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समुद्री कटाव से दहला ओडिशा: गंजाम के 17 गांवों का अस्तित्व खतरे में, हजारों परिवार दहशत में

भुवनेश्वर ओडिशा के गंजाम जिले में समुद्री कटाव ने विकराल रूप धारण कर लिया है। समुद्र के लगातार आगे बढ़ने से गंजाम ब्लॉक के पोड़मपेटा गांव समेत दो ग्राम पंचायतों के 17 गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। शुक्रवार को एक पक्का मकान समुद्र में समा जाने की घटना ने स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ वर्ष पहले तक समुद्र गांव से करीब एक किलोमीटर दूर था, लेकिन लगातार कटाव के कारण अब वह गांव की सीमा तक पहुंच चुका है। हालात ऐसे हैं कि पोड़मपेटा का बड़ा हिस्सा समुद्र में विलीन हो चुका है। कभी करीब 500 घरों वाला यह गांव अब कुछ गिने-चुने मकानों तक सिमट गया है। रोज निगल रहा जमीन स्थानीय लोगों का कहना है कि समुद्र प्रतिदिन कुछ न कुछ जमीन अपने आगोश में ले रहा है। कटाव वाले क्षेत्र से अधिकांश परिवार पलायन कर चुके हैं, लेकिन शेष भूमि भी तेजी से खत्म होती जा रही है। इससे आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। 17 गांवों पर संकट स्थानीय सर्वेक्षण के मुताबिक पालिबंधा ग्राम पंचायत के नौ और रामगड़ा ग्राम पंचायत के आठ गांव समुद्री कटाव की जद में हैं। इन गांवों के हजारों लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। ग्रामीणों ने सरकार से तट सुरक्षा दीवार, बोल्डर पैकिंग और अन्य स्थायी उपाय करने की मांग की है। आंदोलन और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी प्रशासन की ओर से प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। प्रभावित गांवों के लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन शुरू करेंगे और आगामी चुनावों का बहिष्कार भी कर सकते हैं। मुख्यमंत्री को लिखा पत्र छत्रपुर विधायक कृष्ण चंद्र नायक ने मामले को गंभीर बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखा है। उन्होंने प्रभावित गांवों को बचाने के लिए तत्काल विशेष पैकेज, तकनीकी सहायता और स्थायी तटीय सुरक्षा परियोजनाएं शुरू करने का आग्रह किया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कई गांवों का नामोनिशान मिट सकता है। समुद्र का बढ़ता कहर अब गंजाम तट के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

बेमेतरा में अवैध उर्वरक भंडारण पर बड़ी कार्रवाई, 275 बोरी यूरिया जब्त; किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकार सजग

