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BRICS सम्मेलन में भारत का ग्लोबल दम, मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मुलाकात पर दुनिया की नजरें

नई दिल्ली दुनिया बहुत जल्द दिल्ली की धमक देखने वाली है. भारत में ब्रिक्स के मंच से नया वर्ल्ड ऑर्डर दिखेगा. पश्चिम एशिया तनाव के बीच एक ही मंच पर दुनिया की सबसे मजबूत तिकड़ी दिखेगी. जी हां, हम बात कर रहे हैं पीएम मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की. सितंबर महीने में ब्रिक्स समिट होने वाली है. यह ब्रिक्स समिट नई दिल्ली में होगी. इस ब्रिक्स समिट में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी व्लादिमीर पुतिन के शामिल होने की संभावना है. अगर ऐसा होता है तो फिर दुनिया को ब्रिक्स के मंच से नया मैसेज जाएगा. ब्रिक्स के मंच से एक नया गठजोड़ आकार लेगा।  रूसी राष्ट्रपति पुतिन का भारत दौरा कन्फर्म है. खुद रूसी साइड ने भी इसकी घोषणा कि है कि पुतिन सितंबर में ब्रिक्स समिट में शामिल होंगे. अब तक शी जिनपिंग को लेकर कोई ऑफिशियल जानकारी नहीं है. हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस का दावा है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी ब्रिक्स समिट में शामिल होंगे. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं।  शी जिनपिंग आएंगे भारत! सूत्रों की मानें तो रूस और चीन की ओर से नई दिल्ली को सूचित किया गया है कि उनके नेता इस सम्मेलन में आने की संभावना है. रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूसी अधिकारियों ने व्लादिमीर पुतिन की ब्रिक्स समिट में उपस्थिति की पुष्टि की है. वह 31 अगस्त और 1 सितंबर को किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भी शामिल होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी SCO सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है।  क्यों अहम है जिनपिंग का भारत दौरा अगर शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में आते हैं तो यह बड़ी खबर होगी. दुनिया के लिए भी एक मैसेज होगा. अमेरिका के कान खड़े हो जाएंगे. वैसे भी डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स से बहुत जलते हैं. वह ब्रिक्स को मजबूत होता नहीं देखना चाहते. वह ब्रिक्स की ताकत से डरते हैं. वह ब्रिक्स को लेकर काफी जहर उगल चुके हैं. ऐसे में अगर ब्रिक्स के मंच से पीएम मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन की तिकड़ी दिखती है तो पूरी दुनिया में खलबली मचेगी।  अब सुधरने लगे रिश्ते वैसे भी चीन और भारत के जिस तरह से रिश्ते उठा-पटक वाले रहे हैं, ऐसे में शी जिनपिंग का ब्रिक्स समिट में शामिल होना, बड़ी बात होगी. सबसे अधिक चर्चा जिनपिंग के भारत दौरे की ही होगी. शी जिनपिंग का अक्टूबर 2019 के बाद भारत का पहला दौरा होगा. 2019 में जब वह भारत आए थे, तब वह चेन्नई के पास मामल्लापुरम में पीएम मोदी से मिले थे. हालांकि, भारत और चीन के बीच रिश्ते अप्रैल-मई 2020 में सीमा पर गतिरोध शुरू होने के बाद बिगड़ गए थे. गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के बीच दूरी और बढ़ा दी. हालांकि, संबंधों को स्थिर करने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित ब्रिक्स समिट के दौरान हुई थी. तब पीएम मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. उसी समय दोनों पक्षों ने पूर्वी लद्दाख में एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी पूरी करने का फैसला किया था।  भारत-चीन रिश्तों में सुधार     पिछले डेढ़ साल में भारत और चीन ने संबंधों को स्थिर करने में काफी प्रगति की है. इसमें सीधी उड़ानों की बहाली, वीजा जारी करना, चीनी कंपनियों पर लगी पाबंदियों में ढील और कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली शामिल है।      हालांकि, एलएसी पर अभी भी 50,000 से ज्यादा सैनिक तैनात हैं. सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने की प्रक्रिया अब भी जारी है।      पिछले हफ्ते ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी. उसी में चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे की पटकथा लिखी गई है।   

