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नए भारत की नई खादी को मिल रही वैश्विक पहचान, विन्ध्या वैली-कबीरा बने गुणवत्ता के प्रतीक: राज्यमंत्री जायसवाल

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की गौरवशाली पहचान और आत्मनिर्भर भारत का पथप्रदर्शक है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में खादी को "नए भारत की नई खादी" के रूप में नई पहचान मिली है, जिससे पूरे देश में खादी पुनर्जागरण का सूत्रपात हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश, युवाओं का सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। म.प्र. खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से खादी और ग्रामोद्योग राज्य की प्रगति का सशक्त स्तंभ बन रहे हैं। बुनकर मुद्रा योजना के तहत पिछले तीन वर्षों 2023-24 से 2025-26 में कुल 194 बुनकरों को 268.50 लाख रुपये का ऋण वितरित किया गया है। वर्ष 2023-24 में 44 बुनकरों को 21.40 लाख, 2024-25 में 147 बुनकरों को 231.80 लाख और 2025-26 में 3 बुनकरों को 15.30 लाख रुपये का ऋण दिया गया। उन्होंने कहा कि गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज’ और ‘गाँव की ओर जाओ’ संदेश को साकार करते हुए बोर्ड ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, परंपरागत कारीगरी को आधुनिक नवाचार से जोड़ने और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाने का कार्य कर रहा है। कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)  दिलीप जायसवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री  मोदी के "आत्मनिर्भर भारत, भारत में बनाओ, स्वदेशी के लिए मुखर, स्टार्टअप इंडिया" जैसे अभियानों और "सबका साथ, सबका विकास" मंत्र ने खादी एवं ग्रामोद्योग को वैश्विक पहचान दिलाई है। "स्थानीय से वैश्विक" का दृष्टिकोण कारीगरों और ग्रामीण उद्यमियों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ रहा है। राज्यमंत्री  जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा 50 हजार से 5 लाख तक की ऋण सुविधा व्यक्तिगत बुनकर, उद्यमी, स्व-सहायता समूह, हथकरघा संगठन और सहकारी समितियों को दी जा रही है। बुनकरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना में तीन वर्षों में 616 बुनकर और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में 840 बुनकर बीमित किए गए। प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना में 436 रुपये वार्षिक शुल्क पर 2 लाख का जीवन बीमा और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में मात्र 20 रुपये वार्षिक शुल्क पर 2 लाख का दुर्घटना बीमा मिल रहा है। राज्यमंत्री  जायसवाल ने कहा कि म.प्र. खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड सूती, ऊनी, रेशमी एवं पॉलीवस्त्र खादी के साथ मसाले, साबुन, जड़ी-बूटी उत्पाद एवं हस्तनिर्मित वस्तुओं को बढ़ावा दे रहा है। विपणन के लिए "विन्ध्या वैली" और "कबीरा" जैसे नाम स्थापित किए गए हैं जो गुणवत्ता और परंपरा के प्रतीक हैं। "अपना हाथ – अपना साथ" के मार्गदर्शन में महिला स्व-सहायता समूहों, कारीगरों और उद्यमियों को तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग दिया जा रहा है। प्रबंध संचालक  माल सिंह भयड़िया ने बताया कि महात्मा गांधी जी के "गाँव की ओर चलो" आह्वान से प्रेरित होकर मंडल ने ग्रामोद्योग को आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन का सशक्त साधन बनाया है। सुव्यवस्थित योजनाओं से ग्रामीण कारीगरों के उत्पादों को उचित बाजार मिल रहा है। बोर्ड की नई अंतरजाल साइट कारीगरों, उद्यमियों एवं समाज के बीच मजबूत सेतु का कार्य करेगी। प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रदर्शनियाँ प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित कर रही हैं। तीन वर्षों की प्रगति एक नजर में     बुनकर मुद्रा योजना: 194 बुनकरों को 268.50 लाख रुपये का ऋण वितरित     प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना: 616 बुनकर बीमित     प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना: 840 बुनकर बीमित  

