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खामेनेई के बेटे मोजतबा बने ईरान के नए सुप्रीम लीडर

नई दिल्ली. अमेरिका और इजरायल के खिलाफ छिड़ी भीषण जंग के बीच ईरान ने अपना सर्वोच्च नेता चुन लिया है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद अब उनके बेटे मोजतबा खामेनेई यह जिम्मेदारी संभालेंगे। सोमवार को ईरान की तरफ से यह ऐलान होते ही पूरी दुनिया में कोहराम मच गया है। अब इस बात को लेकर चर्चाएं तेज हैं कि आखिर इस युद्ध को लेकर मोजतबा का रुख क्या होगा और वह अमेरिका और इजरायल के साथ-साथ देश के लोगों में उठे असंतोष की भावना का जवाब कैसे देंगे। इससे पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की रमजान के महीने में मौत होने के बाद देश की सत्ता की बागडोर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में सबसे प्रमुख नाम उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का ही था, जिन्हें लंबे समय से ईरान की सत्ता व्यवस्था के भीतर प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। कौन हैं मोजतबा खामेनेई? मोजतबा खामेनेई को अपेक्षाकृत मध्य-स्तरीय धर्मगुरु माना जाता है और उन्हें 2022 में ही अयातुल्ला की उपाधि दी गई थी, जो सर्वोच्च नेता बनने के लिए आवश्यक मानी जाती है। इसीलिए कई विश्लेषकों ने इसे उन्हें अली खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किए जाने का संकेत माना था। मोजतबा ने अपने अधिकतर राजनीतिक जीवन में कोई औपचारिक सरकारी पद नहीं संभाला, लेकिन वह सर्वोच्च नेता के कार्यालय के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें अक्सर सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली 'पावर ब्रोकर' और 'गेटकीपर' के रूप में देखा जाता रहा है। बताया जाता है कि 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने ईरान-इराक युद्ध में संक्षिप्त रूप से हिस्सा लिया था। हालांकि उन्हें व्यापक सार्वजनिक पहचान 1990 के दशक के आखिर में मिली, जब उनके पिता अली खामेनेई की सर्वोच्च नेता के रूप में स्थिति मजबूत हो चुकी थी। 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध लगाए थे और आरोप लगाया था कि वे बिना किसी औपचारिक सरकारी पद के भी सर्वोच्च नेता की ओर से प्रभावी भूमिका निभा रहे थे। आईआरजीसी से करीबी समय के साथ उनकी पहचान दो प्रमुख पहलुओं से जुड़ी रही है। पहला, ईरान की सुरक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और उससे जुड़े कट्टरपंथी नेटवर्क के साथ उनके करीबी संबंध। दूसरा, सुधारवादी राजनीति और पश्चिमी देशों के साथ करीबी संबंधों के प्रति उनका कड़ा विरोध। आलोचक उन्हें 2009 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दमन से भी जोड़ते हैं। माना जाता है कि उन्होंने ईरान के सरकारी प्रसारण संगठन पर भी गहरा प्रभाव बनाए रखा, जिससे उन्हें देश के सूचना तंत्र और सरकारी विमर्श के एक हिस्से पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण मिला। कैसे होगी ईरान की नीति? विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा खामेनेई के सर्वोच्च नेता बनने पर ईरान की नीतियों में बड़े बदलाव की संभावना कम है। माना जाता है कि उनके नेतृत्व में देश की राजनीति में सुरक्षा संस्थानों, खासकर आईआरजीसी का प्रभाव और मजबूत हो सकता है। विश्लेषकों के अनुसार घरेलू स्तर पर विरोध प्रदर्शनों के प्रति सख्त रुख अपनाया जा सकता है, जबकि विदेश नीति में पश्चिमी देशों के साथ बातचीत मुख्य रूप से रणनीतिक जरूरतों के आधार पर ही की जा सकती है। कुल मिलाकर, उनके नेतृत्व में ईरान की नीति रणनीतिक रूप से व्यावहारिक रह सकती है। खामेनेई की नियुक्ति इस बात का भी इशारा है कि ईरान किसी भी हाल में अमेरिकी मांगों के आगे नहीं झुकेगा और वह अपने पिता के सख्त रवैये को जारी रखेंगे, यानी इस्लाम और अमेरिका विरोधी विदेश नीति को सबसे ऊपर रखना। वहीं 28 फरवरी के हमलों में अपने पिता, मां और पत्नी को खोने वाले मोजतबा बदला लेने की कोशिशें भी कर सकते हैं। युद्ध फिलहाल जारी रहेगा।