ब्रिक्स समिट में मतभेद, 60 एजेंडों पर सहमति लेकिन ईरान मुद्दे पर विवाद

नई दिल्ली ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेश मंत्रियों के बीच ईरान के मसले को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन सकी। ऐसी स्थिति में साझा बयान जारी नहीं किया गया। इसकी बजाय एक आउटकम स्टेटमेंट ही जारी किया गया है। जानकारी मिली है कि ईरान के मसले पर भले ही ब्रिक्स देशों के बीच कोई आम सहमति नहीं बन सकी, लेकिन कुल 60 एजेंडों पर सभी ने विचार साझा किए। सभी देशों के इन एजेंडों पर एक जैसे विचार रहे। इन एजेंडों में ऊर्जा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, क्लाइमेट ऐक्शन, फाइनेंशियल कनेक्टिविटी आदि शामिल हैं। दिल्ली में आयोजित विदेश मंत्रियों की इस समिट में ईरान के मसले को लेकर मतभेद हो गए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ब्रिक्स देशों से मांग की कि वे बयान में ईरान और इजरायल के हमलों की निंदा करें। उन्होंने कहा कि इन दोनों देशों ने ईरान पर जो हमले किए, वह गलत थे और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ थे। लेकिन ज्यादातर इस पर सहमत नहीं दिखे। इसकी वजह यह है कि भारत समेत ज्यादातर देश चाहते थे कि ईरान के साथ ही अमेरिका और इजरायल के साथ भी संतुलन बनाकर रखा जाए। इसी को लेकर मीटिंग में मतभेद पैदा हो गए और अंत में साझा बयान जारी न करने पर ही सहमति बनी। गुरुवार को इस समिट की शुरुआत हुई थी। अपने शुरुआती भाषण में भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोले जाने की वकालत की थी। उनका कहना था कि समुद्र में संचालन सुरक्षित और निरंतर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी जंग में अंतरराष्ट्रीय सीमा के तहत आने वाले समुद्री क्षेत्र में किसी तरह की बंदी नहीं होनी चाहिए। वहीं ईरान के विदेश मंत्री ने ब्रिक्स देशों से अपील करते हुए कहा कि आप सभी अमेरिका और इजरायल की ओर से हमारे ऊपर हमले की निंदा करें। इस पर सहमति ही नहीं बन पाई। कुछ देश इसके लिए तैयार थे, लेकिन कुछ मुल्कों ने इस पर सहमति नहीं जताई। जयशंकर और अराघची के बीच समिट से इतर क्या हुई बात ब्रिक्स समिट के इतर जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अराघची के बीच बातचीत हुई। इस दौरान दोनों नेताओं ने इजराय और ईरान के बीच चल रही जंग को लेकर बात की। वहीं जयशंकर ने होर्मुज से जहाजों की आवाजाही होने देने की मांग की। एस. जयशंकर ने कहा कि हमने दोनों देशों के हितों को लेकर बात की। हमारी इस बात को लेकर सहमति है कि जरूरी मुद्दों को बातचीत से हल किया जाए। हमारी क्षेत्रीय स्थिरता और हालातों को लेकर भी बात हुई।

गलवान के बाद पहली बार भारत दौरे पर आएंगे जिनपिंग, ब्रिक्स मंच पर बढ़ रही भारत-चीन की निकटता

