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77 करोड़ के कर्ज मामले में हाईकोर्ट सख्त, बैंक को सेल सर्टिफिकेट जारी करने की मंजूरी

 रांची  झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) के अध्यक्ष अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर कोई न्यायिक या स्थगन आदेश पारित नहीं कर सकते। अदालत ने कर्जदार द्वारा अपनाई गई कानूनी दांवपेच की रणनीति बताते हुए उनकी कड़ी निंदा की और बैंक को सफल नीलामी खरीदार के पक्ष में तुरंत सेल सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कर्जदार पर 77 करोड़ से अधिक का बकाया है। यह जनता का पैसा है जिसे कानूनन वसूला जाना जरूरी है। कर्जदार ने लोन चुकाने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि केवल वसूली प्रक्रिया को टालने के लिए कानूनी दांवपेंच अपनाए। एकल पीठ ने उक्त निर्णय इंडियन बैंक बनाम मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड और नीलामी खरीदार यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड द्वारा दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। क्या है पूरा मामला? देवघर स्थित मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने अस्पताल स्थापित करने के लिए इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) से करोड़ों रुपये का लोन लिया था, जो बाद में बढ़कर ₹19.45 करोड़ तक पहुंच गया। लोन न चुकाने के कारण 31 दिसंबर 2009 को इस खाते को एनपीए घोषित कर दिया गया। साल 2015 में बैंक और अस्पताल प्रबंधन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके बाद बैंक ने अस्पताल की जब्त संपत्ति वापस लौटा दी। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया। इसके बाद बैंक ने करीब 70.92 करोड़ की बकाया राशि की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के तहत नए सिरे से कार्रवाई शुरू की। बैंक ने सात अप्रैल 2026 को अस्पताल की संपत्तियों की नीलामी की, जिससे 44.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इस नीलामी में यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड सबसे बड़ा बोलीदाता बनकर उभरा और उसने पूरी रकम जमा कर दी। डीआरएटी के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी), रांची के बंद होने का हवाला देते हुए कर्जदार अस्पताल ने इलाहाबाद स्थित अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) में याचिका दाखिल की डीआरएटी के अध्यक्ष ने आरडीबी एक्ट की धारा 17ए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 10 अप्रैल 2026 को बैंक को नीलामी की रकम स्वीकार करने की अनुमति तो दी, लेकिन खरीदार को सेल सर्टिफिके जारी करने पर रोक लगा दी थी। इस स्थगन आदेश के खिलाफ बैंक और नीलामी खरीदार दोनों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां और फैसला हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डीआरएटी के आदेश को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर माना। पीठ ने कहा कि कर्जदार ने कोर्ट में पहले भी अर्जी दी थी, जहां उन्हें राहत पाने के लिए दो करोड़ जमा करने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने वह राशि जमा नहीं की और चालाकी से डीआरएटी में बिना कोई प्री-डिपाजिट किए राहत पा ली, जो कि पूरी तरह से अनुचित है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डीआरएटी द्वारा 10 अप्रैल 2026 और 21 अप्रैल 2026 को जारी अंतरिम स्थगन आदेशों को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि अब बैंक द्वारा नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।

डिजिटल जमीन रिकॉर्ड का अंचल अधिकारी करेगा सत्यापन, गलतियों पर जताई चिंता

रांची  झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने राज्य में आनलाइन भूमि अभिलेखों में लगातार हो रही त्रुटियों और विसंगतियों पर चिंता जताते हुए बुधवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि आनलाइन भूमि रिकार्ड भौतिक अभिलेखों की हूबहू कापी होनी चाहिए। इसके लिए अब सभी डिजिटल भूमि अभिलेखों का संबंधित अंचल अधिकारियों (सीओ) द्वारा सत्यापन किया जाएगा और सत्यापन के बाद ही उन्हें डिजिटल हस्ताक्षर के साथ पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाएगा। अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को आदेश का तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करने तथा सभी संबंधित अधिकारियों को आवश्यक प्रशासनिक निर्देश जारी करने को कहा है। वहीं, प्रार्थी को तीन सप्ताह के भीतर अंचल अधिकारी कुड़ू के समक्ष आवेदन देने का निर्देश देते हुए कहा गया कि मामले का निष्पादन 12 सप्ताह के भीतर किया जाए। अदालत ने प्रार्थी राम प्रकाश भगत की याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। प्रार्थी ने शिकायत की थी कि उसके पूर्वजों के नाम दर्ज भूमि का रिकार्ड भौतिक दस्तावेजों में सही है, लेकिन आनलाइन रजिस्टर और डिजिटल रिकार्ड में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज हो गया है, जिसके कारण उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य में बड़ी संख्या में रैयत इसी तरह की शिकायतों के साथ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि डेटा एंट्री में हुई मानवीय त्रुटियों और पर्याप्त सत्यापन तंत्र के अभाव में आनलाइन रिकार्ड और भौतिक अभिलेखों के बीच अंतर उत्पन्न हो रहा है, जिससे नागरिकों को अनावश्यक मुकदमेबाजी करनी पड़ रही है।