राज्यसभा में भड़के नड्डा- वहीं बैठे रहोगे और घटते चले जाओगे

नई दिल्ली. संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार से शुरू हो रहा है। पहले ही दिन दो बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। इनमें लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और विदेश मंत्री एस जयशंकर का पश्चिम एशिया के हालात पर बयान है। माना जा रहा है कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच होने जा रहे सत्र के दूसरे चरण के भी हंगामेदार रहने के आसार हैं। खबर है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने सांसदों को तीनों दिनों के लिए व्हिप जारी कर दिया है। केंद्रीय संसदीय मंत्री किरेन रिजिजू ने जहां सत्तापक्ष की तरफ से चर्चा में हिस्सा लेने वाली सदस्यों के साथ बैठक की, वहीं कांग्रेस ने भी बैठक कर रणनीति पर चर्चा की थी। कहा जा रहा है कि बिरला के खिलाफ लाए जा रहे प्रस्ताव पर 10 घंटे चर्चा हो सकती है। संसदीय सूत्र बताते हैं कि विपक्ष के 118 सांसदों ने प्रस्ताव के समर्थन में नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। नोटिस पर तृणमूल कांग्रेस ने हस्ताक्षर नहीं किए थे, पर नए घटनाक्रम में टीएमसी ने भी प्रस्ताव का समर्थन करने का निर्णय लिया है। एनसीपी (शरद पवार) ने भी अभी तक अपना रुख साफ नहीं किया है, पर माना जा रहा है कि एनसीपी (एसपी) विपक्षी दलों के खिलाफ नहीं जाएगी। विपक्ष पर भड़के नड्डा, ओछी राजनीति के लगाए आरोप विदेश मंत्री एस जयशंकर की तरफ से पश्चिम एशिया पर बयान दिए जाने के दौरान विपक्ष वॉक आउट कर गया। इसपर सत्ता पक्ष के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर, बजट भाषण, वक्फ बिल पर जेपीसी रिपोर्ट समेत कई मामलों का जिक्र कर कहा कि जब भी जवाब की बारी आती है, तो विपक्ष वॉक आउट कर जाता है। उन्होंने कहा, 'इनका कोई इंटरेस्ट भारत के लोगों के विकास में नहीं है, इनका कोई इंटरेस्ट विकसित भारत में नहीं है, कोई इंटरेस्ट आत्मनिर्भर भारत में नहीं है। कोई इंटरेस्ट देश आगे बढ़े इसमें नहीं है। इनका इंटरेस्ट ओछी राजनीति को आगे बढ़ाना है।

ईरान की इस हरकत से आगबबूला हुआ सऊदी अरब

ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान ने बीते 10 दिनों से खाड़ी देशों पर लगातार हमले किए हैं। इन हमलों में ना सिर्फ अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया गया है, बल्कि ईरान ने सऊदी अरब और अन्य देशों के अन्य तेल और रिहायशी ठिकानों पर भी मिसाइलें बरसाई हैं। वहीं खाड़ी देशों ने अब तक संयम से काम लेते हुए दोनों पक्षों से बातचीत की अपील की है। हालांकि अब इन देशों के सब्र का बांध टूटता नजर आ रहा है। रविवार को अपने तेल ठिकानों और एक रिहायशी इलाके पर हुए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए सऊदी अरब ने ईरान को चेतावनी दे दी है। सऊदी अरब ने सोमवार को ईरान को आगाह किया है कि अगर वह अरब देशों पर हमले करता रहा तो उसे अब तक का 'सबसे बड़ा नुकसान' उठाना पड़ेगा। सऊदी अरब का यह बयान उस नए ड्रोन हमले के बाद आया, जिसमें उसके बड़े शायबा तेल क्षेत्र को निशाना बनाया गया था। सऊदी अरब ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन द्वारा शनिवार को दिए गए इस बयान को भी खारिज कर दिया कि ईरान ने खाड़ी अरब देशों पर अपने हमले रोक दिए हैं। भविष्य में संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा- सऊदी सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "देश इस बात की पुष्टि करता है कि ईरानी पक्ष ने इस बयान पर अमल नहीं किया, ना तो राष्ट्रपति के भाषण के दौरान और ना ही उसके बाद। ईरान ने बिना किसी ठोस वजह के अपना आक्रमण जारी रखा है।" बयान में आगे कहा गया कि ईरानी हमले का मतलब है तनाव में और वृद्धि, जिसका वर्तमान और भविष्य में संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा। UAE ने किया अटैक वहीं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ईरान पर हमला बोल दिया है। UAE ने अपने पहले हमले में ईरान के एक विलवणीकरण संयंत्र पर हमला किया है। यह अमीरात और ईरान के बीच शत्रुता में एक अहम वृद्धि का संकेत है। अगर इस हमले की पुष्टि हो जाती है, तो यह हमला ना केवल फारस की खाड़ी के एक और देश को ईरान के साथ सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल करेगा, बल्कि ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के खिलाफ अबू धाबी का पहला जवाबी हमला भी होगा। ईरानी अधिकारियों और उसके सरकारी मीडिया के अनुसार, केशम द्वीप पर स्थित एक विलवणीकरण संयंत्र पर कथित तौर पर रात भर में हमला किया गया, जिससे आसपास के लगभग 30 गांवों में पानी की आपूर्ति बाधित हो गई। ईरान के हमले जारी इस बीच ईरान ने अपने पड़ोसी मुल्कों को रविवार को भी निशाना बनाया। कुवैत के सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ईरानी ड्रोनों ने कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के ईंधन टैंकों को निशाना बनाया। कुवैती वायु रक्षा प्रणालियों ने कई ड्रोनों को मार गिराया, लेकिन मलबे गिरने से हवाई अड्डे के टर्मिनल को आंशिक नुकसान पहुँचा है। इसके अलावा, कुवैत सिटी स्थित 'पब्लिक इंस्टीट्यूशन फॉर सोशल सिक्योरिटी' की बहुमंजिला इमारत में भी ईरानी ड्रोन हमले के बाद भीषण आग लग गई। कुवैती सेना ने बताया कि पिछले 48 घंटों में उन्होंने 12 ड्रोनों और 14 मिसाइलों को सफलतापूर्वक गिरा दिया है।