नई दिल्ली साल 2020 की हिंसक गलवान झड़प के बाद से भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों में जो बर्फ जमी थी, वह अब धीरे-धीरे पिघलती हुई नजर आ रही है। हालिया घटनाक्रमों और कूटनीतिक वार्ताओं से यह लगभग साफ हो गया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत का दौरा करेंगे। 2020 के गलवान विवाद के बाद यह शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा होगी, जो कूटनीतिक लिहाज से एक बहुत बड़ा कदम है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। हाल ही में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में चीन ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को अपना पूर्ण समर्थन देने की बात दोहराई है। भारत और चीन ब्रिक्स (BRICS) तंत्र के तहत अपने आपसी सहयोग को मजबूत करने के लिए लगातार एक-दूसरे के संपर्क में हैं। एक तरफ जहां चीन ने ब्रिक्स समूह की वर्तमान अध्यक्षता के लिए भारत का पूरा समर्थन किया है, वहीं भारत सरकार ने भी इस तंत्र के तहत आयोजित विभिन्न गतिविधियों में चीन द्वारा दिए गए सहयोग की सराहना की है। चीनी विशेष दूत झाई जुन का भारत दौरा पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर आयोजित बैठक में हिस्सा लेने के लिए चीन के विशेष दूत झाई जुन पिछले सप्ताह नई दिल्ली में थे। इस दौरान उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा से मुलाकात की। झाई ने स्पष्ट किया कि दुनिया के दो प्रमुख विकासशील देशों के रूप में, चीन और भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत और संवाद बनाए रखा है। चीन ने की भारत की भूमिका की तारीफ चीनी दूत झाई जुन ने भारत की अध्यक्षता को लेकर सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा- चीन ब्रिक्स की रोटेटिंग (वर्तमान) अध्यक्षता के रूप में भारत द्वारा निभाई जा रही महत्वपूर्ण भूमिका का सम्मान करता है। हमें उम्मीद है कि पश्चिम एशिया के मुद्दे पर होने वाला यह ब्रिक्स परामर्श क्षेत्रीय स्थिति पर एक मजबूत संदेश देगा और इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता लाने में एक रचनात्मक भूमिका निभाएगा। भारत का रुख और नीना मल्होत्रा का बयान चीन द्वारा जारी किए गए एक बयान के अनुसार, भारतीय विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा ने भी ब्रिक्स तंत्र के भीतर चीन की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत क्षेत्रीय तनावों को जल्द से जल्द कम करने और शांति को बढ़ावा देने के लिए चीन सहित सभी ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर काम करने का इच्छुक है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी और राष्ट्रपति का संभावित दौरा ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की आगामी बैठक के लिए चीन के विदेश मंत्री वांग यी के जल्द ही भारत आने की उम्मीद है। यह दौरा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक चर्चाओं को और आगे बढ़ाएगा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम हिस्सा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा है। पिछले साल तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई एक बैठक में शी जिनपिंग ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए चीन के समर्थन का भरोसा दिया था। इस साल के अंत में होने वाले मुख्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए शी जिनपिंग के भारत आने की उम्मीद है। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक सैन्य झड़प के बाद, यह शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा होगी। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए इस दौरे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह खबर इस बात का संकेत देती है कि सीमा पर तनाव के बावजूद, भारत और चीन ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और संवाद का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। कैसे तैयार हुई इस दौरे की जमीन? भारत और चीन के बीच यह कूटनीतिक नरमी अचानक नहीं आई है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सिलसिलेवार तरीके से इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार की गई है। LAC पर गश्त समझौता (अक्टूबर 2024): दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गश्त की बहाली को लेकर एक अहम समझौता हुआ, जिसने तनाव कम करने की दिशा में पहली बड़ी भूमिका निभाई। रूस में मोदी-शी की मुलाकात (अक्टूबर 2024): इस समझौते के तुरंत बाद, रूस के कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच गलवान के बाद पहली औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता हुई। SCO सम्मेलन में न्योता (अगस्त 2025): प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के लिए चीन के तियानजिन गए थे। वहीं पर उन्होंने शी जिनपिंग को 2026 के ब्रिक्स सम्मेलन के लिए भारत आने का औपचारिक निमंत्रण दिया था, जिसे चीनी राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया था। 'ब्रिक्स की आड़ में' रिश्ते सुधारने के क्या मायने हैं? सीधे द्विपक्षीय स्तर पर संबंध सुधारना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। ब्रिक्स जैसा मंच दोनों देशों को एक 'ग्लोबल साउथ' के एजेंडे के तहत बातचीत करने का बहाना देता है। अंतरराष्ट्रीय पटल पर अमेरिका की सख्त व्यापारिक नीतियों और टैरिफ आदि के कारण भारत और चीन दोनों ही अपने क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी धीमी होती अर्थव्यवस्था के बीच चीन भारत जैसे विशाल बाजार से तनाव कम करना चाहता है। वहीं, भारत भी चाहता है कि सीमा पर शांति बनी रहे ताकि वह अपने आंतरिक विकास और वैश्विक कूटनीति पर ध्यान केंद्रित कर सके।

