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ईरान पर हमले की आशंकाओं के बीच पहुंचा US एयरक्राफ्ट

वॉशिंगटन. अमेरिका का USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट मिडल ईस्ट पहुंच गया है। इस एयरक्राफ्ट में तीन गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर भी हैं। कहा जा रहा है कि इस एयरक्राफ्ट के पहुंचने से ईरान पर हमला करने की अमेरिका की क्षमता में इजाफा हो जाएगा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार इस एयरक्राफ्ट को क्षेत्र में स्थिरता बढ़ाने और सुरक्षा की स्थिति मजबूत करने के लिए भेजा गया है। ईरान में हजारों प्रदर्शनकारियों का कत्ल किए जाने के आरोप लगाते हुए अमेरिका आक्रामक है। उसका कहना है कि यदि ईरान ऐसे ही प्रदर्शनकारियों को सजाएं देता रहा तो हम सैन्य दखल दे सकते हैं। इस बीच ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई शासन ने भी अमेरिका को बड़ी चुनौती देते हुए उसे कमजोर बताया है। ईरान के एक सीनियर सैन्य अधिकारी ने सोमवार को कहा कि अमेरिका के बूते की बात नहीं है कि वह ईरान पर सरप्राइज अटैक करे या फिर निर्णायक हमला कर सके। ईरान की Mehr न्यूज एजेंसी के अनुसार अधिकारी ने कहा कि अमेरिका का ऐसा आकलन गलत है कि वह हमला कर सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी कमजोर आकलन के आधार पर अमेरिका यदि हमला करता है और सीमित कार्रवाई जैसी जो बात वह कर रहा है, वैसा कुछ किया तो चीजें हाथ से निकल जाएंगी। हिजबुल्लाह के नेता नईम कासिम ने इस बीच ईरान के समर्थन का ऐलान कर दिया है। उनका कहना है कि यदि अमेरिका ने कोई कदम उठाया तो हम ईरान के साथ रहेंगे और जवाबी कार्रवाई करेंगे। इस बीच हिजबुल्लाह के ऐलान को लेकर लेबनान में ही मतभेद हैं। लेबनान के सांसद और काताएब पार्टी के नेता सैमी गेमायेल ने कहा कि हमें जंग में झोंकने की जरूरत नहीं है। हिजबुल्लाह से बोला लेबनान- आपको सुसाइड करनी है तो करिए उन्होंने हिजबुल्लाह को चेतावनी दी और कहा कि आपको जो करना है करिए, लेकिन इसमें लेबनान को दांव पर लगाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने हिजबुल्लाह के ऐलान को सुसाइड जैसा बताया। उन्होंने कहा कि यदि आप अपने बॉस यानी ईरान को बचाना चाहते हैं तो जाएं। आप सुसाइड करना चाहते हैं तो करें, लेकिन लेबनान को इससे दूर रखें। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबियों का कहना है कि ऐसी कई रिपोर्ट्स मिली हैं, जिनमें कहा गया है कि ईरान की सरकार कमजोर हो रही है।

ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से युद्ध की आशंका, ट्रंप के पास 50 संभावित ठिकानों की जानकारी

तेहरान क्या अमेरिका और ईरान के बीच जंग होने वाली है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि पश्चिम एशिया में फिलहाल हालात ऐसे ही बनते दिख रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन की ओर से अपने नागरिकों को ईरान न जाने की सलाह दी गई है। इसके अलावा ईरान ने अपना एयरस्पेस कमर्शल फ्लाइट्स के लिए बंद कर दिया है। इससे साफ है कि दोनों तरफ से सतर्कता बरती जा रही है और तनाव को देखते हुए जंग की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो लगातार ईरान को जंग और सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। वहीं ईरान का कहना है कि ऐसी किसी भी स्थिति में जो आग भड़केगी वह पूरे इलाके को चपेट में लेगी। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति के हवाले से एनसीबी न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ट्रंप लंबी जंग नहीं चाहते हैं। उन्होंने अपने सुरक्षा सलाहकारों से ईरान के खिलाफ ऐसे ऐक्शन पर विचार करने को कहा है, जिससे एक निर्णायक कदम उठाया जा सके। वह नहीं चाहते कि ईरान के खिलाफ महीनों लंबी जंग चले। ऐसे में संभावना है कि अचानक ही ईरान पर कोई बड़ा अटैक हो सकता है। अमेरिकी नहीं चाहता कि वह ईरान के खिलाफ किसी भी तरह के जमीनी संघर्ष में शामिल हो। हालांकि अमेरिकी सलाहकार इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि किसी एक हमले से ईरान की कमर तोड़ी जा सकती है। उनकी चिंता यह है कि ईरान भी हमले का जवाब देगा और मिडल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों को नुकसान पहुंच सकता है। इराक, सीरिया समेत कई देशों में अमेरिका के ठिकाने हैं, जो ईरान के टारगेट में आ सकते हैं। इसके अलावा ईरान को जवाब देने के लिए इस इलाके में अमेरिका के पास बहुत ज्यादा एसेट्स भी नहीं हैं। इस बीच खबर है कि ट्रंप प्रशासन की ओर से छोटे और टारगेट अटैक किए जा सकते हैं। इसके बाद यदि ईरान की प्रतिक्रिया आती है तो फिर जवाबी कार्रवाई की जाएगी। अमेरिका यह नहीं चाहता कि वह खुद बड़ा अटैक करे। ऐसी स्थिति में ईरान को थोड़ा उकसाने के बाद ही संघर्ष शुरू करने की तैयारी है। ट्रंप के पास मौजूद 50 टारगेट वाली ‘हिट लिस्ट’ में ईरान के कौन से ठिकाने शामिल हैं? डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, एक अमेरिकी थिंक टैंक (UANI) ने राष्ट्रपति ट्रंप को 50 ठिकानों की एक गोपनीय लिस्ट सौंपी है. इस ‘हिट लिस्ट’ में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के सबसे अहम हेडक्वार्टर शामिल हैं. तेहरान का ‘थारुल्लाह हेडक्वार्टर’ इस लिस्ट में सबसे ऊपर बताया जा रहा है. यह जगह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ होने वाली दमनकारी कार्रवाइयों का मुख्य केंद्र है.     लिस्ट में तेहरान के चार मुख्य उप-मुख्यालय भी शामिल हैं.     उत्तर और उत्तर-पश्चिम तेहरान के लिए ‘कुद्स सब-हेडक्वार्टर’ टारगेट पर है.     दक्षिण-पश्चिम तेहरान के लिए ‘फतह सब-हेडक्वार्टर’ को चुना गया है.     पूर्वोत्तर के लिए ‘नस्र’ और दक्षिण-पूर्व के लिए ‘गदर’ मुख्यालय लिस्ट में हैं.     इसके अलावा 23 क्षेत्रीय बासिज बेस भी अमेरिकी रडार पर आ चुके हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरानी प्रदर्शनकारियों से कहा है कि ‘मदद रास्ते में है‘. ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि लोगों की हत्या करने वाले अपनी खैर मनाएं. सीनेटर टॉम कॉटन ने भी ईरानी शासन की तुलना गंभीर बीमारियों से की है. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि कूटनीतिक धैर्य अब पूरी तरह खत्म हो चुका है. भारत की एडवाइजरी- तुरंत ईरान से निकलें हमारे नागरिक इस बीच भारत ने भी अपने सभी नागरिकों को सलाह दी है कि वे तत्काल ईरान से निकल जाएं। करीब 10 हजार भारतीय नागरिक ईरान में हैं। इनकी सुरक्षा चिंताओं को लेकर भारत ने यह आदेश दिया है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास की ओर से यह एडवाइजरी जारी की गई है। फिलहाल दुनिया भर की नजरें इस हालात पर हैं। चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इजरायल भी इस जंग में कूदने की बात कर रहा है। वहीं ईरान का कहना है कि अमेरिकी हमले के जवाब में हम इजरायल को टारगेट करेंगे।

