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भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए अहम खबर, H-1B वीजा की $100,000 फीस 2027 तक जारी

वॉशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B गैर-अप्रवासी वीजा के लिए 100,000 डॉलर का शुल्क लगाने वाले कार्यकारी आदेश को एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। यह जानकारी व्हाइट हाउस ने दी है। H-1B वीजा अमेरिका का एक अस्थायी गैर अप्रवासी वीजा है। इस वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां आईटी, इंजीनियरिंग और विज्ञान जैसे विशेष क्षेत्रों में विदेशी कुशल पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। हर साल लॉटरी के जरिए 85,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। ट्रंप ने H-1B वीजा के शुल्क की अवधि बढ़ाई ट्रंप H-1B वीजा के कड़े आलोचकों में गिने जाते हैं। उन्होंने शुरू से ही इस वीजा प्रोग्राम की आलोचना की है। पहले H-1B वीजा पर फीस को 100000 डॉलर तक बढ़ा दिया था। शुरुआत में यह आदेश सिर्फ एक साल के लिए था, जिसे अब एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया है। अब 21 सितंबर 2027 तक H-1B वीजा के लिए 100000 डॉलर की फीस भरनी होगी। H-1B वीजा पर अमेरिकी अदालतों में सुनवाई हालांकि, ट्रंप के H-1B वीजा शुल्क को अदालतों में कानूनी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा है। बोस्टन स्थित एक अपीलीय अदालत जून में एक संघीय न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसले की समीक्षा कर रही है , जिसमें ट्रंप प्रशासन के लगाए गए उच्च शुल्क को अवैध करार दिया गया था और सरकार को इसे वसूलने से रोक दिया गया था। एक अन्य अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या न्यायाधीश ने अमेरिकी व्यापार संघ के सबसे बड़े लॉबिंग समूह, यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा शुल्क को चुनौती देने वाली याचिका को उचित रूप से खारिज कर दिया था। ट्रंप ने H-1B वीजा का शुल्क कब बढ़ाया था? H-1B वीजा शुल्क वृद्धि के लिए ट्रंप का प्रारंभिक आदेश पहली बार सितंबर 2025 में जारी किया गया था। वह आदेश इस महीने समाप्त होने वाला था। यह आदेश उन विदेशी नागरिकों को दिए गए वीजा पर लागू नहीं होता था जो पहले से ही छात्र वीजा पर संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं, जो नए एच-1बी प्राप्तकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा हैं, या मौजूदा वीजा के नवीनीकरण पर भी लागू नहीं होता था। H-1B वीजा का इस्तेमाल किस लिए होता है? ट्रंप की आलोचना के बावजूद कि कुछ कंपनियां अमेरिकियों के बजाय कम वेतन वाले विदेशी श्रमिकों को काम पर रखने के लिए H-1B वीजा का उपयोग करती हैं। व्यापार समूह और कंपनियों का कहना है कि वे H-1B वीजा के जरिए उच्च कुशल पेशेवरों की भर्ती इसलिए करती हैं, ताकि कुछ उद्योगों में योग्य अमेरिकी श्रमिकों की कमी को दूर किया जा सके। कांग्रेस द्वारा 1990 में स्थापित किया गया H-1B वीजा, भारत और चीन से भर्ती करने की इच्छुक प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

टाटा ट्रस्ट्स बनाम टाटा संस विवाद पहुंच सकता है कोर्ट, अभिषेक मनु सिंघवी को मिली बड़ी जिम्मेदारी

