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खुल सकता है होर्मुज का रास्ता, तेल बाजार में खुशी की लहर; डेढ़ महीने के निचले स्तर पर पहुंचा क्रूड

नई दिल्‍ली  खुशखबरी! ईंधन का संकट जल्‍द ही खत्‍म होने वाला है. ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की संभावना तेजी से बढ़ रही है और माना जा रहा है कि जल्‍द ही दोनों किसी नतीजे पर पहुंचने वाले हैं. समझौते की यह खुशी कच्‍चे तेल की कीमतों पर भी दिख रही है, जो शनिवार सुबह फिसलकर 6 सप्‍ताह यानी डेढ़ महीने के निचले स्‍तर पर पहुंच गया है. माना जा रहा है कि अब होर्मुज का रास्‍ता दोबारा खोला जा सकता है और ईंधन से लदे भारतीय जहाज सरपट भागने लगेंगे. इससे देश में पैदा हुआ क्रूड व गैस का संकट भी जल्‍द ही खत्‍म हो जाएगा।  ग्‍लोबल मार्केट में कच्‍चे तेल की कीमतों में आज 2 फीसदी से भी ज्‍यादा की गिरावट दिख रही है. डब्‍ल्‍यूटीआई का भाव फिसलहर 87.36 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें भी 91.12 डॉलर प्रति बैरल के भाव चल रही हैं. यह 6 सप्‍ताह का सबसे निचला स्‍तर है. अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ शांति समझौते पर अंतिम बातचीत चल रही है. हालांकि, ईरान के विदेशी मंत्री का अब भी कहना है कि कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और दोनों देशों के बीच बातचीत लगातार जारी है. हालांकि, अमेरिका के तेवर देखकर लगता है कि वह ईरान के साथ न्‍यूक्लियर मुद्दे पर दोबारा नए सिरे से बातचीत शुरू कर सकता है।  फिर सस्‍ता हो जाएगा क्रूड ग्‍लोबल एनर्जी एजेंसियों का कहना है कि होर्मुज के रास्‍ते में सैकड़ों जहाज खड़े-खड़े इंतजार कर रहे हैं. इस पर ईरान और अमेरिका दोनों ही अपना दावा ठोक रहे हैं और किसी भी जहाज को गुजरने नहीं दे रहे. अगर दोनों में समझौता होता है और होर्मुज से दोबारा कारोबार शुरू होता है तो जल्‍द ही कच्‍चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकती हैं. फिलहाल इस गतिरोध की वजह से ग्‍लोबल मार्केट में क्रूड का भंडार करीब 2 करोड़ बैरल नीचे आ चुका है. विश्‍व बैंक, आईएमएफ सहित तमाम ग्‍लोबल एजेंसियों ने भी चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचा तो गर्मी के महीने में ईंधन का संकट गहरा सकता है।  भारत को सबसे बड़ी राहत होर्मुज जलडमरूमध्‍य का रास्‍ता खुलता है तो सबसे ज्‍यादा लाभ भारत को होगा. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्‍सा ईंधन इसी रास्‍ते से मंगाता है. जहाजरानी मंत्रालय में निदेशक ओपेश कुमार शर्मा का कहना है कि भारत के लिए होर्मुज कितना महत्‍वपूर्ण इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम अपनी कुल जरूरत का करीब 30 फीसदी क्रूड ऑयल इसी रास्‍ते से मंगाते हैं. इतना ही नहीं, कुल एलपीजी आयात का 70 फीसदी भी इसी रास्‍ते से आता है. लिहाजा अगर शांति वार्ता कामयाब होती है और होर्मुज खुलता है तो भारतीय जहाजों के लिए यह सबसे बड़ी राहत होगी।  होर्मुज में अभी हमारे कितने जहाज ओपेश शर्मा का कहना है कि होर्मुज से अभी भारतीय झंडे वाले 13 जहाजों को ऑपरेट किया जा रहा है. इसमें एक एलपीजी टैंकर से लदा जहाज है, जबकि 5 जहाजों पर कच्‍चे तेल के टैंकर लदे हुए हैं. एक शिप रसायनों से भरा है, जिसका इस्‍तेमाल यूरिया व अन्‍य उर्वरक बनाने में किया जाता है, जबकि 3 कंटेनर लादने वाले शिप हैं और 2 जहाज बल्‍क कैरियर जबकि एक ड्रेगर के रूप में इस रास्‍ते पर खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा है. उन्‍होंने बताया कि 2.70 लाख मीट्रिक टन कच्‍चा तेल लादे एक टैंकर निसोस केरोस ने 25-26 मई को सफलतापूर्वक होर्मुज का रास्‍ता पार कर लिया है और इसके 3 जून तक विशाखापत्‍तन बंदरगाह पर पहुंचने की संभावना है। 

