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विपक्ष को बड़ी जीत: महुआ मोइत्रा पर CBI केस धराशायी, नेशनल हेराल्ड के बाद दूसरी सफलता

नई दिल्ली कैश फॉर क्वेरी मामले में महुआ मोइत्रा को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने लोकपाल के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें सीबीआई को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ कथित तौर पर पैसे लेकर प्रश्न पूछने के मामले में आरोपपत्र दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। कैश-फॉर-क्वेरी स्कैम में यह आरोप है कि मोइत्रा ने एक बिजनेसमैन से कैश और गिफ्ट के बदले सदन में सवाल पूछे थे। कोर्ट ने क्या कहा जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने मोइत्रा की याचिका पर आदेश सुनाते हुए कहा, "आदेश रद्द किया जाता है। हमने लोकपाल से अनुरोध किया है कि वे एक महीने के भीतर संबंधित प्रावधानों के अनुसार लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम की धारा 20 के तहत मंजूरी देने पर विचार करें।" मोइत्रा का पक्ष मोइत्रा के वकील ने दलील दी थी कि लोकपाल द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में साफ तौर पर कमी थी। उन्होंने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम की धारा 20(7) का हवाला देते हुए कहा था कि यह ज़रूरी है कि मंजूरी देने से पहले सरकारी कर्मचारियों की राय ली जाए। इस याचिका का CBI ने विरोध किया था, जिसने तर्क दिया था कि मोइत्रा को लोकपाल की कार्यवाही में दस्तावेज़ पेश करने का कोई अधिकार नहीं है और वह केवल टिप्पणी देने की हकदार हैं, मौखिक सुनवाई की भी नहीं। मोइत्रा ने CBI को मंजूरी आदेश के संबंध में कोई भी कदम उठाने से रोकने की भी मांग की है, जिसमें मौजूदा कार्यवाही के दौरान कोई भी चार्जशीट दायर करना शामिल है, लेकिन यह सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता पेश हुए. सुनवाई खत्म होने पर निधेश गुप्ता ने कोर्ट से सीबीआई की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने तब अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था. महुआ मोइत्रा के वकील ने कोर्ट में दलील दी थी कि लोकपाल ने उनकी बातों पर ठीक से गौर किए बिना सीबीआई को चार्जशीट दायर करने की मंजूरी दे दी. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में कहा गया कि सीबीआई को चार्जशीट दायर करने की अनुमति देने का लोकपाल का फैसला गलत है. महुआ मोइत्रा के वकील ने लोकपाल के फैसले को लोकपाल अधिनियम के विपरीत बताया और कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है. हाईकोर्ट ने अब लोकपाल को महुआ  मोइत्रा की दलीलों पर ठीक से विचार कर एक महीने में फैसला लेने के लिए कहा है. क्या था पूरा मामला? यह मामला अक्टूबर 2023 में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें मोइत्रा पर व्यापारी दर्शन हीरानंदानी से नकद और महंगे उपहार लेकर संसद में अडाणी समूह से जुड़े सवाल पूछने का आरोप लगा था. मोइत्रा ने अपना लॉगिन पासवर्ड हीरानंदानी को देने की बात स्वीकार की थी, लेकिन रिश्वत लेने से इनकार किया था. लोकपाल ने शिकायत पर सीबीआई से प्रारंभिक जांच कराई, फिर मार्च 2024 में औपचारिक जांच का आदेश दिया. जून 2025 में सीबीआई ने रिपोर्ट लोकपाल को सौंपी, जिसके बाद मोइत्रा से टिप्पणियां मांगी गईं. अक्टूबर में सुनवाई के बाद लोकपाल की फुल बेंच ने 12 नवंबर 2025 को धारा 20(7)(ए) और 23(1) के तहत चार हफ्ते में चार्जशीट दाखिल करने का आदेश दिया. मोइत्रा ने इसे चुनौती दी और हाईकोर्ट ने 21 नवंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकपाल की भूमिका जांच रिपोर्ट को सिर्फ मंजूरी देने की नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने की है. इस फैसले से सीबीआई की चार्जशीट प्रक्रिया पर रोक लग गई है और लोकपाल को अब कानून के मुताबिक नए सिरे से विचार करना होगा. मोइत्रा पहले दिसंबर 2023 में लोकसभा से निष्कासित हो चुकी हैं, जब एथिक्स कमिटी ने उन्हें अनैतिक आचरण का दोषी पाया था. हालांकि, उन्होंने सभी आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया था.

TikTok के नए मालिकों का खुलासा, अमेरिका में अब बिना पाबंदी ऐप की सुविधा जारी रहेगी

