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अमेरिका को ईरान युद्ध में 24 हजार करोड़ रुपये का नुकसान, ट्रंप सरकार ने किया इसे गुप्त

वाशिंगटन ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. अमेरिका स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के अनुसार, ईरान के मिसाइलों, ड्रोनों और एक दुर्भाग्यपूर्ण 'फ्रेंडली फायर' की वजह से अमेरिकी सैन्य उपकरणों को 2.3 अरब से 2.8 अरब डॉलर (लगभग 19,400 करोड़ से 23,700 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ है. यह अनुमान मुख्य रूप से हवाई उपकरणों का है. इसमें अमेरिकी ठिकानों पर हुए नुकसान या नौसेना के जहाजों का नुकसान शामिल नहीं है।  रक्षा मंत्री का दावा और अगले दिन ईरान का हमला 26 मार्च को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कैबिनेट बैठक में बड़े दावे किए. उन्होंने कहा कि इतिहास में कभी भी किसी देश की सेना को इतनी तेजी और प्रभावी ढंग से कमजोर नहीं किया गया. लेकिन ठीक अगले दिन, 27 मार्च को ईरान ने सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी एयरबेस 'प्रिंस सुल्तान' पर मिसाइल और ड्रोन हमला कर दिया।  इस हमले में एक बेहद महंगा E-3 AWACS रडार डिटेक्शन विमान नष्ट हो गया, जिसकी कीमत लगभग 5,920 करोड़ रुपये थी. यह विमान आकाश में उड़ने वाला कमांड सेंटर था, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान और मिसाइलों का पता लगाता था।  कितना हुआ कुल नुकसान? CSIS के सीनियर एडवाइजर मार्क कैनशियन ने विस्तृत गणना की है. उनके अनुसार…     THAAD मिसाइल डिफेंस सिस्टम का एक या दो पावरफुल रडार नष्ट हुए, जिनकी कीमत लगभग 4,100 करोड़ से 8,200 करोड़ रुपये के बीच है.     ईरान के हमलों और एक फ्रेंडली फायर घटना में लगभग 19,400 करोड़ से 23,700 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.     फ्रेंडली फायर में कुवैत में तीन F-15 फाइटर जेट भी नष्ट हो गए. युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी. ईरान ने न सिर्फ अमेरिकी ठिकानों पर, बल्कि अमेरिका के सैनिकों वाले खाड़ी देशों के ठिकानों पर भी हमले किए. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी प्रभावित किया, जिससे तेल परिवहन प्रभावित हुआ. CSIS विशेषज्ञ का कहना है कि ईरान का खाड़ी देशों पर हमला करना रणनीतिक गलती साबित हुआ, क्योंकि इससे खाड़ी देश अमेरिका के और करीब आ गए।  अमेरिका की मुश्किलें अमेरिका ने इस युद्ध में पूर्ण पारदर्शिता नहीं दिखाई है. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन चुनावी कारणों से नुकसान की पूरी जानकारी छिपा रहा है. ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने ऑपरेशनल सफलताएं हासिल कीं, लेकिन रणनीतिक लक्ष्य अभी दूर दिख रहे हैं. 2003 के इराक युद्ध और अफगानिस्तान की तरह यहां भी ऑपरेशनल जीत रणनीतिक हार में बदल सकती है।  अभी अमेरिका ने क्षेत्र में 2003 के इराक युद्ध जितनी बड़ी सेना नहीं तैनात की है. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता ने अमेरिकी हवाई उपकरणों को काफी नुकसान पहुंचाया है. CSIS रिपोर्ट अमेरिका के नुकसान का पहला विस्तृत अनुमान है. इसमें ठिकानों के इमारतों को हुए नुकसान और अन्य विशेष उपकरण शामिल नहीं हैं, इसलिए असली नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है।  ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका को अब तक 19,400 से 23,700 करोड़ रुपये से ज्यादा का सैन्य नुकसान हो चुका है. यह घटना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में मिसाइल और ड्रोन कितने प्रभावी साबित हो सकते हैं. अमेरिका के लिए यह न सिर्फ आर्थिक, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती भी बन गया है. युद्ध अभी जारी है और दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे हैं। 

ईरान ने दिया अमेरिका को शर्त—स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलो, तब होगी चर्चा

