samacharsecretary.com

पाकिस्तानी नेता शाहीर सियालवी का ऐलान: सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर के लिए लड़ा ऑपरेशन

लाहौर  पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में छिपे आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. अब इस ऑपरेशन के एक साल बाद पाकिस्तान से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के एक नेता ने खुलेआम स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों के लिए लड़ाई लड़ी थी. यह बयान आतंकियों की एक बैठक में दिया गया, जिसने पाकिस्तान की असली नीति को एक बार फिर उजागर कर दिया है।  क्या कहा पाक नेता ने? लश्कर-ए-तैयबा के एक कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता शाहीर सियालवी ने कहा… पहली बार पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर के लिए लड़ाई लड़ी. उन्होंने यह भी माना कि भारत ने 10 मई को मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय) और बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद का केंद्र) में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था. इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए थे।  पाकिस्तान ने बदली रणनीति सियालवी के अनुसार, हमलों के बाद पाकिस्तान ने दुनिया को गुमराह करने के लिए अपनी रणनीति बदल दी. आतंकियों के जनाजे की नमाज, मौलवी या मुफ्ती से नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के धार्मिक अधिकारी ने पढ़ाए. पाकिस्तानी सैनिक वर्दी पहनकर इन आतंकियों के शव लेकर निकले. इसका मकसद था दुनिया को यह दिखाना कि मारे गए आतंकी नहीं, बल्कि आजादी के लड़ाके थे।  आतंकियों की महफिल में खुलासा यह बयान लश्कर-ए-तैयबा के कार्यक्रम में दिया गया, जिसमें अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी मुजम्मिल इकबाल हाशमी भी मौजूद था. इस बैठक में पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के बीच गहरे संबंध साफ दिखाई दिए।  पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के अंदर लश्कर और जैश के मुख्य ठिकानों पर सटीक हमले किए थे. भारत का कहना था कि आतंकियों को सबक सिखाने के लिए जरूरी था।  इस खुलासे का मतलब यह बयान साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ दिखावा करता है. हकीकत में उसकी सेना कुछ खास आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं की खुलेआम मदद कर रही है. हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को पाकिस्तान अपनी सुरक्षा समझता है।  पाकिस्तान की यह नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके लिए शर्मनाक है. दुनिया के सामने उसकी दोहरी नीति को फिर से उजागर करती है. ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद पाकिस्तान के नेता का यह बयान भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन दुनिया के लिए यह सबूत है कि पाकिस्तान आतंकवाद को राज्य नीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।  भारत लगातार कहता रहा है कि पाकिस्तान आतंकियों का समर्थन करता है. अब खुद पाकिस्तान के लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। 

पाकिस्तान की हालत हुई दयनीय, सऊदी मदद भी नाकाम, ईरान युद्ध ने किया बर्बाद

करांची  अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पाकिस्तान पर बड़ा असर दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कैबिनेट बैठक में खुद ये बात कही है और चेतावनी दी है कि महंगे होते तेल और क्षेत्रीय अस्थिरता ने देश की आर्थिक हालत पतली कर दी है. कैबिनेट बैठक में उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल बिल करीब 300 मिलियन डॉलर था, जो अब बढ़कर 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. ऐसे में हालात पर नजर रखने के लिए सरकार ने एक टास्क फोर्स भी बनाई है. आपको बता दें कि पाकिस्तान इस वक्त महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर देख रहा है और तेल-गैस के लिए यहां त्राहिमाम मचा हुआ है।  शहबाज शरीफ ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.पाकिस्तान महंगाई की मार तो झेल ही रहा है, लेकिन शांति बनाने में भी वो सक्रिय है. शहबाज शरीफ ने बताया कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराई गई, जो 21 घंटे तक चली. इसके बाद दूसरे दौर की वार्ता हो ही नहीं पाई. फिलहाल संघर्ष विराम बना हुआ है और पाकिस्तान किसी भी तरह से वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है।  तेल के बढ़ते दाम ने रुलाया प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि इस समय कच्चे तेल की कीमतें फिर आसमान छू रही हैं, इसलिए नए दाम तय करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सामूहिक प्रयासों से हालात पर काबू पाने की कोशिश जारी है. इस बीच उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री के काम की सराहना करते हुए कहा कि उनकी ओर से उठाए गए कदमों के कारण पाकिस्तान में स्थिति अन्य देशों की तुलना में संतोषजनक है और कहीं भी लंबी कतारें नहीं हैं. हालांकि युद्ध से पहले और बाद की तुलना में 500 मिलियन डॉलर का उछाल आया है, जो अर्थव्यवस्था को की रीढ़ तोड़ रहा है. सरकार मितव्ययिता और बचत के जरिए हालात संभालने की कोशिश कर रही है, इसके लिए एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है. सरकारी उपायों के चलते ईंधन की खपत में काफी कमी आई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी, लेकिन युद्ध के कारण प्रगति को नुकसान पहुंचा है।  ईरान-अमेरिका युद्ध में पाकिस्तान कर रहा मध्यस्थता     पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और तेल संकट के बीच इस पहल को काफी अहम माना जा रहा है, हालांकि ये कुछ खास परिणाम नहीं दे पाई है।      पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू कराने की कोशिश की है. जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिसमें युद्धविराम और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की गई. फिलहाल एक अस्थायी संघर्ष विराम बना हुआ है, जिसे बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।      पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था से परेशान है और शांति चाहता है और दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने के लिए खूब उठापटक कर रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के विदेश मंत्री के साथ संपर्क में रहकर आगे की रणनीति पर काम किया जा रहा है।   