ईरान का आरोप: ट्रंप और नेतन्याहू को किलर बताया, 2500 मौतों का जिम्मेदार बना अमेरिका और इज़राइल

तेहरान  ईरान की सड़कों पर हंगामा जारी है. कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच भिडंत हो रही है. इस बीच ईरान में चल रहे प्रदर्शनों और टकराव की वजह से मरने वालों की संख्या 2500 को पार कर गई है. कई दिनों के बाद ईरान के लोग दूसरे देशों में अपने रिश्तेदारों को फोन कर पाने में सक्षम हो पा रहे हैं. इसके साथ ही वहीं की खौफनाक हकीकत सामने आ रही है.  ईरान में अबतक मरने वालों की संख्या 2571 हो गई है. अमेरिका की मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार बुधवार सुबह तक मरने वालों की संख्या कम से कम 2,571 हो गई थी. यह आंकड़ा कई दशकों में ईरान में किसी भी दूसरे विरोध प्रदर्शन या अशांति में हुई मौतों की संख्या से कहीं ज़्यादा है. और  देश की 1979 की इस्लामिक क्रांति के दौरान फैली अराजकता की याद दिलाता है. पहला हत्यारा ट्रंप है… हालांकि ईरान का प्रशासन किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं दिखता है. ईरानी अधिकारियों ने एक बार फिर से अमेरिकी ट्रंप को कार्रवाई न करने की चेतावनी दी है. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने अमेरिकी रवैये पर जवाब देते हुए लिखा, 'हम ईरान के लोगों के मुख्य हत्यारों के नाम बताते हैं: 1- ट्रंप 2- इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू." समाचार एजेंसी एपी के अनुसार ईरान के सरकारी टेलीविजन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मौतों की पुष्टि की. एक अधिकारी के हवाले से सरकारी टीवी ने कहा कि मुल्क में "बहुत सारे लोग शहीद" हुए हैं. विद्रोहियों ने खामेनेई के लिए मौत की सजा मांगी ये प्रदर्शन दिसंबर के आखिर में ईरान की खराब अर्थव्यवस्था के गुस्से में शुरू हुए और जल्द ही यहां की मजहबी शासन प्रणाली इसके निशाने पर आ गई. राजधानी में लोग सर्वोच्च धार्मिक नेता खामेनेई की मौत की मांग करने नारे लगा रहे हैं और तस्वीरें बना रहे हैं. ईरान में इस कथित 'अपराध' के लिए मौत की सजा मुकर्रर की जाती है. इस बीच अमेरिका लगातार प्रदर्शनकारियों के साथ अपना सपोर्ट जता रहा है. मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा, "ईरानी देशभक्तों, विरोध करते रहो- अपनी संस्थाओं पर कब्जा करो." ट्रंप ने कहा कि था कि उन्होंने सभी ईरानी अधिकारियों के साथ तबतक के लिए बातचीत रोक दी है जबतक इन हत्याओं को रोका नहीं जाता है. उन्होंने कहा कि ईरान को जल्द मदद मिलने वाली है. हालांकि घंटों बाद ट्रंप ने रिपोर्टर्स से कहा कि उनकी सरकार "उसी हिसाब से" कार्रवाई करने से पहले मारे गए प्रदर्शनकारियों की संख्या पर एक सही रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही है. ट्रंप की मदद आ रही है ट्रंप ने ईरानी सुरक्षा बलों के बारे में कहा, "मुझे लगता है कि वे बहुत बुरा बर्ताव कर रहे हैं, लेकिन यह कन्फर्म नहीं है." इस बीच ईरानी सत्ता के रुख में कोई नरमी नहीं दिख रही है. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने अमेरिका के रवैये पर जवाब देते हुए लिखा: "हम ईरान के लोगों के मुख्य हत्यारों के नाम बताते हैं: 1- ट्रंप 2- इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू." ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल देश की सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण संस्था है जो राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा नीतियों का निर्धारण करती है. यह 1989 में संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत स्थापित हुई. इसके अध्यक्ष ईरान के राष्ट्रपति होते हैं, लेकिन इसके सभी निर्णय सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई लेते हैं. तेहरान के फोन लाइन खुले समाचार एजेंसी एपी के अनुसार लगभग 5 दिनों के बाद फोन लाइन खुलने के बाद तेहरान के लोग मुल्क से बाहर कॉल कर रहे हैं. एक ईरानी चश्मदीद ने सेंट्रल तेहरान में भारी सुरक्षा, जले हुए सरकारी भवन, टूटे हुए ATM और कम राहगीरों के बारे में बताया. इस बीच लोग इस बात को लेकर चिंतित थे कि आगे क्या होगा जिसमें अमेरिका के हमले की संभावना भी शामिल थी. अपनी सुरक्षा की चिंता के कारण सिर्फ़ अपना पहला नाम बताने वाले दुकानदार महमूद ने कहा, "मेरे ग्राहक ट्रंप की प्रतिक्रिया के बारे में बात करते हैं और सोचते हैं कि क्या वह इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ़ मिलिट्री हमला करने की योजना बना रहे हैं." "मुझे नहीं लगता कि ट्रंप या कोई दूसरा विदेशी देश ईरानियों के हितों की परवाह करता है." रेजा एक टैक्सी ड्राइवर जिसने सिर्फ़ अपना पहला नाम बताया, ने कहा कि कई लोगों के मन में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. उन्होंने कहा, "लोग – खासकर युवा निराश हैं, लेकिन वे विरोध प्रदर्शन जारी रखने की बात कर रहे हैं."

