samacharsecretary.com

रांची में कर्मचारी पेंशन विवाद, हाई कोर्ट ने सरकार की कार्यशैली पर जताई नाराजगी

रांची  झारखंड हाई कोर्ट में गुमला जिला के बैजनाथ जालान कालेज, सिसई के तृतीय वर्गीय कर्मचारी दिनेश साहू को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिए जाने के मामले में दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद अदालत ने उच्च शिक्षा निदेशक की कार्यशैली पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि जब समान परिस्थितियों वाले दूसरे कर्मियों को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ दिया जा चुका है, तो प्रार्थी को इससे वंचित रखना उचित नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित उच्च शिक्षा निदेशक सुधीर बाड़ा को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर मामले की पुनः समीक्षा कर दिनेश साहू को पंचम एवं छठा वेतनमान का लाभ देते हुए पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान सुनिश्चित करें। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई के पहले सप्ताह में निर्धारित करते हुए अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। उच्च शिक्षा निदेशक की ओर से दाखिल शपथ पत्र में कहा गया था कि विभाग ने सकारण आदेश पारित कर प्रार्थी को एकल पीठ के आदेश के अनुरूप लाभ नहीं देने का निर्णय लिया है। इस पर हाई कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए उस सकारण आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि दिनेश साहू का मामला उपेंद्र प्रसाद एवं अन्य कर्मियों के मामले के समान है। कोर्ट ने कहा कि प्रार्थी का समायोजन और नियमितीकरण भी उसी पत्र के आधार पर हुआ था, जिसके आधार पर उपेंद्र प्रसाद एवं अन्य कर्मियों को लाभ मिला। इसलिए दिनेश साहू को भी वही लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि प्रार्थी के मामले में सरकार ने अब तक कोई अपील दाखिल नहीं की है, जबकि उपेंद्र प्रसाद मामले में अपील समय सीमा के भीतर दाखिल नहीं होने के कारण खारिज हुई थी। इसका हवाला देकर प्रार्थी के मामले को लंबित रखना अनुचित है। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता प्रेम पुजारी ने अदालत को बताया कि दिनेश साहू वर्ष 2022 में बैजनाथ जालान कालेज, सिसई (गुमला) से तृतीय वर्गीय कर्मचारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें फिलहाल प्रोविजनल रूप से पंचम वेतनमान का लाभ मिल रहा है। उनकी सेवा समायोजन और नियमितीकरण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में वर्ष 2005 और 2007 में हुआ था। दिनेश साहू के मामले में सरकार ने एकल पीठ के आदेश को कभी चुनौती ही नहीं दी। बता दें कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने वर्ष 2024 में ही दिनेश साहू को पंचम एवं छठा वेतनमान का लाभ देते हुए पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान करने का निर्देश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर प्रार्थी ने अवमानना याचिका दाखिल की है।

झारखण्ड हाई कोर्ट ने हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन पर मांगा जवाब

 रांची झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के गंभीर मामले पर सख्ती दिखाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन से कड़े सवाल पूछे. कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि हिरासत में मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सीसीटीवी और निगरानी व्यवस्था पर सवाल सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सरायकेला एसपी से पूछा कि राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं. अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि क्या हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं. कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था की कमी को गंभीरता से लिया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग से भी मांगा जवाब अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी तलब किया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि वे यह स्पष्ट करें कि पीड़ित तरुण महतो को “फिट फॉर कस्टडी” का प्रमाण पत्र देने वाले चिकित्सक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है. यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि हिरासत में किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है, और इसमें लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है. पीड़ित को मिला मुआवजा राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पीड़ित तरुण महतो को 1.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है. हालांकि, अदालत का ध्यान केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरे मामले में जवाबदेही तय करना चाहती है. कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो. घटना की पृष्ठभूमि यह मामला 19 नवंबर 2025 की रात का है, जब ईचागढ़ पुलिस तरुण महतो को हिरासत में लेकर गई थी. आरोप है कि थाने में उसकी बेरहमी से पिटाई की गई. इस घटना के बाद पीड़ित की पत्नी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी. इसी पत्र को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया. अगली सुनवाई 18 जून को खंडपीठ ने सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 18 जून को निर्धारित की गई है. अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन कोर्ट के सवालों का क्या जवाब देता है और इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है.

