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हरियाणा को मिली बड़ी सौगात, जींद से सोनीपत के बीच चलेगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

जींद. हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्रदेश को देश की पहली हाइड्रोजन डेमू (DEMU) ट्रेन की सौगात मिलने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया है। रेलवे बोर्ड द्वारा इस महत्वाकांक्षी परियोजना को हरी झंडी दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री ने इसे राज्य के विकास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया। यह देश की पहली पर्यावरण अनुकूल हाइड्रोजन डेमू ट्रेन होगी, जिसे हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच चलाया जाएगा। इसमें कुल 10 कोच होंगे। रेल इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा देने वाली इस परियोजना के बारे में बताते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में हरियाणा विकास और रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रहा है। भविष्य की परियोजनाओं के लिए 'मील का पत्थर': नायब सैनी मुख्यमंत्री ने इस ट्रेन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा, "यह हाइड्रोजन डेमू ट्रेन न केवल प्रदूषण मुक्त सफर का एक आधुनिक विकल्प बनेगी, बल्कि भविष्य की हरित ऊर्जा (Green Energy) परियोजनाओं को देखते हुए एक मील का पत्थर (Milestone) साबित होगी।" हरित और आधुनिक हरियाणा का संकल्प इस ट्रेन के शुरू होने से हरियाणा देश में अत्याधुनिक और इको-फ्रेंडली रेल कनेक्टिविटी वाला पहला राज्य बन जाएगा। मुख्यमंत्री ने भरोसा जताया कि केंद्र सरकार के सहयोग से चल रहे ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स से आने वाले समय में राज्य के नागरिकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलेंगी और उद्योगों व रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। हाइड्रोजन ट्रेन की खासियतें यह ट्रेन अधिकतम 75 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। यह ट्रेन पारंपरिक डीजल या इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम के बजाय हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग करेगी। ट्रेन कुल 1,200 किलोवाट बिजली उत्पन्न करेगी। नई ट्रेन में डिस्ट्रीब्यूटेड पावर रोलिंग स्टॉक (डीपीआरएस) तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा। इस तकनीक की मदद से बिजली एक ही लोकोमोटिव पर निर्भर रहने के बजाय सभी डिब्बों में वितरित की जाती है। हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों को डीजल इंजनों का एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। इसके जरिए कम उत्सर्जन होता है और ये स्वच्छ परिवहन को दिशा मिलती हैं। रेल मंत्रालय ने अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन (आरडीएसओ) से तकनीकी मंजूरी और रेल सुरक्षा आयुक्त (सीसीआरएस) द्वारा किए गए सुरक्षा परीक्षण के बाद इस परियोजना को मंजूरी दी।

हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: इस्तीफे के बाद भी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता

 चंडीगढ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पारिवारिक मजबूरियों के चलते नौकरी से इस्तीफा देने वाले कर्मचारी को केवल तकनीकी आधार पर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने हरियाणा में कार्यरत एक स्टेनो टाइपिस्ट को 13 वर्ष की सेवा के अनुपात में पेंशन, डीसीआरजी (डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी) तथा अन्य रिटायरल लाभ देने के आदेश जारी किए हैं। जस्टिस कुलदीप तिवारी ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता पंकज मेहता ने 13 वर्षों तक बेदाग सेवा दी और उसके खिलाफ कभी कोई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं हुई। ऐसे में अदालत “हाइपर-टेक्निकल” यानी अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने की बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य है। मामले के अनुसार पंकज मेहता को सितंबर 1999 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा नियमित पद पर स्टेनो टाइपिस्ट नियुक्त किया गया था। वर्ष 2012 में गंभीर पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्होंने एक माह का वेतन जमा करवाते हुए इस्तीफा दे दिया, जिसे तीन अक्टूबर 2012 को स्वीकार कर लिया गया। हाई कोर्ट ने खारिज किया दावा लगभग छह वर्ष बाद अगस्त 2018 में उन्होंने अनुपातिक पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों की मांग करते हुए आवेदन दिया, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने पंजाब सिविल सेवा नियमों तथा हरियाणा सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2016 का हवाला देते हुए उनका दावा खारिज कर दिया। इसके बाद पंकज मेहता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी कि संबंधित नियम उन कर्मचारियों पर लागू होते हैं जो बर्खास्तगी या अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देते हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल पारिवारिक मजबूरियों के चलते नौकरी छोड़ी थी और उनका पूरा सेवा रिकार्ड निष्कलंक रहा है। ऐसे में 13 वर्ष की सेवा के बाद उन्हें ग्रेच्युटी और अनुपातिक पेंशन का लाभ मिलना चाहिए। वहीं, जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित नियम केवल सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर लागू होते हैं, इस्तीफा देने वालों पर नहीं। उन्होंने कहा कि तकनीकी इस्तीफा न होने के कारण सेवा स्वतः समाप्त मानी जाएगी और पेंशन का अधिकार नहीं बनता। अदालत ने दोनों पक्षों को सुना दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने जुलाई 2021 के उस आदेश को अस्थिर और कानूनन टिकाऊ नहीं माना, जिसके तहत पंकज मेहता का दावा खारिज किया गया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को चार महीने के भीतर याचिकाकर्ता को सेवा अवधि के अनुपात में पेंशन, डीसीआरजी और अन्य लाभ जारी करने के निर्देश दिए। हालांकि अदालत ने यह कहते हुए ब्याज देने से इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता ने इस्तीफे के लगभग छह वर्ष बाद अपने लाभों के लिए दावा किया था।  

