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BRICS बनाम NATO: रूस ने अमेरिका को दिया करारा जवाब, वैश्विक ताकत का दावा

मास्को  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में अमेरिका और पश्चिमी देशों के समूह नाटो के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन पर निशाना साधा है। लावरोव ने कहा है कि ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ज्यादातर मामलों में सर्वसम्मति के आधार पर फैसले करते हैं, जबकि नाटो के फैसले अमेरिका पर निर्भर करते हैं। लावरोव ने रूस के एक यूट्यूब चैनल एमपाशिया मनुची प्रोजेक्ट के साथ बातचीत में कहा, “ज्यादातर मामलों में अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन किया जाता है। जब बात हमारे पश्चिमी साथियों की हो तब नहीं, बल्कि जब उन प्रतिनिधियों की होती है जिन्हें हम वैश्विक बहुमत कहते हैं। ब्रिक्स, एससीओ, और सोवियत के बाद वाले सीएसटीओ, ईएईयू, और सीआईएस जैसे समूहों में आम सहमति ज़्यादातर बनी रहती है।” उन्होंने कहा, “ यहां आप नाटो की तरह आसानी से फैसले नहीं ले सकते, जहां अमेरिकी कहते हैं 'चुप रहो' और सबको पता है कि यह सब कैसे काम करता है।” लावरोव ने आगे कहा कि यूरोपीय संघ भी फैसलों पर असर डालता है। यूरोपीय संघ की तरह, जहां ब्रसेल्स में बिना चुने हुए नौकरशाह देश की चुनी हुई सरकारों को बताते हैं कि क्या करना है, कैसे बर्ताव करना है, किसके साथ व्यापार करना है और किसके साथ नहीं करना है। हमारे हंगरी के साथियों ने ब्रसेल्स के हाल के गलत कामों पर साफ और समझने लायक टिप्पणी की है।" बता दें कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने दिसंबर 2025 में कहा था कि यूरोपीय संघ यूक्रेनी संघर्ष को लंबा खींचने के लिए व्यवस्थित तरीके से कानून को रौंद रहा है। उन्होंने कहा कि यूराेपीय संघ में कानून का राज "ब्रसेल्स की तानाशाही" से बदल गया है। इससे पहले ने लावरोव ने रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर प्रतिस्पर्धियों को दबाने के लिए अमेरिका पर 'अनुचित तरीकों' का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया। लावरोव ने एक इंटरव्यू में कहा, ''अमेरिका भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्यों जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ हमारे व्यापार, निवेश सहयोग और सैन्य-तकनीकी संबंधों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।''

पूर्व PM इमरान खान की सेहत पर बड़ा खुलासा, 85% दृष्टि प्रभावित; पाक सुप्रीम कोर्ट के CJP को करनी पड़ी दखल

