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छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा फैसला: RTE के तहत एडमिशन नहीं देने पर मान्यता रद्द

रायपुर. छत्तीसगढ़ सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) को लेकर सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि RTE के तहत बच्चों को प्रवेश नहीं देने वाले निजी स्कूलों की मान्यता रद्द कर दी जाएगी। बता दें कि प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने प्रतिपूर्ति राशि नहीं बढ़ाने पर RTE के तहत बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश नहीं देने का ऐलान किया था, जिसके बाद सरकार ने कड़ा फैसला लिया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई भी स्कूल RTE के तहत निर्धारित सीटों पर बच्चों को प्रवेश देने से इंकार करता है, तो उसकी मान्यता तक रद्द की जा सकती है। यह फैसला तब सामने आया है जब प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने प्रतिपूर्ति राशि बढ़ाने की मांग को लेकर RTE के तहत प्रवेश नहीं देने की बात कही थी। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि RTE कानून का पालन करना सभी निजी स्कूलों की कानूनी जिम्मेदारी है। नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें स्कूल की मान्यता खत्म करना भी शामिल है। शिक्षा विभाग ने यह भी कहा है कि बच्चों के अधिकारों से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। 25% सीटें आरक्षित, गरीब बच्चों को मिलेगा लाभ RTE के तहत प्रदेश के गैर-अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), दुर्बल वर्ग और वंचित समूह के बच्चों को उनके निवास क्षेत्र के भीतर प्रवेश दिया जाता है, जिससे उन्हें बेहतर शिक्षा का अवसर मिल सके। प्रतिपूर्ति राशि को लेकर सरकार का पक्ष सरकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ में दी जा रही प्रतिपूर्ति राशि अन्य कई राज्यों के मुकाबले बेहतर या उनके बराबर है। कक्षा 1 से 5 तक: ₹7,000 प्रतिवर्ष, कक्षा 6 से 8 तक: ₹11,400 प्रतिवर्ष, यह राशि प्रति छात्र सरकारी खर्च या निजी स्कूल की फीस (जो कम हो) के आधार पर तय की जाती है और पारदर्शी तरीके से स्कूलों को दी जाती है। अन्य राज्यों से तुलना सरकार के अनुसार, छत्तीसगढ़ की प्रतिपूर्ति राशि कई राज्यों से अधिक है: मध्य प्रदेश: ₹4,419, बिहार: ₹6,569, झारखंड: ₹5,100, उत्तर प्रदेश: ₹5,400, हालांकि ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में यह राशि अधिक है, लेकिन कुल मिलाकर राज्य की व्यवस्था संतुलित मानी जा रही है। लाखों बच्चों को मिल रहा फायदा प्रदेश के 6,862 निजी स्कूलों में वर्तमान में लगभग 3,63,515 बच्चे RTE के तहत पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं इस साल कक्षा पहली में करीब 22,000 सीटों पर प्रवेश प्रक्रिया जारी है, जिससे और अधिक बच्चों को इसका लाभ मिलने वाला है। शिक्षा के अधिकार को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, अप्रैल 2010 से लागू है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार का कहना है कि वह हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई सरकार ने स्पष्ट किया है कि RTE के तहत प्रवेश देने से मना करने या प्रक्रिया में बाधा डालने वाले स्कूलों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसमें मान्यता समाप्त करना भी शामिल है। साथ ही, लोगों से अपील की गई है कि वे किसी भी भ्रामक जानकारी पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें।

ग्रामीण महिलाएं बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल, गृह उद्योग और हस्तशिल्प से संवर रहा भविष्य

आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं ग्रामीण महिलाएं गृह उद्योग और हस्तशिल्प से संवर रहा भविष्य रायपुर  राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के प्रभावी क्रियान्वयन से रायगढ़ जिले की ग्रामीण महिलाएं आज आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। यह योजना महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, कौशल और सामाजिक पहचान भी प्रदान कर रही है। रायगढ़ जिले के ग्राम बड़ेभंडार की निवासी श्रीमती मथुरा कुर्रे इसकी उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि बिहान योजना से जुड़ने के पश्चात उन्हें रिवॉल्विंग फंड एवं कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड के तहत आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ। इस सहयोग से उन्होंने घर पर ही अचार, पापड़, बड़ी एवं मसाला निर्माण का कार्य प्रारंभ किया। आज वे अपने उत्पादों का बाजार में विक्रय कर नियमित आय अर्जित कर रही हैं, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और वे आत्मनिर्भर बन सकी हैं। इसी क्रम में ग्राम रूमकेरा, तहसील घरघोड़ा की श्रीमती जमुना सिदार की कहानी भी प्रेरणादायक है। पूर्व में वे एक गृहिणी थीं, किन्तु बिहान योजना से जुड़ने के बाद उन्होंने बांस शिल्प का प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण उपरांत उन्होंने टोकरी, सूपा एवं अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण प्रारंभ किया। उन्हें विभिन्न मेलों, विशेषकर ‘सरस मेला’ में अपने उत्पादों के प्रदर्शन और विक्रय का अवसर प्राप्त हुआ, जिससे वे अच्छी आय अर्जित कर रही हैं। इससे उनके जीवन स्तर में सकारात्मक परिवर्तन आया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि कौशल विकास, उद्यमिता और आत्मगौरव का अवसर भी प्रदान कर रहा है। जिले में अनेक महिलाएं इस योजना से जुड़कर स्वरोजगार के माध्यम से अपने जीवन को नई दिशा दे रही हैं। शासन के मंशानुरूप जिला प्रशासन रायगढ़ द्वारा महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विभिन्न योजनाओं से जोड़कर महिलाओं को स्वावलंबी बनाया जा रहा है, जिससे वे न केवल अपने परिवार की आय में वृद्धि कर रही हैं, बल्कि समाज में एक सशक्त भूमिका भी निभा रही हैं। बिहान योजना आज जिले में महिला सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनी है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हुए आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

एग्जाम सेंटर पर बड़ी चूक: 4 शिक्षकों की ड्यूटी, मौजूद रहा सिर्फ एक- SDM सख्त

बिलासपुर. शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खोंगसरा में वार्षिक परीक्षा के दौरान गंभीर लापरवाही सामने आई है। 9 वीं और 11वीं कक्षा की परीक्षा के लिए विद्यालय में कुल 4 शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन परीक्षा प्रारंभ होने के बाद केवल एक शिक्षक ही केंद्र पर मौजूद रहे. बाकी के शिक्षकों के विद्यालय नहीं पहुंचने से व्यवस्था प्रभावित हुई। कोटा विकासखंड अंतर्गत शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खोगसरा में 9वीं और 11वीं का वार्षिक परीक्षा हो रही हैं, सोमवार को परीक्षा के लिए विद्यालय में कुल चार शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन परीक्षा प्रारंभ होने के बाद भी सुबह 9:30 बजे तक केवल एक शिक्षक कौशल कुरें ही केंद्र पर मौजूद रहे। बाकी के तीन शिक्षक विद्यालय में उपस्थित नहीं थे, जिससे परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित होती नजर आई। ऐसे में पूरी परीक्षा व्यवस्था एक ही शिक्षक कौशल कुर्रे के भरोसे संचालित होती रही। इनके द्वारा अकेले ही बच्चों को प्रश्न उत्तर पुस्तिका का वितरण कर सभी बच्चों के कक्षाओं की देखरेख भी कर रहे थे। अभिभावकों और ग्रामीणों में इसे लेकर नाराजगी देखी जा रही है। ट्रेन से आना-जाना करते हैं शिक्षक शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खोंगसरा में पदस्थ अधिकतर शिक्षक बिलासपुर में निवास करते हैं, जिससे शिक्षक रोजाना ट्रेन के माध्यम से खोंगसरा तक आते-जाते हैं। समय पर ट्रेन न मिलना या देरी होना सीधे तौर पर स्कूल की व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। यही वजह है कि परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण दिन पर भी शिक्षक समय पर केंद्र तक नहीं पहुंच सके। इस मामले पर कोटा एसडीएम अरविंद कुमार का कहना है कि मामले की जांच की जाएगी, जानकारी सत्य पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।

अब AI पढ़ाएगा बच्चों को: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में डिजिटल क्रांति शुरू

