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ईरान में फिर शुरू हुआ परमाणु सेंटर का निर्माण, इजरायली हमले के बाद तीसरी बार हो रही मरम्मत

तेहरान  ईरान के पारचिन सैन्य परिसर में स्थित तालेगान-2 लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय केंद्र रहा है. पश्चिमी खुफिया एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, यह जगह ईरान के पुराने अमाड परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी हुई थी. वहां उच्च विस्फोटक परीक्षण किए जाने के आरोप लगे थे, जो परमाणु हथियार के डिजाइन से संबंधित हो सकते थे।  ईरान हमेशा से इन आरोपों से इनकार करता आया है. कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है. इस स्थल की भूमिगत कक्ष और संरचनाएं विशेषज्ञों के लिए संदेह का विषय बनी रहीं. पारचिन परिसर स्वयं सैन्य गतिविधियों का बड़ा केंद्र माना जाता है, इसलिए यहां कोई भी गतिविधि तुरंत नजर में आ जाती है।  अक्टूबर 2024 और मार्च 2026 में इजरायली हमलों ने तालेगान-2 स्थल को भारी नुकसान पहुंचाया. इन हमलों में ऊपर की संरचनाएं नष्ट हो गईं और भूमिगत कक्ष में छेद हो गए. यह पहली बार नहीं था जब यह जगह निशाने पर आई. विशेषज्ञों के अनुसार यह विनाश और फिर से निर्माण का तीसरा चक्र है।  हर बार हमले के बाद ईरान ने स्थल को फिर से खड़ा करने की कोशिश की है. मार्च 2026 के हमले के बाद जून में मरम्मत का काम शुरू हुआ. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि ईरान अब सिर्फ मरम्मत नहीं कर रहा, बल्कि अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़ रहा है।   इनमें विस्फोट से बचाव के लिए विशेष सुरक्षा परतें, कंक्रीट के एप्रन और छेदों पर ढक्कन जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. ये कदम दर्शाते हैं कि ईरान इस स्थल को लंबे समय तक चालू रखना चाहता है और भविष्य के संभावित हमलों से बचाने की तैयारी कर रहा है।  फिर से निर्माण की तेजी और सुरक्षा उपायों का महत्व जून से शुरू हुए मरम्मत कार्य में तेजी देखी जा रही है. भूमिगत कक्ष के क्षतिग्रस्त हिस्सों को ढकने और मजबूत करने का काम चल रहा है. कंक्रीट की परतें और सुरक्षात्मक ढांचे जोड़ने से यह साफ है कि ईरान सिर्फ पुरानी स्थिति बहाल नहीं कर रहा, बल्कि स्थल को और मजबूत बना रहा है।  इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी जैसे संगठनों ने इस पैटर्न को गहरी चिंता का विषय बताया है. उनका कहना है कि बार-बार विनाश के बावजूद स्थल को फिर से खड़ा करना सामान्य सैन्य गतिविधि से ज्यादा गंभीर संकेत दे सकता है. हालांकि, सैटेलाइट तस्वीरों से यह तय नहीं किया जा सकता कि वर्तमान काम किसी परमाणु संबंधित गतिविधि से जुड़ा है या नहीं. केवल संरचनात्मक बदलाव ही नजर आ रहे हैं. ईरान का पक्ष है कि ये सब सामान्य रक्षात्मक मरम्मत हैं और उसके परमाणु प्रयास शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं।  यह घटना ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहसों को फिर से ताजा कर देती है. आईएईए लगातार ईरान से ज्यादा पारदर्शिता की मांग करता रहा है. पश्चिमी देश और इजरायल मानते हैं कि अतीत में उच्च विस्फोटक परीक्षणों का मकसद परमाणु हथियार की क्षमता विकसित करना था।  ईरान इन आरोपों को राजनीतिक दबाव बताता है. बार-बार हमले और पुनर्निर्माण का सिलसिला क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है. अगर यह स्थल वाकई किसी संवेदनशील गतिविधि के लिए इस्तेमाल होता रहा हो, तो उसकी बहाली से परमाणु अप्रसार के प्रयासों पर असर पड़ सकता है. दूसरी तरफ, अगर यह सिर्फ सैन्य विस्फोटक परीक्षण स्थल है, तो भी इसकी सुरक्षा बढ़ाया जाना ईरान की रक्षात्मक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।   वैश्विक स्तर पर यह घटना तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक वार्ताओं को प्रभावित कर सकती है. संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य देश आईएईए की रिपोर्टों पर नजर रखे हुए हैं. ईरान अगर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ाने को तैयार नहीं होता, तो प्रतिबंधों या अन्य दबाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है. साथ ही, बार-बार होने वाले हमले मध्य पूर्व में संघर्ष को नया रूप भी दे सकते हैं।  आगे की निगरानी तालेगान-2 स्थल का तेजी से पुनर्निर्माण ईरान की दृढ़ता को दिखाता है कि वह बाहरी हमलों के बावजूद अपनी सैन्य सुविधाओं को बनाए रखना चाहता है. सुरक्षा उपायों का विस्तार इस बात का संकेत है कि भविष्य के खतरों को लेकर तैयारी की जा रही है. विशेषज्ञों की चिंता जायज है क्योंकि इतिहास में यह जगह संदेह के घेरे में रही है. फिर भी, वर्तमान तस्वीरों से परमाणु गतिविधि की पुष्टि नहीं होती।  आने वाले महीनों में सैटेलाइट निगरानी, आईएईए की जांच और कूटनीतिक विकास तय करेंगे कि यह पुनर्निर्माण कितना सामान्य है या कितना चिंताजनक. फिलहाल यह घटना ईरान-इजरायल तनाव और परमाणु मुद्दे की जटिलता को एक बार फिर रेखांकित करती है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सतर्क रहकर तथ्यों पर आधारित प्रतिक्रिया देनी होगी ताकि तनाव और न बढ़े। 

