samacharsecretary.com

केंद्रीय सम्मेलन में झारखंड की मांग: कैंसर दवाएं सस्ती हों, मेडिकल शिक्षा को मिले बढ़ावा

 रांची  केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों का सम्मेलन 29 जून से एक जुलाई तक आयोजित होगा। इस सम्मेलन में झारखंड से स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी सम्मिलित होंगे। इसमें झारखंड की ओर से कैंसर मरीजों को रियायती दर पर दवा उपलब्ध कराने की मांग केंद्र से की जाएगी। साथ ही नए मेडिकल कालेज, आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय, डिजिटल हेल्थ सिस्टम में भी आर्थिक सहायता की मांग स्वास्थ्य मंत्री करेंगे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड़्डा की अध्यक्षता में होनेवाले इस तीन दिवसीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य देशभर में डिजिटल हेल्थ सिस्टम, स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण, मेडिकल शिक्षा के विस्तार, स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ बनाने तथा आम जनता तक बेहतर, पारदर्शी और हाईटेक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर व्यापक मंथन करना है। इस अवसर पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ एवं आधुनिक बनाने के लिए केंद्र सरकार के समक्ष कई महत्वपूर्ण मांगें एवं प्रस्ताव रखेंगे। इरफान अंसारी के अनुसार, झारखंड के सभी जिलों में मेडिकल कालेज की स्थापना एवं दो जिलों में लंबित प्रस्तावों को शीघ्र स्वीकृति प्रदान करने का अनुरोध केंद्र से किया जाएगा। डिजिटल हेल्थ सिस्टम को जिला स्तर से लेकर राज्य मुख्यालय तक पूरी तरह लागू करने के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग करने का भी केंद्र से अनुरोध किया जाएगा ताकि लोगों को पारदर्शी, त्वरित एवं हाईटेक स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। राज्य के सरकारी अस्पतालों में माड्यूलर हाईटेक आपरेशन थिएटर के लिए भी आर्थिक सहायता की मांग की जाएगी। केंद्र सरकार द्वारा विकसित डिजिटल हेल्थ प्लेटफार्म एवं हेल्थ ऐप को झारखंड में प्रभावी रूप से लागू करने के लिए आवश्यक तकनीकी सहयोग एवं संसाधन उपलब्ध कराने का भी अनुरोध किया जाएगा। मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में लिए जाने वाले निर्णयों से झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा और नई गति मिलेगी तथा राज्य के लोगों को अत्याधुनिक, सुलभ एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ प्राप्त होगा।

61 लाख बच्चों को पोलियो खुराक देने का लक्ष्य, झारखंड में तीन दिन चलेगा विशेष अभियान

 रांची  राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान का शुभारंभ रविवार को सदर अस्पताल, रांची में महापौर रोशनी खलखो ने बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाकर किया। इस अवसर पर विधायक सीपी सिंह, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा, सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार समेत कई स्वास्थ्य अधिकारी एवं चिकित्सक मौजूद थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि पिछले 14 वर्षों से भारत में पोलियो का कोई मामला सामने नहीं आया है। यह उपलब्धि स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत और लोगों की जागरूकता का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब भी पोलियो के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में बच्चों का समय पर टीकाकरण कराना बेहद जरूरी है। महापौर रोशनी खलखो ने कहा कि भारत को पोलियो मुक्त बनाए रखने के लिए प्रत्येक बच्चे तक टीकाकरण की पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों के समर्पण की सराहना करते हुए अभिभावकों से अपील की कि वे अपने पांच वर्ष तक के सभी बच्चों को पोलियो की खुराक अवश्य पिलाएं। उन्होंने बताया कि अभियान के तहत अस्पतालों, आंगनबाड़ी केंद्रों, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेष व्यवस्था की गई है। विधायक सीपी सिंह ने कहा कि देश को पोलियो मुक्त बनाने में स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने सदर अस्पताल में बेहतर होती स्वास्थ्य सेवाओं की सराहना करते हुए कहा कि अस्पताल को और सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने बताया कि झारखंड में इस वर्ष लगभग 61 लाख बच्चों को 24,507 बूथों पर पोलियो की खुराक पिलाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने बताया कि 28 जून यानी आज बूथ दिवस के रूप में मनाया जा रहा है, जबकि 29 और 30 जून को स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर छूटे हुए बच्चों को दवा पिलाएंगे। इसके अलावा रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी विशेष टीमें तैनात की गई हैं। राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ. विजय किशोर रजक ने कहा कि पोलियो उन्मूलन की सफलता को बनाए रखने के लिए नियमित टीकाकरण और सतर्कता आवश्यक है। राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान 28 से 30 जून तक चलेगा। स्वास्थ्य विभाग ने सभी अभिभावकों से अपील की है कि वे अपने 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों को पोलियो की दो बूंद अवश्य पिलाकर अभियान को सफल बनाएं।  