रायपुर. छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग शुरू होने जा रहा है। शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों की पठन क्षमता, लेखन और स्मरण शक्ति को बेहतर बनाने के लिए AI आधारित एप्लीकेशन लागू करने की तैयारी की है। इसके जरिए बच्चों का स्तर समझने के बाद उनके समस्या के समाधान के लिए रणनीति बनाई जाएगी। इस पहल को लेकर राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें योजना की रूपरेखा तय की गई। शुरुआत में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में दो जिलों में लागू किया जाएगा। सफल होने के बाद इसे पूरे छत्तीसगढ़ में लागू किया जाएगा। इसके लिए 15 जिलों से करीब 200 घंटे का कंटेंट तैयार किया गया है। SCERT के प्रभारी संचालक जेपी रथ ने कहा कि स्कूली बच्चों की पठन क्षमता और समझ के साथ पढ़ने की क्षमता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद लेने जा रहा है। वाधवानी एआई के सहयोग से विकसित ‘मौखिक धाराप्रवाह पठन (ORF) टूल’ के माध्यम से राज्य के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की पठन दक्षता का सटीक आकलन और उपचारात्मक सुधार किया जाएगा। क्या है ORF टूल और इसकी तकनीक? मनीष सिंह स्ट्रीट कोऑर्डिनेटर ने कहा ORF टूल एक वॉयस एआई मॉडल ASR (Automatic Speech Recognition) पर आधारित है। यह तकनीक बच्चों की आवाज को रिकॉर्ड कर उसे लिखित शब्दों (ट्रांसक्रिप्ट) में बदल देती है, जिससे शिक्षक केवल 2–3 मिनट में ही प्रत्येक बच्चे की पढ़ने की सटीकता और गति का आकलन कर सकते हैं। इस मॉडल को राज्य की भाषा और बच्चों की स्थानीय बोली के अनुसार प्रशिक्षित करने के लिए प्रदेश के 15 जिलों के 300 से अधिक स्कूलों से 200 घंटों का वॉयस डेटा एकत्रित किया गया है। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पठन दक्षता : यह सुनिश्चित करना कि कक्षा 3-5 और 6-8 के सभी बच्चे धाराप्रवाह और समझ के साथ पढ़ सकें। बुनियादी साक्षरता : निपुण भारत मिशन के तहत तय किए गए पठन लक्ष्यों को प्राप्त करना। शिक्षकों का सहयोग : आकलन के समय को कम करना और सटीक परिणामों के आधार पर बच्चों के पठन स्तर की पहचान कर उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करना। कार्यान्वयन की चरणबद्ध योजना छत्तीसगढ़ के लिए प्रस्तावित इस योजना को अलग-अलग चरणों में लागू किया जाएगा। प्रशिक्षण- शिक्षकों को एआई टूल और सुधारात्मक विधियों का प्रशिक्षण देना। एकीकरण- इसे राज्य के मौजूदा डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाएगा, ताकि अलग से कोई ऐप डाउनलोड न करना पड़े। बेसलाइन आकलन- सत्र की शुरुआत में बच्चों के वर्तमान स्तर का मूल्यांकन। आकलन परिणाम- बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार चार समूहों में बांटना। सुधार के लिए सहयोग रिमेडिएशन- परिणामों के आधार पर शिक्षा विभाग विशेष शिक्षण कार्यक्रम चला सकता है। एंडलाइन आकलन- कार्यक्रम के अंत में प्रगति का मूल्यांकन करना। इस मॉडल को अन्य दो राज्यों राजस्थान और गुजरात में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। इसे सभी जिलों और सभी स्कूलों में संचालित किया गया था, और इस टूल के माध्यम से 6.7 मिलियन बच्चों तक पहुंच बनाई गई थी। इसी सफलता के आधार पर अब छत्तीसगढ़ के स्कूलों में इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की तैयारी है।

अब गांव से शहर तक आसान हुआ सफर, मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना बनी ग्रामीणों के लिए वरदान