पाकिस्तान में तेल संकट, पेट्रोलियम मंत्री ने कहा- 5-7 दिन का कच्चा तेल बचा, लॉकडाउन की तैयारी

 इस्लामाबाद वैश्विक मंचों पर खुद को 'मध्यस्थ' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के सामने अब एक गंभीर घरेलू संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के ऊर्जा और वित्त मंत्रालय की ओर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने पूरे देश में खलबली मचा दी है। सरकार ने यह स्वीकार किया है कि देश के पास कच्चे तेल का रिजर्व केवल 5-7 दिनों का ही बचा है, जबकि डीजल और एलपीजी जैसे अन्य ईंधनों का स्टॉक भी कुछ ही हफ्तों में खत्म हो सकता है। संकट की जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना पाकिस्तान के इस अचानक उपजे ऊर्जा संकट का सीधा तार मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों से जुड़ा है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने होर्मुज को व्यापारिक जहाजों के लिए लगभग बंद कर दिया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मुख्य रूप से खाड़ी देशों (सऊदी अरब, कुवैत आदि) से होने वाले आयात पर निर्भर है। रास्ता बंद होने और जहाजों की कमी से सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। पेट्रोलियम मंत्री का कुबूलनामा और वर्तमान हालात पाकिस्तान के केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने ईरान-अमेरिका संघर्ष से जुड़ी मौजूदा भू-राजनीतिक चिंताओं के बीच देश के ईंधन भंडार को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। समा टीवी के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यह युद्ध जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा हो रही है। मंत्री ने कार्यक्रम के दौरान एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि पाकिस्तान का ऊर्जा तंत्र इस समय बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि देश के पास वर्तमान में केवल 5 से 7 दिनों का कच्चा तेल मौजूद है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के पास एक दिन का भी पेट्रोल रिजर्व (भंडार) नहीं है। वहीं डीजल का स्टॉक 26-28 दिन और LPG का स्टॉक केवल 15 दिनों के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने आधिकारिक तौर पर एयरलाइंस के लिए ईंधन की कमी की चेतावनी (NOTAM) जारी कर दी है। अली परवेज मलिक ने वैश्विक बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता की ओर इशारा करते हुए बताया कि इतिहास में दुबई क्रूड की कीमतें कभी भी 170 डॉलर के उच्च स्तर तक नहीं पहुंची थीं। इस अस्थिरता को देखते हुए देश की ऊर्जा भंडारण क्षमता को मजबूत करना अब एक तत्काल आवश्यकता बन गई है। 'कोविड काल' जैसी पाबंदियों की वापसी की तैयारी ईंधन बचाने के लिए शाहबाज शरीफ सरकार बेहद सख्त कदम उठाने पर विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए देश में लॉकडाउन जैसे नियम लागू किए जा सकते हैं। कॉरपोरेट और सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों को घर से काम करने का निर्देश दिया जा सकता है, ताकि सड़कों पर गाड़ियां कम चलें। स्कूलों और कॉलेजों को बंद करके शिक्षा को फिर से ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने की योजना है। लोगों से निजी वाहनों का इस्तेमाल कम करने और कार शेयर करने की अपील की जा रही है। आसमान छूती महंगाई और चरमराती अर्थव्यवस्था पाकिस्तान पहले से ही भयंकर आर्थिक संकट और महंगाई से जूझ रहा है। इस ऊर्जा संकट के कारण सरकार अब पेट्रोल-डीजल की कीमतों की समीक्षा 15 दिनों की जगह हर हफ्ते कर सकती है। युद्ध क्षेत्र से तेल लाने वाले जहाजों का बीमा 30,000 डॉलर से बढ़कर 4,00,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होने से फल, सब्जियां, राशन और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। 'मध्यस्थ' पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी विडंबना? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान अक्सर खुद को इस्लामी देशों और पश्चिमी ताकतों के बीच एक 'मध्यस्थ' के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है। लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि जो देश दूसरों के विवाद सुलझाने का दावा करता है, वह अपनी बुनियादी जरूरतों (ऊर्जा सुरक्षा) को सुरक्षित रखने में बुरी तरह विफल साबित हो रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और आईएमएफ (IMF) के कड़े नियमों के बीच यह तेल संकट पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए 'ताबूत में आखिरी कील' साबित हो सकता है।  

पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचाने के लिए अरबों डॉलर देगा यह मुस्लिम देश, UAE ने किए पैसे वसूलने के प्रयास