नई दिल्ली टाटा ग्रुप के अंदर चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब कोर्ट तक पहुंच सकती है। टाटा ट्रस्ट्स ने सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघिवी को कानूनी सलाह और प्रतिनिधित्व के लिए नियुक्त किया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को फिर से चेयरमैन नियुक्त करने पर सहमति दे दी। जिसके बाद टाटा ट्रस्ट्स के मुखिया नोएल टाटा ने बयान जारी कर इस नियुक्ति को नियमों के खिलाफ बताया था। सिंघवी ने क्या कुछ कहा? इस नियुक्ति के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उन्हें बहुत दुख और अफसोस के साथ इस पूरे मामले का हिस्सा बनना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि वे रतन टाटा के साथ काम कर चुके हैं। साथ इस मामले के दोनों पक्षों को भी अच्छे से जानते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सिंघवी लिखते हैं, 'शेयरहोल्डर के मालिकाना हक को बेकार कर देने से सैकड़ों भारतीय कंपनियों के सामने संकट खड़ा हो जाएगा। इससे उनके कॉरपोरेट गवर्नेंस का बुरा नतीजा निकलेगा।' उन्होंने टाटा-मिस्त्री विवाद को भी जिक्र अपने पोस्ट में किया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद पर टाटा ट्रस्ट्स को स्पष्ट तौर पर प्राथमिकता दी गई थी। सिंघवी लिखते हैं कि उस फैसले को भुला दिया गया है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से आपसी सहयोग और सौहार्द की कमी की वजह से इस पूरे मामले में अब समाधान का सिर्फ कानूनी तरीका ही बचा है। एन चंद्रेशखरन की नियुक्ति के बाद खड़ा हुआ विवाद टाटा संस के मौजूदा चेयरमैन एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल अगले साल फरवरी में समाप्त हो रहा है। उन्होंने फिर से खुद को ना चुनने की अपील की थी। लेकिन 17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड मीटिंग में फिर से उन्हें चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया। इस नियुक्ति का टाटा ट्र्स्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने विरोध किया। बता दें, टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की कुल हिस्सेदारी 66 प्रतिशत की है। इन सबके बीच रिजर्व बैंक ने टाटा संस के एनबीएफसी ना मानने की अपील ठुकरा दी थी। जिसके बाद अब टाटा संस की लिस्टिंग मौजूदा नियमों के अनुसार अनिवार्य हो गई है। वहीं, टाटा ट्रस्ट्स ऐसा नहीं चाहता है। वह लिस्टिंग को लेकर सहमत नहीं है।  

बिहार बना मशरूम उत्पादन का देश में नंबर-1 राज्य, गरीबों और महिलाओं के लिए बढ़ी कमाई की राह

पटना  बिहार इन दोनों के उत्पादन में देश में अग्रणी है, लेकिन मखाना मुखर है और मशरूम मौन। इसीलिए मशरूम की बातें तनिक कम सुनी जा रहीं। हालांकि, इसके भरोसे निम्न आय वर्ग वाले लोगों की कमाई दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ताजा रिपोर्ट बता रही कि वर्ष 2013-14 में बिहार में मात्र 0.06 हजार टन मशरूम होता था, जो बढ़कर अब 42.19 हजार टन हो चुका है। 12.84% की दर से बढ़ेगा मशरूम का बाजार इसके उत्पादन में अभी आगे भी जोरदार वृद्धि की संभावना है, जबकि मखाना उत्पादन के उच्चतम स्तर को छूने लगा है। हालांकि, 2030 तक मखाने का रकबा 70000 हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है। कृषि-अर्थव्यवस्था में मखाना वस्तुत: 'मैक्रो-इकोनमिक सुपरफूड' है, जो वैश्विक स्तर पर बिहार की ब्रांडिंग कर रहा और विदेशी मुद्रा जुटा रहा है। इसके विपरीत, मशरूम एक 'माइक्रो-इकोनमिक गेमचेंजर' है, जो गरीबी उन्मूलन, पोषण सुरक्षा और महिला सशक्तीकरण का प्रभावी और कम लागत वाला जरिया सिद्ध हो रहा है। मशरूम उत्‍पादन में 2022 में अग्रणी बना था ब‍िहार इन दोनों उत्पादों के साथ एक संयोग वर्ष 2022 से जुड़ा है। उस वर्ष दूसरे राज्यों को पीछे छोड़ते हुए बिहार मशरूम के उत्पादन में अग्रणी राज्य बना। तब से वह पहले क्रमांक पर कायम है। मिथिला मखाने को भौगोलिक प्रतिदर्श-चिह्न (जीआइ टैग) भी उसी वर्ष मिला। उसके बाद निर्यात की संभावना में आशातीत वृद्धि हुई। हालांकि, सर्वाधिक खपत आज भी घरेलू स्तर पर ही है। मखाना का उत्पादन मुख्य रूप से तालाबों और जलजमाव वाले क्षेत्रों तक सीमित है। इसके उत्पादन में अत्यधिक श्रम और लागत की आवश्यकता होती है और इसमेंं समुदाय विशेष के लोग दक्ष हैं। मशरूम के लिए उपजाऊ भूमि या विशेष मौसम की आवश्यकता नहीं होती। बेहद कम लागत (भूसा, कंपोस्ट और स्पान के जरिये) से इसे झोपड़ियों या बंद कमरों में रैक बनाकर उगाया जाता है। बहरहाल यह राज्य में एक नई ''इनडोर कृषि क्रांति'' का नेतृत्व कर रहा है। यदि प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केट लिंकेज बेहतर हो, तो बिहार की अर्थव्यवस्था मेंं इसका महत्वपूर्ण योगदान होगा। उत्पादन और निर्यात : विश्व में 80% मखाना भारत में होता है और भारत का 80% बिहार में। मखाने के कुल निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी भी लगभग इतनी ही है। मशरूम के वैश्विक उत्पादन में भारत चौथे स्थान पर है। हालांकि, निर्यात अभी मामूली है, लेकिन कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी अभी 12.02% है, जो 2020 में 10.82% हुआ करती थी। बाजार और अनुमान : मार्केट एंड रिसर्च के अनुसार, भारत में मखाना का बाजार 2025 में 92900 करोड़ रुपये था। 8.85% की चक्रवृद्धि दर से बढ़कर 2034 तक यह 19950 करोड़ रुपये का होगा। मशरूम का बाजार 2024 में लगभग 11992 करोड़ रुपये का था। 2030 तक यह बढ़कर 24753 करोड़ रुपये हो जाएगा। यह 12.84% की वृद्धि होगी।  

