्व का नुकसान हो रहा है।  बढ़ रहा विवाद जबकि जम्मू-कश्मीर के व्यापारी कहते हैं कि पंजाब सिर्फ रास्ते में पड़ने वाला राज्य (ट्रांजिट स्टेट) है, इसलिए वहां टैक्स नहीं लगना चाहिए. उनका कहना है कि पहले 5,000 रुपये लिए जाते थे, लेकिन अब कई बार 25,000 रुपये तक मांगे जा रहे हैं।  इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि ये वाहन सिर्फ हाईवे का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए इस तरह की वसूली का कोई औचित्य नहीं है।  अब इस विवाद को सुलझाने के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों की जल्द बैठक होने की संभावना जताई जा रही है. बैठक के बाद पंजाब सरकार औपचारिक जवाब देगी। 

क्या अमेरिकी सेना बन रही है पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा? डॉक्युमेंट्री में पेंटागन को लेकर बड़ा दावा

वाशिंगटन  वैश्विक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर बड़े-बड़े देशों और औद्योगिक घरानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा महा-प्रदूषक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जलवायु संधियों में ‘फ्री पास’ यानी पूरी छूट मिली हुई है. प्रसिद्ध खोजी पत्रकार एबी मार्टिन (Abby Martin) की नयी खोजी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अर्थ्स ग्रेटेस्ट एनिमी’ (Earth’s Greatest Enemy) ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. 120 मिनट की फिल्म ने पुख्ता सबूतों और अविश्वसनीय आंकड़ों के साथ साबित किया है कि अमेरिकी सेना (US Military) और उसका रक्षा मुख्यालय पेंटागन वैश्विक जलवायु संकट को बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत प्रदूषक है।  140 देशों के कुल उत्सर्जन से भी अधिक कार्बन फैलाता है पेंटागन लॉरा पोलक (Laura Pollock) की ओर से की गयी फिल्म की समीक्षा के अनुसार, इस डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी रक्षा विभाग और उसकी नौसेना एवं वायुसेना के प्रदूषण फैलाने संबंधी जो आंकड़े पेश किये गये हैं, वे चौंकाने वाले हैं।      विमानों का ईंधन ईकोसाइड : फिल्म में पत्रकार एबी मार्टिन बताती हैं कि औसत अमेरिकी नागरिक अपने पूरे जीवनकाल में (लगभग 40 वर्ष) जितना ईंधन का इस्तेमाल करता है, बोइंग पेगासस (Boeing Pegasus) जैसे अमेरिकी सैन्य टैंकर की सिर्फ एक उड़ान में उतना ईंधन खत्म हो जाता है. अमेरिका ऐसे 600 से अधिक उड़ान टैंकर हवा में उड़ाता है।      140 देशों से भी बड़ा प्रदूषक पेंटागन : अमेरिकी सेना का कुल कार्बन उत्सर्जन दुनिया के 140 देशों के संयुक्त उत्सर्जन से भी कहीं अधिक है. इसके बावजूद वैश्विक जलवायु सम्मेलनों (जैसे COP26) में सैन्य उत्सर्जन के इन आंकड़ों को छिपा लिया जाता है।      लाखों समुद्री जीवों का कत्लेआम : एक डरावना आंकड़ा यह भी है कि अमेरिकी नौसेना (US Navy) को अपने 5 साल के युद्धाभ्यास और परीक्षणों के दौरान 2.6 मिलियन (26 लाख) से अधिक समुद्री स्तनधारी जीवों (Marine Mammals) को नुकसान पहुंचाने या उन्हें मार डालने की कानूनी छूट मिली हुई है. इतना ही नहीं, इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान छोड़े गये 2.5 लाख से अधिक गोले और प्रदूषण ने वहां की भूमि को स्थायी रूप से बंजर बना दिया है।  