हरियाणा गेस्ट टीचर्स को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने नियमितीकरण का दिया आदेश

चंडीगढ़  हरियाणा के सरकारी स्कूलों में करीब दो दशक से गेस्ट फैकल्टी शिक्षक और व्याख्याता के तौर पर सेवाएं दे रहे शिक्षकों को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस संदीप मोदगिल की पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीति के तहत याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित किया जाए और उन्हें सभी परिणामी सेवा एवं सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। मामला सुखविंदर सिंह एवं अन्य द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने हरियाणा सरकार की 18 जून 2014 की नियमितीकरण नीति के आधार पर अपनी सेवाएं नियमित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा? याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें वर्ष 2005-06 में सरकारी स्कूलों में रिक्त पदों के विरुद्ध गेस्ट फैकल्टी शिक्षक और व्याख्याता के रूप में नियुक्त किया गया था। नियुक्ति प्रक्रिया विज्ञापन जारी करने, चयन समितियों के गठन, आवेदनों की जांच और मेरिट सूची तैयार करने के बाद पूरी की गई थी। राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति केवल अस्थायी व्यवस्था के तौर पर की गई थी और वे नियमित भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त नहीं हुए थे, इसलिए वे नियमितीकरण के पात्र नहीं हैं। हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि सरकार की दलील स्वीकार कर ली जाए तो नियमितीकरण नीति का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संविदा कर्मचारी स्वाभाविक रूप से नियमित भर्ती प्रक्रिया से बाहर ही नियुक्त होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां “बैकडोर एंट्री” या गुप्त तरीके से नहीं हुई थीं, बल्कि सार्वजनिक प्रक्रिया के तहत योग्य उम्मीदवारों का चयन किया गया था। हाई कोर्ट ने क्या कहा? हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार स्वयं मान चुकी है कि स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी के कारण इन शिक्षकों को नियुक्त किया गया था और लगभग 20 वर्षों तक उनकी सेवाएं लगातार ली जाती रहीं। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इतने लंबे समय तक शिक्षकों की सेवाएं ली गईं तो उन्हें केवल “स्टॉप गैप अरेंजमेंट” बताना पूरी तरह आत्मविरोधी और अनुचित है। कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षकों की भूमिका पर भी विस्तृत टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि शिक्षक समाज और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं तथा उन्हें मनमाने ढंग से “स्पेयर” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि लगातार 20 वर्षों तक संविदा पर कार्य लेने के बाद राज्य अब यह नहीं कह सकता कि ये केवल अस्थायी कर्मचारी थे। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के “मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य” मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने 2014 की नियमितीकरण नीतियों की वैधता को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने कहा कि अब नीति की वैधता पर विवाद समाप्त हो चुका है और याचिकाकर्ता नीति की शर्तों को पर्याप्त रूप से पूरा करते हैं। अंततः हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित किया जाए और उन्हें सभी सेवा एवं रिटायरल लाभ प्रदान किए जाएं। गेस्ट टीचर एसोसिएशन के नेता रघु वत्स ने बताया कि राज्य में इस समय 12,700 के करीब गेस्ट टीचर लगभग 20 साल से सेवा दे रहे है। कोर्ट के इस फैसले से उनकी वर्षों की लड़ाई सफल रही है और उनको एक टीचर के तौर पर सम्मान मिला है।  

NHM कर्मचारियों के नियमितीकरण पर हाई कोर्ट के फैसले के बाद आशा वर्कर यूनियन सक्रिय

