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चबाने वाले तंबाकू का खौफनाक असर, स्टडी में 2.51 लाख मौतों का दावा

 नई दिल्ली तंबाकू खाना सेहत के लिए हानिकारक है. पैकेट पर साफ शब्दों में लिखी यह वॉर्निंग बताती है कि इसके नियमित उपयोग से जान भी जा सकती  है. इसके बावजूद तंबाकू चबाते की आदत दुनियाभर में गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है. Institute for Health Metrics and Evaluation (IHME) की नई स्टडी के मुताबिक, 2023 में दुनिया भर में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल से करीब 2.51 लाख मौतें जुड़ी थीं।  इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण एशिया में देखने को मिला, जहां करीब 2.10 लाख मौतें दर्ज की गईं, जो दुनियाभर में तंबाकू से हुई कुल मौतों का लगभग 84 फीसदी है. यह रिसर्च Global Burden of Disease Study 2023 का हिस्सा है और The Lancet Global Health में प्रकाशित हुई है।  इसमें 1990 से 2023 तक 204 देशों और क्षेत्रों में चबाने वाले तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का आकलन किया गया. खास बात यह है कि स्टडी ने चबाने वाले तंबाकू को दूसरे तरह के बिना धुएं वाले तंबाकू से अलग करके देखा है। स्टडी के मुताबिक, 2023 में 15 साल  और उससे ज्यादा उम्र के करीब 24.1 करोड़ लोग चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल कर रहे थे. पुरुषों में इसका इस्तेमाल महिलाओं के मुकाबले दोगुना ज्यादा है. 1990 से 2023 के बीच किसी भी देश में तंबाकू का इस्तेमाल करने वालों की संख्या में गिरावट दर्ज नहीं की गई।  वहीं 24 देशों में इस्तेमाल करने वालों की संख्या में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई. इस समस्या का सबसे बड़ा केंद्र दक्षिण एशिया रहा. यहां 15 साल से ज्यादा उम्र के 14.6 फीसदी लोग चबाने वाले तंबाकू इस्तेमाल कर रहे थे. देशवार देखें तो पलाऊ में यह दर 24.4, बांग्लादेश में 23.4 और नेपाल में 17.5 फीसदी रही।  भारत समेत 10 देशों में पुरुषों पर सबसे ज्यादा असर दुनियाभर में तंबाकू चबाने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा है. 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण एशिया में हर 5 में से एक पुरुष तंबाकू का सेवन कर रहा है. वहीं महिलाओं की बात करें तो हर 10 में से 1 महिला तंबाकू का इस्तेमाल करती है. इसके साथ ही रिसर्च में यह भी पाया गया कि देशों और महिलाओं-पुरुषों के बीच पैटर्न काफी अलग है. बांग्लादेश में 30 साल से ज्यादा उम्र के हर आयु वर्ग में महिलाओं में इसका इस्तेमाल पुरुषों से ज्यादा था।  स्ट्रोक और मुंह का कैंसर बड़ा खतरा स्टडी ने चबाने वाले तंबाकू से जुड़े छह प्रमुख स्वास्थ्य परिणामों का आकलन किया. स्ट्रोक, होंठ और मुंह का कैंसर, खाने की नली का कैंसर, दूसरे तरह के गले के कैंसर, गले के निचले हिस्से का कैंसर और नाक-गले के बीच होने वाला कैंसर।  इनमें स्ट्रोक से सबसे ज्यादा दर्ज किया गया. इसके बाद होंठ और मुंह के कैंसर दूसरे नंबर पर है. वहीं दुनिया भर में चबाने वाले तंबाकू से होंठ और मुंह के कैंसर से जुड़ा स्वास्थ्य नुकसान 17.3 फीसदी था. दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा बढ़कर 30.5 फीसदी हो गया।  1990 के मुकाबले स्वास्थ्य नुकसान 116% बढ़ा स्टडी के मुताबिक, 1990 से 2023 के बीच चबाने वाले तंबाकू से जुड़ी बीमारी, विकलांगता और समय से पहले मौत के आंकड़ों में 116 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. 2023 में यह आंकड़ा 64.8 लाख तक पहुंच गया. इनमें से 61.7 लाख लोगों ने समय से पहले अपनी जान गंवाई।  रिसर्चर्स का कहना है कि स्मोकिंग की तुलना में चबाने वाले तंबाकू पर अब तक कम ध्यान दिया गया है. सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं, इससे होने वाले नुकसान को लेकर गलत धारणाएं, सीमित निगरानी और कुछ ग्रामीण तथा कम आय वाले समुदायों में ज्यादा इस्तेमाल इसकी बड़ी वजह हो सकते हैं।  रिसर्च के मुताबिक, इस नुकसान को कम करने के लिए तंबाकू रोकथाम और इसे छोड़ने की योजनाओं में चबाने वाले और बिना धुएं वाले तंबाकू को भी ज्यादा गंभीरता से शामिल करना जरूरी है. इसके लिए उम्र, लिंग, देश, स्थानीय आदतों और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के हिसाब से अलग रणनीति बनानी होगी।   

भारत-नेपाल बॉर्डर पर सुरक्षा होगी और मजबूत, सिद्धार्थनगर में IB के लिए चार स्थान चिन्हित