जहां-जहां अमेरिकी बेस, वहां-वहां ‘जहरीली मौत’ खोजी पत्रकार एबी मार्टिन और उनके पति माइक प्रिसनर ने इस सच्चाई को उजागर करने के लिए पूरी दुनिया का दौरा किया. वे ग्लासगो (स्कॉटलैंड) से लेकर अलास्का, हवाई और जापान के ओकिनावा द्वीप तक गये. कैंप लेज्यून और कोरल रीफ को कैसे नुकसान पहुंचा है, यहां जानें।  डॉक्युमेंट्री का संदेश : एक साथ कई मोर्चे पर संघर्ष कर रही है हमारी प्रकृति।  Earths Greatest Enemy: उत्तरी कैरोलिना के कैंप लेज्यून का सच उत्तरी कैरोलिना के ‘कैंप लेज्यून’ में अमेरिकी सेना के ही घरेलू बेस से हुए ईंधन रिसाव, जहरीले कचरे और औद्योगिक अपशिष्टों के कारण स्थानीय अमेरिकी बस्तियों के पानी में जहर घुल गया. फिल्म में उन माताओं का रुदन दिखाया गया है, जिन्होंने इस दूषित पानी के कारण अपने बच्चों को खो दिया।  हवाई और ओकिनावा में कोरल रीफ का विनाश हवाई और ओकिनावा (जापान) में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के निर्माण के लिए पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है. उसके मलबे को समुद्र में फेंककर दुर्लभ कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है. जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कायक (नावों) के जरिये समुद्र में इसका विरोध किया, तो अमेरिकी स्पीडबोट्स ने उनकी नावें पलट दीं और उन्हें हिरासत में ले लिया।  अमेरिकी नेताओं का पाखंड डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के पाखंड पर भी तीखा प्रहार किया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक तरफ तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी और प्रगतिशील प्रतिनिधि अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसी नेता लाइव स्ट्रीम पर कॉप-26 (COP26) के लक्ष्यों को ‘ऐतिहासिक’ बताती हैं, लेकिन जब उनसे सवाल पूछा जाता है कि नेट-जीरो (Net-Zero) के दावों के बीच पेंटागन का बजट और सैन्य खर्च लगातार क्यों बढ़ाया जा रहा है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता।  अमेरिकी पाखंड का सबसे अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज यह फिल्म सीधे तौर पर व्हाइट हाउस और पेंटागन को कटघरे में खड़ा करती है, जो आम जनता को पर्यावरण बचाने के लिए ‘प्लास्टिक स्ट्रॉ’ छोड़ने और ‘इलेक्ट्रिक कारें’ खरीदने का उपदेश देते हैं, लेकिन खुद खरबों गैलन कच्चा तेल फूंकने वाली अपनी युद्ध मशीनरी के प्रदूषण को आधिकारिक रिकॉर्ड की किताबों से ही गायब रखते हैं. यह डॉक्युमेंट्री पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूंजीवादी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे इस सबसे बड़े पाखंड का एक अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज है। 

भोपाल में बनेगा गैस त्रासदी मेमोरियल, भुज के स्मृतिवन से प्रेरित परियोजना पर सरकार की तैयारी

भोपाल  भोपाल में 1984 में हुए भीषण गैस कांड की याद में अब एक भव्य और विश्वस्तरीय स्मारक बनाने की योजना तैयार की जा रही है. यह स्मारक गुजरात के भुज स्थित प्रसिद्ध ‘स्मृतिवन’ की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यूनियन कार्बाइड की केमिकल कचरा-मुक्त भूमि पर यह स्मारक बनाया जाए।  इस परियोजना के लिए एनवायरमेंटल प्लानिंग एंड कॉर्डिनेशन ऑर्गेनाइजेशन (Environmental Planning and Coordination Organisation) को जिम्मेदारी दी गई है. उन्हें भुज के भूकंप स्मारक और म्यूजियम का अध्ययन करने तथा उसके आधार पर एक डिटेल्ड एक्शन प्लान तैयार करने को कहा गया है।  