नक्सलवाद के खात्मे के बाद बदली तस्वीर, अब गांव से शहर तक आसान हुआ सफर अब गांव से शहर तक आसान हुआ सफर, मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना बनी ग्रामीणों के लिए वरदान नक्सलवाद के खात्मे के बाद बदली तस्वीर, अब गांव से शहर तक पहुँचना हुआ आसान रायपुर कभी नक्सल प्रभाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जिन गांवों के लोग अपने ही क्षेत्र में सीमित रहने को विवश थे, आज वही ग्रामीण निर्भय होकर शहरों तक आवागमन कर रहे हैं। माओवाद के खात्में और सुरक्षा व्यवस्था के सुदृढ़ होने के साथ-साथ शासन की जनहितकारी योजनाओं ने सुकमा जिले के दूरस्थ अंचलों में विकास की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इसी परिवर्तन का सशक्त उदाहरण मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के रूप में सामने आया है, जिसने वनांचल और अंदरूनी क्षेत्रों के जनजीवन को नई गति प्रदान की है। सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड के दूरस्थ ग्राम लखापाल, केरलापेंदा और नागाराम सहित आसपास के गांवों के लिए अब दोरनापाल तक पहुंचना सहज और सुरक्षित हो गया है। पूर्व में ग्रामीणों को मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए 8 से 10 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। ग्राम लखापाल के निवासी श्री कूड़ाम जोगा बताते हैं कि बस सेवा प्रारंभ होने से पहले चिंतलनार तक पैदल जाना उनकी मजबूरी थी। कई बार बस छूट जाने के कारण पूरा दिन व्यर्थ चला जाता था और आवश्यक कार्य अधूरे रह जाते थे। अब दोरनापाल-नागाराम मार्ग पर नियमित बस सेवा प्रारंभ होने से यह समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई है। मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के अंतर्गत संचालित बस सेवा अब पोलमपल्ली, कांकेरलंका, चिंतागुफा, चिंतलनार, लखापाल, केरलापेंदा और नागाराम जैसे गांवों के समीप से गुजर रही है। इससे ग्रामीण अब आसानी से बस के माध्यम से दोरनापाल पहुंचकर अपने दैनिक कार्य समय पर पूर्ण कर रहे हैं और उसी दिन सुरक्षित वापस भी लौट पा रहे हैं। यह सुविधा विशेष रूप से महिलाओं, बुजुर्गों, विद्यार्थियों एवं श्रमिकों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। जहां पहले नक्सलियों के भय के कारण ग्रामीणों का बाहर निकलना भी कठिन था, वहीं अब सुरक्षा वातावरण में सुधार के चलते वे निर्भय होकर रोजगार, व्यापार, शिक्षा और उपचार के लिए शहरों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। बस सुविधा ने न केवल आवागमन को सुगम बनाया है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान की है। इरकमपल्ली निवासी श्री मोहनरंजन ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह योजना दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रही है। इससे न केवल कनेक्टिविटी बढ़ी है, बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बल मिला है। कलेक्टर श्री अमित कुमार के अनुसार, पूर्व में नक्सल प्रभावित एवं दूरस्थ क्षेत्रों में वर्तमान में मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के तहत 10 बसों का संचालन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त 5 ‘हक्कुम मेल’ बसें भी नियमित रूप से संचालित हो रही हैं। बस संचालन को प्रोत्साहित करने हेतु शासन द्वारा सब्सिडी प्रदान की जा रही है तथा तीन वर्षों के लिए रोड टैक्स में छूट भी दी गई है। मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना अब केवल एक परिवहन सुविधा नहीं, बल्कि सुकमा जिले के ग्रामीण अंचलों में विश्वास, सुरक्षा और विकास का प्रतीक बन चुकी है। नक्सलवाद के अंधकार से निकलकर यह क्षेत्र अब प्रगति और आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर अग्रसर है, जहां हर सफर अब नई संभावनाओं की ओर ले जा रहा है।

