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तेहरान से फिर शुरू हुईं कमर्शियल फ्लाइट्स, ईरान ने इन देशों के लिए उड़ानें बहाल की

 तेहरान  मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच एक अच्छी खबर सामने आई है। ईरान की राजधानी तेहरान से एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं की बहाली हो गई है। ईरान के सबसे बड़े हवाई अड्डे, इमाम खुमैनी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IKA) ने शनिवार सुबह से अपनी अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों को फिर से शुरू कर दिया है। बता दें कि युद्ध जैसी स्थितियों के कारण लंबे समय से बंद पड़े आसमान में अब नागरिक विमानों की आवाजाही शुरू हो गई है, जिसे वैश्विक स्तर पर तनाव कम होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इन शहरों के लिए रवाना हुई पहली उड़ानें हवाई अड्डा अधिकारियों के अनुसार, उड़ानों की बहाली के बाद तेहरान से पहली आउटबाउंड (बाहर जाने वाली) फ्लाइट्स मस्कट (ओमान), इस्तांबुल (तुर्की) और सऊदी अरब के मदीना शहर के लिए रवाना हुईं। इन उड़ानों के शुरू होने से न केवल फंसे हुए यात्रियों को राहत मिली है, बल्कि कूटनीतिक गलियारों में भी इसे एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। भारतीय दूतावास ने दी यात्रा ना करने की सलाह दो दिन पहले ही भारत ने अपने नागरिकों को ईरान की यात्रा न करने की सलाह दी है। यह परामर्श हाल की उन खबरों के मद्देनजर जारी किया गया है, जिनमें दोनों देशों के बीच कुछ उड़ानों के परिचालन की बात कही गई है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने अपने नवीनतम परामर्श में कहा, "क्षेत्रीय तनाव के कारण हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध और परिचालन संबंधी अनिश्चितताएं ईरान से आने-जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को प्रभावित कर रही हैं।' दूतावास ने स्पष्ट किया, "भारत और ईरान के बीच कुछ उड़ानों के शुरू होने की खबरों के मद्देनजर, पिछले परामर्शों को जारी रखते हुए, भारतीय नागरिकों को दृढ़ता से सलाह दी जाती है कि वे हवाई या सड़क मार्ग से ईरान की यात्रा न करें। गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद हवाई सेवाएं बंद कर दी गई थीं। पाकिस्तान की मध्यस्थता से आठ अप्रैल से लागू हुआ अस्थायी संघर्ष विराम 22 अप्रैल को समाप्त हो रहा है, हालांकि दीर्घकालिक शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। अमेरिका ईरान वार्ता पर क्या है अपडेट इस्लामाबाद में प्रस्तावित अमेरिका और ईरान का वार्ता पर अभी शंका बनी हुई है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के तहत 'लॉकडाउन' एक सप्ताह से जारी है। ईरान के विदेश मंत्री अराघची अपनी टीम के साथ पहुंच चुके हैं। हालांकि अमेरिका का प्रतिनिधिमंडल अभी नहीं पहुंचा है। इससे पहले ईरान ने अमेरिका से सीधी बात करने से भी इनकार कर दिया था। पिछली बार भी इस्लामाबाद में ही शांति वार्ता हुई थी जिसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला था। अमेरिका का कहना है ईरान उसकी मांगों के हिसाब से वार्ता का प्रस्ताव तैयार रखे। मशहद एयरपोर्ट भी हुआ एक्टिव तेहरान से पहले, ईरान के दूसरे सबसे बड़े शहर मशहद के हवाई अड्डे को भी इस हफ्ते की शुरुआत में खोल दिया गया था। उत्तर-पूर्वी ईरान में स्थित यह शहर धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में भी हवाई यातायात परिचालन को बहाल किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि ईरान अब अपनी नागरिक सेवाओं को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है। दुनिया ने ली राहत की सांस युद्ध के माहौल में किसी देश के मुख्य हवाई अड्डे का खुलना शांति की दिशा में एक बड़ा संकेत होता है। जब तक हवाई क्षेत्र बंद रहता है, तब तक बड़े सैन्य टकराव की आशंका बनी रहती है। तेहरान एयरपोर्ट से कमर्शियल उड़ानों का शुरू होना यह संकेत देता है कि सुरक्षा व्यवस्था अब पहले से बेहतर है और नागरिक उड्डयन के लिए खतरा कम हुआ है।  

अमेरिका का ईरानी टैंकर पर धावा, हिंद महासागर में 3 जहाजों की घेराबंदी के बाद तनाव बढ़ा