ईरान संकट पर BRICS की प्रतिक्रिया पर बहस तेज, भारत की रणनीति पर टिकी सबकी नजर

नई दिल्ली भारत ने बीते सप्ताह यह स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर ब्रिक्स देशों के बीच साझा रुख तय करना मुश्किल है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस युद्ध को लेकर सदस्य देशों के अलग-अलग विचार हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में कहा था कि ब्रिक्स के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे शामिल हैं, जिसकी वजह से समूह के लिए एक साझा रुख तय करना कठिन हो गया है। हालांकि भारत इस मुद्दे पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है। गौरतलब है कि भारत इस साल इस प्रभावशाली समूह की अध्यक्षता कर रहा है। लभारत, चीन और रूस जैसे देशों वाले इस समूह का हाल के कुछ सालों में ही विस्तार हुआ है और इसमें ईरान और संयुक्त अरब अमीरात समेत कुछ अन्य देशों को शामिल किया गया है। अब ईरान बीते 2 सप्ताह से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है, जिससे समूह और अध्यक्ष भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ब्रिक्स के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में भारत के सामने चुनौती है कि पश्चिम एशिया के इस संघर्ष पर ब्रिक्स का एक साझा रुख कैसे तैयार किया जाए। ब्रिक्स समूह में शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। 2024 में विस्तार कर मिस्र, इथोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया, जबकि 2025 में इंडोनेशिया भी इसमें शामिल हो गया। ब्रिक्स एक प्रभावशाली समूह बनकर उभरा है, जिसमें दुनिया की 11 बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश शामिल हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर बड़ा कद रखने वाला BRICS इस युद्ध पर कोई संयुक्त बयान जारी नहीं कर पाया है। भारत की BRICS अध्यक्षता के सामने चुनौती हालांकि ईरान युद्ध ने भारत की अध्यक्षता को मुश्किल स्थिति में ला दिया है। ईरान ने सीधे भारत से BRICS को सक्रिय करने की अपील की थी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने विदेश मंत्री एस जयशंकर से संपर्क कर अमेरिका और इजरायल के हमलों और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या की निंदा करने के लिए BRICS से बयान जारी करने की मांग की थी। लेकिन अब तक ऐसा कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हुआ है। इससे पहले 2025 में ब्राजील की अध्यक्षता के दौरान BRICS ने 12 दिन चले युद्ध में इजरायल के हमलों की निंदा करते हुए दो बयान जारी किए थे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अध्यक्ष देश के राष्ट्रीय हित समूह की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं। संघर्ष में शामिल कई पक्षों से भारत के करीबी संबंध भारत की स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि उसके इस संघर्ष में शामिल कई देशों से करीबी संबंध हैं। भारत के इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। वहीं संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ ऊर्जा और भारतीय प्रवासी से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं। इसके अलावा अमेरिका के साथ भी संबंध तेजी से मजबूत हो रहे हैं। दूसरी ओर ईरान के साथ भी भारत के लंबे समय से संबंध हैं, जिनमें चाबहार बंदरगाह परियोजना शामिल है, जो भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देने में अहम है। BRICS के विस्तार ने भी सहमति बनाना कठिन कर दिया है। पहले पांच देशों का यह समूह अब 11 सदस्य देशों तक बढ़ चुका है और इनमें कई देशों के हित एक-दूसरे से टकराते हैं। उदाहरण के लिए ईरान के अपने ही BRICS सदस्य देशों यूएई और सऊदी अरब के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं। ऐसे में अध्यक्ष देश के रूप में भारत किसी तरह की जबरन एकता नहीं बना सकता, बल्कि वह केवल सहमति बनने पर उसे मजबूत कर सकता है या मतभेदों को शांत तरीके से संभाल सकता है। युद्ध से BRICS की अर्थव्यवस्थाओं पर असर ईरान ने मार्च की शुरुआत से होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों के जरिए आवाजाही को काफी हद तक प्रभावित कर दिया है। इससे 1000 से अधिक जहाजों को देरी या रास्ता बदलना पड़ा है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। इसके अलावा एलएनजी, उर्वरक, अनाज और कई अन्य वस्तुएं भी इसी मार्ग से गुजरती हैं। युद्ध के कारण तेल और गैस की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है, टैंकरों का किराया बढ़ गया है और कई जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते से गुजरना पड़ रहा है। इससे यात्रा में 10 से 14 दिन की देरी हो रही है और BRICS देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, के लिए लागत बढ़ रही है। संकट के बीच भारत की रणनीति भारत का रुख इस समय आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और तनाव कम करने पर केंद्रित है। भारत BRICS शेरपा चैनल के जरिए सदस्य देशों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है और कूटनीतिक स्तर पर भी संपर्क बनाए हुए है। भारतीय प्रवक्ता ने बीते दिनों कहा है कि भारत ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि इस संघर्ष पर कोई साझा रुख तय किया जा सके।  