तेहरान  पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के सामने एक नया शांति प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के जरिए भेजे गए इस प्रस्ताव में ईरान ने कहा है कि सबसे पहले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से नाकेबंदी हटाई जाए और युद्ध को तुरंत खत्म किया जाए। इसके बाद, दूसरे चरण की बातचीत में परमाणु हथियार के मुद्दे पर चर्चा की जाए। जानकारी के मुताबिक इस प्रस्ताव को वाइट हाउस भेज दिया गया है। गौरतलब है कि ईरान की तरफ से यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब शांति वार्ता लगभग ठप पड़ी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कहा है कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है तो वह अमेरिका को कॉल कर सकता है। हालांकि इस दौरान ट्रंप ने यह भी दोहराया कि ईरान को किसी भी हालत में परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जाएंगे। इससे पहले ट्रंप ने अपनी टीम को ईरान भेजने का प्लान भी कैंसिल कर दिया था। खबर थी कि US ईरान के पुराने प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं था। नए प्रस्ताव में क्या? ईरान के इस नए प्लान में दो चरणों में वार्ता का जिक्र है। पहले चरण में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने और अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की मांग की गई है। ईरान चाहता है कि इसके लिए या तो युद्धविराम को बढ़ाया जाए या फिर युद्ध को तुरंत खत्म किया जाए। वहीं दूसरे चरण में, यानी हालात सामान्य होने के बाद, परमाणु मुद्दे पर बातचीत शुरू की जाए। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक कोई भी गंभीर बातचीत संभव नहीं है। साथ ही ईरान ने सुरक्षा की गारंटी, मुआवजा और होर्मुज को लेकर नया कानूनी ढांचा बनाने की भी मांग रखी है। पुतिन से मिलेंगे अराघची इस बीच अमेरिका के साथ वार्ता के दूसरे दौर को लेकर अनिश्चितता के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची रविवार को तीन दिन में दूसरी बार पाकिस्तान पहुंचे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल मुनीर और अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद अराघची शनिवार को इस्लामाबाद से रवाना हुए थे। यहां से निकलकर अराघची ओमान गए थे। वहीं अब दोबारा पाकिस्तान से निकलने के बाद अब वे रूस रवाना हो गए हैं और यहां अराघची पुतिन से भी मुलाकात करेंगे। इस दौरान भी युद्ध के लेकर चर्चा हो सकती है। मानेगा अमेरिका? ईरान ने अमेरिका को नया प्रस्ताव भेजा जरूर है लेकिन इस पर सहमति बनना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 10 साल के लिए परमाणु कार्यक्रम यानी न्यूक्लियर एनरिचमेंट रोक दे और अपने मौजूदा भंडार को भी बाहर कर दें। अमेरिका ने कई मौकों पर इस शर्त के बिना युद्धविराम की संभावना से इनकार किया है। ऐसे में ईरान के नए ऑफर पर अमेरिका की सहमति मिलना मुश्किल है।

तेहरान से फिर शुरू हुईं कमर्शियल फ्लाइट्स, ईरान ने इन देशों के लिए उड़ानें बहाल की

 तेहरान  मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच एक अच्छी खबर सामने आई है। ईरान की राजधानी तेहरान से एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं की बहाली हो गई है। ईरान के सबसे बड़े हवाई अड्डे, इमाम खुमैनी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IKA) ने शनिवार सुबह से अपनी अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों को फिर से शुरू कर दिया है। बता दें कि युद्ध जैसी स्थितियों के कारण लंबे समय से बंद पड़े आसमान में अब नागरिक विमानों की आवाजाही शुरू हो गई है, जिसे वैश्विक स्तर पर तनाव कम होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इन शहरों के लिए रवाना हुई पहली उड़ानें हवाई अड्डा अधिकारियों के अनुसार, उड़ानों की बहाली के बाद तेहरान से पहली आउटबाउंड (बाहर जाने वाली) फ्लाइट्स मस्कट (ओमान), इस्तांबुल (तुर्की) और सऊदी अरब के मदीना शहर के लिए रवाना हुईं। इन उड़ानों के शुरू होने से न केवल फंसे हुए यात्रियों को राहत मिली है, बल्कि कूटनीतिक गलियारों में भी इसे एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। भारतीय दूतावास ने दी यात्रा ना करने की सलाह दो दिन पहले ही भारत ने अपने नागरिकों को ईरान की यात्रा न करने की सलाह दी है। यह परामर्श हाल की उन खबरों के मद्देनजर जारी किया गया है, जिनमें दोनों देशों के बीच कुछ उड़ानों के परिचालन की बात कही गई है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने अपने नवीनतम परामर्श में कहा, "क्षेत्रीय तनाव के कारण हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध और परिचालन संबंधी अनिश्चितताएं ईरान से आने-जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को प्रभावित कर रही हैं।' दूतावास ने स्पष्ट किया, "भारत और ईरान के बीच कुछ उड़ानों के शुरू होने की खबरों के मद्देनजर, पिछले परामर्शों को जारी रखते हुए, भारतीय नागरिकों को दृढ़ता से सलाह दी जाती है कि वे हवाई या सड़क मार्ग से ईरान की यात्रा न करें। गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद हवाई सेवाएं बंद कर दी गई थीं। पाकिस्तान की मध्यस्थता से आठ अप्रैल से लागू हुआ अस्थायी संघर्ष विराम 22 अप्रैल को समाप्त हो रहा है, हालांकि दीर्घकालिक शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। अमेरिका ईरान वार्ता पर क्या है अपडेट इस्लामाबाद में प्रस्तावित अमेरिका और ईरान का वार्ता पर अभी शंका बनी हुई है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के तहत 'लॉकडाउन' एक सप्ताह से जारी है। ईरान के विदेश मंत्री अराघची अपनी टीम के साथ पहुंच चुके हैं। हालांकि अमेरिका का प्रतिनिधिमंडल अभी नहीं पहुंचा है। इससे पहले ईरान ने अमेरिका से सीधी बात करने से भी इनकार कर दिया था। पिछली बार भी इस्लामाबाद में ही शांति वार्ता हुई थी जिसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला था। अमेरिका का कहना है ईरान उसकी मांगों के हिसाब से वार्ता का प्रस्ताव तैयार रखे। मशहद एयरपोर्ट भी हुआ एक्टिव तेहरान से पहले, ईरान के दूसरे सबसे बड़े शहर मशहद के हवाई अड्डे को भी इस हफ्ते की शुरुआत में खोल दिया गया था। उत्तर-पूर्वी ईरान में स्थित यह शहर धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में भी हवाई यातायात परिचालन को बहाल किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि ईरान अब अपनी नागरिक सेवाओं को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है। दुनिया ने ली राहत की सांस युद्ध के माहौल में किसी देश के मुख्य हवाई अड्डे का खुलना शांति की दिशा में एक बड़ा संकेत होता है। जब तक हवाई क्षेत्र बंद रहता है, तब तक बड़े सैन्य टकराव की आशंका बनी रहती है। तेहरान एयरपोर्ट से कमर्शियल उड़ानों का शुरू होना यह संकेत देता है कि सुरक्षा व्यवस्था अब पहले से बेहतर है और नागरिक उड्डयन के लिए खतरा कम हुआ है।  