ईरान में उथल-पुथल, US ने नागरिकों को निकलने को कहा , मलाला का महिलाओं को समर्थन संदेश

तेहरान   ईरान इस समय गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. करीब 15 दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं. इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर को राजधानी तेहरान से हुई थी, जो देखते ही देखते पूरे देश में फैल गए. ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक शुरुआत में आर्थिक बदहाली, महंगाई और बेरोजगारी को लेकर उठी आवाजें अब व्यापक असंतोष का रूप ले चुकी हैं. एजेंसी का दावा है कि ये प्रदर्शन अब ईरान के 186 शहरों और कस्बों तक पहुंच चुके हैं. अमेरिका में स्थित एक मानवाधिकार संगठन के मुताबिक सुरक्षा बलों की कार्रवाई में अब तक लगभग 646 लोगों की मौत हो चुकी है, हालांकि इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं हो पाई है. इस घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं भी तेज होती जा रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अमेरिका ईरान में हस्तक्षेप के लिए कड़े विकल्पों पर विचार कर रहा है. ट्रंप के बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. वहीं ईरान की ओर से सख्त लेकिन संतुलित रुख सामने आया है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि ईरान का किसी पर सैन्य कार्रवाई करने का इरादा नहीं है, लेकिन अगर देश पर हमला हुआ तो वह युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है. इससे जुड़ी हुई हर अपडेट हम आपको दे रहे हैं, तो लगातार हमारे साथ बने रहिए.   ईरान में हालात बिगड़े, अमेरिका ने अपने नागरिकों से कहा ‘तुरंत ईरान छोड़ दें’ अमेरिका ने ईरान में चल रहे हालात के बीच अपने नागरिकों से कहा है कि वे देश छोड़ दें. अमेरिका का कहना है कि प्रदर्शन हिंसक भी हो सकते हैं. ऐसे में गिरफ्तारियां और लोगों के घायल होने का खतरा है. सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, कई सड़कें बंद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट प्रभावित है और इंटरनेट भी कई जगह बंद कर दिया गया है. ईरान सरकार ने मोबाइल, लैंडलाइन और देश के इंटरनेट नेटवर्क पर पाबंदी लगा रखी है और एयरलाइंस ने ईरान आने-जाने वाली उड़ानें रद्द या सीमित कर दी हैं. ऐसे में अमेरिकी वर्चुअल एंबेसी ने अपने नागरिकों को चेतावनी दी है कि इंटरनेट बंद रह सकता है, इसलिए दूसरे तरीके से संपर्क की तैयारी रखें. अगर सुरक्षित हो तो ईरान छोड़कर जमीन के रास्ते आर्मेनिया या तुर्की जाने पर विचार करें. उपद्रव के बीच मलाला यूसुफजई का क्या संदेश नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ये विरोध अचानक नहीं हुए। ईरान में सरकार ने बहुत पहले से ही लड़कियों और महिलाओं की आजादी पर सख्त पाबंदियां लगा रखी हैं। खासकर शिक्षा में उन्हें बहुत कम अधिकार मिलते हैं। उन्होंने कहा, ‘दुनिया की बाकी लड़कियों की तरह ईरानी लड़कियां भी सम्मान और गरिमा के साथ जीना चाहती हैं। वे सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी में अपनी मर्जी से फैसले लेना चाहती हैं।’ मलाला यूसुफजई ने कहा, ‘ईरान के लोग कई सालों से इस अन्याय के खिलाफ बोलते आ रहे हैं। लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर भी उनकी आवाज दबा दी जाती रही है। ये नियम सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं हैं। पूरे समाज में महिलाओं पर अलग तरह के नियंत्रण हैं – जैसे अलग-अलग बैठना, हर समय निगरानी रखना और गलती करने पर सजा मिलना।’ उन्होंने कहा कि इन सबकी वजह से महिलाओं को अपनी पसंद की जिंदगी जीने, फैसले लेने और सुरक्षित महसूस करने का हक नहीं मिल पाता। ईरानी महिलाएं और लड़कियां अब अपनी आवाज सुनाई देने और अपना भविष्य खुद तय करने की मांग कर रही हैं। ट्रंप की प्रेस सेक्रेटरी बोलीं – वे जरूरी समझेंगे, तो भेज देंगे सेना व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक बड़ी खासियत यह है कि वे हमेशा सभी विकल्प खुले रखते हैं. उन्होंने बताया कि हवाई हमले भी उन कई विकल्पों में शामिल हैं, जिन पर अमेरिकी राष्ट्रपति विचार कर सकते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप के लिए कूटनीति हमेशा पहली पसंद रहती है. लेविट के मुताबिक राष्ट्रपति ने पिछली रात कहा था कि ईरानी सरकार सार्वजनिक रूप से जो बयान दे रही है, वह उन संदेशों से अलग हैं, जो अमेरिकी प्रशासन को निजी तौर पर मिल रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप जरूरत पड़ने पर सैन्य विकल्पों का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकते. अगर और जब वे इसे जरूरी समझेंगे, तो सेना का सहारा लेने से पीछे नहीं हटेंगे. लेविट ने कहा कि यह बात ईरान से बेहतर कोई नहीं जानता. ईरानी महिलाओं के समर्थन में क्या कहा मलाला यूसुफजई ने साफ कहा कि वे ईरान की जनता और खासकर लड़कियों के साथ खड़ी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान का भविष्य ईरान के लोग ही खुद बनाएं और इसमें महिलाओं व लड़कियों की अहम भूमिका हो। कोई बाहर का देश या दमनकारी सरकार इसमें दखल न दे। मालूम हो कि अभी ईरान में महंगाई, बेरोजगारी और महिलाओं के अधिकारों पर रोक के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। मलाला की यह बात दुनिया भर में ईरानी महिलाओं के संघर्ष को मजबूत समर्थन दे रही है।     तुरंत ईरान छोड़ दें और ऐसा प्लान बनाएं जिसमें अमेरिकी सरकार की मदद पर निर्भर न रहना पड़े.     अगर नहीं निकल सकते, तो किसी सुरक्षित जगह पर रहें और अपने पास खाना, पानी, दवाइयां और जरूरी सामान जमा करके रखें. अमेरिका ने ईरान पर टैरिफ बम फोड़ा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में ईरान पर और दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ बम फोड़ दिया है. उन्होंने ईरान की अर्थव्यवस्था को चूर करने के लिए उन देशों पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाने का ऐलान किया है, जो ईरान के साथ मौजूदा हालात में कारोबार कर रहे हैं. अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोस्ट करके उन्होंने ये जानकारी दी कि आगे ईरान और उसके साझेदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जाएगा. हालांकि अभी इस बात की जानकारी नहीं दी गई है कि इसे … Read more