राशन से लेकर गैस सिलेंडर तक e-KYC अनिवार्य, आधार लिंक नहीं होने पर अटक सकती हैं सुविधाएं

भिंड सार्वजनिक वितरण प्रणाली और घरेलू गैस वितरण व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने राशन कार्ड और गैस सिलेंडर से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव शुरू कर दिए हैं। अब पुराने कागजी राशन कार्ड धीरे-धीरे समाप्त कर स्मार्ट कार्ड या क्यूआर कोड आधारित डिजिटल कार्ड जारी किए जाएंगे। वहीं राशन कार्ड को आधार से लिंक कराना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने वालों का राशन कार्ड निरस्त किया जा सकता है और उन्हें सरकारी खाद्यान्न का लाभ नहीं मिलेगा। फर्जीवाड़ा रोकने के लिए डिजिटल फॉर्मेट और आधार लिंकिंग सरकार का उद्देश्य फर्जी राशन कार्ड, डुप्लीकेट लाभार्थियों और कालाबाजारी पर रोक लगाना है। नए सिस्टम के तहत राशन कार्ड की पूरी जानकारी डिजिटल फॉर्मेट में रहेगी। परिवार के सभी सदस्यों के आधार नंबर कार्ड से लिंक किए जाएंगे, जिससे पात्र हितग्राहियों की पहचान आसानी से हो सकेगी। राशन कार्ड की जानकारी मोबाइल और ऑनलाइन पोर्टल पर भी उपलब्ध रहेगी।  

‘एल्गी ट्री’ मशीन भोपाल में, पर्यावरण के लिए 25 पेड़ों के बराबर फायदा

 भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है. देश में पहली बार वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाली आधुनिक ‘एल्गी ट्री’ तकनीक की शुरुआत भोपाल से हुई है. इस नई तकनीक को अशोका गार्डन स्थित विवेकानंद पार्क में स्थापित किया गया है. बढ़ते प्रदूषण, लगातार बढ़ रही गर्मी और हीटवेव जैसी समस्याओं के बीच इसे एक प्रभावी हरित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।  25 पेड़ों के बराबर कार्बन सोखने की है क्षमता इस तकनीक को मशरूम वर्ल्ड ग्रुप ने विकसित किया है. कंपनी के अनुसार यह एक माइक्रोएल्गी आधारित सिस्टम है, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ता है. दावा किया गया है कि ‘एल्गी ट्री’ की एक यूनिट लगभग 25 पेड़ों के बराबर कार्बन अवशोषित करने की क्षमता रखती है. इसके जरिए सालाना करीब 1.5 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड को कम किया जा सकता है, जिससे शहरों की वायु गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।  कंपनी का कहना है कि इस तकनीक को विकसित करने में करीब दो साल का समय लगा. इस दौरान 50 से अधिक विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की टीम ने लगातार रिसर्च और परीक्षण किए. तकनीक को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह कम जगह में अधिक प्रभावी तरीके से कार्बन को नियंत्रित कर सके. खास बात यह है कि इसे सार्वजनिक स्थानों, पार्कों, व्यस्त बाजारों, संस्थानों और ट्रैफिक वाले इलाकों में आसानी से लगाया जा सकता है।  अन्य शहरों के लिए भी उपयोगी होगी ये तकनीकी पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसी तकनीकें शहरों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती हैं. तेजी से बढ़ते शहरीकरण और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण शहरों में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में ‘एल्गी ट्री’ जैसी तकनीक स्थानीय स्तर पर कार्बन लोड कम करने, तापमान संतुलित रखने और लोगों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।  भोपाल अब देश का पहला शहर बन गया है, जहां इस तकनीक को सार्वजनिक रूप से लागू किया गया है. इसे लेकर स्थानीय लोगों में भी उत्साह देखा जा रहा है. कंपनी ने भविष्य में देश के अन्य शहरों में भी इस तकनीक का विस्तार करने की योजना बनाई है. यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में भारत के कई बड़े शहरों में ‘एल्गी ट्री’ प्रदूषण नियंत्रण का नया माध्यम बन सकता है। 