 चंडीगढ़ सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए हरियाणा की हजारों आशा वर्करों ने अपनी नौकरी पक्की करने का दबाव बढ़ा दिया है। राज्य में 21 साल से आशा वर्कर कार्यरत हैं। इस समय करीब 20 हजार आशा वर्कर सेवाएं दे रही हैं, जिनमें से करीब 17 हजार की सेवाएं 10 साल से अधिक अवधि की हो चुकी हैं। आशा वर्कर्स यूनियन हरियाणा की प्रधान सुनीता, उप प्रधान रानी, सह सचिव सुदेश व अनीता और राज्य कमेटी की सदस्य वंदना ने मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव से मुलाकात कर अनुबंध आधार पर बरसों से काम कर रही आशा वर्करों को पक्का करने और तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की। हरियाणा में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत वर्षों से संविदा आधार पर कार्यरत हजारों कर्मचारियों को दो दिन पहले ही हाई कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। जस्टिस संदीप मौदगिल की बेंच ने 104 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्य सरकार संविदा व्यवस्था की आड़ में कर्मचारियों का अनिश्चितकाल तक शोषण नहीं कर सकती। लंबे समय से लगातार सेवाएं दे रहे कर्मचारियों का कार्य अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी प्रकृति का होता है। इसलिए उन्हें प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित किया जाना चाहिए और सभी सेवा लाभ दिए जाएं। एनएचएम केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य वित्तीय भार वहन करते हैं। हरियाणा सरकार ने हालांकि कोर्ट में दलील दी थी कि नियमित पद स्वीकृत नहीं हैं और अदालत नियमितीकरण का आदेश देकर नए पद सृजित नहीं कर सकती, मगर हाई कोर्ट ने इन दलीलों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वर्षों तक लगातार सेवा लेना यह साबित करता है कि कार्य स्थायी प्रकृति का है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि नियुक्ति पारदर्शी प्रक्रिया से हुई हो, कर्मचारी योग्य हों और वर्षों तक बिना किसी अदालत के संरक्षण के सेवा दे रहे हों, तो राज्य उन्हें अनिश्चितकाल तक अस्थायी नहीं रख सकता। स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने आशा वर्करों की इस मांग के प्रति सहमति जताई और मिशन महानिदेशक आरएस ढिल्लो को विभागीय कार्यवाही शुरू करने की संभावनाएं तलाशने को कहा। आशा वर्कर यूनियन की पदाधिकारी निदेशक से भी मिलीं। उन्हें अवगत कराया गया कि 31 दिसंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार 10 वर्ष की सेवाएं पूरी करने वाले सभी तरह के कर्मचारी-मजदूरों को पक्का किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री के भरोसे से संतुष्ट होकर आशा वर्कर यूनियन ने 28 मई को रेवाड़ी में होने वाले प्रदर्शन को स्थगित कर दिया। आशा वर्कर यूनियन की प्रमुख मांगें 1 .वर्ष 2023 की 73 दिवसीय हड़ताल के दौरान काटे गए मानदेय (Honorarium) का भुगतान किया जाए। 2 .जननी सुरक्षा योजना और आयुष्मान आरोग्य मंदिर के काटे हुए मानदेय को तुरंत बहाल/लागू किया जाए। 3 .वर्ष 2025 में केंद्र सरकार द्वारा घोषित 1,500 रुपये की मानदेय बढ़ोतरी को एरियर (Arrears) सहित दिया जाए। 4 .आशा वर्कर्स को मानदेय सहित मेडिकल लीव (Medical Leave) और मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) की सुविधा मिले। 5 .सभी आशा वर्कर्स और उनके परिवारों को सरकार के पैनल में शामिल अस्पतालों में मुफ्त/कैशलेस इलाज की सुविधा दी जाए। 6 .पारदर्शिता के लिए हर महीने सभी आशा वर्कर्स को उनके मानदेय भुगतान की स्लिप (Salary/Honorarium Slip) दी जाए। 7 .त्योहारों के अवसर पर सभी आशा वर्कर्स को त्योहार भत्ता (बोनस) प्रदान किया जाए।

हरियाणा की आशा वर्करों के लिए बड़ी खबर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद परमानेंट होने की आस