रायपुर  मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को समय पर, उचित मूल्य पर और गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। खरीफ सीजन 2026 के दौरान किसानों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार के निर्देश पर पूरे प्रदेश में उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी और अवैध भंडारण के विरुद्ध सघन अभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़ी में बेमेतरा जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए अवैध रूप से भंडारित 275 बोरी यूरिया जब्त कर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि किसानों के अधिकारों से खिलवाड़ करने वालों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी सु प्रतिष्ठा ममगाईं के निर्देश तथा कृषि विभाग के उप संचालक  मोरध्वज डडसेना के मार्गदर्शन में गठित जिला स्तरीय उड़नदस्ता दल द्वारा जिलेभर में लगातार औचक निरीक्षण और छापामार कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को निर्धारित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण उर्वरक उपलब्ध हो तथा कृत्रिम अभाव उत्पन्न कर अनुचित लाभ कमाने के प्रयासों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। इसी अभियान के तहत प्राप्त गोपनीय सूचना के आधार पर उड़नदस्ता दल ने ग्राम जानो, तहसील देवकर में अँजोर वर्मा के परिसर में औचक निरीक्षण किया। जांच के दौरान उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए 275 बोरी यूरिया का अवैध भंडारण पाया गया। मौके पर संपूर्ण उर्वरक को विधिवत जब्त कर लिया गया तथा संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। प्राप्त जवाब के परीक्षण के बाद नियमानुसार आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। कृषि विभाग ने जब्त किए गए उर्वरकों के नमूने गुणवत्ता परीक्षण के लिए अधिकृत प्रयोगशाला भेजने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को केवल मानक गुणवत्ता वाले उर्वरक ही उपलब्ध कराए जाएं और किसी भी प्रकार की मिलावट अथवा निम्न गुणवत्ता की सामग्री बाजार में न पहुंचे। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी, अवैध भंडारण तथा निर्धारित मूल्य से अधिक दर पर बिक्री करने वालों के विरुद्ध अभियान निरंतर जारी रहेगा। यदि कोई निजी कृषि केंद्र, उर्वरक विक्रेता अथवा सहकारी संस्था इस प्रकार की अनियमितता करते हुए पाई जाती है, तो उसके विरुद्ध उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। आवश्यक होने पर पुलिस में एफआईआर दर्ज कर प्रकरण न्यायालय में भी प्रस्तुत किया जाएगा। कलेक्टर सु प्रतिष्ठा ममगाईं ने कहा है कि किसानों के हितों की रक्षा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी परिस्थिति में उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी अथवा कृत्रिम अभाव उत्पन्न करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। प्रशासन पूरे जिले में लगातार निगरानी कर रहा है और शिकायत प्राप्त होते ही बिना पूर्व सूचना के तत्काल जांच एवं छापामार कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों के हितों की सुरक्षा, कृषि व्यवस्था में पारदर्शिता तथा कृषि आदानों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठा रही है। प्रदेश में चल रही इस तरह की सतत कार्रवाई न केवल कालाबाजारी और जमाखोरी पर अंकुश लगाने में सहायक होगी, बल्कि किसानों का विश्वास भी मजबूत करेगी कि सरकार उनकी मेहनत, उनकी फसल और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। जिला प्रशासन ने किसानों एवं आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि कहीं उर्वरकों की कालाबाजारी, अवैध भंडारण, अधिक मूल्य पर बिक्री अथवा अन्य किसी प्रकार की अनियमितता की जानकारी मिले तो तत्काल कृषि विभाग अथवा जिला प्रशासन को सूचित करें। प्रशासन ने आश्वस्त किया है कि शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी तथा प्रत्येक शिकायत पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी।

Punjab News: सरकार के फैसले का असर, कश्मीरी परिवारों ने शादी के कार्ड बांटना किया बंद; जानें वजह

