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मिडटर्म चुनाव में हार से भड़के ट्रंप, बोले- मैं होता तो ऐसा नहीं होता

वॉशिंगटन डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में पार्टी के शर्मनाक प्रदर्शन पर अपना पहला रिएक्शन दिया है. अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि अगर मैं चुनाव लड़ रहा होता तो उनकी रिपब्लिकन पार्टी को एकतरफा जीत मिलती है. साथ ही उन्होंने कहा है कि वह अमेरिकी जनता का जनादेश मानने को तैयार हैं. अमेरिका में मिडटर्म चुनाव में अमेरिका में सभी 435 हाउस सीटों और 100 में से 35 सीनेट सीटों पर चुनाव हुए हैं. साथ ही 36 राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी हैं. डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के हाथ से दोनों सदन का कंट्रोल जाता दिख रहा है. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी शानदार जीत हासिल करती दिख रही है।  डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा? अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ट्रूथ सोशल पर लिखा है, "मैं बैलेट (मतपत्र) पर नहीं था, और अगर होता, तो हम भारी बहुमत से जीत जाते. इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद. राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप" डोनाल्ड ट्रंप ने साथ में यह भी कहा है कि वह मिडटर्म चुनावों के नतीजों को स्वीकार करेंगे. उन्होंने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' से कहा, "मैं इन नतीजों को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं. हम डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करेंगे, और उनके साथ काम करने को लेकर उत्सुक हैं. हम शायद कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे।  ट्रंप के ये सुलह वाले बयान ऐसे समय में आए हैं, जब उन्होंने बार-बार चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे. इससे यह डर पैदा हो गया था कि शायद वह अपनी हार मानने से इनकार कर दें।  यह चुनाव ट्रंप के विवादों से घिरे दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल पर एक तरह का जनादेश माना जा रहा है. अमेरिका में जीवन गुजारने की बढ़ती लागत, टैरिफ और ईरान के खिलाफ अमेरिकी युद्ध को लेकर लोगों में असंतोष था. इस जंग की वजह से तेल-गैस की कीमतें काफी बढ़ गई हैं और इसका असर रिपब्लिकन पार्टी के उम्मदीवारों पर पड़ा है. दूसरी तरफ ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग भी रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब बनी हुई है।  नतीजों को स्वीकार करता हूं: ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा है कि वे मध्यावधि चुनावों के नतीजों को स्वीकार करेंगे। डेमोक्रेट्स को चुनाव में जीत मिली है और वे उनके साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है और वह अब आगे की ओर देख रहे हैं। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी की हार के लिए खुद के चुनावी मैदान में ना होने को माना है। अमेरिका में 435 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में बहुमत के लिए 218 सीटों की जरूरत होती है। शुरुआती नतीजों के आधार पर माना जा रहा है कि डेमोक्रेट्स इस चुनाव में बहुमत के लिए जरूरी 218 सीटें जीत सकती है। वहीं जबकि रिपब्लिकन पार्टी को 160 सीटें मिलने का अनुमान है। यह डोनाल्ड ट्रंप के लिए सीधेतौर पर झटका है। चुनाव नतीजों का ट्रंप पर असर अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजे खासतौर से डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किल बढ़ा सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल का अभी दो साल का समय बाकी है। अमेरिकी कांग्रेस में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण होना सीधेतौर पर उनके कामकाज पर असर डालेगा। उनके लिए अपने फैसले लेना उस तरह आसान नहीं रहेगा, जैसे वो अब तक लेते रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद से दिखाया है कि वह अपने काम अपने ही तरीके से करते हैं। इस वजह से उनके कई फैसले कानून पेचीदगियों में फंसते रहे हैं और उनको कोर्ट में चुनौती दी जाती रही है। ऐसे में अब जबकि सदन में उनकी पार्टी के पास बहुमत नहीं होगा तो इमिग्रेशन और टैरिफ जैसे मुद्दों पर उनके लिए पहले की तरह मनमर्जी चलाना आसान नहीं होगा।

अमेरिका-ईरान समझौते की उम्मीद तेज, होर्मुज को लेकर ईरान का नया प्रस्ताव सामने आया