धनबाद CSIR विवाद,1 लाख से 16 लाख किराया बिल, हाईकोर्ट ने पुनर्मूल्यांकन का आदेश

रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सीएसआइआर), धनबाद के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सरकारी आवास के किराया बिल में छह माह के भीतर एक लाख रुपये से बढ़कर 16 लाख रुपये हो जाने के मामले सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए CSIR के निदेशक से पूछा कि आखिर इतनी कम अवधि में हाउस रेंट की राशि में इतना बढ़ोतरी कैसे हो गई। खंडपीठ ने CSIR के निदेशक को निर्देश दिया कि सेवानिवृत्त कर्मी गोपाल चंद्र लोहार के 16 लाख रुपये के हाउस रेंट बिल का पुनर्मूल्यांकन कर नए सिरे से गणना की जाए। मामले की अगली सुनवाई एक मई को निर्धारित की गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में सीएसआइआर के निदेशक, सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए। अदालत ने अगली सुनवाई में निदेशक को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी, लेकिन सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी को उपस्थित रहने का निर्देश दिया। प्रार्थी गोपाल चंद्र लोहार वर्ष 1989 में सीएसआइआर धनबाद में टेक्नीशियन पद पर नियुक्त हुए थे। वह 31 दिसंबर 2021 को सेवानिवृत्त हुए। आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद करीब आठ माह तक उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान नहीं किया गया। संस्थान की ओर से उन्हें पत्र देकर सूचित किया गया था कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें आवंटित आवास का किराया 9,995 रुपये प्रतिमाह देना होगा। 17 अप्रैल 2023 को संस्थान ने उन्हें आवास किराया का बकाया 1,06,403 रुपये बताया। इसके बाद नवंबर 2023 में उन्होंने आवास खाली कर दिया। बाद में संस्थान ने आवास किराया बकाया राशि बढ़ाकर 16,11,163 रुपये बता दिया। प्रार्थी का आरोप है कि ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट मद में बकाया लगभग 23 लाख रुपये में से 16 लाख रुपये काटने की मंशा से यह राशि बढ़ाई गई। ट्रिब्यूनल के आदेश पर भी सवाल प्रार्थी ने सरकारी क्वार्टर के किराया एवं दंडात्मक शुल्क की गणना को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि ट्रिब्यूनल ने बिना उचित कारण बताए उनकी याचिका खारिज कर दी और आदेश अत्यंत संक्षिप्त दिया। हाई कोर्ट ने पूर्व की सुनवाई में टिप्पणी करते हुए था कि 17 अप्रैल 2023 को 1,06,403 रुपये और 22 अप्रैल 2024 को 16,11,163 रुपये की गणना के बीच भारी अंतर है, जबकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इतनी वृद्धि किस आधार पर हुई। अदालत ने यह भी कहा था कि पहली गणना प्रशासनिक अधिकारी ने की थी, जबकि बाद की गणना उससे निम्न स्तर के सेक्शन अफसर द्वारा की गई। ट्रिब्यूनल ने बिना जवाब मांगे ही मामले का निपटारा कर दिया, जो प्रथम दृष्टया उचित नहीं प्रतीत होता।