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब समुद्र के बीच खुली ताकत की लड़ाई में बदलता जा रहा है. ईरान के जहाज चकमा देकर होर्मुज को पार कर रहे हैं. लेकिन अब ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी सेना ने एशियाई समुद्री इलाकों में ईरान के कम से कम तीन तेल टैंकरों को रोक लिया है और उन्हें उनके रास्ते से हटा दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ये जहाज भारत, मलेशिया और श्रीलंका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में मौजूद थे. अमेरिकी सेना ने इन्हें इंटरसेप्ट कर उनकी दिशा बदल दी, जिससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका अब ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है।  इन टैंकरों में ‘डीप सी’, ‘सेविन’ और ‘डोरेना’ शामिल हैं. ‘डीप सी’ एक बड़ा सुपरटैंकर है, जो आंशिक रूप से कच्चे तेल से भरा हुआ था और आखिरी बार मलेशिया के तट के पास देखा गया था. वहीं ‘सेविन’ नाम का छोटा टैंकर अपनी क्षमता का करीब 65 प्रतिशत तेल लेकर चल रहा था  भारत के करीब ईरानी जहाज पर अमेरिका का एक्शन रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अहम जहाज ‘डोरेना’ बताया जा रहा है, जो करीब 20 लाख बैरल कच्चे तेल से पूरी तरह भरा हुआ था. यह जहाज चार दिन पहले भारत के दक्षिणी तट के पास देखा गया था, जिसके बाद अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत ने उसे हिंद महासागर में एस्कॉर्ट करते हुए अपनी निगरानी में ले लिया. इसके अलावा ‘डेर्या’ नाम के एक और ईरानी टैंकर को भी रोके जाने की खबर है. यह जहाज भारत में अपना तेल उतार नहीं सका था, क्योंकि ईरानी तेल खरीदने की अमेरिकी छूट खत्म हो चुकी थी।  होर्मुज में अमेरिका ने बनाई दीवार! अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी को और कड़ा कर दिया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अब तक 29 जहाजों को वापस लौटने या दिशा बदलने के लिए मजबूर किया जा चुका है. यह पूरी कार्रवाई ऐसे समय हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य पहले ही तनाव का केंद्र बना हुआ है. ईरान ने भारत आ रहे एक जहाज को कब्जे में ले लिया. वहीं ईरान के तेल टैंकर अमेरिका को चकमा देकर होर्मुज से निकल रहे हैं। 

मोजतबा खामेनेई का अंत! ईरान में जो डर था, वही हुआ, IRGC ने किया बड़ा कांड, क्या ट्रंप का सपना सच हुआ?

तेहरान  ईरान में जिसका डर था, लगता है वह खेल हो गया. अमेरिका ने ईरान पर अटैक कर सियासी तौर पर दो फाड़ करवा दिया है. अमेरिका ईरान में रिजीम चेंज करना चाहता था. ईरानी सरकार और सेना में तकरार से ऐसा लग रहा कि डोनाल्ड ट्रंप का मकसद पूरा होने वाला है. जी हां, ईरान में खामेनेई की सत्ता पर अब किसी और का कंट्रोल हो गया है. खुद ईरान की सेना यानी आईरजीसी ने ही ईरान की सत्ता पर कंट्रोल कर लिया है. ईरान में अब मोजतबा खामेनेई की नहीं चल पा रही है. उन्हें साइडलाइन कर दिया गया है. पेजेशकियान भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. आईआरजीसी ने खामेनेई को सरकार से अलग-थलग कर दिया है और सरकारी कामकाज पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है. कई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. ईरान में यह सबकुछ तब हो रहा, जब अमेरिका बातचीत का दूसरा दौर शुरू करने को बेताब है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज यानी बुधवार को अमेरिका-ईरान की वार्ता होने वाली है।  दरअसल, जब से अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया है, तब से तेहरान में सियासी अनिश्चितता छाई हुई है. ईरान पर अभी किसका कंट्रोल है, किसी को कुछ नहीं समझ आ रहा. आपसी सियासी तकरार अब उभरने लगी हैं. 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के हमलों में पुराने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया. लेकिन उनकी हालत और जगह के बारे में साफ जानकारी नहीं मिल रही है. वे पिछले कई हफ्तों से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे गंभीर रूप से घायल या असमर्थ हो सकते हैं।  ईरान की सत्ता पर किसका कंट्रोल? टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट्स के हवाले से दावा किया कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कथित तौर पर देश के प्रमुख कामकाज पर नियंत्रण कर लिया है. ऐसा करके ईरानी सेना ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को किनारे कर दिया है. उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में धकेल दिया है, क्योंकि सेना देश के सत्ता के मुख्य केंद्रों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. इतना ही नहीं, मोजतबा खामेनेई के दखल को भी रोक दिया है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, आईआरजीसी (IRGC) ने राष्ट्रपति की नियुक्तियों और फैसले को रोक दिया है. साथ ही सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना दिया है, जिससे खामेनेई सरकार प्रभावी रूप से कार्यकारी नियंत्रण से बाहर हो गई है।  IRGC ने खुफिया मंत्री की नियुक्ति रोक दी फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान पिछले गुरुवार को एक नए खुफिया मंत्री को नियुक्त करना चाहते थे. मगर आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने इसमें हस्तक्षेप किया और उनके प्रयास को विफल कर दिया. हुसैन देहगान सहित सभी प्रस्तावित उम्मीदवारों को खारिज कर दिया गया।  फॉक्स न्यूज के अनुसार, आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने जोर देकर कहा कि युद्ध जैसी स्थितियों को देखते हुए सभी महत्वपूर्ण और संवेदनशील नेतृत्व पदों का चयन और उन पर निगरानी सीधे आईआरजीसी द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि कोई और आदेश न आ जाए. ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति आमतौर पर खुफिया मंत्रियों को तभी नामित करते हैं जब उन्हें सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिल जाती है, क्योंकि इस पद के पास प्रमुख सुरक्षा विभागों पर अंतिम अधिकार होता है।  ईरानी सुप्रीम लीडर कहां हैं?  हाल के समय में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का कोई अता-पता नहीं है. न तो उनके लोकेशन की जानकारी है और न ही उनके स्वास्थ्य की. कई बार मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वह तेहरान में ही हैं और घायल हैं. मोजतबा खामेनेई के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने के कारण ईरानी सेना प्रभावी रूप से राष्ट्रपति को उनके पसंदीदा उम्मीदवार को आगे बढ़ाने से रोक रहा है, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गई है।  गौरतलब है की अमेरिकी अटैक के बाद से मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने नहीं आए हैं. वह जिंदा हैं या नहीं हैं, कहां हैं और कहां नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे शायद काम करने में असमर्थ हो गए हैं. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरानी सेना आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडरों के नेतृत्व वाली एक ‘सैन्य परिषद’ ने उन तक पहुंच को सीमित कर दिया है, जिससे वे प्रभावी रूप से सरकारी अधिकारियों से अलग-थलग पड़ गए हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी सीमित हो गया है।  खामेनेई की मृत्यु के बाद सत्ता का खालीपन फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इससे ईरानी व्यवस्था के शीर्ष पर नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हो गया है. हालांकि यह माना जा रहा है कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने एक प्रमुख भूमिका संभाल ली है, लेकिन उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से बहुत कम उपस्थिति या कोई आधिकारिक संचार देखने को मिला है. विश्वसनीय सूत्रों ने ईरान इंटरनेशनल को बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने हाल के दिनों में मोजतबा खामेनेई के साथ एक आपात बैठक करने की बार-बार कोशिश की है, लेकिन उनके सभी अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला है और उनसे कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है।  मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक घेरा फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि आईआरजीसी के सीनियर अधिकारियों से बनी एक सैन्य परिषद अब मुख्य निर्णय लेने वाली संरचना पर पूर्ण नियंत्रण रखती है. यह परिषद मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाए हुए है और देश की स्थिति पर सरकारी रिपोर्टों को उन तक पहुंचने से रोक रही है. इसी बीच बताया जा रहा है कि मोजतबा खामेनेई के करीबी लोगों के घेरे में एक अभूतपूर्व आंतरिक संकट उभर रहा है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ करीबी सहयोगी अली असगर हेजाजी को हटाने के लिए जोर डाल रहे हैं. हेजाजी … Read more