वाशिंगटन अमेरिका के साथ जंग खत्म करने को लेकर ईरान और कतर के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत में नया मोड़ आया है. ईरानी वार्ताकार रविवार को दोहा से लौट गए हैं. हालांकि, बातचीत से जुड़े एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि वार्ताकारों के लौटने की वजह बातचीत में आई कोई मुश्किल नहीं थी. इस बीच समझौते के लिए एक ड्राफ्ट प्रस्ताव साझा किया जा रहा है और आगे की बैठक भी हो सकती है. इस बीच अब्बास अराघची ने कहा कि होर्मुज दो दिन की बजाय सात दिन में खुल जाएगा।  अधिकारी ने ड्राफ्ट प्रस्ताव की विस्तृत जानकारी नहीं दी. वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने बताया कि बातचीत का आधार सितंबर में ईरान की ओर से तैयार किया गया सात चरणों वाला प्लान है. इसका मकसद होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना है. तेहरान अब इस प्रस्ताव को समझौते के तहत पहले से कम समय में लागू करने की बात कह रहा है।  ईरान ने रखीं अपनी शर्तें ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बघाई ने बताया कि उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी संदेशों के आदान-प्रदान में मदद के लिए दोहा में थे. कतर के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका तक ईरान का संदेश पहुंचाया जा रहा था।  बघाई ने कहा कि ईरान की मांगें बिल्कुल साफ हैं. अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म किए बिना, ईरान की मांगों का सम्मान किए बिना और उसकी जायज जरूरतों को पूरा किए बिना कोई अंतिम समझौता नहीं हो सकता. उन्होंने यह भी कहा कि इन शर्तों के पूरा हुए बिना होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना या सुरक्षित बनाना संभव नहीं है।   7 दिन के बजाय 2 दिन में खुल सकता है होर्मुज स्ट्रेट शनिवार को कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के हवाले से बताया था कि समझौता होने पर होर्मुज स्ट्रेट को सात दिन के बजाय दो दिन के भीतर खोला जा सकता है. ईरान के शुरुआती प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही खारिज कर चुके हैं।  अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद बढ़ सकता है तनाव बातचीत का यह दौर ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका में मंगलवार को होने वाले मिडटर्म चुनाव के बाद जंग फिर तेज होने की आशंका जताई जा रही है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से जब चुनाव को लेकर तेहरान के रुख के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ईरान को उम्मीद नहीं है कि इन चुनावों से अमेरिका कोई नया देश बन जाएगा।  ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका चुनाव से पहले ईरान पर कोई नया हमला नहीं करेगा. उन्होंने यह भी दावा किया है कि तेहरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है. हालांकि, ट्रंप ने आगे सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया है। 

अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ने के आसार, ट्रंप के आदेश पर 4 दिन में हो सकती है सैन्य कार्रवाई!

वाशिंगटन अमेरिका ईरान पर बड़े हमले की तैयारी कर रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के 96 घंटे यानी चार दिनों के अंदर अमेरिकी सेना हमला शुरू कर सकती है. 26 अक्टूबर 2026 को सामने आई इस रिपोर्ट में दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह दावा किया गया है. अमेरिका के पास हमले के लिए जरूरी सैन्य ताकत मौजूद है. संभावित हमले में ईरान के रडार, मिसाइल लॉन्चर और दूसरे सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है।  अभी ट्रंप ने हमले का अंतिम आदेश नहीं दिया है. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप साल के अंत से पहले हमले की मंजूरी दे सकते हैं. इसके लिए 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद का समय अहम माना जा रहा है. इस बीच, इजरायल भी ईरान के खिलाफ अमेरिका के अगले कदम पर नजर रख रहा है।  किन ठिकानों पर हमला कर सकता है अमेरिका? रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की योजना में ईरान के कई सैन्य ठिकाने शामिल हैं. इनमें रडार सिस्टम, मिसाइल लॉन्चर और दूसरे जरूरी सैन्य ठिकाने हो सकते हैं. इसके अलावा, ईरान के ऊर्जा से जुड़े ठिकानों और परमाणु केंद्रों को भी संभावित निशाने के तौर पर देखा जा रहा है।  रडार की मदद से दुश्मन के विमानों और दूसरी सैन्य गतिविधियों का पता लगाया जाता है. वहीं, मिसाइल लॉन्चर से मिसाइलें दागी जाती हैं. अगर इन ठिकानों पर हमला होता है, तो ईरान की निगरानी करने और जवाबी हमला करने की ताकत पर असर पड़ सकता है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका किन ठिकानों पर हमला करेगा।  3 नवंबर के चुनाव के बाद बढ़ सकता है तनाव रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप साल 2026 के अंत से पहले ईरान पर हमले का आदेश दे सकते हैं. लेकिन यह सिर्फ अधिकारियों का अनुमान है. हमले की कोई तय तारीख सामने नहीं आई है. अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने हैं. इन चुनावों में अमेरिकी संसद के कई सदस्यों को चुना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अधिकारियों को लगता है कि चुनाव के बाद ईरान पर हमले को लेकर फैसला हो सकता है. हालांकि, ट्रंप क्या फैसला लेंगे, यह अभी साफ नहीं है।  इजरायल भी रख रहा नजर ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इजरायल की भूमिका भी अहम हो सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के कुछ अधिकारी चुनाव के बाद ईरान के साथ सैन्य टकराव की आशंका जता रहे हैं. अगर ट्रंप हमले की मंजूरी देते हैं, तो इजरायल भी अपनी सैन्य कार्रवाई कर सकता है।  दोनों देशों की ओर से किसी संयुक्त हमले की अंतिम घोषणा नहीं हुई है. अगर अमेरिका और इजरायल ईरान पर हमला करते हैं, तो पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ सकता है. ईरान जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सैनिकों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है. इससे संघर्ष और बढ़ने का खतरा रहेगा।  फिलहाल, अमेरिकी सेना की तैयारी और हमले का अंतिम फैसला अलग-अलग बातें हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आदेश मिलने पर अमेरिकी सेना 96 घंटे के अंदर कार्रवाई कर सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमला जरूर होगा. अब सबकी नजर ट्रंप के अगले कदम पर है. अगर अमेरिका हमला करता है, तो ईरान की प्रतिक्रिया और इजरायल की भूमिका से पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। 