बोकारो में कंकाल मामले पर HC का बड़ा सवाल, पुलिस की लापरवाही पर जताई नाराजगी

 बोकारो झारखंड के बोकारो में एक युवती के लापता होने और उसके बाद जंगल से एक महिला का कंकाल मिलने के मामले में पुलिस की लापरवाही को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP), बोकारो SP, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) के निदेशक और विशेष जांच टीम (SIT) को समन जारी करते हुए 16 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। यह समन जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने लापता लड़की की मां रेखा देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। उनकी 18 वर्षीय बेटी 31 जुलाई 2025 से लापता है। इस संबंध में बोकारो के पिंड्राजोरा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी, लेकिन पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किए जाने पर लापता लड़की की मां ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बिना जांच के पुलिस ने किया बड़ा दावा इसी बीच हाल ही में बोकारो पुलिस ने जंगल से एक स्त्री का कंकाल बरामद किया और दावा किया कि यह लापता लड़की का हो सकता है। हालांकि याचिकाकर्ता रेखा देवी के वकील ने अदालत को बताया कि बोकारो पुलिस द्वारा बरामद किया गया महिला का कंकाल लापता पीड़िता का नहीं है। 'कंकाल मिलने के बाद भी DNA मिलान नहीं कराया' इसके बाद न्यायाधीशों ने सरकार से पूछा कि क्या उस कंकाल का रेखा देवी और उनके पति के साथ DNA के साथ मिलान किया गया है। तब ना में जवाब मिलने पर अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि कंकाल के कई दिन पहले ही बरामद हो जाने के बावजूद, कोई DNA टेस्ट नहीं किया गया और न ही कोई सैंपल लिया गया। HC ने कहा- पूरी प्रक्रिया में की जा रही देरी अदालत को बताया गया कि इस मामले में दिनेश महतो नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, जबकि बोकारो के एक जंगल से एक महिला का कंकाल बरामद किया गया है। तो जजों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सैंपल पहले ही ले लिया गया होता, तो नतीजा कुछ ही घंटों में पता चल जाता, लेकिन बिना किसी वजह के पूरी प्रक्रिया में देरी की जा रही है। 18 पुलिस कांस्टेबलों को किया गया निलंबित इसी बीच, बोकारो SP ने इस केस में ड्यूटी के दौरान लापरवाही बरतने के आरोप में पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन के इंचार्ज सहित 18 पुलिस कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया है। रेखा देवी की 18 साल की बेटी 31 जुलाई, 2025 को लापता हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई थी। लेकिन बेटी का खोजने के लिए पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर, रेखा देवी ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की, तब जाकर पुलिस हरकत में आई।  

ओपन जेलों की स्थिति पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को रिपोर्ट देने का निर्देश

 रांची झारखंड हाईकोर्ट ने सूबे की ओपन जेलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए बड़ा कदम उठाया है. सोमवार को कोर्ट ने जनहित याचिका में तब्दील स्वत: संज्ञान पर सुनवाई की. इस मामले को न्यायपालिका ने जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हुए व्यापक निगरानी का निर्देश दिया है. इसके लिए अदालत ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि गृह सचिव की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति का गठन किया जाए. पीठ ने दिए सख्त निर्देश चीफ जस्टिस एमएस सौनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए. कोर्ट ने कहा कि ओपन जेलों की स्थिति सुधारने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए. इस समिति की अध्यक्षता गृह सचिव करेंगे और इसमें कारा महानिदेशक तथा संबंधित जेल अधीक्षक को भी शामिल किया जा सकता है. स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक गठित समिति की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले की अगली सुनवाई 11 जून 2026 को होगी. कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ओपन जेलों में सुधार के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन जरूरी इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी शामिल हैं. सर्वोच्च अदालत ने देशभर की ओपन जेलों की मॉनिटरिंग के लिए गृह विभाग को कमेटी बनाने और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का निर्देश दिया है. इसमें चिकित्सा सुविधा, जिम, भोजन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को सुधारने पर विशेष जोर दिया गया है. कैदियों के पुनर्वास पर फोकस ओपन जेलों का उद्देश्य कैदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया को मजबूत करना है. ऐसे में वहां की सुविधाओं का बेहतर होना बेहद जरूरी है. हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए इस मामले को गंभीरता से लिया है. पहले स्वत: संज्ञान, अब जनहित याचिका गौरतलब है कि झारखंड हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया था. अब इसे जनहित याचिका में तब्दील कर दिया गया है, जिससे इस मुद्दे पर नियमित सुनवाई और निगरानी सुनिश्चित हो सके. सुधार की दिशा में अहम कदम हाईकोर्ट का यह कदम राज्य की जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यदि कोर्ट के निर्देशों का सही तरीके से पालन होता है, तो ओपन जेलों में रहने वाले कैदियों को बेहतर जीवन स्तर और पुनर्वास के अवसर मिल सकेंगे.

झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख, नामांकन पर रोक के बाद अब 10 अप्रैल को होगी अधिकारियों से सीधी जवाब-तलब

रांची रांची विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (आईएलएस) में बुनियादी सुविधाओं और अकादमिक फैकल्टी की कमी का मामला अब गंभीर रूप ले चुका है. इस मुद्दे पर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगते हुए कई शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है. कोर्ट का सख्त रुख सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रांची विश्वविद्यालय का पक्ष सुना, लेकिन स्थिति से संतुष्ट नहीं हुआ. कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा विभाग के सचिव, वित्त विभाग के सचिव, विश्वविद्यालय के कुलपति, डीन और आईएलएस के निदेशक को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का आदेश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले को हल्के में नहीं लिया जाएगा. 10 अप्रैल को अगली सुनवाई हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 अप्रैल की तारीख तय की है. माना जा रहा है कि इस दिन कोर्ट संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब करेगा और संस्थान में व्याप्त समस्याओं के समाधान को लेकर ठोस निर्देश दे सकता है. इससे विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव और बढ़ गया है. याचिका में उठाए गए गंभीर मुद्दे प्रार्थी अंबेश कुमार चौबे और अन्य की ओर से दायर याचिका में आईएलएस में फैकल्टी की भारी कमी, पर्याप्त क्लासरूम, लाइब्रेरी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मुद्दा उठाया गया है. याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि इस स्थिति में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना मुश्किल हो गया है. बीसीआई मानकों की अनदेखी इससे पहले की सुनवाई में भी कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के निर्धारित मानकों की अनदेखी पर नाराजगी जताई थी. कोर्ट ने पाया कि संस्थान में कई जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जो किसी भी विधि संस्थान के लिए अनिवार्य होती हैं. इस पर कोर्ट ने कड़ा कदम उठाते हुए नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 में नामांकन पर रोक लगा दी थी. छात्रों के भविष्य पर संकट आईएलएस में सुविधाओं की कमी का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा है. उचित फैकल्टी और संसाधनों के अभाव में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है. इससे उनकी पेशेवर तैयारी और करियर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. छात्र और अभिभावक दोनों इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं. अब सुधार की उम्मीद हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस मामले में तेजी से सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे. यदि संबंधित विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन समय रहते आवश्यक कदम उठाते हैं, तो संस्थान की स्थिति में सुधार संभव है और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सकता है.