बिहार में ऊर्जा विस्तार की योजना: एनटीपीसी लगाएगी आधुनिक तकनीक वाली नई बिजली उत्पादन इकाई

पटना  बरौनी में आठ सौ मेगावाट क्षमता की नई अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल तकनीक वाली थर्मल बिजली उत्पादन इकाई लगाने पर विचार किया जा रहा है। इसकी फिजिबिलिटी रिपोर्ट पर काम हो रहा है। ऊर्जा मंत्रालय की अनुमति के बाद यह काम रफ्तार पकड़ेगा। इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार नई यूनिट की स्थापना के लिए जमीन का कोई संकट नहीं है। जहां अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल तकनीक वाली थर्मल यूनिट लगाए जाने की योजना है वहां पुरानी थर्मल पावर यूनिट जो अब बंद हो चुकी है, उसकी जमीन का इस्तेमाल होगा। साथ में बैट्री स्टोरेज यूनिट पर भी काम नई थर्मल पावर यूनिट के साथ-साथ बैट्री स्टोरेज यूनिट भी बरौनी में लगाई जाएगी। इसके माध्यम से बिजली को इस तकनीक के माध्यम से पीक आवर की मांग के लिए रखा जा सकेगा। एनटीपीसी बिहार में पहली बार बैट्री स्टोरेज सिस्टम पर काम करेगी। बिहार में अभी एनटीपीसी की आठ सौ मेगावाट क्षमता की केवल एक यूनिट है। यह यूनिट औरंगाबाद के नवीनगर में बीआरबीसीएल की स्टेज-2 यूनिट है। अल्ट्रा क्रिटिकल यूनिट का फायदा अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल यूनिट का फायदा यह है कि इसमें कोयले की खपत कम होती है। मोटे तौर पर प्रति यूनिट बिजली उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत कम कोयला लगता है। इस वजह से कार्बन डाइआक्साइड, सल्फर और नाइट्रोजन आक्साइड जैसे हानिकार गैसों का उत्सर्जन कम होता है। पानी की भी बचत हाेती है। कहलगांव और कांटी स्थित थर्मल यूनिट पर भी विचार एनटीपीसी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कहलगांव और कांटी स्थित थर्मल यूनिट परिसर में भी 800 मेगावाट क्षमता वाली अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल यूनिट की स्थापना संभव है। वैसे अभी इसकी फिजिबिलिटी रिपोर्ट पर काम आरंभ नहीं हुआ है। कहलगांव में तीसरे चरण के तहत 800 मेगावाट क्षमता वाली यूनिट की स्थापना के लिए साइट सर्वे का काम पूरा हो चुका है। यहां भी जमीन उपलब्ध है। बिहार में एनटीपीसी की थर्मल पावर उत्पादन इकाई बिहार में अभी एनटीपीसी की छह थर्मल पावर यूनिट काम कर रही। इनकी कुल वाणिज्यिक क्षमता 9500 मेगावाट है। एनटीपीस की थर्मल पावर यूनिट बाढ़, औरंगाबाद, बरौनी, कांटी व कहलगांव में है।  