भोपाल से कानपुर का सफर होगा आसान, 4-लेन रोड से समय में बड़ी कटौती

भोपाल भोपाल-कानपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर के पहले फेस में भोपाल से विदिशा के बीच इस साल के आखिर तक लॉजिस्टिक और इंडस्ट्रियल अधोसंरचना का काम नजर आने लगेगा। नेशनल हाईवे के निर्माणाधीन इस 42 किमी. के हिस्से के पास एमपीआइडीसी ने इंटीग्रेटेड मैन्यूफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक क्लस्टर के तौर पर विकसित करने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसमें वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स होंगी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण रोड पर काम कर रहा है, जबकि एमपीआइडीसी लॉजिस्टिक हब डेवलपमेंट से जुड़ी गतिविधियां तय करेगा। लॉजिस्टिक हब के तौर पर इसके विकसित होने से भोपाल व विदिशा के बीच छोटे उद्योगों और वेयरहाउसिंग का बड़ा जाल बिछने की उम्मीद है, जिससे प्रदेश में रोजगार बढ़ेगा। राजधानी के विकास का रास्ता भी बदलेगा टाउन प्लानर सुयश कुलश्रेष्ठ के अनुसार अभी शहर का पूरा विकास दक्षिण दिशा यानी नर्मदापुरम रोड व इंदौर रोड की ओर है। इस कॉरिडोर के बनने से ये रायसेन रोड, विदिशा रोड की ओर होगा। विदिशा रोड खुद इकोनॉमिक कॉरिडोर में बदलेगा तो यहां नए प्रोजेक्ट्स नए विकास की स्थितियां बनेंगी। नर्मदापुरम रोड से इसे जोडऩे पहले से ही बायपास है। इंदौर रोड की ओर भी प्रस्तावित पश्चिमी बायपास से जुड़ेगा। ऐसे समझें अभी क्या है स्थिति भोपाल के पास दीवानगंज/सलामतपुर वाले क्षेत्र से विदिशा की ओर बढ़ता है। भोपाल से विदिशा तक की 42 किमी. की दूरी को कवर करता है। यह कॉरिडोर भोपाल को उत्तर प्रदेश के कानपुर नौबस्ता/रिंग रोड से जोड़ेगा। इस हिस्से पर काम सबसे तेज गति से चल रहा है। 4-लेन चौड़ीकरण का काम अब बाहर नजर आने लगा है। भोपाल, विदिशा, सागर, छतरपुर में भूमि अधिग्रहण का अधिकांश काम पूरा हो चुका है। इकोनॉमिक कॉरिडोर पर डालें एक नजर     इसकी कुल लंबाई 526 किमी.। इसमें से 360 किमी. मध्य प्रदेश में है।     यह एक 4-लेन हाईवे होगा। कुछ हिस्सों में 6-लेन की योजना भी है।     भोपाल से कानपुर जाने में अभी 12-13 घंटे लगते हैं। कॉरिडोर से यह सफर सात से आठ घंटे में पूरा होगा।     मध्य प्रदेश वाले हिस्से के लिए 3600 करोड़ रुपए मंजूर है।     भोपाल से विदिशा का भाग 42 किमी. का है। इसमें मौजूदा सड़क को ही हाइवे में बदला जा रहा है।     कॉरिडोर का काम जनवरी में शुरू हुआ है । नेशनल हाइवे व एमपीआइडीसी से प्रशासन इसपर लगातार चर्चा कर रहा है। इसके काम तेजी से पूरे कराने के साथ कॉरिडोर का आमजन को लाभ दिलाने नई योजना बनाई जा रही है। – प्रियंक मिश्रा, कलेक्टर