कैट का आदेश रद्द, हाईकोर्ट ने रेलवे की कार्रवाई को बताया भेदभावपूर्ण और मनमाना

रांची झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे भर्ती से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए कैट (केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण) की रांची सर्किट बेंच के 23 अक्टूबर 2024 के आदेश को निरस्त कर दिया. साथ ही अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के अंदर याचिककर्ता को नियुक्ति पत्र जारी किया जाए. भेदभावपूर्ण और मनमाना था निर्णय जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद व जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ ने कैट की रांची सर्किट बेंच के आदेश को रद्द कर दिया. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार करना असंवैधानिक है. कहा कि समान परिस्थितियों में अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति दी गई है, लेकिन याचिककर्ता को नियुक्ति से वंचित किया गया. ऐसा करना भेदभावपूर्ण और मनमाना है. क्या है पूरा मामला प्रार्थी रविशंकर कुमार भारतीय सेना में 16 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दे चुके थे. उन्होंने रेलवे की नॉन टेक्निकल पापुलर कैटिगरीज के तहत आवेदन किया था. नियम के मुताबिक अभ्यर्थी का 31 मार्च 2020 तक सेना से सेवानिवृत्त होना जरूरी था, जबकि प्रार्थी 30 अप्रैल 2020 को सेवानिवृत्त हुए थे. दस्तावेज सत्यापन के दौरान रेलवे ने उनकी उम्मीदवारी को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि वे कट-ऑफ तिथि के भीतर सेवानिवृत्त नहीं हुए और आवेदन में गलत जानकारी दी है.  इसके बाद प्रार्थी ने रेलवे के निर्णय को कैट में चुनाैती दी थी. कैट ने रविशंकर कुमार की याचिका खारिज करते हुए रेलवे के निर्णय को सही ठहराया था. याचिककर्ता रविशंकर कुमार ने कोर्ट में याचिका दायर कर कैट के आदेश को चुनाैती दी थी और अपनी नियुक्ति की मांग की थी.

जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक बने झारखंड HC के नए चीफ जस्टिस, पद एवं गोपनीयता की शपथ

रांची झारखंड हाईकोर्ट को नया मुख्य न्यायाधीश मिल गया है। लोकभवन में शुक्रवार को यहां आयोजित समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक को झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ दिलाई। इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, झारखंड हाईकोर्ट के अन्य न्यायाधीश, महाधिवक्ता, स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी और राज्य सरकार के मंत्री उपस्थित रहे। समारोह के दौरान सभी गणमान्य लोगों ने नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक का कार्यकाल 28 नवंबर 2026 तक रहेगा। उनका स्थानांतरण बॉम्बे हाईकोर्ट से झारखंड हाईकोर्ट किया गया है। जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक को अक्टूबर 1988 में महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकित किया गया था। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की पणजी पीठ में सिविल एवं संवैधानिक कानून, श्रम एवं सेवा कानून, पर्यावरण कानून, वाणिज्यिक व कर कानून, कंपनी कानून तथा जनहित याचिकाओं के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभावी प्रैक्टिस की। अपने विधिक कैरियर के दौरान उन्होंने केंद्र सरकार के लिए अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता, राज्य सरकार के लिए विशेष अधिवक्ता तथा विभिन्न निगमों को कानूनी सेवाएं प्रदान कीं। उनकी विधिक दक्षता और अनुभव को देखते हुए 21 जून 2013 को उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। जस्टिस सोनक का जन्म 28 नवंबर 1964 को हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गोवा के पणजी स्थित डॉन बॉस्को हाई स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद धेम्पे कॉलेज ऑफ आट्र्स एंड साइंस से बीएससी तथा एमएस कॉलेज ऑफ लॉ, पणजी से प्रथम श्रेणी में एलएलबी की डिग्री हासिल की। इसके अतिरिक्त उन्होंने जेवियर सेंटर ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च से पुर्तगाली भाषा में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है।  

