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चुनाव हार पर पप्पू यादव की पहली प्रतिक्रिया: “जनता से शिकायत नहीं, पर इतना जरूर कहूंगा…”

पटना  बिहार में एक बार फिर NDA की बहार की संभावना अब प्रबल होती जा रही है। राज्य में चुनावी तस्वीर धीरे-धीरे स्पष्ट हो रही है। विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले शुरुआती रुझानों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भारी बहुमत की ओर बढ़ता दिख रहा है जिसके बाद दोनों दलों के कार्यालयों में जश्न शुरू हो गया है। वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन के खेमे में मायूसी का माहौल है। पूर्णिया के सांसद रह चुके पप्पू यादव भी दुखी नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ये नतीजे बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हैं। रुझानों में स्थिति काफी हद तक स्पष्ट होने के बाद मीडिया के बातचीत के दौरान जन अधिकार पार्टी के प्रमुख ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा, “नतीजा स्वीकार करना पड़ेगा, लेकिन ये बिहार के लिए दुर्भाग्य होगा।” उन्होंने आगे कहा, “जनता को मैं कुछ नहीं कह सकता लेकिन बिहार के लिए ये दुर्भाग्य होगा।” प्रचंड जीत की ओर NDA फिलहाल NDA राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 180 से अधिक पर बढ़त हासिल करते हुए प्रचंड जीत की ओर बढ़ रहा है। निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर दोपहर तक उपलब्ध रुझानों के अनुसार, भाजपा 101 विधानसभा सीटों में से 80 से अधिक सीटों पर बढ़त के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिख रही है। ऐसे में भाजपा का यह प्रदर्शन उसे राजनीतिक रूप से और मजबूत करेगा और पिछले साल के लोकसभा चुनाव में मिले झटके की बहुत हद तक भरपाई करेगा। वहीं इस चुनाव में JDU को भी काफी फायदा मिलता दिख रहा है। साल 2020 के चुनाव में केवल 43 सीटें जीतने वाली नीतीश की पार्टी इस बार 70 से अधिक सीटों पर आगे है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 20 से अधिक सीटों पर आगे है। महागठबंधन का बुरा हाल महागठबंधन का हाल बुरा है। पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी का तमगा हासिल करने के बावजूद प्रमुख विपक्षी पार्टी रही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक दिख रहा है और वह 40 से कम सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। राजद ने इस चुनाव में 140 से भी अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसके अलावा 61 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक पहुंचने में विफल होती दिख रही है।  

आधी आबादी ने बदला समीकरण—नीतीश कुमार को मिला महिला वोटरों का ज़बरदस्त साथ

  नई दिल्ली बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रुझानों में एनडीए बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल चुका है। तमाम एग्जिट पोल ने साफ इशारा किया था कि एनडीए को महिलाओं, ओबीसी और ईबीसी वर्ग का बंपर समर्थन मिला है। रुझान भी इस बात पर मुहर लगा रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में दोनों चरणों में कुल मतदान 66.91 फीसदी रहा था। मतदान के दोनों ही चरणों में पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं ने ज्यादा वोटिंग की। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 फीसदी रहा था। वहीं पुरुषों का मतदान प्रतिशत 62.8 फीसदी ही रहा। इन आंकड़ों से साफ हो जाता है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने करीब 10 फीसदी ज्यादा मतदान किया। रुझानों में एनडीए को 190, महागठबंधन को 49 और अन्य के खाते में 4 सीटें जाने के संकेत मिल रहे हैं। अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं तो एनडीए बिहार में इतिहास रच देगा। जीविका दीदी योजना ने बदल डाला सियासी माहौल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार की सरकार ने राज्य में जीविका दीदी योजना के तहत 1.30 करोड़ महिलाओं को दस-दस हजार रूपये दिए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 सितंबर को नीतीश सरकार की इस योजना की शुरुआत महिलाओं को दस-दस हजार रुपये देकर की थी। तीन अक्तूबर को 25 लाख नई महिलाओं को दस-दस हजार रुपये दिए गए। शराबबंदी के फैसले ने नीतीश को बनाया महिलाओं का 'लाडला' मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू करने का फैसला लिया। इसकी वजह से महिलाओं में नीतीश कुमार को काफी लोकप्रियता मिली। 2006 की ये योजना भी बनी भविष्य की गेमचेंजर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 में मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत लड़कियों को साइकिल और स्कूल की पोशाक दी जाती है। इस योजना ने बिहार की उन बेटियों को काफी मजबूत किया, जो स्कूल दूर होने की वजह से पढ़ाई छोड़ देती थीं।  