वाशिंगटन  दुनियाभर में फेमस वीडियो ऐप TikTok से जुड़ी बड़ी खबर सामने आ रही है. लंबे समय से बैन की तलवार झेल रहे टिक-टॉक ने आखिरकार घुटने टेक दिए हैं!अब टिकटॉक बिक गया है! अमेरिकी निवेशकों के साथ स्पिन-ऑफ डील साइन हो गई है. कंपनी के सीईओ शाउ जी च्यू के मुताबिक अब अमेरिका में टिक-टॉक एक नई कंपनी के रूप में काम करेगा, जिसका कंट्रोल अमेरिकी हाथों में होगा. इस बड़े बदलाव के बाद अब सोशल मीडिया पर एक ही सवाल तेज हो गया है कि अगर अमेरिका में रास्ता निकल सकता है, तो क्या भारत में भी टिक-टॉक की वापसी संभव है? क्या बाइटडांस का यह समझौता भारत सरकार के कड़े रुख में नरमी ला सकता है? आइए जानते हैं इस यह खबर विस्तार से. TikTok के सीईओ शाउ जी च्यू ने ऐप से बैन हटाने के लिए अमेरिकी निवेशकों के एक ग्रुप के साथ एक डील साइन कर ली है. इस डील के बाद अब अमेरिका में टिक-टॉक के बैन होने का खतरा टलता नजर आ रहा है. क्या है पूरा मामला? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका की ट्रंप सरकार ने जनवरी में एक कानून पारित किया, जिसके तहत टिक-टॉक की मदर कंपन ByteDance को अपना अमेरिकी कारोबार किसी अमेरिकी कंपनी को बेचने या फिर बैन का सामना करने का अल्टीमेटम दिया था. अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन वाली इस नई डील के जरिए टिक-टॉक एक नई अमेरिकी यूनिट के रूप में काम करेगी. सीईओ ने मेमो में क्या कहा? सीईओ शाउ जी च्यू ने इस डील के बाद कर्मचारियों को भेजे एक मैसेज मे कहा है कि हमने एक नए टिक-टॉक यू.एस. जॉइंट वेंचर को लेकर निवेशकों के साथ डील किए हैं. इससे 17 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी नागरिक इस समुदाया का हिस्सा बनें रह सकेंगे. टिकटॉक की इस नई कंपनी में 7 सदस्यों वाला एक बोर्ड होगा जिसके भी ज्यादातर अमेरिकी सदस्य ही होंगे. कंपनी को लेकर हुए जॉइन्ट वेंचर का 50 फीसदी हिस्सा Oracle, Silver Lake और अबू-धाबी बेस्ड MGX के पास रहेगा. वहीं मात्र 30 फीसदी हिस्सा ByteDance के इन्वेस्टर्स के पास और 20 फीसदी हिस्सा TikTok  के मदर कंपनी ByteDance के पास होगा. TikTok को लेकर हुए इस नए जॉइन्ट वेंचर में Oracle एक trusted security partner की भूमिका निभाएगा. सरल शब्दों में कहें तो कंपनी के ऑडिट का काम Oracle के पास रहेगा. यह डील 22 जनवरी को पूरा होने की उम्मीद है. साथ ही अमेरिका की तरफ से राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के चलते बाइटडांस पर अमेरिकी कारोबार बेचने के लिए बनाए जा रहे दबाव का सिलसिला भी समाप्त हो जाएगा. 

रक्षा बजट में बड़ा बढ़ावा, ऑपरेशन सिंदूर के बाद नए ड्रोन, अटैक वेपन और एयर डिफेंस में निवेश

नई दिल्ली भारत की सुरक्षा चुनौतियां दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं. खासकर पड़ोसी देशों से आने वाले खतरों को देखते हुए भारतीय सेना को और मजबूत बनाने की जरूरत है. हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ सख्त और त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम है. इस ऑपरेशन के बाद रक्षा मंत्रालय अगले वित्तीय वर्ष (2026-27) के लिए रक्षा बजट में करीब 20% की बड़ी बढ़ोतरी मांगने की तैयारी कर रहा है. क्या है ऑपरेशन सिंदूर? अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक भयानक आतंकी हमला हुआ था. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने 26 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी. यह हमला सिर्फ सीमा पार से नहीं, बल्कि भारत के अंदर धार्मिक आधार पर नफरत फैलाने की कोशिश था. जवाब में भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया. इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में 9 बड़े आतंकी ठिकानों को सटीक हमलों से तबाह कर दिया. ब्रह्मोस मिसाइलें, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और स्वदेशी ड्रोन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ. पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें भेजीं, लेकिन भारत की मल्टी-लेयर एयर डिफेंस ने उन्हें रोक दिया. यह ऑपरेशन सिर्फ 4-5 दिनों का था, लेकिन इसने भारत की सैन्य ताकत और स्वदेशी हथियारों की विश्वसनीयता दुनिया के सामने दिखा दी. ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया कि भारत अब स्ट्रैटेजिक रेस्ट्रेंट की पुरानी नीति से आगे बढ़ चुका है. अब आतंकवाद के खिलाफ सीधा और तेज जवाब दिया जाएगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नया नॉर्मल कहा है- आतंकियों और उनके समर्थकों में कोई फर्क नहीं किया जाएगा. रक्षा बजट में क्यों बढ़ोतरी की जरूरत? ऑपरेशन सिंदूर से कई सबक मिले…     ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ गया है.     एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत करना जरूरी है.     लंबी दूरी के हमलावर हथियार (स्टैंडऑफ वेपन्स) की कमी महसूस हुई.     तेजी से आधुनिकीकरण (मॉडर्नाइजेशन) और सैन्य तैयारी बढ़ाने की आवश्यकता है. रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में कहा कि भारत का टफ नेबरहुड और लंबी अवधि की सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए बजट में बड़ी बढ़ोतरी चाहिए. उन्होंने उम्मीद जताई कि वित्त मंत्रालय इसका समर्थन करेगा. वर्तमान रक्षा बजट कितना है? वित्तीय वर्ष 2025-26 में रक्षा मंत्रालय को रिकॉर्ड 6.81 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह पिछले साल से करीब 9.5% ज्यादा है. इसमें…     कैपिटल खर्च (नए हथियार और उपकरण खरीदने के लिए): 1.80 लाख करोड़ रुपये.     रेवेन्यू खर्च (वेतन, रखरखाव, ईंधन आदि): करीब 3.12 लाख करोड़ रुपये.     पेंशन: 1.61 लाख करोड़ रुपये.     रिसर्च एंड डेवलपमेंट (DRDO के लिए): 26,817 करोड़ रुपये. इस बजट का बड़ा हिस्सा आत्मनिर्भर भारत अभियान पर खर्च होता है. 75% कैपिटल खर्च स्वदेशी कंपनियों से खरीदारी के लिए रखा जाता है. अगले बजट में क्या हो सकता है? रक्षा मंत्रालय 2026-27 के लिए करीब 20% बढ़ोतरी मांगेगा. अगर यह मंजूर हुई तो बजट 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है. इस पैसे से मुख्य फोकस इन क्षेत्रों पर होगा…     नए ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम: हमलावर ड्रोन (कामिकाज़ ड्रोन) और सर्विलांस ड्रोन खरीदे जाएंगे. पाकिस्तानी ड्रोन हमलों से सबक लेते हुए एंटी-ड्रोन तकनीक (जैसे भार्गवास्त्र सिस्टम) को बढ़ावा.     एयर डिफेंस सिस्टम: आकाश, S-400 जैसी सिस्टम की और यूनिट्स. मल्टी-लेयर डिफेंस को पूरे देश में फैलाना, खासकर सीमावर्ती इलाकों में.     हमलावर हथियार (अटैक वेपन्स): लंबी दूरी की मिसाइलें (ब्रह्मोस की और रेंज वाली). स्टैंडऑफ वेपन्स – जो दूर से ही दुश्मन को निशाना बना सकें. नए फाइटर जेट, हेलिकॉप्टर और तोपें.     स्वदेशी उत्पादन और R&D: आत्मनिर्भर भारत को तेज करना. निजी कंपनियों और MSMEs को ज्यादा फंडिंग. DRDO और निजी सेक्टर के साथ मिलकर नई तकनीकें विकसित करना.     सीमाः सड़कें, पुल, एयरबेस और लॉजिस्टिक्स को मजबूत करना. क्यों जरूरी है यह बढ़ोतरी? भारत की 17% विश्व जनसंख्या की रक्षा के लिए सिर्फ 3% वैश्विक रक्षा खर्च करता है (चीन 12% करता है). ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि स्वदेशी हथियार कितने प्रभावी हैं, लेकिन और निवेश की जरूरत है ताकि सेना हमेशा तैयार रहे. यह बढ़ोतरी न सिर्फ सुरक्षा बढ़ाएगी, बल्कि रोजगार पैदा करेगी और भारतीय कंपनियों को मजबूत बनाएगी. ऑपरेशन सिंदूर भारत की नई रक्षा नीति का प्रतीक है – मजबूत, आत्मनिर्भर और त्वरित जवाब देने वाली. आने वाला रक्षा बजट इस दिशा में एक बड़ा कदम होगा. भारत अब सिर्फ जवाब नहीं देता, बल्कि खतरे को जड़ से खत्म करने की तैयारी करता है.