झारखंड HC ने विद्युत शुल्क अधिनियम किया निरस्त

रांची. झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के औद्योगिक और बिजली क्षेत्र को बड़ी राहत देते हुए सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 2021 तथा उससे जुड़े विद्युत शुल्क नियम 2021 को असंवैधानिक और मनमाना करार देते हुए निरस्त कर दिया है। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला मेसर्स पाली हिल ब्रुअरीज प्राइवेट लिमिटेड समेत 30 से अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद दिया। इन याचिकाओं में बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कैप्टिव पावर उत्पादकों, स्टील और खनन कंपनियों तथा औद्योगिक संगठनों ने राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने मूल कानून बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम, 1948 (जिसे झारखंड ने अपनाया है) की चार्जिंग धारा में संशोधन किए बिना ही बिजली शुल्क की गणना की पद्धति बदल दी गई। बिजली शुल्क केवल खपत या बिक्री की गई बिजली की इकाइयों (यूनिट) पर ही लगाया जा सकता है। नेट चार्जेज के आधार पर शुल्क लगाने का कोई कानूनी प्रविधान नहीं है। नेट चार्जेज शब्द की परिभाषा कानून में नहीं दी गई, जिससे यह व्यवस्था अस्पष्ट और मनमानी बन जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक मामले में नई व्यवस्था के कारण किसी औद्योगिक उपभोक्ता पर बिजली शुल्क में लगभग 1000 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई थी। नेट चार्जेज के आधार पर शुल्क लगाने का कोई कानूनी प्रविधान नहीं है। खंडपीठ ने उस प्रविधान को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को अधिसूचना जारी कर बिजली शुल्क की दरें बदलने का अधिकार दिया गया था। अदालत ने इसे बिना किसी स्पष्ट नीति के विधायी शक्तियों का अत्यधिक हस्तांतरण बताया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि विद्युत नियामक आयोग द्वारा तय टैरिफ से बिजली शुल्क को जोड़ना समान परिस्थितियों वाले उपभोक्ताओं के बीच असमानता पैदा कर सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि, कोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2021 को वैध ठहराया। इस संशोधन के तहत कैप्टिव पावर प्लांट्स पर 17 फरवरी 2022 से 50 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली शुल्क लगाया गया है। अदालत ने कहा कि कर दर तय करना राज्य की आर्थिक नीति का विषय है और जब तक इसमें संवैधानिक उल्लंघन न हो, न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। प्रार्थियों की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने कानून की मूल संरचना को बदले बिना ही टैक्स लगाने की पूरी प्रणाली बदल दी, जो संविधान और स्थापित न्याय सिद्धांतों के विपरीत है।

कानून-व्यवस्था पर सख्ती: झारखंड HC ने थानों में CCTV लगाने की तय की अंतिम तिथि

रांची  झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रदेश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरा लगाने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि यह कार्यवाही तय समयसीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए, ताकि थानों में होने वाली हर गतिविधि पारदर्शी रहे और किसी भी प्रकार की अवैध कारर्वाई पर रोक लग सके। झारखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को ‘प्रॉपर्टी रिएल्टी प्राइवेट लिमिटेड‘, शौभिक बनर्जी सहित अन्य की ओर से दाखिल एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।  पिछली सुनवाई में अदालत ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और आईटी विभाग की सचिव को सशरीर उपस्थित होने का आदेश दिया था। अदालत के निर्देश पर ये सभी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित हुए और कोर्ट के समक्ष अब तक की प्रगति रिपोर्ट पेश की। सभी 334 थानों में जल्द से जल्द कैमरे लगाने का आदेश सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि 31 दिसंबर से पहले सभी जिलों के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) और टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। इसके बाद राज्य के सभी 334 थानों में जल्द से जल्द कैमरे लगाने का काम आरंभ किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सीसीटीवी कैमरे चालू अवस्था में रहें और उनका डाटा नियमित रूप से संरक्षित किया जाए। साथ ही कोटर् ने 5 जनवरी तक आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट मांगी है। यह मामला पश्चिम बंगाल निवासी शौभिक बनर्जी की याचिका पर आधारित है। याचिकाकर्ता ने बताया कि चेक बाउंस मामले में वह धनबाद कोर्ट में जमानत के लिए आए थे, लेकिन धनबाद पुलिस ने उन्हें दो दिनों तक अवैध रूप से थाना परिसर में रोके रखा और जबरन दबाव बनाकर दूसरे पक्ष का पक्ष लिया। उन्होंने दावा किया कि पूरी घटना बैंक मोड़ थाना में लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हुई थी, किंतु पुलिस ने अदालत को बताया कि केवल दो दिन का ही सीसीटीवी बैकअप उपलब्ध है। अदालत ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि धनबाद जैसे अपराधग्रस्त शहर में सीसीटीवी डेटा का सही रखरखाव न होना बेहद चिंताजनक है। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो और सभी थानों में रिकॉडिर्ंग का पर्याप्त स्टोरेज सुनिश्चित किया जाए।