Crude Oil सस्ता होने से खुशखबरी, पेट्रोल-डीजल और LPG को लेकर बढ़ी उम्मीदें

नई दिल्‍ली  कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बढ़ती उम्मीदों के कारण सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लुढ़ककर दो सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया. बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड वायदा 4.55% की गिरावट के साथ 98.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 4.73% टूटकर 92.03 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा. दोनों ही अनुबंधों के लिए 7 मई के बाद का यह सबसे निचला स्तर है. क्रूड की कीमतों में आई यह गिरावट भारत के लिए बड़ी राहत है।  भारत के लिहाज से सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इस संभावित समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) का संकट टल सकता है. तनाव से पहले दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल और एलएनजी का परिवहन इसी मार्ग से होता था. इस रूट के सुचारू होने से भारत में गैस और तेल की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी रहेगी, जिससे देश में एलपीजी की किल्लत का खतरा पूरी तरह टल जाएगा और आपूर्ति चेन मजबूत होगी।  अमेरिका-ईरान में शांति की उम्मीद से टूटे दाम तेल की कीमतों में यह बड़ी गिरावट अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बढ़ती उम्मीदों के कारण आई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद बाजार में सकारात्मक माहौल बना है. ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि दोनों देश एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर “काफी हद तक बातचीत पूरी” कर चुके हैं. इस समझौते के तहत मध्य पूर्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग को दोबारा पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सकता है।  भले ही ते बाजार इस खबर से झूम उठा हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी पूरी तरह जश्न मनाना जल्दबाजी होगी. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ किया है कि उन्होंने अपने प्रतिनिधियों से ईरान के साथ किसी भी समझौते में जल्दबाजी न करने को कहा है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रुकावटों समेत कई जटिल मुद्दों पर दोनों पक्षों में मतभेद अभी भी बरकरार हैं।   

होर्मुज स्ट्रेट में तनाव का असर: ईरानी तेल टैंकर फंसे, स्टोरेज भरने से समुद्र में रिसाव की आशंका

नई दिल्ली ईरान इस समय क्रूड ऑयल को स्टोर करने को लेकर गंभीर संकट का सामना कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की ओर से होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की गई नाकेबंदी के चलते ईरानी तेल टैंकरों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे में ईरान का कच्चा तेल उसके मुख्य निर्यात केंद्र खर्ग द्वीप पर तेजी से जमा हो रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों में इस इलाके के समुद्र में बड़े पैमाने पर तेल फैला हुआ नजर आया है, जिससे आशंका जताई जा रही है कि स्टोरेज क्षमता खत्म होने के बाद तेल समुद्र में छोड़ा जा रहा है या फिर पुराने ढांचे से रिसाव हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान प्रतिदिन 30 लाख बैरल से अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करता है और इसका बड़ा हिस्सा खार्ग द्वीप से निर्यात होता है। फिलहाल अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण टैंकर फारस की खाड़ी से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। ईरान ने पुराने जहाजों और फ्लोटिंग स्टोरेज टैंकरों का उपयोग शुरू किया, फिर भी स्टोरेज क्षमता तेजी से भरती चली गई। अगर तेल उत्पादन रोका जाता है तो कई तेल कुओं को स्थायी नुकसान हो सकता है। इसलिए तेहरान के सामने उत्पादन जारी रखने और अतिरिक्त तेल को संभालने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। 45 वर्ग किमी तक फैला तेल का धब्बा सैटेलाइट इमेजरी में खार्ग द्वीप के आसपास समुद्र में लगभग 20 से 45 वर्ग किलोमीटर तक फैला तेल का धब्बा देखा गया है। कुछ रिपोर्टों में अनुमान लगाया गया कि हजारों बैरल तेल समुद्र में रिस चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसाव पुरानी पाइपलाइन, टैंकरों पर बढ़ते दबाव या युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण हो सकता है। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नियंत्रित नहीं हुई तो फारस की खाड़ी के समुद्री जीवन, तटीय क्षेत्रों और मछली उद्योग पर गंभीर असर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है। ईरान-अमेरिका तनाव और समुद्री टकराव के कारण वैश्विक तेल बाजार में भी भारी अस्थिरता देखी जा रही है। कई देशों को डर है कि अगर यह संकट और गहराया तो कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है। भारत समेत एशियाई देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि वे पश्चिम एशिया से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं।