चंडीगढ़  पंजाब सरकार के एक फैसले से कश्मीरी लोगों की चिंता बढ़ गई है. यहां शादी-विवाहों के लिए पूरी तैयारी कर चुके लोगों ने अचानक इनविटेशन कार्ड तक बांटना बंद कर दिया है. दरअसल पंजाब में पशु ले जाने वाले वाहनों पर शुल्क बढ़ा दिया गया है, इससे कश्मीर में मटन की कमी हो गई है, जिससे लोग परेशान हैं, जबकि मटन कश्मीर में होने वाली शादियों में दिया जाने वाला प्रमुख भोजन है।  इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक श्रीनगर में ऐसे कई परिवार हैं जहां आने वाले हफ्तों में शादियां होनी हैं लेकिन कश्मीर में मटन की कमी हो गई है. लिहाजा कुछ लोगों ने शादी के कार्ड बांटना रोक दिया है और कुछ दिन के लिए शादियां पोस्टपोन कर दी हैं. यहां के लोग उम्मीद जता रहे हैं कि कुछ दिनों में मटन की सप्लाई ठीक रहे।  बता दें कि कश्मीर में मटन की कमी की मुख्य वजह पंजाब में लगाया जा रहा अतिरिक्त शुल्क है. मटन व्यापारियों ने आरोप लगाया कि पंजाब सीमा पर भेड़ ले जाने वाले हर ट्रक से 25,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं. इसका असर कीमतों पर भी पड़ा है. ऐसे में मटन 700 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 750 रुपये प्रति किलो हो गया है।  एक-दो किलो पर देखें तो यह कोई बड़ा अंतर नहीं दिखाई देता है लेकिन शादियों में जहां 200-400 किलो मटन की जरूरत एक साथ होती है तो वहां यह कीमत कई हजार का अंतर डाल रही है. कई जगहों पर देखा जा रहा है कि मटन की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है।  यह समस्या ऐसे समय आई है जब कश्मीर में अप्रैल से अक्टूबर तक शादी का सीजन चलता है. इसका असर कश्मीरी पारंपरिक दावत वाजवान पर भी पड़ा है, जिसमें मटन का एक नहीं बल्कि कई व्यंजन शामिल होते हैं. अब इन व्यंजनों की संख्या कम हो रही है।  बता दें कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस शुल्क को गैरकानूनी और मनमाना बताया है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मामले में पंजाब के सीएम भगवंत मान को पत्र लिखकर पशु ढोने वाले वाहनों की आवाजाही बिना रुकावट जारी रखने की मांग की है. वहीं कश्मीर मटन डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव मेहराज-उद-दीन गनी ने बताया कि भेड़ मंडियां लगातार नौ दिनों से बंद हैं. उन्होंने कहा कि शादी का मौसम है, लेकिन व्यापारी मजबूर हैं।  कश्मीर में 90 फीसदी लोग मांसाहारी बता दें कि कश्मीर का मुख्य भोजन ही मांस है. यहां लगभग 90 फीसदी लोग मांसाहारी हैं और यहां मटन की खपत देश में सबसे ज्यादा है. हर साल यहां 600 लाख किलो से ज्यादा मटन खाया जाता है. इसका आधे से ज्यादा हिस्सा हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान से आने वाली भेड़ों से पूरा होता है।  व्यापारियों के अनुसार सामान्य दिनों में रोज 40–50 ट्रक (करीब 8,000 भेड़) कश्मीर आते हैं. शादी के सीजन में यह संख्या 60–70 ट्रक (करीब 11,000 भेड़) तक पहुंच जाती है।  पंजाब सरकार ने दिया जबाव वहीं इस मुद्दे पर पंजाब सरकार का कहना है कि यह कोई नया टैक्स नहीं है, बल्कि पशु मंडी शुल्क है. अधिकारियों के मुताबिक कुछ व्यापारी नियमों का पालन किए बिना पशु बाहर ले जा रहे हैं, जिससे राजस्व का नुकसान हो रहा है।  बढ़ रहा विवाद जबकि जम्मू-कश्मीर के व्यापारी कहते हैं कि पंजाब सिर्फ रास्ते में पड़ने वाला राज्य (ट्रांजिट स्टेट) है, इसलिए वहां टैक्स नहीं लगना चाहिए. उनका कहना है कि पहले 5,000 रुपये लिए जाते थे, लेकिन अब कई बार 25,000 रुपये तक मांगे जा रहे हैं।  इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि ये वाहन सिर्फ हाईवे का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए इस तरह की वसूली का कोई औचित्य नहीं है।  अब इस विवाद को सुलझाने के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों की जल्द बैठक होने की संभावना जताई जा रही है. बैठक के बाद पंजाब सरकार औपचारिक जवाब देगी। 

क्या अमेरिकी सेना बन रही है पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा? डॉक्युमेंट्री में पेंटागन को लेकर बड़ा दावा