यौन हिंसा मामलों पर झारखंड HC सख्त, पीड़ितों के लिए समयबद्ध राहत और पुनर्वास के निर्देश

 रांची झारखंड हाई कोर्ट ने महिलाओं और यौन हिंसा की पीड़िताओं के अधिकारों, सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका मामले में राज्य सरकार, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों को कई अहम निर्देश दिए हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा और POCSO मामलों में, क्षेत्राधिकार का हवाला देकर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता और Zero FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है. मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 8 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में कहा कि Zero FIR दर्ज नहीं करना कानून के उल्लंघन के समान है. Zero FIR दर्ज करने में लापरवाही पर अदालत सख्त झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को BNSS 2023 की धारा 173 के तहत Zero FIR दर्ज करने की व्यवस्था को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. इसके साथ ही अदालत ने पुलिसकर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाने के भी आदेश दिए हैं. साथ ही, अदालत ने महिला और बाल विकास विभाग को राज्यभर में वन-स्टॉप सेंटरों की कार्यप्रणाली को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि इन केंद्रों की निगरानी के लिए एक समिति बनाई जाए ताकि मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित हो सके. यौन हिंसा पीड़ितों के लिए राहत और पुनर्वास पर जोर हाईकोर्ट ने यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए सरकार को और प्रभावी कदम उठाने को कहा है. अदालत ने पाया कि कई मामलों में पीड़ितों को समय पर सहायता नहीं मिलती, जिससे प्रक्रिया प्रभावित होती है. इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ितों को तुरंत कानूनी और सामाजिक सहायता मिलनी चाहिए. दुष्कर्म पीड़ित बच्चों को मुफ्त शिक्षा और छात्रवृत्ति का आदेश अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर जिले में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जाए, जो दुष्कर्म से जन्मे बच्चों की शिक्षा और समग्र विकास की निगरानी करेगा. ऐसे बच्चों को बारहवीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी.वहीं, यदि कोई छात्र आईआईटी, एनआईटी, एम्स या आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश प्राप्त करता है, तो उसे उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति का लाभ भी दिया जाए. प्रमुख निर्देश और व्यवस्था हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे की शुरुआत में ही ट्रायल कोर्ट यह तय करे कि पीड़िता को अंतरिम राहत देने की जरूरत है या नहीं. मामले का अंतिम फैसला चाहे किसी भी रूप में आए, पीड़िता के लिए अंतिम मुआवजा तय करना जरूरी होगा. मुआवजे की राशि का भुगतान 30 दिनों के अंदर करने का निर्देश दिया गया है. यौन अपराध से जुड़े मामलों का निपटारा तय समयसीमा में हो और इसके लिए बीएनएसएस की धारा 346 का पालन किया जाए. अदालतों को बेवजह तारीख पर तारीख देने से बचने को कहा गया है, ताकि मामलों का जल्द निष्पादन हो सके. पुलिस महानिदेशक को एक विशेष निगरानी दल बनाने का निर्देश दिया गया है, जो समय-समय पर ऐसे मामलों की समीक्षा करेगा. मीडिया, पुलिस और न्यायालय से जुड़े सभी कर्मियों को पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा. पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने या उसकी गोपनीयता भंग करने वालों पर सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी. दुष्कर्म के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा गया है. अंतिम जांच दो महीने के अंदर समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है. सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को पीड़ितों को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है. पॉक्सो से जुड़े मामलों में 24 घंटे के भीतर आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करनी होगी. यौन अपराध से पीड़ित महिलाओं और बच्चियों का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाएगा. सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रतिबंधित चिकित्सीय जांच पद्धति पर पूरी तरह रोक लगाने और उसका सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया गया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रतिबंध का उल्लंघन गंभीर पेशेवर कदाचार माना जाएगा. दूरस्थ क्षेत्रों की किशोरियों और महिलाओं के लिए कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे. स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में निःशुल्क आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने पर जोर दिया गया है. यदि किसी पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक कारणों से स्थान बदलना पड़े, तो सरकार उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था करेगी. महिला हेल्पलाइन 181 को और अधिक प्रभावी बनाने तथा उसे आपातकालीन सेवा 112 से जोड़ने पर विचार करने का निर्देश दिया गया है.