ईरान जंग को लेकर एक्सपर्ट की चेतावनी, कच्चा तेल $200 बैरल तक पहुंच सकता है

 नई दिल्‍ली ईरान और अमेरिका के बीच लड़ाई ने पूरी दुनिया को महंगाई के खतरे में डाल दिया है. हर देश महंगाई के खतरे से बचने के लिए छोटे-मोटे कदम उठा रहा है, लेकिन सवाल है कि ये कब तक चलेगा? अगर वॉर ज्‍यादा दिनों तक चलता है तो दुनिया में महंगाई बढ़ना और ग्‍लोबल इकोनॉमी में संकट में आ सकती है. साथ ही तेल के दाम में रिकॉर्ड उछाल आ सकती है, जिससे हर छोटी बड़ी चीजें के दाम में बड़ी बढ़ोतरी हो जाएगी।  ब्रोकरेज फर्म Macquarie ने  भी इसी चीज को लेकर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि अगर ईरान से जुड़ा मौजूदा संघर्ष जून तक खिंचता है और स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद रहता है तो कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ सकती हैं और इसकी 40% संभावना है।  फर्म ने कहा कि दूसरी तिमाही तक जारी रहने वाला संघर्ष तेल की वास्तविक कीमतों को ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर पहुंचा सकता है. हालांकि, ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने 60 फीसदी की ज्‍यादा आशावादी संभावना जताई है, जिसके तहत इस महीने के अंत तक संघर्ष में कमी आ सकती है।  यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब ब्रेंट क्रूड की कीमतों में सालों में सबसे मजबूत मंथली उछाल देखी गई है, जिसका मुख्‍य कारण अमेर‍िका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव हैं. ईरान द्वारा स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगभग बंद कर देने से आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है और एक गहरे एनर्जी संकट की आशंका बढ़ गई है।  तेल क्षेत्रों में संकट बढ़ी  एक महीने से चल रहे इस वॉर ने प्रमुख तेल उत्‍पादक क्षेत्रों में हलचल तेज कर दी है. एशिया को तेल की आपूर्ति करने वाले एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍से को कंट्रोल करने वाले स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान के कंट्रोल ने एनर्जी मार्केट में अस्थिरता को और बढ़ा दिया है. ब्रोकरेज ने अपनी नोट में कहा कि अगर यह रास्‍ता लंबे समय तक बंद रहता है तो कीमतों में इतनी तेजी होनी चाहिए कि ग्‍लोबल तेल डिमांड में भारी गिरावट आ आ जाए. हालांकि यह रास्‍ता खुलने का संकेत मिला है।  ब्रेंट के दाम फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार  27 मार्च को दो चीनी जहाजों को होर्मुज से गुजरने से रोके जाने के बाद तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे यह संकेत मिला कि ईरान इस खास समुद्री मार्ग से आने-जाने पर प्रतिबंध लगाना जारी रखे हुए है. मई डिलीवरी के लिए ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 2.82% बढ़कर 111.06 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट फ्यूचर 2.68% बढ़कर 97.01 डॉलर हो गया।  समुद्री यातायात पर नज़र रखने वाली कंपनी मरीनट्रैफिक के अनुसार, चाइना ओशन शिपिंग कंपनी के मालिकाना हक वाले जहाजों को वापस भेज दिया गया. वॉर शुरू होने के बाद से किसी बड़े कंटेनर वाहक द्वारा इस मार्ग को पार करने का यह पहला प्रयास था. क्षमता के हिसाब से COSCO दुनिया की चौथी सबसे बड़ी शिपिंग लाइन है।  ट्रंप का बड़ा ऐलान  वहीं डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरान को होर्मुज फिर से खोलने के लिए 10 दिन का समय देने का फैसला किया है. साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा है कि वे 10 दिनों तक ईरान के एनर्जी इंफ्रा पर हमला नहीं करेंगे. सोशल मीडिया पोस्‍ट में ट्रंप ने कहा कि ईरान से बातचीत अभी अच्‍छी चल रही है. इस कदम के तहत, अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह 6 अप्रैल तक ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले रोक देंगे। 

तेल-गैस के कुओं से निकला क्रूड बनाता है ये 50 आम चीजें: प्लास्टिक से लेकर वैसलीन तक