वाशिंगटन  वैश्विक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर बड़े-बड़े देशों और औद्योगिक घरानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा महा-प्रदूषक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जलवायु संधियों में ‘फ्री पास’ यानी पूरी छूट मिली हुई है. प्रसिद्ध खोजी पत्रकार एबी मार्टिन (Abby Martin) की नयी खोजी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अर्थ्स ग्रेटेस्ट एनिमी’ (Earth’s Greatest Enemy) ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. 120 मिनट की फिल्म ने पुख्ता सबूतों और अविश्वसनीय आंकड़ों के साथ साबित किया है कि अमेरिकी सेना (US Military) और उसका रक्षा मुख्यालय पेंटागन वैश्विक जलवायु संकट को बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत प्रदूषक है।  140 देशों के कुल उत्सर्जन से भी अधिक कार्बन फैलाता है पेंटागन लॉरा पोलक (Laura Pollock) की ओर से की गयी फिल्म की समीक्षा के अनुसार, इस डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी रक्षा विभाग और उसकी नौसेना एवं वायुसेना के प्रदूषण फैलाने संबंधी जो आंकड़े पेश किये गये हैं, वे चौंकाने वाले हैं।      विमानों का ईंधन ईकोसाइड : फिल्म में पत्रकार एबी मार्टिन बताती हैं कि औसत अमेरिकी नागरिक अपने पूरे जीवनकाल में (लगभग 40 वर्ष) जितना ईंधन का इस्तेमाल करता है, बोइंग पेगासस (Boeing Pegasus) जैसे अमेरिकी सैन्य टैंकर की सिर्फ एक उड़ान में उतना ईंधन खत्म हो जाता है. अमेरिका ऐसे 600 से अधिक उड़ान टैंकर हवा में उड़ाता है।      140 देशों से भी बड़ा प्रदूषक पेंटागन : अमेरिकी सेना का कुल कार्बन उत्सर्जन दुनिया के 140 देशों के संयुक्त उत्सर्जन से भी कहीं अधिक है. इसके बावजूद वैश्विक जलवायु सम्मेलनों (जैसे COP26) में सैन्य उत्सर्जन के इन आंकड़ों को छिपा लिया जाता है।      लाखों समुद्री जीवों का कत्लेआम : एक डरावना आंकड़ा यह भी है कि अमेरिकी नौसेना (US Navy) को अपने 5 साल के युद्धाभ्यास और परीक्षणों के दौरान 2.6 मिलियन (26 लाख) से अधिक समुद्री स्तनधारी जीवों (Marine Mammals) को नुकसान पहुंचाने या उन्हें मार डालने की कानूनी छूट मिली हुई है. इतना ही नहीं, इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान छोड़े गये 2.5 लाख से अधिक गोले और प्रदूषण ने वहां की भूमि को स्थायी रूप से बंजर बना दिया है।  जहां-जहां अमेरिकी बेस, वहां-वहां ‘जहरीली मौत’ खोजी पत्रकार एबी मार्टिन और उनके पति माइक प्रिसनर ने इस सच्चाई को उजागर करने के लिए पूरी दुनिया का दौरा किया. वे ग्लासगो (स्कॉटलैंड) से लेकर अलास्का, हवाई और जापान के ओकिनावा द्वीप तक गये. कैंप लेज्यून और कोरल रीफ को कैसे नुकसान पहुंचा है, यहां जानें।  डॉक्युमेंट्री का संदेश : एक साथ कई मोर्चे पर संघर्ष कर रही है हमारी प्रकृति।  Earths Greatest Enemy: उत्तरी कैरोलिना के कैंप लेज्यून का सच उत्तरी कैरोलिना के ‘कैंप लेज्यून’ में अमेरिकी सेना के ही घरेलू बेस से हुए ईंधन रिसाव, जहरीले कचरे और औद्योगिक अपशिष्टों के कारण स्थानीय अमेरिकी बस्तियों के पानी में जहर घुल गया. फिल्म में उन माताओं का रुदन दिखाया गया है, जिन्होंने इस दूषित पानी के कारण अपने बच्चों को खो दिया।  हवाई और ओकिनावा में कोरल रीफ का विनाश हवाई और ओकिनावा (जापान) में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के निर्माण के लिए पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है. उसके मलबे को समुद्र में फेंककर दुर्लभ कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है. जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कायक (नावों) के जरिये समुद्र में इसका विरोध किया, तो अमेरिकी स्पीडबोट्स ने उनकी नावें पलट दीं और उन्हें हिरासत में ले लिया।  अमेरिकी नेताओं का पाखंड डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के पाखंड पर भी तीखा प्रहार किया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक तरफ तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी और प्रगतिशील प्रतिनिधि अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसी नेता लाइव स्ट्रीम पर कॉप-26 (COP26) के लक्ष्यों को ‘ऐतिहासिक’ बताती हैं, लेकिन जब उनसे सवाल पूछा जाता है कि नेट-जीरो (Net-Zero) के दावों के बीच पेंटागन का बजट और सैन्य खर्च लगातार क्यों बढ़ाया जा रहा है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता।  अमेरिकी पाखंड का सबसे अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज यह फिल्म सीधे तौर पर व्हाइट हाउस और पेंटागन को कटघरे में खड़ा करती है, जो आम जनता को पर्यावरण बचाने के लिए ‘प्लास्टिक स्ट्रॉ’ छोड़ने और ‘इलेक्ट्रिक कारें’ खरीदने का उपदेश देते हैं, लेकिन खुद खरबों गैलन कच्चा तेल फूंकने वाली अपनी युद्ध मशीनरी के प्रदूषण को आधिकारिक रिकॉर्ड की किताबों से ही गायब रखते हैं. यह डॉक्युमेंट्री पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूंजीवादी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे इस सबसे बड़े पाखंड का एक अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज है। 