नर्क से भी भयावह था हिटलर का यह कैंप, हजारों बेगुनाहों की मौत की डरावनी कहानी

दाचाऊ एडोल्फ हिटलर ने नाजी जर्मनी में अपने राज के दौरान यहूदियों समेत लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा। इस इतिहास से तो हर कोई परिचित है, लेकिन क्या आपको मालूम है कि हिटलर की क्रूरताओं के किस्सों में मार्च का महीना काफी अहम है। ये वही महीना है, जब हिटलर ने नाजी कैंपों की नींव रखना शुरू किया था, जो आगे चलकर यहूदियों समेत उन तमाम लोगों की मौत की वजह बनें, जिन्हें सरकार नापसंद करती थी। इसी महीने हिटलर ने पहले 'जहन्नुम' यानी नाजी कैंप की नींव रखी थी, जिसे दाचाऊ कैंप के तौर पर जाना जाता है। दाचाऊ कैंप का इतिहास इतना दर्दनाक है, जिसे जानकर लोगों की रूह कांप जाती है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या महिलाएं और जवान, हिटलर जिसको भी नापसंद करता था, उन्हें कैंपों में ठेल दिया जाता था, जहां उनकी जिंदगी जहन्नुम से कम ना थी। एडोल्फ हिटलर ने जनवरी 1933 में नाजी जर्मनी की कमान संभाली और इसी साल मार्च में दाचाऊ कंसन्ट्रेशन कैंप खोला गया। ये कैंप दक्षिणी जर्मनी के दाचाऊ शहर में स्थित था। वैसे तो इस कैंप को राजनीतिक बंदियों के लिए बनाया गया था, लेकिन फिर यहां यहूदियों को कैद किया जाने लगा। दाचाऊ कैंप में क्या होता था? नेशनल म्यूजिम के मुताबिक, शुरुआत में यहां उन राजनीतिक बंदियों को कैद किया गया, जो हिटलर की नीतियों के खिलाफ थे। यहां कैद किए जाने वाले ज्यादातर लोग समाजवादी और कम्युनिस्ट थे। मगर नाजी सरकार का इरादा तो कुछ और ही था। राजनीतिक कैदियों के बाद नंबर आया कलाकारों, बुद्धिजीवियों, शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांगों, रोमानी लोगों और समलैंगिकों का, जिन्हें नाजी सरकार हीन भावना से देखती थी। फिर यहां यहूदियों को भी कैद किया जाने लगा। इस कैंप को चलाने का जिम्मा हिलमार वैकरले को मिला हुआ था, जो नाजी अर्धसैनिक संगठन SS का एक अधिकारी था। कैंप में कैद किए गए लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था। इसका अंदाजा कुछ यूं लगाया जा सकता है कि हिटलर ने एक फरमान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि कैंप के अंदर जर्मनी का कानून लागू नहीं होगा। इसका मतलब था कि कैदियों के साथ मारपीट की जाए या उन्हें मौत के घाट उतारा जाए, ऐसा करने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इससे कैंप के नाजी अधिकारियों को अपने मनमुताबिक सजा देने का अधिकार मिल गया। हिलमार वैकरले के बाद कैंप का जिम्मा थियोडोर आइके के पास आ गया, जिसने यहां वो बर्बरता फैलाई, जो रूह कंपा देती है। सबसे पहले थियोडोर आइके ने एक रेगुलेशन जारी किया, जिसमें ये बताया गया कि कैंप किस तरह चलेगा। इसके तहत अगर कोई कैदी छोटी सी भी गलती कर देता था, तो उसकी बेहरमी से पिटाई होती थी। अगर किसी ने यहां से भागने की हिम्मत की या फिर उसकी राजनीतिक विचारधारा