PK का आगे क्या होगा राजनीतिक सफ़र? उनकी हार के 5 बड़े कारण हुए उजागर

पटना बिहार विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसुराज पार्टी (जेएसपी) की उम्मीदें धराशायी हो गईं। शुरुआती रुझानों में न केवल उन्हें कोई सीट नहीं मिली, बल्कि उनके सबसे मजबूत उम्मीदवार भी किसी मुकाबले में दिखाई नहीं दिए। चुनावी मैदान में किशोर न तो एनडीए को चुनौती दे पाए, न ही महागठबंधन को प्रभावित कर पाए -मतलब कि वे उम्मीद के मुताबिक वोटकटवा भी नहीं बन सके। अब सवाल यह उठता है कि जो उन्होंने जोर-शोर से कहा था- अगर जनता दल यूनाइटेड 25 से अधिक सीटें जीत गया तो मैं संन्यास ले लूंगा- क्या किशोर उस वादे पर कायम रहेंगे? बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों ने प्रशांत किशोर और उनकी नई राजनीतिक मुहिम जनसुराज पार्टी (जेएसपी) के लिए उम्मीदों के बुलंद पंखों को तोड़ दिया है। शुरुआती रुझानों में पार्टी एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी, जबकि एग्जिट पोल्स ने 0-5 सीटों का अनुमान लगाया था। खास बात यह रही कि पार्टी के सबसे मजबूत उम्मीदवार भी किसी मुकाबले में नजर नहीं आए। जनसुराज पार्टी के जमावड़े और सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ ने शुरुआती तौर पर यह भरोसा दिया था कि किशोर किसी न किसी रूप में बिहार की राजनीति में सेंध लगाने में सक्षम हैं। लेकिन चुनाव परिणाम यह साबित करते हैं कि जमीन पर उनकी पकड़ लगभग शून्य रही। अब सवाल उठता है कि प्रशांत किशोर अपने चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों पर खरे उतरेंगे या नहीं। संन्यास का वादा और विफलता चुनाव प्रचार के दौरान किशोर ने नेशनल टीवी पर दावा किया था कि अगर जनता दल यूनाइटेड 25 से अधिक सीटें जीतता है तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे। यह वादा इतनी आत्मविश्वास के साथ किया गया था कि उन्होंने पत्रकार से कहा कि यह रिकॉर्डिंग रख लें। अब परिणाम सामने हैं और किशोर के वादे के पालन पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। हार के पीछे पांच प्रमुख कारण:- 1 तेजस्वी यादव को चुनौती देने से पीछे हटना जेएसपी की हार का सबसे बड़ा कारण प्रशांत किशोर का तेजस्वी यादव को चुनौती न देना रहा। शुरुआती घोषणा में उन्होंने राघोपुर से मैदान में उतरकर तेजस्वी की ‘परिवारवाद’ और वादों की पोल खोलने की बात कही थी। लेकिन आखिरकार यह मुकाबला नहीं हुआ, जिससे उनका वैकल्पिक नेता बनने का मौका गंवा गया। 2- मोदी और शाह के खिलाफ खुलकर नहीं बोले किशोर ने केंद्रीय नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ सीधे तौर पर हमला नहीं किया। विपक्ष के कई नेता चुनावी मुद्दों पर उनके विरोध में जहर उगल रहे थे, लेकिन किशोर इस लहर का हिस्सा नहीं बने। जनता ने यह महसूस किया कि जेएसपी बीजेपी की ‘बी टीम’ जैसी भूमिका निभा रही है। 3 – शराबबंदी के खिलाफ विवादास्पद रुख किशोर ने शराबबंदी समाप्त करने की घोषणा कर महिलाओं और परिवारों की नाराजगी झेली। बिहार में महिलाओं के लिए यह नीति सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता का प्रतीक मानी जाती है। किशोर का यह कदम युवाओं को लुभाने की कोशिश में महिलाओं के विरोध को जन्म देने वाला साबित हुआ। 4- जाति और धर्म के आधार पर टिकट वितरण किशोर ने चुनाव से पहले घोषणा की थी कि उनकी पार्टी जाति और धर्म से ऊपर उठकर राजनीति करेगी। लेकिन टिकट वितरण में वही पैटर्न अपनाया गया, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हुआ। 5- NDA नेताओं के खिलाफ माहौल नहीं बना पाए उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और मंत्री अशोक चौधरी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बावजूद किशोर ने इसे केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित रखा। जनता तक इस मुद्दे का प्रभाव नहीं पहुंच पाया।