BRICS बनाम NATO: रूस ने अमेरिका को दिया करारा जवाब, वैश्विक ताकत का दावा

मास्को  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में अमेरिका और पश्चिमी देशों के समूह नाटो के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन पर निशाना साधा है। लावरोव ने कहा है कि ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ज्यादातर मामलों में सर्वसम्मति के आधार पर फैसले करते हैं, जबकि नाटो के फैसले अमेरिका पर निर्भर करते हैं। लावरोव ने रूस के एक यूट्यूब चैनल एमपाशिया मनुची प्रोजेक्ट के साथ बातचीत में कहा, “ज्यादातर मामलों में अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन किया जाता है। जब बात हमारे पश्चिमी साथियों की हो तब नहीं, बल्कि जब उन प्रतिनिधियों की होती है जिन्हें हम वैश्विक बहुमत कहते हैं। ब्रिक्स, एससीओ, और सोवियत के बाद वाले सीएसटीओ, ईएईयू, और सीआईएस जैसे समूहों में आम सहमति ज़्यादातर बनी रहती है।” उन्होंने कहा, “ यहां आप नाटो की तरह आसानी से फैसले नहीं ले सकते, जहां अमेरिकी कहते हैं 'चुप रहो' और सबको पता है कि यह सब कैसे काम करता है।” लावरोव ने आगे कहा कि यूरोपीय संघ भी फैसलों पर असर डालता है। यूरोपीय संघ की तरह, जहां ब्रसेल्स में बिना चुने हुए नौकरशाह देश की चुनी हुई सरकारों को बताते हैं कि क्या करना है, कैसे बर्ताव करना है, किसके साथ व्यापार करना है और किसके साथ नहीं करना है। हमारे हंगरी के साथियों ने ब्रसेल्स के हाल के गलत कामों पर साफ और समझने लायक टिप्पणी की है।" बता दें कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने दिसंबर 2025 में कहा था कि यूरोपीय संघ यूक्रेनी संघर्ष को लंबा खींचने के लिए व्यवस्थित तरीके से कानून को रौंद रहा है। उन्होंने कहा कि यूराेपीय संघ में कानून का राज "ब्रसेल्स की तानाशाही" से बदल गया है। इससे पहले ने लावरोव ने रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर प्रतिस्पर्धियों को दबाने के लिए अमेरिका पर 'अनुचित तरीकों' का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया। लावरोव ने एक इंटरव्यू में कहा, ''अमेरिका भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्यों जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ हमारे व्यापार, निवेश सहयोग और सैन्य-तकनीकी संबंधों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।''

अमेरिका को बड़ा झटका? भारत-चीन-रूस साथ आए, BRICS का डिजिटल भुगतान मॉडल क्या बदल देगा खेल