ईरान-अमेरिका में फिर बढ़ा तनाव, ट्रंप बोले- करेंगे हमला, तेहरान ने दी जवाबी धमकी

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ फिर सैन्य कार्रवाई कर सकता है. इससे युद्ध के दोबारा बढ़ने की आशंका बढ़ गई है. इसी बीच ईरानी सुरक्षा अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया है कि अगर अमेरिका और इजराइल फिर से ईरान पर हमला करते हैं, तो ईरान खाड़ी में समुद्र के नीचे बिछी संचार केबल को निशाना बनाने की तैयारी कर चुका है।  ट्रंप ने शुक्रवार को फ्लोरिडा की एक रैली में कहा कि अमेरिका एक और 'लिटिल एपिक फ्यूरी' कर सकता है. उन्होंने 28 फरवरी को शुरू हुए ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के नाम का जिक्र करते हुए यह बात कही. हालांकि, ट्रंप ने यह नहीं बताया कि ऐसी कार्रवाई कब या किस तरह की जा सकती है।  युद्ध कितने समय तक चलेगा, इसे लेकर अभी भी स्थिति साफ नहीं है. इस बीच ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं और नई सैन्य कार्रवाई से क्षेत्र और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की चिंता भी बढ़ रही है. अमेरिका और इजराइल के हमलों में हजारों लोगों की मौत और लाखों लोगों के विस्थापित होने की बात कही गई है।  ट्रंप बोले- युद्ध जल्दी खत्म कर सकते हैं इससे पहले शुक्रवार को ट्रंप ने कहा कि अमेरिका युद्ध को बहुत जल्दी खत्म कर सकता है. हालांकि, उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या अमेरिका को इसे तुरंत खत्म करना चाहिए या फिर इसे धीरे-धीरे कमजोर पड़ने देना चाहिए. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पास युद्ध खत्म करने की क्षमता है, लेकिन सवाल यह है कि इसे खत्म किया जाए या इसे धीरे-धीरे खत्म होने दिया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर लगातार जा रहा है और अमेरिका को वह सब मिल रहा है जो वह चाहता है।  ट्रंप पहले भी युद्ध को लेकर अलग-अलग लक्ष्य और समयसीमा बताते रहे हैं. इसी महीने उन्होंने कहा था कि अगले महीने होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले अमेरिका ईरान पर हमला नहीं करेगा. इन चुनावों में अमेरिकी संसद के नियंत्रण को लेकर फैसला होना है।  फ्रांस और तुर्की ने नई सैन्य कार्रवाई से चेताया ईरान के खिलाफ फिर सैन्य कार्रवाई की आशंका के बीच कई देशों ने चेतावनी दी है. शुक्रवार को इस्तांबुल में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मिस्र, पाकिस्तान, सऊदी अरब और इटली के प्रतिनिधियों की बैठक हुई. तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा कि ईरान पर नया हमला तनाव बढ़ाएगा और युद्ध पूरे क्षेत्र में फैल सकता है. उन्होंने कहा कि इस संघर्ष को खत्म करने का रास्ता बातचीत और कूटनीति ही है।  फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने भी नई सैन्य कार्रवाई से बचने की चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से किसी को फायदा नहीं होगा और इससे तेल की कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है. जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने कहा कि जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ईरान के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, ताकि वह परमाणु हथियार हासिल न करे।  