इस्लामाबाद कैश के भारी संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए एक बार फिर बड़ा आर्थिक पैकेज देने का वादा किया है। अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की 'स्प्रिंग मीटिंग्स' में हिस्सा लेने गए पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने मीडिया को संबोधित करते हुए यह अहम घोषणा की। वित्त मंत्री ने बताया कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के लिए 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त वित्तीय सहायता का ऐलान किया है। इसके साथ ही, पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में सऊदी अरब के पहले से जमा 5 अरब डॉलर के डिपॉजिट की अवधि को भी बढ़ा दिया है। पाक वित्त मंत्री औरंगजेब कई आर्थिक और कूटनीति बैठकों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। उन्होंने इन बैठकों के साइडलाइन पर सऊदी फंड फॉर डेवलपमेंट (एसएफडी) के सीईओ सुल्तान बिन अब्दुलरहमान अल-मरशद से मुलाकात भी की थी, जिसमें दोनों देशों के बीच निरंतर सहयोग पर जोर दिया गया। ऐन वक्त पर मिली संजीवनी और UAE का दबाव पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब की यह मदद एक 'लाइफलाइन' की तरह है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पाकिस्तान से अपना 3.5 अरब डॉलर का पुराना कर्ज चुकाने की मांग कर दी थी, जिसकी मियाद इस महीने खत्म हो रही है। UAE के इस कदम से पाकिस्तान पर डिफॉल्ट यानी दिवालिया होने का भारी खतरा मंडराने लगा था। ऐसे नाजुक वक्त में सऊदी अरब (और कतर) ने आगे आकर यह सुनिश्चित किया है कि पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार खाली न हो। IMF की शर्तों को पूरा करने में मिलेगी मदद पाकिस्तान इस वक्त IMF के साथ एक नए बेलआउट पैकेज को लेकर बातचीत कर रहा है। IMF की यह सख्त शर्त रही है कि पाकिस्तान के प्रमुख सहयोगी देश जैसे सऊदी अरब और चीन अपना पैसा पाकिस्तान के बैंक में बनाए रखें, ताकि देश का विदेशी मुद्रा भंडार एक सुरक्षित स्तर पर रहे। सऊदी अरब द्वारा 5 अरब डॉलर के डिपॉजिट को रोके रखने और 3 अरब डॉलर अतिरिक्त देने से पाकिस्तान का पक्ष IMF के सामने काफी मजबूत हो गया है। मध्य पूर्व का संकट और ऊर्जा सुरक्षा वर्तमान में मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा और ईंधन जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। तेल महंगा होने से पाकिस्तान का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। सऊदी फंड से मिला यह नया पैसा पाकिस्तान को महंगे तेल और जरूरी चीजों जैसे भोजन, उर्वरक का आयात करने के लिए एक महत्वपूर्ण 'बफर' प्रदान करेगा। रेमिटेंस (विदेशों से आने वाली मुद्रा) अभी तक प्रभावित नहीं हुई है, लेकिन 40-50% रेमिटेंस खाड़ी देशों से आती है। पाकिस्तान आईएमएफ से अगली किश्त लगभग 1.3 अरब डॉलर की उम्मीद कर रहा है, जिसकी मंजूरी इस महीने या अगले महीने होने की संभावना है। निवेशकों के भरोसे में होगी वृद्धि वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों, चीनी वित्त मंत्री और सऊदी समकक्षों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। इस वित्तीय पैकेज की घोषणा से वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के प्रति थोड़ा भरोसा बहाल होगा। इससे पाकिस्तान की मुद्रा (पाकिस्तानी रुपया) को भी डॉलर के मुकाबले स्थिरता मिलने की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह सहायता पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को तुरंत मजबूती देगी, जिससे यूएई का कर्ज चुकाने के बाद भी रिजर्व 2-3 महीने के आयात स्तर पर बने रहेंगे। आईएमएफ लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी। निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा। सऊदी अरब के इस कदम ने न सिर्फ पाकिस्तान को एक तात्कालिक आर्थिक संकट से उबार लिया है, बल्कि यह भी साबित किया है कि रणनीतिक मोर्चे पर रियाद अभी भी इस्लामाबाद का सबसे भरोसेमंद सहयोगी है।