हमलों के बाद भी नहीं टूटी ईरान की मिसाइल ताकत! भूमिगत फैक्ट्रियों में फिर बनने लगी बैलिस्टिक मिसाइलें

तेहरान  अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है।  यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है।  युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे। अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे।  ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है।  अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।  अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है।  सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है।  अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति   ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही।  विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है।  अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है।  ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है।  वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो।  कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।   

ईरान के खर्ग द्वीप के पास टैंकर पर हमला, अमेरिकी मिसाइल हमले से मची हलचल

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम की ओर जा रहा है। इसी बीच ईरानी मीडिया ने खर्ग द्वीप पर बड़े हमले का दावा किया है। जानकारी के मुताबिक खर्ग द्वीप के पास जोरदार धमाके सुने गए हैं। ये धमाके वहीं हुए हैं जहां तेल का मुख्य हब है। एसएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक खर्ग द्वीप के पास ही ईरान के टैंकर को निशाना बनाया गया है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अमेरिका ने ईरान के टैंकर को ही निशाना बनाया है या फिर खर्ग द्वीप पर भी तबाही मचाई है। बीते दिनों अमेरिका ने एआई वीडियो जारी करते हुए दावा किया था कि खर्ग द्वीप को तबाह करके टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया है। हालांकि ईरान ने अमेरिका के इस दावे को खारिज कर दिया था। अमेरिका बोला- यह युद्ध नहीं है अमेरिका एक तरफ युद्ध की आग भड़काता ही जा रहा है और दूसरी तरफ दावा कर रहा है कि यह युद्ध नहीं है। वेंस से अमेरिका के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय 'व्हाइट हाउस' में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान पूछा गया कि क्या तीन नवंबर को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले युद्ध समाप्त हो सकता है जिसके जवाब में उन्होंने कहा, ''मैं इसे युद्ध नहीं कहूंगा। फिलहाल सक्रिय गोलीबारी नहीं हो रही है।'' ट्रंप इसे बता रहे मामूली बात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संघर्ष को ''मामूली बात'' करार दिया और देश के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस के इस बयान से सहमति जताई कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को ''युद्ध'' नहीं कहा जा सकता। ट्रंप ने 'ओवल ऑफिस' (अमेरिका के राष्ट्रपति का आधिकारिक कार्यालय) में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान वेंस की एक दिन पहले की टिप्पणियों के बारे में सवाल किए जाने पर कहा कि ईरान पर अमेरिकी हमले अब ''रुक-रुककर'' हो रहे हैं। उन्होंने इस संघर्ष की गंभीरता को कम दिखाने की कोशिश की जबकि इस युद्ध पर अमेरिकी करदाताओं के 37.5 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च हो चुके हैं और अमेरिका के 18 सैन्यकर्मियों की मौत हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक अहम रास्ता बना हुआ है। क्षेत्रीय तनाव के बीच इससे होकर होने वाली जहाजों की आवाजाही में काफी कमी आई है। हाल के दिनों में यहाँ से गुज़रने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम हो गई है। बड़े तेल टैंकर और गैस कैरियर लगभग इस रास्ते का इस्तेमाल करना बंद कर चुके हैं। तनाव बढ़ने से पहले, दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की खेप इसी जलडमरूमध्य से होकर गुज़रती थी।