ईरान ने समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल काटने की बनाई योजना नई सैन्य कार्रवाई की आशंका के बीच ईरान ने खाड़ी में समुद्र के नीचे बिछी संचार केबल को निशाना बनाने की योजना तैयार की है. दो वरिष्ठ ईरानी सुरक्षा अधिकारियों ने रॉयटर्स को यह जानकारी दी है. एक अधिकारी ने कहा कि अगर ईरान पर हमला हुआ तो समुद्र के नीचे की केबल से लेकर सैन्य ठिकानों तक कोई जगह सुरक्षित नहीं रहेगी. अधिकारी ने दावा किया कि ईरान को इन केबल तक पूरी पहुंच है और वह इन्हें नष्ट कर सकता है।  ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के राजनीतिक मामलों के उप प्रमुख यदोल्लाह जावानी ने भी कहा है कि अगर ईरानी बुनियादी ढांचे पर हमला हुआ तो ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे मौजूद सात प्रमुख इंटरनेट केबल को निशाना बना सकता है।  केबल कटने से इंटरनेट और कारोबार पर असर समुद्र के नीचे बिछी केबल दुनिया के करीब 99 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक को पहुंचाती हैं. हालांकि, होर्मुज स्ट्रेट से अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ का एक प्रतिशत से भी कम गुजरता है. इसके बावजूद कई केबल कटने से इंटरनेट की रफ्तार धीमी हो सकती है और वित्तीय लेनदेन, ऑनलाइन कारोबार और क्लाउड सेवाओं पर असर पड़ सकता है।  इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इंटरनेट ट्रैफिक को दूसरी लाइनों पर कितनी जल्दी भेजा जा सकता है और उन नेटवर्क में कितनी क्षमता उपलब्ध है. युद्ध के दौरान केबल की मरम्मत भी मुश्किल हो सकती है, क्योंकि बीमा लागत बढ़ने और समुद्री क्षेत्र में जाने की अनुमति मिलने में देरी हो सकती है।  खाड़ी देशों के तकनीकी निवेश पर भी खतरा खाड़ी के देशों ने तेल पर निर्भरता कम करने और खुद को एआई के बड़े केंद्र के तौर पर विकसित करने के लिए तकनीकी बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है. अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के साथ उनके संबंध भी इसी वजह से बढ़े हैं. ईरान के हमलों में मार्च में संयुक्त अरब अमीरात में अमेजन वेब सर्विसेज की दो सुविधाओं को नुकसान पहुंचने की बात कही गई थी. बहरीन में भी उसकी एक सुविधा के पास बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा था।  जमीन के रास्ते इंटरनेट ट्रैफिक के लिए वैकल्पिक मार्ग मौजूद हैं. खाड़ी सरकारें और अमेरिकी तकनीकी कंपनियां भी नेटवर्क को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए नए बुनियादी ढांचे में निवेश कर रही हैं. माइक्रोसॉफ्ट ने 2030 तक मध्य पूर्व में समुद्र के नीचे और जमीन के रास्ते कनेक्टिविटी पर 40 करोड़ डॉलर से ज्यादा निवेश करने की योजना बनाई है। 

भारत आने से पहले ट्रंप के मंत्री का बड़ा बयान, India-US ट्रेड डील अंतिम चरण के करीब