ईरान में प्रदर्शनों में मृतकों की संख्या 544 तक पहुंची, पेजेशकियन की नागरिकों से शांति की अपील

तेहरान  ईरान में पिछले दो हफ्तों से सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शन जारी है. इस दौरान कम से कम 544 प्रदर्शनकारी मारे गए जिनमें आठ बच्चे भी शामिल हैं. सीएनएन ने ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स के हवाले से ये रिपोर्ट दी है. विरोध प्रदर्शन 28 दिसंबर को बढ़ती महंगाई और आर्थिक मुश्किलों के खिलाफ शुरू हुए थे, लेकिन जल्द ही ये पूरे देश में तनावपूर्ण अशांति में बदल गए, जिसमें प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुई. विरोध प्रदर्शन कई शहरों में फैल गए. अधिकारी गिरफ्तारियों, कार्रवाई और बल प्रयोग करके जवाब दे रहे हैं. मानवाधिकार समूहों ने बार-बार हताहतों की संख्या और प्रदर्शनकारियों के साथ किए जा रहे बर्ताव पर चिंता जताई. ईरानी अधिकारियों ने अशांति के लिए दंगाइयों और विदेशी दखलअंदाजी को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि यह भी कहा है कि जायज आर्थिक शिकायतों को दूर किया जाएगा. अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने इस स्थिति पर खुलकर बात की है. पोप लियो ने अपनी एंजेलस प्रार्थना के बाद वेटिकन में भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि वह ईरान में शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं. उन्होंने कहा, 'मेरे विचार इन दिनों मध्य पूर्व में खासकर ईरान और सीरिया में जो हो रहा है, उस पर हैं, जहाँ लगातार तनाव के कारण कई लोगों की मौत हो रही है. मुझे उम्मीद है और मैं प्रार्थना करता हूँ कि पूरे समाज की भलाई के लिए बातचीत और शांति को धैर्यपूर्वक बढ़ावा दिया जाएगा.' फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने भी ईरानी अधिकारियों से हिंसा से बचने की अपील की और एक्स पर पोस्ट किया, 'आक्रामकता बंद होनी चाहिए. हम गलत तरीके से हिरासत में लिए गए सभी प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की मांग करते हैं.' आयरलैंड की विदेश मंत्री हेलेन मैकएन्टी ने कहा कि वह ईरान से आ रही रिपोर्टों से 'बहुत चिंतित' हैं. साथ ही इस बात पर जोर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण सभा और जानकारी तक पहुंच का पूरी तरह से सम्मान किया जाना चाहिए. उन्होंने ईरानी अधिकारियों से आगे हिंसा न करने और प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने की भी अपील की.   इजराइल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने कहा कि इजराइल ईरानी लोगों का समर्थन करता है और एक्स पर कहा. 'हम आजादी के लिए ईरानी लोगों के संघर्ष का समर्थन करते हैं और उन्हें सफलता की शुभकामनाएं देते हैं.' इजराइल डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने रविवार को कहा कि वह ईरान में हो रहे घटनाक्रम पर करीब से नज़र रख रही है, क्योंकि विरोध प्रदर्शन तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर गए हैं. आईडीएफ के एक प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, 'ये विरोध प्रदर्शन ईरान का अंदरूनी मामला है. फिर भी आईडीएफ रक्षात्मक रूप से तैयार है और लगातार अपनी क्षमताओं और ऑपरेशनल तैयारी में सुधार कर रही है.'  सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भी रविवार को बाद में एक सीमित सुरक्षा परामर्श करने की उम्मीद है, जिसमें ईरान और लेबनान के घटनाक्रम एजेंडे में होंगे. जापान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी ईरान की स्थिति पर एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि जापान शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ किसी भी तरह की ताकत के इस्तेमाल के खिलाफ हैं. अशांति के बीच अमेरिकी अधिकारियों ने सीएनएन को बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद ईरान में मिलिट्री विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, और उन्होंने तेहरान को प्रदर्शनकारियों पर जानलेवा बल का इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी है. ईरानी अटॉर्नी जनरल मोहम्मद मोवाहेदी आजाद ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सख्त होगी. तस्नीम समाचार एजेंसी के अनुसार, उन्होंने कहा कि कार्रवाई बिना किसी नरमी, दया या रियायत के की जाएगी. उन्होंने कहा, 'सभी दंगाईयों पर आरोप एक जैसे हैं.' इस बीच, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने नागरिकों से अपील की कि वे उस चीज में शामिल न हों जिसे उन्होंने हिंसक अशांति बताया. टेलीविजन पर दिए गए भाषण में उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध और हिंसा के बीच साफ अंतर है. उन्होंने कहा, 'अगर लोगों को कोई चिंता है, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनकी चिंताओं को दूर करें, लेकिन सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि हम दंगाइयों के एक समूह को आकर पूरे समाज को बाधित करने की अनुमति न दें.' पेजेशकियन ने आगे कहा, 'यह किस तरह का विरोध है? यह किस तरह का संदेश है, जो लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर रहा है?' उन्होंने आगे कहा, 'अमेरिका और इजराइल वहाँ बैठे हैं और उन्हें जाने के लिए कह रहे हैं और (कह रहे हैं) 'हम तुम्हारे साथ हैं'. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कहा कि वे ईरान के अंदरूनी मामलों पर टिप्पणी करने के बजाय "अपने देश को संभालें'. सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किए गए एक संदेश में खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर ईरान में अशांति को बढ़ावा देने और अपने देश की गंभीर समस्याओं को हल करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया. खामेनेई ने लिखा, 'अमेरिका के राष्ट्रपति ने घोषणा की कि अगर ईरानी सरकार ऐसा या वैसा करती है, तो वह दंगाइयों का साथ देंगे. दंगाइयों ने उन पर उम्मीदें लगा रखी हैं. अगर वह इतने काबिल हैं, तो उन्हें अपने देश को संभालना चाहिए.'