झारखंड: शिक्षकों के हित में हाईकोर्ट का अहम फैसला, सरकार को समयसीमा में निर्णय का निर्देश

रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण आदेश में राज्य के प्राथमिक स्कूलों में कार्यरत सहायक शिक्षकों को एमएसीपी योजना का लाभ दिए जाने के मामले में सरकार को 16 सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया है। एकल पीठ ने जामताड़ा जिले के 84 शिक्षकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त आदेश पारित किया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स और शिवम पाठक ने अदालत को बताया कि राज्य के अन्य स्कूलों (जैसे अल्पसंख्यक स्कूल, आवासीय विद्यालय) तथा बिहार राज्य के शिक्षकों को एमएसीपी का लाभ पहले से दिया जा रहा है, जबकि प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों को यह सुविधा नहीं मिल पाई है। याचिका में राज्य सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे इन शिक्षकों को भी एमएसीपी का लाभ दें। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि सरकार ने सात अगस्त 2024 को झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ को पत्र लिखकर एमएसीपी की प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि अन्य विद्यालयों के शिक्षकों को यह लाभ मिल रहा है और सरकार ने इस विषय पर विचार-विमर्श शुरू भी कर दिया है, इसलिए यह आवश्यक है कि प्राथमिक शिक्षकों के संबंध में भी जल्द से जल्द फैसला लिया जाए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सरकार इस मामले में अंतिम निर्णय लें। पूरी प्रक्रिया इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 16 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए। अदालत ने याचिका निष्पादित कर दी। 16,290 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन देने का आदेश हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम जिले के 80 प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षकों की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें 16,290 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता मैट्रिक और इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक हैं, जिन्होंने वर्ष 2006 से पहले सेवा में आए थे। उनकी मांग थी कि छठें वेतन आयोग की संस्तुतियों के तहत जारी वित्त विभाग के प्रस्ताव के अनुसार उनका प्रारंभिक वेतन एक जनवरी 2006 से 16,290 रुपये निर्धारित किया जाए। शिक्षकों ने शिक्षा विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि यह वेतनमान केवल झारखंड सचिवालय के सहायकों पर लागू होता है। अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला पूर्व में एक मामले में कोर्ट के निर्णय (27 नवंबर 2025) से पूरी तरह आच्छादित है। अदालत ने शिक्षकों के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए विभाग के 10 जून 2024 के सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने राज्य को निर्देश दिया कि वह इन याचिकाकर्ताओं को वही, लाभ प्रदान करे जो पिछले मामले के याचिकाकर्ताओं को दिए गए थे। सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले संबंधित मामले के निर्णय के खिलाफ सरकार ने खंडपीठ में अपील दायर कर दी है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील के आदेश से शिक्षकों न्यूनतम वेतनमान प्रभावित होगा। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह ने पक्ष रखा।