हजारों लोगों की याद में बने स्मारक मुख्यमंत्री मोहन यादव फरवरी 2026 में कच्छ दौरे के दौरान भुज के स्मृतिवन से काफी प्रभावित हुए थे. 2001 के विनाशकारी भूकंप में जान गंवाने वाले हजारों लोगों की याद में बने इस स्मारक ने उन्हें प्रेरित किया. यह स्मारक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का परिणाम है, जिन्होंने इसे 2011 में चीन के सिचुआन भूकंप स्मारक को देखकर तैयार करने की योजना बनाई थी।  भुज का ‘स्मृतिवन’ 470 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और इसे देश का सबसे बड़ा स्मारक माना जाता है. यह 2001 के भूकंप में जान गंवाने वाले 13,000 से अधिक लोगों की स्मृति में बनाया गया है. यहां 7 थीम आधारित गैलरियां बनाई गई हैं, जहां आधुनिक तकनीक जैसे सिम्युलेटर, थ्री-डी और प्रोजेक्टर के जरिए भूकंप का वास्तविक अनुभव कराया जाता है।  सीएम ने दिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) को इस महत्वाकांक्षी परियोजना की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने निर्देश दिए कि एप्को की एक विशेष टीम गुजरात के भुज में बने आधुनिक भूकंप स्मारक व संग्रहालय का मौका-मुआयना करे। वहां की व्यवस्थाओं और डिजाइन का विस्तृत निरीक्षण करने के बाद भोपाल में भी वैसा ही भव्य स्मारक तैयार करने के लिए एक विधिवत प्रस्ताव और ठोस एक्शन प्लान तैयार किया जाए। भुज का 'स्मृतिवन' मॉडल क्यों है खास? भोपाल में जिस भुज मॉडल को आधार बनाकर स्मारक की रूपरेखा तैयार की जा रही है, वह बेहद अनूठा है। 2001 के गुजरात भूकंप पीड़ितों की याद में बना भुज का 'स्मृतिवन' अपनी आधुनिक गैलरी, मियावाकी वन और आपदा प्रबंधन के जीवंत अनुभवों (सिम्युलेटर तकनीक) के कारण दुनिया भर में मशहूर है। अब इसी तर्ज पर भोपाल गैस त्रासदी के इतिहास और पीड़ितों की याद को सहेजने के लिए यूनियन कार्बाइड परिसर को नया रूप दिया जाएगा। कच्‍छ दौरे के समय सीएम हुए थे प्रभावित दरअसल, फरवरी 2026 में अपने कच्छ दौरे के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भुज के 'स्मृतिवन' को देखकर बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 2001 के विनाशकारी भूकंप पीड़ितों की याद में 470 एकड़ में फैला भुज का यह अनूठा स्मारक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का परिणाम था। पीएम मोदी ने साल 2011 में चीन के सिचुआन प्रांत के भूकंप स्मारक को देखने के बाद इस भव्य स्मृतिवन का खाका तैयार किया था। क्यों अनूठा व विश्वस्तरीय है भुज का 'स्मृतिवन'? देश का सबसे बड़ा स्मारक: यह स्मारक 2001 के गुजरात भूकंप में जान गंवाने वाले 13,000 से अधिक लोगों की याद में भुज की भुजिया पहाड़ी पर पूरे 470 एकड़ क्षेत्र में बनाया गया है। भूकंप का वास्तविक अहसास: स्मृतिवन में 7 थीम-आधारित गैलरी बनाई गई हैं। यहाँ विशेष सिम्युलेटर की मदद से आने वाले आगंतुकों को भूकंप का वास्तविक (लाइव) अनुभव कराया जाता है। कच्छ की संस्कृति और इतिहास: थ्री-डी प्रोजेक्टर व आधुनिक गैजेट्स के जरिए कच्छ की अनूठी संस्कृति, भूकंप का इतिहास और इस भीषण आपदा के बाद हुए अद्भुत पुनर्निर्माण की पूरी कहानी को जीवंत रूप में दिखाया गया है। पर्यावरण और जल संरक्षण: पूरे परिसर में 50 चेकडैम बनाए गए हैं। इसके साथ ही, दिवंगत आत्माओं की याद में 50,000 से अधिक पौधे लगाकर एक भव्य 'मियावाकी वन' विकसित किया गया है। पुनर्निर्माण की कहानी को दिखाया इस स्मारक में कच्छ की संस्कृति, इतिहास और भूकंप के बाद हुए पुनर्निर्माण की कहानी को भी दिखाया गया है. इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है. यहां 50 चेकडेम बनाए गए हैं और 50,000 से अधिक पौधों के साथ मियावाकी वन विकसित किया गया है।  