शोहरतगढ़  भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो की इकाइयों के लिए भूमि चिह्नित की गई है। ककरहवा, खुनुआ, बढ़नी और डुमरियागंज में कार्यालय व आवास के लिए भूमि प्रस्तावित है। ककरहवा के भाटिनपार और खुनुआ 0.3000-0.3000 हेक्टेयर भूमि प्रस्तावित की गई है। डुमरियागंज के रूदौलिया बुजुर्ग में भी 0.3000 हेक्टेयर भूमि प्रस्तावित है। बढ़नी क्षेत्र के मधवापुर में 0.1052 हेक्टेयर भूमि आवास निर्माण तथा ढेबरुआ में 0.0910 हेक्टेयर भूमि कार्यालय निर्माण के लिए प्रस्तावित है। ककरहवा और डुमरियागंज की भूमि का निरीक्षण हो चुका है। खुनुआ में चिह्नित स्थल का शीघ्र निरीक्षण कराकर उपयुक्त पाए जाने पर पुनर्ग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी है। इससे सीमापार गतिविधियों पर स्थानीय निगरानी मजबूत होने की उम्मीद है। सीमा सुरक्षा के लिहाज से अहम पड़ाव जनपद में भारत-नेपाल की 68 किलोमीटर की सीमा पूरी तरह से खुली होने के कारण सिद्धार्थनगर का सीमावर्ती क्षेत्र सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। खुनुआ और बढ़नी, ककरहवा जैसे प्रमुख सीमा बिंदुओं के आसपास आइबी इकाइयों की स्थापना से विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी को संस्थागत आधार मिलने की उम्मीद है। दो वर्षों के बीच खुनुवा एवं ककरहावा के रास्ते कई विदेशी भारत में प्रवेश करते हुए पकड़े गए हैं। इसको लेकर सीमा की संवेदनशीलता और बढ़ गई है। बब्बर खालसा ग्रुप, इंडियन मुजाहिदीन ग्रुप से जुड़े आतंकी भारत-नेपाल के बढ़नी बार्डर से पकड़े भी जा चुके हैं। खुली सीमा के चलते दुश्मन देश भारत-विरोधी गतिविधियों को और तेज कर सकते हैं। आतंकी संगठन बिहार और उत्तर प्रदेश के नेपाल से सटे इलाकों में उनकी नापाक गतिविधियों को बढ़ाने नए इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े किए जाने की आशंका है, जिसके जरिए भारत में अशांति फैलाई जा सके। नेपाल से सटे इलाकों में कट्टरपंथी गतिविधियों में काफी इजाफा नजर आ रहा है। बढ़नी बार्डर पर मिल चुका है पाकिस्तान कनेक्शन 1993 में बढ़नी में भारत-नेपाल सीमा पर अजमेर सिंह व भाग सिंह नामक उग्रवादी पकडे़ गए। वर्ष 2010 में बढ़नी बार्डर से इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकी सलमान उर्फ छोटू को एटीएस ने पकड़ा था। वर्ष 2013 में बिहार के रक्सौल से इसी आतंकी संगठन का मास्टर माइंड अब्दुल करीम टुंडा पकड़ा गया था। पूछताछ में बढ़नी के आसपास रहकर देश विरोधी गतिविधि चलाने की बात सामने आई थी। इसी बीच इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े आतंकी यासिन भटकल को पकड़ा गया था। इसके अलावा पड़ोसी जनपद महराजगंज से हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी नासिर को पकड़ा गया था। बब्बर खालसा का खतरनाक उग्रवादी मक्कन सिंह भी बढ़नी में पकड़ा गया था    

बाब अल-मंदेब पर बढ़ा तनाव, हूतियों के खिलाफ सऊदी ऑपरेशन की तैयारी; पाकिस्तान की भी बड़ी भूमिका

दुबई  दुनिया के तेल और व्यापार की सप्लाई पर दोहरी चोट लगी है. एक तरफ ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है, तो दूसरी तरफ यमन में हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर कब्जा कर लिया है. दुनिया के समुद्री व्यापार के इन दोनों अहम रास्तों पर संकट के बीच सऊदी अरब ने हूतियों पर हमले की तैयारी शुरू कर दी है. सऊदी अपने लोगों को इस जंग में नहीं भेजेगा. इस ऑपरेशन में यमन की एक लाख से ज्यादा सैनिकों वाली सेना को मैदान में उतारा जा सकता है, जबकि सऊदी अरब हवाई हमलों से उनका साथ देगा. इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी बढ़ गई है. उसने सऊदी अरब में 30 से 40 हजार सैनिक तैनात किए हैं और सैन्य उपकरणों के साथ सलाहकार भी भेजे हैं. हालांकि कहा जा रहा है कि ये सैनिक सऊदी की रक्षा के लिए हैं. सऊदी के इस अटैक प्लान से पहले खबर आई थी कि अमेरिका ने अपनी कई पैट्रियट मिसाइलों को सऊदी और कतर के तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा में तैनात किया है।  सऊदी अरब का क्या है प्लान? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ हमले के दो विकल्पों पर विचार कर रहा है. पहला विकल्प बाब-अल-मंदेब के आसपास के तटीय इलाकों को हूतियों से वापस लेने का है. दूसरा विकल्प यमन के कई मोर्चों पर एक साथ हमला करने का है. इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हो सकते हैं. इस हमले की टाइमिंग फिक्स नहीं है, लेकिन आने वाले कुछ हफ्तों में शुरू किया जा सकता है. हालांकि, इसकी तारीख को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं. कुछ सूत्रों का कहना है कि हमला एक हफ्ते के भीतर शुरू हो सकता है, जबकि कुछ का मानना है कि अमेरिका के नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों के बाद ही सैन्य कार्रवाई हो सकती है।  1 लाख सैनिक कर सकते हैं हमला रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब इस बार सीधे बड़े जमीनी अभियान के बजाय यमनी सैनिकों को आगे रखकर ऑपरेशन चलाने की तैयारी कर रहा है. इस अभियान में 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को जुटाया जा सकता है. हालांकि, सैनिकों की संख्या इस बात पर निर्भर करेगी कि हमले का दायरा कितना बड़ा रखा जाता है. जमीन पर यमनी सेना हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी, जबकि सऊदी अरब हवाई हमलों के जरिए समर्थन देगा. इस तरह ऑपरेशन की कमान सऊदी के समर्थन वाले यमनी बलों के हाथ में होगी और रियाद उन्हें सैन्य मदद देगा।  अमेरिका भी इस अभियान में सऊदी अरब की मदद कर रहा है. वह खुफिया जानकारी और टारगेट से जुड़ी सूचनाएं उपलब्ध करा रहा है. इससे पहले उसने उसकी हवाई सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पैट्रियट एयर डिफेंस तैनात किए हैं. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की सीधे सैन्य मदद और हवाई हमलों की मांग को पहले ठुकरा दिया था।  समंदर के दो बड़े दरवाजे बंद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा पहलू समुद्री व्यापार के दो अहम रास्तों का संकट में आना है. होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान युद्ध के कारण लगभग बंद है. ऐसे में दुनिया की नजर बाब-अल-मंदेब पर टिक गई है, जो लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश मार्ग है. बाब-अल-मंदेब भूमध्य सागर और एशिया के बीच समुद्री व्यापार का बेहद अहम रास्ता है. होर्मुज में आवाजाही बाधित होने के बाद इसकी अहमियत और बढ़ गई है. अब हूतियों के इस इलाके पर नियंत्रण से अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर दबाव बढ़ने का खतरा है. सऊदी अरब का मानना है कि जब तक हूतियों के हाथ में बाब-अल-मंदेब का नियंत्रण रहेगा, तब तक उनके साथ शांति वार्ता की नई प्रक्रिया शुरू करना मुश्किल होगा. इसकी वजह यह है कि इस समुद्री रास्ते पर नियंत्रण हूतियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा दबाव बनाने की ताकत देता है।  पाकिस्तान के 30-40 हजार सैनिक सऊदी अरब में तैनात इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने हाल ही में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरणों और सलाहकारों के जरिए मदद दी है. रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने पिछले महीने चार कार्गो विमान अदन भेजे थे. इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, छोटी तोपें, ड्रोन और एंटी ड्रोन सिस्टम शामिल थे. अदन यमन की सऊदी समर्थित सरकार का मुख्य केंद्र है. इसके अलावा, पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ मिलकर यमनी बलों की मदद कर रहे हैं. रिपोर्ट में एक पाकिस्तानी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब में 30 हजार से 40 हजार सैनिक तैनात किए हैं. ये सैनिक सऊदी अरब की जमीनी सीमाओं की सुरक्षा और ड्रोन-मिसाइल हमलों को रोकने में मदद कर रहे हैं. इनकी तैनाती पिछले साल से अलग-अलग चरणों में हुई है और हालिया तनाव के बाद भी सैनिक पहुंचे हैं।  सऊदी के सामने क्या है दिक्कत? सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ने वाले सभी गुट एकजुट नहीं हैं. पहले गृहयुद्ध के दौरान सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अलग-अलग यमनी लड़ाकू गुटों को हथियार और ट्रेनिंग दी थी. पिछली सर्दियों में यमन के दक्षिणी हिस्से में UAE समर्थित लड़ाकों ने पूर्वी इलाकों पर कब्जा करने और अलग देश बनाने की योजना का ऐलान किया था. इसके बाद सऊदी समर्थित लड़ाकों के साथ उनकी झड़पें हुईं और अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. यमन मामलों के जानकार मोहम्मद अलबाशा के मुताबिक, हूतियों के खिलाफ लड़ने वाले कई गुट अभी भी बड़े और लंबे सैन्य अभियान के लिए तैयार नहीं हैं. दूसरी तरफ हूती कई मोर्चों पर दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं। 