शहर में बनेंगे 10 हजार नए फ्लैट, आवास परियोजना को हरी झंडी

इंदौर प्रधानमंत्री आवास योजना 2.0 के तहत नगर निगम ने विभिन्न स्थलों पर आवास निर्माण करने के लिए कुल 5 डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) राज्य शासन के जरिए केंद्र सरकार को भेजी थी। सरकार के 5 में से 2 डीपीआर मंजूर करते ही निगम फ्लैट निर्माण के काम पर लग गया है, जो कि ताप्ती परिसर ट्रेजर फैंटेसी (सिंदौड़ा रंगवासा) और बढिय़ा कीमा में बनेंगे। सबके पास खुद का आवास हो और मकान की कीमत भी कम हो इसके लिए प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की गई है। योजना के पहले चरण में इंदौर शहर और आसपास 13 जगहों पर मिली सरकारी जमीन पर 18606 फ्लैट बनने के साथ लोगों को आबंटित होना शुरू हो गए हैं। अब प्रधानमंत्री आवास योजना 2.0 पर काम शुरू किया गया है। भेजी गई डीपीआर मंजूरी इसके चलते ताप्ती परिसर ट्रेजर फैंटेसी (सिंदौड़ा रंगवासा), सनावदिया, बढिय़ा कीमा और उमरीखेड़ा में 10 हजार फ्लैट बनाने की डीपीआर मंजूरी के लिए राज्य शासन के जरिए केंद्र सरकार को भेजी गई। निगम अफसरों के अनुसार ताप्ती परिसर और बढिया कीमा की डीपीआर मंजूर हो गई है। अब जल्द ही निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। रायपुर में भाजपा की बड़ी बैठक इसके लिए पिछले दिनों निगमायुक्त क्षितिज सिंघल और प्रधानमंत्री आवास योजना के अपर आयुक्त अर्थ जैन ने स्थल निरीक्षण किया था। साथ ही अफसरों को निर्देशित किया गया कि योजना के अंतर्गत प्रस्तावित सभी आवासीय परियोजनाओं से पात्र हितग्राहियों को शीघ्र लाभ मिल सके, इसके लिए फ्लैट का निर्माण जल्द से जल्द शुरू किया जाए। प्रधानमंत्री आवास योजना-2.0 पर एक नजर     6048 वन बीएचके के फ्लैट आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए बनेंगे।     1368 टू बीएचके के फ्लैट बनेंगे। 720 थ्री बीएचके के फ्लैट बनेंगे। प्रधानमंत्री आवास योजना क्या है… प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों, निम्न आय वर्ग (LIG), और मध्यम आय वर्ग (MIG) के परिवारों को 2022 (और अब 2.0 के तहत आगे) तक पक्का घर उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत सरकार घर बनाने या खरीदने के लिए सब्सिडी और वित्तीय सहायता प्रदान करती है। योजना के तहत, पात्र लाभार्थियों को नया घर बनाने या कच्चे घर को पक्का करने के लिए लगभग 1.20 लाख से 2.50 लाख तक की वित्तीय सहायता/सब्सिडी मिलती है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदक के पास पहले से कोई पक्का घर नहीं होना चाहिए। यह योजना मुख्य रूप से EWS (आर्थिक रूप से कमजोर), LIG (निम्न आय वर्ग) और MIG (मध्यम आय वर्ग) के लिए है।

सावधान! जबलपुर में तेजी से बढ़े Vitamin B-12 Deficiency के मरीज, जानिए 8 अहम लक्षण