सम्राट चौधरी सरकार का बड़ा फैसला, अब बिना सूचना नहीं होगा फैक्ट्रियों का निरीक्षण

पटना बिहार के निबंधित कल-कारखानों में अब इंस्पेक्टर राज नहीं चलेगा। राज्य की सम्राट चौधरी सरकार ने फैक्ट्रियों से इंस्पेक्टर राज को जड़ से खत्म करने का प्लान तैयार कर लिया है। इसके तहत अब औचक निरीक्षण पर रोक होगी और सरकार की मंशा है कि इससे संबंधित कार्यों को ऑनलाइन पोर्टल पर लाया जाए। इसके जरिए तरफ जहां काम में पारदर्शिता आएगी तो वहीं भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगा। नई योजना के तहत श्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग के अधिकारी औचक रूप से किसी भी कारखाने का निरीक्षण नहीं कर सकेंगे। अब विभाग की ओर से नामित अधिकारी ही कारखानों का निरीक्षण कर सकेंगे। निरीक्षण के पहले कारखाना संचालकों को संबंधित अधिकारी और निरीक्षण की तिथि की जानकारी दी जाएगी। जांच रिपोर्ट भी ऑनलाइन रहेगी। इससे कोई खामी बता कारखाना संचालकों से इंस्पेक्टर किसी तरह की अवैध उगाही नहीं कर सकेगा। विभागीय अधिकारियों के अनुसार राज्य में सामाजिक सुरक्षा (बिहार) नियमावली 2026 लागू की गई है। इसके तहत न केवल कामगारों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी, बल्कि कारखाना संचालकों को भी इंस्पेक्टर राज से मुक्ति मिलेगी। सरकार लाएगी ऑनलाइन पोर्टल इसके लिए वेब आधारित निरीक्षण प्रणाली लाई जाएगी। इसमें निरीक्षण प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित हो सकेगी। यह सरकार का ऑनलाइन पोर्टल होगा। कम्प्यूटर से ही एलॉटमेंट होगा कि कौन सा इंस्पेक्टर किस फैक्ट्री में जाएगा। इससे मालिक और इंस्पेक्टर की सेटिंग नहीं होगी। निरीक्षण से 15 दिन पहले कंपनी को ऑनलाइन बता दिया जाएगा कि उसके यहां निरीक्षण होने वाला है। वेतन, सुरक्षा और पीएफ सभी चीजों की ऑनलाइन होगी जांच कारखाना से जुड़ी सभी गतिविधियां ऑनलाइन ही जांच की जा सकेगी। मसलन कर्मियों को वेतन मिला या नहीं, सुरक्षा की क्या स्थिति है और पीएफ कट रहा है या नहीं। निरीक्षण के तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट ऑनलाइन अपलोड करनी होगी ताकि मुख्यालय के अधिकारी उसे देख सकें। अगर कोई कमी निकली तो ऑनलाइन ही उसमें सुधारने का टास्क दिया जाएगा। कंपनी ने अपनी गलती सुधारी या नहीं, यह सब ऑनलाइन रहेगा। सुधार होने पर उसकी रिपोर्ट अपलोड करने पर इंस्पेक्टर कारखानों की जांच नहीं कर सकेगा। कोई परेशानी होने पर कामगार ऑनलाइन ही शिकायत करेंगे। इस ऑनलाइन व्यवस्था में सरकार को इसकी जानकारी रहेगी कि कौन कारखाना संचालक किस कानून का पालन नहीं कर रहा है। आंकड़ों पर एक नजर ● 7952 राज्य में निबंधित कारखानों की संख्या है ● 2000 कारखानों में 20 से अधिक कर्मी कार्यरत ● 120 कारखानों को खतरनाक श्रेणी में रखा गया है  