रॉबर्ट पेप ने समझाई ईरान की मजबूती, ‘चौथी सबसे बड़ी ताकत’ बनने की वजह

तेहरान  क्या दुनिया अब तक ईरान को समझने में बहुत बड़ी भूल कर रही थी? क्या पश्चिमी देश जिस ईरान को एक ‘कमजोर’ देश मान रहे थे, वह असल में दुनिया का एक नया पावर सेंटर बन चुका है? मशहूर अमेरिकी रणनीतिकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ रॉबर्ट पेप ने कहा, दुनिया का नजरिया अब ईरान को लेकर पूरी तरह से बदल रहा है. उन्‍होंने एक्‍स पर ल‍िखा, ईरान अब वो नहीं, जो हम उसे समझ रहे थे।  ज‍िस वक्‍त ईरान अमेर‍िका के सामने सीना ठोककर खड़ा है, ठीक उसी वक्‍त रॉबर्ट पेप ने यह बातें कहीं. अमेरिकी टीवी शो ‘मॉर्निंग जो’ की एक चर्चा का हवाला देते हुए उन्‍होंने कहा कि अब तक पश्चिमी मीडिया में इस बात पर बहस होती थी कि ईरान कितना कमजोर हो चुका है. लेकिन अब अचानक पूरी बहस का रुख बदल गया है. अब वहां चर्चा इस बात पर हो रही है कि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) का क्या होगा और ईरान के साथ नेगोशिएशन कैसे किया जाए. पेप के मुताबिक, अब दुनिया समझ गई है कि ईरान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  बहुत बड़ा चेंज आ गया     पेप का कहना है कि यह वैश्विक नजरिए में एक बहुत बड़ा और गहरा बदलाव है. दुनिया अब ईरान को ‘सुलझाई जाने वाली एक समस्या’ के रूप में नहीं देख रही है. बल्कि अब उसे एक ऐसी ‘बड़ी ताकत’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लोहा मानना ही पड़ेगा. पेप के मुताबिक, दुनिया में नए ‘पावर सेंटर’ यानी शक्ति के केंद्र इसी तरह से उभरते हैं. उन्होंने बताया कि दो हफ्ते पहले ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अपने लेख में उन्होंने ठीक यही बात कही थी।      तब पेप ने लिखा था कि ईरान बिखर नहीं रहा है, बल्कि ‘होर्मुज’ का इस्तेमाल करके वह एक टिकाऊ ताकत बन रहा है. तब लोगों को उनकी बात अजीब लगी थी, लेकिन आज वही बात एक सच्चाई बन चुकी है. रॉबर्ट पेप ने समझाया कि आखिर ईरान के हाथ में ऐसी कौन सी चाबी है. इसका जवाब है ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’. यह दुनिया का वो संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है. यह पूरी दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 25 फीसदी है।      एशिया से लेकर खाड़ी देशों की पूरी अर्थव्यवस्था इसी एक समुद्री रास्ते पर टिकी हुई है. पेप कहते हैं कि जो भी देश इस ‘चोकपॉइंट’ को कंट्रोल करेगा, वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की ताकत रखेगा. ईरान की इस नई ताकत के पीछे उसकी एक बेहद स्मार्ट रणनीति है. पेप इसे ‘दबदबा’ नहीं, बल्कि ‘डिनायल’ की नीति कहते हैं।      ईरान को इस समुद्री रास्ते को पूरी तरह से बंद करने की कोई जरूरत नहीं है. वह सिर्फ अपनी मिसाइलों, ड्रोन्स, समुद्री सुरंगों और अपनी शानदार भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल करके वहां एक लगातार बना रहने वाला ‘खतरा’ पैदा कर रहा है. इस रास्ते पर सिर्फ ‘अनिश्चितता’ का खौफ पैदा करना ही दुनिया का व्यवहार बदलने के लिए काफी है. ईरान बिना रास्ता ब्लॉक किए ही अपना काम निकाल रहा है।  वेस्‍ट के ल‍िए यह कड़वी सच्‍चाई रॉबर्ट पेप ने पश्चिमी देशों और अमेरिका के सामने एक बहुत बड़ी सच्चाई रखी है. उनका कहना है कि इस स्थिति ने दुनिया के सामने एक गहरी चुनौती पेश कर दी है. अब दो ही विकल्प बचे हैं. या तो पूरी दुनिया ईरान को ग्लोबल पावर के ‘चौथे केंद्र’ के रूप में स्वीकार कर ले, या फिर ईरान के इस दबदबे को तोड़ने के लिए एक ऐसी जंग छेड़े, जिसकी भयंकर कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी. पेप इसे ‘द एस्केलेशन ट्रैप’ यानी बढ़ते तनाव का जाल कहते हैं। 