ट्रंप की भी नहीं चली? ईरान समझौते से पहले इजरायल के कदम ने बढ़ाया तनाव, लेबनान में 16 मारे गए

वाशिंगटन  अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में होने वाली समझौता समारोह ऐन मौके पर खटाई में पड़ गई है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस समझौते के औपचारिक साइनिंग समारोह के लिए स्विट्जरलैंड रवाना होने ही वाले थे, लेकिन इजरायल ने आखिरी वक्त टांग अड़ा दी. इजरायल ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीधी अपील को भी नजरअंदाज कर दिया और लेबनान पर हमला कर दिया. इस हमले में 16 लोगों की मौत हुई है।  ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर इजरायल, लेबनान और हिजबुल्लाह को आपस में न उलझने की हिदायत दी थी. लेकिन इजरायल ने इस चेतावनी को दरकिनार करते हुए गुरुवार और शुक्रवार की दरमियानी रात दक्षिणी लेबनान पर बड़ा हमला कर दिया. इस हमले के बाद ईरान ने स्विट्जरलैंड जाने से साफ इनकार कर दिया, जिसके चलते जेडी वेंस को भी अपना दौरा रद्द करना पड़ा।  ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने भी बताया है कि लेबनान में सीजफायर होने तक स्विट्जरलैंड में ईरान के प्रतिनिधिमंडल और अमेरिका के बीच होने वाली बैठक टाल दी गई है।  ट्रंप की अपील को इजरायल ने किया दरकिनार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़ी डील से ठीक पहले अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रूश सोशल' पर लिखा था, "अमेरिका शांति के लिए प्रतिबद्ध है और हम मिडिल ईस्ट रीजन में सभी को बढ़ावा देते हैं कि वे हमारी बातचीत को आगे बढ़ने देने के लिए अपना कमिटमेंट बनाए रखें. मार्केट को ये शांति रास आ रही है. तेल की कीमतें बहुत नीचे हैं और स्टॉक्स बहुत ऊपर हैं. हम लेबनान, हिजबुल्लाह और इजरायल सहित सभी मोर्चों पर पूरी तरह से सीजफायर की उम्मीद करते हैं।  इजरायल और हिजबुल्लाह में तनाव की लपटें फिर उठीं इजरायल के हमले के बाद हिजबुल्लाह ने भी मोर्चा खोल दिया. हिजबुल्लाह ने शुक्रवार सुबह एक बयान जारी कर दावा किया कि उसके लड़ाकों ने गाइडेड मिसाइलों का इस्तेमाल करके इजरायल के तीन आधुनिक 'मर्कवा' टैंकों को तबाह कर दिया है और उनमें आग लगा दी है. हिजबुल्लाह के मुताबिक, यह भिड़ंत तब शुरू हुई जब इजरायली सेना के एक बख्तरबंद और एक इन्फैंट्री पलटन ने नबातीह शहर के पास रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अली अल-ताहेर की पहाड़ियों की तरफ बढ़ने की कोशिश की।  इस हिंसक टकराव का सीधा असर स्विट्जरलैंड में होने वाली डील पर पड़ा. एक दिन पहले ही अमेरिका और ईरान के बीच मिडिल ईस्ट वॉर को खत्म करने के लिए एक सहमति बनी थी, जिसे शुक्रवार को औपचारिक रूप देना था. लेकिन इस जमीनी सैन्य टकराव के बाद ईरान ने बातचीत की मेज से कदम पीछे खींच लिए और स्विट्जरलैंड जाने से मना कर दिया।  जेडी वेंस का स्विट्जरलैंड दौरा ऐन वक्त पर रद्द इस अचानक बदले हालात के बाद सीएनएन की रिपोर्ट में व्हाइट हाउस के प्रवक्ता के हवाले से बताया गया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अब स्विट्जरलैंड नहीं जा रहे हैं. उन्हें ईरान के साथ तय हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के सेरेमनी के तहत हस्ताक्षर करने के लिए वहां पहुंचना था. व्हाइट हाउस ने यह भी साफ किया है कि समझौते के अगले चरण और आने वाली तकनीकी वार्ताओं की योजनाएं अभी पूरी तरह अंतिम रूप में नहीं पहुंच सकी हैं।  अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जब भी मौका बनेगा, रवाना होने के लिए तैयार है, लेकिन इस तरह की बातचीत की व्यवस्थाएं कभी भी आसान या पूरी तरह अनुमानित नहीं होती हैं. फिलहाल उपराष्ट्रपति रवाना नहीं हो रहे हैं और अगले कदम के बारे में जैसे ही कोई ठोस जानकारी मिलेगी, साझा की जाएगी।  ट्रंप के बाद जेडी वेंस ने भी इजरायल को सुनाया  इस पूरे घटनाक्रम और इजरायल के अड़ंगे से अमेरिकी प्रशासन बेहद नाराज नजर आ रहा है. बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बढ़ते तनाव के बीच, जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है. व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए वेंस ने सीधे तौर पर नेतन्याहू की कैबिनेट के सदस्यों से कहा कि वे हकीकत को समझें और जागें।  जेडी वेंस ने इजरायल को याद दिलाया, "इस समय पूरी दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे राष्ट्र प्रमुख हैं जो इजरायल को लेकर सहानुभूति रखते हैं. और संयोग से वही दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति के प्रमुख भी हैं. अगर मैं इजरायली सरकार की कैबिनेट में होता, तो मैं अपने उस इकलौते शक्तिशाली सहयोगी पर हमला नहीं करता जो पूरी दुनिया में मेरे साथ खड़ा है।  वेंस की नाराजगी सिर्फ यहीं नहीं रुकी, उन्होंने इजरायल को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद का हिसाब भी सरेआम रख दिया. उन्होंने इजरायल को दोटूक लहजे में कहा कि वे अमेरिकी करदाताओं के पैसे पर निर्भर हैं. वेंस ने कहा, "पिछले तीन महीनों में आपके देश की रक्षा करने वाले दो-तिहाई रक्षात्मक हथियार अमेरिकी लोगों ने बनाए हैं और उनका खर्च अमेरिकी करदाताओं ने उठाया है।   

मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसे हालात! ईरान ने बहरीन, कुवैत और होर्मुज में खोला मोर्चा, दुनिया की बढ़ी चिंता

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव एक बार फिर खुली सैन्य भिड़ंत में बदलता दिखाई दे रहा है. अमेरिका के ताजा हमलों के बाद ईरान ने दावा किया कि उसने बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं. इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया गया. इन घटनाओं के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने ऐलान किया कि होर्मुज स्ट्रेट को "अगले आदेश तक" बंद कर दिया गया है।  IRGC के मुताबिक, गुरुवार तड़के कुवैत के अली अल सलेम और अहमद अल-जाबेर एयर बेस पर ड्रोन हमले किए गए. इनके अलावा बहरीन में शेख ईसा एयरबेस को निशाना बनाया गया. संगठन का दावा है कि ये कार्रवाई अमेरिका द्वारा ईरान के भीतर किए गए नए सैन्य हमलों के जवाब में की गई है और अमेरिका के 18 प्रमुख सैन्य संपत्तियों को तबाह कर दिया है. ईरान ने यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से "अवैध रूप से" गुजरने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों पर भी हमले किए गए हैं।  ईरानी सेना ने अमेरिका पर अप्रैल में हुए युद्धविराम के उल्लंघन का आरोप लगाया है. उसका कहना है कि अमेरिकी सेना लगातार ईरान के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई कर रही है, जिसके कारण जवाबी कदम उठाने पड़े. IRGC ने साफ चेतावनी दी कि होर्मुज से गुजरने वाला हर तरह का समुद्री यातायात अब प्रभावित होगा।  बहरीन में ईरानी हमलों का टारगेट फिफ्थ फ्लीट IRGC ने दावा किया कि आर्मी के ड्रोन हमलों की इस लहर में, फिफ्थ फ्लीट के पैट्रियट सिस्टम के कम्युनिकेशन एंटीना और रडार इंस्टॉलेशन को निशाना बनाया गया है. ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, जॉर्डन में स्थित अल-अजराक एयर बेस और मुवाफ्फाक सल्ती एयर बेस पर जोरदार विस्फोटों की खबर सामने आई है. ये दोनों सैन्य ठिकाने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौजूदगी और अमेरिकी अभियानों के समर्थन के लिए जाने जाते हैं. हालांकि विस्फोटों की वजह और नुकसान की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।  दूसरी तरफ अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर ईरान के भीतर कई ठिकानों पर हमले किए गए. अमेरिका का कहना है कि ये हमले ईरान की "लगातार और अनुचित आक्रामकता" के जवाब में किए गए हैं।  अमेरिका के ताजा हमले का कहां-कहां हुआ असर? ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी हमलों के बाद केशम द्वीप, बंदर अब्बास, सीरिक और करगान जैसे इलाकों में जोरदार विस्फोट हुए. दक्षिणी शहर करगान में हुए धमाकों में कम से कम दो लोगों के घायल होने की भी खबर है. इससे पहले बीते दिन अमेरिका ने केशम द्वीप, सीरिक, जास्क और बंदर अब्बास के आसपास सैन्य ठिकानों, रडार और सर्विलांस सिस्टम को निशाना बनाया था।  होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी हेलीकॉप्टर मार गिराया गया यह पूरी घटना उस घटना के बाद सामने आई है जिसमें होर्मुज स्ट्रेट के ऊपर एक अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर मार गिराया गया था. इसके बाद दोनों देशों के बीच लगातार जवाबी हमले हो रहे हैं. बुधवार को ईरान ने बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट, कुवैत के अली अल सलेम एयर बेस और जॉर्डन के अज्राक एयर बेस को निशाना बनाने का दावा किया था।  इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर शांति वार्ता को जानबूझकर लंबा खींचने का आरोप लगाया है. ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान पर "बहुत कड़ा प्रहार" करेगा. जवाब में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा कि देश किसी भी दबाव या धमकी के सामने झुकने वाला नहीं है और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर कदम उठाएगा। 