शासन की योजनाओं से बदला जीवन, पीएम आवास और उज्ज्वला से मिला ग्रामीणों को सहारा

शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं से संवरा जीवन,पीएम आवास, उज्ज्वला और महतारी वंदन से मिला संबल रायपुर शासन द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाएं ग्रामीण अंचलों में न केवल आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि आमजन के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का नया अध्याय भी जोड़ रही हैं। इसी कड़ी में जांजगीर-चांपा जिले के विकासखंड पामगढ़ के ग्राम लोहर्सी की निवासी श्रीमती ज्योति कश्यप की जीवन यात्रा परिवर्तन की एक प्रेरक मिसाल है। कभी अभाव और कठिनाइयों से जूझ रही श्रीमती ज्योति कश्यप का जीवन आज शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से पूरी तरह बदल चुका है। पूर्व में उनका कच्चा मकान हर मौसम में चुनौती बन जाता था। वर्षा के दौरान छत टपकना, घर में पानी भरना और असुरक्षित वातावरण में रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। इसके साथ ही लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाते समय उठने वाले धुएं से आंखों में जलन और सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याएं उनके स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही थीं। परिस्थितियों में सकारात्मक बदलाव तब आया, जब उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना की जानकारी मिली। उन्होंने आशा और विश्वास के साथ आवेदन किया और आवास स्वीकृत होने के बाद उनके जीवन में जैसे नई रोशनी का संचार हुआ। पक्के मकान के निर्माण से अब उनका परिवार सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण में निवास कर रहा है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गैस कनेक्शन प्राप्त होने से उनकी रसोई धुएं से मुक्त हो गई है, जिससे स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ समय और श्रम की भी बचत हो रही है। श्रीमती ज्योति कश्यप के जीवन में आत्मनिर्भरता का एक नया आयाम महतारी वंदन योजना से जुड़ा है। इस योजना के तहत प्रतिमाह प्राप्त होने वाली 1000 रुपये की सहायता राशि से वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं कर पा रही हैं। जहां पहले उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं अब वे आत्मसम्मान के साथ अपने निर्णय लेने में सक्षम हुई हैं। आज श्रीमती ज्योति कश्यप का जीवन इस बात का प्रमाण है कि शासन की योजनाएं यदि सही पात्र तक पहुंचें, तो वे न केवल जीवन स्तर को सुधारती हैं, बल्कि आत्मविश्वास और स्वाभिमान को भी नई ऊंचाई प्रदान करती हैं।

एक जिला एक उत्पाद योजना से आई नई उम्मीद, अदरक की खेती से दोगुना मुनाफा

एक जिला एक उत्पाद योजना से बदली तस्वीर अदरक की खेती से दोगुना मुनाफा कमाया रायपुर  सरकार की “एक जिला एक उत्पाद” योजना अब धरातल पर किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इसी क्रम में बालोद जिले के गुण्डरदेही विकासखंड अंतर्गत ग्राम बघमरा के युवा प्रगतिशील किसान श्री आकाश चंद्राकर ने अदरक की खेती के माध्यम से सफलता की एक नई मिसाल प्रस्तुत की है। पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ते हुए आकाश चंद्राकर ने “एक जिला एक उत्पाद” योजना से प्रेरित होकर अपने लगभग ढाई एकड़ खेत में अदरक की खेती की शुरुआत की। वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर प्रबंधन के साथ की गई इस खेती से उन्हें उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त हुआ। साथ ही बाजार में अदरक की अच्छी मांग के कारण उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिला, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। किसानों को प्रोत्साहित करने और खेती की लागत को कम करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ शासन के उद्यानिकी विभाग द्वारा राज्य पोषित मसाला क्षेत्र विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत आकाश चंद्राकर को लगभग 49 हजार रुपये का अनुदान प्रदान किया गया। इस वित्तीय सहयोग से उन्हें आधुनिक कृषि संसाधन जुटाने, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं तकनीकों का उपयोग करने में सहायता मिली, जिसका सीधा लाभ उत्पादन और गुणवत्ता में दिखाई दिया। आकाश चंद्राकर बताते हैं कि अदरक की खेती उनके लिए समृद्धि का नया द्वार बनकर आई है। शासन से प्राप्त अनुदान ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। “एक जिला एक उत्पाद” के अंतर्गत अदरक को चयनित किए जाने के बाद जिले के अन्य किसान भी इस नगदी फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पारंपरिक फसलों की तुलना में अदरक से प्राप्त अधिक शुद्ध लाभ ने किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। जिला प्रशासन बालोद और उद्यानिकी विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जा रही तकनीकी सलाह एवं अनुदान से खेती अब घाटे का सौदा नहीं, बल्कि लाभ का माध्यम बनती जा रही है। श्री चंद्राकर ने केंद्र एवं राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि शासन की इस पहल से बालोद जिला अदरक उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान स्थापित करेगा।