इसी मॉडल को आधार बनाकर भोपाल में बनने वाला नया स्मारक गैस कांड का दर्द, इतिहास और सबक को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम करेगा। 

Right to Business Act: चंडीगढ़ में बिजनेस के लिए नई व्यवस्था लागू, पढ़ें कैसे मिलेगा फायदा और कैसे करें आवेदन

चंडीगढ़  केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है।केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, पंजाब राइट टू बिजनेस एक्ट, 2020 को कुछ जरूरी संशोधनों के साथ लागू कर दिया है। तारीख 2 जुलाई, 2026 से यह प्रभावी रूप से लागू हो चुका है।। इस नए कानून के आने से चंडीगढ़ में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को एक नई मजबूती मिलेगी। आइए समझते हैं यह राइट टू बिजनेस एक्ट क्या है और लोगों व व्यापारियों को कैसे इसका फायदा होगा। राइट टू बिजनेस एक्ट क्या है? राइट टू बिजनेस एक्ट का मुख्य उद्देश्य नए व्यवसायों को शुरू करने के लिए दी जाने वाली सरकारी मंजूरियों से है। जहां पहले किसी भी कारोबार को शुरू करने से पहले एनओसी के लिए व्यवसासियों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे। वहीं, अब इसके लिए सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम बनाया जाएगा है। इसके जरिए आवश्यक मंजूरियां एक ही जगह से और एक तय समय-सीमा के अंदर दी जाएंगी। चंडीगढ़ तक एक्सटेंड करने के पीछे क्या है उद्देश्य? चंडीगढ़ में इस एक्ट को लागू करने का मुख्य उद्देश्य लोगों के समय को बचाना है। वहीं, सरकार भी चाहती है कि चंडीगढ़ देश में निवेश और कारोबार के लिए एक पसंदीदा और आकर्षक केंद्र बने। इसके लिए प्रक्रियाओं को डिजिटल किया जाएगा ताकि कारोबारी घर बैठे सरकारी काम आसानी से करवा सके। कौन-कौन से बिजनेस इसमें आएंगे? इस एक्ट के दायरे में मुख्य रूप से तीन बड़े सेक्टर्स को शामिल किया गया है। पहला उद्योग मसलन नए कारखाने और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, व्यापार- रिटेल, होलसेल और सर्विस सेक्टर आईटी कंपनियां और स्टार्टअप्स इत्यादि। क्या होगी आवदेन की प्रक्रिया व्यवसाय शुरू करने के लिए अब किसी भी निवेशक को अलग-अलग विभागों में जाने की जरूरत नहीं होगी। आवेदन करने की प्रक्रिया सिंगल विंडो क्लियरेंस पोर्टल के माध्यम से पूरी होगी। आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज और फीस एक ही बार में जमा करनी होगी।  चंडीगढ़ मास्टर प्लान-2031 को मिलेगी नई रफ्तार मास्टर प्लान-2031 के अंतर्गत चंडीगढ़ के औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के आधुनिकीकरण में यह कानून एक गेम-चेंजर साबित होगा। राइट टू बिजनेस एक्ट इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने के लिए मुख्य भूमिका निभाएगा। इसके लागू होने से शहर में बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ लालफीताशाही खत्म होगी। कारोबार बढ़ने से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।