इस्लामाबाद पाक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इमरान खान के दाहिनी आंख में 'सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन' (CRVO) नामक गंभीर बीमारी का पता चला है, जो समय पर इलाज न मिलने पर स्थाई अंधापन पैदा कर सकती है। इसी वजह से उनकी 85 फीसदी रोशनी चली गई। लंबे समय से जेल में बंद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के हेल्थ अपडेट से पाकिस्तान में हड़कंप मचा हुआ है। पाक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खान की दाहिनी आंख की रोशनी 85 फीसदी खत्म हो चुकी है। उसमें अब सिर्फ 15 फीसदी को रोशनी बची है। डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इमरान खान की आंख की जांच के लिए एक स्पेशल मेडिकल टीम बनाने का आदेश दिया है। यह आदेश कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें PTI फाउंडर ने दावा किया था कि उनकी दाहिनी आंख में “सिर्फ़ 15 फीसदी” रोशनी बची है। SC ने यह भी निर्देश दिया कि इमरान को उनके बच्चों से बात करने की इजाज़त दी जाए। यह आदेश दिया गया कि आंखों की जांच और फोन कॉल दोनों 16 फरवरी (सोमवार) से पहले किए जाएं। SC का यह निर्देश तब आया जब पाकिस्तान के चीफ जस्टिस (CJP) याह्या अफरीदी की अगुवाई वाली और जस्टिस शाहिद बिलाल हसन सहित दो अन्य जजों की बेंच ने PTI संस्थापक के अदियाला जेल में रहने की स्थिति से जुड़े मामले की सुनवाई फिर से शुरू की। खून का थक्का जमने से गई रोशनी कोर्ट में पेश रिपोर्ट में बताया गया कि इमरान खान ने कहा है कि उनकी दाईं आंख की केवल लगभग 15% दृष्टि बची है। रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2025 तक उनकी दोनों आंखों की दृष्टि सामान्य थी, लेकिन बाद में धुंधलापन शुरू हुआ और इलाज में देरी के कारण स्थिति बिगड़ गई। बताया गया कि बाद में डॉक्टरों ने जांच में खून का थक्का (ब्लड क्लॉट) जैसी समस्या की पहचान की और इंजेक्शन सहित इलाज किया गया, लेकिन दृष्टि पूरी तरह वापस नहीं आ सकी। कैदी की सेहत राज्य की जिम्मेदारी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कैदी की सेहत सर्वोच्च प्राथमिकता है और राज्य का दायित्व है कि उसे उचित इलाज मिले। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत सभी कैदियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। कोर्ट ने माना कि परिवार से संपर्क भी महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। इसलिए बच्चों से टेलीफोन पर बातचीत की अनुमति देने के निर्देश दिए गए। सुनवाई के दौरान टॉप जज ने कहा, “हम उनकी (इमरान की) हेल्थ के मामले पर सरकार का स्टैंड जानना चाहते हैं।” इस पर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल (AGP) मंसूर उस्मान अवान ने कन्फर्म किया कि मेडिकल फैसिलिटी देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। AGP अवान ने कहा, “अगर कैदी सैटिस्फाइड नहीं है, तो सरकार कदम उठाएगी।” इस पर CJP अफरीदी ने फिर कहा कि इमरान के “अपने बच्चों के साथ टेलीफोन कॉल का मामला भी जरूरी है”। जेल में इलाज पर उठे सवाल रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इमरान खान ने पहले जेल प्रशासन को आंख की समस्या की शिकायत की थी, लेकिन समय पर विशेष इलाज नहीं मिला। बाद में विशेषज्ञ डॉक्टर बुलाए गए। यह मामला सिर्फ एक कैदी के स्वास्थ्य का नहीं बल्कि जेलों में मेडिकल सुविधाओं, मानवाधिकार और राजनीतिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा माना जा रहा है। इस बीच, इन्फॉर्मेशन मिनिस्टर अताउल्लाह तरार ने कहा कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार द्वारा फैलाई जा रही कहानी रिपोर्ट के सामने “पूरी तरह से गलत साबित हुई है।”

चीन का बढ़ता दखल या कर्ज़ का जाल? पेरू पर मंडराए संकट को लेकर अमेरिका अलर्ट

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने चिंता जताई है कि चीन लातिन अमेरिकी देश पेरू के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर अपना नियंत्रण मजबूत करके उसकी संप्रभुता को नुकसान पहुंचा रहा है। अमेरिकी की यह चेतावनी पेरू की एक अदालत के उस फैसले के बाद आई है जिसमें एक स्थानीय नियामक ने चीन द्वारा बनाए गए विशाल बंदरगाह की निगरानी को सीमित कर दिया है। पेरू की राजधानी लीमा के उत्तर में चांकाय में स्थित 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से स्थापित गहरे पानी का बंदरगाह लातिन अमेरिका में चीन की पकड़ का प्रतीक बन गया है। यह बंदरगाह अमेरिका के साथ तनाव का केंद्र बिंदु भी है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पश्चिमी गोलार्ध मामलों के ब्यूरो ने सोशल मीडिया मंच पर कहा कि वह ''उन नवीनतम खबरों से चिंतित है कि पेरू अपने सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक, चांकाय पर नजर रखने में असहाय हो सकता है, जो लालची चीनी मालिकों के अधिकार क्षेत्र में है।'' अमेरिका ने कहा, ''हम पेरू के उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की देखरेख करने के संप्रभु अधिकार का समर्थन करते हैं। इसे इस क्षेत्र और दुनिया के लिए एक सबक के रूप में लें, सस्ते चीनी ऋण की कीमत संप्रभुता से चुकानी पड़ती है।'' यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब ट्रंप प्रशासन पश्चिमी गोलार्ध पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। वहीं, चीन लंबे समय से बड़े पैमाने पर ऋण और व्यापार के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित कर रहा है। चीन की सरकार ने बृहस्पतिवार को अमेरिकी टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बृहस्पतिवार को अपनी दैनिक प्रेस वार्ता में कहा, ''चीन चांकाय बंदरगाह के बारे में अमेरिका द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों और दुष्प्रचार का कड़ा विरोध करता है और इसकी कड़ी निंदा करता है।''  