ड्रोन विवाद के बाद बढ़ा तनाव, अमेरिका ने ईरान पर किए ताबड़तोड़ हमले

तेहरान  ईरान के अमेरिकी MQ-1 प्रीडेटर ड्रोन को मार गिराने के बाद यूएस ने ईरान में रडार और ड्रोन कंट्रोल सेंटर पर बड़ा हमला किया है। सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए की खबर के अनुसार, ईरान के अर्द्धसैन्य बल 'रिवोल्यूशनरी गार्ड' ने एक बयान में बताया कि अमेरिकी बलों ने एक द्वीप पर दूरसंचार टावर को निशाना बनाया। इससे पहले कुवैत ने बताया था कि ईरान की ओर से हमला किया गया है। अमेरिका ने कहा कि आत्मरक्षा के लिए उसने गुरुक और ईरान के केश्म आइलैंड पर बमबारी की है। होर्मुज वाले द्वीप पर भी हमला बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच औपचारिक रूप से युद्धविराम है। हालांकि कई बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका और ईरान दोनों की तरफ से युद्धविराम का उल्लंघन किया गया है। ईरान ने दावा किया है कि अमेरिका होर्मुज के सिरिक आइलैंड पर हमला करन के लिए कुवैत के एयरबेस का इस्तेमाल कर रहा था। इसीलिए इस एयरबेस को टारगेट किया गया है। ईरान ने फिर खोल दिए मिसाइल अड्डे एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रिपेयरिंग का काम पूरा होने के बाद ईरान ने एक बार फिर अपने मिसाइल अड्डे खोल दिए हैं। सुरंगों में बनाए गए इन अड्डों को सुरक्षित बनाने के लिए एंट्री को सील कर दिया गया है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक सैटलाइट इमेजरी से पता चला है कि जिन 69 ठिकानों पर अमेरिका ने हमला किया था उनमें से करीब 50 को फिर से खोला जा चुका है और मेंटिनेंस का काम पूरा हो चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने बुलडोजर और ट्रक का इस्तेमाल करके सारा मलबा साफ कर दिया है और सड़कों को भी दुरुस्त कर दिया गया है। इसके बाद अब ईरान एक बार फिर लॉन्ग रेंज मिसाइल अटैक करने की स्थिति में है। बताया गया कि लगभग सात हफ्ते पहले हुए सीजफायर के बाद ही ईरान ने अपने मिसाइल ठिकानों को रिकवर करने का मिशन शुरू कर दिया था। कहां अटकी है समझौते की बात सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा संशोधित मसौदा कई बार मध्यस्थों के माध्यम से ईरान को भेजा गया है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान की अगुवाई में मध्यस्थता की जा रही है। हालांकि अमेरिकी संशोधनों को "महत्वपूर्ण" बताया गया है, लेकिन उनके विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और ईरान ने भी अभी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। फारस की खाड़ी में तनाव के बावजूद ईरान ने कहा है कि पिछले 24 घंटों में 28 वाणिज्यिक जहाज, जिनमें तेल टैंकर और मालवाहक पोत शामिल हैं, उसकी अनुमति से होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे। वहीं दक्षिण पार्स गैस क्षेत्र के कुछ प्लेटफॉर्मों पर उत्पादन आंशिक रूप से बहाल कर दिया गया है। आर्थिक मोर्चे पर भी ईरान दबाव में है। खबरों के अनुसार, खुजेस्तान प्रांत में मजदूरों और पेंशनभोगियों ने वेतन, पेंशन और बढ़ती महंगाई को लेकर प्रदर्शन किया।