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप के मंत्री मार्को रुबियो आज भारत आ रहे हैं और यहां आने से पहले ही उन्होंने एक बड़ी खुशखबरी दे दी है. ये भारत-अमेरिका के बीच होने वाली ट्रेड डील से जुड़ी हुई है. अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है कि India-US Trade Deal फाइनल होने वाली है और दोनों देश इसके बेहद करीब पहुंच गए हैं।  इस दौरान रुबियो ने अमेरिका द्वारा ग्राहम एक्ट के तहत रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में छूट को लेकर भी बात की और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, कीमतों और राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिकी विदेश नीति के फैसलों में कई कारकों पर विचार किया जाता है।  'India-US डील होने वाली है!' अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि वाशिंगटन भारत के साथ एक व्यापार समझौता फाइनल करने के बहुत करीब है. इसके साथ ही उन्होंने भारत के साथ अमेरिका की व्यापार वार्ता को डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा छूट संबंधी फैसलों से भी जोड़ा. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, 'हम अभी भारत के साथ एक व्यापार समझौता फाइनल करने की कोशिश कर रहे हैं. हम ऐसा करने के बहुत करीब हैं।  US के मंत्री ने बताया- क्यों दी रूस को छूट?  रूसी तेल (Russian Oil) और गैस के मुद्दे पर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में हमें वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर पड़ने वाले असर की वजह से प्रतिबंधों में छूट देनी पड़ी है. हमें इन सभी चीजों को संभालना पड़ता है. अभी हम भारत के साथ एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के काफी करीब हैं. जब राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी छूट या इस तरह के अन्य मामलों पर कोई फैसला लेते हैं, तो हम इन बातों को भी ध्यान में रखते हैं।  रुबियो ने आगे कहा कि हर देश के सामने कई जटिल कारक होते हैं, जिन्हें ध्यान में रखना जरूरी होता है. अमेरिकी विदेश मंत्री के मुताबिक, भौगोलिक स्थिति एक वास्तविकता है. कुछ देशों के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत खोजना बहुत मुश्किल होता है और यह कोई बहाना नहीं है, लेकिन विदेश नीति तय करते समय इन सभी बातों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।  Trump के फैसले पर दिया था ये बयान गौरतलब है कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने बीते शनिवार को अचानक रूसी तेल खरीदारों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने के फैसले को रोक दिया था और इसके पीछे तर्क दिया कि यह फैसला सुरक्षा कारणों की वजह से लिया गया है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ट्रंप के इस फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि Donald Trump 60 दिनों का समय लेना चाहते हैं, ताकि वे यह समझ सकें कि रूस पर प्रतिबंध लगाने और अन्‍य देशों पर टैरिफ लगाने का ग्‍लोबल इकोनॉमी पर क्‍या असर होगा।  इसके साथ ही रुबियो ने भारत की रूसी तेल खरीद पर भी बात की थी और कहा कि भारत जैसे देश ने अपनी एनर्जी जरूरतों के सोर्स में विविधता लाई है, लेकिन वे अभी भी रूस से काफी मात्रा में तेल खरीद रहे हैं, जिसका कारण है कि कोई भी देश रातों-रात पूरी तरह से दूसरे सोर्स पर निर्भर नहीं हो सकता है।   