भोपाल में नोटरी के नाम पर बड़ा खेल! 140 अधिकृत वकील, लेकिन खुले हैं 1000 से ज्यादा दफ्तर

भोपाल  शहर में नोटरी व्यवस्था को लेकर एक शिकायत ने निगरानी और नियमन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता अधिवक्ता लालचंद भारके का दावा है कि भोपाल में करीब 140 नोटरी अधिवक्ता नियुक्त हैं, जबकि इनके नाम से संचालित होने वाले नोटरी कार्यालयों की संख्या एक हजार से अधिक है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानों पर नोटरी की अनुपस्थिति में दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं और पर्याप्त स्टांप शुल्क के बिना शपथ पत्र प्रमाणित किए जा रहे हैं। शिकायत में नोटरी अधिवक्ता गुलाम निजामुद्दीन अनवर सिद्दीकी के खिलाफ भी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं। शिकायत में क्या आरोप 30 सितंबर 2026 को दी गई शिकायत में भारके ने कहा है कि एक शपथ पत्र उनके नाम से तैयार कराया गया और उस पर नोटरी अधिवक्ता की उपस्थिति तथा प्रक्रिया को लेकर आपत्ति है। शिकायतकर्ता के अनुसार शपथ पत्र पर पर्याप्त स्टांप शुल्क नहीं लगाया गया और नोटरी टिकट भी चस्पा नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि शपथ पत्र प्रमाणित करने वाले नोटरी अधिवक्ता मौके पर मौजूद नहीं थे और प्रतिनिधि के माध्यम से प्रक्रिया पूरी की गई। नोटरी के लिए क्या हैं नियम? नोटरी अधिनियम, 1952 और नोटरी नियम, 1956 के तहत नोटरी को अपने नोटरी कार्य का अभिलेख निर्धारित रजिस्टर में रखना होता है। नियमों में ली गई फीस की रसीद देने का प्रावधान बताया गया है। शपथ पत्रों के संबंध में उपलब्ध नियमों में नोटरी रजिस्टर में प्रविष्टि अनिवार्य नहीं बताई गई है, लेकिन अन्य नोटरी कार्यों के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है। दस्तावेज के अनुसार नोटरी को दस्तावेज पर पर्याप्त स्टांप शुल्क लगा है या नहीं, यह देखना होता है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि स्टांप शुल्क की जांच किए बिना दस्तावेजों का नोटरीकरण होने से राजस्व को नुकसान हो सकता है। निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है प्रतिनिधि से नोटरी कार्य पर सवालशिकायतकर्ता ने कहा है कि नोटरी को अपने नियुक्त स्थान पर उपस्थित रहकर नोटरी कार्य करना होता है और किसी दूसरे व्यक्ति को प्रतिनिधि बनाकर नोटरी कार्य नहीं कराया जा सकता। उनका आरोप है कि कुछ कार्यालयों में अन्य व्यक्ति दस्तावेज तैयार कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि संबंधित विभागीय जांच के बाद ही होगी। शिकायत में नोटरी कार्य के दौरान खाली कागज पर हस्ताक्षर कराने का आरोप भी लगाया गया है। भारके ने जिला नोटरी अधिवक्ता प्रकोष्ठ के अध्यक्ष को शिकायत देकर जांच और कार्रवाई की मांग की है।

असम में फिर शुरू हुई जंगल सफारी, मानस 2 और काजीरंगा 3 अक्टूबर से पर्यटकों के लिए खुले