अमेरिका का ईरानी टैंकर पर धावा, हिंद महासागर में 3 जहाजों की घेराबंदी के बाद तनाव बढ़ा

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब समुद्र के बीच खुली ताकत की लड़ाई में बदलता जा रहा है. ईरान के जहाज चकमा देकर होर्मुज को पार कर रहे हैं. लेकिन अब ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी सेना ने एशियाई समुद्री इलाकों में ईरान के कम से कम तीन तेल टैंकरों को रोक लिया है और उन्हें उनके रास्ते से हटा दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ये जहाज भारत, मलेशिया और श्रीलंका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में मौजूद थे. अमेरिकी सेना ने इन्हें इंटरसेप्ट कर उनकी दिशा बदल दी, जिससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका अब ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है।  इन टैंकरों में ‘डीप सी’, ‘सेविन’ और ‘डोरेना’ शामिल हैं. ‘डीप सी’ एक बड़ा सुपरटैंकर है, जो आंशिक रूप से कच्चे तेल से भरा हुआ था और आखिरी बार मलेशिया के तट के पास देखा गया था. वहीं ‘सेविन’ नाम का छोटा टैंकर अपनी क्षमता का करीब 65 प्रतिशत तेल लेकर चल रहा था  भारत के करीब ईरानी जहाज पर अमेरिका का एक्शन रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अहम जहाज ‘डोरेना’ बताया जा रहा है, जो करीब 20 लाख बैरल कच्चे तेल से पूरी तरह भरा हुआ था. यह जहाज चार दिन पहले भारत के दक्षिणी तट के पास देखा गया था, जिसके बाद अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत ने उसे हिंद महासागर में एस्कॉर्ट करते हुए अपनी निगरानी में ले लिया. इसके अलावा ‘डेर्या’ नाम के एक और ईरानी टैंकर को भी रोके जाने की खबर है. यह जहाज भारत में अपना तेल उतार नहीं सका था, क्योंकि ईरानी तेल खरीदने की अमेरिकी छूट खत्म हो चुकी थी।  होर्मुज में अमेरिका ने बनाई दीवार! अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी को और कड़ा कर दिया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अब तक 29 जहाजों को वापस लौटने या दिशा बदलने के लिए मजबूर किया जा चुका है. यह पूरी कार्रवाई ऐसे समय हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य पहले ही तनाव का केंद्र बना हुआ है. ईरान ने भारत आ रहे एक जहाज को कब्जे में ले लिया. वहीं ईरान के तेल टैंकर अमेरिका को चकमा देकर होर्मुज से निकल रहे हैं। 

मोजतबा खामेनेई का अंत! ईरान में जो डर था, वही हुआ, IRGC ने किया बड़ा कांड, क्या ट्रंप का सपना सच हुआ?