बिहार चुनाव परिणाम: BJP को मिला नया रास्ता, नीतीश पर निर्भरता खत्म!

पटना  बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सारे एग्जिट पोल्स को फेल कर दिया है। कुल 11 एग्जिट पोल आए थे, जिनमें से एक पोल डायरी ने ही एनडीए को 184 से 206 तक सीटें मिलने का अनुमान जताया था। अब आंकड़ा 200 पहुंच गया है तो इस एग्जिट पोल की चर्चा है। इस बीच सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के प्रदर्शन को लेकर है। भाजपा ने कुल 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 91 पर जीत हासिल हो गई है। इस आंकड़े के साथ भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। भाजपा ने 2010 में इतनी ही सीटें पाई थीं, लेकिन तब सबसे बड़ी पार्टी जेडीयू थी। इस बार हालात अलग हैं।   जेडीयू ने भी शानदार प्रदर्शन किया है, लेकिन 79 सीटें लेकर भाजपा से 12 सीट पीछे है। इस तरह भाजपा की स्थिति ऐसी बन रही है कि उसके लिए जेडीयू के बिना भी बिहार की सत्ता में पहुंचने के रास्ते खुल रहे हैं। यह रास्ता चिराग पासवान की लोजपा-आर, जीतनराम मांझी की HAM और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोकमोर्चा को साथ लेकर बनता है। दरअसल बिहार विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है। अब अकेले भाजपा के पास 91 है तो खुद को पीएम मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान के पास भी 21 सीटें हैं। दोनों मिलकर 112 हो जाते हैं। फिर HAM की 5 और RLM की 4 सीटों को मिलाकर 121 नंबर होते हैं। बसपा का भी एक कैंडिडेट जीतता दिख रहा है। यदि बसपा का समर्थन मिल जाए तो बहुमत ही हासिल हो जाएगा। यही नहीं दूसरे दलों के कुछ विधायकों को सदन से गैर-हाजिर कराकर भी बहुमत के नंबर हासिल किए जा सकते हैं। हालांकि यह सिर्फ एक विकल्प है और भाजपा शायद ही ऐसा करना चाहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि नीतीश कुमार अब भी बिहार में एक फैक्टर हैं। इसके अलावा यदि वह चाहें तो वह भी सरकार बनाने का दम रखते हैं। यही नहीं ऐसी सरकार में वह कंफर्ट में भी होंगे क्योंकि यदि भाजपा को छोड़कर वह निकले तो कम ताकत वाली आरजेडी उनके साथ होगी। नीतीश कुमार के पास क्या हैं रास्ते, क्या कहता है आंकड़ा उनकी सीटों के साथ यदि आरजेडी की 28, कांग्रेस की 5, ओवैसी की 5 और अन्य की 9 सीटों को मिला लिया जाए तो वह भी अलग होकर सरकार बना सकते हैं। इस तरह यह नतीजा बेहद रोचक है और आंकड़ा मजेदार हो गया है। हालांकि फर्क यह है कि नीतीश कुमार को कई ऐसे दलों को साधना होगा, जो अतिवादी हैं और नीतीश की उदार विचारधारा से मेल नहीं खाते, जैसे असदुद्दीन ओवैसी।  