बाढ़-सूखे से निपटने के लिए हाईटेक सिस्टम लाएगी बिहार सरकार

पटना  बिहार सरकार जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और नदियों के प्रभावी प्रबंधन के लिए नई जल नीति तैयार कर रही है. इस नीति में आधुनिक तकनीक और डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा. सरकार का लक्ष्य पानी का बेहतर उपयोग करना और बाढ़-सूखे जैसी समस्याओं से समय रहते निपटना है. डिजिटल होगी जल प्रबंधन प्रणाली नई नीति के तहत जल प्रबंधन को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाया जाएगा. नदियों के जलस्तर की निगरानी और रिपोर्टिंग आधुनिक डिजिटल सिस्टम से होगी. इससे बाढ़ और सूखे की स्थिति का पहले से सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा. सरकार का मानना है कि इससे जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा. नई वाटर अथॉरिटी बनाने की तैयारी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार मौजूदा जल संसाधन संस्थाओं की समीक्षा कर रही है. जरूरत पड़ने पर नई वाटर अथॉरिटी और अन्य संस्थानों का गठन भी किया जाएगा. इसके लिए जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग, जल शक्ति मंत्रालय के सहयोग से स्टेट वाटर रिसोर्स रिफॉर्म फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है. उच्च स्तरीय समिति करेगी निगरानी नई नीति की रूपरेखा तैयार करने के लिए मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है. इसमें जल संसाधन, कृषि, पर्यावरण, नगर विकास, पीएचईडी, ग्रामीण विकास और लघु जल संसाधन विभाग के अधिकारी शामिल हैं. यह समिति पूरे फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देगी. भूजल और नदी डेटा पर रहेगा विशेष फोकस नई नीति में गिरते भूजल स्तर को सुधारने पर विशेष जोर दिया जाएगा. साथ ही नदी से जुड़े आंकड़ों को अधिक सटीक और उपयोगी बनाया जाएगा. जल परियोजनाओं की डिजिटल मॉनिटरिंग होगी और पुराने जल कानूनों को भी समय के अनुसार अपडेट करने की तैयारी है. किसानों और शहरों को मिलेगा सीधा लाभ नई व्यवस्था लागू होने के बाद नहरों के जरिए सिंचाई के लिए पानी का बेहतर वितरण किया जाएगा. इससे किसानों को समय पर पर्याप्त पानी मिल सकेगा. औद्योगिक इकाइयों और शहरों के लिए भी संतुलित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी. डैम में सेंसर आधारित मीटर लगाए जाएंगे और नहरों में पानी की बर्बादी रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा. सरकार का मानना है कि इस नई नीति के लागू होने के बाद बिहार जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में अधिक आधुनिक, सुरक्षित और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में आगे बढ़ेगा.

1 जुलाई से बड़ा बदलाव: मनरेगा की जगह लागू होगी ‘G-RAM-JI’ स्कीम, बढ़ेगा रोजगार का दायरा