तेहरान  ईरान में जिसका डर था, लगता है वह खेल हो गया. अमेरिका ने ईरान पर अटैक कर सियासी तौर पर दो फाड़ करवा दिया है. अमेरिका ईरान में रिजीम चेंज करना चाहता था. ईरानी सरकार और सेना में तकरार से ऐसा लग रहा कि डोनाल्ड ट्रंप का मकसद पूरा होने वाला है. जी हां, ईरान में खामेनेई की सत्ता पर अब किसी और का कंट्रोल हो गया है. खुद ईरान की सेना यानी आईरजीसी ने ही ईरान की सत्ता पर कंट्रोल कर लिया है. ईरान में अब मोजतबा खामेनेई की नहीं चल पा रही है. उन्हें साइडलाइन कर दिया गया है. पेजेशकियान भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. आईआरजीसी ने खामेनेई को सरकार से अलग-थलग कर दिया है और सरकारी कामकाज पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है. कई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. ईरान में यह सबकुछ तब हो रहा, जब अमेरिका बातचीत का दूसरा दौर शुरू करने को बेताब है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज यानी बुधवार को अमेरिका-ईरान की वार्ता होने वाली है।  दरअसल, जब से अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया है, तब से तेहरान में सियासी अनिश्चितता छाई हुई है. ईरान पर अभी किसका कंट्रोल है, किसी को कुछ नहीं समझ आ रहा. आपसी सियासी तकरार अब उभरने लगी हैं. 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के हमलों में पुराने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया. लेकिन उनकी हालत और जगह के बारे में साफ जानकारी नहीं मिल रही है. वे पिछले कई हफ्तों से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे गंभीर रूप से घायल या असमर्थ हो सकते हैं।  ईरान की सत्ता पर किसका कंट्रोल? टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट्स के हवाले से दावा किया कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कथित तौर पर देश के प्रमुख कामकाज पर नियंत्रण कर लिया है. ऐसा करके ईरानी सेना ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को किनारे कर दिया है. उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में धकेल दिया है, क्योंकि सेना देश के सत्ता के मुख्य केंद्रों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. इतना ही नहीं, मोजतबा खामेनेई के दखल को भी रोक दिया है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, आईआरजीसी (IRGC) ने राष्ट्रपति की नियुक्तियों और फैसले को रोक दिया है. साथ ही सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना दिया है, जिससे खामेनेई सरकार प्रभावी रूप से कार्यकारी नियंत्रण से बाहर हो गई है।  IRGC ने खुफिया मंत्री की नियुक्ति रोक दी फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान पिछले गुरुवार को एक नए खुफिया मंत्री को नियुक्त करना चाहते थे. मगर आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने इसमें हस्तक्षेप किया और उनके प्रयास को विफल कर दिया. हुसैन देहगान सहित सभी प्रस्तावित उम्मीदवारों को खारिज कर दिया गया।  फॉक्स न्यूज के अनुसार, आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने जोर देकर कहा कि युद्ध जैसी स्थितियों को देखते हुए सभी महत्वपूर्ण और संवेदनशील नेतृत्व पदों का चयन और उन पर निगरानी सीधे आईआरजीसी द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि कोई और आदेश न आ जाए. ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति आमतौर पर खुफिया मंत्रियों को तभी नामित करते हैं जब उन्हें सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिल जाती है, क्योंकि इस पद के पास प्रमुख सुरक्षा विभागों पर अंतिम अधिकार होता है।  ईरानी सुप्रीम लीडर कहां हैं?  हाल के समय में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का कोई अता-पता नहीं है. न तो उनके लोकेशन की जानकारी है और न ही उनके स्वास्थ्य की. कई बार मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वह तेहरान में ही हैं और घायल हैं. मोजतबा खामेनेई के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने के कारण ईरानी सेना प्रभावी रूप से राष्ट्रपति को उनके पसंदीदा उम्मीदवार को आगे बढ़ाने से रोक रहा है, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गई है।  गौरतलब है की अमेरिकी अटैक के बाद से मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने नहीं आए हैं. वह जिंदा हैं या नहीं हैं, कहां हैं और कहां नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे शायद काम करने में असमर्थ हो गए हैं. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरानी सेना आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडरों के नेतृत्व वाली एक ‘सैन्य परिषद’ ने उन तक पहुंच को सीमित कर दिया है, जिससे वे प्रभावी रूप से सरकारी अधिकारियों से अलग-थलग पड़ गए हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी सीमित हो गया है।  खामेनेई की मृत्यु के बाद सत्ता का खालीपन फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इससे ईरानी व्यवस्था के शीर्ष पर नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हो गया है. हालांकि यह माना जा रहा है कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने एक प्रमुख भूमिका संभाल ली है, लेकिन उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से बहुत कम उपस्थिति या कोई आधिकारिक संचार देखने को मिला है. विश्वसनीय सूत्रों ने ईरान इंटरनेशनल को बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने हाल के दिनों में मोजतबा खामेनेई के साथ एक आपात बैठक करने की बार-बार कोशिश की है, लेकिन उनके सभी अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला है और उनसे कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है।  मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक घेरा फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि आईआरजीसी के सीनियर अधिकारियों से बनी एक सैन्य परिषद अब मुख्य निर्णय लेने वाली संरचना पर पूर्ण नियंत्रण रखती है. यह परिषद मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाए हुए है और देश की स्थिति पर सरकारी रिपोर्टों को उन तक पहुंचने से रोक रही है. इसी बीच बताया जा रहा है कि मोजतबा खामेनेई के करीबी लोगों के घेरे में एक अभूतपूर्व आंतरिक संकट उभर रहा है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ करीबी सहयोगी अली असगर हेजाजी को हटाने के लिए जोर डाल रहे हैं. हेजाजी … Read more