जोरहाट जंगल का सफर कुछ महीनों के लिए बंद था. बारिश का मौसम था. रास्ते मुश्किल थे और वन्यजीवों की सुरक्षा को देखते हुए असम के कई नेशनल पार्क और अभयारण्य पर्यटकों के लिए बंद थे. अब इंतजार खत्म हो गया है. असम में वाइल्डलाइफ टूरिज्म का नया सीजन शुरू हो चुका है।  2 अक्टूबर को मानस नेशनल पार्क के दरवाजे पर्यटकों के लिए खुल गए. इसके ठीक एक दिन बाद यानी 3 अक्टूबर से काजीरंगा नेशनल पार्क में भी सैलानियों की एंट्री शुरू हो गई. और अगर आपकी लिस्ट में पोबितोरा भी है, तो उसके लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा. पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य 13 अक्टूबर से खुलेगा. यानी अक्टूबर का महीना असम के जंगलों के नाम है।  बक्सा और चिरांग जिलों में फैला मानस नेशनल पार्क 2 अक्टूबर से खुल चुका है. मानसून की वजह से हर साल यहां कुछ समय के लिए पर्यटन गतिविधियां बंद रहती हैं।  अब मौसम बदलने के साथ जंगल सफारी और वन्यजीवों को करीब से देखने का मौका फिर मिल गया है. और मानस के बाद नंबर आया काजीरंगा का… काजीरंगा नेशनल पार्क 3 अक्टूबर से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया. यह पार्क गोलाघाट और नगांव समेत कई जिलों में फैला है. इसका विस्तार बिश्वनाथ और सोनितपुर के कुछ हिस्सों तक भी है।  काजीरंगा का नाम आते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? एक सींग वाला गैंडा. लेकिन कहानी सिर्फ गैंडे तक सीमित नहीं है. काजीरंगा असम के सबसे बड़े वन्यजीव पर्यटन आकर्षण में शामिल है. हर टूरिज्म सीजन में यहां देश ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।  अब आंकड़ों पर आते हैं. क्योंकि ये आंकड़े बताते हैं कि असम के जंगलों को देखने के लिए लोगों में कितनी दिलचस्पी है. 2025-26 के टूरिज्म सीजन में काजीरंगा नेशनल पार्क में 4.68 लाख से ज्यादा टूरिस्ट पहुंचे थे. पिछले साल यह संख्या करीब 4.06 लाख थी. यानी एक साल में पर्यटकों की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई।  इन 4.68 लाख से ज्यादा पर्यटकों में 4.37 लाख से अधिक भारतीय थे. वहीं 30 हजार से ज्यादा विदेशी पर्यटक भी काजीरंगा पहुंचे. काजीरंगा सिर्फ देश के पर्यटकों की पसंद नहीं है, दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले सैलानी भी असम के इस जंगल का रुख करते हैं।  मानस में भी बढ़े पर्यटक अब मानस की बात करते हैं. साल 2025-26 के टूरिज्म सीजन में मानस नेशनल पार्क में कुल 63,723 लोग पहुंचे थे. इनमें करीब 59 हजार भारतीय और लगभग 5 हजार विदेशी पर्यटक शामिल थे. यानी यहां भी पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है. और अब नया सीजन शुरू हो चुका है. जंगल फिर खुले हैं. सफारी फिर शुरू हो गई है. ऐसे में आने वाले महीनों में पर्यटकों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।  पोबितोरा के लिए 13 अक्टूबर तक इंतजार अगर आप असम के वाइल्डलाइफ सर्किट में पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य को भी शामिल करना चाहते हैं, तो तारीख याद रखिए. 13 अक्टूबर… मोरीगांव जिले में पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य इसी दिन पर्यटकों के लिए खोला जाएगा. पिछले टूरिज्म सीजन में पोबितोरा में 35,371 पर्यटक पहुंचे थे. यानी मानस, काजीरंगा और पोबितोरा तीनों जगहों के खुलने के बाद असम का प्रमुख वाइल्डलाइफ टूरिज्म सर्किट पूरी तरह एक्टिव हो जाएगा।  असम के पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने इन पर्यटन स्थलों को फिर से खोलने के शेड्यूल की जानकारी दी है. मानसून के दौरान जंगलों में पर्यटकों की आवाजाही रोकना हर साल की प्रक्रिया है. बारिश के दौरान जंगलों की स्थिति, सड़कें और वन्यजीवों की सुरक्षा जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है. अब मानसून का दौर पीछे छूट रहा है और पर्यटन सीजन सामने है. इसलिए असम के जंगलों में फिर से हलचल शुरू हो गई है।  तो अगर असम जाने का प्लान है… तो तारीखें नोट कर लीजिए. 2 अक्टूबर को मानस नेशनल पार्क खुल चुका है. 3 अक्टूबर को काजीरंगा नेशनल पार्क खुल चुका है. 13 अक्टूबर को पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य खुलेगा. पिछले सीजन के आंकड़े बता रहे हैं कि असम के जंगलों को देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है. इस बार भी देश के अलग-अलग हिस्सों से पर्यटकों के पहुंचने की उम्मीद है. तो जंगल तैयार हैं. सफारी तैयार है. और असम का नया वाइल्डलाइफ टूरिज्म सीजन भी शुरू हो चुका है।     

खेतों से ग्लोबल मार्केट तक पहुंचा कालानमक चावल, UPITS-2026 में सिद्धार्थनगर की कुकीज़ ने बटोरी तारीफ