बौखलाया ईरान! बंदर अब्बास पर वार के बाद US एयरबेस को बनाया निशाना

   तेहरान अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति वार्ता लगातार विफल होती नजर आ रही है. इसी बीच ईरानी की IRGC ने दावा किया है कि उसने बंदर अब्बास पोर्ट के पास हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए हमला किया है. उधर, कुवैत के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वह अपने देश की ओर दागी गई मिलाइलों और ड्रोन्स को रोक रहे हैं। तसनीम समाचार एजेंसी के अनुसार, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने स्थानीय समयानुसार सुबह 4:50 बजे बंदर अब्बास पोर्ट के पास हुए अमेरिकी हमले के बाद एक अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए जवाबी कार्रवाई की है. हालांकि,  आईआरजीसी ने ये नहीं बताया कि उसने अमेरिका के किस बेस को निशाना बनाया है। IRGC ने अमेरिका को दी चेतावनी ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिका को सीधे तौर पर बेहद सख्त चेतावनी जारी की है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि इस तरह के हमलों को दोबारा दोहराया गया तो ईरान की तरफ से इससे भी ज्यादा निर्णायक और घातक प्रतिक्रिया दी जाएगी और इसके गंभीर परिणामों के लिए केवल हमलावर जिम्मेदार होगा। इस भीषण गोलाबारी का असर अब पड़ोसी देशों पर भी साफ दिखने लगा है. क्षेत्र में बढ़े अचानक खतरे को देखते हुए कुवैत ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह अपनी एयरस्पेस की ओर दागे जा रहीं मिसाइलों और यूएवी (UAVs) को लगातार इंटरसेप्ट कर हवा में ही नष्ट कर रहे हैं। बंदर अब्बास पोर्ट के धमाके इससे पहले बुधवार रात को अमेरिका ने ईरान के अंदर एक और बड़े हवाई हमले को अंजाम दिया. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग रात 1:30 बजे (स्थानीय समय) ईरान के बंदर अब्बास शहर के पूर्वी हिस्से से तीन धमाकों की आवाजें सुनाई दीं। एक अमेरिकी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी सेना ने रात भर ईरान में नए हमले किए, जिसमें एक ऐसे सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया गया, जिसके बारे में अधिकारियों का मानना ​​था कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिकी सेना और कमर्शियल समुद्री आवाजाही के लिए खतरा पैदा कर रहा था. यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई है।

इंटरनेट की ‘मास्टर चाबी’ ईरान के पास! खतरे में पड़ सकते हैं WhatsApp, UPI और ऑनलाइन सेवाएं