 नई दिल्ली ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जंग से सिर्फ तेल और गैस का संकट ही नहीं बढ़ा है. इस जंग से हमारी रोजमर्रा की जरूरतों के समान पर भी संकट मंडराने लगा है. क्योंकि, हम हर दिन, हर वक्त कोई न कोई ऐसी चीज का इस्तेमाल करते रहते हैं, जो पेट्रो केमिकल्स या पेट्रोलियम मैटेलियल से बना होता है. ऐसे में जानते हैं कि  पेट्रोलियम बेस्ड उन छोटी-छोटी चीजों के बारे में, जिनका हम हर रोज इस्तेमाल करते हैं।   हम हर जो रोज जिस बोतल से पानी पीते हैं, उसकी प्लास्टिक या फिर जिस गाड़ी से चलते हैं, उसके टायर की रबड़ या जो लोशन चेहरे और शरीर पर लगाते हैं, उसमें मिला केमिकल कहां से आता है. ये सब पेट्रो केमिकल उत्पाद हैं और मिडिल ईस्ट की जंग से  सिर्फ गैस और तेल ही नहीं, पेट्रोलियम से बनने वाले इन छोटे-छोटे प्रोडक्ट्स पर भी संकट गहरा रहा है।   हमारी सुबह की शुरुआत ही पेट्रोकेमिकल से बने टूथपेस्ट ट्यूब से होती है. इसके बाद बाथरूम में मौजूद शैम्पू , शैम्पू की बोतलें, साबुन, लोशन, बॉडी वॉश और सिंथेटिक कपड़ों की बारी आती है. पेट्रोलियम का मतलब सिर्फ पेट्रोल, डीजल और गैस नहीं होता है. इससे और भी कई तरह की चीजें निकलती है, जो हमारी कई छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करती है।  1. प्लास्टिक और पैकेजिंग मैटेरियल पानी की बोतलें फूड कंटेनर, टिफिन बॉक्स पॉलिथीन बैग, रैपर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामान की पैकेजिंग नोट – इन सबमें ज्यादातर प्लास्टिक, पॉलिथीन और पॉलीप्रोपेलीन पेट्रोकेमिकल से बनते हैं.  पेट्रो केमिकल्स​ 2. कपड़े और टेक्सटाइल पॉलिएस्टर  नायलॉन  स्पोर्ट्स वियर क्लोथिंग मैटेरियल कारपेट और परदे नोट- ये सभी  सिंथेटिक कपड़े हैं और  पूरी तरह पेट्रोकेमिकल बेस्ड हैं. 3. पर्सनल केयर और कॉस्मेटिक्स साबुन, शैम्पू क्रीम, लोशन टूथपेस्ट परफ्यूम नोट – इन प्रोडक्ट्स को बनाने में ग्लीशरीन और दूसरे पेट्रो केमिकल्स यूज होते हैं. पेट्रो केमिकल्स​ 4. घरेलू सामान डिटर्जेंट और क्लीनिंग लिक्विड प्लास्टिक फर्नीचर किचन के कुछ नॉन स्टीक बर्तन  फोम, मैट्रेस और कुशन 5. ऑटोमोबाइल और ट्रांसपोर्ट टायर (Synthetic rubber) कार के डैशबोर्ड, सीट कवर लुब्रिकेंट (Engine oil) पेंट और कोटिंग नोट – इन उत्पादों का निर्माण विशुद्ध पेट्रो केमिकल्स से होता है. 6. इलेक्ट्रॉनिक्स मोबाइल फोन के पार्ट्स लैपटॉप/टीवी का बॉडी वायर और केबल (इंसुलेशन) 7. दवाइयां और मेडिकल प्रोडक्ट कई दवाओं के केमिकल कंपोनेंट सिरिंज, बैग मेडिकल प्लास्टिक उपकरण 8. कंस्ट्रक्शन मैटेलियल PVC पाइप पेंट और वार्निश इन्सुलेशन मटेरियल फ्लोरिंग विनायल 9. खिलौने और स्पोर्ट्स मैटेलियल प्लास्टिक टॉय फुटबॉल, हेलमेट जिम इक्विपमेंट 10. फूड पैकेजिंग मैटेलियल फूड पैकेजिंग फिल्म बोतलें और कैन फूड स्टोरेज कंटेनर पेट्रो केमिकल्स​ कच्चे तेल और गैस को रिफाइन करने के दौरान अलग-अलग स्टेज पर उससे अलग-अलग कैमिकल निकलते हैं और उनका इस्तेमाल कई तरह की जरूरी चीजों को बनाने में होता है. कच्चे तेल और गैस का शोधन या डिस्टिलेशन के अलग-अलग चरणों में होता है और हर स्टेज में अलग-अलग पेट्रो केमिकल्स या हाईड्रोकार्बन प्राप्त होते हैं.  पहले चरण में ही इससे एथेन, मीथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन जैसे गैस निकलते हैं. इनमें से प्रोपेन और ब्यूटेन से एलपीजी, पीएनजी और अन्य गैस बनाए जाते हैं,जिनका इस्तेमाल किचन से लेकर ऑटोमोबाइल तक में होता है.  इसके साथ ही ब्यूटाडाइन, बेंजीन, टोल्यून, मेथनॉल, ग्लिसरीन जैसे तत्व निकलते हैं, जिससे प्लास्टिक, पेंट, रबर, फॉर्मास्यूटिकल उत्पाद, कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स, लोशन, क्रीम जैसी चीजें बनती हैं. आगे के स्टेज में एथिलीन, प्रोपिलीन, ब्यूटिलीन जैसे पदार्थ निकलते हैं, जिनसे प्लास्टिक, पॉलिथीन, रबड़ और ऐसे ही अन्य मैटेरियल बनाए जाते हैं.  शोधन प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है – एक्रिलोनाइट्राइल और आइसोब्यूटिलीन जैसे पेट्रो केमिकल प्राप्त होते हैं, जिससे फोम, रेजिन, पेंट और कोटिंग्स जैसे मेटेलियल बनते हैं. इन हाईड्रोकार्बन का इस्तेमाल पैकेजिंग मैटेरियल, चिपकने वाले पदार्थ, विस्फोटक, गोंद, औद्योगिक रसायन, सिंथेटिक रबर, टायरों, साबुन और डिटर्जेंट, रंग, दवाई, क्लीनिंग मैटेरियल और कई तरह के मेडिकल उपकरणों बनाने में होता है. पेट्रोलियम को रिफाइन करने के दौरान ही अमोनिया और यूरिया जैसे उर्वरक बनाने वाले तत्व भी निकलते हैं. 