ग्रेटर नॉएडा सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पीढ़ियों से महकता कालानमक चावल अब केवल थाली तक सीमित नहीं है। वही पारंपरिक खुशबू अब कुकीज़ के स्वाद में ढलकर देश की सीमाओं से बाहर वैश्विक बाजार तक अपनी पहचान बना रही है। एक परिवार की तीन पीढ़ियों की खेती, एक युवा उद्यमी के नवाचार और उपलब्ध अवसरों के समन्वय से शुरू हुआ यह सफर आज स्थानीय कृषि विरासत को आधुनिक उद्यमिता से जोड़ने की प्रेरक कहानी बन गया है। उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो-2026 (यूपीआईटीएस-2026) इंडिया एक्सपो मार्ट एवं सेंटर ग्रेटर नोएडा में सिद्धार्थनगर की मेसर्स बुद्धा डिलाइट्स द्वारा कालानमक चावल से तैयार कुकीज़ जब देश-विदेश के खरीदारों के सामने पहुंचीं, तो स्वाद के साथ कालानमक चावल की विशिष्ट पहचान ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया।  ट्रेड शो के दौरान इकाई को 200 बिजनेस इंक्वायरी प्राप्त हुईं, जिनकी कुल अनुमानित कारोबारी संभावनाएं करीब 04 करोड़ रुपये की हैं।यह उपलब्धि केवल एक उद्यम की व्यावसायिक सफलता नहीं, बल्कि इस बात का उदाहरण भी है कि स्थानीय कृषि उत्पादों में नवाचार और मूल्य संवर्धन के माध्यम से गांव और खेत से निकलने वाले उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा सकता है। फ्रांस तक पहुंची कालानमक चावल की महक, 50 हजार कुकीज़ का मिला ऑर्डर यूपीआईटीएस-2026 बुद्धा डिलाइट्स के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबार का महत्वपूर्ण माध्यम भी बना। इकाई के संस्थापक डॉ. अजय कुमार रावत ने फ्रांस के एक बायर के साथ एमओयू साइन किया है। इसके अंतर्गत 50 हजार कुकीज़ की आपूर्ति का कन्फर्म ऑर्डर प्राप्त हुआ है, जिसकी कुल कीमत 20 लाख रुपये है। सिद्धार्थनगर के खेतों में उगने वाले कालानमक चावल से बने उत्पाद का फ्रांस के बाजार तक पहुंचना स्थानीय कृषि विरासत के वैश्विक संभावनाओं से जुड़ने का उदाहरण है। जिस फसल को परिवार पीढ़ियों से खेत में उगा रहा था, आज उसी फसल से तैयार उत्पाद के लिए विदेश से व्यावसायिक ऑर्डर मिलना इस यात्रा को विशेष बनाता है। उपभोक्ताओं ने भी अपनाया स्वाद, UPITS में 04.70 लाख रुपये की बिक्री व्यापारिक खरीदारों के साथ आम उपभोक्ताओं ने भी कालानमक चावल से तैयार उत्पादों में रुचि दिखाई। यूपीआईटीएस-2026 के दौरान बुद्धा डिलाइट्स ने बी2सी श्रेणी में 04.70 लाख रुपये की बिक्री दर्ज की। कालानमक कैश्यू कुकीज़, एरोमैटिक ब्राउन राइस कुकीज़, ड्राई फ्रूट शुगर फ्री कुकीज़ और जैगरी कुकीज़ जैसे अलग-अलग उत्पादों ने यह संभावना सामने रखी कि पारंपरिक अनाज को आधुनिक स्वाद और उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुरूप प्रस्तुत कर उसके लिए नया बाजार तैयार किया जा सकता है। दादा-परदादा के खेतों से मिली विरासत को बनाया उद्यम का आधार इस सफलता की जड़ें सिद्धार्थनगर के उन खेतों में हैं, जहां डॉ. अजय कुमार रावत का परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से कालानमक चावल की खेती करता आ रहा है। शिक्षक पिता और गृहिणी माता के परिवार में पले-बढ़े डॉ. रावत ने राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने नेचुरोपैथी योगा में भी डॉक्टरेट किया। राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में कार्य करते हुए भी उनके मन में अपनी मिट्टी और कालानमक से जुड़ी पारिवारिक विरासत को कुछ नया स्वरूप देने का विचार बना रहा। यही विचार धीरे-धीरे प्रयोग में बदला। कालानमक को केवल चावल के रूप में बेचने के बजाय उससे ऐसे उत्पाद तैयार करने की सोच विकसित हुई, जिन्हें नई पीढ़ी और आधुनिक बाजार भी सहजता से अपना सके। इस विचार को वास्तविक उत्पाद में बदलने के लिए डॉ. रावत ने स्वयं खाद्य उत्पाद निर्माण की बारीकियां सीखीं और पुणे से कुकरी एवं बेकरी में डिप्लोमा कोर्स पूरा किया। इसके बाद कालानमक चावल के अलग-अलग वैरिएंट्स पर प्रयोगों का सिलसिला शुरू हुआ। लगातार प्रयासों के बाद वर्ष 2024 में मेसर्स बुद्धा डिलाइट्स की स्थापना हुई। परंपरा वही रही, बदल गया उसका स्वरूप डॉ. रावत ने कालानमक की मूल पहचान को बनाए रखते हुए उसे आधुनिक खाद्य उत्पादों से जोड़ने का प्रयास किया। इसी प्रयोग से कालानमक कैश्यू कुकीज़, एरोमैटिक ब्राउन राइस कुकीज़, ड्राई फ्रूट शुगर फ्री कुकीज़ और जैगरी कुकीज़ जैसे उत्पाद सामने आए।यह बदलाव केवल उत्पाद का नहीं था। इसके साथ कालानमक के लिए बाजार का दायरा भी बदलने लगा।जो कालानमक पहले मुख्यतः चावल के रूप में उपभोक्ता तक पहुंचता था, वही अब मूल्यवर्धित उत्पाद के रूप में नई उपभोक्ता श्रेणियों और नए बाजारों तक पहुंच रहा है।आज बुद्धा डिलाइट्स का वार्षिक टर्नओवर लगभग 3 करोड़ रुपये है। यूपीआईटीएस-2026 में मिली करीब 4 करोड़ रुपये की 200 बिजनेस इंक्वायरी और फ्रांस से प्राप्त 20 लाख रुपये के कन्फर्म ऑर्डर ने उद्यम के विस्तार की संभावनाओं को और मजबूत किया है। वित्तीय संबल मिला तो सपनों को विस्तार देने का रास्ता खुला किसी नवाचार को सफल उद्यम में बदलने के लिए विचार और परिश्रम के साथ वित्तीय संसाधन भी आवश्यक होते हैं। डॉ. रावत के उद्यम को आगे बढ़ाने में ‘एक जनपद एक व्यंजन पोषण वित्त योजना’ ने महत्वपूर्ण संबल प्रदान किया। योजना के अंतर्गत उन्होंने 50 लाख रुपये का ऋण लिया है, जिस पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग के माध्यम से 10 लाख रुपये की मार्जिन मनी (सब्सिडी) उपलब्ध कराई जाएगी। इस वित्तीय सहयोग से उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादों को नए बाजारों तक पहुंचाने और उद्यम को विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ने का आधार मिला है। “अपनी मिट्टी की पहचान को दुनिया तक पहुंचाना ही सपना” डॉ. अजय कुमार रावत के लिए यह उद्यम केवल कारोबार नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और उससे जुड़ी पहचान को आगे ले जाने का माध्यम भी है। उनका उद्देश्य कालानमक की विशिष्ट सुगंध और स्वाद को मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से देश-दुनिया के उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है।यूपीआईटीएस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने उत्पाद प्रस्तुत करने, देश-विदेश के खरीदारों से सीधे संवाद करने और फ्रांस से व्यावसायिक ऑर्डर प्राप्त करने को वे अपने उद्यम की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं।उन्होंने उपलब्ध कराए गए मंच, संबंधित विभागों के सहयोग और स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार से जोड़ने के प्रयासों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे अवसर छोटे और स्थानीय उद्यमों को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने तथा नए बाजारों तक पहुंचने का मार्ग प्रदान करते हैं। खेत से कुकीज़ तक… और सिद्धार्थनगर से फ्रांस तक सिद्धार्थनगर के एक खेत से शुरू हुई यह कहानी आज अंतरराष्ट्रीय कारोबार के द्वार तक पहुंच चुकी … Read more

एयर चीफ एपी सिंह का बड़ा बयान, ऑपरेशन सिंदूर में ड्रोन ने बदली जंग की तस्वीर; इसी महीने होंगे रिटायर