हिना बलूच का सनसनीखेज खुलासा: पाकिस्तान की 80% आबादी गे, 20% बायसेक्सुअल

कराची  पाकिस्तानी ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता हिना बलूच का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने पाकिस्तान में बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। वीडियो में हिना ने दावा किया है कि पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' (विषमलैंगिक) नहीं है और देश की पूरी आबादी या तो समलैंगिक (Gay) है या बायसेक्सुअल (Bisexual)। उनका तर्क है कि सामाजिक दबाव, धर्म और पारिवारिक सम्मान की आड़ में पाकिस्तान में लोग अपनी कामुकता को छिपाकर रखते हैं। पाकिस्तानी समाज का 'खुला रहस्य' 'क्वीर ग्लोबल' को दिए एक हालिया इंटरव्यू में हिना बलूच ने पाकिस्तानी समाज की इस स्थिति को एक 'खुला रहस्य' बताया। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि पाकिस्तान की आधे से अधिक आबादी वास्तव में गे है। वे बस इसे खुलकर कहना नहीं चाहते हैं। मुझे लगता है कि पाकिस्तान की 80 प्रतिशत आबादी गे है और बाकी 20 प्रतिशत बायसेक्सुअल है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कामुकता के मामले में पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' है।' धर्म और संस्कृति की आड़ बलूच ने तर्क दिया कि कई लोग अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) को दबाते हैं या उससे इनकार करते हैं। अपने बचपन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'लोग इससे इनकार करेंगे, वे इसके बीच में धर्म को लाएंगे, वे संस्कृति का हवाला देंगे, लेकिन यह एक खुला रहस्य है।' हिना बलूच ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि उनका निजी संघर्ष कामुकता को लेकर कम, बल्कि अपनी जेंडर एक्सप्रेशन (लिंग अभिव्यक्ति) को लेकर ज्यादा था। उन्होंने बताया, 'मुझे हमेशा इस बात की चिंता सताती थी कि मैं कैसे लिपस्टिक लगाऊं ताकि परिवार से गालियां न सुननी पड़ें। मैं कैसे महिलाओं वाले कपड़े और गहने पहनूं जिससे मुझे मार न खानी पड़े?' समुदाय का शोषण उन्होंने पाकिस्तान के 'ख्वाजा सरा' (ट्रांसजेंडर) समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली प्रणालीगत और सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस समुदाय के कई लोगों को मजबूरन भीख मांगने, शादियों में नाचने या सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) जैसे सीमित और शोषणकारी कामों में धकेल दिया जाता है। इन सामाजिक बंधनों और शोषण को अस्वीकार करते हुए, बलूच ने जेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। वह 'सिंध मूरत मार्च' की सह-संस्थापक बनीं और पाकिस्तान के प्रसिद्ध 'औरत मार्च' में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने खुद को ट्रांसजेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों की एक मुखर पैरोकार के रूप में स्थापित किया। हिंसा और देश छोड़ना बलूच ने बताया कि एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'प्राइड फ्लैग' फहराने के बाद उन्हें भारी हिंसक प्रतिशोध का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा, उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कथित अपहरण और दुर्व्यवहार का भी सामना किया। इन जानलेवा और खौफनाक अनुभवों ने अंततः उन्हें पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बाद में, उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित 'SOAS विश्वविद्यालय' में स्कॉलरशिप हासिल की और अपनी सुरक्षा के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) में शरणार्थी का दर्जा मांगा।

पाकिस्तान के प्रयासों को लगा झटका, ईरान ने इस्लामाबाद बैठक से किया मना, युद्धविराम पर असफलता

इस्लामाबाद पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराने के प्रयास पूरी तरह विफल हो गए हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने शुक्रवार को मध्यस्थों का हवाला देते हुए यह जानकारी दी। ईरान ने पाकिस्तान सहित मध्यस्थता करा रहे देशों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह आने वाले दिनों में इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात करने को तैयार नहीं है और अमेरिका की मांगों को पूरी तरह अस्वीकार्य मानता है। कुल मिलाकर ये बातचीत अब 'डेड एंड' पर पहुंच गई है। ईरान का इनकार और अमेरिका की मांगें सूत्रों के अनुसार, ईरान ने युद्धविराम के लिए अपनी शर्तें दोहराई हैं। शुरुआती दौर में ईरान ने कहा था कि वह तभी युद्ध समाप्त करेगा जब अमेरिका युद्ध मुआवजा दे, मध्य पूर्व के अपने सभी सैन्य ठिकानों से वापसी करे और भविष्य में किसी भी हमले से सुरक्षा की गारंटी दे। इन मांगों पर कोई समझौता नहीं होने के कारण बातचीत अटक गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के नेतृत्व में बातचीत को आगे बढ़ाने की यह कोशिश कोई सफलता हासिल नहीं कर सकी। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसे अमेरिका की मांगें 'अस्वीकार्य' लगती हैं। वह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक के लिए अपने कोई अधिकारी को नहीं भेजेगा। इस कड़े रुख ने बातचीत की मौजूदा रूपरेखा के दरवाजे प्रभावी रूप से बंद कर दिए हैं। पाकिस्तान की निकल गई हवा! पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान बैकडोर कूटनीति के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार ने सार्वजनिक तौर पर इस्लामाबाद में सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी करने की पेशकश की थी। इसी दिशा में पाकिस्तान ने अमेरिका की ओर से एक 15-सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव ईरान को सौंपा था। इससे पहले, चीन और पाकिस्तान ने भी संयुक्त रूप से एक 5-सूत्रीय शांति योजना पेश की थी। हालांकि, अमेरिका की कुछ कठोर रणनीतिक मांगों और जमीनी स्तर पर लगातार हो रहे सैन्य हमलों के कारण, ईरान ने इस बातचीत से अपने कदम पीछे खींच लिए। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि पाकिस्तान के लिए दोनों पक्षों को एक मेज पर लाना कूटनीतिक रूप से एक बेहद जटिल काम था, जो अंततः विफल साबित हुआ। शांति प्रयासों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ईरान ने अपने हवाई क्षेत्र में एक अमेरिकी युद्धक विमान (F-15E) को मार गिराने का दावा किया। पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी विशेष बलों ने एक पायलट का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर लिया है, जबकि दूसरे की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। तुर्की और मिस्र तलाश रहे नए विकल्प इस कूटनीतिक गतिरोध के कारण शांति प्रयास अधर में लटक गए हैं। इसे देखते हुए तुर्की और मिस्र अब इस समस्या का समाधान इस्लामाबाद से बाहर तलाश रहे हैं। दोनों देश युद्धविराम की बची-खुची उम्मीदों को बचाने के लिए नए स्थानों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें दोहा (कतर) और इस्तांबुल (तुर्की) बातचीत की मेजबानी के लिए प्रमुख विकल्पों के रूप में उभरे हैं। विवाद की मुख्य जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का समुद्री रास्ता एक्सियोस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच एक संभावित समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी। इस समझौते के तहत यह प्रस्ताव था कि अगर तेहरान 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के समुद्री रास्ते को वैश्विक व्यापार के लिए फिर से खोल देता है, तो इसके बदले में युद्धविराम लागू किया जा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख और धमकियां रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ फोन पर बातचीत के दौरान संभावित युद्धविराम को लेकर चर्चा की थी। उसी दिन, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि ईरान के राष्ट्रपति युद्धविराम चाहते हैं। हालांकि, ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि युद्धविराम तभी होगा जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से 'खुला और स्वतंत्र' होगा। ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा: हम तभी विचार करेंगे जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुला होगा। तब तक, हम ईरान पर विनाश की हद तक बमबारी कर रहे हैं। उन्हें वापस पाषाण युग में भेज देंगे!!!" ईरान की प्रतिक्रिया ट्रंप के इन दावों और बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने युद्धविराम चाहने वाले ट्रंप के दावे को पूरी तरह से झूठा और निराधार करार दिया है। इस युद्ध की आंच अब अन्य देशों तक फैल रही है। इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी दूतावास ने हाई-अलर्ट जारी करते हुए अमेरिकी नागरिकों को तुरंत इराक छोड़ने को कहा है, क्योंकि ईरान समर्थित मिलिशिया गुटों द्वारा हमले की आशंका है। बहरीन से लेकर दुबई तक ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं।