अररिया ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना मनरेगा (MGNREGA) अब पूरी तरह से नए स्वरूप में नजर आने वाली है। वर्ष 2005 में 'नरेगा' के रूप में शुरू हुई और 2010 में 'मनरेगा' बनी इस योजना का नाम अब केंद्र सरकार ने बदल दिया है। वर्ष 2026 से इसे 'जी राम जी' (G-RAM-JI) यानी 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण' के नाम से जाना जाएगा। तकनीकी दिक्कतों के कारण टली थी योजना, अब 1 जुलाई से होगी लागू विभागीय जानकारी के अनुसार, इस नई योजना को वित्तीय वर्ष 2026-27 की शुरुआत से ही लागू किया जाना था। हालांकि, पोर्टल और तकनीकी तैयारियां पूरी न होने के कारण इसे कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया था। अब विभाग ने इसे आगामी 1 जुलाई से पूरी तरह लागू करने का सख्त निर्देश जारी किया है। पुराना मनरेगा कानून होगा समाप्त, नए जॉब कार्ड बनने तक पुराने रहेंगे मान्य इस संबंध में जानकारी देते हुए मनरेगा पीओ अफरोज अहमद ने बताया कि नई व्यवस्था लागू होते ही पुराना मनरेगा कानून समाप्त हो जाएगा। पुरानी सभी योजनाएं इसमें समाहित कर ली जाएंगी। राहत की बात यह है कि जब तक मजदूरों के नए जॉब कार्ड नहीं बन जाते, तब तक उनके पुराने जॉब कार्ड ही मान्य रहेंगे। सिर्फ मजदूरी नहीं, अब गांवों का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करेगी सरकार अधिकारियों के मुताबिक, 'जी राम जी' योजना सिर्फ मजदूरी आधारित नहीं होगी, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला एक व्यापक मिशन बनेगी। इसमें मिट्टी भराई जैसे पारंपरिक कार्यों के बजाय जल संरक्षण, खेत, सड़क, पुलिया, स्कूल भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, बाढ़ सुरक्षा और सिंचाई जैसे ढांचागत (Infrastructure) कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। 100 के बदले मिलेंगे 125 दिन काम, 3 दिन के भीतर खाते में आएगा पैसा इस नई योजना का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब ग्रामीणों को साल में 100 दिन के बदले 125 दिनों के रोजगार की गारंटी मिलेगी। यही नहीं, मजदूरी का भुगतान महज तीन दिनों के भीतर डीबीटी (DBT) के माध्यम से सीधे बैंक खाते में कर दिया जाएगा। भुगतान में देरी होने पर मजदूरों को मुआवजा देने का भी नियम बनाया गया है विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के तहत हर हफ्ते वेतन का प्रविधान वर्तमान में चल रही मनरेगा योजना में मजदूरों को ₹252 की दिहाड़ी मिलती है। केंद्र सरकार की इस नई योजना का मुख्य उद्देश्य देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को 'विकसित भारत वर्ष 2047' के लक्ष्य के अनुरूप तैयार करना है। इसके तहत मजदूरों का वेतन भुगतान हर सप्ताह करने का भी प्रविधान है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।  

77 करोड़ के कर्ज मामले में हाईकोर्ट सख्त, बैंक को सेल सर्टिफिकेट जारी करने की मंजूरी

 रांची  झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) के अध्यक्ष अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर कोई न्यायिक या स्थगन आदेश पारित नहीं कर सकते। अदालत ने कर्जदार द्वारा अपनाई गई कानूनी दांवपेच की रणनीति बताते हुए उनकी कड़ी निंदा की और बैंक को सफल नीलामी खरीदार के पक्ष में तुरंत सेल सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कर्जदार पर 77 करोड़ से अधिक का बकाया है। यह जनता का पैसा है जिसे कानूनन वसूला जाना जरूरी है। कर्जदार ने लोन चुकाने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि केवल वसूली प्रक्रिया को टालने के लिए कानूनी दांवपेंच अपनाए। एकल पीठ ने उक्त निर्णय इंडियन बैंक बनाम मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड और नीलामी खरीदार यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड द्वारा दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। क्या है पूरा मामला? देवघर स्थित मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने अस्पताल स्थापित करने के लिए इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) से करोड़ों रुपये का लोन लिया था, जो बाद में बढ़कर ₹19.45 करोड़ तक पहुंच गया। लोन न चुकाने के कारण 31 दिसंबर 2009 को इस खाते को एनपीए घोषित कर दिया गया। साल 2015 में बैंक और अस्पताल प्रबंधन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके बाद बैंक ने अस्पताल की जब्त संपत्ति वापस लौटा दी। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया। इसके बाद बैंक ने करीब 70.92 करोड़ की बकाया राशि की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के तहत नए सिरे से कार्रवाई शुरू की। बैंक ने सात अप्रैल 2026 को अस्पताल की संपत्तियों की नीलामी की, जिससे 44.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इस नीलामी में यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड सबसे बड़ा बोलीदाता बनकर उभरा और उसने पूरी रकम जमा कर दी। डीआरएटी के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी), रांची के बंद होने का हवाला देते हुए कर्जदार अस्पताल ने इलाहाबाद स्थित अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) में याचिका दाखिल की डीआरएटी के अध्यक्ष ने आरडीबी एक्ट की धारा 17ए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 10 अप्रैल 2026 को बैंक को नीलामी की रकम स्वीकार करने की अनुमति तो दी, लेकिन खरीदार को सेल सर्टिफिके जारी करने पर रोक लगा दी थी। इस स्थगन आदेश के खिलाफ बैंक और नीलामी खरीदार दोनों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां और फैसला हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डीआरएटी के आदेश को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर माना। पीठ ने कहा कि कर्जदार ने कोर्ट में पहले भी अर्जी दी थी, जहां उन्हें राहत पाने के लिए दो करोड़ जमा करने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने वह राशि जमा नहीं की और चालाकी से डीआरएटी में बिना कोई प्री-डिपाजिट किए राहत पा ली, जो कि पूरी तरह से अनुचित है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डीआरएटी द्वारा 10 अप्रैल 2026 और 21 अप्रैल 2026 को जारी अंतरिम स्थगन आदेशों को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि अब बैंक द्वारा नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।