तेहरान  दुनिया का इंटरनेट क्या अब ईरान के कंट्रोल में जा सकता है? पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट से जुड़ी एक खबर ने टेक दुनिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान अब समुद्र के नीचे बिछी उन इंटरनेट केबल्स पर कंट्रोल बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिनसे दुनिया का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। मामला सिर्फ इंटरनेट स्पीड का नहीं है, बल्कि ग्लोबल डेटा, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड सर्विस और अरबों डॉलर की डिजिटल इकॉनमी का भी है।  शिप्स ही नहीं, इंटरनेट के लिए भी ईरान लेगा टोल? असल कहानी फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी है. यही वह समुद्री रास्ता है जहां से तेल के बड़े जहाज गुजरते हैं. लेकिन कम लोग जानते हैं कि इसी रास्ते के नीचे दुनिया की कई अहम अंडरसी इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं. यही केबल्स एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को इंटरनेट से जोड़ती हैं।  अब ईरान से जुड़े मीडिया नेटवर्क और IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन इंटरनेट केबल्स से कमाई की जा सकती है. ये ठीक वैसा ही होगा जैसे ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले शिप्स से टोल वसूलने का फैसला किया है।  कुछ रिपोर्ट्स में इसे डिजिटल टोल बूथ जैसा मॉडल बताया गया है. यानी जो विदेशी कंपनियां या नेटवर्क इन केबल्स का इस्तेमाल करेंगे, उनसे फीस ली जा सकती है।  रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से जुड़े मीडिया आउटलेट्स ने दावा किया कि इन केबल्स के जरिए हर दिन भारी मात्रा में डिजिटल ट्रैफिक गुजरता है. इसमें बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड डेटा, सोशल मीडिया ट्रैफिक और AI सर्विस तक शामिल हैं।  समुद्र के नीचे से ट्रैवल करता है डेटा इस खबर ने इसलिए चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दुनिया पहले ही अंडरसी केबल्स पर बढ़ते खतरे को लेकर परेशान है. इंटरनेट का करीब 95 से 99 प्रतिशत ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर केबल्स से गुजरता है. अगर इनमें बड़ी खराबी आ जाए या जानबूझकर नुकसान पहुंचाया जाए तो कई देशों में इंटरनेट, बैंकिंग और क्लाउड सर्विस पर असर पड़ सकता है।  पोर्ट्स में बताया गया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब सिर्फ तेल का रास्ता नहीं रहा, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी बड़ा सेंटर बन चुका है. यहां कई अहम केबल्स गुजरती हैं जो एशिया और यूरोप को जोड़ती हैं।  क्या टेक कंपनियां मानेंगी ईरानी कानून? मामला सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ईरान फ्यूचर में विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियम मानने के लिए मजबूर कर सकता है. यहां तक कि केबल्स की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम भी अपने नियंत्रण में लेने की बात सामने आई है।  टेक एक्सपर्ट्स का डर यह है कि अगर किसी दिन इन केबल्स पर तनाव बढ़ा या उन्हें नुकसान पहुंचा, तो उसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत समेत एशिया के कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी भी प्रभावित हो सकती है. वीडियो कॉल से लेकर UPI पेमेंट और AI सर्वर तक असर महसूस हो सकता है।  अब दुनिया की चिंता यह है कि अगर भविष्य में इंटरनेट भी तेल की तरह जियोपॉलिटिकल हथियार बन गया, तो हालात कितने बदल सकते हैं. अभी तक देश तेल सप्लाई रोकने की धमकी देते थे, लेकिन आने वाले समय में इंटरनेट केबल्स भी दबाव बनाने का बड़ा जरिया बन सकती हैं।  यानी जिस इंटरनेट को लोग सिर्फ मोबाइल डेटा और WiFi समझते हैं, उसके पीछे समुद्र के नीचे फैला हजारों किलोमीटर लंबा एक ऐसा नेटवर्क है, जिस पर अब दुनिया की राजनीति भी उतर आई है। 

अमेरिका को ईरान युद्ध में 24 हजार करोड़ रुपये का नुकसान, ट्रंप सरकार ने किया इसे गुप्त

वाशिंगटन ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. अमेरिका स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के अनुसार, ईरान के मिसाइलों, ड्रोनों और एक दुर्भाग्यपूर्ण 'फ्रेंडली फायर' की वजह से अमेरिकी सैन्य उपकरणों को 2.3 अरब से 2.8 अरब डॉलर (लगभग 19,400 करोड़ से 23,700 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ है. यह अनुमान मुख्य रूप से हवाई उपकरणों का है. इसमें अमेरिकी ठिकानों पर हुए नुकसान या नौसेना के जहाजों का नुकसान शामिल नहीं है।  रक्षा मंत्री का दावा और अगले दिन ईरान का हमला 26 मार्च को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कैबिनेट बैठक में बड़े दावे किए. उन्होंने कहा कि इतिहास में कभी भी किसी देश की सेना को इतनी तेजी और प्रभावी ढंग से कमजोर नहीं किया गया. लेकिन ठीक अगले दिन, 27 मार्च को ईरान ने सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी एयरबेस 'प्रिंस सुल्तान' पर मिसाइल और ड्रोन हमला कर दिया।  इस हमले में एक बेहद महंगा E-3 AWACS रडार डिटेक्शन विमान नष्ट हो गया, जिसकी कीमत लगभग 5,920 करोड़ रुपये थी. यह विमान आकाश में उड़ने वाला कमांड सेंटर था, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान और मिसाइलों का पता लगाता था।  कितना हुआ कुल नुकसान? CSIS के सीनियर एडवाइजर मार्क कैनशियन ने विस्तृत गणना की है. उनके अनुसार…     THAAD मिसाइल डिफेंस सिस्टम का एक या दो पावरफुल रडार नष्ट हुए, जिनकी कीमत लगभग 4,100 करोड़ से 8,200 करोड़ रुपये के बीच है.     ईरान के हमलों और एक फ्रेंडली फायर घटना में लगभग 19,400 करोड़ से 23,700 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.     फ्रेंडली फायर में कुवैत में तीन F-15 फाइटर जेट भी नष्ट हो गए. युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी. ईरान ने न सिर्फ अमेरिकी ठिकानों पर, बल्कि अमेरिका के सैनिकों वाले खाड़ी देशों के ठिकानों पर भी हमले किए. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी प्रभावित किया, जिससे तेल परिवहन प्रभावित हुआ. CSIS विशेषज्ञ का कहना है कि ईरान का खाड़ी देशों पर हमला करना रणनीतिक गलती साबित हुआ, क्योंकि इससे खाड़ी देश अमेरिका के और करीब आ गए।  अमेरिका की मुश्किलें अमेरिका ने इस युद्ध में पूर्ण पारदर्शिता नहीं दिखाई है. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन चुनावी कारणों से नुकसान की पूरी जानकारी छिपा रहा है. ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने ऑपरेशनल सफलताएं हासिल कीं, लेकिन रणनीतिक लक्ष्य अभी दूर दिख रहे हैं. 2003 के इराक युद्ध और अफगानिस्तान की तरह यहां भी ऑपरेशनल जीत रणनीतिक हार में बदल सकती है।  अभी अमेरिका ने क्षेत्र में 2003 के इराक युद्ध जितनी बड़ी सेना नहीं तैनात की है. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता ने अमेरिकी हवाई उपकरणों को काफी नुकसान पहुंचाया है. CSIS रिपोर्ट अमेरिका के नुकसान का पहला विस्तृत अनुमान है. इसमें ठिकानों के इमारतों को हुए नुकसान और अन्य विशेष उपकरण शामिल नहीं हैं, इसलिए असली नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है।  ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका को अब तक 19,400 से 23,700 करोड़ रुपये से ज्यादा का सैन्य नुकसान हो चुका है. यह घटना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में मिसाइल और ड्रोन कितने प्रभावी साबित हो सकते हैं. अमेरिका के लिए यह न सिर्फ आर्थिक, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती भी बन गया है. युद्ध अभी जारी है और दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे हैं। 