पाकिस्तान की बिना तैयारी वाली पंचायत, सऊदी अरब और मिस्र की उल्टे पांव वापसी, मिशन दलाली हुआ नाकाम

कराची   अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. इस्लामाबाद में आयोजित विदेश मंत्रियों की अहम बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के समय से पहले ही समाप्त हो गई. यह बैठक 29–30 मार्च को दो दिनों तक चलने वाली थी, लेकिन यह एक ही दिन में खत्म हो गई. इस सम्मेलन में तु्र्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया. इस बैठक का मुख्य उद्देश्य यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान के बीच संभावित बातचीत के लिए एक मध्यस्थता ढांचा तैयार करना था।  हालांकि कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में किसी ठोस रोडमैप या कार्ययोजना पर सहमति नहीं बन सकी. इसकी सबसे बड़ी बाधा ईरान की सख्त शर्तें रहीं, जिसमें उसने सुरक्षा की गारंटी और बातचीत के लिए भरोसेमंद आश्वासन की मांग की थी. इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई. सूत्रों का कहना है कि बैठक में शामिल किसी भी देश ने ईरान की मुख्य चिंताओं को दूर करने को लेकर ठोस भरोसा नहीं जताया. जिस बैठक का उद्देश्य इस युद्ध को खत्म कराने के लिए समझौता कराना था, वो वक्त से पहले खत्म हो गई।  बिना तैयारी पाकिस्तान ने बुला ली पंचायत इसका असर यह हुआ कि सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्री 29 मार्च को ही बैठक छोड़कर रवाना हो गए, जिससे सम्मेलन तय समय से पहले ही खत्म हो गया. बैठक के दौरान देशों के बीच मतभेद भी साफ नजर आए. पाकिस्तान और तुर्की, जहां मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे, वहीं सऊदी अरब और मिस्र ने ज्यादा सतर्क रुख अपनाया. इन देशों का मानना था कि किसी भी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले सीधे अमेरिका से चर्चा जरूरी है. खासतौर पर सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के इस दावे का पूरी तरह समर्थन करने में हिचक दिखाई कि वे अमेरिका और ईरान के बीच सफल मध्यस्थता कर सकते हैं. इससे बैठक में एकजुटता की कमी साफ नजर आई।  जिस काम के लिए आए, वो हुआ ही नहीं बैठक का एक अहम निष्कर्ष यह भी रहा कि पाकिस्तान और तुर्की अब ईरान से संपर्क कर उसे अपनी शर्तों में नरमी लाने के लिए राजी करने की कोशिश कर सकते हैं. ईरान अब तक अपने पिछले अनुभवों को देखते हुए ठोस गारंटी की मांग पर अड़ा हुआ है. हालांकि कोई ठोस नतीजा नहीं निकलने के बावजूद सभी देशों ने बातचीत जारी रखने और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई है, ताकि क्षेत्र में तनाव को कम किया जा सके. कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक अगर यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, तो इस सप्ताह ही एक नई बैठक आयोजित की जा सकती है. फिलहाल तो क्षेत्रीय देशों के बीच भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं बन पा रहा है।   

आटा और तेल की कमी के बीच अफगानिस्तान से युद्ध, पाकिस्तान पर क्या आएगा तबाही का त्रिकोण?