नई दिल्ली BRICS देशों की मजबूती हमेशा से ही अमेरिका को परेशान करती रही है। भारत, रूस और चीन की अगुवाई वाली इस समूह पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार निशाना साधा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस समूह का डॉलर को सीधी चुनौती देना। अब ब्रिक्स के सदस्य देश डॉलर का तोड़ लेकर आए हैं जो डोनाल्ड ट्रंप की बेचैनी को और बढ़ा सकती है। BRICS एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहा है जिससे भारत, चीन और रूस जैसे देशों की डिजिटल करेंसियों को इंटीग्रेट किया जाएगा। बता दें कि भारत इस साल होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी रहा है। इस बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर एक नए डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर चर्चा तेज हो गई है। हाल के दिनों में ब्रिक्स की साझा करेंसी को लेकर भी चर्चाएं हुई थीं, लेकिन अब यह स्पष्ट हो हो गया है कि ये समूह नई करेंसी नहीं, बल्कि एक साझा डिजिटल पेमेंट सिस्टम लाने की तैयारी में है। डिजिटल करेंसी को जोड़ने का प्लान रिपोर्ट के मुताबिक इस सिस्टम में भारत के ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। इसमें हर देश अपनी करेंसी पर पूरा कंट्रोल बनाए रखेगा। बदलाव सिर्फ इतना होगा कि इन करेंसी के जरिए आपसी लेनदेन आसान हो जाएगा। इस सिस्टम के जरिए ब्रिक्स देश आपस में होने वाले व्यापार का भुगतान सीधे अपनी डिजिटल करेंसी में कर सकेंगे। इसके लिए ना तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही स्विफ्ट जैसे डॉलर आधारित सिस्टम से होकर भुगतान करना पड़ेगा। भारत की अहम भूमिका भारत इस पूरे मॉडल को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि करेंसी को मिलाने की बजाय सिस्टम को आपस में जोड़ना बेहतर रास्ता है। इसका आधार भारत का खुद का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई है, जिसने देश के अंदर डिजिटल पेमेंट को आसान बनाया है। इसके पीछे एक व्यावहारिक वजह भी है। पहले रूस के साथ व्यापार में रुपये में भुगतान हुआ, लेकिन बाद में रूस के पास इतने रुपये जमा हो गए, जिनका वह ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाया। बहुपक्षीय सिस्टम बनने से ऐसी समस्या से बचा जा सकेगा। काम कैसे करेगा ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम? ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सिस्टम दो अहम तकनीकी आधारों पर काम करेगा। पहला है सेटलमेंट साइकिल। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का भुगतान तुरंत नहीं किया जाएगा। एक तय अवधि में आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा और आखिर में सिर्फ अंतर की रकम का भुगतान होगा। उदाहरण के तौर पर, अगर चीन एक महीने में भारत से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और भारत चीन से 450 अरब रुपये का सामान लेता है, तो सिर्फ 50 अरब रुपये का ही भुगतान करना होगा। इससे पैसों की जरूरत और ट्रांजेक्शन कॉस्ट दोनों कम होंगी। वहीं दूसरा आधार है फॉरेक्स स्वैप लाइन। अगर किसी देश को अस्थायी रूप से दूसरे देश की करेंसी की ज्यादा जरूरत पड़ती है, तो सेंट्रल बैंक आपस में करेंसी बदलकर संतुलन बना सकते हैं। क्यों डॉलर का विकल्प तलाश रहे देश? ब्रिक्स देश काफी अरसे से इस पर विचार कर रहे हैं। रूस को स्विफ्ट सिस्टम से बाहर करने और उसके 300 अरब डॉलर फ्रीज करने देने के बाद कई देश इसे चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं। इससे पहले ईरान, उत्तर कोरिया और क्यूबा पर भी ऐसे कदम उठाए गए थे, लेकिन रूस जैसे बड़े देश के साथ ऐसा होने से डर बढ़ गया। ऐसे में ब्रिक्स का यह डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक बैकअप की तरह काम कर सकता है, ताकि किसी संकट की स्थिति में व्यापार ठप न हो।