रॉबर्ट पेप ने समझाई ईरान की मजबूती, ‘चौथी सबसे बड़ी ताकत’ बनने की वजह

तेहरान  क्या दुनिया अब तक ईरान को समझने में बहुत बड़ी भूल कर रही थी? क्या पश्चिमी देश जिस ईरान को एक ‘कमजोर’ देश मान रहे थे, वह असल में दुनिया का एक नया पावर सेंटर बन चुका है? मशहूर अमेरिकी रणनीतिकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ रॉबर्ट पेप ने कहा, दुनिया का नजरिया अब ईरान को लेकर पूरी तरह से बदल रहा है. उन्‍होंने एक्‍स पर ल‍िखा, ईरान अब वो नहीं, जो हम उसे समझ रहे थे।  ज‍िस वक्‍त ईरान अमेर‍िका के सामने सीना ठोककर खड़ा है, ठीक उसी वक्‍त रॉबर्ट पेप ने यह बातें कहीं. अमेरिकी टीवी शो ‘मॉर्निंग जो’ की एक चर्चा का हवाला देते हुए उन्‍होंने कहा कि अब तक पश्चिमी मीडिया में इस बात पर बहस होती थी कि ईरान कितना कमजोर हो चुका है. लेकिन अब अचानक पूरी बहस का रुख बदल गया है. अब वहां चर्चा इस बात पर हो रही है कि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) का क्या होगा और ईरान के साथ नेगोशिएशन कैसे किया जाए. पेप के मुताबिक, अब दुनिया समझ गई है कि ईरान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  बहुत बड़ा चेंज आ गया     पेप का कहना है कि यह वैश्विक नजरिए में एक बहुत बड़ा और गहरा बदलाव है. दुनिया अब ईरान को ‘सुलझाई जाने वाली एक समस्या’ के रूप में नहीं देख रही है. बल्कि अब उसे एक ऐसी ‘बड़ी ताकत’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लोहा मानना ही पड़ेगा. पेप के मुताबिक, दुनिया में नए ‘पावर सेंटर’ यानी शक्ति के केंद्र इसी तरह से उभरते हैं. उन्होंने बताया कि दो हफ्ते पहले ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अपने लेख में उन्होंने ठीक यही बात कही थी।      तब पेप ने लिखा था कि ईरान बिखर नहीं रहा है, बल्कि ‘होर्मुज’ का इस्तेमाल करके वह एक टिकाऊ ताकत बन रहा है. तब लोगों को उनकी बात अजीब लगी थी, लेकिन आज वही बात एक सच्चाई बन चुकी है. रॉबर्ट पेप ने समझाया कि आखिर ईरान के हाथ में ऐसी कौन सी चाबी है. इसका जवाब है ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’. यह दुनिया का वो संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है. यह पूरी दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 25 फीसदी है।      एशिया से लेकर खाड़ी देशों की पूरी अर्थव्यवस्था इसी एक समुद्री रास्ते पर टिकी हुई है. पेप कहते हैं कि जो भी देश इस ‘चोकपॉइंट’ को कंट्रोल करेगा, वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की ताकत रखेगा. ईरान की इस नई ताकत के पीछे उसकी एक बेहद स्मार्ट रणनीति है. पेप इसे ‘दबदबा’ नहीं, बल्कि ‘डिनायल’ की नीति कहते हैं।      ईरान को इस समुद्री रास्ते को पूरी तरह से बंद करने की कोई जरूरत नहीं है. वह सिर्फ अपनी मिसाइलों, ड्रोन्स, समुद्री सुरंगों और अपनी शानदार भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल करके वहां एक लगातार बना रहने वाला ‘खतरा’ पैदा कर रहा है. इस रास्ते पर सिर्फ ‘अनिश्चितता’ का खौफ पैदा करना ही दुनिया का व्यवहार बदलने के लिए काफी है. ईरान बिना रास्ता ब्लॉक किए ही अपना काम निकाल रहा है।  वेस्‍ट के ल‍िए यह कड़वी सच्‍चाई रॉबर्ट पेप ने पश्चिमी देशों और अमेरिका के सामने एक बहुत बड़ी सच्चाई रखी है. उनका कहना है कि इस स्थिति ने दुनिया के सामने एक गहरी चुनौती पेश कर दी है. अब दो ही विकल्प बचे हैं. या तो पूरी दुनिया ईरान को ग्लोबल पावर के ‘चौथे केंद्र’ के रूप में स्वीकार कर ले, या फिर ईरान के इस दबदबे को तोड़ने के लिए एक ऐसी जंग छेड़े, जिसकी भयंकर कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी. पेप इसे ‘द एस्केलेशन ट्रैप’ यानी बढ़ते तनाव का जाल कहते हैं। 

ईरानी जहाज के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने के बाद अमेरिका ने किया हमला, बातचीत का रास्ता क्या होगा?