चंडीगढ़. सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए हरियाणा की हजारों आशा वर्करों ने अपनी नौकरी पक्की करने का दबाव बढ़ा दिया है। राज्य में 21 साल से आशा वर्कर कार्यरत हैं। इस समय करीब 20 हजार आशा वर्कर सेवाएं दे रही हैं, जिनमें से करीब 17 हजार की सेवाएं 10 साल से अधिक अवधि की हो चुकी हैं। आशा वर्कर्स यूनियन हरियाणा की प्रधान सुनीता, उप प्रधान रानी, सह सचिव सुदेश व अनीता और राज्य कमेटी की सदस्य वंदना ने मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव से मुलाकात कर अनुबंध आधार पर बरसों से काम कर रही आशा वर्करों को पक्का करने और तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की। हरियाणा में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत वर्षों से संविदा आधार पर कार्यरत हजारों कर्मचारियों को दो दिन पहले ही हाई कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। जस्टिस संदीप मौदगिल की बेंच ने 104 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्य सरकार संविदा व्यवस्था की आड़ में कर्मचारियों का अनिश्चितकाल तक शोषण नहीं कर सकती। लंबे समय से लगातार सेवाएं दे रहे कर्मचारियों का कार्य अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी प्रकृति का होता है। इसलिए उन्हें प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित किया जाना चाहिए और सभी सेवा लाभ दिए जाएं। एनएचएम केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य वित्तीय भार वहन करते हैं। हरियाणा सरकार ने हालांकि कोर्ट में दलील दी थी कि नियमित पद स्वीकृत नहीं हैं और अदालत नियमितीकरण का आदेश देकर नए पद सृजित नहीं कर सकती, मगर हाई कोर्ट ने इन दलीलों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वर्षों तक लगातार सेवा लेना यह साबित करता है कि कार्य स्थायी प्रकृति का है। हाई कोर्ट ने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि नियुक्ति पारदर्शी प्रक्रिया से हुई हो, कर्मचारी योग्य हों और वर्षों तक बिना किसी अदालत के संरक्षण के सेवा दे रहे हों, तो राज्य उन्हें अनिश्चितकाल तक अस्थायी नहीं रख सकता। स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने आशा वर्करों की इस मांग के प्रति सहमति जताई और मिशन महानिदेशक आरएस ढिल्लो को विभागीय कार्यवाही शुरू करने की संभावनाएं तलाशने को कहा। आशा वर्कर यूनियन की पदाधिकारी निदेशक से भी मिलीं। उन्हें अवगत कराया गया कि 31 दिसंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार 10 वर्ष की सेवाएं पूरी करने वाले सभी तरह के कर्मचारी-मजदूरों को पक्का किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री के भरोसे से संतुष्ट होकर आशा वर्कर यूनियन ने 28 मई को रेवाड़ी में होने वाले प्रदर्शन को स्थगित कर दिया। आशा वर्कर यूनियन की प्रमुख मांगें वर्ष 2023 की 73 दिवसीय हड़ताल के दौरान काटे गए मानदेय (Honorarium) का भुगतान किया जाए। जननी सुरक्षा योजना और आयुष्मान आरोग्य मंदिर के काटे हुए मानदेय को तुरंत बहाल/लागू किया जाए। वर्ष 2025 में केंद्र सरकार द्वारा घोषित 1,500 रुपये की मानदेय बढ़ोतरी को एरियर (Arrears) सहित दिया जाए। आशा वर्कर्स को मानदेय सहित मेडिकल लीव (Medical Leave) और मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) की सुविधा मिले।  सभी आशा वर्कर्स और उनके परिवारों को सरकार के पैनल में शामिल अस्पतालों में मुफ्त/कैशलेस इलाज की सुविधा दी जाए। पारदर्शिता के लिए हर महीने सभी आशा वर्कर्स को उनके मानदेय भुगतान की स्लिप (Salary/Honorarium Slip) दी जाए। त्योहारों के अवसर पर सभी आशा वर्कर्स को त्योहार भत्ता (बोनस) प्रदान किया जाए।