संघर्ष और भटकाव के बाद मनकू कड़ती की एक नई यात्रा की शुरुआत

संघर्ष और भटकाव के बाद मनकू कड़ती की नई शुरुआत रायपुर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित अंचल में बदलाव की कई कहानियां उभर रही हैं। इन्हीं में से एक कहानी है बीजापुर जिले के छोटे से गांव चेरली के युवक मनकू कड़ती की, जिनका जीवन संघर्ष, भटकाव और फिर सकारात्मक परिवर्तन का उदाहरण बनकर सामने आया है। बीजापुर जिले के चेरली गांव में जन्मे मनकू कड़ती का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। गरीबी, असुरक्षा और सीमित संसाधनों के बीच उनका परिवार लगातार चुनौतियों से जूझता रहा। पारिवारिक स्थिति उस समय और भी गंभीर हो गई, जब उनके पिता को जेल जाना पड़ा। इस घटना ने मनकू के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला और उनका बचपन अभाव और अस्थिरता के माहौल में बीता। इन्हीं परिस्थितियों और नकारात्मक माहौल के प्रभाव में मनकू धीरे-धीरे भटकाव की ओर बढ़ने लगे। उन्हें लगा कि गलत रास्ता ही उन्हें पहचान और सुरक्षा दिला सकता है। हालांकि, उनके भीतर एक द्वंद्व लगातार बना रहा। क्या यही उनका भविष्य है ? यह सवाल उनके मन में बार-बार उठता रहा। समय के साथ मनकू के भीतर आत्मचिंतन की प्रक्रिया शुरू हुई। उन्होंने महसूस किया कि हिंसा और भय के रास्ते पर चलकर वे अपने जीवन को अंधकार की ओर ले जा रहे हैं। यही एहसास उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने ठान लिया कि अब वे अपनी दिशा बदलेंगे और एक नई शुरुआत करेंगे। अप्रैल 2025 में मनकू कड़ती ने साहसिक कदम उठाते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। यह निर्णय उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन यही उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और सही फैसला साबित हुआ। इस कदम ने उनके लिए मुख्यधारा में लौटने और एक सम्मानजनक जीवन जीने के रास्ते खोल दिए। आत्मसमर्पण के बाद उन्हें पुनर्वास प्रक्रिया के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला। उन्होंने ट्रैक्टर ऑपरेटर के रूप में प्रशिक्षण लिया, जहां उन्होंने न केवल भारी मशीनों का संचालन सीखा, बल्कि अनुशासन, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास को भी अपने जीवन में अपनाया। निरंतर मेहनत और सीखने की इच्छा ने उनके व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव लाया।  आज मनकू कड़ती एक बदले हुए इंसान के रूप में सामने आए हैं। वे आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर हैं और समाज के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जहां पहले उनके जीवन में डर और अस्थिरता थी, वहीं अब आत्मविश्वास और नई उम्मीद ने जगह ले ली है। मनकू कड़ती के जीवन की यह नई शुरूआत इस बात का प्रमाण है कि विपरीत परिस्थितियों और गलत दिशा में बढ़ते कदमों के बावजूद, यदि व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर ले तो जीवन में सकारात्मक बदलाव संभव है।

अमृत मिशन 2.0 के तहत 20 एमएलडी क्षमता के टर्शरी ट्रीटमेंट प्लांट को मिली मंजूरी, प्रदूषण-मुक्त होगी नदी

रायपुर अमृत मिशन 2.0 के तहत 20 एमएलडी क्षमता के टर्शरी ट्रीटमेंट प्लांट ऊर्जाधानी कोरबा की जीवनरेखा मानी जाने वाली हसदेव नदी अब प्रदूषण के काले साये से मुक्त होकर फिर से कल-कल बहेगी। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘अमृत मिशन 2.0’ योजना ने कोरबा में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि जोड़ दी है। छत्तीसगढ़ शासन के प्रयासों से भारत सरकार ने शहर के दूषित जल के वैज्ञानिक उपचार हेतु 165 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है। सालों से शहर के 11 बड़े नालों का दूषित सीवरेज जल सीधे हसदेव नदी में मिलकर उसकी शुद्धता को प्रभावित कर रहा था। इस गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए 20 एमएलडी क्षमता का अत्याधुनिक टर्शरी ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 3 करोड़ 30 लाख लीटर दूषित जल को नदी में गिरने से पहले ही रोककर अत्याधुनिक तकनीक से उपचारित किया जाएगा। इससे नदी के प्रदूषण में भारी कमी आएगी और उसका जल पुनः स्वच्छ बनेगा। परियोजना के पूर्ण होते ही कोरबा उन चुनिंदा 12 शहरों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहाँ जल शोधन की ऐसी उन्नत और वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध है। यह परियोजना केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी बनेगी। उपचारित किए गए करोड़ों लीटर पानी को बर्बाद करने के बजाय एनटीपीसी द्वारा निर्धारित दरों पर खरीदा जाएगा। इससे उद्योगों को स्वच्छ जल उपलब्ध होगा, नगर निगम के राजस्व में वृद्धि होगी और भू-जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। कलेक्टर  कुणाल दुदावत ने इसे कोरबा जिले के लिए ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के मानकों का पालन करते हुए नगर पालिक निगम कोरबा द्वारा तैयार किए गए इस वैज्ञानिक समाधान को अब वास्तविक रूप मिलने जा रहा है। वर्तमान में निविदा प्रक्रिया प्रगति पर है और जल्द ही निर्माण कार्य धरातल पर शुरू हो जाएगा। अमृत मिशन 2.0 के तहत यह प्लांट न केवल हसदेव नदी को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण की नई मिसाल भी पेश करेगा। इसके माध्यम से कोरबा औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरणीय स्वच्छता के क्षेत्र में भी अग्रणी बनेगा।