वाशिंगटन/तेहरान  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव चरम पर पहुंच गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को घोषणा की कि अमेरिकी नौसेना ने गल्फ ऑफ ओमान में एक ईरानी झंडे वाले कार्गो जहाज तौस्का पर गोलीबारी कर उसे जब्त कर लिया. जहाज अमेरिकी नौसेना की ब्लॉकेड को तोड़ने की कोशिश कर रहा था. इस घटना ने क्षेत्र में पहले से ही अस्थिर युद्धविराम को और कमजोर कर दिया है, जबकि पाकिस्तान में प्रस्तावित शांति वार्ता पर गहरा संकट छा गया है।  सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि यूएसएस स्प्रुएंस ने तौस्का को रोका और उसे रुकने की उचित चेतावनी दी. ईरानी क्रू ने नहीं माना, इसलिए हमारी नौसेना ने उनके इंजन रूम में छेद कर उन्हें रोक दिया. अब यह जहाज यूएस मरीन्स की कस्टडी में हैं और देख रहे हैं कि उसमें क्या है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने भी इसकी पुष्टि की. जहाज ईरान के अब्बास बंदरगाह की ओर जा रहा था. ईरान की सेना ने राज्य मीडिया के माध्यम से चेतावनी दी है कि वह जल्द ही जवाबी कार्रवाई करेगी. ईरानी अधिकारियों ने इस घटना को युद्धविराम का उल्लंघन बताया है।  गौरतलब है कि पिछले हफ्तों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान ने अमेरिकी ब्लॉकेड के जवाब में जलमार्ग को बंद रखा हुआ है. इससे ग्लोबल तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है. इस बीच, व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस और उच्च स्तरीय अमेरिकी अधिकारी आने वाले दिनों में पाकिस्तान जाकर ईरान के साथ शांति वार्ता का नया दौर करेंगे. हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक अमेरिका ब्लॉकेड नहीं हटाता तब तक वह अपने दूत नहीं भेजेगा. इस बीच मौजूदा युद्ध विराम की मियाद बुधवार को समाप्त हो जा रही है. इसे बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन नई घटना ने स्थिति को जटिल बना दिया है।  वार्ता में अड़चने वार्ता में कई प्रमुख अड़चनें हैं. ईरान के यूरेनियम स्टॉक पर नियंत्रण, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी मांगें इसमें सबसे अहम हैं. ईरान अमेरिकी ब्लॉकेड को युद्धविराम का उल्लंघन मान रहा है, जबकि अमेरिका का कहना है कि ईरान ने जहाजों पर फायरिंग कर समझौते का उल्लंघन किया. इस तनाव का वैश्विक प्रभाव साफ दिख रहा है. रविवार को तेल की कीमतों में फिर उछाल आया. ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड दोनों में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. दुनिया के लगभग फीसदी तेल की ढुलाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होती है. कई दिनों से यहां शिपिंग प्रभावित है, जिससे एशिया और यूरोप में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका है।  पाकिस्तान इन वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पहले दौर की वार्ता में 21 घंटे की चर्चा के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका था. उपराष्ट्रपति वांस ने तब कहा था कि ईरान अमेरिकी शर्तों- खासकर परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता को मानने को तैयार नहीं है. अब नई घटना के बाद वार्ता की संभावनाएं धूमिल नजर आ रही हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है. अगर युद्ध विराम नहीं बढ़ाया गया तो फिर से पूर्ण युद्ध की स्थिति बन सकती है. अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि ब्लॉकेड तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान अपनी मांगें पूरी नहीं करता. वहीं ईरान कह रहा है कि जब तक अमेरिका अपने बंदरगाहों पर ब्लॉकेड नहीं  .हटाता, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलना नामुमकिन है। 