खाप पंचायत का बड़ा फैसला, भिवानी में अंतरजातीय विवाह को मिली हरी झंडी

भिवानी. झाझड़िया खाप पंचायत ने अंतरजातीय विवाह का निर्णय लिया है। इसके अलावा हिंदू मैरिज एक्ट में बदलाव की मांग करते हुए साथ ही यह भी मांग उठाई है कि कोर्ट मैरिज में माता पिता की सहमति जरूरी हो। नेहरू पार्क में हुई पंचायत की अध्यक्षता खाप के राष्ट्रीय प्रधान राय सिंह झाझड़िया की रही। पंचायत में छह अहम निर्णय लिया गए। वक्ताओं ने कहा पंचायत समाज में सार्थक बदलाव पर काम करेगी। भाईचारा मजबूत करने के लिए मुहिम चलाई जाएगी। पंचायत में हुए निर्णय के बारे में खाप के राष्ट्रीय अध्यक्ष राय सिंह झाझड़िया ने कहा खाप अंतरजीतीय विवाह को मंजूरी देती है। कोर्ट मैरिज होती है तो उसमें माता पिता की सहमति जरूरी हो। हिंदू मैरिज एक्ट में बदलाव की मांग हिंदू मैरिज एक्ट में बदलाव किया जाए। इसके अलावा विकसित भारत जीरामजी योजना का रुपया किसानों ओर मजदूरों को दिया जाए। इस योजना का रुपया गलत हाथों में जा रहा है इस पर रोक लगाई जाए। पंचायत में यह प्रस्ताव किया गया कि पेट्रोल डीजल के एक माह में चार बार रेट बढ़ाए गए हैं इनको तुरंत प्रभाव से वापस लिया जाए। सौनाली फौगाट और शिक्षिका मनीषा मौत मामले में सीबीआई जांच की रिपोर्ट सामने लाई जाए। देरी होने से लोगों का भरोसा टूट रहा है। सीबीआई जांच जल्द लोगों के सामने नहीं लाई जाती तो लोग बड़ा आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे और इसके लिए प्रशाासन स्वयं जिम्मेदार होगा। पंचायत में पर्यावरण संरक्षण को लेकर निर्णय लिया गया किया ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाए जाएंगे। बरगद, नीम, पीपल, त्रिवेणी हर गांंव में लगाए जाएंगे। पंचायत में खाप के राजस्थान प्रधान रामस्वरूप तारानगर, हरियाणा प्रधान प्रीत भैरवी, उप प्रधान सतबीर बारवास, भिवानी के प्रधान बनवारीलाल, प्रताप सिंह नंबरदार, सरपंच जयवीर सिंह, ईश्वर सिंह घिकाड़ा, अमरसिंह, राजेश पहाड़ी, फौजी जयसिंह, सूबेदार रामसिंह, पटवारी रामेहर सिंह, विजय पिलानी अधिवक्ता, सरपंच सतबीर रोहिला, सुरेश कोच, सरपंच धर्मबीर, युवा प्रधान संदीप बरालू आदि मौजूद रहे।

फ्री बस यात्रा के लिए तैयार रहें, भिवानी में हैपी कार्ड को लेकर शुरू होगा जागरूकता अभियान

भिवानी. आपकी यात्रा सुगम और सुखद हो इसके लिए हैप्पी कार्ड बनाए गए हैं। भिवानी डिपो में अभी भी 45 हजार से अधिक हैप्पी कार्ड आवेदकों का इंतजार कर रहे हैं। भिवानी डिपो, तोशाम और लोहारू सब डिपो में हजारों हैप्पी कार्डों का वितरण नहीं हो पाया है। रोडवेज कर्मचारी अब पात्र लोगों को फोन कर-करके कार्ड ले जाने की अपील कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित संख्या में लोग कार्ड लेने नहीं पहुंच रहे। रोडवेज अधिकारियों की मानें तो भिवानी डिपो, तोशाम और लोहारू डिपो में पिछले दिनों कुल 53,252 हैप्पी कार्ड पहुंचे थे। इनमें से बड़ी संख्या अब भी डिपो में पड़ी हुई है। इससे पहले अप्रैल 2024 में 1,52,892 हैप्पी कार्ड आए थे। इस प्रकार अब तक इन तीनों डिपो में कुल मिलाकर 2,06,144 हैप्पी कार्ड पहुंच चुके हैं। डेढ़ लाख से ज्यादा कार्ड बंटे रोडवेज के अनुसार अब तक 1,57,363 हैप्पी कार्ड पात्र लोगों को वितरित किए जा चुके हैं। बावजूद इसके 45 हजार से अधिक कार्ड अब भी पात्र लोगों तक पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। रोडवेज अधिकारियों का कहना है कि शुरुआत में योजना को लेकर लोगों में उत्साह दिखा, लेकिन अब धीरे-धीरे कार्ड लेने वालों की संख्या घटने लगी है। खासतौर पर भिवानी डिपो में अब पहले जैसी भीड़ नजर नहीं आ रही। कम होती दिलचस्पी ने बढ़ाई चिंता रोडवेज विभाग के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन गई है। जिन लोगों ने आवेदन प्रक्रिया पूरी कर हैप्पी कार्ड बनवा लिया, वही अब कार्ड लेने में कम रुचि दिखा रहे हैं। कई पात्र लोग या तो सूचना के बावजूद डिपो नहीं पहुंच रहे या फिर कार्ड लेने में देरी कर रहे हैं। विभागीय कर्मचारियों को अब लाभार्थियों के मोबाइल नंबर पर संपर्क करना पड़ रहा है। कर्मचारी लगातार फोन करके लोगों से कार्ड प्राप्त करने की अपील कर रहे हैं, ताकि योजना का लाभ समय पर मिल सके और कार्ड निष्क्रिय अवस्था में डिपो में न पड़े रहें। लाभार्थियों तक पहुंचाना अब बड़ी चुनौती हैप्पी कार्ड योजना का उद्देश्य जरूरतमंद और पात्र वर्ग को रोडवेज यात्रा में राहत देना है, लेकिन लाभार्थियों की उदासीनता के कारण विभाग को अतिरिक्त प्रयास करने पड़ रहे हैं। डिपो स्तर पर कार्डों की सुरक्षा, रिकार्ड और वितरण व्यवस्था भी एक अतिरिक्त जिम्मेदारी बन गई है। रोडवेज अधिकारियों का मानना है कि अगर लोग समय पर अपने कार्ड नहीं लेते, तो योजना का पूरा लाभ प्रभावित हो सकता है। डिपो में आए हैप्पी कार्डों का वितरण लगातार किया जा रहा है। जिन पात्र लोगों के कार्ड तैयार हैं, उन्हें फोन के माध्यम से सूचना दी जा रही है। डीसी के गांवों में लगने वाले रात्रि दरबार में भी हैप्पी कार्ड वितरण के लिए बूथ बनाए जाते हैं। पात्र लोग संबंधित डिपो पर पहुंचकर अपना हैप्पी कार्ड प्राप्त कर सकते हैं ताकि सरकार की इस योजना का लाभ आसानी से मिल सके।