इल्तिजा मुफ्ती ने नीतीश कुमार के खिलाफ उठाया कड़ा कदम, बढ़ सकती हैं बिहार CM की परेशानियां

श्रीनगर महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा ने बिहार के CM नीतीश कुमार के खिलाफ श्रीनगर में केस (FIR) फाइल किया है। PDP नेता और JK असेंबली के सदस्य वहीद पारा, आगा सैयद मुंतज़िर मेहदी और मोहित भान उनके साथ थे। इल्तिजा ने नीतीश की “औरतों से नफरत करने वाली सोच” की आलोचना की और चुप्पी के बाद उमर अब्दुल्ला द्वारा उनका “बचाव” करने पर सवाल उठाया। इल्तिजा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री नितीश कुमार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि "बेहद शर्मनाक है कि जब एक मुस्लिम महिला का नकाब सरेआम खींचा गया। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए नहीं बल्कि उस हर महिला की है जो सार्वजनिक स्थानों पर खुद को असुरक्षित महसूस करती है।

संसद ने मनरेगा खत्म करने वाले बिल को दी मंजूरी, वीबी जी राम जी कानून की राह आसान

नई दिल्ली संसद ने गुरुवार को विपक्ष के तीव्र विरोध और हंगामे के बीच विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड अजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी ) बिल पारित कर दिया. यह बिल 20 साल पुरानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह लेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में हर साल 125 दिनों की रोजगार की गारंटी देगा. राज्यसभा ने बिल को ध्वनि मत से पास किया. गुरुवार को ही दिन में लोकसभा ने भी इसे मंजूरी दी थी. विपक्ष ने बिल के पारित होने के दौरान जोरदार हंगामा किया. विपक्ष का कहना है कि मौजूदा योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाकर सरकार उनकी स्मृति का अपमान कर रही है और राज्यों पर वित्तीय बोझ डाल रही है.राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों ने बिल वापस लेने की मांग की और सरकार के खिलाफ नारे लगाए. कई सदस्यों ने बिल की प्रतियां फाड़ दीं, जिस पर सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उन्हें ट्रेजरी बेंच की ओर न जाने की चेतावनी दी. हंगामे के बाद विपक्षी सदस्यों ने वॉकआउट किया और संसद परिसर में संविधान सदन के बाहर धरने पर बैठ गए. उन्होंने देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है. पूरी रात धरने पर बैठे टीएमसी सांसद तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने संविधान सदन की सीढ़ियों पर 12 घंटे का धरना देने का फैसला किया. विपक्ष ने बिल को संसदीय समिति के पास भेजने की भी मांग की थी. राज्यसभा में पांच घंटे की चर्चा के जवाब में ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बिल का जोरदार बचाव किया. उन्होंने कहा कि यह बिल ग्रामीण भारत के विकास और रोजगार अवसरों के लिए जरूरी है. चौहान ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने महात्मा गांधी के आदर्शों की कई बार हत्या की और उनके नाम का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया. मंत्री ने कहा कि यूपीए शासन में मनरेगा भ्रष्टाचार से ग्रस्त थी और सामग्री खरीद पर अपेक्षित धन खर्च नहीं हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना विकसित भारत बनाने का है, जिसमें गांवों का विकास अहम है. उन्होंने विपक्ष के हंगामे को लोकतंत्र का अपमान करार दिया और कहा कि सदन दादागिरी से नहीं चलेगा. चौहान ने दावा किया कि भाजपा ने गांधीजी को अपना आदर्श बनाया है और उनकी सामाजिक-आर्थिक विचारधारा को अपनाया है. लोकसभा में 8 घंटे चली चर्चा लोकसभा में भी आठ घंटे की चर्चा के दौरान विपक्ष ने कागज फाड़े और नारे लगाए. चौहान ने कहा कि मनरेगा अब पुरानी हो चुकी है और अब स्थायी संपत्तियां बनाने, जल संरक्षण, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और मौसम संबंधी कार्यों पर 10-11 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की जरूरत है. अब यह बिल राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सरकार इसे नोटिफाई करेगी और यह कानून बन जाएगा. बताया जा रहा है कि सरकार फरवरी में बजट सत्र से पहले इसे कानूनी शक्ल देना चाहती थी ताकि नए बजट में इस मद में धन राशि आवंटित की जा सके. बिल पर चर्चा के दौरान जमकर हंगामा इससे पहले  सदन में उक्त विधेयक पर देर रात तक चर्चा हुई और विपक्ष के अधिकतर सदस्यों ने इसे विभाग संबंधी संसदीय स्थायी समिति को विचार-विमर्श के लिए भेजने की मांग की। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने गुरुवार को केंद्रीय मंत्री के जवाब से पहले यह मांग फिर से उठाई जिसे आसन की ओर से अस्वीकार कर दिया गया। सदन पर उछाले गए कागज, फाड़ी गई बिल की कॉपी? इसके बाद विपक्षी सदस्यों की नारेबाजी के बीच शिवराज सिंहचौहान ने अपना जवाब पूरा किया। हालांकि, उनके उत्तर के बाद सदन ने विपक्ष के कुछ सदस्यों के संशोधनों को खारिज करते हुए ‘विकसित भारत-जी राम जी विधेयक, 2025’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस दौरान आसन के समीप हंगामा कर रहे कुछ विपक्षी सदस्यों ने मंत्री के सामने कागज भी उछाले। फैसले में सिविल अपीलों को मंजूर करते हुए शैला की पार्टिशन सूट को खारिज कर दिया गया. मामला केरल का है, जहां श्रीधरन की मौत के बाद 1990 में भाई-बहनों ने इंजेक्शन सूट दाखिल किया था और वसीयत की कॉपी पेश की थी. शैला ने उसमें हिस्सा नहीं लिया, जिसे कोर्ट ने बाद में उनके खिलाफ माना. वोट के कारण कांग्रेस को बापू याद आए- शिवराज उन्होंने कहा कि मनरेगा के नाम में पहले महात्मा गांधी का नाम नहीं था और इसका नाम नरेगा था, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले वोटों के कारण कांग्रेस को बापू याद आ गए और उनका नाम जोड़ा गया। चौहान ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नीत सरकार ने मनरेगा को भी ताकत के साथ लागू नहीं किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सही से क्रियानवित किया। यूपीए और एनडीए सरकार की तुलना उन्होंने संप्रग और राजग सरकार के समय इस योजना के क्रियान्वयन की तुलना करते हुए कहा कि कांग्रेस के समय जहां 1660 करोड़ श्रम दिवस सृजित हुए थे, वहीं मोदी सरकार में 3210 करोड़ श्रम दिवस का सृजन किया गया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार से पहले इस योजना में महिलाओं की भागीदारी 48 प्रतिशत थी, जो इस सरकार के समय 56.73 प्रतिशत हो गई। 'कांग्रेस ने किया गांधी का नाम चुराने का पाप' केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने तो गांधी का नाम चुराने का पाप किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने सदन में कहा कि यह सरकार ‘सनक’ में नाम बदल रही है। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हम सनक में नाम नहीं बदल रहे, अपने परिवार के लोगों पर नाम रखने की सनक तो कांग्रेस की है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की सरकारों के समय सैकड़ों योजनाओं, इमारतों, उत्सवों, संस्थानों आदि के नाम गांधी परिवार के सदस्यों- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर रखे गए थे। कांग्रेस पर जमकर बरसे केंद्रीय मंत्री केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस महात्मा गांधी का नाम लेकर ‘ढोंग’ कर रही है और उसने तो देश के बंटवारे के दिन, कश्मीर को विशेष दर्जा दिये जाने के साथ, इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाये जाने के दिन ही ‘‘बापू के आदर्शों की हत्या कर दी थी। उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि इन्होंने बापू के आदर्शों को मारने का काम किया, मोदी … Read more

एक दिन में बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थियों को ईरान-पाकिस्तान द्वारा वापस भेजा गया