 नई दिल्ली दुनिया भर में चल रहे संघर्षों को देखते हुए यह साफ हो गया है कि मजबूत सैन्य बल हर देश की जरूरत है. हाल के वर्षों में वायु शक्ति किसी भी देश की ताकत की सबसे तेज धार बन चुकी है. भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंसमें यही बात दोहराई।   उन्होंने कहा कि वायुसेना लगातार अपनी क्षमताओं को बेहतर बना रही है. हर युद्ध घटक का अपना महत्व है लेकिन संयुक्त बल की जरूरत सबसे ज्यादा है. ऑपरेशन सिंदूर में आईएएफ ने यही साबित किया. वायुसेना न सिर्फ ऑपरेशनल पंच देती है बल्कि मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी आगे रहती है. कई देशों में मदद पहुंचाकर वसुधैव कुटुंबकम की भावना को जीवंत किया  है।  एयर चीफ ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए बताया कि पाकिस्तानी विमानों को निशाना बनाया गया जो खतरा बन रहे थे. भारतीय लॉइटरिंग म्यूनिशन्स ने दुश्मन पक्ष में भारी अफरातफरी मचा दी. उन्होंने साफ कहा कि वायुसेना को अलग ड्रोन फोर्स की जरूरत नहीं है. मौजूदा ढांचे में ही ड्रोन और अन्य सिस्टम को एकीकृत किया जा रहा है।  संख्या की कमी को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि मिग-21 को पिछले साल चरणबद्ध तरीके से हटाया गया जबकि इसे दो-तीन साल पहले करना चाहते थे. देरी नुकसान पहुंचाती है लेकिन मौजूदा प्रगति से उम्मीद है कि अंतर भर जाएगा. कम विमान होने के बावजूद ऑपरेशनल क्षमता को लेकर वायुसेना सहज है क्योंकि खरीद प्रक्रिया चल रही है।  आत्मनिर्भरता अब मजबूरी बन चुकी है… आत्मनिर्भरता अब मजबूरी बन चुकी है. एयर चीफ ने एचएएल और एडीए को पूर्ण समर्थन देने की बात कही. स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस, एएमसीए के साथ मिसाइल और रडार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया. एमआरएफए सौदा इस वित्तीय वर्ष में हस्ताक्षरित होने की उम्मीद है बशर्ते दोनों पक्ष काम करें. स्क्वाड्रन ताकत बढ़ाने के लिए एचएएल हर साल 24 से अधिक विमान बनाने की बात कर रहा है।  एमआरएफए पूरा होने पर आवश्यक लड़ाकू विमान मिल सकेंगे. चीन के बढ़ते स्टील्थ विमान और पाकिस्तान द्वारा उन्हें हासिल करने की कोशिश चिंता का विषय है लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में वे कुछ खास नहीं कर पाए. आधुनिक हथियार प्रणालियों को अपने प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया जा रहा है।  वायुसेना का विजन साफ है. एआई आधारित बल तैयार किया जाएगा जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहायता करेगी लेकिन फैसला इंसान के हाथ में रहेगा. अंतरिक्ष क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने और मुख्य ऑपरेशनों के समर्थन पर काम चल रहा है. स्पेस हथियारों पर भी शुरुआत हो चुकी है. थिएटर कमांड के बारे में एयर चीफ ने कहा कि वे इसके खिलाफ नहीं हैं. बहुपक्षीय अभ्यासों में भागीदारी जारी है जिसमें तरंग शक्ति सबसे बड़ा है. ये अभ्यास सहयोग और अनुभव साझा करने का माध्यम बनते हैं।     संगठन से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं और व्यक्तिगत संदेश   एयर चीफ ने फ्लाईदुबई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन भारतीय पायलट का साहस सराहनीय है और उन पर गर्व है. उन्होंने जोर दिया कि कोई भी व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं है. पिछले दो साल में जो कुछ हुआ वह पूरी वायुसेना का काम है. जो नहीं हो पाया उसकी जिम्मेदारी वे खुद लेने को तैयार हैं और संतुष्ट हैं।  रिश्वत और हनीट्रैप के मामलों पर संवेदनशील बनाया जा रहा है. प्रियंका सक्सेना मामले में अदालत के फैसले का पालन होगा और प्रशिक्षण के बाद उन्हें स्क्वाड्रन लीडर के रूप में शामिल किया जाएगा.  यह एयर चीफ की अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस है क्योंकि वे इस माह के अंत में सेवा निवृत्त हो रहे हैं।  उन्होंने देशवासियों को आश्वस्त किया कि भारतीय वायुसेना हमेशा तैयार रहेगी. दिग्गज सैनिकों का भी आभार जताया. कुल मिलाकर यह वार्ता वायुसेना की मौजूदा स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की दिशा को साफ करती है. संख्या की कमी के बावजूद तकनीक, आत्मनिर्भरता और संयुक्त अभियानों पर जोर देकर आईएएफ अपनी ताकत बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 

केंद्रीय कर्मचारियों के 18 महीने के DA एरियर पर नई उम्मीद, 8वें वेतन आयोग से जुड़ा बड़ा सवाल