रांची में कर्मचारी पेंशन विवाद, हाई कोर्ट ने सरकार की कार्यशैली पर जताई नाराजगी

रांची  झारखंड हाई कोर्ट में गुमला जिला के बैजनाथ जालान कालेज, सिसई के तृतीय वर्गीय कर्मचारी दिनेश साहू को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिए जाने के मामले में दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद अदालत ने उच्च शिक्षा निदेशक की कार्यशैली पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि जब समान परिस्थितियों वाले दूसरे कर्मियों को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ दिया जा चुका है, तो प्रार्थी को इससे वंचित रखना उचित नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित उच्च शिक्षा निदेशक सुधीर बाड़ा को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर मामले की पुनः समीक्षा कर दिनेश साहू को पंचम एवं छठा वेतनमान का लाभ देते हुए पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान सुनिश्चित करें। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई के पहले सप्ताह में निर्धारित करते हुए अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। उच्च शिक्षा निदेशक की ओर से दाखिल शपथ पत्र में कहा गया था कि विभाग ने सकारण आदेश पारित कर प्रार्थी को एकल पीठ के आदेश के अनुरूप लाभ नहीं देने का निर्णय लिया है। इस पर हाई कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए उस सकारण आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि दिनेश साहू का मामला उपेंद्र प्रसाद एवं अन्य कर्मियों के मामले के समान है। कोर्ट ने कहा कि प्रार्थी का समायोजन और नियमितीकरण भी उसी पत्र के आधार पर हुआ था, जिसके आधार पर उपेंद्र प्रसाद एवं अन्य कर्मियों को लाभ मिला। इसलिए दिनेश साहू को भी वही लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि प्रार्थी के मामले में सरकार ने अब तक कोई अपील दाखिल नहीं की है, जबकि उपेंद्र प्रसाद मामले में अपील समय सीमा के भीतर दाखिल नहीं होने के कारण खारिज हुई थी। इसका हवाला देकर प्रार्थी के मामले को लंबित रखना अनुचित है। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता प्रेम पुजारी ने अदालत को बताया कि दिनेश साहू वर्ष 2022 में बैजनाथ जालान कालेज, सिसई (गुमला) से तृतीय वर्गीय कर्मचारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें फिलहाल प्रोविजनल रूप से पंचम वेतनमान का लाभ मिल रहा है। उनकी सेवा समायोजन और नियमितीकरण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में वर्ष 2005 और 2007 में हुआ था। दिनेश साहू के मामले में सरकार ने एकल पीठ के आदेश को कभी चुनौती ही नहीं दी। बता दें कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने वर्ष 2024 में ही दिनेश साहू को पंचम एवं छठा वेतनमान का लाभ देते हुए पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान करने का निर्देश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर प्रार्थी ने अवमानना याचिका दाखिल की है।

झारखण्ड हाई कोर्ट ने हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन पर मांगा जवाब

 रांची झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के गंभीर मामले पर सख्ती दिखाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन से कड़े सवाल पूछे. कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि हिरासत में मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सीसीटीवी और निगरानी व्यवस्था पर सवाल सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सरायकेला एसपी से पूछा कि राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं. अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि क्या हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं. कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था की कमी को गंभीरता से लिया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग से भी मांगा जवाब अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी तलब किया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि वे यह स्पष्ट करें कि पीड़ित तरुण महतो को “फिट फॉर कस्टडी” का प्रमाण पत्र देने वाले चिकित्सक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है. यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि हिरासत में किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है, और इसमें लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है. पीड़ित को मिला मुआवजा राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पीड़ित तरुण महतो को 1.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है. हालांकि, अदालत का ध्यान केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरे मामले में जवाबदेही तय करना चाहती है. कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो. घटना की पृष्ठभूमि यह मामला 19 नवंबर 2025 की रात का है, जब ईचागढ़ पुलिस तरुण महतो को हिरासत में लेकर गई थी. आरोप है कि थाने में उसकी बेरहमी से पिटाई की गई. इस घटना के बाद पीड़ित की पत्नी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी. इसी पत्र को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया. अगली सुनवाई 18 जून को खंडपीठ ने सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 18 जून को निर्धारित की गई है. अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन कोर्ट के सवालों का क्या जवाब देता है और इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है.