जबलपुर Vitamin B12: सुबह उठने पर थकान महसूस होना, पैरों में दर्द, हाथ-पैरों में झुनझुनी, चक्कर आना और अत्यधिक कमजोरी जैसी समस्याएं अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। शहर में बड़ी संख्या में युवा भी विटामिन बी12 की कमी से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। शहर के अस्पतालों, क्लीनिकों और आयुर्वेद अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जांच में अधिकांश मरीजों में विटामिन बी12 की कमी सामने आ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार शाकाहारी लोगों में यह समस्या अधिक देखी जा रही है। युवती को पैरों में जकड़न की शिकायत सिविल लाइन निवासी 26 वर्षीय युवती लंबे समय से पैरों में जकड़न और दर्द की समस्या से परेशान थी। उसे सुबह उठने पर कमजोरी महसूस होती थी। जांच में विटामिन बी12 की कमी सामने आई। चिकित्सकों ने उसे मोरिंगा पाउडर, आम का अचार, आंवला मुरब्बा और दही नियमित रूप से लेने की सलाह दी। करीब एक महीने में उसे राहत मिलने लगी। ये हैं विटामिन बी12 की कमी के प्रमुख लक्षण     हाथ-पैरों में सुन्नपन या झुनझुनी     मांसपेशियों में कमजोरी और संतुलन बनाने में परेशानी     एनीमिया और अत्यधिक थकान     याददाश्त कमजोर होना और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई     अवसाद और चिड़चिड़ापन     भूख कम लगना और वजन घटना     जीभ में सूजन या जलन     त्वचा का पीला पड़ना और धड़कन तेज होना खानपान में सुधार बहुत जरूरी आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. पंकज मिश्रा के अनुसार बड़ी संख्या में लोग विटामिन बी12 की कमी से पीड़ित हैं। कई मरीजों को लंबे समय तक सप्लीमेंट लेने की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया कि आम का अचार, मोरिंगा, आंवला, दही, पनीर, केला, नारियल पानी, पालक भाजी और किशमिश जैसे खाद्य पदार्थ शरीर में पोषक तत्वों की कमी दूर करने में मददगार हो सकते हैं। सामान्य काम में भी होने लगी थकान मानेगांव निवासी 32 वर्षीय महिला को अत्यधिक थकान और चक्कर आने की शिकायत थी। स्थिति ऐसी हो गई थी कि घर के सामान्य काम करने में भी वह थक जाती थी। जांच में विटामिन बी12 की कमी पाई गई। डॉक्टरों ने उसे आम का अचार, काला तिल और केला नियमित रूप से खाने की सलाह दी। झुनझुनी की समस्या से मिली राहत अधारताल निवासी 45 वर्षीय महिला को हाथ-पैरों में लगातार झुनझुनी महसूस हो रही थी। जांच में विटामिन बी12 की कमी सामने आने के बाद उसे प्री-बायोटिक दही, आम का अचार, आंवला मुरब्बा और नारियल पानी लेने की सलाह दी गई। कुछ समय बाद उसे आराम मिल गया।