मेडिकल उपकरणों की कीमतों पर लगेगी लगाम? केंद्र ने अस्पतालों और मेडिकल सेक्टर से शुरू की बातचीत

नई दिल्ली  अस्पतालों में मेडिकल उपकरणों की मममानी कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। सरकार ने मेडिकल उपकरणों की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के मुद्दे पर मेडिकल सेक्टर और प्राइवेट अस्पतालों के साथ बातचीत शुरू कर दी है। गौरतलब है कि हाल ही में महाराष्ट्र ड्रग एंड फूड एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की जांच में सामने आया कि प्राइवेट अस्पताल लोगों से मेडिकल उपकरणों की मनमानी कीमत वसूलते हैं। एफडीए आयुक्त ने अस्पताल के मेडिकल उपकरणों की कीमतों और एमआरपी के बीच भारी अंतर को लेकर सवाल उठाया था। इससे पहले अगस्त में, स्वास्थ्य संबंधी संसदीय समिति ने भी प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए ली जानी वाली की रकम की सीमा तय करने की सिफारिश की थी। सूत्रों ने बताया, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने फार्मास्यूटिकल्स विभाग के सचिव के साथ बैठक के बाद निर्देश दिया है कि मेडिकल सेक्टर और अस्पतालों के साथ बैठकें और संवाद किया जाए। हाल ही में एएनआई को दिए साक्षात्कार में दवाओं की कीमतों के नियमन के बारे में मुल्तानी फार्मास्युटिकल्स के सीईओ डॉ. विवेक श्रीवास्तव ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा सभी के लिए है। केंद्र सरकार ने ड्रग प्राइसेस कंट्रोल ऑर्डर के जरिये इस पर काम करना शुरू कर दिया है ताकि दवाओं को बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा सके। एम्स कल्याणी के अध्यक्ष डॉ. वाईके. गुप्ता ने कहा, नेशनल लिस्ट आफ एसेंशियल मेडिसिंस (एलएलईएम) में शामिल दवाएं शेड्यूल्ड दवाओं की श्रेणी में आ जाती हैं और उनकी कीमतें नियंत्रित की जाती हैं। हालांकि, कुछ नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं भी होती हैं जिनकी कीमतें फार्मास्युटिकल कंपनियां अपनी सुविधा के अनुसार तय कर सकती हैं। इसी तरह, कई मेडिकल इस्तेमाल की वस्तुओं और उपकरणों, जैसे सिरिंज और ग्लव्स, की कीमतों पर भी कोई असरदार नियंत्रण नहीं है। नतीजतन, उत्पादन लागत, अस्पताल की लागत और मरीज से ली जाने वाली कीमत में बहुत ज़्यादा अंतर होता है। उन्होंने कहा, हमारा मकसद गुणवत्ता से समझौता किए बिना मरीजों को शोषण से बचाना है। अस्पतालों का वाजिब मुनाफा कमाना तो ठीक है, लेकिन बेवजह ज़्यादा मुनाफा कमाना गलत है। मरीज से जो भी कीमत मांगी जाती है, उसे चुकाने के लिए मजबूर होते हैं। पता चला है कि एक जैसी वस्तुओं की कीमत में बाज़ार की एमआरपी के मुकाबले 10 से 20 गुना तक का फर्क होता है। ऐसी हरकतों पर असरदार तरीके से रोक लगनी चाहिए।  

होर्मुज संकट ने बिगाड़ा ट्रंप का तेल गेम, अमेरिका में डीजल 6.49 डॉलर प्रति गैलन पहुंचा

नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बीते दिनों एक बयान देते हुए कहा था कि अमेरिका वेनेजुएला की तरह ईरान में बने रहने और तेल का खजाना अपने पास रखने का फैसला कर सकता है. लेकिन ट्रंप का ये तेल का खेल उनके लिए बड़ी टेंशन का सबब बनता जा रहा है. दरअसल, ईरान युद्ध से बिगड़े हालातों के बीच अमेरिका में डीजल की कीमतें अब नए रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गई हैं. बीते हफ्तेभर में ही US Diesel Price में बड़ा उछाल आया है, जो देश में महंगाई का जोखिम बढ़ा रहा है. ईरान-होर्मुज ने बिगाड़ा ट्रंप का खेल ईरान से जंग और होर्मुज संकट ने मिलकर अमेरिका की ही तेल निकाल दिया है. अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के अनुसार, 19 सितंबर को डीजल की राष्ट्रीय औसत कीमत 6.4866 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई, जो पिछले रिकॉर्ड को भी पार कर गई. एक सप्ताह पहले यह कीमत 6.16 डॉलर थी. इसका मतलब है कि सिर्फ एक सप्ताह में डीजल की कीमत में लगभग 33 सेंट या 5.3% की बढ़ोतरी (US Diesel Price Hike) हुई है. सालभर में 75% महंगा हुआ डीजल AAA के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि डीजल के दाम में हालिया बढ़ोतरी के बाद अब Diesel Price एक साल पहले की तुलना में लगभग 75% अधिक महंगा हो चुका है, जब राष्ट्रीय औसत कीमत 3.71 डॉलर थी. अमेरिका और इजरायल ने पहली बार ईरान पर 28 फरवरी को हमला किया था और इसके बाद जैसे-जैसे युद्ध बढ़ा डीजल का दाम ट्रंप की टेंशन भी बढ़ाता चला गया. AAA का डेटा देखें, तो US-Iran War शुरू होने से ऐन पहले से पहले यानी 27 फरवरी को डीजल 3.75 डॉलर प्रति गैलन था, जबकि 19 सितंबर के रिकॉर्ड 6.49 डॉलर पर पहुंच गया. इसका मतलब है कि अमेरिका में डीजल का एक आम ग्राहक अब होर्मुज संकट से ठीक पहले की तुलना में प्रति गैलन लगभग 73% अधिक पेमेंट करने को मजबूर है. कैलिफोर्निया अमेरिका का सबसे महंगा फ्यूल मार्केट बन गया है. एएए के मुताबिक, राज्य में डीजल की औसत कीमत 8.4161 डॉलर प्रति गैलन है, डीजल की कीमत राष्ट्रीय औसत से लगभग 2 डॉलर प्रति गैलन ज्यादा है. Hormuz बना ट्रंप की टेंशन अमेरिका में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड हाई पर पहुंचने से अमेरिकी उपभोक्ताओं, ट्रक चालकों, किसानों और व्यवसायों पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास लंबे समय से जारी संकट ने ग्लोबल फ्यूल सप्लाई को प्रभावित किया है और अमेरिका पर भी इसका बड़ा असर देखने को मिला है. Hormuz ही ट्रंप के टेंशन की सबसे बड़ी वजह बना हुई, जो 28 फरवरी को अमेरिका-ईरान संघर्ष के शुरू होने के बाद से बुरी तरह से बाधित है. दुनिया की कुल तेल जरूरत के 20 फीसदी को पूरा करने के लिए जिम्मेदार इस समुद्री तेल रूट को ईरान ने बंद किया हुआ है. इससे Global Oil-Gas Supply का पांचवां हिस्सा ठप है. रॉयटर्स ने मार्च की रिपोर्ट पर गौर करें, तो में युद्ध की वजह से मिडिल ईस्ट के खाड़ी क्षेत्र के 8 प्रमुख उत्पादक देशों से तेल निर्यात फरवरी के स्तर से कम से कम 60% गिर गया था. तो दूसरी ओर रूसी रिफाइनरियों पर हमलों और मध्य पूर्वी देशों के रिफाइनिंग और एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में आई रुकावटों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. दूसरों को सप्लाई कर खुद परेशान ग्लोबल ऑयल क्राइसिस के बीच अमेरिका उन बाजारों के लिए रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जो कमी का सामना कर रहे हैं, लेकिन द वॉल स्ट्रीट जर्नल की मानें, तो इससे खुद अमेरिका के घरेलू डीजल भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन का कहना है कि डीजल की कीमतें अब सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्रूड की लागत, रिफाइनिंग मार्जिन, डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट, टैक्स और डीजल के 'क्रैक स्प्रेड' यानी कच्चे तेल की इनपुट लागत और थोक डीजल कीमतों के बीच के अंतर को दर्शाती हैं. ग्लोबली डिस्टिलेट की सीमित आपूर्ति और Crude Price Hike ने तेल की लागत और रिफाइनिंग मार्जिन दोनों को बढ़ाया है. महंगाई का बढ़ा खतरा डीजल का महत्व सिर्फ ईंधन टैंक तक ही सीमित नहीं है. यह भारी ट्रकों, ट्रेनों, कृषि मशीनों और मछली पकड़ने वाली नावों समेत अमेरिकी माल ढुलाई नेटवर्क के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता है. यही कारण है कि डीजल संकट अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालता है, इसकी कीमतों में बढ़ोतरी माल ढुलाई दरों, कृषि लागत, खाद्य पदार्थों की कीमतें, औद्योगिक लागत और आखिर में उपभोक्ता पर महंगाई का बोझ बढ़ाती हैं.