सहमति के बाद यू-टर्न? अमेरिका ने क्यों बदलीं ट्रेड डील की शर्तें, MEA का बड़ा बयान

नई दिल्ली भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील की चर्चा इन दिनों सभी जगह है। इस डील की फैक्टशीट पर हाल ही में वाइट हाउस द्वारा कुछ बदलाव किए गए थे। अब इन बदलावों पर जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह संशोधन दोनों देशों की आपसी सहमति के बाद हुए हैं। यह दोनों देशों की साझा समझ को भी प्रदर्शित करते हैं। मीडिया से बात करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मामले पर सरकार का मत सामने रखा। उन्होंने कहा, "दोनों देशों के बीच में पारस्परिक लाभ और व्यापारिक लाभ को ध्यान में रखकर एक अंतरिम समझौते पर सहमति बनी थी। इसे एक संयुक्त बयान के रूप में पेश किया गया था। यही बयान (फैक्टशीट) इस मामले में हमारी समझ का आधार बना हुआ है। अमेरिका की तरफ से इसमें जो भी संशोधन किए गए हैं, वह पूरी तरह से आपसी समझ को प्रदर्शित करते हैं। क्या है पूरा मामला? लंबी बातचीत और कई दौर की मीटिंग के बाद आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच एक समझौते पर मुहर लगी थी। हालांकि, अभी भी इस पर बातचीत जारी है, लेकिन एक संयुक्त बयान जारी कर दिया गया था। यह एक बार 10 फरवरी को फिर चर्चा में आया, जब वाइट हाउस ने इस बयान की फैक्टशीट में बदलाव कर दिया। इस बदलाव के मुताबिक भारत द्वारा जिन अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ कम करने या समाप्त करने की बात पहले कही गई थी, उनमें से कुछ दालों को हटा दिया गया। इस संशोधन के पहले वाइट हाउस की आधिकारिक बेवसाइट पर उपलब्ध बयान के मुताबिक कहा गया था कि भारत सभी प्रकार की औद्योगिक वस्तुओं और अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर से टैरिफ हटाने या कम करने के लिए सहमत हुआ है। इसके अलावा अमेरिका की तरफ से पहले 500 बिलियन डॉलर की खरीद को लेकर भारत के प्रतिबद्ध होने की बात कही गई थी, इसे बाद में संशोधित करके 'इरादा रखता है' वाली बात जोड़ी गई। यानी यह बात भारत के लिए बाध्यकारी न होकर एक आपसी सहमति पर आधारित होगी। भारत और अमेरिका व्यापारिक समझौता ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से लगातार भारत और अमेरिका के बीच में तनाव बना हुआ था। यह तनाव इतना बढ़ गया कि ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को भी खरी-खोटी सुनाना शुरू कर दी। अमेरिकी ट्रंप, प्रशासन द्वारा लगातार बनाए गए दबाव के बाद भी सरकार ने किसानों के हितों को ताक पर नहीं रखा। महीनों की वार्ता के बाद आखिरकार दोनों देश एक समझौते पर पहुंचे। इस समझौते की तरफ सबसे पहले अमेरिकी राजदूत सर्गियो गोर ने इशारा किया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी जानकारी साझा कर दी। इसके बाद भारत सरकार की तरफ से भी इस पर जानकारी साझा की गई।