काबुल  ईरान और पाकिस्तान से एक ही दिन में 5,500 से अधिक अफगान शरणार्थियों को जबरन अफगानिस्तान वापस भेजा गया। यह जानकारी तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने  दी। प्रवासियों से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए गठित उच्च आयोग की रिपोर्ट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा करते हुए तालिबान के उप प्रवक्ता मुल्ला हमदुल्लाह फ़ित्रत ने बताया कि बुधवार को कुल 863 परिवारों के 5,591 लोग अफगानिस्तान लौटे। यह जानकारी पज्हवोक अफगान न्यूज ने दी। उन्होंने बताया कि लौटने वाले शरणार्थी हेरात के इस्लाम क़िला बॉर्डर, हेलमंद के बह्रमचा, निमरोज़ के पुल-ए-अब्रेशम, नंगरहार के तोरखम और कंधार के स्पिन बोल्डक सीमा मार्गों से देश में दाखिल हुए। फ़ित्रत के अनुसार, 1,311 परिवारों के 7,165 लोगों को उनके संबंधित इलाकों में भेजा गया, जबकि 849 परिवारों को मानवीय सहायता प्रदान की गई। इसके अलावा, दूरसंचार कंपनियों ने हाल ही में लौटे शरणार्थियों को 937 सिम कार्ड भी उपलब्ध कराए। उन्होंने यह भी बताया कि  ईरान और पाकिस्तान से 3,005 अफगान शरणार्थियों को जबरन निर्वासित किया गया था।इस बीच, ईरान और पाकिस्तान से अफगान शरणार्थियों के निर्वासन का सिलसिला जारी है। काबुल के एक प्रवासी शिविर में रह रहे कई लौटे हुए शरणार्थियों ने पाकिस्तानी पुलिस द्वारा कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है और कहा है कि उनकी सारी संपत्ति वहीं छूट गई। अफगानिस्तान के टोलो न्यूज के अनुसार, पिछले सप्ताह लौटे शरणार्थियों ने तत्काल आश्रय, भूमि, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसरों की मांग उठाई थी। पाकिस्तान से निर्वासित जमालुद्दीन ने टोलो न्यूज से कहा, “हमें जबरन निकाल दिया गया। हमारी कुछ संपत्ति वहीं रह गई। यहां न पैसा है, न रहने की जगह। सर्दी बढ़ रही है और हालात बेहद कठिन हैं।” एक अन्य निर्वासित गुलज़ार ने कहा, “हमें बाहर निकाल दिया गया। वह देश हमारे लिए पराया था। अब हम अपने वतन लौटे हैं और इस्लामिक अमीरात से मदद की अपील करते हैं।” कई लौटे हुए शरणार्थियों ने कहा कि पाकिस्तान में उनकी सारी संपत्ति नष्ट या छूट गई और उन्होंने तालिबान से आश्रय, आपात सहायता और रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की। ईरान से लौटे जन मोहम्मद ने कहा, “इस्लामिक अमीरात को इन लोगों की मदद करनी चाहिए। उनके पास रहने की कोई जगह नहीं है। मैं खुद जौज़जान प्रांत जा रहा हूं, लेकिन वहां भी ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है।”

शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद ढाका में पत्रकारों पर हमला, ‘द डेली स्टार’ और ‘प्रथम आलो’ के दफ्तर में आग लगाई गई

ढाका  बांग्लादेश में उस्मान हादी की मौत के बाद दंगाइयों ने आधी रात वहां के मीडिया प्रतिष्ठानों के दफ्तर में जमकर धमाल मचाया. दंगाइयों ने बांग्लादेश के अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द डेली स्टार' के दफ्तर को आग लगा दी, इस दौरान बिल्डिंग के छत पर दर्जनों पत्रकार तीन घंटे तक फंसे रहे. ये इन पत्रकारों के लिए मौत से होकर गुजरने का अनुभव था.  'द डेली स्टार' का ऑफिस अब पूरी तरह से जल चुका है. बलवाइयों ने बांग्लादेश के दूसरे अखबार प्रथम आलो के दफ्तर को भी जला दिया है.  यह हमला अखबार के कारवान बाज़ार ऑफिस में हुआ, जिसके बाद पास की प्रोथोम आलो बिल्डिंग में तोड़फोड़ और आगजनी हुई. एक पत्रकार के मुताबिक बाहर से एक फोन कॉल आया जिसने स्टाफ को चेतावनी दी कि भीड़ द डेली स्टार के परिसर की ओर बढ़ रही है.  