ईरान के राष्ट्रपति ने अल्लाह के खिलाफ युद्ध बताकर दी सजा-ए-मौत की चेतावनी

तेहरान. ईरान में आर्थिक तंगी और दमनकारी नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब अपने दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुके हैं। इस बीच, ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। शनिवार को ईरान के अटॉर्नी जनरल ने प्रदर्शनकारियों को 'अल्लाह का शत्रु' घोषित करते हुए उन्हें फांसी की सजा देने की धमकी दी है। ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद मोवहेदी आजाद ने सरकारी टेलीविजन पर बयान देते हुए कहा कि जो कोई भी इन प्रदर्शनों में शामिल है या दंगाइयों की मदद कर रहा है, उसे 'मोहारेबेह' (अल्लाह के खिलाफ युद्ध) का दोषी माना जाएगा। ईरानी कानून के तहत इस अपराध की सजा सिर्फ मौत है। उन्होंने निर्देश दिए कि बिना किसी देरी और दया के इन लोगों के खिलाफ मुकदमे चलाए जाएं। सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने भी संकेत दिए हैं कि देशव्यापी स्तर पर अब बड़ा क्रैकडाउन शुरू किया जा सकता है। ईरान ने बाहरी दुनिया से संपर्क काटने के लिए इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय फोन लाइनों को पूरी तरह बंद कर दिया है। इसके बावजूद, मानवाधिकार संस्थाओं से मिली जानकारी के अनुसार हालात बेहद चिंताजनक हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता समाचार एजेंसी (HRANA) के अनुसार, अब तक कम से कम 72 लोग मारे गए हैं। प्रदर्शनों के दौरान 2,300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। ईरानी मीडिया के अनुसार, गचसरन में बासिज बल के 3 सदस्य मारे गए हैं और हमदान, बंदर अब्बास, गिलान और मशहद में भी सुरक्षा अधिकारियों की मौत की खबरें हैं। ट्रंप सरकार की ईरान को सख्त चेतावनी अमेरिका ने ईरान के प्रदर्शनकारियों का खुला समर्थन किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, "अमेरिका ईरान के बहादुर लोगों के साथ खड़ा है।" वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि वह राष्ट्रपति ट्रंप के साथ खेल न खेलें। जब वे कुछ कहते हैं, तो उसका मतलब होता है। क्या है इस गुस्से की वजह? प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर 2025 को ईरान की गिरती अर्थव्यवस्था के कारण हुई थी। ईरानी मुद्रा रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर 1.4 मिलियन (14 लाख) प्रति डॉलर पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और परमाणु कार्यक्रम की वजह से आम जनता दाने-दाने को मोहताज है। अब यह आर्थिक गुस्सा सीधे तौर पर देश की धार्मिक सत्ता को चुनौती देने वाले राजनीतिक विद्रोह में बदल गया है।

‘दुनिया के सबसे अमीर बच्चे’ को बुला रहा पूरा ईरान?