क्रेडिट कार्ड यूजर्स अलर्ट! RBI करने जा रहा है नियमों में बड़ा बदलाव

नई दिल्ली  भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के दिशा-निर्देशों में बदलाव के लिए ड्राफ्ट जारी किया है। इसका मकसद कवरेज का विस्तार, परिचालन प्रक्रियाओं का सरलीकरण और कृषि क्षेत्र की उभरती जरूरतों का ध्यान रखना है। इस ड्राफ्ट पर आम लोग और अन्य हितधारक छह मार्च 2026 तक टिप्पणियां और सुझाव दे सकते हैं। होने वाले हैं ये बदलाव आरबीआई ने केसीसी लोन की मंजूरी और री-पेमेंट प्रोग्राम में एकरूपता लाने के लिए फसल सत्रों की अवधि को मानकीकृत करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों को 12 माह के चक्र और लंबी अवधि वाली फसलों को 18 माह के चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। लंबी अवधि की फसलों के चक्र के अनुरूप लोन अवधि तय करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की कुल अवधि छह वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। ड्राफ्ट में केसीसी के तहत निकासी सीमा को प्रत्येक फसल सत्र के लिए फसल की अनुमानित लागत के साथ समायोजित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि किसानों को वास्तविक खेती लागत के अनुरूप पर्याप्त लोन मिल सके। इसके अलावा, मिट्टी की जांच, वास्तविक समय में मौसम पूर्वानुमान, जैविक एवं उत्तम कृषि पद्धतियों के सर्टिफिकेशन जैसे तकनीकी खर्चों को भी पात्र मद में शामिल किया गया है। ये खर्च कृषि परिसंपत्तियों के मेंटेनेंस के लिए वर्तमान में स्वीकृत 20 प्रतिशत अतिरिक्त के भीतर रखे जाएंगे। किसान क्रेडिट कार्ड के बारे में बता दें कि किसान क्रेडिट कार्ड सिर्फ सरकारी बैंक ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय ग्रामीण और कुछ निजी बैंकों से भी मिलता है। इस कार्ड के लिए जमीन का मालिक होना जरूरी नहीं, किरायेदार और शेयरफार्मर भी पात्र हैं। इसके लिए जरूरी दस्तावेज में दो पासपोर्ट साइज के फोटो, राजस्व अधिकारियों द्वारा विधिवत प्रमाणित भूमि जोत का प्रमाण, रकबे के साथ फसल पैटर्न (उगाई जाने वाली फसलें) आदि शामिल हैं। शॉर्ट टर्म के लिए कितना लोन किसान क्रेडिट कार्ड योजना, किसानों को उनकी विविध वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त और समय पर लोन प्रोवाइड करने के लिए बनाई गई है। यह किसानों को संस्थागत लोन तक आसान पहुंच प्राप्त करने मदद करती है। इसके जरिए कृषि और फसल के बाद के खर्चों के लिए पैसे की उपलब्धता सुनिश्चित किया जा सकता है। संशोधित ब्याज अनुदान योजना (एमआईएसएस) के तहत किसानों को फसल और संबद्ध गतिविधियों के लिए रियायती शॉर्ट टर्म एग्री लोन प्रोवाइड किया जाता है। योजना में 3 लाख रुपये तक के लोन पर 7 प्रतिशत ब्याज दर है। वहीं, समय पर री-पेमेंट के लिए अतिरिक्त 3 प्रतिशत अनुदान के साथ प्रभावी दर को घटकर 4 प्रतिशत हो जाता है। एमआईएसएस में किसान क्रेडिट कार्ड वाले छोटे किसानों के लिए नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीदों यानी एनडब्ल्यूआर पर फसल के बाद के लोन भी शामिल हैं।  