ईरान के हफ्ते भर के संकट के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

तेहरान. ईरान और अमेरिका-इजरायल के युद्ध को आज एक सप्ताह पूरा हो रहा है। एक सप्ताह में ही इस युद्ध का असर पूरी दुनिया में पड़ा है। एक तरफ यूरोप से लेकर एशिया तक की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं तो दूसरी ओर खाड़ी देशों में हमले भी खूब हुए हैं जिनमें जान और माल दोनों का नुकसान हुआ है। खाड़ी देशों में फंसे पर्यटक अब भी संकट का सामना कर रहे हैं। ईरान ने अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले किए थे जिनमें ईरान के सर्वोच्चा नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे। संघर्ष बढ़ता ही जा रहा इस सैन्य हमले के बाद ईरान ने मुख्य रूप से इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन तथा सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमले किए। पिछले तीन दिनों में दोनों पक्षों की ओर से हमलों और जवाबी हमलों के बीच यह संघर्ष काफी बढ़ गया है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल युद्ध के सातवें दिन शुक्रवार को भी इजरायल के लड़ाकू विमान मंडराते रहे। समंदर में हजारों तेल के जहाज फंसे हुए हैं। इनमें 36 जहाज भारत के भी हैं। ऐसे में तेल की आपूर्ति में बड़ी बाधा उत्पन्न हुई है। कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी कि यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है और खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने पर तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। शुक्रवार को अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत दो वर्षों में पहली बार 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई। तेहरान में तेज हो गए हमले ईरान की राजधानी तेहरान में शनिवार तड़के कई विस्फोट हुए, जिनसे आसमान में काले धुएं के गुबार उठते दिखाई दिए। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर मिसाइलें दागीं। इस बीच अमेरिका ने चेतावनी दी कि जल्द ही बड़े पैमाने पर बमबारी अभियान शुरू किया जा सकता है, जिसे अधिकारी सप्ताह भर से जारी संघर्ष का अब तक का सबसे तीव्र हमला बता रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप सख्त क्षेत्र में लड़ाई खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इज़राइल को 15.1 करोड़ डॉलर के नए हथियारों की बिक्री को मंजूरी दे दी। ट्रंप ने कहा कि ईरान के ''बिना शर्त आत्मसमर्पण'' करने तक उससे कोई बातचीत नहीं होगी। वहीं, संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत ने कहा कि देश अपनी रक्षा के लिए ''हर जरूरी कदम'' उठाएगा। एक वीडियो फुटेज में पश्चिमी तेहरान के ऊपर विस्फोटों से धुएं के गुबार दिखाई दिए, जबकि इजराइल ने कहा कि उसने व्यापक हमलों का नया दौर शुरू किया है। इजराइली सेना ने कहा कि वह ईरान से दागी गई नयी मिसाइलों को रोकने की कोशिश कर रही है। ईरान के हमलों के बाद बहरीन में शनिवार सुबह सायरन बजे। सऊदी अरब ने कहा कि उसने अपने विशाल शायबह तेल क्षेत्र की ओर बढ़ रहे ड्रोन नष्ट कर दिए और प्रिंस सुल्तान एयर बेस की ओर दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल को मार गिराया। इस बीच अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के अनुसार, रूस ने ईरान को ऐसी जानकारी दी है जिससे वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी युद्धपोतों, विमानों और अन्य सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बात कर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर संवेदना जताई। ईरान में 1200 से ज्यादा मौतें इस संघर्ष में अब तक ईरान में कम से कम 1,230 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि लेबनान में 200 से अधिक और इजराइल में करीब 12 लोग मारे गए हैं। छह अमेरिकी सैनिक भी इस संघर्ष में जान गंवा चुके हैं। ईरान के राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ''कुछ देशों'' ने मध्यस्थता के प्रयास शुरू कर दिए हैं, लेकिन उन्होंने इसके बारे में विस्तार से नहीं बताया।

भारत सरकार तय कर रही है क्रूड ऑयल के इस्तेमाल की प्राथमिकताएं, ईरान जंग का असर पड़ने वाला है