भोपाल में बनेगा गैस त्रासदी मेमोरियल, भुज के स्मृतिवन से प्रेरित परियोजना पर सरकार की तैयारी

भोपाल  भोपाल में 1984 में हुए भीषण गैस कांड की याद में अब एक भव्य और विश्वस्तरीय स्मारक बनाने की योजना तैयार की जा रही है. यह स्मारक गुजरात के भुज स्थित प्रसिद्ध ‘स्मृतिवन’ की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यूनियन कार्बाइड की केमिकल कचरा-मुक्त भूमि पर यह स्मारक बनाया जाए।  इस परियोजना के लिए एनवायरमेंटल प्लानिंग एंड कॉर्डिनेशन ऑर्गेनाइजेशन (Environmental Planning and Coordination Organisation) को जिम्मेदारी दी गई है. उन्हें भुज के भूकंप स्मारक और म्यूजियम का अध्ययन करने तथा उसके आधार पर एक डिटेल्ड एक्शन प्लान तैयार करने को कहा गया है।  हजारों लोगों की याद में बने स्मारक मुख्यमंत्री मोहन यादव फरवरी 2026 में कच्छ दौरे के दौरान भुज के स्मृतिवन से काफी प्रभावित हुए थे. 2001 के विनाशकारी भूकंप में जान गंवाने वाले हजारों लोगों की याद में बने इस स्मारक ने उन्हें प्रेरित किया. यह स्मारक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का परिणाम है, जिन्होंने इसे 2011 में चीन के सिचुआन भूकंप स्मारक को देखकर तैयार करने की योजना बनाई थी।  भुज का ‘स्मृतिवन’ 470 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और इसे देश का सबसे बड़ा स्मारक माना जाता है. यह 2001 के भूकंप में जान गंवाने वाले 13,000 से अधिक लोगों की स्मृति में बनाया गया है. यहां 7 थीम आधारित गैलरियां बनाई गई हैं, जहां आधुनिक तकनीक जैसे सिम्युलेटर, थ्री-डी और प्रोजेक्टर के जरिए भूकंप का वास्तविक अनुभव कराया जाता है।  सीएम ने दिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) को इस महत्वाकांक्षी परियोजना की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने निर्देश दिए कि एप्को की एक विशेष टीम गुजरात के भुज में बने आधुनिक भूकंप स्मारक व संग्रहालय का मौका-मुआयना करे। वहां की व्यवस्थाओं और डिजाइन का विस्तृत निरीक्षण करने के बाद भोपाल में भी वैसा ही भव्य स्मारक तैयार करने के लिए एक विधिवत प्रस्ताव और ठोस एक्शन प्लान तैयार किया जाए। भुज का 'स्मृतिवन' मॉडल क्यों है खास? भोपाल में जिस भुज मॉडल को आधार बनाकर स्मारक की रूपरेखा तैयार की जा रही है, वह बेहद अनूठा है। 