NDA की जीत में चिराग का बड़ा योगदान, बिहार चुनाव में साबित हुए ‘फिनिशर’

पटना  शुक्रवार दोपहर तक जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव के रुझान सामने आते गए, सोशल मीडिया पर चर्चा का माहौल गर्म होता गया. वजह साफ थी, NDA भारी बहुमत की ओर बढ़ रहा था और चिराग पासवान की LJP(RV) ने एक ऐसे फिनिशर की भूमिका निभाई, जिसने सबका ध्यान खींच लिया. ठीक वैसे ही जैसे क्रिकेट में रविंद्र जडेजा आख़िरी ओवरों में ताबड़तोड़ पारी खेलकर मैच को अपने नाम कर लेते हैं, चिराग पासवान ने भी NDA के लिए वैसा ही प्रदर्शन कर दिखाया. 29 सीटों पर चुनाव लड़ी पार्टी LJP(RV) इस चुनाव में 29 सीटों पर लड़ रही थीं, जबकि बीजेपी और जेडीयू 101–101 सीटों पर चुनाव लड़ रहे थे. बड़ी पार्टियों ने ओपनिंग बैट्समैन की तरह मजबूत शुरुआत की, लेकिन फिनिशिंग टच चिराग की पार्टी को देना था और उन्होंने यह काम शानदार तरीके से किया. 2024 में 5 सीटों पर जीत दर्ज की 2024 लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर 5 जीत दर्ज कर चुके चिराग को प्रधानमंत्री मोदी ने 'हनुमान' कहा था, वे 2025 में फिर से सुर्खियों में आ गए हैं. 29 में से 23 सीटों पर बढ़त, यानी लगभग परफेक्ट स्ट्राइक रेट. मगध, सीमांचल और पाटलिपुत्र क्षेत्रों में पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है, और 5% से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया है. NDA के वोट का ट्रांसफर चिराग की पार्टी को मिला सबसे बड़ी बात यह रही कि NDA के वोट का बेहतरीन ट्रांसफर चिराग की पार्टी को मिला. बीजेपी और जेडीयू के समर्थकों ने LJP(RV) के उम्मीदवारों पर भरोसा जताया और चिराग ने भी वोट ट्रांसफर के मामले में गठबंधन को पूरा समर्थन दिया. 2020 के मुकाबले चौंकाने वाला प्रदर्शन यह प्रदर्शन 2020 के मुकाबले चौंकाने वाला है. तब 137 सीटों पर चुनाव लड़कर LJP(RV) सिर्फ एक जीत पाई थी और उसकी ‘एंटी-नीतीश’ मुहिम ने जेडीयू को बड़ा नुकसान पहुंचाया था. लेकिन इस बार NDA के साथ रहते हुए चिराग ने न सिर्फ अपनी पार्टी को मजबूत किया, बल्कि नीतीश कुमार और पूरे NDA की सीटों में भी इजाफा कर दिया. चिराग पासवान ने खुद को 'हनुमान' साबित किया इस तरह चिराग पासवान ने खुद को सचमुच 'हनुमान' साबित कर दिया जो गठबंधन को मजबूती देते हुए जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इस जीत के बाद NDA में चिराग का कद और बढ़ेगा, और बिहार की राजनीति में समीकरण भी बदलेंगे. जेडीयू और LJP(RV) के बीच लंबे समय से चली आ रही खटास के बीच यह नतीजे चिराग के लिए राजनीतिक पूंजी का काम करेंगे. अब चिराग के लिए भी 'जडेजा स्टाइल' में जश्न मनाने का वक्त है. बैट उठाने और तलवार घुमाने का अंदाज वाला.