ईरानी जहाज के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने के बाद अमेरिका ने किया हमला, बातचीत का रास्ता क्या होगा?

वाशिंगटन/तेहरान  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव चरम पर पहुंच गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को घोषणा की कि अमेरिकी नौसेना ने गल्फ ऑफ ओमान में एक ईरानी झंडे वाले कार्गो जहाज तौस्का पर गोलीबारी कर उसे जब्त कर लिया. जहाज अमेरिकी नौसेना की ब्लॉकेड को तोड़ने की कोशिश कर रहा था. इस घटना ने क्षेत्र में पहले से ही अस्थिर युद्धविराम को और कमजोर कर दिया है, जबकि पाकिस्तान में प्रस्तावित शांति वार्ता पर गहरा संकट छा गया है।  सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि यूएसएस स्प्रुएंस ने तौस्का को रोका और उसे रुकने की उचित चेतावनी दी. ईरानी क्रू ने नहीं माना, इसलिए हमारी नौसेना ने उनके इंजन रूम में छेद कर उन्हें रोक दिया. अब यह जहाज यूएस मरीन्स की कस्टडी में हैं और देख रहे हैं कि उसमें क्या है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने भी इसकी पुष्टि की. जहाज ईरान के अब्बास बंदरगाह की ओर जा रहा था. ईरान की सेना ने राज्य मीडिया के माध्यम से चेतावनी दी है कि वह जल्द ही जवाबी कार्रवाई करेगी. ईरानी अधिकारियों ने इस घटना को युद्धविराम का उल्लंघन बताया है।  गौरतलब है कि पिछले हफ्तों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान ने अमेरिकी ब्लॉकेड के जवाब में जलमार्ग को बंद रखा हुआ है. इससे ग्लोबल तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है. इस बीच, व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस और उच्च स्तरीय अमेरिकी अधिकारी आने वाले दिनों में पाकिस्तान जाकर ईरान के साथ शांति वार्ता का नया दौर करेंगे. हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक अमेरिका ब्लॉकेड नहीं हटाता तब तक वह अपने दूत नहीं भेजेगा. इस बीच मौजूदा युद्ध विराम की मियाद बुधवार को समाप्त हो जा रही है. इसे बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन नई घटना ने स्थिति को जटिल बना दिया है।  वार्ता में अड़चने वार्ता में कई प्रमुख अड़चनें हैं. ईरान के यूरेनियम स्टॉक पर नियंत्रण, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी मांगें इसमें सबसे अहम हैं. ईरान अमेरिकी ब्लॉकेड को युद्धविराम का उल्लंघन मान रहा है, जबकि अमेरिका का कहना है कि ईरान ने जहाजों पर फायरिंग कर समझौते का उल्लंघन किया. इस तनाव का वैश्विक प्रभाव साफ दिख रहा है. रविवार को तेल की कीमतों में फिर उछाल आया. ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड दोनों में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. दुनिया के लगभग फीसदी तेल की ढुलाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होती है. कई दिनों से यहां शिपिंग प्रभावित है, जिससे एशिया और यूरोप में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका है।  पाकिस्तान इन वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पहले दौर की वार्ता में 21 घंटे की चर्चा के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका था. उपराष्ट्रपति वांस ने तब कहा था कि ईरान अमेरिकी शर्तों- खासकर परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता को मानने को तैयार नहीं है. अब नई घटना के बाद वार्ता की संभावनाएं धूमिल नजर आ रही हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है. अगर युद्ध विराम नहीं बढ़ाया गया तो फिर से पूर्ण युद्ध की स्थिति बन सकती है. अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि ब्लॉकेड तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान अपनी मांगें पूरी नहीं करता. वहीं ईरान कह रहा है कि जब तक अमेरिका अपने बंदरगाहों पर ब्लॉकेड नहीं  .हटाता, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलना नामुमकिन है। 