2001 के गुजरात भूकंप पीड़ितों की याद में बना भुज का 'स्मृतिवन' अपनी आधुनिक गैलरी, मियावाकी वन और आपदा प्रबंधन के जीवंत अनुभवों (सिम्युलेटर तकनीक) के कारण दुनिया भर में मशहूर है। अब इसी तर्ज पर भोपाल गैस त्रासदी के इतिहास और पीड़ितों की याद को सहेजने के लिए यूनियन कार्बाइड परिसर को नया रूप दिया जाएगा। कच्‍छ दौरे के समय सीएम हुए थे प्रभावित दरअसल, फरवरी 2026 में अपने कच्छ दौरे के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भुज के 'स्मृतिवन' को देखकर बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 2001 के विनाशकारी भूकंप पीड़ितों की याद में 470 एकड़ में फैला भुज का यह अनूठा स्मारक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का परिणाम था। पीएम मोदी ने साल 2011 में चीन के सिचुआन प्रांत के भूकंप स्मारक को देखने के बाद इस भव्य स्मृतिवन का खाका तैयार किया था। क्यों अनूठा व विश्वस्तरीय है भुज का 'स्मृतिवन'? देश का सबसे बड़ा स्मारक: यह स्मारक 2001 के गुजरात भूकंप में जान गंवाने वाले 13,000 से अधिक लोगों की याद में भुज की भुजिया पहाड़ी पर पूरे 470 एकड़ क्षेत्र में बनाया गया है। भूकंप का वास्तविक अहसास: स्मृतिवन में 7 थीम-आधारित गैलरी बनाई गई हैं। यहाँ विशेष सिम्युलेटर की मदद से आने वाले आगंतुकों को भूकंप का वास्तविक (लाइव) अनुभव कराया जाता है। कच्छ की संस्कृति और इतिहास: थ्री-डी प्रोजेक्टर व आधुनिक गैजेट्स के जरिए कच्छ की अनूठी संस्कृति, भूकंप का इतिहास और इस भीषण आपदा के बाद हुए अद्भुत पुनर्निर्माण की पूरी कहानी को जीवंत रूप में दिखाया गया है। पर्यावरण और जल संरक्षण: पूरे परिसर में 50 चेकडैम बनाए गए हैं। इसके साथ ही, दिवंगत आत्माओं की याद में 50,000 से अधिक पौधे लगाकर एक भव्य 'मियावाकी वन' विकसित किया गया है। पुनर्निर्माण की कहानी को दिखाया इस स्मारक में कच्छ की संस्कृति, इतिहास और भूकंप के बाद हुए पुनर्निर्माण की कहानी को भी दिखाया गया है. इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है. यहां 50 चेकडेम बनाए गए हैं और 50,000 से अधिक पौधों के साथ मियावाकी वन विकसित किया गया है।  इसी मॉडल को आधार बनाकर भोपाल में बनने वाला नया स्मारक गैस कांड का दर्द, इतिहास और सबक को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम करेगा। 

Right to Business Act: चंडीगढ़ में बिजनेस के लिए नई व्यवस्था लागू, पढ़ें कैसे मिलेगा फायदा और कैसे करें आवेदन