सरकार के खिलाफ है, तो फिर उसे तुरंत मौत के घाट उतार दिया जाता था। कैदियों को खुद का बचाव करने या अपने साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के खिलाफ बोलने की आजादी नहीं थी। अगर कोई कुछ कहता, तो उसे पहले पीटा जाता और फिर उसकी हत्या कर दी जाती। थियोडोर आइके ने यहां पर जो रेगुलेशन बनाई थी, उसको एक ब्लूप्रिंट के तौर पर देखा गया। इसके बाद जितने भी नाजी कैंप बनाए गए, वहां इसी आधार पर सजा देने का प्रावधान किया गया। यहां कैद किए लोगों को समय पर खाना नहीं मिलता था। उनसे कई-कई घंटों तक काम करवाया जाता था। जब 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई, तो दाचाऊ में कैद किए गए लोगों से हथियार और अन्य चीजें बनवाई जाने लगीं। इसके अलावा हजारों ऐसे कैदी भी थे, जिनके ऊपर नाजी वैज्ञानिक और डॉक्टर मेडिकल एक्सपेरिमेंट किया करते थे। दाचाऊ में कितने लोग मारे गए थे? यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजिम के अनुसार, 1940 तक दाचाऊ एक कंसन्ट्रेशन कैंप का रूप धारण कर चुका था, जहां के हालात बेहद क्रूर और भीड़भाड़ भरे थे। इसे लगभग 6,000 बंदियों को रखने के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन आबादी लगातार बढ़ती रही और 1944 तक लगभग 30,000 कैदियों को शिविर में ठूंस दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में, हिटलर को यह विश्वास हो गया कि जर्मनी और नाजियों द्वारा कब्जा किए गए देशों में यहूदियों की दैनिक गतिविधियों पर बैन लगाने भर से 'यहूदी समस्या' का समाधान नहीं होगा। उस लगने लगा कि ये समस्या तभी सुलझेगी, जब सारे यहूदियों का सफाया कर दिया जाए। इसके बाद 1941 से लेकर 1944 तक जहां हजारों यहूदियों और उन लोगों को भेजा जाने लगा, जिन्हें सरकार पसंद नहीं करती थी। फिर यहां उन्हें जहरीली गैस देकर मारने का सिलसिला शुरू हुआ। 1933 से 1945 तक दाचाऊ के हजारों कैदी बीमारी, कुपोषण और अत्यधिक काम की वजह से जान गंवा बैठे। कैंप के नियमों के उल्लंघन के लिए हजारों लोगों को फांसी दे दी गई। 1942 में इस कैंप में बैरक एक्स का निर्माण शुरू हुआ, जो एक श्मशानगृह था और इसमें शवों को जलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चार बड़ी भट्टियां शामिल थीं। नाजियों ने दाचाऊ के कैदियों पर खूब मेडिकल एक्सपेरिमेंट भी किए। उदाहरण के लिए, नाजी वैज्ञानिक ये पता लगाना चाहते थे कि क्या बर्फीले पानी में डूबे व्यक्ति को जीवित किया जा सकता है। इस संभावना का पता लगाने के लिए कैदियों को बर्फीले पानी में डुबोकर परीक्षण किया जाता था। उन्हें घंटों तक बर्फीले पानी से भरे टैंकों में जबरन डुबोया जाता था। इस दौरान भी कैदी मारे जाते रहे। यहां कैद हुए लोगों को आजादी तब मिली, जब 29 अप्रैल 1945 को अमेरिकी सेना ने दाचाऊ कैंप पर अपना कंट्रोल जमाया। 1933 से लेकर 1945 तक यहां 2 लाख से ज्यादा कैदियों को रखा गया था, जिसमें से हजारों ने अपनी जान गंवाई।