  नई दिल्ली अमेरिका और ईरान में युद्ध (US-Iran War) जारी है, जिससे दुनिया में तेल संकट गहराया हुआ है और पाकिस्तान इससे पहले ही बेहाल नजर आ रहा है, दूसरी ओर पड़ोसी देश पर कर्ज (Pakistan Debt) भी लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच अफगानिस्तान के साथ जंग (Pakistan-Afghanistan War) से उसे तगड़ी मार पड़ी है. एक साथ ट्रिपल अटैक ने पाकिस्तान का तेल निकाल दिया है. पहले से ही आर्थिक संकट के चलते भारी भरकम कर्ज के बोझ तले देश का ईरान युद्ध से तेल बंद हुआ, तो अफगानिस्तान से साथ जंग ने देश की महंगाई बढ़ाकर इकोनॉमी पर संकट बढ़ा दिया है। लगातार बढ़ रहा कर्ज का बोझ  पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट झेल रहा है और इससे उबरने के लिए वो तमाम मित्र देशों के साथ ही आए दिन आईएमएफ और विश्व बैंक के सामने कटोरा लेकर मदद मांगता नजर आता रहा है. हालांकि, भारी भरकम आर्थिक मदद मिलने के बाद भी देश के हालात बदतर ने हुए हैं. पाकिस्तानी मीडिया की एक रिपोर्ट को देखें, तो Pakistan पर जनवरी 2026 तक कुल कर्ज 79,322 अरब पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच गया। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान द्वारा जारी डॉक्युमेंट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के कर्ज में घरेलू उधार में तेज उछाल आया है. केंद्रीय बैंक (SBP)  के आंकड़ों को देखें, देश की संघीय सरकार का घरेलू कर्ज जनवरी 2026 तक 55,978 पाकिस्तानी अरब रुपये तक पहुंच गया था. इसके अलावा  बाहरी कर्ज 23,344 अरब पाकिस्तानी रुपये हो गया. जो जीडीपी का करीब 70% है और पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली का बड़ा उदाहरण है। यहां बता दें कि पाकिस्तान आईएमएफ का सबसे बड़ा कर्जदार है और 1958 से अब तक 26 आईएमएफ बेलआउट कार्यक्रमों के जरिए 34 अरब डॉलर के आसपास की मदद ले चुका है. तमाम रिपोर्ट्स में पाकिस्तानी इकोनॉमिस्ट बताते नजर आए हैं, कि IMF के कर्ज के सहारे चल रहा पाकिस्तान पहले से ही दिवालिया स्थिति में है और वर्तमान के बिगड़े ग्लोबल हालात इकोनॉमी को गहरी चोट पहुंचा सकते हैं। मिडिल ईस्ट में युद्ध, PAK में कोहराम पाकिस्तान पर दूसरा अटैक मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध से हुआ है. दरअसल, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग से तेल संकट गहरा गया है और पूरी तरह तेल के आयात पर निर्भर पाकिस्तान में कोहराम मचा है. हालात ये है कि पाकिस्तान में तेल की कमी के चलते पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए, सरकारी गाड़ियों में 60% कटौती, सांसदों और मंत्रियों की सैलरी कट, सरकारी विभागों के गैर-जरूरी खर्च में 20% की कटौती, मीटिंगों को वर्चुअल और पढ़ाई को ऑनलाइन में शिफ्ट करना समेत अन्य उपाय लागू किए गए हैं, जो कोरोना काल जैसे ही हैं। Middle East War से पाकिस्तान की बदहाल इकोनॉमी को और झटका लग सकता है. डॉन की बीते दिनों आई रिपोर्ट के मुताबिक, खुद पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री पूर्व वित्त मंत्री हाफिज पाशा ने चेतावनी दी है कि अगर ये युद्ध जारी रहा और क्रूड प्राइस 100 डॉलर के पार बने रहे, तो Pakistan GDP पर 1-1.5% का निगेटिव इम्पैक्ट पड़ सकता है. पेट्रोलियम आयात में बढ़ोतरी के चलते अगले साल पाकिस्तान को 12-14 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने एक और संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के बराबर 120 डॉलर के हाई पर पहुंचती हैं, तो पाकिस्तान में महंगाई कोहराम मचा सकती है और फिर उसी दौर के करीब 30% पर पहुंच सकती है. उस समय लोग आटा, दाल के लिए अपनी जान पर खेलते नजर आए थे, तो वहीं अब फिर से फ्यूल की कमी पाकिस्तान का तेल निकालती नजर आ रही है। पाकिस्तान में मिडिल ईस्ट की जंग के ताजा असर की बात करें, तो पाकिस्तान के ब्‍यूरो ऑफ स्‍टैटिस्टिक्‍स के साप्ताहिक महंगाई के आंकड़े के मुताबिक, बीते 11 मार्च को समाप्त सप्ताह में महंगाई सूचकांक SPI सालाना आधार पर 6.44% बढ़ गया. पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल के दाम बढ़ने के साथ ही खाद्य पदार्थों की महंगाई दर में तेज इजाफा हुआ है. ब्रेड, दूध से लेकर आटा-दाल-चावल तक खाने-पीने की तमाम चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं। अफगानिस्तान से युद्ध ने बढ़ाई मुसीबत पहले से ही बदहाल पाकिस्तान के लिए मुसीबत अफगानिस्तान के साथ चल रहे उसके युद्ध ने और भी बढ़ा दी है. हालांकि, ये संघर्ष 2025 के अंत में ही सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद शुरू हो गया था और अब ये भीषण रूप ले चुका है. युद्ध की टेंशन में आयात और निर्यात सुस्त पड़ गया है. सीमा पर तनाव ने जरूरी सामानों की आवाजाही बाधित कर दी है, जिससे पाकिस्तान में तमाम जरूरी चीजों के दाम में तेज इजाफा हुआ है और देश के लोगों पर महंगाई की तगड़ी मार पड़ रही है। खासतौर पर तोरखम और चमन जैसे बॉर्डर रूट्स बंद होने से ताजे सामान बंद हो गए हैं, तो वहीं पाकिस्तान में कारोबारियों की मुसीबत को अफगान कोयले की कमी ने बढ़ा दिया है. सीमेंट निर्माता कंपनियों की टेंशन भी कोयले की आपूर्ति बंद होने से चरम पर पहुंच गई है।