रोहतक: भूमि विवादों के समाधान के लिए अब सिर्फ राजस्व अधिकारी करेंगे कार्रवाई

रोहतक  हरियाणा सरकार ने लाल डोरा और स्वामित्व योजना से संबंधित शिकायतों के त्वरित एवं प्रभावी समाधान के लिए नई व्यवस्था लागू की है। विकास एवं पंचायत विभाग द्वारा सभी जिला उपायुक्तों को जारी निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि अब हरियाणा आबादी देह (स्वामित्व अधिकारों का निहितकरण, अभिलेखीकरण एवं समाधान) अधिनियम-2025 के तहत आने वाली शिकायतों का निपटारा केवल अधिकृत राजस्व अधिकारी ही करेंगे। सरकार के इस फैसले को ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व संबंधी विवादों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे आमजन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था का लाभ मिलेगा। विकास एवं पंचायत विभाग, चंडीगढ़ की ओर से जारी पत्र के अनुसार यह अधिनियम 19 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था, जबकि इसे 26 नवंबर 2025 से प्रभावी माना गया है। विभाग के संज्ञान में आया था कि लाल डोरा और स्वामित्व योजना से जुड़ी शिकायतें अब तक कई स्थानों पर बीडीपीओ (खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी) तथा डीडीपीओ (जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी) कार्यालयों को भेजी जा रही थीं, जबकि अधिनियम में इन अधिकारियों की कोई निर्धारित भूमिका नहीं है। इससे शिकायतों के निस्तारण में अनावश्यक देरी और फाइलों की आवाजाही बढ़ रही थी। नए निर्देशों के तहत अब ऐसे सभी मामलों का निस्तारण केवल अधिनियम के तहत नियुक्त नायब तहसीलदार (एसी द्वितीय श्रेणी) और तहसीलदार (एसी प्रथम श्रेणी) जैसे राजस्व अधिकारियों की ओर से किया जाएगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि शिकायतों का समाधान अधिनियम की धारा 15 और 16 के प्रावधानों के अनुरूप किया जाना अनिवार्य होगा जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी राजपाल चहल ने कहा कि विभागीय निर्देशों के अनुसार अब लाल डोरा व स्वामित्व योजना से संबंधित मामलों को बीडीपीओ या डीडीपीओ कार्यालयों में नहीं भेजा जाएगा, बल्कि शिकायतकर्ता सीधे संबंधित राजस्व अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकेंगे। इससे न केवल प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि शिकायतों के समाधान में तेजी आएगी और लोगों को समय पर राहत मिल सकेगी।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार, पुराने गेस्ट टीचर्स को पक्का करने के निर्देश