BRICS के बैंक NDB में मेंबरशिप के लिए पाकिस्तान ने चीन से सहयोग की अपील की

बीजिंग  आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान अपनी बेचारगी का हवाला देकर भीख मांगने में कसर नहीं छोड़ता। वहीं चीन पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त है। अब पाकिस्तान ने BRICS देशों के बैंक न्यू डिवेलपमेंट बैंक (NDB) की सदस्यता के लिए चीन से गुहार लगाई है। इसके बदले में उसने चीन को ऑफर भी दिया है। पाकिस्तान ने कहा है कि वह चीन की कंपनियों, उद्योगों और खनिजों के क्षेत्र में निवेश के लिए ज्यादा मौके उपलब्ध करवाएगा। शुक्रवार को जारी किए गए आधिकारिक बयान के मुताबिक पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने वॉशिंगटन में चीन के वित्त मेंत्री लियाओ मिन से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने एनडीबी की सदस्यता को लेकर बात की। औरंगजेब ने चीन से कहा कि वह एनडीबी की सदस्यता दिलाने में उसकी मदद करे। उन्होंने कहा कि इसके बदले पाकिस्तान में तकनीक, कृषि, उद्योग और खनिज के क्षेत्र में चीनी निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। बता दें कि ब्रिक्स देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर एनडीबी बनाया है जिसका उद्देश्य इन्फ्रास्ट्रक्चर, सतत पोषणीय विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी फंडिंग उपलब्ध कराना है। विकासशील देशों के विकास में यह बैंक बड़ी भूमिका निभाता है। इसी साल फरवरी में इकोनॉमिक कोऑर्डिनेशन कमेटी ने एनडीबी में 582 मिलियन डॉलर के शेयर्स की खरीद की मंजूरी दी है। फाइनेंस डिवीजन के बयान के मुताबिक इसीसी ने पाकिस्तान की एनडीबी में सदस्यता को मंजूरी दे दी है। पाकिस्तान ने नवंबर 2024 में ब्रिक्स की सदस्यता के लिए भी आवेदन किया था। बताया गया था कि चीन ने इस्लामाबाद को इसके लिए भरोसा दिया था। हालांकि पीएम मोदी से चीनी राष्ट्रपति की मुलाकात के बाद पाकिस्तान की उम्मीदों पर पानी फिर गया। तुर्की को पार्टनर देशों में शामिल किया गया था लेकिन पाकिस्तान को नहीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने कहा था कि वह ब्रिक्स में ज्यादा देशों का स्वागत करने को तैयार है लेकिन फैसले सर्वसम्मति से लिए जाएंगे। पीएम मोदी ने कहा था कि किसी देश को सदस्यता देने से पहले विचार किया जाना चाहिए कि उसमें ब्रिक्स के संस्थापक देशों की राय शामिल हो। बता दें कि ब्रिक्स के संस्थापक देशों में रूस, चीन, भारत और ब्राजील का नाम है।

पुतिन ने ब्रिक्स के एजेंडे से अमेरिका को दिया संकेत, चीन ने भी समर्थन जताया

तियानजिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रविवार को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन के तियानजिन शहर पहुंचे। उन्होंने कहा कि रूस और चीन ने ब्रिक्स देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधा डालने वाले 'भेदभावपूर्ण प्रतिबंधों' के खिलाफ एकजुट रुख अपनाया है। माना जा रहा है कि पुतिन ने चीन की धरती से अमेरिका को संदेश दिया है कि 'भेदभावपूर्ण प्रतिबंधों' के खिलाफ वे एकजुट हैं। पुतिन ने यह बातें चीन की सरकारी समाचार एजेंसी 'शिन्हुआ' से बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि रूस और चीन महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने पर ध्यान दे रहे हैं और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए ब्रिक्स की क्षमता को मजबूत करने के लिए एकजुट हैं। पुतिन ने कहा कि मॉस्को और बीजिंग ब्रिक्स सदस्यों और वैश्विक स्तर पर 'सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधा डालने वाले भेदभावपूर्ण प्रतिबंधों' के खिलाफ साझा रुख अपनाते हैं। पुतिन ने कहा कि रूस और चीन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक में सुधार का समर्थन करते हैं। पुतिन ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स देशों पर 10 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दे रहे हैं। ब्रिक्स एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। सऊदी अरब, ईरान, इथियोपिया, मिस्र, अर्जेंटीना और संयुक्त अरब अमीरात इसके नए सदस्य हैं। पुतिन ने उम्मीद जताई कि तियानजिन में होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन 10-सदस्यीय संगठन को नई गति देगा, समकालीन चुनौतियों और खतरों का सामना करने की इसकी क्षमता को मजबूत करेगा, तथा यूरेशियाई क्षेत्र में एकजुटता को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि इससे अधिक न्यायसंगत बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में मदद मिलेगी। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा, पुतिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वार्ता करेंगे और द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के खिलाफ चीन की जीत की 80वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित परेड में भी शामिल होंगे।  