गेहूं खरीदी में बड़ा संकट: एफसीआई के फैसले से किसानों का करोड़ों रुपया अटका

भोपाल FCI- एमपी में समर्थन मूल्य पर गेहूं उपार्जन का काम तेजी से चल रहा है। गेहूं खरीदी में मुख्यमंत्री का गृह जिला उज्जैन सबसे आगे निकल गया है। यहां शनिवार शाम तक रेकॉर्ड तोड़ 4.79 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया। इधर, उत्पादन में कई बार राष्ट्रीय रेकॉर्ड बना चुके नर्मदापुरम में इस बार अभी तक 2.58 लाख मीट्रिक टन ही खरीदी हुई। इसमें भी 3500 मीट्रिक टन गेहूं को एफसीआइ ने रिजेक्ट कर दिया। यह आंकड़ा प्रदेश के 55 जिलों में सबसे अधिक है। अब रिजेक्ट गेहूं की ग्रेडिंग कराई जा रही है, जिसे दोबारा भेजा जाएगा। प्रदेश में कुल 17 हजार मीट्रिक टन गेहूं रिजेक्ट किया गया है जिसका किसानों को भुगतान अटक गया है। उधर खरीदे गए गेहूं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में भोपाल प्रदेश में नंबर- 1 पर है। यहां 1.94 लाख मीट्रिक टन की खरीदी हुई, जिसमें 90 प्रतिशत को एफसीआइ ने स्वीकार किया और 92 फीसद का परिवहन हो चुका है। जब मुख्यमंत्री मैदान में उतरे प्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर कई उतार-चढ़ाव आए। किसानों को परेशान भी होना पड़ा। इसके बावजूद उज्जैन, भोपाल जैसे कई जिलों में स्थानीय प्रशासनक की सूझबूझ से खरीदी में अब तक का रेकॉर्ड अच्छा दिखाई दे रहा है। कुछ जिलों में प्रशासनिक चूक ने सरकार की प्रदेश स्तर पर किरकिरी कराई। जबकि मुख्यमंत्री ने केंद्रों तक पहुंचना शुरू किया तो सुधार भी नजर आया। अब ज्यादातर कलेक्टर केंद्रों पर पहुंच रहे हैं, किसानों के हालचाल जान रहे हैं। प्रदेश को 100 लाख मीट्रिक टन खरीदी का लक्ष्य मिला है, 15 दिन खरीदी के बचे है।   रीवा संभाग पिछड़ा खरीदे गए गेहूं को सुरक्षित गोदामों तक पहुंचाने में रीवा संभाग प्रदेश में सबसे ज्यादा पिछड़ा है। सिंगरौली ने 50 फीसद, मऊगंज ने 31, सीधी ने 40, मैहर ने 46, सतना ने 49 और रीवा ने खरीदे गए गेहूं में से 56 फीसद का ही परिवहन किया है। हालांकि जबलपुर संभाग के मंडला में भी 46 प्रतिशत ही परिवहन हो पाया है। ऐसे बढ़ी स्पीड सैटेलाइट मैपिंग में गेहूं के खेत खाली बताए गए। इसकी वजह से स्लॉट बुकिंग में दिक्कत आई तो मुख्यमंत्री ने शिथिलता बरतने के निर्देश दिए। तब बात बनी। स्लॉट बुकिंग वाला सर्वर ठप्प पड़ा तो मुख्यमंत्री ने अफसरों को फटकारा और ठीक कराया, गेहूं खरीदी भी 5 से बढ़ाकर 6 दिन की। देर रात तक तुलाई शुरू कराई है। तौलकांटों की संख्या पहले से बढ़ाई है। इन जिलों का गेहूं का एक दाना रिजेक्ट नहीं: राजगढ़, उज्जैन, मंदसौर, आगर मालवा, रतलाम, नीमच, हरदा, जबलपुर, पांढुर्णा, गुना, शहडोल। 17 हजार मीट्रिक टन गेहूं रिजेक्ट, भुगतान अटका प्रदेश के 55 जिलों में 54 लाख मीट्रिक टन से अधिक की गेहूं खरीदी हो चुकी है। इसमें से 85 प्रतिशत का परिवहन हुआ है, जबकि 17 हजार मीट्रिक टन रिजेक्ट भी हुआ है। यह गेहूं खराब नहीं होता, बल्कि तय मानकों को पूरा नहीं करता, इसलिए एफसीआइ इसे स्वीकार नहीं करता। जब तक गेहूं की यह मात्रा स्वीकार नहीं कर ली जाती, तब तक किसानों को भुगतान नहीं मिलता।