छोटा निवेश, बड़ा फायदा! पोस्ट ऑफिस स्कीम से मिलेगा ₹90 हजार तक ब्याज

नई दिल्ली बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव और निवेश से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच अधिकांश लोग ऐसे विकल्प की तलाश करते हैं, जहां उनका पैसा सुरक्षित भी रहे और अच्छा रिटर्न भी मिल सके। ऐसे निवेशकों के लिए डाकघर की बचत योजनाएं एक भरोसेमंद विकल्प मानी जाती हैं। नेशनल डेस्क: बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव और निवेश से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच अधिकांश लोग ऐसे विकल्प की तलाश करते हैं, जहां उनका पैसा सुरक्षित भी रहे और अच्छा रिटर्न भी मिल सके। ऐसे निवेशकों के लिए डाकघर की बचत योजनाएं एक भरोसेमंद विकल्प मानी जाती हैं। इन्हीं योजनाओं में पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट स्कीम (POTD) इन दिनों काफी चर्चा में है। यह योजना भारत सरकार की संप्रभु गारंटी के साथ आती है, इसलिए इसमें निवेश को बेहद सुरक्षित माना जाता है। खास बात यह है कि इस योजना में निवेश करके बिना किसी बाजार जोखिम के अच्छा रिटर्न प्राप्त किया जा सकता है। बैंक एफडी जैसी योजना पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट स्कीम का ढांचा काफी हद तक बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) योजना जैसा है। इसमें निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार एक, दो, तीन या पांच साल की अवधि के लिए पैसा जमा कर सकते हैं। मौजूदा ब्याज दरों के अनुसार:     एक साल के लिए जमा राशि पर 6.9 प्रतिशत ब्याज मिलता है     दो और तीन साल की अवधि पर 7 प्रतिशत ब्याज मिलता है     पांच साल के निवेश पर 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जाता है 2 लाख के निवेश पर संभावित कमाई यदि कोई निवेशक इस योजना में पांच साल के लिए 2 लाख रुपये का निवेश करता है, तो मौजूदा 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के हिसाब से पांच साल बाद उसका कुल फंड लगभग 2,89,990 रुपये हो सकता है। इसमें 2 लाख रुपये मूल निवेश होगा, जबकि करीब 89,990 रुपये ब्याज के रूप में मिल सकते हैं। यानी केवल ब्याज से ही लगभग 90 हजार रुपये की कमाई संभव है। ज्यादा निवेश पर ज्यादा फायदा अगर कोई व्यक्ति अधिक रकम निवेश करता है, तो उसे उसी अनुपात में अधिक रिटर्न भी मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई निवेशक पांच साल के लिए 5 लाख रुपये जमा करता है, तो अवधि पूरी होने पर उसे लगभग 2,24,974 रुपये ब्याज के रूप में मिल सकते हैं। इस तरह कुल राशि करीब 7,24,974 रुपये तक पहुंच सकती है। टैक्स में भी मिलती है राहत इस योजना का एक और बड़ा फायदा यह है कि पांच साल की अवधि वाली टाइम डिपॉजिट पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत टैक्स छूट का लाभ भी मिलता है। निवेशक 1.5 लाख रुपये तक की राशि पर टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। खाता खोलना आसान पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट स्कीम में खाता खोलना भी काफी आसान है। इसमें न्यूनतम 1,000 रुपये से निवेश शुरू किया जा सकता है और अधिकतम निवेश की कोई सीमा तय नहीं है। निवेशक अपनी जरूरत के अनुसार सिंगल या जॉइंट अकाउंट भी खुलवा सकते हैं। हर साल मिलने वाला ब्याज निवेशक के खाते में जुड़ता रहता है, जिससे समय के साथ निवेश की कुल राशि बढ़ती जाती है। सुरक्षित निवेश और स्थिर रिटर्न की वजह से यह योजना उन लोगों के लिए खास तौर पर उपयोगी मानी जाती है जो बिना जोखिम के अपनी बचत बढ़ाना चाहते हैं।  

भीषण गर्मी का अलर्ट: देश के 417 जिले हाई रिस्क में, दिन ही नहीं रातें भी दे रहीं राहत नहीं