नई दिल्ली केंद्रीय कर्मचारियों के लिए गठित आठवें वेतन आयोग के सामने अलग-अलग संगठन अपनी डिमांड रख रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे डिमांड हैं जो लंबे समय से चर्चा के केंद्र में रहे हैं। ऐसी ही एक डिमांड कोरोना काल के 18 महीने के महंगाई भत्ते/महंगाई राहत (DA/DR) एरियर की है। आइए जानते हैं इसके बारे में। क्या है मामला? दरअसल, कोविड-19 महामारी के दौरान साल 2020 की दोनों छमाही यानी जनवरी से जून और जुलाई से दिसंबर तक के डीए बढ़ोतरी को सरकार ने होल्ड कर दिया था। इसके अलावा साल 2021 की पहली छमाही में भी केंद्रीय कर्मचारियों को डीए नहीं बढ़ाया गया था। इस तरह, केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के भत्ते में 18 महीने तक किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की गई। कोरोना के दौरान रोके गए 18 महीने के महंगाई भत्ते/महंगाई राहत (DA/DR) के बकाये के भुगतान की केंद्रीय कर्मचारी लंबे समय से मांग कर रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने अलग-अलग समय पर संसद में दिए गए जवाबों में स्पष्ट किया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार की वित्तीय स्थिति पर पड़े दबाव को देखते हुए जनवरी 2020, जुलाई 2020 और जनवरी 2021 की DA/DR की तीन किस्तों को फ्रीज किया गया था। सरकार ने यह भी कहा है कि महामारी के दौरान पैदा हुई असाधारण वित्तीय परिस्थितियों और सरकार की वित्तीय स्थिति को देखते हुए उस अवधि के DA/DR एरियर का भुगतान करना व्यावहारिक नहीं माना गया। आठवें वेतन आयोग से मांग हाल ही में उत्तर प्रदेश में रिटायर हो चुके कर्मचारियों और पेंशनभोगियों ने विरोध प्रदर्शन किया और 12 सूत्रीय मांगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचाया है। प्रमुख मांग थी कि 1 जनवरी 2026 से पहले रिटायर होने वाले सरकारी कर्मचारियों को भी 8वें वेतन आयोग के दायरे में शामिल किया जाए। संगठन ने मांग की कि रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए और पुराने रिटायर लोगों की पेंशन में भी संशोधन किया जाए। उन्होंने पुरानी पेंशन व्यवस्था को बहाल करने और पेंशन से होने वाली आय को टैक्स से छूट देने की भी मांग की। अन्य प्रमुख मांगों में 65 साल की उम्र के बाद हर 5 साल में पेंशन में 5% की बढ़ोतरी और 10 साल बाद पेंशन कम्यूटेशन से जुड़ी कटौती को खत्म करना शामिल था। पेंशनभोगियों ने कोविड-19 महामारी के दौरान रोके गए 18 महीने के महंगाई भत्ते/महंगाई राहत (DA/DR) के बकाये के भुगतान की भी मांग की है। यह भी मांग की गई कि 50% से अधिक महंगाई भत्ते को मूल पेंशन में मिला दिया जाए। संगठन ने वेतन आयोग की प्रक्रिया में देरी का हवाला देते हुए कर्मचारियों, शिक्षकों और पेंशनभोगियों के लिए अंतरिम राहत की भी मांग की। क्या 8वें वेतन आयोग का पैनल इन मांगों पर विचार करेगा? यह तब पता चलेगा जब 8वां वेतन आयोग केंद्र सरकार को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप देगा। बता दें कि यह 3 सदस्यों वाला आयोग है। यह एक अस्थायी निकाय है। इसकी अध्यक्षता जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। आयोग का गठन 3 नवंबर 2025 को किया गया था और उम्मीद है कि यह गठन के 18 महीनों के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप देगा। ऐसे में 8वें वेतन आयोग की अंतिम रिपोर्ट मई-जून 2027 में पेश किए जाने की उम्मीद है।

मध्य प्रदेश में बारिश की कमी से बढ़ी चिंता, 25 जिलों में सामान्य बरसात; 11 में 80% से भी कम

भोपाल मध्य प्रदेश में इस साल मानसून की बेरुखी से राज्य के आधे हिस्से में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं। प्रदेश के 55 में से 30 जिलों में सामान्य बारिश का कोटा पूरा नहीं हो सका है, जिनमें से 11 जिलों में तो 80 प्रतिशत से भी कम बारिश दर्ज की गई है। इस अनियमित बारिश का सीधा असर फसलों, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है। दरअसल, प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य बारिश का औसत 37.3 इंच है, जबकि इस बार केवल 35.6 इंच (95.4 फीसदी) बारिश दर्ज की गई। यह सामान्य से लगभग 4 प्रतिशत कम है। 5 साल में सबसे सूखा मानसून वर्ष 2022 में सर्वाधिक 46 इंच बारिश हुई थी, जबकि 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच पानी गिरा था। इस बार 35.6 इंच के साथ यह बीते 5 वर्षों की सबसे कम बारिश है। मात्र 0.6 फीसदी की कमी के कारण मध्य प्रदेश सामान्य से कम बारिश वाली श्रेणी में चला गया है।प्रदेश में इस बार 5 साल की तुलना में सबसे कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। साल 2022 में सबसे ज्यादा 46 इंच पानी गिरा था। 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश हुई थी। वहीं इस बार 35.8 इंच पानी ही गिरा है। बता दें कि इस बार मानसून 9 दिन देरी से 24 जून को पहुंचा था और अगले 9 दिन में पूरे प्रदेश को कवर कर लिया। देरी की वजह से प्रदेश में जून में 30 प्रतिशत बारिश कम हुई थी, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में ये आंकड़ा प्लस में 8 प्रतिशत पर आ गया। अगस्त के दूसरे सप्ताह में भारी बारिश का दौर शुरू हो गया, जो आखिरी तक तक जारी रहा। सितंबर के पहले सप्ताह में भारी बारिश का दौर बना रहा। तीसरे सप्ताह पश्चिमी हिस्से में अच्छी बारिश हुई। आखिरी सप्ताह प्रदेशभर में कहीं तेज तो कहीं हल्की बारिश हुई। पश्चिम में कम, पूर्व में ज्यादा बारिश मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से (इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, ग्वालियर-चंबल संभाग) में सामान्य से 12 फीसदी कम बारिश हुई, जबकि पूर्वी हिस्से (जबलपुर, रीवा, सागर, शहडोल संभाग) में 4 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। जून का घाटा नहीं भर पाए जुलाई-सितंबर मानसून ने इस बार 9 दिन की देरी से 24 जून को दस्तक दी थी। जून के महीने में बारिश में 30 फीसदी की भारी कमी दर्ज की गई। जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से अधिक बारिश हुई, लेकिन यह शुरुआती घाटे की भरपाई नहीं कर सकी। जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा बारिश जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा पानी गिरा, लेकिन वह जून की भरपाई नहीं कर सका। लिहाजा, प्रदेश में सामान्य से कम बारिश रिकॉर्ड की गई। मानसूनी पीरियड 30 सितंबर तक 904 मिमी, यानी 35.6 इंच (95.4 प्रतिशत) रिकॉर्ड की गई, जो 'सामान्य बारिश' की कैटेगिरी से नीचे है। IMD (मौसम केंद्र) के मुताबिक, 96 से 104 प्रतिशत बारिश ही 'सामान्य बारिश' की कैटेगिरी में शामिल हैं। यदि 0.6% पानी और गिर जाता तो प्रदेश इस कैटेगिरी में पहुंच जाता, यानी इस बार प्रदेश में 'सामान्य से कम' बारिश दर्ज हुई है। सोयाबीन और गेहूं का उत्पादन घटेगा मालवा सहित इंदौर और नर्मदापुरम में कम बारिश से सोयाबीन उत्पादन प्रभावित होगा। इस साल प्रदेश में 52 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन और कुल 134.31 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बोवनी हुई है। दावा किया जा रहा है कि पश्चिमी हिस्से में पानी की कमी से सोयाबीन का उत्पादन 2 से 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक घट सकता है। वहीं पानी की कमी के कारण आगामी रबी सीजन में गेहूं और चने की बोवनी भी प्रभावित होगी। 19 प्रमुख बांध रीते, पेयजल और बिजली पर खतरा प्रदेश के कुल 54 बड़े बांधों में से 35 बांध 90 फीसदी या उससे अधिक भरे हैं। वहीं 19 बांधों में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत के बीच अटका हुआ है। जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने 90 फीसदी से अधिक भरे बांधों की विशेष निगरानी के निर्देश दिए हैं। वहीं गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, राजघाट और मणिखेड़ा जैसे 5 बड़े जल विद्युत गृहों में जलस्तर कम रहने से हाइड्रो पावर उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। इस बार बारिश का लंबा दौर नहीं रहा मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक कहते हैं- इस बार प्रदेश में बारिश का ट्रेंड बदला हुआ देखने को मिला। कई जिलों में इतनी अतिवृष्टि हुई कि जनजीवन प्रभावित रहा। कई में अनियमित बारिश भी हुई। जैसे कभी तेज बारिश तो कभी लंबा ब्रेक। इस वजह से हालात ठीक नहीं है। पहले 8 से 10 दिन लगातार बारिश होती थी, लेकिन इस बार अधिकतम दो दिन तक ही लगातार पानी गिरा। पहले बंगाल की खाड़ी से डिप्रेशन, लो प्रेशर एरिया (निम्न दाब क्षेत्र) से एक्टिव होते थे और सागर क्षेत्र से होते हुए प्रदेश के कई हिस्सों में गुजरते थे। इससे अति भारी या भारी बारिश होती थी। इस बार सिस्टम इतने मजबूत नहीं रहे। मानसूनी सीजन में भी प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में दिन में गर्म रहे। बारिश के अंतराल की वजह से जमीन सूखने लगी। इस वजह से पानी जमीन के अंदर नहीं उतरा। वर्तमान में तेज धूप है और जमीन सूख रही है। इससे कुछ दिनों के बाद ही भू-जल स्तर नीचे जाने लगेगा। माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत विशेषज्ञ नायक कहते हैं कि जिन जिलों में 20 प्रतिशत या इससे कम पानी गिरा है, वहां पर सरकार को माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत है। जब किसी इलाके में 26 प्रतिशत या उससे कम बारिश होती है तो वह इलाका सूखा घोषित होता है। इस बार सूखे के दायरे में आने वाले कई जिले हैं। यहां पर सरकार सर्वे कराकर पेयजल की स्थिति का आकलन लगाए। शहरों में जल संकट की आशंका भोपाल: सामान्य से 9 फीसदी अधिक (41 इंच से ज्यादा) बारिश दर्ज की गई। बड़ा तालाब, भदभदा और कलियासोत डैम फुल हो चुके हैं, हालांकि केरवा और कोलार में पानी की कमी है। इंदौर: सामान्य से 27 प्रतिशत कम (लगभग 9.5 इंच कम) … Read more