तेजस्वी का MY समीकरण नहीं चला, नीतीश-मोदी की जोड़ी ने दिलाई NDA को प्रचंड बढ़त

पटना  बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतों की गिनती अभी भी जारी है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए प्रचंड जीत की तरफ बढ़ रहा है। इस चुनाव में महिलाओं (M) ने जमकर वोटिंग की है। रुझानों में इसका असर भी देखने को मिल रहा है। नीतीश कुमार की अगुवाई में बिहार में महिलाओं की सशक्त बनाने के लिए काफी काम हुए हैं। चाहे जीविका दीदी हों या फिर महिला रोजगार योजना, एनडीए के इसका फायदा इस चुनाव में साफ तौर पर मिलता दिख रहा है। वहीं, पूरे चुनाव प्रचार के दौरान युवाओं (Y) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का असर दिख रहा था।   बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान महिलाओं में बिहार सरकार और केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का असर साफ दिख रहा था। महिलाएं साफ-साफ बोलती थीं कि 'जिसका खाते हैं, उसी के देंगे।' कुछ महिलाओं में बिहार सरकार की तरफ से मिले 10 हजार का भी क्रेज दिख रहा था। यही कारण हैं महिलाओं ने बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लिया और नतीजा एनडीए के पक्ष में जाता दिख रहा है। मुकेश सहनी की वजह से छिटके मुस्लिम आरजेडी को अपने मुस्लिम (M) और यादव (Y) पर भरोसा था। हालांकि, एक आकलन यह भी है कि एनडीए ने यादवों में सेंधमारी कर दी है। टुडेड चाणक्य के मुताबिक, यादवों का 23 प्रतिशत वोट एनडीए के प्रत्याशियों को मिला है। कुछ सीटों पर मुस्लिमों ने भी कुछ वोट भाजपा को छोड़कर एनडीए में शामिल घटक दलों को या फिर एआईएमआईएम और प्रशांत किशोर की जनसुराज जैसे दलों को दिया है। वहीं, मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का कैंडिडेट बनाने की वजह से मुस्लिमों में भी नाराजगी देखने को मिली थी।

एनडीए की लहर में ‘लालटेन’ मंद पड़ी—पीएम मोदी का संदेश: जनता ने विकास को चुना

पटना पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर बिहार चुनाव के नतीजों पर लिखा कि 'सुशासन की जीत हुई है। विकास की जीत हुई है। जन-कल्याण की भावना की जीत हुई है। सामाजिक न्याय की जीत हुई है। बिहार के मेरे परिवारजनों का बहुत-बहुत आभार, जिन्होंने 2025 के विधानसभा चुनावों में एनडीए को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व जीत का आशीर्वाद दिया है। यह प्रचंड जनादेश हमें जनता-जनार्दन की सेवा करने और बिहार के लिए नए संकल्प के साथ काम करने की शक्ति प्रदान करेगा।' 'मैं एनडीए के प्रत्येक कार्यकर्ता का आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने अथक परिश्रम किया है। उन्होंने जनता के बीच जाकर हमारे विकास के एजेंडे को सामने रखा और विपक्ष के हर झूठ का मजबूती से जवाब दिया। मैं उनकी हृदय से सराहना करता हूं!' पीएम मोदी ने लिखा कि 'आने वाले समय में हम बिहार के विकास, यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्य की संस्कृति को नई पहचान देने के लिए बढ़-चढ़कर काम करेंगे। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यहां की युवा शक्ति और नारी शक्ति को समृद्ध जीवन के लिए भरपूर अवसर मिले।'