काबुल में आतंकी ठिकाने बताकर पाकिस्तान ने 400 लोगों की जान ली, जिनमें मरीज और आम लोग भी शामिल

काबुल अफ़गानिस्तान के उप-सरकारी प्रवक्ता ने मंगलवार सुबह बताया कि अफ़गान राजधानी काबुल में नशा करने वालों का इलाज करने वाले एक अस्पताल पर हुए पाकिस्तानी हवाई हमले में मरने वालों की संख्या बढ़कर 400 हो गई है।  सोशल मीडिया पोस्ट में हमदुल्ला फितरत ने कहा कि सोमवार देर रात हुए इस हमले में अस्पताल का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो गया. उन्होंने बताया कि अब तक 400 लोग मारे जा चुके हैं और करीब 250 अन्य के घायल होने की खबर है।  फितरत ने आगे कहा कि बचाव दल इमारत में लगी आग पर काबू पाने और मलबे से शवों को निकालने का काम कर रहे हैं।  पाकिस्तान क्या बोला? पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के दावे को झूठा और जनता की राय को गुमराह करने के मकसद से किया गया बताकर खारिज कर दिया. पाकिस्तान ने कहा कि उसने सोमवार को काबुल और नंगरहार प्रांत में केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था।  अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार के डिप्टी प्रवक्ता हमदुल्ला फ़ितरत के मुताबिक, काबुल के उमर एडिक्शन ट्रीटमेंट हॉस्पिटल पर हमला स्थानीय समय के अनुसार रात लगभग 9 बजे (16:30 GMT) हुआ. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि यह हॉस्पिटल 2,000 बेड की सुविधा वाला है और इस हमले में इमारत का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो गया।  'हम फिर से उठ खड़े होंगे…' अफगानिस्तानी क्रिकेटर राशिद खान ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "काबुल में पाकिस्तानी हवाई हमलों के कारण आम नागरिकों के हताहत होने की ताज़ा रिपोर्टों से मुझे गहरा दुख हुआ है. आम नागरिकों के घरों, शिक्षण संस्थानों या चिकित्सा सुविधाओं को निशाना बनाना एक युद्ध अपराध है. इंसानी जानों के प्रति इस तरह की शदीद गफलत, खासकर रमज़ान के पवित्र महीने में, बेहद घिनौनी और गहरी चिंता का विषय है. इससे केवल फूट और नफ़रत ही बढ़ेगी।  उन्होंने आगे कहा कि मैं संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली अन्य एजेंसियों से अपील करता हूं कि वे इस ताज़ा जुल्म जांच करें और इसके दोषियों को जवाबदेह ठहराएं. इस मुश्किल घड़ी में मैं अपने अफ़ग़ान लोगों के साथ खड़ा हूं. हम इस सदमे से उबरेंगे और एक राष्ट्र के रूप में हम फिर से उठ खड़े होंगे. हम हमेशा ऐसा ही करते आए हैं।  'जेट ने बम गिराए…' स्थानीय टेलीविज़न चैनलों ने ऐसे फुटेज दिखाए, जिनमें दमकलकर्मी एक इमारत के मलबे के बीच उठ रही लपटों को बुझाने के लिए संघर्ष करते नज़र आ रहे थे।  हॉस्पिटल में सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम करने वाले 31 साल के ओमिद स्तानिकज़ई ने AFP समाचार एजेंसी को बताया कि हमले से पहले उन्होंने आसमान में लड़ाकू विमानों को गश्त करते हुए सुना था. हमारे चारों ओर सैन्य टुकड़ियां थीं. जब इन सैन्य टुकड़ियों ने जेट पर गोलीबारी की, तो जेट ने बम गिराए और आग लग गई. सभी मृतक और घायल नागरिक थे।  पाकिस्तान के द्वारा यह हमला अफ़ग़ान अधिकारियों के उस बयान के कुछ घंटों बाद हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि दोनों पक्षों के बीच उनकी साझा सीमा पर गोलीबारी हुई थी और अफ़ग़ानिस्तान में चार लोग मारे गए थे. यह घटना ऐसे वक्त में हुई है, जब इन पड़ोसी देशों के बीच पिछले कई वर्षों की सबसे भीषण लड़ाई तीसरे हफ़्ते में प्रवेश कर गई है।  'इंसानियत के खिलाफ जुर्म…' अफ़ग़ान सरकार के एक और प्रवक्ता ज़बीहुल्ला मुजाहिद ने इससे पहले सोशल मीडिया पर अस्पताल पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है और काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाया है. उन्होंने कहा कि अफ़ग़ान सरकार इस तरह के कृत्य को सभी सिद्धांतों के खिलाफ और इंसानियत के खिलाफ जुर्म मानती है।  'आतंकवादियों को मदद देने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर…' पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के प्रवक्ता मुशर्रफ़ ज़ैदी ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि काबुल में किसी भी अस्पताल को निशाना नहीं बनाया गया।  सोशल मीडिया पोस्ट में पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा कि इन हमलों में सैन्य ठिकानों और आतंकवादियों को मदद देने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर को सटीक रूप से निशाना बनाया गया, जिसमें अफ़ग़ान तालिबान के तकनीकी उपकरणों और गोला-बारूद के गोदाम शामिल हैं. इसके साथ ही काबुल और नंगरहार में मौजूद अफ़ग़ानिस्तान-स्थित पाकिस्तानी लड़ाकों को भी निशाना बनाया गया. मंत्रालय ने आगे कहा कि इन ठिकानों का इस्तेमाल बेकसूर पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ किया जा रहा था। 