ढाका-वॉशिंगटन की डील ने बढ़ाई दिल्ली की चिंता? क्षेत्रीय राजनीति में हलचल

नई दिल्ली कपड़ा उद्योग बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इस रीढ़ को सहारा देते हैं भारत समेत सेंट्रल एशिया के कुछ देश. बांग्लादेश कपड़े बनाता है लेकिन इसके लिए कपास (Cotton) भारत सप्लाई करता है, लेकिन अब बांग्लादेश ने इसमें बड़े बदलाव की घोषणा कर दी है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने 9 फरवरी को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता किया था. आज यानी गुरुवार को बांग्लादेश में चुनाव हो रहे हैं और इस चुनाव से ठीक तीन दिन पहले यूनुस सरकार ने अमेरिका से व्यापार समझौता कर लिया. समझौते की वैधता पर कई सवाल खड़े हुए क्योंकि यूनुस सरकार ने समझौते को काफी सीक्रेट रखा और इसका ड्राफ्ट किसी के साथ शेयर नहीं किया गया. अमेरिका के साथ हुए समझौते के तहत बांग्लादेश भारत से कपास की खरीद को धीरे-धीरे कम करने जा रहा है. बांग्लादेश ने घोषणा की है कि भारत की जगह अब अमेरिका से कपास खरीदी जाएगी.   'बांग्लादेश के लिए गेमचेंजर साबित होगा अमेरिका से कपास की खरीद' बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के सूचना सलाहकार शफीकुल आलम ने एक इंटरव्यू में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते को 'गेम चेंजर' बताया. उन्होंने कहा कि इससे बांग्लादेश को अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जो उसके लिए बेहद अहम है. अमेरिका ने बांग्लादेश से व्यापार समझौते के तहत टैरिफ में एक प्रतिशत की कटौती कर उसे 19% कर दिया है. कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देश वस्त्र उद्योग में बांग्लादेश के प्रतिस्पर्धी हैं और इन देशों पर भी अमेरिका ने 19% का ही टैरिफ लगाया है. साथ ही, अमेरिका ने कहा है कि अगर बांग्लादेश अपने कपड़े अमेरिकी कपास या मानव निर्मित फाइबर से बनाता है तो उस पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा यानी बांग्लादेश बिना किसी फीस के उसे अमेरिका में बेच सकेगा. भारत से बड़ी मात्रा में कपास खरीदता है बांग्लादेश बांग्लादेश का वस्त्र उद्योग काफी बड़ा है लेकिन वो कपड़ों के लिए पर्याप्त कपास या जरूरी धागे का उत्पादन नहीं कर पाता. इसके लिए वो भारत और सेंट्रल एशिया के देशों पर निर्भर है. लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद अब उसके सप्लायर्स में अमेरिका शीर्ष के देशों में शामिल हो जाएगा. 2024 में भारत ने बांग्लादेश को 1.6 अरब डॉलर का कपास धागा और लगभग 8.5 करोड़ डॉलर का मानव निर्मित फाइबर धागा बेचा था. इनका बड़ा हिस्सा जमीनी बंदरगाहों के रास्ते भेजा गया. लेकिन 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया. भारत ने शेख हसीना को राजनीतिक शरण दी जिसके बाद से रिश्ते और खराब हुए. इसे देखते हुए 13 अप्रैल 2025 को बांग्लादेश ने जमीनी रास्ते से भारतीय कपास के आयात पर रोक लगा दी. इसके जवाब में भारत ने 16 मई 2025 से बांग्लादेश के रेडीमेड गारमेंट्स समेत कई उत्पादों के जमीनी रास्ते से देश में एंट्री पर रोक लगा दी. बांग्लादेश भारत को सबसे अधिक रेडीमेड गारमेंट्स बेचता है. तनावपूर्ण रिश्तों के बीच बांग्लादेश ने भारत के बजाए अब अमेरिका से कपास खरीदने की योजना बनाई है. अमेरिका बांग्लादेशी कपड़ों का सबसे बड़ा बाजार भी है. ऐसे में बांग्लादेश मान रहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में कपास खरीद को शामिल करना टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए बहुत अच्छा फैसला साबित होगा. ब्रैक यूनिवर्सिटी के प्रमुख अर्थशास्त्री प्रोफेसर सलीम जहान ने द हिंदू से बात करते हुए कहा कि इस समझौते से अमेरिका के कपास उत्पादकों के लिए बांग्लादेश अब आकर्षक जगह बन गया है. हालांकि, उन्होंने कहा कि अमेरिका का कपास भारत और मिस्र के कपास जैसी क्वालिटी वाला होगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है. उन्होंने कहा, 'टेक्सटाइल सेक्टर में कपास की क्वालिटी सबसे ज्यादा मायने रखती है. अगर अमेरिकी कपास स्टैंडर्ड पर खरी नहीं उतरी, तो अमेरिकी खरीदार भी हमारे कपड़े पसंद नहीं करेंगे.' प्रोफेसर जहान ने यह भी कहा कि अमेरिका बांग्लादेश से काफी दूर है और वहां से कपास के आने की वजह से उसका शिपिंग चार्ज काफी बढ़ सकता है जिससे टैरिफ में मिली छूट का फायदा कम हो जाएगा.

‘हिंदू अनुष्ठान रोके जाएं’ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दरगाह मैनेजमेंट को क्या मिला जवाब?

कर्नाटक सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 फरवरी) को कर्नाटक स्थित अलंद लाडले मशाइक दरगाह प्रबंधन की उस अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें जिसमें दरगाह परिसर में हिंदू महाशिवरात्रि पूजा और दूसरे हिंदू रीति-रिवाजों पर रोक लगाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। दरगाह मैनेजमेंट ने भारत के संविधान के आर्टिकल 32 के तहत अर्जी दी थी, जो उन पार्टियों को राहत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की इजाज़त देता है जिनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। दरगाह प्रबंधन याचिका में दावा किया था कि दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने के लिए हर साल रणनीतिक तरीके से पूजा की अनुमति लेने की कोशिश की जा रही है। प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर दरगाह के मूल धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की भी मांग की थी। हालांकि, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी टिप्पणी की थी कि हर मामला सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट लाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि हाई कोर्ट प्रभावी नहीं हैं। जब कल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची के सामने यह मामला आया, तो इस बेंच ने यह भी सवाल उठाया था कि पहले हाई कोर्ट जाने के बजाय आर्टिकल 32 की पिटीशन क्यों फाइल की गई। यह विवाद उस दरगाह से जुड़ा है जो 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से संबंधित मानी जाती है। दरगाह परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग नाम से पहचानी जाने वाली एक संरचना भी मौजूद बताई जाती है। ऐतिहासिक रूप से इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजा-अर्चना करते रहे हैं, हालांकि 2022 में यहां पूजा अधिकार को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। गौरतलब है कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2025 में 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति दी थी, जो भारी सुरक्षा के बीच सम्पन्न हुई थी। इससे पहले भी कोर्ट के आदेश पर सीमित संख्या में पूजा कराई गई थी। दरगाह प्रबंधन का कहना था कि बार-बार अंतरिम आदेश लेकर धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 के खिलाफ हो सकता है। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखना जरूरी माना गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इस मामले में आगे की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला धार्मिक अधिकार, ऐतिहासिक दावों और कानून के संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