शिक्षा व्यवस्था सुधारने की नई पहल, बिहार के मॉडल स्कूलों में अधिकारी निभाएंगे शिक्षक की भूमिका

पटना बिहार में अब जिला स्तरीय अधिकारी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ शिक्षक की भूमिका में भी नजर आएंगे. राज्य के 700 मॉडल स्कूलों में अधिकारियों को संबद्ध किया जा रहा है. ये अधिकारी स्कूलों में पढ़ाई और प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी करेंगे. साथ ही हर सप्ताह कम से कम एक कक्षा खुद भी लेंगे. इस संबंध में सभी जिलों के डीएम को निर्देश दिया गया है. शिक्षा विभाग के सचिव राजीव रोशन की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि प्रत्येक सरस्वती विद्या निकेतन यानी मॉडल स्कूल से एक जिला स्तरीय पदाधिकारी को संबद्ध किया जाए. हर सप्ताह अधिकारी खुद लेंगे कक्षा संबद्ध किए गए अधिकारी नियमित रूप से मॉडल स्कूलों का निरीक्षण करेंगे. वे स्कूल की शैक्षणिक और आधारभूत सुविधाओं की समीक्षा भी करेंगे. जरूरत के अनुसार अधिकारियों को सुधार के लिए दिशा-निर्देश देना होगा. अधिकारी हर सप्ताह अपनी रुचि के विषय के अनुसार एक या उससे अधिक कक्षाएं खुद लेंगे. इसके अलावा वे पाठ्य-टीका, गृहकार्य और क्लासरूम ट्रांजेक्शन का भी अवलोकन करेंगे. अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि स्कूल में निर्धारित पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो. आधुनिक सुविधाओं का सही इस्तेमाल हो. विद्यार्थियों की उपस्थिति भी बेहतर रहे. पढ़ाई से लेकर अनुशासन तक पर नजर अधिकारी विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास और अनुशासन की स्थिति की समीक्षा करेंगे. वे नियमित उपस्थिति पर भी नजर रखेंगे. शिक्षकों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी होगी. स्कूल की मूलभूत सुविधाओं की भी जांच की जाएगी. इसमें बिजली, रंग-रोगन, शौचालय और पेयजल जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. प्रधानाध्यापक और शिक्षकों के साथ बैठक भी होगी. इसमें स्कूल के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी कदमों पर चर्चा की जाएगी. स्कूलों में नवाचार को बढ़ावा देने पर भी जोर रहेगा. अंग्रेजी कौशल पर भी रहेगा फोकस मॉडल स्कूलों में विद्यार्थियों के अंग्रेजी कौशल को बेहतर बनाने के लिए विशेष कक्षाएं चलेंगी. अधिकारियों को डिबेट, लेखन और व्याकरण जैसे विषयों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है. कक्षा लेने वाले अधिकारी स्कूल की स्थिति और अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट शिक्षा विभाग को देंगे. इस रिपोर्ट के आधार पर जिला शिक्षा पदाधिकारी स्कूल की व्यवस्था में जरूरी सुधार करेंगे. ई-शिक्षा कोष पर होगी स्कूलवार निगरानी संबद्ध अधिकारियों को ई-शिक्षा कोष पर स्कूलवार पंजीकृत किया जाएगा. अधिकारियों से मिलने वाली रिपोर्ट को जिला शिक्षा पदाधिकारी राज्यस्तरीय समीक्षा बैठक में प्रस्तुत करेंगे. इस व्यवस्था के जरिए मॉडल स्कूलों में पढ़ाई, अनुशासन, शिक्षकों की उपस्थिति और आधारभूत सुविधाओं की नियमित निगरानी की जाएगी.