नई दिल्ली भारत में क्लाइमेट चेंज का असर अब सिर्फ "चिलचिलाती दोपहर" तक ही सीमित नहीं है, बल्कि "घुटन भरी रातें" और "बढ़ती नमी" भी बड़ी आबादी के लिए जानलेवा खतरा बन रही हैं। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की तरफ से जारी की गई नई स्टडी, "बहुत ज्यादा गर्मी भारत पर कैसे असर डाल रही है: जिला-लेवल हीट रिस्क का आकलन 2025", ने चौंकाने वाले तथ्य सामने लाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 57 प्रतिशत ज़िले, जहां देश की 76 प्रतिशत आबादी रहती है, अब बहुत ज़्यादा से लेकर बहुत ज्यादा गर्मी के खतरे का सामना कर रहे हैं। यह स्टडी पहली बार 35 इंडिकेटर्स के आधार पर 734 ज़िलों का डिटेल्ड एनालिसिस करती है, जो 1982 से 2022 तक बदलते ट्रेंड्स को दिखाता है। हीट 'हॉटस्पॉट': दिल्ली और महाराष्ट्र लिस्ट में सबसे ऊपर CEEW डेटा के मुताबिक, देश के 417 जिले 'हाई रिस्क' कैटेगरी में हैं, जबकि 201 जिलों में मीडियम रिस्क है। सबसे ज्यादा गर्मी के खतरे वाले टॉप 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लिस्ट इस तरह है: दिल्ली, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश दिलचस्प और चिंता की बात यह है कि यह खतरा सिर्फ़ शहरी इलाकों तक ही सीमित नहीं है। जहाँ दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे आर्थिक केंद्र खतरे में हैं, वहीं महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण ज़िले, जहाँ खेती करने वाले मज़दूर खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर हैं, भी ज़्यादा खतरे में हैं। रातें दिनों से ज्यादा खतरनाक स्टडी की सबसे डरावनी बात 'गर्म रातों' (बहुत ज़्यादा गर्म रातें) में बढ़ोतरी है। रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले एक दशक (2012-2022) में, लगभग 70 प्रतिशत ज़िलों में हर गर्मी के मौसम में कम से कम पाँच और बहुत ज़्यादा गर्म रातें दर्ज की गई हैं। "साइंस साफ़ है—हम अब बहुत ज़्यादा, लंबे समय तक चलने वाली गर्मी और खतरनाक रूप से गर्म रातों के दौर में आ गए हैं।" जब रात का टेम्परेचर नॉर्मल से काफ़ी ज़्यादा रहता है, तो इंसान के शरीर को दिन की गर्मी से उबरने का समय नहीं मिलता, जिससे हीट स्ट्रोक और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। डेटा के मुताबिक, गर्म दिनों के मुकाबले गर्म रातें बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। उत्तर भारत में बढ़ती ह्यूमिडिटी उत्तर भारत के ज़िले, जिन्हें पहले सूखा माना जाता था, अब तटीय इलाकों के बराबर ह्यूमिडिटी महसूस कर रहे हैं। पिछले दस सालों में इंडो-गैंगेटिक मैदानों में रिलेटिव ह्यूमिडिटी में 10 परसेंट की बढ़ोतरी देखी गई है। बदलाव: कानपुर, जयपुर, दिल्ली और वाराणसी जैसे शहरों में ह्यूमिडिटी का लेवल 30-40 परसेंट से बढ़कर 40-50 परसेंट हो गया है। असर: ज्यादा ह्यूमिडिटी की वजह से महसूस होने वाला टेम्परेचर असल टेम्परेचर से 3-5 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा हो जाता है। इससे शरीर के पसीना निकलने के नैचुरल कूलिंग प्रोसेस में रुकावट आती है, जिससे नॉर्मल टेम्परेचर भी जानलेवा हो जाता है। आगे का रास्ता: डिस्ट्रिक्ट लेवल पर हीट एक्शन प्लान CEEW में सीनियर प्रोग्राम लीड, डॉ. विश्वास चिताले ने ज़ोर दिया कि लोकल लेवल पर हीट एक्शन प्लान लागू करने का समय आ गया है। महाराष्ट्र, ओडिशा और गुजरात जैसे राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन इसे नेशनल लेवल पर बढ़ाने की जरूरत है। मुख्य सुझाव:     फाइनेंशियल मदद: 2024 में हीटवेव को डिजास्टर कैटेगरी में शामिल किए जाने के साथ, राज्य अब स्टेट डिज़ास्टर मिटिगेशन फंड का इस्तेमाल कर सकते हैं।     समाधान: नेट-जीरो कूलिंग शेल्टर, कूल रूफ और अर्ली वार्निंग सिस्टम को ज़रूरी करें।     डेटा अपडेट: हीट एक्शन प्लान में सिर्फ टेम्परेचर ही नहीं, बल्कि रात में होने वाली गर्मी और ह्यूमिडिटी का डेटा भी शामिल करें।     यह रिपोर्ट साफ करती है कि बहुत ज़्यादा गर्मी अब भविष्य की चेतावनी नहीं है, बल्कि आज की एक त्रासदी है, जिससे निपटने के लिए पॉलिसी और स्ट्रक्चरल बदलावों की जरूरत है।  

मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर: ईरान ने UAE पर मिसाइल-ड्रोन से किया बड़ा हमला, जॉर्डन का एयरबेस निशाने पर