जेल से मैदान तक अनंत सिंह का दबदबा, मोकामा में 28 हजार वोटों की ऐतिहासिक जीत

मोकामा  बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में मोकामा सीट से एक बार फिर अनंत सिंह ने मैदान मार लिया है. उन्होंने महागठबंधन की प्रत्याशी और सूरजभान की पत्नी वीणा देवी को 28206 वोटों से चुनाव हरा दिया है. अनंत सिंह को कुल 91406 वो मिले जबकि वीणा देवी को 63210 वोटों से संतोष करना पड़ा और वो दूसरे नंबर पर रहीं. मोकामा में 26 राउंड की गिनती खत्म, अनंत सिंह ने 28206 वोटों की बनाई निर्णायक बढ़त, वीणा देवी को मिले 63210 वोट  22वें राउंड की गिनती के बाद मोकामा से अनंत सिंह 22988 वोटों से आगे, अब तक मिले कुल 82787 वोट, सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को अब तक मिले 59799 वोट – मोकामा से अनंत सिंह 19287 वोटों से निकले आगे, 18वें राउंड की गिनती के बाद अब तक मिले 68132 वोट, वीणा देवी को 48845 वोट – मोकामा से अनंत सिंह ने 14480 वोटों से बनाई बढ़त, अब तक मिले 45386 वोट, वीणा देवी को अब तक 30906 वोट – मोकामा से अनंत सिंह ने बनाई 9665 वोटों की बढ़त, वीणा देवी पिछड़ीं, अनंत सिंह को अब तक मिले 32552 वोट – अनंत सिंह के पटना आवास पर जश्न, शुरू हो गई दावत, ढोल नगाड़ों पर नाच रहे समर्थक – अनंत सिंह ने मोकामा से बनाई बड़ी लीड, अब तक 15034 वोट आए, वीणा देवी के खिलाफ 2031 वोटों की बनाई बढ़त – अनंतमय होता दिख रहा मोकामा, 4524 से ज्यादा वोटों से निकले आगे – जेल में बंद अनंत सिंह की मोकामा में लगातार बढ़त जारी – मोकामा सीट पर राजेश कुमार रत्नाकर पिछड़े – मोकामा में शुरुआती रुझानों में अनंत सिंह निकले आगे – मोकामा में वोटों की गिनती शुरू, गिने जा रहे हैं पोस्टल बैलेट्स इस सीट का नतीजा न सिर्फ मोकामा बल्कि पूरे पटना ज़िले की राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है. फिलहाल सबकी नज़रें इसी मुकाबले पर है जहां बाहुबल, प्रभाव और जनसमर्थन तीनों की सीधी टक्कर दिख रही है. एक ओर हैं बाहुबली नेता अनंत सिंह हैं जो अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार और दबदबे के लिए जाने जाते हैं, वहीं उनके सामने हैं पूर्व सांसद और बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी, जिन्हें महागठबंधन का समर्थन प्राप्त है. मोकामा की इस सीट पर परंपरागत रूप से बाहुबल और प्रभावशाली व्यक्तित्व राजनीति पर हावी रहे हैं, और इस बार भी मुकाबला उसी अंदाज़ में तेज़ हो चुका है. अनंत सिंह जेल में है लेकिन दोनों उम्मीदवारों ने अपने-अपने गढ़ में पूरी ताक़त झोंक दी है . दोनों ही प्रत्याशी भूमिहार समाज से आते हैं.