ईरान की धमकी: ‘गलती की तो पूरी ताकत से देंगे जवाब’, ट्रंप को किया चेतावन

तेहरान  ईरान और अमेरिका में जारी तनाव के बीच तेहरान ने एक बार फिर सख्त लहजे में चेतावनी दी है. ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मह बाकर ग़ालिबाफ ने साफ कहा है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार जरूर है, लेकिन अगर जरा सी भी गलती हुई तो जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा।  टीवी पर रविवार को दिए गए संबोधन में गालिबाफ ने दो टूक कहा कि ईरान इस समय हाई अलर्ट पर है. उन्होंने कहा, "हम पूरी तरह तैयार हैं. अगर उन्होंने जरा सी भी गलती की, तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे." उनके इस बयान से साफ है कि एक तरफ वार्ता की बात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ सख्ती भी बरकरार है।  गालिबाफ ने यह भी दावा किया कि ईरान ने मैदान में अपनी ताकत दिखाई है और अब वह मजबूत स्थिति से बातचीत करना चाहता है. उन्होंने कहा कि इस बार ईरान की सैन्य क्षमता पहले के मुकाबले काफी बेहतर है और यह बात जंग के दौरान साफ नजर आई है।  हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अमेरिका के पास संसाधन और ताकत ज्यादा है. गालिबाफ ने कहा, "हम सैन्य तौर पर अमेरिका से मजबूत नहीं हैं. उनके पास ज्यादा पैसा, ज्यादा हथियार और ज्यादा अनुभव है." लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अपनी रणनीति और तैयारी के दम पर हालात को अपने पक्ष में मोड़ा है।  गालिबाफ के मुताबिक, यह सीधी लड़ाई नहीं बल्कि अलग तरह की जंग है, जिसमें ईरान ने अपनी योजना के जरिए मजबूत देशों का मुकाबला किया. उन्होंने कहा कि विरोधी देशों के पास संसाधन तो थे, लेकिन उनकी रणनीति सही नहीं रही, जबकि ईरान ने बेहतर तरीके से काम किया।  गालिबाफ ने अमेरिका के फैसलों पर भी सवाल उठाए और कहा कि उनके विरोधी ईरान को सही तरीके से समझ नहीं पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि "वे हमारे लोगों को लेकर भी गलत सोच रखते हैं और सैन्य फैसलों में भी गलती करते हैं।  इस दौरान उन्होंने इजरायल पर भी निशाना साधा. गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका भले ही "अमेरिका फर्स्ट" की बात करता हो, लेकिन असल में उसके फैसलों में इजरायल की भूमिका ज्यादा नजर आती है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका कई बार इजरायल से मिली जानकारी के आधार पर फैसले लेता है, जो सही नहीं होती।  इसके अलावा, गालिबाफ ने यह भी कहा कि विरोधी देशों ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली. उनके मुताबिक, ईरान को अस्थिर करने और उसकी तेल संपत्ति पर कब्जा करने की योजना भी नाकाम रही।  इस बीच, अमेरिका की तरफ से भी रुख सख्त बना हुआ है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि ईरान पर दबाव बनाकर रखा जाएगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ब्लॉकेड जारी रहेगी और ईरानी जहाजों को उसके पोर्ट से निकलने नहीं दिया जाएगा. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों देश बातचीत की राह चुनते हैं या फिर टकराव और बढ़ता है। 

ईरान के 56 हजार करोड़ रुपये भारत में फंसे, जानिए क्यों नहीं कर सकता वापस?