हाइपरसोनिक खतरे पर इजरायल की ढाल: डेविड्स स्लिंग से क्या बदलेगा गेम?

इजरायल  इजरायल की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली डेविड्स स्लिंग ने एक बार फिर अपनी शक्ति साबित की है। भविष्य में बढ़ते मिसाइल खतरों, खासकर ईरान जैसे दुश्मनों को ध्यान में रखते हुए, इजरायल ने इस मध्यम दूरी की एयर डिफेंस सिस्टम के कई जटिल और चुनौतीपूर्ण परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। इजरायल ने तैयार कर लिया ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइलों का तोड़, डेविड्स स्लिंग के साथ क्या प्लान? इजरायल की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली डेविड्स स्लिंग ने एक बार फिर अपनी शक्ति साबित की है। भविष्य में बढ़ते मिसाइल खतरों, खासकर ईरान जैसे दुश्मनों को ध्यान में रखते हुए, इजरायल ने इस मध्यम दूरी की एयर डिफेंस सिस्टम के कई जटिल और चुनौतीपूर्ण परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। ये परीक्षण जून 2025 में ईरान के साथ हुए 12 दिनों के युद्ध से सीखे गए महत्वपूर्ण सबकों पर आधारित हैं, जहां डेविड्स स्लिंग ने लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को भी सफलतापूर्वक रोक लिया था। यह प्रणाली इजरायल की बहु-स्तरीय रक्षा ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें आयरन डोम (छोटी दूरी), डेविड्स स्लिंग (मध्यम दूरी) और एरो (लंबी दूरी) शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को बताया कि भविष्य के खतरों के लिए तैयारियों को मजबूत करने के उद्देश्य से इस मध्यम दूरी की एयर डिफेंस प्रणाली के साथ कई उन्नत परीक्षण किए गए। राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स द्वारा विकसित डेविड्स स्लिंग को 40 से 300 किलोमीटर की दूरी तक रॉकेट, बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल, विमान तथा मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी/ड्रोन) को मार गिराने के लिए तैयार किया गया है। इन परीक्षणों के नए चरण की घोषणा ऐसे समय में हुई जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ वार्ता कर रहे थे। यह घटनाक्रम क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच सामने आया है, जहां तेहरान की ओर से संभावित हमले की आशंका जताई जा रही है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये अभ्यास जून 2025 में ईरान के साथ हुए 12 दिवसीय युद्ध से प्राप्त 'परिचालन अनुभवों' पर आधारित थे। इसमें मौजूदा और उभरते खतरों के अनुरूप कई चुनौतीपूर्ण परिदृश्य शामिल किए गए। मंत्रालय ने कहा कि परीक्षणों की सफलता प्रणाली के तकनीकी और परिचालन उन्नयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। युद्ध के दौरान इस प्रणाली ने उच्च प्रदर्शन दिखाया और सफल अवरोधनों से कई जानें बचाईं तथा बड़े नुकसान को टाला। बता दें कि डेविड्स स्लिंग वर्ष 2017 से इजरायल में सक्रिय है और देश की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली का मध्य स्तर बनाती है। इस ढांचे में कम दूरी के लिए आयरन डोम और आयरन बीम शामिल हैं, जबकि लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए शीर्ष स्तर पर एरो-3 प्रणाली तैनात है। डेविड्स स्लिंग के उन्नयन से एरो-3 पर दबाव कम होता है। एरो-3 को इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ने लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का मुकाबला करने के लिए विकसित किया है। जहां डेविड्स स्लिंग की एक मिसाइल दागने की लागत लगभग 10 लाख डॉलर है, वहीं एरो-3 के इस्तेमाल पर 25 लाख डॉलर से अधिक खर्च आ सकता है। हालांकि डेविड्स स्लिंग को मूल रूप से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, लेकिन रक्षा सूत्रों के अनुसार जून 2025 में ईरान के साथ संघर्ष के दौरान इसे तैनात किया गया और इसने लगभग 1500 किलोमीटर दूर से दागी गई कई मिसाइलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया। इससे पहले इसका उपयोग मुख्य रूप से गाजा पट्टी और लेबनान से हमास तथा हिज़बुल्लाह द्वारा दागे गए मध्यम दूरी के रॉकेटों के खिलाफ किया जाता था। सेना के अनुसार, जून के संघर्ष के दौरान तेहरान की ओर से दागी गई लगभग 550 बैलिस्टिक मिसाइलों और 1000 से अधिक ड्रोनों में से करीब 85 प्रतिशत को सफलतापूर्वक मार गिराया गया।