तेहरान. एक हाथ में रईसी थी, दूसरे में तन्हाई… और साथी था सिर्फ एक कुत्ता। 1970 के दशक की उस वायरल खबर का नायक आज ईरान की सड़कों पर गूंज रहे नारों का केंद्र बन गया है। आज ईरान की सड़कें एक बार फिर आग उगल रही हैं। दिसंबर 2025 के आखिर से शुरू हुए ये विरोध प्रदर्शन अब एक राष्ट्रीय क्रांति में बदलते प्रतीत हो रहे हैं। आर्थिक संकट, महंगाई, रियाल की रिकॉर्ड गिरावट और इस्लामिक रिपब्लिक की दमनकारी नीतियों से तंग आकर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन इस बार सबसे ज्यादा गूंज रहा है एक नाम- रजा पहलवी का। वे ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे और ईरान के 'क्राउन प्रिंस' हैं। तो सवाल ये है कि वो शख्स, जिसे बचपन में दुनिया का सबसे अमीर बच्चा कहा जाता था और जिसका सबसे करीबी दोस्त सिर्फ एक कुत्ता था, वह आज 47 साल के निर्वासन के बाद भी ईरान के दिलों में क्यों जिंदा है? वह पुरानी तस्वीर और 'सोने का पिंजरा' 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में जन्मे रजा पहलवी को जन्म से ही क्राउन प्रिंस का दर्जा मिला। उनके पिता मोहम्मद रजा शाह उस वक्त ईरान के शक्तिशाली शासक थे- तेल की कमाई से देश अमीर हो रहा था और शाह का निजी साम्राज्य अरबों डॉलर का था। रजा को फ्रेंच गवर्नेस ने पाला, निजी पैलेस स्कूल में पढ़ाई हुई, बॉडीगार्ड्स 24/7 साथ रहते थे। लेकिन ये वैभव अकेलेपन के साथ आया। हाल ही सोशल मीडिया पर ईरान की एक पत्रिका की कटिंग वायरल हो रही है। यह 1978 के आसपास की है। उस समय रजा पहलवी की उम्र महज 17 साल थी। हेडलाइन में लिखा है- दुनिया का सबसे अमीर बच्चा, जिसका दोस्त सिर्फ उसका कुत्ता है। उस दौर में रजा पहलवी के पास वह सब कुछ था जो एक इंसान सपने में भी नहीं सोच सकता। अपना हवाई जहाज, कस्टम मेड कारें, महलों में सुरक्षा गार्ड और बेहिसाब दौलत। लेकिन उस रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास जो नहीं था, वह था- 'सच्चा दोस्त'। उनका सबसे करीबी साथी उनका स्पैनियल कुत्ता 'जूडी' था। यह उस दौर की बात है जब ईरान को मिडिल-ईस्ट का पेरिस कहा जाता था और रजा पहलवी उसके भविष्य के बादशाह थे। 1979 की क्रांति और सब कुछ खो जाना इस तस्वीर के छपने के कुछ ही समय बाद, रजा पहलवी की किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि किसी फिल्मी कहानी को भी मात दे दी। 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई। उनके पिता, शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़ना पड़ा। वह लड़का, जो 'दुनिया का सबसे अमीर बच्चा' था, अचानक 'दुनिया का सबसे हाई-प्रोफाइल रिफ्यूजी' बन गया। महलों की जगह निर्वासन ने ले ली। जिस देश पर उन्हें राज करना था, वहां उनके परिवार के लिए मौत के फरमान जारी हो गए। रजा पहलवी ने अपनी जवानी अमेरिका में एक निर्वासित राजकुमार के रूप में बिताई, अपने देश को दूर से जलते हुए देखते रहे। आज पूरा ईरान उन्हें क्यों बुला रहा है? कहानी का सबसे अहम मोड़ अब, यानी 2023-2025 के बीच आया है। आज ईरान की सड़कों पर, हिजाब विरोधी प्रदर्शनों में और सरकार विरोधी रैलियों में एक नारा अक्सर गूंजता है- रजा शाह, रूहता शाद (रजा शाह, तुम्हारी आत्मा को शांति मिले) और ए शहजादे, वापस आओ। ईरान में प्रदर्शन दिसंबर 2025 में तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए, जहां व्यापारियों ने महंगाई के खिलाफ हड़ताल की। जल्द ही ये पूरे देश में फैल गए- तेहरान, शिराज, इस्फहान, मशहद, यहां तक कि छोटे शहरों में। सरकार ने इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद कर दीं, लेकिन लोग नहीं रुके। मौतें सैकड़ों में हैं, हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन नारे अब सिर्फ आर्थिक नहीं- पूरी तरह ब्रांडाजन के हैं। और इसी बीच रजा पहलवी ने वीडियो मैसेज जारी किए: 6 जनवरी को पहली बार उन्होंने लोगों से शाम 8 बजे एक साथ नारे लगाने को कहा। 8-9 जनवरी को फिर फ्रेश कॉल दिया- शहर के सेंटर कब्जाने, पुराना शेर और सूरज झंडा लहराने और शहरों पर कब्जा करने की अपील। उन्होंने कहा- मैं जल्द ही अपनी मातृभूमि में वापस आऊंगा। प्रदर्शनकारियों ने उनकी कॉल पर अमल किया- लाखों सड़कों पर उतरे, और नारे सिर्फ मौत बर खामनेई नहीं, बल्कि पहलवी वापस आएगा भी लगे। इसके पीछे के प्रमुख कारण: आर्थिक बदहाली: ईरान की करेंसी (रियाल) रसातल में जा चुकी है। महंगाई चरम पर है। लोगों को वह दौर याद आ रहा है जब शाह के राज में ईरान की इकोनॉमी मजबूत थी और तेल का पैसा विकास में लग रहा था। धार्मिक कट्टरता से उब चुकी जनता: महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुए आंदोलनों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान की नई पीढ़ी (Gen Z) इस्लामी गणतंत्र के सख्त नियमों (जैसे अनिवार्य हिजाब) को नहीं मानती। वे उस सेक्युलर और आधुनिक ईरान की कल्पना करते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व पहलवी परिवार करता था। नेतृत्व का अभाव: ईरान में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ है। ऐसे में रजा पहलवी, जो अब 63 वर्ष के हैं, एक जाने-पहचाने चेहरे और 'एकता के प्रतीक' के रूप में उभरे हैं। वे लोगों के लिए उस 'खोए हुए सुनहरे दौर' की निशानी हैं। लेकिन क्या सब चाहते हैं राजशाही? नहीं। कुछ विरोधी कहते हैं कि शाह के दौर में भी दमन था (SAVAK की बदनामी), असमानता बढ़ी थी। कुछ नारे लगाते हैं: न शाह, न मुल्ला। ईरानी सेना और शासन ने प्रदर्शनों को अमेरिका और इजराइल की साजिश करार दिया है। लेकिन आज की तस्वीर में पहलवी सबसे मजबूत और सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त चेहरा हैं। दिलचस्प बात यह है कि रजा पहलवी खुद को अब 'राजा' के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करते। हालिया इंटरव्यूज और भाषणों में उन्होंने साफ किया है कि वे राजशाही वापस लाने के लिए नहीं, बल्कि ईरान में लोकतंत्र लाने के लिए लड़ रहे हैं। वे कहते हैं- मुझे सत्ता नहीं चाहिए, मैं बस अपने लोगों को चुनने का अधिकार देना चाहता हूं। यह बदलाव उन्हें उस 17 साल के रईस बच्चे से एक परिपक्व राजनेता बनाता है।

एक दिन में बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थियों को ईरान-पाकिस्तान द्वारा वापस भेजा गया

काबुल  ईरान और पाकिस्तान से एक ही दिन में 5,500 से अधिक अफगान शरणार्थियों को जबरन अफगानिस्तान वापस भेजा गया। यह जानकारी तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने  दी। प्रवासियों से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए गठित उच्च आयोग की रिपोर्ट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा करते हुए तालिबान के उप प्रवक्ता मुल्ला हमदुल्लाह फ़ित्रत ने बताया कि बुधवार को कुल 863 परिवारों के 5,591 लोग अफगानिस्तान लौटे। यह जानकारी पज्हवोक अफगान न्यूज ने दी। उन्होंने बताया कि लौटने वाले शरणार्थी हेरात के इस्लाम क़िला बॉर्डर, हेलमंद के बह्रमचा, निमरोज़ के पुल-ए-अब्रेशम, नंगरहार के तोरखम और कंधार के स्पिन बोल्डक सीमा मार्गों से देश में दाखिल हुए। फ़ित्रत के अनुसार, 1,311 परिवारों के 7,165 लोगों को उनके संबंधित इलाकों में भेजा गया, जबकि 849 परिवारों को मानवीय सहायता प्रदान की गई। इसके अलावा, दूरसंचार कंपनियों ने हाल ही में लौटे शरणार्थियों को 937 सिम कार्ड भी उपलब्ध कराए। उन्होंने यह भी बताया कि  ईरान और पाकिस्तान से 3,005 अफगान शरणार्थियों को जबरन निर्वासित किया गया था।इस बीच, ईरान और पाकिस्तान से अफगान शरणार्थियों के निर्वासन का सिलसिला जारी है। काबुल के एक प्रवासी शिविर में रह रहे कई लौटे हुए शरणार्थियों ने पाकिस्तानी पुलिस द्वारा कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है और कहा है कि उनकी सारी संपत्ति वहीं छूट गई। अफगानिस्तान के टोलो न्यूज के अनुसार, पिछले सप्ताह लौटे शरणार्थियों ने तत्काल आश्रय, भूमि, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसरों की मांग उठाई थी। पाकिस्तान से निर्वासित जमालुद्दीन ने टोलो न्यूज से कहा, “हमें जबरन निकाल दिया गया। हमारी कुछ संपत्ति वहीं रह गई। यहां न पैसा है, न रहने की जगह। सर्दी बढ़ रही है और हालात बेहद कठिन हैं।” एक अन्य निर्वासित गुलज़ार ने कहा, “हमें बाहर निकाल दिया गया। वह देश हमारे लिए पराया था। अब हम अपने वतन लौटे हैं और इस्लामिक अमीरात से मदद की अपील करते हैं।” कई लौटे हुए शरणार्थियों ने कहा कि पाकिस्तान में उनकी सारी संपत्ति नष्ट या छूट गई और उन्होंने तालिबान से आश्रय, आपात सहायता और रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की। ईरान से लौटे जन मोहम्मद ने कहा, “इस्लामिक अमीरात को इन लोगों की मदद करनी चाहिए। उनके पास रहने की कोई जगह नहीं है। मैं खुद जौज़जान प्रांत जा रहा हूं, लेकिन वहां भी ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है।”