नई दिल्ली ईरान ने रविवार को क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाते हुए यूएई पर 16 बैलिस्टिक मिसाइलें और 117 ड्रोन दागे । इसके साथ ही जॉर्डन के एक प्रमुख एयरबेस को भी निशाना बनाए जाने की खबर है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि यह हमला उसके जारी सैन्य अभियान ऑपरेशन ऑनेस्ट प्रॉमिस 4 का हिस्सा है। इजरायली शहरों के साथ‑साथ जॉर्डन पर भी हमला आईआरजीसी के अनुसार, ताजा हमलों में तेल अवीव और बेएरशेवा जैसे इजरायली शहरों के साथ‑साथ जॉर्डन के अल‑अज्राक एयरबेस को लक्ष्य बनाया गया। ईरानी सरकारी मीडिया ने बताया कि यह अभियान मिसाइलों की नई पीढ़ी से अंजाम दिया गया। इसी बीच, लेबनान के एक अधिकारी ने बताया कि बढ़ते संघर्ष के बीच 117 ईरानी नागरिकों को शनिवार‑रविवार की रात रूसी विमान से बेरूत से निकाला गया। जिनमें राजनयिक और दूतावास कर्मचारी शामिल हैं, हालात तेजी से बिगड़ते दिख रहे हैं और पूरे क्षेत्र में अलर्ट बढ़ा दिया गया है।  

तेहरान में गूंजे धमाके: इजरायल ने फ्यूल डिपो को बनाया निशाना, एसिड रेन को लेकर चेतावनी जारी

नई दिल्ली ईरान की राजधानी तेहरान में पांच फ्यूल डिपो को निशाना बनाया गया। इजरायल की तरफ से किए गए हवाई हमलों में तेहरान में बड़े धमाके हुए। इसके कारण धुएं के ऊंचे गुबार देखे गए। इजरायल की सेना ने कन्फर्म किया है कि उनकी एयरफोर्स ने तेहरान में फ्यूल स्टोरेज की जगहों पर हमला किया है। इजरायल ने कहा है कि उनका मकसद ईरान की सेना को उनका इस्तेमाल करने से रोकना है। हालांकि ईरान ने धमाकों और आग की पुष्टि तो की है, लेकिन कहा है कि उसके फ्यूल रिजर्व सुरक्षित हैं।   धमाकों से लगी बड़ी आग दरअसल इजरायल के लड़ाकू विमानों ने तेहरान और उसके आस-पास कई ऑयल डिपो पर हमला किया। इससे बड़ी आग लग गई और आसमान में काले धुएं फैल गया। सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो वायरल हैं, जिसमें आग देखी जा सकती है। इस घटना में अब तक 4 लोगों की मौत हो गई है, जिसें दो तेल टैंकर ड्राइवर भी शामिल हैं। ईरानी रेड क्रिसेंट ने तेल डिपो में धमाकों के बाद हवा में टॉक्सिन निकलने की वजह से तेहरान में एसिड रेन की चेतावनी दी है। एजेंसी ने कहा है कि धमाकों की वजह से हवा में जहरीले हाइड्रोकार्बन कंपाउंड, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड की काफी मात्रा निकली है। आग पर पाया गया काबू फ्यूल टैंक में हुए धमाकों से आस-पास के शहरों को भी हिला दिया। सड़क पर लीक हो रहे फ्यूल से आग बहती हुई दिख रही थी। इमरजेंसी क्रू ने आग पर काबू पाने के लिए रात भर काम किया। ईरान ने बताया कि 5 जगहों पर हमला हुआ है, जिसमें 4 स्टोरेज डिपो और एक पेट्रोलियम प्रोडक्ट ट्रांसपोर्ट सेंटर शामिल हैं। अधिकारियों ने कहा है कि आग पर काबू पा लिया गया है। नुकसान को कम करने के लिए फ्यूल डिस्ट्रीब्यूशन को कुछ समय के लिए रोक दिया गया था। हवा में फ्यूल की गंध महसूस हो रही थी। बता दें कि इजराइल ने 28 फरवरी से ईरान पर लगभग 3400 हमले किए हैं।  