चंडीगढ़  केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है।केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, पंजाब राइट टू बिजनेस एक्ट, 2020 को कुछ जरूरी संशोधनों के साथ लागू कर दिया है। तारीख 2 जुलाई, 2026 से यह प्रभावी रूप से लागू हो चुका है।। इस नए कानून के आने से चंडीगढ़ में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को एक नई मजबूती मिलेगी। आइए समझते हैं यह राइट टू बिजनेस एक्ट क्या है और लोगों व व्यापारियों को कैसे इसका फायदा होगा। राइट टू बिजनेस एक्ट क्या है? राइट टू बिजनेस एक्ट का मुख्य उद्देश्य नए व्यवसायों को शुरू करने के लिए दी जाने वाली सरकारी मंजूरियों से है। जहां पहले किसी भी कारोबार को शुरू करने से पहले एनओसी के लिए व्यवसासियों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे। वहीं, अब इसके लिए सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम बनाया जाएगा है। इसके जरिए आवश्यक मंजूरियां एक ही जगह से और एक तय समय-सीमा के अंदर दी जाएंगी। चंडीगढ़ तक एक्सटेंड करने के पीछे क्या है उद्देश्य? चंडीगढ़ में इस एक्ट को लागू करने का मुख्य उद्देश्य लोगों के समय को बचाना है। वहीं, सरकार भी चाहती है कि चंडीगढ़ देश में निवेश और कारोबार के लिए एक पसंदीदा और आकर्षक केंद्र बने। इसके लिए प्रक्रियाओं को डिजिटल किया जाएगा ताकि कारोबारी घर बैठे सरकारी काम आसानी से करवा सके। कौन-कौन से बिजनेस इसमें आएंगे? इस एक्ट के दायरे में मुख्य रूप से तीन बड़े सेक्टर्स को शामिल किया गया है। पहला उद्योग मसलन नए कारखाने और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, व्यापार- रिटेल, होलसेल और सर्विस सेक्टर आईटी कंपनियां और स्टार्टअप्स इत्यादि। क्या होगी आवदेन की प्रक्रिया व्यवसाय शुरू करने के लिए अब किसी भी निवेशक को अलग-अलग विभागों में जाने की जरूरत नहीं होगी। आवेदन करने की प्रक्रिया सिंगल विंडो क्लियरेंस पोर्टल के माध्यम से पूरी होगी। आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज और फीस एक ही बार में जमा करनी होगी।  चंडीगढ़ मास्टर प्लान-2031 को मिलेगी नई रफ्तार मास्टर प्लान-2031 के अंतर्गत चंडीगढ़ के औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के आधुनिकीकरण में यह कानून एक गेम-चेंजर साबित होगा। राइट टू बिजनेस एक्ट इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने के लिए मुख्य भूमिका निभाएगा। इसके लागू होने से शहर में बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ लालफीताशाही खत्म होगी। कारोबार बढ़ने से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

कांग्रेस का बड़ा एक्शन: जिला अध्यक्ष तैयार करेंगे विवादित नेताओं की सूची, अनुशासनहीनों पर गिरेगी गाज

भोपाल  मध्य प्रदेश कांग्रेस में अक्सर अपने ही नेताओं के कारण पार्टी की मुसीबतें बढ़ती रहती हैं। कई नेता सीधे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से लेकर प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी, पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह तक को निशाने पर ले लेते हैं। अब पार्टी लाइन से हटकर अक्सर विवादित बयान देने वाले कांग्रेसियों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं। एमपी कांग्रेस अब ऐसे विवादित नेताओं की लिस्ट तैयार करने जा रही है जो पार्टी लाइन से हटकर बयान देते हैं। जिला अध्यक्ष बनाएंगे विवादित बयानवीरों की लिस्ट एमपी कांग्रेस के संगठन प्रभारी डॉ संजय कामले ने बताया कि पार्टी फोरम पर सीनियर लीडर्स ने कई बार यह विषय उठाया है कि कई कार्यकर्ता ऐसे हैं जो अक्सर पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी करते हैं। ऐसे नेताओं पर लगाम लगाने के लिए अब पार्टी कड़ा फैसला लेने जा रही है। सोशल मीडिया पर भी पार्टी के खिलाफ लिखने वाले होंगे चिन्हित कांग्रेस के संगठन प्रभारी डॉ संजय कामले ने सभी जिला अध्यक्षों को भेजे पत्र में लिखा है कि पार्टी को लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि कुछ कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर पार्टी की नीतियों, नेतृत्व और फैसलों के खिलाफ पोस्ट कर रहे हैं। इसे अनुशासनहीनता माना जाएगा। चिन्हित करें नोटिस दें न मानें तो एक्शन लें पत्र में कहा गया है कि प्रदेश प्रभारी के निर्देश पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने तय किया है कि किसी भी स्तर पर अनुशासनहीनता स्वीकार नहीं की जाएगी। जिला अध्यक्षों से कहा गया है कि ऐसे पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की पहचान कर उन्हें पहले नोटिस जारी करें। यदि इसके बाद भी उनके व्यवहार में सुधार नहीं होता है तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें और इसकी रिपोर्ट प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भेजें। जिले में कार्रवाई नहीं हो सकती तो सबूतों के साथ प्रदेश को रिपोर्ट भेजें पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन नेताओं के खिलाफ जिला स्तर पर कार्रवाई संभव नहीं है, उनके मामलों की पूरी जानकारी और साक्ष्यों के साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भेजी जाए, ताकि उनके विरुद्ध भी आवश्यक कार्रवाई की जा सके। संगठन ने जिला इकाइयों से इस काम को प्राथमिकता के साथ पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