पीएम मोदी का BRICS समिट में आतंकवाद पर करारा प्रहार, देखते रह गए बाकी देश

जोहान्सबर्ग जोहान्सबर्ग में आयोजित BRICS समिट 2025 में भारत के पहलगाम में हुए हालिया आतंकी हमले का मुद्दा छाया रहा। BRICS के सभी सदस्य देशों ने इस हमले की सख्त निंदा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने का संकल्प दोहराया। रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों ने भी भारत के साथ एकजुटता दिखाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रियो डी जेनेरियो में आयोजित 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को संबोधित किया। पीएम मोदी ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को जमकर लताड़ा है। आतंक को समर्थन देने वालों को मिले सजा : पीएम मोदी पीएम मोदी ने इस मंच से पाकिस्तान का नाम लिए बिना उस पर हमला बोलते हुए कहा, आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है। आतंक को शह और समर्थन देने वालों को सजा मिलनी चाहिए। कोई भी देश या संस्था इस खतरे से अलग नहीं रह सकता। मोदी ने कहा कि पहलगाम में निर्दोष नागरिकों पर किया गया हमला कायरता की निशानी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलता रहेगा और आतंक को जड़ से खत्म करने के लिए हर संभव कदम उठाएगा। पीएम मोदी ने कहा कि हाल ही में पहलगाम में अमानवीय और कायराना आतंकी हमला हुआ. यह मानवता पर हमला था. ब्रिक्स में पीस एंड सिक्योरिटी एंड रिफॉर्म ऑफ ग्लोबल गवर्नेंस सत्र के दौरान पीएम मोदी ने शांति और भाईचारे के प्रति भारत की प्रतिबद्धता जताते हुए पड़ोसी मुल्क पर निशाना साधते हुए कहा कि दोहरे मापदंडों की कोई जगह नहीं है. अगर कोई देश आतंकवाद का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन करता है तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. आतंकियों पर प्रतिबंध लगाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि आतंकवाद का समर्थन या इसकी मौन सहमति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. पीएम मोदी ने सभी देशों से इस पर निर्णायक फैसला लेने को कहा है. उन्होंने कहा कि भारत महात्मा गांधी और गौतम बुद्ध से प्रेरित होकर शांति के मार्ग पर आगे बढ़ता रहेगा. फिर चाहे परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल हो, शांति मानवता के कल्याण के लिए सबसे बेहतरीन मार्ग रहेगा. ब्रिक्स देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की इतना ही नहीं ब्रिक्स समिट में शामिल नेताओं ने भी कड़े शब्दों में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की. इस दौरान आतंकवाद के हर प्रारूप से निपटने, सीमापार आतंकवाद, आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकियों को पनाह देने से निपटने पर प्रतिबद्धता जताई. आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेस नीति बनाने और इसके लिए दोहरे मानदंड को खारिज किया जाना चाहिए. ब्रिक्स देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए संयुक्त बयान जारी किया. इस बयान में कहा गया कि हम 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हैं, जिसमें 26 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लोग घायल हो गए. हम आतंकवाद के लिए जीरो टॉलरेंस अपनाने का आग्रह करते हैं और आतंकवाद से निपटने के लिए दोहरे मापदंडों को खारिज करने का आग्रह करते हैं.