झारखंड में ऊर्जा विस्तार: पतरातू विद्युत परियोजना से बढ़ेगी उत्पादन क्षमता और रोजगार

 रांची पतरातू स्थित पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (पीवीयूएनएल) की तीसरी 800 मेगावाट क्षमता वाली इकाई को 15 मार्च 2027 तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है. यह जानकारी पीवीयूएनएल के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एके सहगल ने रामगढ़ जिले के पतरातू में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान दी. उन्होंने कहा कि परियोजना के माध्यम से पुराने ताप विद्युत संयंत्र की जगह अत्याधुनिक सुपर क्रिटिकल और पर्यावरण अनुकूल बिजली उत्पादन प्रणाली स्थापित की जा रही है, जिससे राज्य की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी. वर्तमान में 1600 मेगावाट बिजली उत्पादन सीईओ ने बताया कि वर्तमान में पीवीयूएनएल की उत्पादन क्षमता 1600 मेगावाट है. पहले चरण के तहत स्थापित दो इकाइयां पहले ही वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर चुकी हैं. पहली 800 मेगावाट इकाई 5 नवंबर 2025 को और दूसरी इकाई 25 जून 2026 को उत्पादन से जुड़ी. उन्होंने कहा कि तीसरी इकाई का निर्माण कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है. इसे चालू वित्तीय वर्ष के भीतर उत्पादन प्रणाली से जोड़ने की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है. कुल पांच इकाइयों की है योजना एके सहगल ने बताया कि पीवीयूएनएल परियोजना के तहत पतरातू में 800-800 मेगावाट की कुल पांच इकाइयां स्थापित की जानी हैं. पहले चरण में तीन इकाइयों का निर्माण किया जा रहा है, जबकि दूसरे चरण की शेष दो इकाइयों के लिए स्वीकृति और निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास जारी है. उन्होंने कहा कि सभी इकाइयों के चालू होने के बाद राज्य की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और झारखंड के साथ-साथ अन्य राज्यों को भी गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी. स्थानीय युवाओं को रोजगार देने पर जोर सीईओ ने कहा कि पीवीयूएनएल की प्राथमिकता रामगढ़ जिले और झारखंड के स्थानीय युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध कराना है. निर्माण कार्य के दौरान परियोजना में करीब आठ से नौ हजार श्रमिक कार्यरत थे. अब दो इकाइयों के संचालन शुरू होने के बाद ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस (ओएंडएम) कार्यों में भी बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार दिया जा रहा है. अनुभवी स्थानीय कर्मियों को प्राथमिकता के आधार पर कार्य से जोड़ा जा रहा है. सहकारी समितियों के माध्यम से बढ़ेगा रोजगार उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष जुलाई से छह सहकारी समितियों का गठन किया गया है, जिनसे वर्तमान में 400 से 550 लोग जुड़े हुए हैं. भविष्य में इन समितियों को ओएंडएम कार्यों के अलावा अन्य गतिविधियों में भी अवसर दिए जाएंगे. इसके साथ ही फ्लाई ऐश आधारित उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देकर स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के नए अवसर विकसित करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है. महिलाओं को फ्लाई ऐश उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी पीवीयूएनएल ने पहल की है. सीईओ ने बताया कि आसपास के 30 गांवों की 30 महिलाओं को 15 दिवसीय प्रशिक्षण देकर फ्लाई ऐश से सजावटी और उपयोगी उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है. इन उत्पादों को झारक्राफ्ट सहित अन्य बाजारों से जोड़ने की योजना बनाई गई है, ताकि महिलाओं को स्थायी आय का स्रोत मिल सके और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें. बिजली व्यवस्था मजबूत करने के लिए युवाओं का प्रशिक्षण उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में विद्युत वितरण प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से रामगढ़ जिले के आसपास के गांवों के 20 युवाओं को जमशेदपुर स्थित प्रशिक्षण संस्थान में चार माह का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इस प्रशिक्षण में 11 केवी ट्रांसफार्मर के रखरखाव, संचालन और सुरक्षा संबंधी तकनीकी जानकारी दी जा रही है. प्रशिक्षण पूरा होने के बाद युवा स्वरोजगार स्थापित कर सकेंगे और राज्य की बिजली व्यवस्था को भी तकनीकी सहयोग प्रदान करेंगे.