स्लॉट बुकिंग में गड़बड़ी बनी किसानों की मुसीबत, मंडियों में नहीं बिक पा रही उपज

शहडोल समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने की आस लगाए बैठे किसानों के लिए तकनीक वरदान के बजाय अड़चन साबित हो रही है। उपार्जन केंद्रों में इन दिनों गेहूं खरीदी शुरू होने से पहले ही सर्वर की सुस्त रफ्तार और सैटेलाइट सत्यापन में तकनीकी खामियों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सरकारी दावों के विपरीत, पोर्टल पर आ रहे असत्यापित के मैसेज ने हजारों किसानों की नींद उड़ा दी है। फिलहाल, अन्नदाता सरकारी सिस्टम और सैटेलाइट के इस मकडज़ाल में उलझा हुआ है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन तकनीकी खामियों को कितनी जल्दी दूर कर किसानों को राहत पहुंचाता है। 500 किसान अब भी कतार में जिले में कुल 9,526 पंजीकृत किसान हैं, लेकिन तकनीकी दिक्कतों के चलते अब तक केवल 7,084 किसान ही अपना स्लॉट बुक कर पाए हैं। करीब 2,500 किसान ऐसे हैं जो दिन-रात ऑनलाइन केंद्रों और सोसायटियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन पोर्टल पर उनकी जानकारी अपडेट नहीं हो पा रही है। सैटेलाइट मैपिंग बनी जंजाल स्लॉट बुकिंग के दौरान किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या सैटेलाइट द्वारा असत्यापित या किसान कोड सत्यापन अपूर्ण जैसे मैसेज आ रहे हैं। शुरुआत में 8,700 खसरों में सैटेलाइट मैपिंग को लेकर विसंगतियां पाई गई थीं। प्रशासनिक जांच के बाद अधिकांश मामलों का निराकरण तो हुआ, लेकिन 46 खसरों में रिकॉर्ड के उलट फसल पाई गई। हैरानी की बात यह है कि जिन किसानों की फसल मौके पर सही है, उन्हें भी तकनीकी ग्लिच के कारण दोबारा सत्यापन के लिए भटकना पड़ रहा है। मुख्य समस्याएं एक नजर में सर्वर की धीमी गति: स्लॉट बुकिंग के दौरान पोर्टल का बार-बार कैश होना। सत्यापन का फेर: सैटेलाइट डेटा और जमीनी हकीकत में अंतर होने से तकनीकी रुकावट। अपूर्ण किसान कोड: पुराने डेटा और नए पंजीकरण के बीच मिलान न होना। बिचौलियों का सता रहा डर तैयारी कर ली थी, लेकिन जैसे ही स्लॉट बुकिंग करने गया, वहां लिखा आता है कि सैटेलाइट से सत्यापन नहीं हुआ है। पटवारी के पास जाओ तो वो तहसील भेजते हैं, समझ नहीं आ रहा अनाज मंडी ले जाएं या दफ्तरों के चक्कर काटें। रहसू पटेल, किसान ग्राम अमरहा

मध्य प्रदेश में साइंटिफिक अफसर बनने का मौका, भर्ती के लिए आवेदन जल्द होंगे बंद

भोपाल MPPSC Recruitment 2026: मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए शानदार मौका है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) ने साइंटिफिक अफसर बायोलॉजी के पदों पर वैकेंसी निकाली है। इस भर्ती के लिए अप्लाई करने की आखिरी तारीख अब करीब है। ऐसे में जिन उम्मीदवारों ने अभी तक अपना रजिस्ट्रेशन नहीं किया है, वे बिना देरी किए एमपीपीएससी की ऑफिशियल वेबसाइट mppsc.mp.gov.in पर जाकर अपना फॉर्म भर सकते हैं। आवेदन करने की आखिरी तारीख 20 मई, 2026 तय की गई है। एलिजिबिलिटी और आयु सीमा इस वैकेंसी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों का वनस्पति विज्ञान (Botany), जंतु विज्ञान, बायोकेमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी या बायोटेक्नोलॉजी जैसे विषयों में पोस्ट ग्रेजुएट होना जरूरी है। इसके साथ ही कुछ अन्य योग्यताएं भी तय की गई हैं। उम्मीदवारों की उम्र की गिनती 1 जनवरी, 2027 के आधार पर होगी। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अधिकतम आयु सीमा में सरकारी नियमों के अनुसार छूट मिलेगी।   लेट फीस और सैलरी कैंडिडेट्स को सलाह दी जाती है कि, वे 20 मई तक अपना फॉर्म जरूर भर लें। अगर आप 21 मई से 27 मई के बीच आवेदन करते हैं, तो आपको 3000 रुपये लेट फीस देनी होगी। वहीं, 28 मई से 28 अक्टूबर 2026 तक फॉर्म भरने वाले उम्मीदवारों को लेट फीस के रूप में 25000 रुपये का भारी भुगतान करना होगा। इस भर्ती प्रक्रिया के जरिए चुने गए उम्मीदवारों को शानदार सैलरी मिलेगी। चयनित साइंटिफिक अफसर को हर महीने 15600 रुपये से लेकर 39100 रुपये तक सैलरी दी जाएगी। ऐसे करें अप्लाई कैंडिडेट्स इन आसान स्टेप्स को फॉलो करके आसानी से अपना फॉर्म अप्लाई कर सकते हैं:     सबसे पहले कैंडिडेट्स मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की ऑफिशियल वेबसाइट mppsc.mp.gov.in पर जाएं।     वेबसाइट के होम पेज पर रजिस्ट्रेशन से जुड़े लिंक पर क्लिक करें।     इसके बाद फॉर्म में मांगी गई अपनी सभी जरूरी जानकारी सही तरीके से भरें।     अपने दस्तावेजों की स्कैन कॉपी अपलोड करें और आवेदन शुल्क जमा करें।     फॉर्म सबमिट करने के बाद भविष्य की जरूरत के लिए उसका एक प्रिंट आउट जरूर निकाल लें। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे परीक्षा से जुड़ी किसी भी लेटेस्ट अपडेट के लिए आयोग की ऑफिशियल वेबसाइट mppsc.mp.gov.in को समय-समय पर चेक करते रहें।