 नई दिल्ली ईरान जंग के मद्देनजर भारत सरकार कच्चे तेल के इस्तेमाल की प्रायरिटी फिर से तय कर रही है. कच्चा तेल कहां और कैसे इस्तेमाल हो इसके लिए सरकार योजना बना रही है. हालांकि सरकार ने कहा है कि भारत के पास इस समय होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे क्रूड से ज़्यादा क्रूड है. LPG की कोई कमी नहीं है. सरकार ने रिफाइनरियों को LPG प्रोडक्शन बढ़ाने को कहा है। वेस्ट एशिया से सप्लाई में रुकावट के बाद भारत ने ऑयल रिफाइनरीज को लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG)  प्रोडक्शन ज़्यादा से ज़्यादा करने का निर्देश दिया है. सरकार ने घरेलू प्रोड्यूसर को उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन रिसोर्स का इस्तेमाल करके LPG आउटपुट को प्रायोरिटी देने का आदेश दिया है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG इंपोर्टर है, और पिछले साल इसने 33.15 मिलियन मीट्रिक टन फ्यूल की खपत क. इंपोर्ट डिमांड का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है, जिसमें वेस्ट एशिया 85 से 90 परसेंट सप्लाई करता है, जिससे भारत रीजनल रुकावटों के प्रति कमज़ोर हो जाता है। सरकार ने कहा है कि भारत में LPG की किल्लत नहीं होने दी जाएगी. भारत खाड़ी देशों के अलावा दूसरे क्षेत्रों से LNG खरीदना शुरू कर दिया है. इसके अलावा भारत कतर सरकार से भी बात कर रहा है ताकि LNG की सप्लाई फिर से शुरू की जा सके. बता दें कि कतर भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर है. कतर के गैस प्लांट पर ईरानी हमले के बाद कतर ने गैस प्रोडक्शन बंद कर दिया है और भारत को एक्सपोर्ट रोक दिया है।  जनवरी से US से LPG भारत आनी शुरू हो गई है. नवंबर 2025 में भारतीय सरकारी तेल कंपनियों ने 2026 के लिए US गल्फ कोस्ट से लगभग 2.2 MTPA LPG इंपोर्ट करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है।  रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सभी ऑयल रिफाइनर को निर्देश दिया गया है कि वे अपने पास मौजूद प्रोपेन और ब्यूटेन का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें और यह पक्का करें कि LPG प्रोडक्शन के लिए उनका इस्तेमाल हो. प्रोड्यूसर को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे सरकारी रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन को घरों में बांटने के लिए LPG, प्रोपेन और ब्यूटेन उपलब्ध कराएं. भारत में लगभग 332 मिलियन एक्टिव LPG कंज्यूमर हैं। LPG के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन का ज़रूरी इस्तेमाल करने से एल्काइलेट्स का प्रोडक्शन कम हो जाएगा, जो गैसोलीन ब्लेंडिंग का एक हिस्सा है। रिफाइनर को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन को पेट्रोकेमिकल प्रोडक्शन के लिए इस्तेमाल न करें, जिससे पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों के लिए फीडस्टॉक कम हो जाएगा।

तेल की कीमत में उछाल, मिडिल ईस्ट तनाव के बीच कच्चा तेल 83 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर

नई दिल्ली   मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच गुरुवार को कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई। सप्लाई पर असर पड़ने के कारण कीमतों में उछाल आया है, क्योंकि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) को बंद कर दिया है। सुबह के शुरुआती कारोबार में इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर बेंचमार्क क्रूड का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.43 प्रतिशत बढ़कर 83.26 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। वहीं न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (एनवाईमेक्स) पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.63 प्रतिशत बढ़कर 76.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक कंटेनर जहाज पर प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिससे जहाज को नुकसान पहुंचा है। तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी भारत के आयात बिल पर असर डाल सकती है। यदि कच्चे तेल की कीमत पूरे साल के लिए प्रति बैरल 1 डॉलर बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल लगभग 16,000 करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है। इस बीच, सरकारी सूत्रों के मुताबिक, कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी को लेकर भारत फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में है। देश के पास लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल का भंडार और 25 दिनों के पेट्रोलियम उत्पादों का स्टॉक मौजूद है, जिसमें वह तेल भी शामिल है जो जहाजों के जरिए भारत के बंदरगाहों की ओर आ रहा है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, जिसमें से करीब 50 प्रतिशत तेल मिडिल ईस्ट के देशों से आता है, जो मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। ईरान युद्ध के बाद इस मार्ग से सप्लाई प्रभावित हुई है। हालांकि, भारत ने अफ्रीका, रूस और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता लाई है और रणनीतिक भंडार बनाकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने खाड़ी देशों के अलावा अन्य देशों से भी तेल आयात बढ़ाया है, जिसके चलते अब बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते नहीं आती। भारत ने 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) के दौरान 206.3 मिलियन टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च किए गए।  