ईरान की धमकी: ‘गलती की तो पूरी ताकत से देंगे जवाब’, ट्रंप को किया चेतावन

तेहरान  ईरान और अमेरिका में जारी तनाव के बीच तेहरान ने एक बार फिर सख्त लहजे में चेतावनी दी है. ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मह बाकर ग़ालिबाफ ने साफ कहा है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार जरूर है, लेकिन अगर जरा सी भी गलती हुई तो जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा।  टीवी पर रविवार को दिए गए संबोधन में गालिबाफ ने दो टूक कहा कि ईरान इस समय हाई अलर्ट पर है. उन्होंने कहा, "हम पूरी तरह तैयार हैं. अगर उन्होंने जरा सी भी गलती की, तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे." उनके इस बयान से साफ है कि एक तरफ वार्ता की बात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ सख्ती भी बरकरार है।  गालिबाफ ने यह भी दावा किया कि ईरान ने मैदान में अपनी ताकत दिखाई है और अब वह मजबूत स्थिति से बातचीत करना चाहता है. उन्होंने कहा कि इस बार ईरान की सैन्य क्षमता पहले के मुकाबले काफी बेहतर है और यह बात जंग के दौरान साफ नजर आई है।  हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अमेरिका के पास संसाधन और ताकत ज्यादा है. गालिबाफ ने कहा, "हम सैन्य तौर पर अमेरिका से मजबूत नहीं हैं. उनके पास ज्यादा पैसा, ज्यादा हथियार और ज्यादा अनुभव है." लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अपनी रणनीति और तैयारी के दम पर हालात को अपने पक्ष में मोड़ा है।  गालिबाफ के मुताबिक, यह सीधी लड़ाई नहीं बल्कि अलग तरह की जंग है, जिसमें ईरान ने अपनी योजना के जरिए मजबूत देशों का मुकाबला किया. उन्होंने कहा कि विरोधी देशों के पास संसाधन तो थे, लेकिन उनकी रणनीति सही नहीं रही, जबकि ईरान ने बेहतर तरीके से काम किया।  गालिबाफ ने अमेरिका के फैसलों पर भी सवाल उठाए और कहा कि उनके विरोधी ईरान को सही तरीके से समझ नहीं पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि "वे हमारे लोगों को लेकर भी गलत सोच रखते हैं और सैन्य फैसलों में भी गलती करते हैं।  इस दौरान उन्होंने इजरायल पर भी निशाना साधा. गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका भले ही "अमेरिका फर्स्ट" की बात करता हो, लेकिन असल में उसके फैसलों में इजरायल की भूमिका ज्यादा नजर आती है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका कई बार इजरायल से मिली जानकारी के आधार पर फैसले लेता है, जो सही नहीं होती।  इसके अलावा, गालिबाफ ने यह भी कहा कि विरोधी देशों ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली. उनके मुताबिक, ईरान को अस्थिर करने और उसकी तेल संपत्ति पर कब्जा करने की योजना भी नाकाम रही।  इस बीच, अमेरिका की तरफ से भी रुख सख्त बना हुआ है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि ईरान पर दबाव बनाकर रखा जाएगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ब्लॉकेड जारी रहेगी और ईरानी जहाजों को उसके पोर्ट से निकलने नहीं दिया जाएगा. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों देश बातचीत की राह चुनते हैं या फिर टकराव और बढ़ता है। 

ईरान के 56 हजार करोड़ रुपये भारत में फंसे, जानिए क्यों नहीं कर सकता वापस?

  नई दिल्ली अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच एक मुद्दा जो बार-बार सामने आ रहा है, वो है ईरान के फ्रीज एसेट्स का. ईरान का मोटा पैसा दुनिया के अलग-अलग देशों में जब्त हैं. इसी कड़ी में भारत का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है, जहां ईरान के करीब 7 अरब डॉलर यानी लगभग 560 अरब रुपये या करीब 56 हजार करोड़ रुपये अटके हुए हैं. यह रकम कोई छोटी नहीं है, और यही वजह है कि तेहरान इसे वापस पाने के लिए लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहा है।  इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति से. इसके बाद से ही ईरान और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते गए. अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक, कई वजहों से वॉशिंगटन ने तेहरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध (सैंक्शन) लगाए. समय के साथ ये सैंक्शन और सख्त होते गए, खासकर ईरान के न्यूक्लियर और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर अमेरिका-इजरायल ने और सख्ती दिखाई।  इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि ईरान अपने ही कमाए हुए पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है. जब कोई देश दूसरे देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, तो उसके बैंकिंग सिस्टम और इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन पर रोक लग जाती है. यही वजह है कि ईरान का तेल बेचकर कमाया गया पैसा कई देशों के बैंकों में जमा तो है, लेकिन फ्रीज है. यानी ईरान उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता।  भारत में क्यों फंसा है ईरान का पैसा? भारत का मामला भी कुछ ऐसा ही है. भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था. उस तेल के बदले जो भुगतान किया गया, वह भारतीय बैंकों में जमा हो गया. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह पैसा सीधे ईरान को ट्रांसफर नहीं किया जा सका. इसलिए यह रकम भारत में ही "फ्रीज" हो गई।  ईरानी सरकारी प्रेस टीवी के दावे के मुताबिक सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई और देशों में भी ईरान का पैसा फंसा हुआ है. रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के पास करीब 20 अरब डॉलर, इराक में लगभग 6 अरब डॉलर, जापान में 1.5 अरब डॉलर और कतर में करीब 6 अरब डॉलर फंसे हुए हैं. यूरोप के कुछ देशों और खुद अमेरिका में भी ईरान का दो अरब डॉलर फंसा है. रिपोर्ट्स की मानें तो ईरान के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के एसेट्स दुनियाभर में फ्रीज बताए जाते हैं।  ईरान के पैसे पर क्यों लगी पाबंदी? अब सवाल उठता है कि "फ्रोजन एसेट्स" आखिर होते क्या हैं? आसान भाषा में समझें तो जब किसी देश की संपत्ति चाहे वह पैसा हो, प्रॉपर्टी हो या निवेश किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा रोक दी जाती है, तो उसे फ्रीज्ड एसेट कहा जाता है. ऐसा आमतौर पर सैंक्शन, कानूनी विवाद या अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन के आरोप में किया जाता है।  ईरान के लिए यह पैसा बेहद अहम है. दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रही उसकी अर्थव्यवस्था पहले ही दबाव में है. ऐसे में अगर यह फंसा हुआ पैसा वापस मिल जाए, तो उसकी आर्थिक स्थिति को बड़ी राहत मिल सकती है. यही कारण है कि हाल की बातचीत में ईरान ने कम से कम 6 अरब डॉलर की रकम रिलीज करने की मांग को "कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर" यानी भरोसा कायम करने के तौर पर रखा है।  ईरान का पैसा क्यों रिलीज नहीं कर रहा अमेरिका? लेकिन यह इतना आसान नहीं है. अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस बात को लेकर सख्त हैं कि अगर पैसा रिलीज भी किया जाए, तो उसका इस्तेमाल किस तरह होगा. उन्हें डर है कि यह रकम कहीं ईरान के सैन्य या परमाणु कार्यक्रम में न लग जाए. इसी वजह से हर बार बातचीत अटक जाती है. हालांकि, ईरान की तरफ से कहा जाता है कि ये पैसा उनका है और इसका इस्तेमाल कैसे होगा वो खुद ये तय करेगा।  एक और दिलचस्प पहलू यह है कि भले ही सैंक्शन हट जाएं, तब भी ईरान को अपनी पूरी रकम तुरंत नहीं मिल सकती. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा पहले से ही पुराने कर्ज चुकाने या निवेश के लिए बंधा हुआ है. ऐसे में तेहरान को सिर्फ आंशिक राहत ही मिल पाएगी।  मसलन, भारत में फंसा ईरान का 652 अरब रुपये सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का बड़ा हिस्सा है. जब तक अमेरिका-ईरान के रिश्तों में सुधार नहीं होता और प्रतिबंधों में ढील नहीं मिलती, तब तक यह पैसा यूं ही बैंकों में फ्रीज रहेगा. आने वाले दिनों में अगर कोई बड़ा समझौता होता है, तभी उम्मीद की जा सकती है कि ईरान अपने पैसे का इस्तेमाल कर पाएगा। 