  नई दिल्ली अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच एक मुद्दा जो बार-बार सामने आ रहा है, वो है ईरान के फ्रीज एसेट्स का. ईरान का मोटा पैसा दुनिया के अलग-अलग देशों में जब्त हैं. इसी कड़ी में भारत का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है, जहां ईरान के करीब 7 अरब डॉलर यानी लगभग 560 अरब रुपये या करीब 56 हजार करोड़ रुपये अटके हुए हैं. यह रकम कोई छोटी नहीं है, और यही वजह है कि तेहरान इसे वापस पाने के लिए लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहा है।  इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति से. इसके बाद से ही ईरान और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते गए. अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक, कई वजहों से वॉशिंगटन ने तेहरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध (सैंक्शन) लगाए. समय के साथ ये सैंक्शन और सख्त होते गए, खासकर ईरान के न्यूक्लियर और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर अमेरिका-इजरायल ने और सख्ती दिखाई।  इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि ईरान अपने ही कमाए हुए पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है. जब कोई देश दूसरे देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, तो उसके बैंकिंग सिस्टम और इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन पर रोक लग जाती है. यही वजह है कि ईरान का तेल बेचकर कमाया गया पैसा कई देशों के बैंकों में जमा तो है, लेकिन फ्रीज है. यानी ईरान उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता।  भारत में क्यों फंसा है ईरान का पैसा? भारत का मामला भी कुछ ऐसा ही है. भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था. उस तेल के बदले जो भुगतान किया गया, वह भारतीय बैंकों में जमा हो गया. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह पैसा सीधे ईरान को ट्रांसफर नहीं किया जा सका. इसलिए यह रकम भारत में ही "फ्रीज" हो गई।  ईरानी सरकारी प्रेस टीवी के दावे के मुताबिक सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई और देशों में भी ईरान का पैसा फंसा हुआ है. रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के पास करीब 20 अरब डॉलर, इराक में लगभग 6 अरब डॉलर, जापान में 1.5 अरब डॉलर और कतर में करीब 6 अरब डॉलर फंसे हुए हैं. यूरोप के कुछ देशों और खुद अमेरिका में भी ईरान का दो अरब डॉलर फंसा है. रिपोर्ट्स की मानें तो ईरान के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के एसेट्स दुनियाभर में फ्रीज बताए जाते हैं।  ईरान के पैसे पर क्यों लगी पाबंदी? अब सवाल उठता है कि "फ्रोजन एसेट्स" आखिर होते क्या हैं? आसान भाषा में समझें तो जब किसी देश की संपत्ति चाहे वह पैसा हो, प्रॉपर्टी हो या निवेश किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा रोक दी जाती है, तो उसे फ्रीज्ड एसेट कहा जाता है. ऐसा आमतौर पर सैंक्शन, कानूनी विवाद या अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन के आरोप में किया जाता है।  ईरान के लिए यह पैसा बेहद अहम है. दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रही उसकी अर्थव्यवस्था पहले ही दबाव में है. ऐसे में अगर यह फंसा हुआ पैसा वापस मिल जाए, तो उसकी आर्थिक स्थिति को बड़ी राहत मिल सकती है. यही कारण है कि हाल की बातचीत में ईरान ने कम से कम 6 अरब डॉलर की रकम रिलीज करने की मांग को "कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर" यानी भरोसा कायम करने के तौर पर रखा है।  ईरान का पैसा क्यों रिलीज नहीं कर रहा अमेरिका? लेकिन यह इतना आसान नहीं है. अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस बात को लेकर सख्त हैं कि अगर पैसा रिलीज भी किया जाए, तो उसका इस्तेमाल किस तरह होगा. उन्हें डर है कि यह रकम कहीं ईरान के सैन्य या परमाणु कार्यक्रम में न लग जाए. इसी वजह से हर बार बातचीत अटक जाती है. हालांकि, ईरान की तरफ से कहा जाता है कि ये पैसा उनका है और इसका इस्तेमाल कैसे होगा वो खुद ये तय करेगा।  एक और दिलचस्प पहलू यह है कि भले ही सैंक्शन हट जाएं, तब भी ईरान को अपनी पूरी रकम तुरंत नहीं मिल सकती. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा पहले से ही पुराने कर्ज चुकाने या निवेश के लिए बंधा हुआ है. ऐसे में तेहरान को सिर्फ आंशिक राहत ही मिल पाएगी।  मसलन, भारत में फंसा ईरान का 652 अरब रुपये सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का बड़ा हिस्सा है. जब तक अमेरिका-ईरान के रिश्तों में सुधार नहीं होता और प्रतिबंधों में ढील नहीं मिलती, तब तक यह पैसा यूं ही बैंकों में फ्रीज रहेगा. आने वाले दिनों में अगर कोई बड़ा समझौता होता है, तभी उम्मीद की जा सकती है कि ईरान अपने पैसे का इस्तेमाल कर पाएगा। 

ईरान ने चीनी सैटेलाइट के जरिए अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, रिपोर्ट से बढ़ी चिंताएं

तेहरान  ईरान ने चीन के जासूसी सैटेलाइट का इस्तेमाल करते हुए मिडल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों की रेकी की थी। इसी के चलते उसे पूरी जानकारी मिल गई थी और फिर जंग में उसने चुन-चुनकर अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। चीनी सैटेलाइनट का यह इस्तेमाल 2024 के आखिरी दिनों में किया गया था। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने TEE-01B सैटेलाइट्स का इस्तेमाल किया था। इन्हें चीन की कंपनी 'अर्थ आई' ने तैयार किया है। इनकी सेवाओं को ईरानी सेना की एयरोस्पेस फोर्स ने खरीदा था। चीन की ओर से इन सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के कुछ दिन बाद ही ईरान ने सेवाएं ली थीं। इस बीच चीनी विदेश मंत्रालय ने ऐसी रिपोर्ट्स को खारिज किया है। उसका कहना है कि चीन पर टैरिफ लगाने के लिए ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं। इन मनगढ़ंत आरोपों का इस्तेमाल हमारे ऊपर टैरिफ लगाने के बहाने के तौर पर किया जा सकता है। चीनी मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि यदि अमेरिका ने हमारे ऊपर टैरिफ बढ़ाया तो फिर हम भी उसका जवाब देंगे। फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि उसने ईरानी सेना के लीक दस्तावेजों के अध्ययन के बाद यह जानकारी दी है। अखबार का कहना है कि ईरानी सेना के कमांडरों ने सैटेलाइट से कहा था कि वह अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों की मॉनिटरिंग करे। इसके बाद सैटेलाइट की मदद से तस्वीरें और अन्य जानकारियां हासिल की गईं। इन तस्वीरों को काफी पहले ही जुटाया गया था। इसके बाद जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए तो उसने भी जवाबी हमले किए। ईरान ने इराक, कतर, सऊदी अरब समेत कई देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। जानकारी यह भी है कि चीनी सैटेलाइट्स की रेंज में एशिया का ज्यादातर हिस्सा आता है। इसके अलावा लैटिन अमेरिका समेत कई और क्षेत्र उसकी जद में हैं। 'ट्रंप भी कह चुके मेरा इरादा चीन को टारगेट करना' बता दें कि चीन पर डोनाल्ड ट्रंप खुद ही आरोप लगा चुके हैं कि उसने ईरान को हथियारों के जरिए मदद की है। उनका कहना था कि मैंने कुछ देशों पर 50 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की जो बात कही है, वह मुख्य रूप से चीन के लिए ही है। गौरतलब है कि मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद चीन जाने वाले हैं। माना यह भी जा रहा है कि शायद अपने दौरे से पहले एक बेहतर डील के लिए चीन पर दबाव डालने की भी उनकी यह रणनीति हो सकती है।