हजारों कब्रों के नीचे से दौड़ेगी ट्रेन! एमपी के इस प्रोजेक्ट का विरोध तेज, कोर्ट में अगली सुनवाई 14 मई

भोपाल एमपी में इंदौर और भोपाल में मेट्रो प्रोजेक्ट चल रहे हैं। दोनों जगहों पर मेट्रो ट्रेनें चलने लगी हैं लेकिन प्रोजेक्ट का अधिकांश हिस्सा अभी बाकी है। इस बीच भोपाल मेट्रो की प्लानिंग पर ही सवाल उठने लगे हैं। राजधानी भोपाल के शाही कब्रिस्तान बड़ा बाग से मेट्रो गुजरने पर विवाद खड़ा हो गया है। प्रोजेक्ट के अंतर्गत ऊपर बनीं हजारों कब्रों के नीचे से मेट्रो ट्रेनें चलाने की योजना है। इससे जहां मुस्लिम समुदाय ने आपत्ति जताई है वहीं आम लोग भी घबरा रहे हैं। भोपाल टॉकीज स्थित शाही कब्रिस्तान के नीचे प्रस्तावित अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन और नारियलखेड़ा की वक्फ जमीन पर निर्माण के खिलाफ कमेटी इंतेजामियां औकाफ-ए-आम्मा ने मध्यप्रदेश राज्य वक्फ अधिकरण प्रकरण दायर किए है। इन पर रोक की मांग की गई है। भोपाल के शाही कब्रिस्तान बड़ा बाग से मेट्रो गुजरने के प्लान के विरोध प्रदर्शन के बाद मामला वक्फ ट्रिब्यूनल पहुंच गया। मामले में शुक्रवार को सुनवाई हुई। इसमें ट्रिब्यूनल ने मेट्रो प्रबंधन से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 14 मई को होगी। कमेटी का दावा है कि प्रस्तावित मेट्रो लाइन से करीब एक एकड़ क्षेत्र सीधे प्रभावित हो सकता है, जिससे बड़ी संख्या में कब्रों के अस्तित्व और संरचना पर खतरा उत्पन्न होगा। यह भी आरोप लगाया गया है कि मेट्रो प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों ने अब तक इस क्षेत्र का विस्तृत नक्शा, तकनीकी रिपोर्ट या सुरक्षा आकलन सार्वजनिक नहीं किया है, जिससे आशंकाएं और बढ़ गई हैं। मामले में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। अब यह कानूनी मामला भी दायर हुआ है। पहले प्रकरण में हमीदिया रोड स्थित मासूमा तकिया अम्मनशाह, मस्जिद नूरानी, मुल्लाशाह और अन्य पंजीकृत वक्फ कब्रिस्तान क्षेत्रों के नीचे से अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन निकालने की योजना पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई गई है। कहा गया है यहां हजारों कब्रें मौजूद हैं। प्रमुख बिंदु कब्रिस्तान के नीचे से निकलेगी मेट्रो लाइन प्रोजेक्ट की खिलाफत कर रहा मुस्लिम समुदाय कब्रिस्तान में बैठकर किया मेट्रो प्रोजेक्ट का विरोध समुदाय ने कानूनी लड़ाई की तैयारी की कहा- हजारों कब्रें मौजूद, इनके अस्तित्व पर खतरा