मिडल ईस्ट युद्ध से तेल संकट की आशंका, फिर भी भारत पर नहीं पड़ रहा कोई असर

नई दिल्‍ली मिडिल ईस्‍ट में जंग छिड़ी हुई है. ईरान लगातार दुबई, सऊदी और अन्‍य देशों पर मिसाइलें दाग रहा है. वहीं अमेरिका-इजरायल ईरान पर लगातार हमले कर रहे हैं. कुछ अन्‍य देशों ने भी ईरान पर हमले की चेतावनी दी है. ऐसे में इस जंग के शांत होने के आसार फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं. ऐसे में सबसे बड़ी चिंता कच्‍चे तेल को लेकर है, जिसके दाम में रिकॉर्ड तेजी आने की संभावना जताई जा रही है |  सोमवार को कच्‍चे तेल की कीमतों में 13 फीसदी तक की उछाल देखी गई और आगे 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है. अगर ऐसा होता है तो दुनियाभर में महंगाई चरम पर आ सकती है, जो ग्‍लोबल इकोनॉमी के लिए भी खतरा है |  तेल की कीमतों में इतनी बड़ी तेजी आने की वजह ईरान के कंट्रोल में 'स्‍ट्रेट ऑफ होमुर्ज' गलियारा है, जहां से दुनियाभर के लिए 40 फीसदी तेल आयात होता है. इसी रास्‍ते 20 फीसदी अन्‍य गैस या एनर्जी का भी आयात किया जाता है. अकेले भारत 50 फीसदी कच्‍चे तेल का आयात करता है. इस एरिए के चोक होने की खबर है, जिसके बाद तेल की कीमतों में इजाफा हुआ है |  भारत पर नहीं कच्‍चे तेल का संकट हालांकि भारत को इससे डरने की जरूरत नहीं, क्‍योंकि भारत के पास रिजर्व में बहुत ज्‍यादा कच्‍चा तेल पड़ा हुआ है, जिससे भारत की जरूरतें बिना रुकावट पूरी हो सकती हैं. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि भारत के पास फिलहाल अल्पकालिक व्यवधानों से निपटने के लिए पर्याप्त बफर भंडार मौजूद हैं |  45 दिनों का भंडार  रणनीतिक भंडार LPG और एलएनजी की मांग को लगभग 15 दिनों तक पूरा कर सकते हैं, जबकि कच्चे तेल के भंडार आपूर्ति में व्यवधान की स्थिति में 45 दिनों तक चलने का अनुमान है. भारत के लिए यह  तैयारी ऐसे समय में की गई है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ रही हैं |  बढ़ते तनाव के बावजूद, अधिकारियों का कहना है कि जलडमरूमध्य में लंबे समय तक व्यवधान या बंद होने की स्थिति में भी भारत घरेलू मांग को पूरा करने के लिए वैकल्पिक बाजारों से ऊर्जा प्राप्त करने की अपनी क्षमता को बरकरार रखेगा. हालांकि निकट भविष्य में भौतिक आपूर्ति में व्यवधान की संभावना कम ही दिखती है. अभी कच्‍चे तेल के दाम इंटरनेशनल मार्केट में 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है |  कितना खास है ये मार्ग?  गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक है, जिससे वैश्विक कच्‍चे तेल का लगभग  40% और एलएनजी शिपमेंट का लगभग 20 फीसदी हिस्सा गुजरता है. इसलिए, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की दीर्घकालिक बाधा वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है |  यूरोपियन गैस की कीमतों में 22% की तेजी यूरोपियन नैचुरल गैस की कीमतों में लगभग 22% की तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. मिडिल ईस्ट में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण, खासकर ईरान पर हाल ही में US और इजराइली मिलिट्री हमलों और होर्मुज़ स्ट्रेट के ज़रिए सप्लाई में रुकावट के डर के बाद, एनर्जी कीमतों में उछाल आई है |  2022 के गैस मार्केट में उथल-पुथल के बाद यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी है. डर है कि इस युद्ध से LNG (लिक्विफाइड नैचुरल गैस) और दूसरे एनर्जी शिपमेंट का फ्लो रुक सकता है या झगड़े बढ़ने पर उनका रूट बदला जा सकता है | 

ईरान संकट: 100 डॉलर के पार कच्चा तेल, पेट्रोल-डीजल पर क्या होगा असर?