ईरान ने दिया अमेरिका को शर्त—स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलो, तब होगी चर्चा

तेहरान  पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के सामने एक नया शांति प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के जरिए भेजे गए इस प्रस्ताव में ईरान ने कहा है कि सबसे पहले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से नाकेबंदी हटाई जाए और युद्ध को तुरंत खत्म किया जाए। इसके बाद, दूसरे चरण की बातचीत में परमाणु हथियार के मुद्दे पर चर्चा की जाए। जानकारी के मुताबिक इस प्रस्ताव को वाइट हाउस भेज दिया गया है। गौरतलब है कि ईरान की तरफ से यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब शांति वार्ता लगभग ठप पड़ी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कहा है कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है तो वह अमेरिका को कॉल कर सकता है। हालांकि इस दौरान ट्रंप ने यह भी दोहराया कि ईरान को किसी भी हालत में परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जाएंगे। इससे पहले ट्रंप ने अपनी टीम को ईरान भेजने का प्लान भी कैंसिल कर दिया था। खबर थी कि US ईरान के पुराने प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं था। नए प्रस्ताव में क्या? ईरान के इस नए प्लान में दो चरणों में वार्ता का जिक्र है। पहले चरण में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने और अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की मांग की गई है। ईरान चाहता है कि इसके लिए या तो युद्धविराम को बढ़ाया जाए या फिर युद्ध को तुरंत खत्म किया जाए। वहीं दूसरे चरण में, यानी हालात सामान्य होने के बाद, परमाणु मुद्दे पर बातचीत शुरू की जाए। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक कोई भी गंभीर बातचीत संभव नहीं है। साथ ही ईरान ने सुरक्षा की गारंटी, मुआवजा और होर्मुज को लेकर नया कानूनी ढांचा बनाने की भी मांग रखी है। पुतिन से मिलेंगे अराघची इस बीच अमेरिका के साथ वार्ता के दूसरे दौर को लेकर अनिश्चितता के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची रविवार को तीन दिन में दूसरी बार पाकिस्तान पहुंचे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल मुनीर और अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद अराघची शनिवार को इस्लामाबाद से रवाना हुए थे। यहां से निकलकर अराघची ओमान गए थे। वहीं अब दोबारा पाकिस्तान से निकलने के बाद अब वे रूस रवाना हो गए हैं और यहां अराघची पुतिन से भी मुलाकात करेंगे। इस दौरान भी युद्ध के लेकर चर्चा हो सकती है। मानेगा अमेरिका? ईरान ने अमेरिका को नया प्रस्ताव भेजा जरूर है लेकिन इस पर सहमति बनना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 10 साल के लिए परमाणु कार्यक्रम यानी न्यूक्लियर एनरिचमेंट रोक दे और अपने मौजूदा भंडार को भी बाहर कर दें। अमेरिका ने कई मौकों पर इस शर्त के बिना युद्धविराम की संभावना से इनकार किया है। ऐसे में ईरान के नए ऑफर पर अमेरिका की सहमति मिलना मुश्किल है।