पानी का संकट गहराया, 3 साल में बिगड़े हालात; गंगा-सिंधु बेसिन में भी भूजल तेजी से घटा

नई दिल्ली  दुनियाभर में भूजल का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर 34 प्रतिशत भूजल निगरानी केंद्रों पर जल स्तर सामान्य से नीचे दर्ज किया गया, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत था। इस प्रकार महज एक साल के भीतर इस संकट में 9 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। भारत के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जहां भूजल स्तर सामान्य से काफी नीचे पहुंच चुका है। तीन साल में तेजी से बिगड़े हालात वैश्विक स्तर पर पिछले तीन वर्षों के दौरान भूजल की स्थिति तेजी से खराब हुई है। वर्तमान में दुनिया के 65 प्रतिशत भूजल निगरानी केंद्रों पर जल स्तर सामान्य सीमा से बाहर चला गया है। वर्ष 2022 से 2025 के बीच भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप, मेक्सिको, चिली, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भूजल में भारी गिरावट दर्ज की गई है। ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव से पिछले तीन वर्षों में दुनिया भर के ग्लेशियरों से 1400 गीगाटन बर्फ पिघलकर नष्ट हो चुकी है। पिछले पांच वर्षों में पानी की किल्लत और उससे जुड़ी समस्याओं के कारण हुई कुल मौतों में से 80 प्रतिशत मौतें एशिया और अफ्रीका में दर्ज की गईं। वहीं वर्ष 2021 से 2025 के चार वर्षों के दौरान गंगा और सिंधु नदी के ऊपरी बेसिन क्षेत्रों में जमीन के नीचे जमा पानी में लगातार कमी देखी गई है। नदियों के लिए सबसे सूखा वर्ष रहा 2025 वर्ष 2025 नदियों के जल प्रवाह के लिहाज से भी अत्यंत प्रतिकूल साबित हुआ है। इस दौरान दुनिया के 36 प्रतिशत नदी क्षेत्रों में पानी का बहाव सामान्य से कम रहा। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1991 से लेकर 2025 तक की समयावधि में यह नदियों के लिए अब तक का सबसे सूखा वर्ष दर्ज किया गया।

किसानों के लिए नई योजना, ₹6 लाख तक कर्ज पर सरकार देगी 5% ब्याज अनुदान

लखनऊ  किसानों के बहुउपयोगी योजना के रूप में उभर कर सामने आई किसान क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ प्रदेश के लाखों किसानों ने उठाया, लेकिन केसीसी का लाभ लेने वालों में डिफाल्टरों की संख्या बढ़ गई, जो बैंक और शासन दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था। ऐसे में योगी सरकार ने इसके समाधान और किसानों को सुविधा के लिए मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना की शुरूआत की है, जिससे किसानों को बड़ा लाभ मिल सकता है। क्या है मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिसंबर 2025 को मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना की घोषणा की थी, जिसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक की ओर से किसानों को कम ब्याज पर लोन दिया जाता है। सरकार का मानना है रियायती ब्याज दर पर ऋण प्राप्त होने से किसान ऋणमाफी की मानसिकता से बाहर निकलेंगे और दीर्घकालीन पूंजी निवेश कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित होंगे। ऋण पर पांच प्रतिशत का अनुदान मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना के अंतर्गत किसानों को छह लाख रुपये तक का ऋण सिर्फ छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से दिया जाएगा। राज्य सरकार ऋणों पर पांच प्रतिशत अनुदान देगी। यह अनुदान उन्हीं किसानों को मिलेगा, जो निर्धारित अवधि के अंदर किस्तें अदा कर रहे हैं। बता दें कि नाबार्ड उच्च ब्याज दर (11 से 11.50 प्रतिशत) पर ऋण देता है, जिसका भुगतान कई बार किसान नहीं कर पाते थे। ऐसे में प्रस्तावित योजना के अंतर्गत लघु किसानों को छह लाख रुपये तक का ऋण छह प्रतिशत रियायती वार्षिक ब्याज की दर से दिया जाएगा मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना की पात्रता योगी सरकार किसानों को कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलाने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। इसी क्रम में ही यह योजना लॉन्च की गई। योजना का लाभ लेने के लिए किसान को उत्तर प्रदेश का निवासी होना अनिवार्य है ओर साथ ही उसके पास कृषि योग्य भूमि होनी चाहिए और सरकारी रिकॉर्ड में जमीन का का दस्तावेज हों। पांच साल से अधिक ऋण अवधि का विकल्प ‘मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना’ उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक के माध्यम से चलाई जाएगी। बैंक द्वारा किसानों को दीर्घकालिक ऋण न्यूनतम ब्याज पर दिया जाएगा। इस योजना के तहत प्रदेश सरकार ब्याज पर अनुदान देगी, जिससे खेती किसानी के लिए लिया जाने वाला यह ऋण काफी सस्ता पड़ेगा। ऋण पांच साल और उससे अधिक अवधि के लिए दिया जाएगा। बता दें कि 15 सितंबर 2026 को हुई कैबिनेट की बैठक में लघु एवं सीमांत किसानों के लिए दीर्घकालिक ऋण की विशेष सुविधा देने के लिए बनाई मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना संबंधी प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी गई है।

सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की तैयारी, गांवों में लगे सोलर सिस्टम के आधार पर तय होंगे ‘सोलर विलेज’

पटना  बिजली कंपनी अब सोलर विलेज योजना को आगे लाने की तैयारी में है। किसी गांव में कितनी संख्या मे सोलर सिस्टम काम रहे उनकी संख्या के आधार पर गांवों की रैंकिंग की जाएगी। रैकिंग के आधार पर सोलर विलेज यानी सौर ग्राम तय होंगे। शीर्ष के सोलर विलेज को बिजली कंपनी के स्तर से इंसेंटिव यानी प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी। सोलर सिस्टम की होगी गणना इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार गांवों में स्थित स्कूल, घर की छतों और अगर स्वास्थ्य केंद्र है तो वहां लगे सोलर सिस्टम की गिनती सोलर विलेज तय किए जाने को लेकर होगी। प्रधानमंत्री मुफ्त बिजली सूर्य घर योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में भी घर की छतों पर सोलर सिस्टम लगने शुरू हुए हैं। इनकी गिनती सोलर विलेज तय करने में महत्वपूर्ण होगी। सभी सिस्टम अब ग्रिड कनेक्टेड हैं। वर्तमान में प्राय: सभी गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइट काम कर रहे हैं इसलिए सोलर विलेज योजना में इसकी गणना नहीं होगी। अधिक से अधिक लगे सोलर सिस्टम बिजली कंपनी के संबंधित अधिकारी ने बताया कि किसी गांव को पूरी तरह से सोलर विलेज के रूप में विकसित करना संभव नहीं है। पर यह कोशिश है कि गांव में अधिक से अधिक सोलर सिस्टम लगे। अब जो भी सिस्टम लग रहा वह ग्रिड कनेक्टेड लग रहा। धरनई गांव को बनाया गया था पहला सोलर विलेज वर्ष 2014 में बिहार के एक गांव को सोलर विलेज के रूप में विकसित किए जाने का प्रयोग किया गया था। उस समय लोग सौर ऊर्जा को नकली बिजली कहते थे। जहानाबाद जिले के धरनई गांव में कुछ संस्थाओं के माध्यम से सोलर माइक्रो ग्रिड की स्थापना की गयी थी। पर बाद के सालों में रख रखाव के अभाव में यह प्रोजेक्ट बंद हो गया इसके अलावा हाल ही में नालंदा जिले के नूरसराय प्रखंड स्थित डोईया गांव को साेलर माडल गांव के रूप में विकसित किया गया है। गुजरात में है देश का पहला सोलर विलेज गुजरात का मोढेरा गांव देश का पहला सोलर विलेज है। यहां 24 घंटे सौर ऊर्जा से बिजली की आपूर्ति होती है। सोलर इनर्जी की तकनीक ग्राउंड माउंटेड सोलर पावर प्लांट और बैट्री इनर्जी स्टोरेज सिस्टम यहां लगा है। सभी घरों की छत पर सोलर पैनल लगे हुए हैं।  

PNS जुल्फिकार हाईजैक प्लान: अलकायदा के साथ मिलकर अमेरिकी-भारतीय जहाजों पर हमले की थी तैयारी