बिरसा मुंडा स्मृति पार्क में ट्राइबल बाजार, संस्कृति और प्रदर्शनी बनेगी आकर्षण

रांची  राज्य सरकार विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष नौ अगस्त को आदिवासी महोत्सव का आयोजन करती है। पिछले वर्ष दिशोम गुरु शिबू सोरन के निधन के कारण इस अवसर पर आदिवासी महोत्सव का आयोजन नहीं हो सका था। इस वर्ष आदिवासी महोत्सव को भव्य बनाने की तैयारी है। इस बार यह आयोजन तीन दिनों का होगा। राज्य सरकार इसकी तैयारी में जुट गई है। इस वर्ष भी आदिवासी महोत्सव रांची स्थित बिरसा मुंडा स्मृति पार्क में आयोजित किया जाएगा। इस बार ट्राइबल बाजार इस महोत्सव का विशेष आकर्षण होगा, जिसमें जनजातीय समुदाय द्वारा तैयार सामग्री की प्रदर्शनी लगाई जाएगी। इसके अलावा जनजातीय कला एवं संस्कृति, उनके खान-पान, झारखंड और राष्ट्र के निर्माण में जनजातीय समुदाय की भूमिका को रेखांकित करनेवाली भी प्रदर्शनी लगाई जाएगी। इस बार प्रदर्शनी को एक पारंपरिक प्रदर्शनी के बजाय एक इमर्सिव कल्चरल इकोसिस्टम के तौर पर डिज़ाइन करने का निर्णय लिया गया है। एक नालेज ज़ोन भी होगा, जिसमें लोगों को जनजातीय समुदाय की विशेषताओं की जानकारी दी जाएगी। इकोनामिक जोन में आगंतुकों के खाने-पीने आदि के अलावा सेल्फ हेल्प ग्रुप द्वारा तैयार हैंडीक्राफ्ट, हैंडलूम आदि के स्टाल भी लगाए जाएंगे। महोत्सव की शुरुआत जतरा से होगी, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय कलाकार सम्मिलित होंगे। इसमें 10 हजार लोगों के शामिल होने का अनुमान लगाया गया है। ड्रोन, लेजर एवं लाइट शो में दिखेगी जनजातीय संस्कृति तीन दिनों के आयोजन में ड्रोन एवं लाइट शो भी हाेगा। लेजर शो भी होगा। इसमें जनजातीय संस्कृति को प्रदर्शित किया जाएगा। कार्यक्रम के समापन पर फायरवर्क शो भी हाेगा। दिशोम गुरु पर केंद्रित कई कार्यक्रम इस बार आदिवासी महोत्सव में पद्म भूषण दिशोम गुरू शिबू सोरेन पर केंद्रित कई कार्यक्रम आयोजित होंगे। विभिन्न प्रकार के शो के अलावा एलईडी के माध्यम से झारखंड के निर्माण में उनके योगदान को दर्शाया जाएगा।  