ईरान ने चीनी सैटेलाइट के जरिए अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, रिपोर्ट से बढ़ी चिंताएं

तेहरान  ईरान ने चीन के जासूसी सैटेलाइट का इस्तेमाल करते हुए मिडल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों की रेकी की थी। इसी के चलते उसे पूरी जानकारी मिल गई थी और फिर जंग में उसने चुन-चुनकर अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। चीनी सैटेलाइनट का यह इस्तेमाल 2024 के आखिरी दिनों में किया गया था। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने TEE-01B सैटेलाइट्स का इस्तेमाल किया था। इन्हें चीन की कंपनी 'अर्थ आई' ने तैयार किया है। इनकी सेवाओं को ईरानी सेना की एयरोस्पेस फोर्स ने खरीदा था। चीन की ओर से इन सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के कुछ दिन बाद ही ईरान ने सेवाएं ली थीं। इस बीच चीनी विदेश मंत्रालय ने ऐसी रिपोर्ट्स को खारिज किया है। उसका कहना है कि चीन पर टैरिफ लगाने के लिए ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं। इन मनगढ़ंत आरोपों का इस्तेमाल हमारे ऊपर टैरिफ लगाने के बहाने के तौर पर किया जा सकता है। चीनी मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि यदि अमेरिका ने हमारे ऊपर टैरिफ बढ़ाया तो फिर हम भी उसका जवाब देंगे। फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि उसने ईरानी सेना के लीक दस्तावेजों के अध्ययन के बाद यह जानकारी दी है। अखबार का कहना है कि ईरानी सेना के कमांडरों ने सैटेलाइट से कहा था कि वह अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों की मॉनिटरिंग करे। इसके बाद सैटेलाइट की मदद से तस्वीरें और अन्य जानकारियां हासिल की गईं। इन तस्वीरों को काफी पहले ही जुटाया गया था। इसके बाद जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए तो उसने भी जवाबी हमले किए। ईरान ने इराक, कतर, सऊदी अरब समेत कई देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। जानकारी यह भी है कि चीनी सैटेलाइट्स की रेंज में एशिया का ज्यादातर हिस्सा आता है। इसके अलावा लैटिन अमेरिका समेत कई और क्षेत्र उसकी जद में हैं। 'ट्रंप भी कह चुके मेरा इरादा चीन को टारगेट करना' बता दें कि चीन पर डोनाल्ड ट्रंप खुद ही आरोप लगा चुके हैं कि उसने ईरान को हथियारों के जरिए मदद की है। उनका कहना था कि मैंने कुछ देशों पर 50 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की जो बात कही है, वह मुख्य रूप से चीन के लिए ही है। गौरतलब है कि मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद चीन जाने वाले हैं। माना यह भी जा रहा है कि शायद अपने दौरे से पहले एक बेहतर डील के लिए चीन पर दबाव डालने की भी उनकी यह रणनीति हो सकती है।