Crude Oil Forecast: सिटी बैंक का बड़ा दावा, कच्चे तेल की कीमतें और गिरेंगी; क्या घटेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

नई दिल्ली  दुनिया भर में कच्चे तेल (Crude Oil) की किल्लत का दौर अब खत्म होने की कगार पर है. मॉर्गन स्टैनली और गोल्डमैन सॉक्‍स के बाद अब दिग्गज अमेरिकी निवेश बैंक सिटी (Citigroup) ने भी भविष्यवाणी की है कि साल के अंत तक कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो इससे भारतीय तेल कंपनियों पर बोझ कम होगा और देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती हो सकती है।  सिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि फरवरी के अंत में शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के चलते होर्मुज जलडमरूमध्‍य पर दोहरी नाकेबंदी जैसी स्थिति बन गई थी. इस वजह से कच्‍चे तेल की सप्‍लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई. लेकिन अब वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक अंतरिम समझौता होने से तनाव कम हुआ है और इस महत्‍वपूर्ण समुद्री रास्‍ते पर जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो गई है. कच्चा तेल पर्याप्‍त मात्रा में उपलब्‍ध है. इस वजह से बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड दूसरी तिमाही में लगभग 30% तक टूटकर 71.92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।  भरपूर मात्रा में उपलब्‍ध है कच्‍चा तेल सिटी बैंक के विश्लेषकों के मुताबिक, तेल बाजार अब तेजी से अपनी पुरानी और सामान्य स्थिति में लौट रहा है. होर्मुज रूट खुलने से रिफाइनरियों को भरपूर कच्चा तेल मिल रहा है. दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश चीन फिलहाल बाजार से थोड़ी दूरी बनाए हुए है, जिससे कच्चे तेल की फिजिकल मांग कमजोर हुई है. वैश्विक तेल भंडारों में उम्मीद के मुकाबले बेहद कम गिरावट दर्ज की गई है, यानी स्टॉक में तेल की कोई कमी नहीं है।  $60-65 के दायरे में आएगा ब्रेंट क्रूड सिटी के विश्लेषकों का अनुमान है कि गर्मियों के दौरान अगर तेल की कीमतों में कोई अस्थायी तेजी आती भी है, तो उसे केवल बिकवाली का अवसर माना जाना चाहिए क्योंकि अंततः कीमतों को नीचे ही आना है. बैंक के मुताबिक, साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड आसानी से 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में पहुंच जाएगा।  केवल सिटी ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य बड़े वित्तीय संस्थान भी कच्‍चे तेल में गिरावट का अनुमान जता चुके हैं. गोल्डमैन सॉक्‍स ने कहा था कि ईरान विवाद शांत होने के बाद बाजार में फिर से ओवरसप्‍लाई की स्थिति बन जाएगी. वहीं, मॉर्गन स्टैनली (Morgan Stanley) भी पिछले कुछ हफ्तों में दो बार कच्चे तेल के अपने अनुमानित दामों में कटौती कर चुका है।  भारत के लिए इसके क्या मायने हैं? भारत अपनी जरूरत का करीब 80-85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का $60 के स्तर पर आना भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकारी तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा. कच्चे तेल के दाम कम होने से कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन बढ़ेगा. इससे कंपनियों को पेट्रोल और डीजल का रेट घटाने का मौका मिलेगा।