9वीं मंजिल पर फंसे 28 पत्रकार, नीचे सुलगती आग न्यूज़रूम में मौजूद स्टाफ ने शुरू में नीचे जाने की कोशिश की, लेकिन तब तक एक भीड़ बिल्डिंग की निचली मंजिलों पर पहुंच चुकी थी, उन्होंने यहां तोड़फोड़ शुरू कर दी और बाद में उसके कुछ हिस्सों में आग लगा दी.  'द डेली स्टार' में हिंसा की पूरी रिपोर्ट बांग्लादेश की वेबसाइट बीडीन्यूज24 में छपी है. रिपोर्ट के अनुसार जब प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस के निचले हिस्से में आग लगा दी तो वहां से धुएं का गुबार निकल पड़ा. इस वजह से पत्रकार बाहर नहीं निकल पाए.  इसके बाद पत्रकारों का एक ग्रुप 9वीं मंजिल की छत पर चला गया. पत्रकार ने बताया कि वहां 28 लोग थे.  कुछ देर बाद बिल्डिंग का एक कैंटीन वर्कर बाहर की आग बुझाने वाली सीढ़ी का इस्तेमाल करके नीचे उतरा. जमीन पर पहुंचते ही भीड़ ने उसे पकड़ लिया और पीटा. इस घटना के बाद किसी और ने सीढ़ी का इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की.  बाद में फायर फाइटर्स आए और निचली मंजिलों पर लगी आग को काबू में किया. इसके बाद फायर सर्विस के चार लोग फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए छत पर गए. हालांकि, नीचे तोड़फोड़ जारी रहने के कारण पत्रकार नीचे आना नहीं चाह रहे थे. वहीं नीचे बिल्डिंग में आग भी लगी हुई थी. इस दौर में इन पत्रकारों ने ऊपर रहना ही मुनासिब समझा. और छत का दरवाज़ा बंद कर दिया गया.  दंगाइयों ने की ऊपर चढ़ने की कोशिश फायर सर्विस के स्टाफ ने उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश की, इन लोगों ने पत्रकारों से कहा कि आर्मी के जवान बिल्डिंग के बाहर मौजूद हैं. लेकिन जब कई हमलावर छत पर आ गए और दरवाजा पीटने लगे तो फिर से घबराहट फैल गई. छत पर मौजूद फायर फाइटर्स भी घबरा गए.  इस दौरान पत्रकारों ने मदद का इंतजार करते हुए छत पर रखे गमलों से दरवाजे को बंद करने की कोशिश की. बाद में एडिटर्स काउंसिल के प्रेसिडेंट और न्यू एज के एडिटर नूरुल कबीर, फोटोग्राफर शाहिदुल आलम के साथ भीड़ को शांत करने की कोशिश में बिल्डिंग के सामने गए. बाद में नूरुल कबीर के साथ बदसलूकी की गई. पत्रकारों के अनुसार बाद में सैनिकों ने सीढ़ियों के एक तरफ से रास्ता दिया, जिसका इस्तेमाल हमलावरों ने बिल्डिंग में घुसने और तोड़फोड़ और लूटपाट जारी रखने के लिए किया.  हम खुशकिस्मत थे… इस दौरान छत पर और बिल्डिंग के अंदर फंसे डेली स्टार के स्टाफ को फायर-एग्जिट सीढ़ियों से नीचे उतारा गया और बिल्डिंग के पीछे के रास्ते से बाहर निकाला गया. एक पत्रकार ने कहा, "हम खुशकिस्मत थे. हम एक बड़ी आपदा से बच गए. मुझे नहीं पता कि देश किस दिशा में जा रहा है."इस घटना के बाद 'द डेली स्टार' का न्यूज रूम जल गया है और इस ग्रुप ने फिलहाल अखबारों का फिजिकल और ऑनलाइन प्रकाशन बंद करने का फैसला किया है. इधर उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश के मुख्य प्रशासक मोहम्मद यूनुस ने रात को देश को संबोधित किया.  मोहम्मद यूनुस ने कहा, "इस क्रूर हत्या में शामिल सभी अपराधियों को जल्द से जल्द न्याय के कठघरे में लाया जाएगा और उन्हें अधिकतम सजा दिलाई जाएगी. इस मामले में कोई नरमी नहीं बरती जाएगी." यूनुस ने कहा, "मैं एक बार फिर स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि उस्मान हादी पराजित ताकतों, फासीवादी आतंकवादियों के दुश्मन थे. उनकी आवाज को दबाने और क्रांतिकारियों को डराने का नापाक प्रयास पूरी तरह विफल किया जाएगा. कोई भी डर, आतंक या खूनखराबे के ज़रिए इस देश की लोकतांत्रिक प्रगति को नहीं रोका जा सकता." बता दें कि 12 दिसंबर को इंकलाब मंच के नेता उस्मान हादी को अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी थी. इसके बाद बेहतर इलाज के लिए उसे सिंगापुर ले जाया गया था. जहां उसकी मौत हो गई. 