नाबालिग ईसाई बच्ची का अपहरण कर कराया धर्म परिवर्तन? पाकिस्तान में जबरन निकाह पर बवाल

इस्लामाबाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहा। बार-बार ऐसे मामले सामने आते हैं जहां अल्पसंख्यक समुदाय की मासूम बच्चियों का अपहरण कर उनके धर्म को जबरन बदल दिया जाता है और छोटी उम्र में ही जबरदस्ती शादी कर दी जाती है। एक बार फिर ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। ह्यूमन राइट्स फोकस पाकिस्तान (HRFP) ने पाकिस्तान के साहिवाल जिले की तहसील चिचावतनी में 13 वर्षीय ईसाई लड़की सतीश मरियम के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन शादी पर गहरी चिंता जताई है। 11 जनवरी को दर्ज हुआ था मामला रिपोर्ट के अनुसार, 11 जनवरी 2026 को पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 365-बी के तहत एफआईआर दर्ज की गई। आरोप है कि सतीश मरियम का अपहरण 10 और 11 जनवरी की रात के बीच हुआ। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर बशारत मसीह ने बताया कि स्थानीय लोगों ने अली हैदर गुलजार को कुछ अज्ञात साथियों के साथ नाबालिग लड़की को जबरन गाड़ी में ले जाते देखा था। बशारत मसीह ने एचआरएफपी टीम को बताया कि पुलिस ने शिकायत दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू की है, लेकिन अभी तक कोई संतोषजनक प्रगति नहीं हुई है। बताया गया कि यह घटना तब हुई जब सतीश की मां शाहनाज बीबी एड़ी में फ्रैक्चर के कारण चलने-फिरने में असमर्थ थीं। परिवार के अनुसार, सतीश घर के काम के लिए बाहर गई थी, तभी उसे जबरन उठा लिया गया। कानून प्रवर्तन अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाने और कराची में लड़की के होने के दावों के बावजूद, परिवार का आरोप है कि उसे ढूंढने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। 22 जनवरी 2026 को अपहरण के मामले को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के घर में कई व्यक्तियों द्वारा कथित तौर पर घुसपैठ की गई, धमकियां दी गईं और उन्हें डराया-धमकाया गया, जिसके बाद दूसरी एफआईआर दर्ज की गई। इसमें पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 452, 506, 148 और 149 के तहत घर में जबरन घुसने, आपराधिक धमकी और गैरकानूनी जमावड़े से जुड़े आरोप लगाए गए। लड़की ने कबूल कर लिया है इस्लाम रिपोर्ट के अनुसार, मामला तब और गंभीर हो गया जब कथित अपहरणकर्ता ने दावा किया कि नाबालिग लड़की ने इस्लाम कबूल कर लिया है और शादी भी कर ली है। पीड़िता के परिवार का कहना है कि सतीश के बयान दर्ज किए गए थे और 28 जनवरी को चिचावतनी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नूर मोहम्मद दोथर के समक्ष हुई अदालती सुनवाई में अपहरणकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया गया। इसमें माता-पिता को बेटी से मिलने की इजाजत नहीं दी गई और कानूनी जानकारी के बिना कार्यवाही की गई। 3 फरवरी 2026 को एचआरएफपी कार्यालय में बोलते हुए सतीश के माता-पिता ने न्याय की अपनी मांग दोहराई। सतीश की मां शाहनाज बीबी ने कहा कि वह घर पर अकेली है, स्वास्थ्य खराब होने के कारण बेटी की रक्षा नहीं कर पा रही है और लगातार मिल रही धमकियों से परिवार की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं। माता-पिता का कहना है कि सतीश नाबालिग है, इसलिए कानूनी रूप से न तो विवाह की सहमति दे सकती है और न ही धर्म परिवर्तन कर सकती है। सुरक्षा की मांग ह्यूमन राइट्स फोकस पाकिस्तान के अध्यक्ष नवीद वाल्टर ने अल्पसंख्यक नाबालिग लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह से सुरक्षा, पीड़ित परिवारों द्वारा झेली जा रही धमकियों व उत्पीड़न, बिना पूर्ण पारदर्शिता और प्रतिनिधित्व के कानूनी कार्यवाही तथा नाबालिग की सुरक्षा व कल्याण को लेकर गंभीर चिंता जताई है। वहीं, एचआरएफपी अध्यक्ष नवीद वाल्टर ने सतीश मरियम के माता-पिता को उनके दौरे के दौरान आश्वासन दिया कि हम सतीश मरियम और उनके परिवार के साथ पूरी एकजुटता से खड़े हैं। हम संबंधित अधिकारियों से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने, नाबालिग के अधिकारों की रक्षा करने और परिवार को उत्पीड़न व धमकियों से सुरक्षा प्रदान करने की मांग करते हैं।  