जानिए क्यों बिहार में तेजस्वी यादव की हुई दुर्गति: 5 अहम वजहें

पटना     बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों करीब करीब आ चुके हैं. बिहार की जनता ने तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को बड़ा झटका दिया है. 14 नवंबर को सुबह 10.45 पर जो रुझान दिख रहा है उसमे महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस-वाम) 54 सीटों पर सिमटता दिख रहा, जबकि एनडीए (बीजेपी-जेडीयू) 185 सीटों पर मजबूत दिख रही है. ताजा रुझानों में तेजस्‍वी खुद अपनी सीट पर पीछे चल रहे हैं. जाहिर है कि बिहार की जनता ने महागठबंधन और तेजस्वी यादव को हराया नहीं है बल्कि एक तरह से नकार दिया है. आखिर जो पार्टी और जो नेता चुनाव के दिन तक बराबरी का टक्कर देने का दावा कर रहा था वो इस तरह कैसे धराशाई हो गया. आइये देखते हैं इसके पीछे क्या कारण रहे? 52 यादव उम्मीदवारों को टिकट देना गलत साबित हुआ इस हार की एक प्रमुख वजह आरजेडी द्वारा 52 यादव उम्मीदवारों को टिकट देना साबित हुआ. यह फैसला न केवल जातिवादी छवि को मजबूत कर गया, बल्कि गैर-यादव वोट बैंक को दूर भगा दिया. बिहार की राजनीति जाति पर टिकी है, जहां यादव (14% आबादी) आरजेडी का कोर वोट बैंक है, लेकिन 52 टिकट यादवों को देने से पब्लिक को यादव राज की गंध आने लगी . जिसके चलते अगड़े और अति पिछड़े महागठबंधन से दूर हो गए. आरजेडी ने कुल 144 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें 52 यादव थे जो कुल प्रत्याशियों का लगभग 36% था.  यह संख्या 2020 के 40 से बढ़ी, जो तेजस्वी की 'यादव एकीकरण' रणनीति का हिस्सा थी. महागठबंधन में सीट शेयरिंग के तहत आरजेडी को 143 सीटें मिलीं थीं. हो सकता है कि आरजेडी को यादव सीटों पर अच्छी सफलता मिल जाए पर ओवरऑल यह नुकसान कर गया.  बीजेपी ने प्रचार में 'आरजेडी का यादव राज' का नैरेटिव चलाया, जो शहरी और मध्यम वर्ग में गूंजा. तेजस्वी ने यदि 30-35 यादव टिकटों तक सीमित रखा होता तो कुर्मी-कोइरी वोटों का हिस्सा 10-15% बढ़ सकता था.जैसा अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनावों में किया था. उन्होंने केवल 5 यादव प्रत्याशियो को मैदान में उतारा. बाकी पिछड़ी जातियों और सवर्णों को वोट देकर उन्हें अपना बना लिया. सहयोगी पार्टियों को भाव न देना तेजस्वी यादव की रणनीति में सबसे बड़ी चूक अपने सहयोगियों कांग्रेस, वाम दलों और छोटी पार्टियों के साथ 'बराबर भाव' न रखना साबित हुआ. सीट शेयरिंग विवादों ने गठबंधन को कमजोर किया, और तेजस्वी के 'आरजेडी सेंट्रिक' अप्रोच ने विपक्ष को बांट दिया. यह न केवल वोट ट्रांसफर फेल कर गया, बल्कि एनडीए को 'एकजुट' दिखाने का मौका दिया.  कांग्रेस ने 'गारंटी' मेनिफेस्टो पर जोर दिया, लेकिन तेजस्वी ने 'नौकरी देंगे' को प्राथमिकता दी, जो सहयोगियों को चुभा. इतना ही नहीं तेजस्वी ने महागठबंधन के घोषणापत्र का नाम भी तेजस्वी प्रण रखकर सबको पीछे कर दिया. तेजस्वी ने प्रचार में सहयोगियों को बैकसीट पर रखा. रैलियों में राहुल गांधी की तस्वीरें कम, तेजस्वी की ज्यादा दिखीं.  तेजस्वी का अपने वादों का ब्लू प्रिंट नहीं दे पाना तेजस्वी की सबसे बड़ी चूक यह रही कि वो वादे तो बहुत कर दिए पर उसका ठोस ब्लूप्रिंट नहीं दे पाए. हर घर को एक सरकारी नौकरी, पेंशन, महिला सशक्तिकरण और शराबबंदी की समीक्षा जैसे वादे तो किए, लेकिन फंडिंग, कार्यान्वयन योजना या समयबद्ध ब्लूप्रिंट के अभाव ने वोटरों में अविश्वास पैदा किया. हर घर को सरकारी नौकरी पर वो खुद जवाब नहीं दे सके. हर रोज कहते रहे कि बस अगले 2 दिन में ब्लू प्रिंट आ जाएगा. पर चुनाव बीत जाने के बाद भी वो दिन नहीं आया. महागठबंधन का मुस्लिमपरस्त छवि बन जाना महागठबंधन की 'मुस्लिमपरस्त' छवि तेजस्वी यादव की हार का बड़ा कारण बनी. मुस्लिम बहुल सीटों पर तो आरजेडी या महागठबंधन के अन्य सहयोगियों की जीत संभव होगी पर पूरे प्रदेश में इसका नुकसान हुआ. खुद यादव जाति के वोट कई जगहों पर आरजेडी को नहीं मिले. सत्ता मिलने पर बिहार में वक्फ बिल नहीं लागू करने वादा जिस तरह तेजस्वी ने किया वह बहुत से यादव बंधुओं को भी पसंद नहीं आया. बीजेपी ने लालू यादव के संसद में वक्फ बिल के अत्याचार के खिलाफ दिए भाषण को खूब वायरल कराया जिसका फायदा उसे मिला. अपने पिता लालू प्रसाद को लेकर कन्फ्यूज रहे तेजस्वी   तेजस्वी ने लालू की विरासत को अपनाया, लेकिन पोस्टर्स में उनकी तस्वीर को छोटा कर 'नई पीढ़ी' को क्या दिखाने की कोशिश की यह समझ में नहीं आया. यह दोहरी नीति उल्टी पड़ गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोपालगंज रैली में कहा, तेजस्वी लालू के पाप छिपा रहे हैं.  तेजस्वी ने लालू के सामाजिक न्याय एजेंडे को अपनाया, लेकिन 'जंगल राज' छवि से डरकर दूरी बनाई. पोस्टर्स में लालू को कोने में ठूंसना उनका अपमान ज्यादा था.  