युद्ध के साए में इज़राइल का हथियार निर्यात, गाजा-ईरान तनाव के बीच 14 अरब डॉलर की बिक्री

तेल अवीव इजरायल दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक है, लेकिन वह जंग लड़ते हुए भी बड़ा व्यापार कर रहा है. गाजा में लंबी जंग और ईरान के साथ तनाव के बावजूद, 2024 में इजरायल ने रिकॉर्ड 14.7 अरब डॉलर (करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये) के हथियार बेचे. सबसे हैरानी की बात ये है कि इनमें से आधे से ज्यादा यूरोपीय देशों ने खरीदे. इजरायल के रक्षा मंत्रालय ने जून 2025 में यह आंकड़ा जारी किया. यह चौथा साल लगातार है जब इजरायल के हथियार निर्यात ने नया रिकॉर्ड बनाया.  2024 में हथियार बिक्री का रिकॉर्ड: आंकड़े क्या कहते हैं? इजरायल के रक्षा उद्योग ने 2024 में 13% की बढ़ोतरी के साथ 14.7 अरब डॉलर का टर्नओवर किया. यह 2023 की तुलना में 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा है. मुख्य खरीदार यूरोप था, जिसने कुल निर्यात का 54% (करीब 8 अरब डॉलर) लिया. 2023 में यह हिस्सा सिर्फ 35% था. एशिया-पैसिफिक दूसरे नंबर पर रहा, लेकिन यूरोप ने सबको पछाड़ दिया. सबसे ज्यादा बिके हवाई रक्षा सिस्टम, जैसे आयरन डोम के हिस्से. इनकी बिक्री 48% रही. इसके अलावा मिसाइलें, ड्रोन, रडार और साइबर हथियार भी लोकप्रिय रहे. इजरायल एयर इंडस्ट्रीज (आईएआई), राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स और एल्बिट सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने बड़ा योगदान दिया. जंग के बीच व्यापार कैसे फला-फूला? गाजा में 2023 से चल रही जंग ने इजरायल को भारी नुकसान दिया. हजारों सैनिक घायल हुए, लेकिन इसने इजरायली हथियारों की ताकत दिखाई. यूरोपीय देशों को लगा कि इजरायल के हथियार असली जंग में काम करते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध से यूरोप को हथियारों की भारी जरूरत पड़ी. इजरायल ने मौका लपका और तेजी से डिलीवरी दी. ईरान के साथ तनाव ने भी मदद की. ईरान ने अप्रैल 2024 में इजरायल पर मिसाइल हमला किया, लेकिन इजरायल ने उसे रोक लिया. इससे उसके डिफेंस सिस्टम की डिमांड बढ़ी. यूरोप में भी रूस का खतरा है, इसलिए वे इजरायली तकनीक चाहते हैं. बावजूद बॉयकॉट कॉल्स के (गाजा जंग पर निंदा के कारण) बिक्री बढ़ी. यूरोपीय देश क्यों खरीद रहे? यूरोप इजरायल का सबसे बड़ा पार्टनर बन गया. जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों ने बड़े ऑर्डर दिए. उदाहरण के लिए…     जर्मनी: आयरन डोम जैसे सिस्टम के लिए अरबों डॉलर खर्च.     पोलैंड: ड्रोन और मिसाइल सिस्टम.     रोमानिया: रडार और एयर डिफेंस. यूरोपीय संघ (ईयू) ने गाजा पर सख्त बातें कीं, लेकिन व्यापार जारी रहा. ईयू इजरायल का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, जिसने 2024 में 45.5 अरब डॉलर का व्यापार किया. हथियारों पर दबाव है, लेकिन अभी कोई बड़ा प्रतिबंध नहीं. कुछ देशों ने कहा कि अगर गाजा जंग न रुकी, तो ट्रेड बेनिफिट्स काट देंगे. इजरायल के लिए फायदे और चुनौतियां यह बिक्री इजरायल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है. रक्षा उद्योग 7% जीडीपी देता है. 50 हजार नौकरियां पैदा करता है. जंग के खर्च (करीब 60 अरब डॉलर) को पूरा करने में मदद मिलती है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय निंदा बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र ने गाजा में 'नरसंहार' का आरोप लगाया. अमेरिका ने 18 अरब डॉलर की मदद दी, लेकिन यूरोप में बॉयकॉट मूवमेंट तेज हो रहा. नेतन्याहू सरकार ने कहा कि यह आत्मनिर्भरता का सबूत है. वे और निर्यात बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, खासकर एशिया और अफ्रीका में.  दुनिया पर असर: शांति या हथियार दौड़? यह खबर दिखाती है कि जंग के बीच भी पैसा कमाया जा सकता है. लेकिन गाजा में 40000 से ज्यादा मौतें हो चुकीं हैं. ईरान तनाव बढ़ रहा है. यूरोप के हथियार खरीदने से मिडिल ईस्ट में संतुलन बिगड़ सकता है. हथियार व्यापार को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक नियम सख्त करने चाहिए. इजरायल की यह सफलता तकनीकी ताकत दिखाती है, लेकिन नैतिक सवाल भी खड़े करती है. क्या जंग के बीच हथियार बेचना सही है?