इस्लामाबाद पाकिस्तानी नौसेना युद्धकाल में ही नहीं, शांतिकाल में भी पूरी दुनिया के लिए खतरा है। 2014 में तो पाकिस्तानी नौसेना के बागी अफसरों ने अल कायदा आतंकवादियों के साथ मिलकर परमाणु हथियारों से लैस एक युद्धपोत को अगवा करने की कोशिश की थी। गनीमत रही कि उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई और बागी अफसर पकड़े गए। नहीं तो उनकी योजना युद्धपोत को अगवा कर उसमें तैनात मिसाइलों से अरब सागर में तैनात भारतीय और अमेरिकी युद्धपोतों पर हमला करने की थी। अगर ऐसा होता तो यह किसी बड़े युद्ध की शुरुआत हो सकती थी। पीएनएस जुल्फिकार को अगवा करने की कहानी पाकिस्तानी युद्धपोत को अगवा करने की कोशिश 2014 में की गई थी। इस घटना का विस्तार से वर्णन स्टीव कोल की 2018 की बेस्टसेलर पुस्तक 'डायरेक्टोरेट एस' में किया गया है। इसकी योजना पाकिस्तानी नौसेना के दो कट्टरपंथी अधिकारी लेफ्टिनेंट जीशान रफीक और ओवैस जखरानी ने बनाई थी, हालांकि इसमें दर्जनों दूसरे अधिकारी और नौसैनिक शामिल थे। इन दोनों अधिकारियों का संबंध अल कायदा से था। उस समय पीएनएस जुल्फिकार पाकिस्तानी नौसेना का सबसे आधुनिक युद्धपोत था, जो चीन में निर्मित 3,144 टन वजनी चार टाइप एफ-22पी श्रेणी के फ्रिगेटों में से पहला था। पीएनएस जुल्फिकार से अमेरिकी युद्धपोत पर हमले की थी प्लानिंग इन दोनों की योजना चालक दल और कप्तान को बंधक बनाकर युद्धपोत का अपहरण करना ही नहीं था। बल्कि, इन दोनों ने युद्धपोत पर तैनात मिसाइलों से हमला कर अमेरिकी नौसेना के जहाज को डुबानी की भी प्लानिंग की थी। इनके निशाने पर अमेरिकी युद्धपोत यूएसएनएस सप्लाई था, जो एक फार्स्ट कॉम्बेट सपोर्ट शिप है। इसका इस्तेमाल मिशन पर तैनात अमेरिकी नौसेना के दूसरे युद्धपोतों को ईंधन, हथियार और खाने की डिलीवरी करने के लिए किया जाता है। उस समय यह जहाज उत्तरी अरब सागर में तैनात था, जो अमेरिकी नौसेना के एक फ्रिगेट के लिए सप्लाई लेकर जा रहा था। पीएनएस जुल्फिकार पर हथियारों की सप्लाई बागी अधिकारियों ने पीएनएस जुल्फिकार पर कब्जे के लिए छोटे हथियार और ऑटोमेटिक रायफलों को बैग में भरकर पहले ही अंदर पहुंचा दिया था। उन्होंने मिसाइल रूम और ऑपरेशन रूम की डुप्लिकेट चाभी भी बनवा ली थी। उन्हें एक और कमजोरी का पता था कि पीएनएस ज़ुल्फिकार पर मौजूद तोप और C-802 मिसाइलों को जहाज के मुख्य ऑपरेशन रूम के बाहर से ही तैयार और लॉन्च किया जा सकता था। C-802 मिसाइलों को दूसरे डेक से तब तक संचालित किया जा सकता था जब तक कि मिसाइलों का आटोमेटिक सिस्टम बंद रहता था। परमाणु हथियार से लैस था पीएनएस जुल्फिकार पीएनएस जुल्फिकार कोई साधारण जहाज नहीं था। यह पाकिस्तान की नौसेना सामरिक बल कमान का हिस्सा था, जिसे 2012 में स्थापित किया गया था। उस समय पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार दागने में सक्षम कोई पनडुब्बी नहीं थी, लेकिन 19 और 21 दिसंबर 2012 को इस फ्रिगेट ने कथित तौर पर C-802 क्रूज मिसाइलों का परीक्षण किया। इन मिसाइलों में दो से चार किलोटन की क्षमता वाला छोटा परमाणु हथियार भी लगाया जा सकता था, जो 1945 में अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम की विस्फोटक क्षमता का लगभग 15 से 25 प्रतिशत था। हमले के लगभग छह सप्ताह बाद, भारत की खुफिया एजेंसी (R&AW) ने कराची से मिली जानकारी के आधार पर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सूचित किया कि हमले के समय पीएनएस जुल्फिकार पर एक परमाणु हथियार मौजूद था गोलीबारी में मारे गए मुख्य अपहरणकर्ता 6 सितंबर 2014 की सुबह कराची में, लेफ्टिनेंट रफीक और जखरानी पीएनएस जुल्फिकार पर सवार हुए। उनके कुछ साथी नौसैनिक वर्दी में एक छोटी नाव में बंदरगाह की ओर बढ़े। एक सतर्क संतरी ने उन्हें देख लिया और गोलीबारी शुरू हो गई। जब गोलीबारी रुकी, तो रफीक और जखरानी समेत तीन हमलावर मारे गए। उन्हें अपने हथियारों का इस्तेमाल करने या फ्रिगेट की तोपों से फायरिंग करने का मौका नहीं मिला। 5 पाकिस्तान नौसैनिको को मौत की सजा मिली इस साजिश में शामिल पांच जीवित पाकिस्तानी नौसेना अधिकारियों को मार्च 2016 में एक गुप्त सैन्य मुकदमे के बाद नौसेना न्यायाधिकरण द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी। इनमें सब-लेफ्टिनेंट हम्माद अहमद, इरफानुल्लाह, मोहम्मद हम्माद, अरसलान नज़ीर और हाशिम नसीर शामिल थे। 2024 में उनकी मौत की सजा पर रोक लगा दी गई थी। उनके वर्तमान ठिकाने के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।