कांग्रेस से दोस्ती का ‘रिटर्न गिफ्ट’? तेजस्वी यादव को भी मिला वही तगड़ा नुकसान

पटना  ईंट बांधकर तैरना जितना कठिन है, उतना ही मुश्किल किसी दल के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना हो चुका है। यह बात 2017 में यूपी में अखिलेश यादव की करारी हार ने साबित की थी और वही स्थिति अब बिहार में हई है। यहां आरजेडी से लड़कर 62 सीटें कांग्रेस ने ली थीं और जब चुनाव नतीजे आए तो अब तक 6 सीटों पर ही कांग्रेस की बढ़त है। इस तरह उसका स्ट्राइक रेट 10 फीसदी से भी कम है। 2017 में यूपी चुनाव में 100 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था और 7 पर ही जीती थी। इस नतीजे को लेकर माना गया था कि कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना सपा को भारी पड़ा।   फिर उन्होंने 2017 में अपनी रणनीति में बदलाव किया और सपा अलग होकर चुनाव लड़ी थी। लेकिन तेजस्वी यादव ने कोई सबक नहीं लिया और 2017 वाली अखिलेश यादव की गलती बिहार में दोहरा दी। नतीजा सामने है। दरअसल 2014 के बाद से ही लगातार ऐसा देखा जा रहा है कि जब भी कांग्रेस सामने होती है तो भाजपा का प्रदर्शन शानदार होता है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों के मुकाबले भी कांग्रेस नहीं टिक पाती है। ऐसे में कांग्रेस को ज्यादा सीटें देना आरजेडी के लिए घातक साबित हुआ है। इसके अलावा समन्वय स्थापित ना हो पाने का नुकसान भी सीधे तौर पर आरजेडी को हुआ है। कांग्रेस को भाकपा-माले ने दिखाया आईना, शानदार स्ट्राइक रेट दिलचस्प बात यह है कि महज 20 सीटों पर लड़ने वाले वामपंथी दल भाकपा-माले की 7 सीटों पर बढ़त है। ऐसे में कांग्रेस ने अपनी हार से महागठबंधन की भी हार की पटकथा लिख दी है। वहीं एनडीए की बात करें तो अमित शाह लगातार पटना में कैंप करते रहे। तीन दिन तो वह निकले ही नहीं और लगातार सहयोगी दलों के साथ मिलकर मंथन करते रहे। इसका सीधा फायदा एनडीए को मिला है, जबकि महागठबंधन को करारा झटका लगा। यही नहीं प्रचार में भी एनडीए आगे रहा। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने कैंपेन को लीड किया और अमित शाह ने भी 36 रैलियां कीं तो वहीं राजनाथ सिंह भी 20 रैलियों में नजर आए। भाजपा के लिए योगी समेत प्रचार में उतरे थे कई सीएम यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हों या फिर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भाजपा ने पूरी फौज ही प्रचार में उतारे रखी। इसके अलावा जेडीयू, लोजपा जैसे दलों के नेता भी कंधे से कंधा मिलाकर प्रचार करते रहे। इसके उलट महागठबंधन में ना तो सहमति बनी और ना ही प्रचार में समन्वय नजर आया।