धनबाद CSIR विवाद,1 लाख से 16 लाख किराया बिल, हाईकोर्ट ने पुनर्मूल्यांकन का आदेश

रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सीएसआइआर), धनबाद के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सरकारी आवास के किराया बिल में छह माह के भीतर एक लाख रुपये से बढ़कर 16 लाख रुपये हो जाने के मामले सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए CSIR के निदेशक से पूछा कि आखिर इतनी कम अवधि में हाउस रेंट की राशि में इतना बढ़ोतरी कैसे हो गई। खंडपीठ ने CSIR के निदेशक को निर्देश दिया कि सेवानिवृत्त कर्मी गोपाल चंद्र लोहार के 16 लाख रुपये के हाउस रेंट बिल का पुनर्मूल्यांकन कर नए सिरे से गणना की जाए। मामले की अगली सुनवाई एक मई को निर्धारित की गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में सीएसआइआर के निदेशक, सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए। अदालत ने अगली सुनवाई में निदेशक को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी, लेकिन सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी को उपस्थित रहने का निर्देश दिया। प्रार्थी गोपाल चंद्र लोहार वर्ष 1989 में सीएसआइआर धनबाद में टेक्नीशियन पद पर नियुक्त हुए थे। वह 31 दिसंबर 2021 को सेवानिवृत्त हुए। आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद करीब आठ माह तक उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान नहीं किया गया। संस्थान की ओर से उन्हें पत्र देकर सूचित किया गया था कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें आवंटित आवास का किराया 9,995 रुपये प्रतिमाह देना होगा। 17 अप्रैल 2023 को संस्थान ने उन्हें आवास किराया का बकाया 1,06,403 रुपये बताया। इसके बाद नवंबर 2023 में उन्होंने आवास खाली कर दिया। बाद में संस्थान ने आवास किराया बकाया राशि बढ़ाकर 16,11,163 रुपये बता दिया। प्रार्थी का आरोप है कि ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट मद में बकाया लगभग 23 लाख रुपये में से 16 लाख रुपये काटने की मंशा से यह राशि बढ़ाई गई। ट्रिब्यूनल के आदेश पर भी सवाल प्रार्थी ने सरकारी क्वार्टर के किराया एवं दंडात्मक शुल्क की गणना को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि ट्रिब्यूनल ने बिना उचित कारण बताए उनकी याचिका खारिज कर दी और आदेश अत्यंत संक्षिप्त दिया। हाई कोर्ट ने पूर्व की सुनवाई में टिप्पणी करते हुए था कि 17 अप्रैल 2023 को 1,06,403 रुपये और 22 अप्रैल 2024 को 16,11,163 रुपये की गणना के बीच भारी अंतर है, जबकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इतनी वृद्धि किस आधार पर हुई। अदालत ने यह भी कहा था कि पहली गणना प्रशासनिक अधिकारी ने की थी, जबकि बाद की गणना उससे निम्न स्तर के सेक्शन अफसर द्वारा की गई। ट्रिब्यूनल ने बिना जवाब मांगे ही मामले का निपटारा कर दिया, जो प्रथम दृष्टया उचित नहीं प्रतीत होता।

बोकारो में कंकाल मामले पर HC का बड़ा सवाल, पुलिस की लापरवाही पर जताई नाराजगी

 बोकारो झारखंड के बोकारो में एक युवती के लापता होने और उसके बाद जंगल से एक महिला का कंकाल मिलने के मामले में पुलिस की लापरवाही को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP), बोकारो SP, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) के निदेशक और विशेष जांच टीम (SIT) को समन जारी करते हुए 16 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। यह समन जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने लापता लड़की की मां रेखा देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। उनकी 18 वर्षीय बेटी 31 जुलाई 2025 से लापता है। इस संबंध में बोकारो के पिंड्राजोरा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी, लेकिन पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किए जाने पर लापता लड़की की मां ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बिना जांच के पुलिस ने किया बड़ा दावा इसी बीच हाल ही में बोकारो पुलिस ने जंगल से एक स्त्री का कंकाल बरामद किया और दावा किया कि यह लापता लड़की का हो सकता है। हालांकि याचिकाकर्ता रेखा देवी के वकील ने अदालत को बताया कि बोकारो पुलिस द्वारा बरामद किया गया महिला का कंकाल लापता पीड़िता का नहीं है। 'कंकाल मिलने के बाद भी DNA मिलान नहीं कराया' इसके बाद न्यायाधीशों ने सरकार से पूछा कि क्या उस कंकाल का रेखा देवी और उनके पति के साथ DNA के साथ मिलान किया गया है। तब ना में जवाब मिलने पर अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि कंकाल के कई दिन पहले ही बरामद हो जाने के बावजूद, कोई DNA टेस्ट नहीं किया गया और न ही कोई सैंपल लिया गया। HC ने कहा- पूरी प्रक्रिया में की जा रही देरी अदालत को बताया गया कि इस मामले में दिनेश महतो नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, जबकि बोकारो के एक जंगल से एक महिला का कंकाल बरामद किया गया है। तो जजों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सैंपल पहले ही ले लिया गया होता, तो नतीजा कुछ ही घंटों में पता चल जाता, लेकिन बिना किसी वजह के पूरी प्रक्रिया में देरी की जा रही है। 18 पुलिस कांस्टेबलों को किया गया निलंबित इसी बीच, बोकारो SP ने इस केस में ड्यूटी के दौरान लापरवाही बरतने के आरोप में पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन के इंचार्ज सहित 18 पुलिस कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया है। रेखा देवी की 18 साल की बेटी 31 जुलाई, 2025 को लापता हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई थी। लेकिन बेटी का खोजने के लिए पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर, रेखा देवी ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की, तब जाकर पुलिस हरकत में आई।  

ओपन जेलों की स्थिति पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को रिपोर्ट देने का निर्देश