PF पर संकट? बड़े खर्चों में अब किस पर भरोसा करेंगे लोग

 नई दिल्ली हमारे देश में अधिकतर लोग रिटायरमेंट फंड को लेकर गंभीर नहीं हैं. पेंशन की व्यवस्था पर ज्यादातर नौकरी-पेशा लोग तो चर्चा ही नहीं करते, क्योंकि वो इसके प्रत‍ि न तो जागरुक है और न ही उन्हें इसकी पूरी जानकारी है. इसे आप पढ़े-लिखे लोगों की समस्या कहें या मजबूरी, लेकिन सच यही है. रिटायरमेंट फंड और पेंशन को लेकर सबसे ज्यादा उदासीनता तो प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों में है. दरअसल, प्राइवेट नौकरी वालों के लिए PF का अमाउंट एक बड़ा सहारा होता है. छोटी-छोटी राशि हर महीने जुड़कर एक बड़ा फंड बन जाता है. प्राइवेट जॉब करने वालों के ल‍िए तो उनके लिए PF का पैसा मुसीबत का साथी होता है. नौकरी छूट गई तो PF के पैसे से आर्थिक चुनौतियां थोड़ी कम हो जाती हैं. परिवार में कोई बीमार है, कर्ज लेने से अच्छा है कि PF का पैसा निकालकर इलाज करवा लेते हैं. बच्चों की पढ़ाई या शादी में पैसे कम पड़ रहे हैं, तो PF अकाउंट से निकाल लेते हैं. घर खरीदना है, पीएफ खाते में वर्षों से पड़ी जमापूंजी को निकाल लेते हैं. देश में अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए PF के पैसे मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा इन्हीं कामों में इस्तेमाल हो रहे हैं. यहां गौरतलब है क‍ि देश में जब सबसे अधिक लोग प्राइवेट जॉब करते हैं. PF में बड़े बदलाव की तैयारी आज PF राशि पर चर्चा का मूल कारण सरकार का नया कदम है. सरकार कह रही है कि चंद महीने के बाद से आप चुटकी में पीएफ फंड को निकाल सकते हैं, प्रक्रिया आसान हो जाएगी. EPFO खातों को UPI और ATM से लिंक कर दिया जाएगा. ये सबकुछ मार्च-2026 तक पूरा होने का दावा किया जा रहा है. PF निकासी प्रक्रिया को आसान बनाना अच्छी बात है. क्योंकि लोगों को अभी भी PF अमाउंट निकालने में परेशानी होती है. सरकार का कहना है कि जिस तरह से लोग अपने बैंक खाते से पैसे निकाले हैं, ठीक उसी तरह की व्यवस्था PF फंड को निकालने के लिए कर दी जाएगी, इसपर काम तेजी से चल रहा है.  यानी डिजिटल युग में PF खाते से पैसे निकालना तो बेहद आसान हो जाएगा, लेकिन इसका एक बड़ा साइड इफेक्ट भी द‍िखना तय है. लोगों की बचत पर ग्रहण लगने वाला है. जब मन करे PF अकाउंट से फंड निकालने की सुविधा मिल जाएगी तो जरा सोचिए- फिर कितने और कौन लोग होंगे, जो PF खातों में वर्षों तक राशि बचाकर रखेंगे. छोटी-छोटी जरूरतों पर लोग ATM पहुंच जाएंगे. ऐसे में PF अमाउंट कितने दिन तक अकाउंट में टिका रहेगा, ये बड़ा सवाल है? घर खरीदना, बीमारी, पढ़ाई या शादी जैसे मौकों पर जो PF फंड आज सहारा बन जाता है, भविष्य में ये व‍िकल्प आपके पास नहीं रहेगा.  फिर सेविंग को लेकर क्या विकल्प? तुरंत PF निकासी की सुविधा लागू होते ही कोई भी अपने आपको PF अमाउंट निकालने में सहज पाएगा. चाहे, जिनके पीएफ अकाउंट में 10 लाख रुपये जमा हो या फिर 10 हजार. मोबाइल खरीदना और शॉपिंग जैसे काम के लिए भी लोग बेधड़क PF से पैसे निकालने लग जाएंगे. आदत इतनी बिगड़ सकती है कि सैलरी की तरह ही जैसे ही हर महीने PF अकाउंट में अमाउंट डिपॉजिट होगी, चंद दिन के बाद खुद जाकर निकाल लिया करेंगे.  वैसे ही देश में रिटायरमेंट फंड को लेकर लोग जागरूक नहीं हैं. भले ही आज निकासी प्रोसेस में समस्या की वजह से लोग PF फंड नहीं निकाल पा रहे हैं, लेकिन इसी आड़ में मोटा अमाउंट जमा हो जा रहा है. तुरंत PF फंड निकासी की सुविधा से भले ही कोई 20 साल तक नौकरी कर लेगा, परंतु अधिकतर लोगों के EPFO खाते में जमापूंजी के नाम पर चंद रुपये बचेंगे, क्योंकि वो तो समय-समय पर UPI और ATM का लाभ लेकर PF के पैसे को निकाले जा चुके होंगे. अब कुछ आंकड़ों को देखते हैं, जिससे आपको पता चल जाएगा कि कैसे बचत पर ग्रहण लगने वाला है. नियम के मुताबिक, कर्मचारी और नियोक्ता, दोनों ही कर्मचारी के मूल वेतन का 12% पीएफ में योगदान करते हैं. जिसमें कुछ कुछ हिस्सा पेंशन फंड (EPS) में जाता है. वित्त वर्ष 2023-24 में EPFO के सदस्य 7.37 करोड़ थे, यानी मौजूदा समय में 8 करोड़ के आसपास लोग EPFO से जुड़े हैं. EPFO का कुल PF कॉर्पस (FY25) में करीब 25 लाख करोड़ रुपये है, जो कि भारत की सबसे बड़ी रिटायरमेंट सेविंग फंड में से एक है. यह राशि साल-दर-साल बढ़ रही है. लेकिन नई व्यवस्था लागू होते ही ये राशि घटने लगेगी, फिर ये पैसा कहां जाएगा?  PF की आड़ में जोखिम लेने से नहीं हिचकेंगे लोग ये भी हो सकता है कि लोग PF का पैसा शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में लगाना शुरू कर दे, क्योंकि PF पर फिलहाल 8.25 फीसदी ब्याज दर निर्धारित है. जबकि म्यूचुअल फंड में इससे ज्यादा की संभावना रहती है. शेयर बाजार से तो लोग PF के मुकाबले दोगुने-तिगुने ब्याज की कल्पना कर लेते हैं. ऐसे में एक सुरक्षित निवेश से पैसे निकालकर लोग जोखिम लेने से नहीं हिचकेंगे. अब PF की तुलना में म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार से कितना फायदा होगा, वो तो समय ही बताएगा. सच्चाई ये भी है कि भारत में कुल सकल बचत दर करीब 31 फीसदी है. वहीं सेबी के हालिया सर्वे के मुताबिक केवल 10% भारतीय परिवार ही म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार और बॉन्ड जैसे वित्तीय उत्पादों में निवेश करते हैं. शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 15% का है, जबकि ग्रामीण इलाकों में महज 6% है. हालांकि युवा पीढ़ी में अब बचत का रुझान बढ़ा है. लेकिन वो तेजी से जोखिम भरे शेयर बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं.  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अब भी करीब 69% भारतीय हाउसहोल्ड बैंक में डिपॉजिट या FD में पैसा रखना पसंद करते हैं. वहीं एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 40% शहरी लोगों ने रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए अब तक कोई निवेश नहीं किया है. ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खराब है. यानी देश में आधी से ज्यादा आबादी के पास रिटायरमेंट फंड को लेकर कोई प्लान नहीं है. पेंशन की बात करें तो देश की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन अधिकतम … Read more

जनसंख्या संतुलन बदलने की ओर: 2030 तक मुस्लिमों की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी, हिंदू आबादी घटेगी