इरान संकट: खामेनेई की हत्या की धमकी, ट्रंप ने कही अहम प्रतिक्रिया

तेहरान लारीजानी ने एक्स पर एक अलग पोस्ट में ईरान के पड़ोसियों से यह भी कहा था कि उन्हें या तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ अपने इलाके का इस्तेमाल करने से रोकना चाहिए, या हमारे पास खुद ऐसा करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। ईरान के सिक्योरिटी चीफ अली लारीजानी ने रविवार को कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की कीमत चुकाएंगे। खामेनेई के करीबी लारीजानी ने रविवार को एक्स पर पोस्ट किया, "हम अपने लीडर और अपने लोगों के खून का बदला लगातार लेंगे। ट्रंप को इसकी कीमत चुकानी होगी और चुकाएंगे।" इस पर ट्रंप ने इन धमकियों को खारिज करते हुए दो टूक कहा है कि वह लारीजानी को जानते ही नहीं। 28 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच तब युद्ध की शुरुआत हुई, जब अमेरिका व इजरायल ने मिलकर ईरान की राजधानी तेहरान में कई हमले किए। इनमें अली खामेनेई समेत कई की मौत हो गई। इसके बाद से तेहरान गल्फ देशों पर लगातार हमले कर रहा है और दुबई, बहरीन, कुवैत, कतर समेत कई जगहों पर मिसाइलों और ड्रोन से हमले करके बड़े नुकसान कर रहा है। ईरान ने अमेरिका के कई बेस पर अटैक किए हैं। ट्रंप ने सीबीएस न्यूज को बताया, "मुझे नहीं पता कि वह किस बारे में बात कर रहे हैं, वह कौन हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।'' उन्होंने कहा कि लारीजानी पहले ही हार चुके हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान पर अमेरिकी हमले जारी रहेंगे और तेहरान से बिना शर्त सरेंडर की मांग की। लारीजानी ने एक्स पर एक अलग पोस्ट में ईरान के पड़ोसियों से यह भी कहा था कि उन्हें या तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ अपने इलाके का इस्तेमाल करने से रोकना चाहिए, या हमारे पास खुद ऐसा करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। ट्रंप का दावा, ईरान ने किया था मिनाब में बालिकाओं के स्कूल पर हमला वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के मिनाब शहर में एक स्कूल पर हुए हमले में अमेरिका की जिम्मेदारी से इनकार करते हुए कहा है कि इसे ईरान ने ख़ुद अंजाम दिया था। इस हमले में 175 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें अधिकांश बच्चे बताए जा रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि उनकी राय में यह हमला ईरान की एक त्रुटिपूर्ण मिसाइल के कारण हुआ हो सकता है। उल्लेखनीय है कि सीएनएन, न्यू यॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की जांच में अलग निष्कर्ष सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार उपग्रह चित्रों और अन्य दृश्य प्रमाणों के आधार पर यह संभावना जतायी गयी है कि 28 फरवरी को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के ठिकानों पर अमेरिकी हमलों के दौरान दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में स्थित एक लड़कियों के प्राथमिक विद्यालय को निशाना बनाया गया।  

संवैधानिक अनादर पर मोदी की टिप्पणी, TMC पर कड़ा आरोप

नई दिल्ली पीएम नरेंद्र मोदी ने बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कार्यक्रम के बहिष्कार को लेकर टीएमसी सरकार पर तीखा हमला बोला और इसे संविधान व लोकतंत्र का अपमान बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सम्मान के साथ समझौता किया गया और यह न केवल राष्ट्रपति बल्कि देश के संविधान का भी अपमान है। यह लोकतंत्र की महान परंपरा का भी अपमान है। प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव में शामिल होने के लिए पश्चिम बंगाल गई थीं। लेकिन इस महत्वपूर्ण और पवित्र कार्यक्रम में उन्हें उचित सम्मान देने के बजाय टीएमसी ने उसका बहिष्कार किया। पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं और वह हमेशा आदिवासी समुदाय के विकास और कल्याण को लेकर चिंतित रही हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार की ओर से कार्यक्रम के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई गई। टीएमसी सरकार पर सत्ता के अहंकार प्रधानमंत्री के अनुसार, राज्य सरकार ने इस आयोजन को पूरी तरह अव्यवस्था के हवाले कर दिया। उनका कहना था कि यह घटना केवल राष्ट्रपति का अपमान नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान और उसकी मूल भावना का भी अनादर है। उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र की महान परंपरा में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक होता है। ऐसे में किसी भी राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर इस पद की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। पीएम मोदी ने टीएमसी सरकार पर सत्ता के अहंकार में डूबे होने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल उल्लंघन पर केंद्र सख्त इससे पहले केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत जवाब मांगा है। सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान प्रोटोकॉल, कार्यक्रम स्थल और मार्ग व्यवस्था से जुड़े नियमों के कथित उल्लंघन पर पश्चिम बंगाल सरकार से रविवार शाम 5 बजे तक जवाब तलब किया गया है। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारियों का स्वागत के लिए उपस्थित न होना "ब्लू बुक" के नियमों का उल्लंघन बताया है।