क्या है इस जगह का राज? छत्तीसगढ़ में ‘उछलती जमीन’ का रहस्य, कदम रखते ही महसूस होगा झटका

सरगुजा   छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित मैनपाट केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी 'रहस्यमयी धरती' के लिए भी दुनिया भर में कौतूहल का विषय बना हुआ है। 'मिनी शिमला' के नाम से मशहूर यह हिल स्टेशन विज्ञान और रोमांच का एक ऐसा संगम है, जिसे देख कर पर्यटक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। आइए जानते हैं कहां यह रहस्यमयी जगह। जहां कदम रखते ही कांपने लगती है जमीन मैनपाट का सबसे बड़ा आकर्षण 'जलजली' पॉइंट है। यहां की जमीन आम पत्थरों या मिट्टी की तरह कठोर नहीं है। जैसे ही आप इस जमीन पर कदम रखते हैं या थोड़ा सा उछलते हैं, पूरी धरती किसी स्पंज के गद्दे की तरह हिलने लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप जमीन पर नहीं, बल्कि पानी पर तैरती किसी चादर पर खड़े हों। क्या है इस रहस्य के पीछे का विज्ञान? विशेषज्ञों के अनुसार, इसे वैज्ञानिक भाषा में 'क्वेकिंग बॉग' (Quaking Bog) कहा जाता है। जमीन के नीचे पानी का एक बड़ा सोते (Internal water body) होने और ऊपर वनस्पति व दलदली मिट्टी की एक मोटी लचीली परत होने के कारण यह 'बाउंस' करती है। हालांकि, शोधकर्ता आज भी इस गुत्थी को पूरी तरह सुलझाने में जुटे हैं कि इतनी ऊंचाई पर यह संरचना स्थायी रूप से कैसे बनी हुई है। 'मिनी शिमला' की मनमोहक वादियां समुद्र तल से लगभग 3,300 फीट की ऊंचाई पर बसा मैनपाट अपनी ठंडी जलवायु और धुंध भरी पहाड़ियों के कारण पर्यटकों की पहली पसंद है। पर्यटन के अन्य प्रमुख केंद्र:     उल्टा पानी: यहां गुरुत्वाकर्षण के नियम फेल होते नजर आते हैं, क्योंकि पानी ढलान के बजाय ऊपर की ओर बहता है।     टाइगर और फिश पॉइंट: घने जंगलों के बीच गिरते दूधिया झरने मन को शांति प्रदान करते हैं।     मेहता पॉइंट: यहाँ से सूर्यास्त और घाटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। संस्कृति का संगम: छोटा तिब्बत मैनपाट की एक और खासियत यहां का तिब्बती समुदाय है। 1962 के आसपास यहां बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी बसे थे, जिसके बाद इसे 'मिनी तिब्बत' कहा जाने लगा। यहां के भव्य और शांत बौद्ध मठ आत्मिक शांति का अनुभव कराते हैं। स्थानीय बाजारों में तिब्बती ऊनी कपड़े और पारंपरिक व्यंजनों (जैसे मोमोज और थुपका) का स्वाद सैलानियों को खूब लुभाता है।