मॉस्को  रूस, जो अपनी सैन्य शक्ति और वैश्विक राजनीति में प्रभाव के लिए जाना जाता है, अब एक नए ध्यान केंद्र का हिस्सा बन रहा है: उसकी बदलती जनसंख्या संरचना। Pew Research और कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है और अनुमान है कि 2030 तक यह कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा बन सकती है। वहीं, हिंदू और अन्य छोटे धार्मिक समुदाय अब भी सीमित संख्या में हैं। इस बदलाव का असर केवल सांख्यिकीय नहीं होगा, बल्कि रूस की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है। मुस्लिम आबादी की मौजूदा स्थिति रूस की कुल आबादी लगभग 14 से 15 करोड़ के बीच आंकी जाती है। इसमें मुस्लिम समुदाय का हिस्सा लगभग 7 से 10 फीसदी के आसपास माना जाता है, यानी करीब 2.5 करोड़ लोग। चूंकि रूस में धर्म के आधार पर नियमित जनगणना नहीं होती, इसलिए ये आंकड़े अलग-अलग रिसर्च और सर्वेक्षणों पर आधारित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लाम रूस में तेजी से बढ़ता धर्म बन चुका है और आने वाले वर्षों में इसकी हिस्सेदारी और बढ़ सकती है। भविष्य में संभावित बदलाव कुछ धार्मिक और मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि अगले 10-15 साल में रूस की आबादी में मुस्लिम हिस्सेदारी और भी बढ़ सकती है। हालांकि विशेषज्ञ इसे अत्यधिक अनुमान मानते हैं, लेकिन प्रवास और जन्मदर के आधार पर मुस्लिम आबादी की वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता। माइग्रेशन: मुस्लिम आबादी बढ़ने का मुख्य कारण रूस में मुस्लिम आबादी में इजाफे का सबसे बड़ा कारण मध्य एशियाई देशों से हो रहे प्रवास को माना जाता है। उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देशों से लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में रूस आते हैं। इनमें से कई लंबे समय से रूस में रह रहे हैं और स्थायी रूप से बस चुके हैं। इसके अलावा, रूस के कुछ इलाके जैसे तातारस्तान, चेचन्या और दागेस्तान लंबे समय से मुस्लिम बहुल रहे हैं और वहां जन्मदर अपेक्षाकृत अधिक है, जिससे कुल मुस्लिम संख्या में इजाफा हो रहा है। कहां ज्यादा मुस्लिम आबादी है रूस में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से मजबूत है। तातारस्तान, चेचन्या और दागेस्तान में यह समुदाय पारंपरिक रूप से बड़ा है। वहीं मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे बड़े शहरों में प्रवासी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है।  कुछ रिपोर्ट्स यह अनुमान लगा रही हैं कि 2030 तक मुस्लिम आबादी और अधिक बढ़ सकती है। विशेषज्ञ इस दावे को कुछ हद तक अतिशयोक्ति मानते हैं, क्योंकि कुल आबादी सीमित है। फिर भी यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में रूस की जनसंख्या संरचना में बदलाव नजर आएगा। ईसाई धर्म का अब भी प्रभाव वर्तमान में रूस में ईसाई धर्म के अनुयायी सबसे अधिक हैं। लगभग आधी आबादी ईसाई परंपराओं से जुड़ी हुई है। हालांकि कम जन्मदर और घटती जनसंख्या के कारण ईसाई समुदाय का अनुपात धीरे-धीरे कम हो रहा है। हिंदू और अन्य धार्मिक समुदाय रूस में हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुत कम हैं। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो किसी धर्म से नहीं जुड़ा, जिसका कारण मुख्य रूप से सोवियत युग का धर्मनिरपेक्ष प्रभाव माना जाता है।  

इस बार गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली की झांकी नहीं, सरकार ने प्रस्ताव नहीं भेजा

नई दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड को लेकर राज्य सरकारों द्वारा रक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। रक्षा मंत्रालय ने इस बार हरियाणा की झांकी के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है। वहीं, 26 जनवरी की परेड में दिल्ली की झांकी शामिल नहीं होगी, क्योंकि दिल्ली सरकार ने इस वर्ष झांकी के लिए कोई प्रस्ताव भेजा ही नहीं। गौरतलब है कि पिछले वर्ष, यानी 76वें गणतंत्र दिवस परेड में पाँच वर्षों के अंतराल के बाद दिल्ली की झांकी शामिल की गई थी, जो शिक्षा मॉडल पर आधारित थी। दरअसल, गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राज्य सरकारें अपने प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजती हैं। लेकिन इस बार दिल्ली सरकार ने कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया, जिसके कारण 77वें गणतंत्र दिवस की परेड में कर्तव्य पथ पर राजधानी की झांकी नहीं दिखाई देगी। गौर करने वाली बात यह है कि पाँच वर्ष बाद 76वें गणतंत्र दिवस (2025) में शिक्षा मॉडल पर आधारित दिल्ली की झांकी परेड में शामिल हुई थी। इससे पहले 2020 से 2024 तक लगातार परेड में दिल्ली को स्थान नहीं मिल पाया था। इनमें प्रत्येक राज्य की झांकी अपनी संस्कृति, विरासत और जीवनशैली को प्रदर्शित करती नज़र आएगी। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश की झांकी में बुंदेलखंड स्थित कालिंजर किले का प्रदर्शन किया जाएगा। विंध्य पर्वतमाला पर स्थित यह प्राचीन एवं अभेद्य किला बांदा जिले में है, जिसका निर्माण चंदेल शासकों के काल में हुआ था। यह किला बुंदेलखंड के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इस राज्य की भी नहीं दिखेगी झांकी हालांकि दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा की झांकी भी इस बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नहीं होगी। हरियाणा सरकार ने रक्षा मंत्रालय को कुल पाँच प्रस्ताव भेजे थे। प्रारंभिक चरण में हिसार जिले के पुरातात्विक स्थल राखीगढ़ी पर आधारित प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन बाद में रक्षा मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया। कितने राज्यों को मिली स्वीकृति? झांकियों के चयन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने तीन दौर की बैठकों के बाद 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियों को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करने की स्वीकृति दे दी है। माना जा रहा है कि इन राज्यों की सूची लगभग अंतिम मानी जा रही है और अब इसमें बदलाव की संभावना बहुत कम है। पश्चिम बंगाल , उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, पुडुचेरी, ओडिशा, नागालैंड, मणिपुर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, असम