नई दिल्ली क्या पश्चिम एशिया में छिड़ा नया सैन्य टकराव भारतीयों की जेब पर भारी पड़ने वाला है? ईरान पर हुए ताज़ा हमले के बाद होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव चरम पर है और वैश्विक तेल बाज़ार में घबराहट साफ दिख रही है. ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुका है और आशंका है कि हालात बिगड़े तो कीमतें 100 डॉलर के पार जा सकती हैं |  तेल के लिए 85–90 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर भारत के लोगों के लिए यह बड़ा प्रश्न है कि क्या यहां पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ सकते हैं? आशंका तो यह भी है कि अगर हालात जल्दी ही ठीक नहीं हुए, तो ऑयल कंपनियां भाव में 12 से 14 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं |  एक अच्छी बात यह भी है कि भारत ने अपने तेल आयात के दूसरे विकल्पों को फिर से टटोलना शुरू कर दिया है, ताकि आम लोगों पर किसी तरह का संकट न आए. भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम रिवर्ज का बड़ा भंडार यह आश्वासन देता है कि संभवत: देश में पेट्रोल और डीजल के दाम न बढ़ें |  केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया कि भारत का पेट्रोलियम रिजर्व 74 दिनों की मांग पूरी कर सकता है. इसमें ISPRL की SPR कैविटी, रिफाइनरी स्टॉक और फ्लोटिंग स्टोरेज शामिल हैं. ISPRL और PIB के डेटा के अनुसार, भारत के पास 5.33 MMT क्रूड ऑयल तीन भूमिगत भंडारों में है. विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पदुर. SPR अकेले 9-10 दिन का स्टॉक है, लेकिन सभी तेल कंपनियों का कमर्शियल स्टॉक मिलाकर कुल 70-75 दिन का बफर बनता है. तो कुल मिलाकर, शायद ऐसा संकट नहीं आएगा कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम अनियंत्रित हो जाएं. फिर भी, पेट्रोल के दाम कैसे बढ़ते हैं, इस बारे में जान लेना आवश्यक है |  कंपनियों के हाथ में है चाबी भारत में पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकार तय करती थी, लेकिन अब यह पूरी तरह से तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के हाथ में है. जून 2010 में सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को और अक्टूबर 2014 में डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त (De-regulate) कर दिया था. इसका मतलब कि सरकार का तेल की कीमतों पर कंट्रोल नहीं है. अब तेल की कीमत हर सुबह 6 बजे बदलती है. 16 जून 2017 से भारत में डायनेमिक फ्यूल प्राइसिंग (Dynamic Fuel Pricing) लागू है. इसके तहत अब कीमतें 15 दिन में नहीं, बल्कि पिछले 15 दिनों के अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के औसत दाम और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति के आधार पर हर रोज सुबह 6 बजे तय की जाती हैं |  1 डॉलर बढ़ने पर आपकी जेब से कितना असर?     अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बैरल में खरीदा जाता है, जबकि भारत में पेट्रोल-डीज़ल लीटर में बिकते हैं.     एक बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है.     जब कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो इसे 159 लीटर में बांटने पर प्रति लीटर करीब 0.006 डॉलर की बढ़ोतरी होती है.     भारत तेल डॉलर में खरीदता है. अगर डॉलर का भाव 91 रुपये है, तो प्रति लीटर यह बढ़ोतरी लगभग 57 पैसे बैठती है. यानी बाजार की आम धारणा के अनुसार, कच्चे तेल में 1 डॉलर की तेजी से खुदरा कीमतों में करीब 50 से 60 पैसे प्रति लीटर का इजाफा होता है. लेकिन संकट के समय अगर रुपया कमजोर होकर 92 या 93 रुपये तक पहुंच जाए, तो यह असर 65 पैसे या उससे अधिक भी हो सकता है. कच्चे तेल की तेजी और रुपये की गिरावट मिलकर ग्राहकों को दोहरा झटका देती है |  100 डॉलर पर कितना बढ़ेगा बोझ?     90 डॉलर प्रति बैरल: रिटेल कीमतों में करीब 5 से 6 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी संभव है.     100 डॉलर प्रति बैरल: यह बढ़ोतरी 12 से 14 रुपये प्रति लीटर तक जा सकती है.     110 डॉलर प्रति बैरल: पेट्रोल-डीज़ल 18 से 21 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो सकते हैं. ये अनुमान केवल मूल गणित पर आधारित हैं. वास्तविक कीमतों में टैक्स जुड़ने के बाद असर और बढ़ जाता है. पंप पर कीमत कैसे बनती है? जब आप पेट्रोल पंप पर भुगतान करते हैं, तो आप सिर्फ तेल का पैसा नहीं दे रहे होते. भारत में पेट्रोल-डीजल की कुल कीमत का लगभग 40% से 50% हिस्सा सिर्फ टैक्स होता है|      बेस प्राइस: सबसे पहले कच्चे तेल की कीमत में समुद्री ढुलाई और इंश्योरेंस जैसी लागत जुड़ती है (रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस).     केंद्र का टैक्स: इसके ऊपर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) जुड़ती है.     डीलर का मुनाफा: फिर पेट्रोल पंप मालिक का कमीशन शामिल होता है.     राज्य का टैक्स: अंत में राज्य सरकारें अपना टैक्स लगाती हैं. चूंकि यह प्रतिशत में होता है, इसलिए जैसे ही कच्चे तेल का बेस प्राइस बढ़ता है, टैक्स की राशि भी अपने आप बढ़ जाती है. यही कारण है कि हर राज्य में कीमतें अलग-अलग होती हैं. चूंकि पेट्रोल-डीजल फिलहाल GST के दायरे से बाहर हैं, इसलिए इन पर टैक्स का बोझ काफी ज्यादा रहता है. भारत का रिजर्व आएगा काम? स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है. भारत की प्रमुख तेल विपणन कंपनियां कई बार शार्ट टर्म का झटका खुद सहकर अचानक कीमत बढ़ोतरी को टालने की कोशिश करती हैं. इसके अलावा केंद्र सरकार चाहे तो उत्पाद शुल्क में कटौती कर सकती है, जैसा 2022 में किया गया था. भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) भी हैं, जिनका उपयोग आपूर्ति संतुलित रखने के लिए किया जा सकता है |