चंडीगढ़. हरियाणा के सरकारी स्कूलों में करीब दो दशक से गेस्ट फैकल्टी शिक्षक और व्याख्याता के तौर पर सेवाएं दे रहे शिक्षकों को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस संदीप मोदगिल की पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीति के तहत याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित किया जाए और उन्हें सभी परिणामी सेवा एवं सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। मामला सुखविंदर सिंह एवं अन्य द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने हरियाणा सरकार की 18 जून 2014 की नियमितीकरण नीति के आधार पर अपनी सेवाएं नियमित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा? याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें वर्ष 2005-06 में सरकारी स्कूलों में रिक्त पदों के विरुद्ध गेस्ट फैकल्टी शिक्षक और व्याख्याता के रूप में नियुक्त किया गया था। नियुक्ति प्रक्रिया विज्ञापन जारी करने, चयन समितियों के गठन, आवेदनों की जांच और मेरिट सूची तैयार करने के बाद पूरी की गई थी। राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति केवल अस्थायी व्यवस्था के तौर पर की गई थी और वे नियमित भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त नहीं हुए थे, इसलिए वे नियमितीकरण के पात्र नहीं हैं। हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि सरकार की दलील स्वीकार कर ली जाए तो नियमितीकरण नीति का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संविदा कर्मचारी स्वाभाविक रूप से नियमित भर्ती प्रक्रिया से बाहर ही नियुक्त होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां “बैकडोर एंट्री” या गुप्त तरीके से नहीं हुई थीं, बल्कि सार्वजनिक प्रक्रिया के तहत योग्य उम्मीदवारों का चयन किया गया था। हाई कोर्ट ने क्या कहा? हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार स्वयं मान चुकी है कि स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी के कारण इन शिक्षकों को नियुक्त किया गया था और लगभग 20 वर्षों तक उनकी सेवाएं लगातार ली जाती रहीं। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इतने लंबे समय तक शिक्षकों की सेवाएं ली गईं तो उन्हें केवल “स्टॉप गैप अरेंजमेंट” बताना पूरी तरह आत्मविरोधी और अनुचित है। कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षकों की भूमिका पर भी विस्तृत टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि शिक्षक समाज और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं तथा उन्हें मनमाने ढंग से “स्पेयर” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि लगातार 20 वर्षों तक संविदा पर कार्य लेने के बाद राज्य अब यह नहीं कह सकता कि ये केवल अस्थायी कर्मचारी थे। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के “मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य” मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने 2014 की नियमितीकरण नीतियों की वैधता को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने कहा कि अब नीति की वैधता पर विवाद समाप्त हो चुका है और याचिकाकर्ता नीति की शर्तों को पर्याप्त रूप से पूरा करते हैं। अंततः हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित किया जाए और उन्हें सभी सेवा एवं रिटायरल लाभ प्रदान किए जाएं। गेस्ट टीचर एसोसिएशन के नेता रघु वत्स ने बताया कि राज्य में इस समय 12,700 के करीब गेस्ट टीचर लगभग 20 साल से सेवा दे रहे है। कोर्ट के इस फैसले से उनकी वर्षों की लड़ाई सफल रही है और उनको एक टीचर के तौर पर सम्मान मिला है।  