 रांची झारखंड हाईकोर्ट ने सूबे की ओपन जेलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए बड़ा कदम उठाया है. सोमवार को कोर्ट ने जनहित याचिका में तब्दील स्वत: संज्ञान पर सुनवाई की. इस मामले को न्यायपालिका ने जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हुए व्यापक निगरानी का निर्देश दिया है. इसके लिए अदालत ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि गृह सचिव की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति का गठन किया जाए. पीठ ने दिए सख्त निर्देश चीफ जस्टिस एमएस सौनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए. कोर्ट ने कहा कि ओपन जेलों की स्थिति सुधारने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए. इस समिति की अध्यक्षता गृह सचिव करेंगे और इसमें कारा महानिदेशक तथा संबंधित जेल अधीक्षक को भी शामिल किया जा सकता है. स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक गठित समिति की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले की अगली सुनवाई 11 जून 2026 को होगी. कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ओपन जेलों में सुधार के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन जरूरी इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी शामिल हैं. सर्वोच्च अदालत ने देशभर की ओपन जेलों की मॉनिटरिंग के लिए गृह विभाग को कमेटी बनाने और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने का निर्देश दिया है. इसमें चिकित्सा सुविधा, जिम, भोजन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को सुधारने पर विशेष जोर दिया गया है. कैदियों के पुनर्वास पर फोकस ओपन जेलों का उद्देश्य कैदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया को मजबूत करना है. ऐसे में वहां की सुविधाओं का बेहतर होना बेहद जरूरी है. हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए इस मामले को गंभीरता से लिया है. पहले स्वत: संज्ञान, अब जनहित याचिका गौरतलब है कि झारखंड हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया था. अब इसे जनहित याचिका में तब्दील कर दिया गया है, जिससे इस मुद्दे पर नियमित सुनवाई और निगरानी सुनिश्चित हो सके. सुधार की दिशा में अहम कदम हाईकोर्ट का यह कदम राज्य की जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यदि कोर्ट के निर्देशों का सही तरीके से पालन होता है, तो ओपन जेलों में रहने वाले कैदियों को बेहतर जीवन स्तर और पुनर्वास के अवसर मिल सकेंगे.

झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख, नामांकन पर रोक के बाद अब 10 अप्रैल को होगी अधिकारियों से सीधी जवाब-तलब

रांची रांची विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (आईएलएस) में बुनियादी सुविधाओं और अकादमिक फैकल्टी की कमी का मामला अब गंभीर रूप ले चुका है. इस मुद्दे पर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगते हुए कई शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है. कोर्ट का सख्त रुख सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रांची विश्वविद्यालय का पक्ष सुना, लेकिन स्थिति से संतुष्ट नहीं हुआ. कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा विभाग के सचिव, वित्त विभाग के सचिव, विश्वविद्यालय के कुलपति, डीन और आईएलएस के निदेशक को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का आदेश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले को हल्के में नहीं लिया जाएगा. 10 अप्रैल को अगली सुनवाई हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 अप्रैल की तारीख तय की है. माना जा रहा है कि इस दिन कोर्ट संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब करेगा और संस्थान में व्याप्त समस्याओं के समाधान को लेकर ठोस निर्देश दे सकता है. इससे विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव और बढ़ गया है. याचिका में उठाए गए गंभीर मुद्दे प्रार्थी अंबेश कुमार चौबे और अन्य की ओर से दायर याचिका में आईएलएस में फैकल्टी की भारी कमी, पर्याप्त क्लासरूम, लाइब्रेरी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मुद्दा उठाया गया है. याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि इस स्थिति में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना मुश्किल हो गया है. बीसीआई मानकों की अनदेखी इससे पहले की सुनवाई में भी कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के निर्धारित मानकों की अनदेखी पर नाराजगी जताई थी. कोर्ट ने पाया कि संस्थान में कई जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जो किसी भी विधि संस्थान के लिए अनिवार्य होती हैं. इस पर कोर्ट ने कड़ा कदम उठाते हुए नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 में नामांकन पर रोक लगा दी थी. छात्रों के भविष्य पर संकट आईएलएस में सुविधाओं की कमी का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा है. उचित फैकल्टी और संसाधनों के अभाव में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है. इससे उनकी पेशेवर तैयारी और करियर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. छात्र और अभिभावक दोनों इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं. अब सुधार की उम्मीद हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस मामले में तेजी से सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे. यदि संबंधित विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन समय रहते आवश्यक कदम उठाते हैं, तो संस्थान की स्थिति में सुधार संभव है और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सकता है.