धार में रेल सेवा का इंतजार खत्म होने के करीब, अक्टूबर में होगा अंतिम निरीक्षण; 4 नए स्टेशन जुड़ेंगे

 धार  प्रदेश के धार वासियों को स्वतंत्रता के बाद पहली बार रेल सेवा मिलने जा रही है। पश्चिम रेलवे की इंदौर-दाहोद रेल लाइन परियोजना अब अपने अंतिम दौर में पहुंच गई है। रेलवे सूत्रों के अनुसार कमिश्नर रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) 28 और 29 अक्तूबर  को इस नए 46 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग का अंतिम निरीक्षण करेंगे। इस महत्वपूर्ण निरीक्षण के तुरंत बाद रूट पर नियमित रूप से यात्री ट्रेनों के संचालन को हरी झंडी मिल जाएगी। रेलवे प्रशासन ने आने वाले 25 दिनों में धार तक ट्रेन संचालन से जुड़े सभी शेष कार्यों को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। चार नए स्टेशनों की तैयारी इस नई रेल लाइन के माध्यम से मध्य प्रदेश के चार नए रेलवे स्टेशन भारतीय रेल नेटवर्क से जुड़ेंगे। इनमें पीथमपुर, सागौर, गुणावद और धार रेलवे स्टेशन शामिल हैं। ये चारों स्टेशन पूरी तरह बनकर तैयार हो चुके हैं और यहां फिनिशिंग तथा सिग्नलिंग से संबंधित काम लगभग 97 प्रतिशत तक पूरा कर लिया गया है। टीही से धार के बीच रेल लाइन बिछने के बाद यह सभी स्टेशन आपस में जुड़ जाएंगे। आजादी के बाद पहली बार धार में ट्रेन पहुंचने को लेकर स्थानीय निवासियों में भारी उत्साह देखा जा रहा है। रेलवे सुरक्षा आयुक्त के निरीक्षण के उपरांत रेलवे बोर्ड नई ट्रेनों की समय-सारणी घोषित करेगा।  भोपाल और मुंबई तक कनेक्टिविटी इंदौर-दाहोद रेल लाइन शुरू होने से मालवा का यह पूरा क्षेत्र सीधे राजधानी भोपाल से कनेक्ट हो जाएगा। धार और पीथमपुर के लोग सीधे इंदौर से जुड़ेंगे, साथ ही आने वाले समय में दाहोद लिंक के माध्यम से वे रतलाम, झाबुआ और उज्जैन जैसे धार्मिक एवं व्यावसायिक केंद्रों से आसानी से जुड़ सकेंगे। झाबुआ के रास्ते गुजरात के दाहोद से जुड़ने के कारण मध्य प्रदेश से अहमदाबाद, वडोदरा और मुंबई जाने वाले यात्रियों को एक नया और बहुत छोटा मार्ग मिल जाएगा। इससे यात्रा के समय में करीब दो से तीन घंटे तक की बचत होगी। इसके अलावा मालगाड़ियों को भी आसानी से क्लीयरेंस मिलेगा, जिससे यात्री ट्रेनों की रफ्तार भी सुपरफास्ट हो जाएगी। आधुनिक सुरंग और बिना गिट्टी का ट्रैक इंदौर से गुजरात के दाहोद को जोड़ने वाली इस संपूर्ण रेल परियोजना की कुल लंबाई लगभग 204.76 किलोमीटर है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत पीथमपुर के निकट तीन किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण कार्य पूर्ण कर लिया गया है। टीही टनल की मुख्य विशेषता यह है कि इसका ट्रैक पूरी तरह से बैलास्टलेस बनाया गया है, यानी इसमें गिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सुरक्षा एवं निगरानी के दृष्टिकोण से इस सुरंग के भीतर 140 हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।