सुरक्षा दावों के बीच धनबाद में बढ़ा अवैध कोयला कारोबार, ड्रोन निगरानी भी नाकाम

धनबाद कोयला चोरी पर अंकुश लगाने के तमाम दावों के बावजूद धनबाद में अवैध कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। आरोप है कि कोयला चोरों को स्थानीय पुलिस और सीआईएसएफ के कुछ कर्मियों का संरक्षण मिल रहा है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी जारी है। जनवरी से मई 2026 के बीच कोयला चोरी के 522 मामले बीसीसीएल ने दर्ज किए गए। यह आंकड़ा बीसीसीएल मुख्यालय के पास दर्ज है। इसी को लेकर लगातार सुरक्षा एजेंसी, बीसीसीएल प्रंबधन के साथ समीक्षा भी हो रही है। इस दौरान करीब 2972.13 मीट्रिक टन कोयला चोरी करने का प्रयास हुआ, जिसकी अनुमानित कीमत 2.37 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी, ड्रोन सर्विलांस और संयुक्त अभियान के बावजूद चोरी की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। कोयला कंपनियों और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि लगातार कार्रवाई के बावजूद चोरी के प्रयास जारी हैं। पांच महीनों में कुल 30 एफआईआर दर्ज की गईं, जबकि कई मामलों में तकनीकी निगरानी के आधार पर कार्रवाई की गई। मई में सबसे अधिक मामले सामने आने से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है। प्रशासन का मानना है कि संगठित गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई के बिना कोयला चोरी पर पूरी तरह नियंत्रण संभव नहीं होगा। ड्रोन से 333 बार निगरानी, फिर भी नहीं थमी चोरी कोयला चोरी रोकने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में ड्रोन के माध्यम से लगातार निगरानी की जा रही है। जनवरी से मई तक कुल 333 बार ड्रोन सर्विलांस किया गया। निगरानी के आधार पर 140 कार्रवाई की गईं, लेकिन चोरी की घटनाओं पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी। जनवरी में 78, फरवरी में 87, मार्च में 120, अप्रैल में 109 और मई में 128 घटनाएं दर्ज होने के बावजूद पुलिस और प्रबंधन की ओर से लगातार कार्रवाई जारी है। 232 अवैध खनन स्थलों को किया गया बंद अवैध खनन रोकने के लिए पांच महीनों में 232 अवैध माइनिंग साइटों को भरकर बंद किया गया। अप्रैल में सबसे अधिक 57 और मई में 51 स्थलों पर कार्रवाई हुई। इसके अलावा मार्च में 44, फरवरी में 39 तथा जनवरी में 41 अवैध खनन स्थलों को बंद कराया गया। आईसीसीसी की निगरानी से पकड़े गए 476 मामले इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (आईसीसीसी) की निगरानी से 476 मामले चिन्हित किए गए। इनमें 474 मामलों में कार्रवाई की गई तथा 118 मीट्रिक टन कोयला बरामद किया गया। इसकी अनुमानित कीमत 10.12 लाख रुपये बताई गई है। मानसून से पहले बढ़ी चुनौती अधिकारियों के अनुसार मानसून से पहले अवैध खनन और कोयला चोरी की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। इसे देखते हुए सीआईएसएफ, स्थानीय पुलिस और कोयला कंपनियों की सुरक्षा टीमों द्वारा संयुक्त अभियान चलाया जा रहा है। रात में गश्त बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात करने की भी व्यवस्था की गई है। सबसे ज्यादा मामले मई : 128 मामले मार्च : 120 मामले अप्रैल : 109 मामले फरवरी : 87 मामले जनवरी : 78 मामले