ईरान को 12 साल लगेगा सिर्फ मरम्मत करने में, US से संघर्ष ने किया इतना नुकसान

तेहरान  अमेरिका और इजरायल के साथ हुए युद्ध से हुए नुकसान से उबरने में ईरान को 10 साल से ज्यादा का समय लगेगा। खबर है कि ईरान के सेंट्रल बैंक ने इससे जुड़ी जानकारियां सरकार के सामने रख दी हैं। साथ ही अर्थव्यवस्था को संभालने की अपील की है। कहा जा रहा है कि ईरान की अहम रिफाइनरी समेत कई जगहों को खासा नुकसान हुआ है। साथ ही मुल्क में तेजी से महंगाई बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की पहले से ही नाजुक अर्थव्यवस्था को 40 दिनों के युद्ध के दौरान जमकर नुकसान पहुंचा है। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान को भेजे गए एक आकलन में वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया है कि इस नुकसान को ठीक करने में 12 साल तक का समय लग सकता है। कितना हुआ नुकसान, महंगाई होने वाली है युद्ध के दौरान कई बड़े एयरपोर्ट्स को नुकसान पहुंचा। जबकि, तेल ठिकानों, रिफाइनरीज और पेट्रोकेमिकल संस्थानों को भी निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने चेताया है कि उत्पादन क्षमता को हुए नुकसान के चलते आने वाले महीनों में महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। राष्ट्रपति को भेजे गए आकलन में बताया गया है कि औद्योगिक इनपुट सप्लाई ऐसे ही कम बनी रही तो महंगाई में 180 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। अमेरिका से सुलह की सलाह रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दुल नसीर हेम्मती ने राष्ट्रपति से अर्थव्यवस्था को स्थिर करने की अपील की है। साथ ही उन्होंने इंटरनेट सुविधा को पूरी तरह से बहाल करने और अमेरिका के साथ समझौता करने की सलाह भी दी है। इंटरनेट ने दिया बड़ा झटका युद्ध के दौरान ईरान में लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहा था। कहा जा रहा था कि इंटरनेट बंद करने का फैसला साइबर अटैक से बचने के लिए लिया गया था। अब ईरान की डिजिटल इकोनॉमी मुल्क की जीडीपी का 5-6 प्रतिशत है। अब ऐसे में इंटरनेट के बंद होने के चलते पेमेंट सिस्टम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ठप हो गए थे। क्यों नहीं हो पाया समझौता ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने विफल शांति वार्ता के बाद सोमवार को कहा कि लंबी बैठक से कोई सबक नहीं सीखा गया। समझौते के करीब पहुंचने के बावजूद वार्ता विफल हो गई। एक्स पर पोस्ट में उन्होंने लिखा कि ईरान ने पूरी निष्ठा से इस बैठक में भाग लिया लेकिन अमेरिका की मांगे बढ़ती मांगों, लक्ष्य और नाकेबंदी के चलते ये वार्ता टूट गई। दूसरे दौर की बातचीत की कोशिश भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली ने सोमवार को कहा है कि अमेरिका कोई गैर कानूनी मांग न करे और तेहरान की शर्तों को माने, तो हम अमेरिका के साथ दूसरे दौर की वार्ता के लिए तैयार हैं। भारत में ईरानी राजदूत ने आरोप लगाया कि वार्ता के दौरान अमेरिकी पक्ष ने गैरकानूनी मांगें रखीं, जिसके कारण बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल सका। अमेरिका कीी नाकेबंदी के सवाल पर उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान की क्षमताओं से भली-भांति परिचित है। ये पता होना चाहिए कि होर्मुज ईरान के जल क्षेत्र में आता है। पश्चिम एशिया संकट पर उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में ईरान और भारत का साझा भविष्य जुड़ा है।

ट्रंप की धमकी: होर्मुज में तूफान का खतरा, ईरान पर नहीं पड़ी असर, रूस ने युद्ध में लिया कदम