बुक लीक कांड: क्या जनरल नरवणे को निशाना बनाया गया? पेंगुइन इंडिया से पूछताछ तेज

नई दिल्ली पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब लीक मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने छानबीन तेज कर दी है। इस सिलसिले में प्रकाशक पेंगुइन इंडिया के प्रतिनिधियों से पूछताछ की गई है। सूत्रों की मानें तो पुलिस 15 सवालों के जवाब जानना चाहती है। स्पेशल सेल तकनीकी सबूतों के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि यह पूरी घटना किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं है। कोई आपराधिक साजिश तो नहीं? पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि स्पेशल सेल की छानबीन अब इस बात पर फोकस है कि क्या पांडुलिपि के कथित लीक के पीछे कोई आपराधिक साजिश तो नहीं थी। हाल ही में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नरवणे की किताब के कथित लीक की जांच में आपराधिक साजिश के आरोप भी जोड़ दिए हैं। 15 सवालों के जवाब चाह रही स्पेशल सेल पुलिस सूत्रों ने बताया कि स्पेशल सेल ने पेंगुइन इंडिया को नोटिस जारी कर 15 अहम सवालों के जवाब मांगे थे। जांच एजेंसी ने कंपनी से पांडुलिपि की हैंडलिंग, डिजिटल और फिजिकल एक्सेस, एडिटिंग प्रक्रिया, प्रिंटिंग से पहले की सुरक्षा व्यवस्था और ड्राफ्ट कॉपी तक किन-किन लोगों की पहुंच थी, जैसे बिंदुओं पर जानकारी तलब की थी। पेंगुइन इंडिया के प्रतिनिधियों से पूछताछ वहीं जांच टीम ने पेंगुइन इंडिया के प्रतिनिधियों से विस्तृत पूछताछ की है। कंपनी के प्रतिनिधि पूछताछ के लिए पेश हुए। उन्होंने कुछ सवालों के जवाब जांच एजेंसी को सौंप दिए हैं। कुछ बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया है। स्पेशल सेल अब पेंगुइन इंडिया द्वारा दिए गए जवाबों और दस्तावेजों का विश्लेषण कर रही है। डिजिटल ट्रेल की भी जांच जांच में इस सवाल का भी जवाब तलाशा जा रहा है कि क्या यह घटना किसी आंतरिक लापरवाही का नतीजा है। इस मामले में किसी की गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस तकनीकी साक्ष्यों और डिजिटल ट्रेल की भी जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। नहीं प्रकाशित की पुस्तक- पेंगुइन इंडिया गौरतलब है कि राहुल गांधी ने लोकसभा में इसके कुछ अंश का जिक्र करते हुए सरकार की घेरेबंदी की थी। इसके बाद पुस्तक को लेकर विवाद बढ़ गया। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने अपने बयान में कहा कि हम स्पष्ट कर रहे हैं कि पुस्तक का प्रकाशन नहीं हुआ है। पुस्तक की कोई भी प्रति प्रिंट या डिजिटल रूप में जनता के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई है। फिर कैसे लीक हो गए बुक के अंश? ऐसे में सवाल उठता है कि जब किताब प्रकाशित नहीं हुई तो इसके अंश आम कैसे हो गए? पुलिस सूत्रों ने बताया कि अप्रकाशित पांडुलिपि कथित तौर पर कैसे प्रसारित हुई? इसके जवाब तलाशे जा रहे हैं।