Iran के Oil की Shipping पड़ गई भारी, America ने लगाया Indian Citizen पर लगाया Ban

 वाशिंगटन अमेरिका ने ईरान से तेल और पेट्रोकेमिकल व्यापार में शामिल छह कंपनियों और कई जहाजों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें भारत और पाकिस्तान की एक-एक फर्म भी शामिल है। यह कार्रवाई अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह जानकारी अमेरिकी विदेश मंत्रालय और ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने दी। पाकिस्तान के लाहौर में स्थित एलायंस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड और नई दिल्ली में स्थित भारत की साई साबुरी कंसल्टिंग सर्विसेज पर ईरानी तेल व्यापार में उनकी कथित भूमिका के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। OFAC के अनुसार, ये कंपनियां ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को गुप्त रूप से भेजने में शामिल एक नेटवर्क का हिस्सा थीं, जो अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करता है। प्रतिबंधों का कारण और असर ये प्रतिबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की "अधिकतम दबाव" नीति का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक कम करना और उसके परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल विकास और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने कहा, "हम ईरान के राजस्व स्रोतों को निशाना बनाना जारी रखेंगे और उसके ऐसे वित्तीय संसाधनों तक पहुंच को बाधित करेंगे, जो उसकी अस्थिर करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।" पाकिस्तान की एलायंस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के लिए ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान और पनामा आधारित कंपनियों और उनके संचालित जहाजों को भी निशाना बनाया गया है। साई साबुरी कंसल्टिंग सर्विसेज पर दो एलपीजी टैंकरों, बैटेलूर और नील के कॉमर्शियल मैनेजर के रूप में काम करने का आरोप है, जो ईरानी तेल के परिवहन में शामिल थे। एक अरब डॉलर के तेल व्यापार पर लगा दिए नए प्रतिबंध  अमेरिका ने ईरान के करीब एक अरब डॉलर के तेल व्यापार पर एक बार फिर प्रतिबंध लगाए हैं। ईरान के तेल व्यापार को हिजबुल्लाह से मिलने वाली आर्थिक मदद पर प्रतिबंध लगाया है। अमेरिका ने ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों की जानकारी दी। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने बताया कि ईरान के साथ न्यूक्लियर डील पर बातचीत करने से पहले तेल व्यापार के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमेरिका जानता है कि ईरान को तेल व्यापार करने के लिए हिजबुल्लाह पैसा देता है, लेकिन हिजबुल्ला ईरान से तेल लेकर उसे ईराक का तेल बताकर आगे सप्लाई करता है। हिजबुल्लाह की वित्तीय संस्था ऐसे कमाती मुनाफा ट्रेजरी सचिव ने बताया कि अमेरिका को हिजबुल्लाह के कंट्रोल वाली वित्तीय संस्था अल-क़र्द अल-हसन के बारे में पता चला है, जिसके अधिकारियों ने लाखों डॉलर के लेन-देन किया है, जिससे हिजबुल्लाह का फायदा हो रहा है। यह संस्था ईराक के बिजनेसमैन सलीम अहमद सईद की कंपनियां के मुनाफा कमा रही है। हिजबुल्लाह की यह संस्था सलीम की कंपनियों को फंडिंग करती है। सलीम की कंपनियां साल 2020 से ईरान से तेल खरीद रही है और उसे ईराक के तेल में मिलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रहा है। ईरान से कच्चे तेल की इस खरीद फरोख्त का सीधा फायदा हिजबुल्लाह को हो रहा है, लेकिन अमेरिका ऐसा होने नहीं देगा। प्रतिबंधों से ईरान को होगा यह नुकसान ट्रेजरी सचिव ने कहा कि अमेरिका ईरान के रेवेन्यू सोर्स को टारगेट करता रहेगा, ताकि ईरान के रेवेन्यू में कटौती हो और देश में क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा मिले। ऑयल सपलाई करने वाले कई जहाज भी प्रतिबंधित किए हैं, जो सीक्रेट तरीके से ईरान के स्मगल ऑयल को तस्करों तक तेल पहुंचाते हैं। इसलिए अमेरिका ने 16 वित्तीय संस्थाओं और समुद्री जहाजों पर कार्रवाई की है, जो, अवैध तरीके से ईरान के तेल की तस्करी में शामिल थे। क्योंकि इन संस्थाओं को तेल बेचकर मिलने वाला पैसा आतंकवादी संगठनों हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों को समर्थन में देता है। इसलिए तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाकर इस आय को रोकने की कोशिश की गई है। बता दें कि ईरान के तेल व्यापार पर अमेरिका प्रतिबंध लगाता रहा है और समय के साथ प्रतिबंध कड़े भी किए हैं। साल 2018 में ईरान जब परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर हुआ तो अमेरिका ने ईरान के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना, उस पर न्यूक्लियर प्रोग्राम पर बातचीत करने के लिए दबाव डालना था। ईरान का 'शैडो फ्लीट' और तेल व्यापार अमेरिका का दावा है कि ईरान अपने तेल निर्यात को बनाए रखने के लिए "शैडो फ्लीट" या "डार्क फ्लीट" का उपयोग करता है, जो गुप्त रूप से तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को ट्रांसफर करता है। ये जहाज अक्सर बंदरगाहों की क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर जहाज-से-जहाज ट्रांसफर के जरिए तेल की उत्पत्ति को छिपाते हैं। इस तरह का व्यापार मुख्य रूप से चीन जैसे देशों को टारगेट करता है, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। वैसे ये यह पहली बार नहीं है जब भारतीय कंपनियों पर ईरानी तेल व्यापार के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस साल फरवरी में, चार अन्य भारतीय कंपनियों पर भी इसी तरह के आरोपों में प्रतिबंध लगाए गए थे। इसके अलावा, अक्टूबर 2024 में, भारत की गब्बारो शिप सर्विसेज और दिसंबर 2024 में दो अन्य भारतीय शिपिंग कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से लागू हैं, लेकिन 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान परमाणु समझौते से हटने के बाद इनमें और तेजी आई। इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को रोकना और क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों को उसके समर्थन को कम करना है। हाल के महीनों में, इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हमलों के बाद ये प्रतिबंध और सख्त हो गए हैं।