वाशिंगटन पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई, जबकि पहले युद्धविराम की घोषणा की गई थी. इस असफल बातचीत के बाद हालात और बिगड़ते नजर आ रहे हैं. वार्ता फेल होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा कदम उठाते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक घेराबंदी लागू कर दी. ट्रंप ने साफ कहा कि हम किसी देश को दुनिया को ब्लैकमेल या डराने नहीं देंगे.उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर ईरान की कोई तेज हमला करने वाली नौकाएं अमेरिकी सेना के करीब आईं, तो उन्हें तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा।  हिज्बुल्ला का ऐलान हालांकि ट्रंप ने यह भी दावा किया कि बातचीत विफल होने के बाद ईरान के प्रतिनिधियों ने फिर से संपर्क किया है और अब तेहरान शांति समझौते के लिए बातचीत में लौटना चाहता है. इस बीच क्षेत्र में एक और तनावपूर्ण बयान सामने आया है. लेबनान के संगठन हिज्बुल्ला के प्रमुख नईम कासिम ने लेबनान सरकार से अपील की है कि वह अमेरिका में इजरायल के साथ होने वाली प्रस्तावित वार्ता को रद्द कर दे. हिज्बुल्ला ने कहा कि इजरायल जैसे दुश्मन देश के साथ किसी भी तरह की बातचीत को पूरी तरह खारिज करते हैं. उन्होंने इसे रद्द करने के लिए सरकार से ऐतिहासिक और साहसिक फैसला लेने की मांग की. गौरतलब है कि हिजबुल्लाह ईरान समर्थित संगठन है और 2 मार्च से इजरायल के साथ संघर्ष में शामिल है।  रूस बनना चाहता है मध्यस्थ ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध में अब रूस शांतिदूत की भूमिका निभाना चाहता है. पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस संबंध में ऑफर दिया था और अब विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अरागची से फोन पर बातचीत की. रूस की ओर से कहा गया कि सशस्त्र संघर्ष दोबारा न हो, यह बहुत जरूरी है. साथ ही रूस ने एक बार फिर साफ किया कि वह इस संकट को सुलझाने में हर संभव मदद करने के लिए पूरी तरह तैयार है।  अमेरिका बोला- फैसला ईरान को लेना है अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने कहा कि ईरान को परमाणु समझौते पर आगे बढ़ने के लिए खुद कदम उठाने होंगे. उन्होंने साफ किया कि पाकिस्तान में 21 घंटे चली बातचीत के बाद अमेरिका अब वहां से वापस आ रहा है और ईरान की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं रही. वेंस के मुताबिक आगे की बातचीत इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान कितनी गंभीरता से बातचीत में शामिल होता है. उन्होंने कहा कि अब प्रगति की जिम्मेदारी ईरान पर है और उसे यह दिखाना होगा कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाने के लिए तैयार है।  पाकिस्तान का दावा- ईरान चाहता है इस्लामाबाद में हो वार्ता इस्लामाबाद में हुई बातचीत के बाद मध्यस्थता की कोशिश करने वाले देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच मैसेज का आदान-प्रदान जारी रखा है. उनका लक्ष्य है कि दोनों देश कम से कम 45 दिन के लिए सीजफायर बढ़ाने पर राजी हो जाएं. दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने पर तो सहमत हैं, लेकिन अगली मीटिंग के एजेंडा, उद्देश्य, फॉर्मेट और जगह को लेकर मतभेद अभी भी बने हुए हैं. ईरान चाहता है कि अगली बातचीत इस्लामाबाद में हो क्योंकि वहां उसे सुविधा और पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भरोसा है. वहीं अमेरिका दूसरी जगहों पर विचार कर रहा है, जहां उसे सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स बेहतर लगते हैं. हालांकि अगर बड़े मुद्दों पर सहमति बनती है, तो बातचीत की जगह कोई बड़ी रुकावट नहीं बनेगी।   2 दिन बाद फिर शुरू होगी ईरान-अमेरिका वार्ता ईरान-अमेरिका युद्ध: एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच एक नई दौर की बातचीत जल्द ही गुरुवार तक हो सकती है. अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि हाल ही में इस्लामाबाद में हुई उच्चस्तरीय वार्ता भले ही किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची, लेकिन बातचीत के दरवाजे खुले रहे. इसका मतलब है कि दोनों देश अब भी कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं. आने वाली बातचीत में पिछले मुद्दों पर फिर चर्चा हो सकती है और समझौते की संभावना बनी हुई है।   होर्मुज नाकेबंदी हटाना चाहता है सऊदी, ट्रंप से की बात अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक सऊदी अरब, अमेरिका पर दबाव डाल रहा है कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नौसैनिक घेराबंदी तुरंत हटा ले और दोबारा बातचीत की मेज पर लौट आए. सऊदी और अन्य खाड़ी देशों को डर है कि अगर अमेरिका ने घेराबंदी जारी रखी तो ईरान बदला लेने के लिए उनके वैकल्पिक रास्ते भी बंद कर सकता है. ऐसी स्थिति उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगी. होर्मुज के हाहाकार के बाद भी उनका तेल अब तक दूसरे रास्तों से निकल रहा था लेकिन ट्रंप के इस कदम से वो भी खतरे में आ जाएंगे।  होर्मुज पर चीन ने अमेरिका को हड़काया – हमारे मामले से दूर रहो  होर्मुज ब्लॉकेड पर अब चीन भी भड़क उठा है. चीन ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी लगाने के ट्रंप के फैसले को लेकर अमेरिका को चेताया है. चीन ने अमेरिका को आगाह किया कि वह ईरान के साथ चीन के संबंधों में दखल न दे. होर्मुज ब्लॉकेड पर चीन की अमेरिका को सीधी-सीधी पहली प्रतिक्रिया है. चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून ने कहा कि बीजिंग तेहरान के साथ अपने व्यापार और ऊर्जा संबंधी वादों को पूरा करेगा. उन्होंने कहा कि चीनी जहाज इस इलाके में अपना काम जारी रखेंगे और बाहरी दखल को बर्दाश्त नहीं करेंगे।  लेबनान-इजरायल के बीच वार्ता की शुरुआत इजरायल-लेबनान वार्ता: अमेरिका में आज इजराइल और लेबनान के बीच बातचीत की शुरुआत होगी. अमेरिकी राजदूत येचिएल लीटर और लेबनान की राजदूत नादा हमादेह मोआवद की आज शांति के लिए बातचीत होगी. पिछले हफ्ते पहली बार दोनों देशों के राजदूतों के बीच फोन पर दशकों बाद बातचीत हुई थी. 1983 में अंतिम बार दोनों देशों के बीच आखिरी और सीधी बातचीत हुई थी, हालांकि अप्रत्यक्ष समझौते और अप्रत्यक्ष वार्ता होती रही है. आज अमेरिका की मध्यस्थता में यह बातचीत होनी है. ये बात दिलचस्प है क्योंकि इजरायल-लेबनान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध तक नहीं हैं।  होर्मुज की नाकेबंदी कर रहा अमेरिका, ईरान को दी धमकी … Read more