पेड़ों की कटाई पर HC सख्त, हिसार इंटरचेंज प्रोजेक्ट पर लगा ब्रेक

हिसार. विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस एक बार फिर हिसार की धरती पर आकार लेती दिखाई दे रही है। गांव ढंढूर के समीप एनएच-9 और एनएच-52 को आधुनिक डबल लूप इंटरचेंज व्हीकल अंडरपास के माध्यम से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना फिलहाल कागजों में ही ठहर गई है। उच्च न्यायालय के एक केस में दिए आदेश के बाद प्रदेशभर में पेड़ों की कटाई पर लगी रोक ने इस परियोजना की रफ्तार पर अचानक विराम लगा दिया है। जिस परियोजना से हजारों वाहन चालकों को राहत मिलने की उम्मीद थी, वही अब हरियाली और विकास के द्वंद्व में उलझी खड़ी है। टेंडर आवंटित हो चुका है, तकनीकी तैयारियां भी लगभग पूरी हैं, लेकिन निर्माण स्थल पर खड़े पेड़ फिलहाल इस परियोजना के सबसे बड़े अवरोध बन गए हैं। आदेश ने थाम दी परियोजना की चाल प्रदेश में पेड़ों की कटाई पर रोक का आधार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चल रहे सुनील कुमार शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले को माना जा रहा है। हरियाणा के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने सात अप्रैल 2026 को क्षेत्रीय वन अधिकारियों को पत्र जारी कर स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आगामी आदेश तक किसी भी आयु अथवा प्रजाति के पेड़ की कटाई की अनुमति न दी जाए। इसके बाद से विभागीय स्तर पर पेड़ों की कटाई से जुड़े प्रस्ताव भी रोक दिए गए। इसी आदेश की परछाई अब हिसार की इस बहुप्रतीक्षित सड़क परियोजना पर भी पड़ रही है। एनएचएआई करवा रहा है पेड़ों का सर्वे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अब निर्माण क्षेत्र में पेड़ों की गणना और सर्वे का कार्य करवा रहा है। विभाग यह स्पष्ट करने में जुटा है कि परियोजना के लिए आखिर कितने पेड़ों की कटाई आवश्यक होगी। हालांकि स्थिति साफ है कि जब तक पेड़ हटाने की अनुमति नहीं मिलती, तब तक निर्माण कार्य की शुरुआत संभव नहीं दिखाई देती। ऐसे में जिस परियोजना से क्षेत्र को शीघ्र राहत मिलने की उम्मीद थी, उसका इंतजार अब और लंबा हो सकता है। ढंढूर के पास आकार लेगा आधुनिक यातायात केंद्र प्रस्तावित योजना के तहत गांव ढंढूर के समीप एनएच-9 और एनएच-52 को जोड़ने के लिए दो आधुनिक डबल लूप इंटरचेंज व्हीकल अंडरपास बनाए जाने हैं। ये अंडरपास मौजूदा ओवरब्रिज से लगभग एक-एक किलोमीटर की दूरी पर विकसित किए जाएंगे। इनके निर्माण के बाद वाहन चालकों को लंबा चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं रहेगी और दोनों राष्ट्रीय राजमार्ग एक ही बिंदु पर व्यवस्थित रूप से जुड़ सकेंगे। इससे यातायात अधिक सुगम और सुरक्षित बनने की उम्मीद है। भारी वाहनों के लिए भी होगा सहज मार्ग इंजीनियरों के अनुसार प्रत्येक अंडरपास की चौड़ाई लगभग 20 मीटर और ऊंचाई साढ़े पांच मीटर के आसपास होगी। आधुनिक मानकों पर आधारित यह संरचना भारी ट्रकों और बड़े वाहनों की आवाजाही को भी बिना बाधा के संभव बनाएगी। भविष्य में बढ़ते ट्रैफिक दबाव को ध्यान में रखते हुए परियोजना को तकनीकी रूप से मजबूत स्वरूप दिया गया है। 63.27 करोड़ की परियोजना करीब 63.27 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली इस परियोजना को एनएचएआई ने विस्तृत योजना के साथ तैयार किया है। इसके पूर्ण होने पर प्रतिदिन गुजरने वाले लगभग 30 हजार वाहनों को सीधा लाभ मिलने का अनुमान है। वाहनों को बिना रुके मार्ग मिलने से ईंधन की बचत होगी, यात्रा समय घटेगा और यातायात जाम की समस्या में भी कमी आएगी। एनएच-9 का यह हिस्सा लंबे समय से दुर्घटना संभावित क्षेत्र माना जाता रहा है। क्रास ट्रैफिक और अव्यवस्थित मोड़ों के कारण यहां हादसों का खतरा बना रहता है। डबल लूप इंटरचेंज बनने के बाद वाहनों की आवाजाही अलग-अलग स्तरों पर संचालित होगी, जिससे टकराव के बिंदु कम होंगे और दुर्घटनाओं की आशंका में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। इस परियोजना से विकास को मिलेगी रफ्तार हिसार-सिरसा मार्ग और हिसार-कैथल मार्ग को बेहतर ढंग से जोड़ने वाली यह परियोजना केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं मानी जा रही। विशेषज्ञों के अनुसार इससे औद्योगिक, व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी। बेहतर संपर्क व्यवस्था निवेश आकर्षित करेगी और रोजगार के अवसरों का विस्तार भी संभव होगा। गांव ढंढूर निवासी विकास जांगड़ा और नरेंद्र ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित यह परियोजना क्षेत्र के लिए एक दूरदर्शी और जनहितकारी पहल है। यह भविष्य की सुरक्षित और सुव्यवस्थित यातायात व्यवस्था की मजबूत नींव है। परियोजना के पूर्ण होने के बाद एनएच-9 और एनएच-52 के बीच आवागमन कहीं अधिक सहज और सुरक्षित हो जाएगा। डबल लूप इंटरचेंज के प्रमुख लाभ सुचारू यातायात : अलग स्तर पर मार्ग बनने से वाहनों को रुकना नहीं पड़ेगा और यातायात निर्बाध रूप से चलता रहेगा। दुर्घटनाओं में कमी : क्रासिंग और टर्निंग प्वाइंट कम होने से हादसों की आशंका घटेगी। समय और ईंधन की बचत : बिना रुकावट के सफर से यात्रा तेज होगी और ईंधन की खपत कम होगी। बढ़ती ट्रैफिक क्षमता : भारी वाहनों और बढ़ते ट्रैफिक दबाव को संभालने में यह संरचना अधिक सक्षम होगी। कम होगा प्रदूषण : वाहनों के लगातार चलने से इंजन कम समय तक आइडल रहेगा, जिससे प्रदूषण घटेगा। बेहतर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी : दो प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग सीधे जुड़ने से व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। अनिकेत श्रीवास्तव ने कहा कि न्यायालय के एक आदेश के चलते पेड़ों की कटाई पर रोक लगी हुई है। इसी कारण गांव ढंढूर के पास प्रस्तावित डबल लूप इंटरचेंज व्हीकल अंडरपास परियोजना पर फिलहाल काम शुरू नहीं हो पाया है। विभाग पेड़ों का सर्वे करवा कर रिपोर्ट तैयार करेगा तभी स्थिति स्पष्ट होगी। पेड़ कटाई की अनुमति मिलने के बाद ही निर्माण कार्य आरंभ हो पाएगा।