राजस्थान में बम ब्लास्ट की साजिश: पाकिस्तान से भेजा IED, 3 जगह धमाके की योजना

अजमेर  सरहद पार से ड्रोन के जरिए भेजे गए मौत के सामान (RDX) ने राजस्थान से लेकर हरियाणा तक खौफनाक साजिश का जाल बुना था। अंबाला में करीब 2 किलो विस्फोटक के साथ पकड़े गए तीन आतंकियों ने जो खुलासे किए हैं, उसने राजस्थान पुलिस और खुफिया एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इस साजिश का मुख्य सिरा अजमेर के लौंगिया मोहल्ला से जुड़ा है, जहां का निवासी अली अकबर उर्फ बाबू इस आतंकी नेटवर्क का अहम मोहरा निकला। हनुमानगढ़ था 'टारगेट नंबर-1' पूछताछ में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि आतंकियों की पहली पसंद अंबाला नहीं, बल्कि राजस्थान का हनुमानगढ़ था। साजिश के मुताबिक, हनुमानगढ़ में बम धमाका करने के लिए आईईडी (IED) तो वहां पहुंचा दी गई थी, लेकिन ऐन वक्त पर पाकिस्तान से आरडीएक्स की खेप नहीं पहुंच पाई। इस 'सप्लाई फेलियर' की वजह से राजस्थान एक बड़े धमाके से बाल-बाल बच गया। योजना विफल होने पर चार दिन बाद आईईडी को वापस मंगा लिया गया था। अजमेर के 'बाबू' ने भेजी थी लोकेशंस की वीडियो गिरफ्तार आरोपी अली अकबर उर्फ बाबू ने कुबूला है कि उसने पाकिस्तान में बैठे आतंकी शहजाद भट्टी के इशारे पर राजस्थान, दिल्ली और पंजाब के महत्वपूर्ण ठिकानों की रेकी की थी। इन जगहों के वीडियो बनाकर बाकायदा व्हाट्सएप के जरिए पाकिस्तान भेजे गए थे, ताकि बड़े टारगेट चुने जा सकें। अंबाला में 'एक्टिव बम' के साथ पकड़े गए हनुमानगढ़ का प्लान फेल होने के बाद आतंकियों ने अंबाला के सैन्य ठिकानों और माता बाला सुंदरी मंदिर को निशाने पर लिया। आरोपी पैशन प्रो मोटरसाइकिल पर टिफिन बम लेकर जा रहे थे, जो पूरी तरह एक्टिव था। एसटीएफ ने समय रहते इन्हें दबोच लिया, वरना 2 किलो आरडीएक्स 200 मीटर के दायरे में तबाही मचाने और लगभग 250 लोगों की जान लेने के लिए काफी था। NIA की एंट्री, राजस्थान में अलर्ट मामले की गंभीरता को देखते हुए अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस केस को अपने हाथ में ले सकती है। चूंकि एक आरोपी अजमेर का है और हनुमानगढ़ को निशाना बनाने की कोशिश हुई थी, इसलिए राजस्थान के सुरक्षा घेरे को और कड़ा कर दिया गया है। फिलहाल आरोपी 7 दिन के रिमांड पर हैं, जिनसे और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।