रूस पर प्रतिबंधों से पीछे हटे ट्रंप? भारत-चीन को कैसे मिल सकती है राहत

मॉस्को  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया फैसलों ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर वॉशिंगटन की नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ ट्रंप रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूसी डीजल के निर्यात को अनुमति देने, रूस पर कुछ प्रतिबंधों में छूट देने और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की आलोचना करने से दोनों सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ा है. इन घटनाओं से ऐसा संकेत मिलता है कि ट्रंप अब युद्ध को लेकर जेलेंस्की की रणनीति का समर्थन करने के बजाय उन पर समझौते के लिए दबाव बना रहे हैं।  हालांकि यह कहना कि अमेरिका पूरी तरह यूक्रेन के खिलाफ हो गया है, ये नहीं कहा जा सकता है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के सामने फिलहाल चुनौती उनके देश में होने वाले मिड टर्म इलेक्शन और दबाव से बाहर निकलना है. यही वजह है कि उन्होंने इस वक्त अपना ध्यान यूक्रेन के मसले से हटाकर चुनाव पर टिका रखा है. ये स्थिति जेलेंस्की के लिए सबसे ज्यादा असहज हो गई है. वे खुलकर ट्रंप के खिलाफ बोल रहे हैं और अपना भरोसा यूरोपियन यूनियन पर जता रहे हैं।  90 मिनट की फोन कॉल के बाद क्या बदला? 9 अक्टूबर, 2026 को पुतिन के साथ फोन पर बातचीत के बाद ट्रंप ने रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ाने वाले समझौते की घोषणा की. इसके तहत रूस को अमेरिकी और वैश्विक बाजारों में पहले 3 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा डीजल भेजना था. इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति का प्रस्ताव रखा गया. इस समझौते के साथ रूसी ईंधन पर कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों में भी राहत दी गई. 16 अक्टूबर को जारी कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने ग्राहम कानून के कई प्रावधानों से छूट देने के लिए राष्ट्रीय हित का हवाला दिया. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे ईंधन की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. अब यूक्रेन के लिए समस्या ये है कि रूस को तेल उत्पाद बेचने का मौका मिलने से उसकी कमाई बढ़ सकती है. इसी धन का इस्तेमाल युद्ध जारी रखने के लिए किया जा सकता है. जेलेंस्की ने इस फैसले को अनुचित बताते हुए चेतावनी दी है कि डीजल के बाद रूस के साथ गैस और दूसरे क्षेत्रों में भी व्यापारिक समझौते हो सकते हैं. उनके मुताबिक इससे प्रतिबंधों में व्यापक ढील का रास्ता खुल सकता है।  भारत-चीन का क्या फायदा? अब ट्रंप के लिए मिड टर्म इलेक्शन गले की हड्डी बना हुआ है, जिसे लेकर उन्हें अपने देश में दबाव का सामना करना पड़ रहा है. इसे खत्म करने के लिए ट्रंप डीजल की आपूर्ति बढ़ाने वाला समझौता किया है. इस परिस्थिति में रूस से तेल खरीदने वाले टॉप सप्लायर्स पर अभी वो 100 फीसदी टैरिफ वाली तलवार टल गई है, जो मुसीबत साबित होने वाली थी. रूस से तेल लेने वाले देशों चीन-भारत सबसे ऊपर हैं, ऐसे में रूस को प्रतिबंधों और टैरिफ में राहत मिलने का सीधा मतलब ये है कि भारत-चीन को आंशिक तौर पर फायदा होगा।  जेलेंस्की पर नाराजगी की वजह क्या है?     ट्रंप और जेलेंस्की के बीच मतभेद केवल रूसी ईंधन तक सीमित नहीं हैं. अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने की दिशा में कदम उठाए, क्योंकि इन हमलों से रूस की ईंधन आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें बढ़ सकती हैं।      अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यूक्रेन के हमले जारी रहने के बाद ट्रंप ने रूस के साथ डीजल समझौता किया. वहीं दूसरी तरफ जेलेंस्की का आरोप है कि यूक्रेन ने अमेरिकी आग्रह पर ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की कोशिश की, लेकिन रूस ने यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर हमले जारी रखे।      इसी वजह से उन्होंने रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले दोबारा शुरू करने की घोषणा की. यह टकराव दिखाता है कि दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने की शर्तों पर सहमति नहीं बन पा रही है।      ट्रंप ने यह भी कहा है कि पुतिन, जेलेंस्की के मुकाबले शांति समझौता करने के लिए अधिक इच्छुक दिखाई देते हैं. इस बयान से यूक्रेन की चिंता बढ़ी है, क्योंकि इससे युद्ध के लिए रूस के बजाय यूक्रेन को जिम्मेदार ठहराने का राजनीतिक दबाव बन सकता है. स्टारलिंक के लिमिटेड एक्सेस से उठे सवाल जेलेंस्की ने यूरोपीय नेताओं के सामने अमेरिकी स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा पर लगी गति संबंधी पाबंदियों का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि इन सीमाओं से यूक्रेन की एंटी ड्रोन एक्टिविटी और सैन्य रसद पर असर पड़ा. युद्ध में अमेरिकी तकनीक और सहायता पर यूक्रेन की निर्भरता उसे मुश्किल स्थिति में डालती है. ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन के दौरान जेलेंस्की ने 2027 के लिए कम से कम 70 अरब यूरो की अतिरिक्त सहायता मांगी. उनका कहना था कि यूक्रेन को रक्षा, हथियारों और देश की मजबूती बनाए रखने के लिए इस धन की जरूरत होगी. यह मांग बताती है कि कीव अब यूरोप से ज्यादा आर्थिक और सैन्य समर्थन हासिल करना चाहता है।  क्यों जेलेंस्की के पीछे ही पड़ गए ट्रंप? ट्रंप के फैसलों के पीछे तीन संभावित कारण दिखाई देते हैं –     अमेरिका में ईंधन की कीमतों को कम करके घरेलू आर्थिक दबाव घटाना.     रूस के साथ सीधे समझौते के जरिए युद्ध समाप्त करने की कोशिश करना.     यूक्रेन पर ऐसी शर्तें स्वीकार करने का दबाव बनाना, जिन्हें अमेरिका शांति वार्ता के लिए जरूरी मानता है।  अगर इसका दूसरा पहलू देखें, तो रूस को आर्थिक राहत मिलने से पुतिन की स्थिति मजबूत हो सकती है, जबकि यूक्रेन की बातचीत करने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है. अमेरिकी नीति पर आलोचना करने वाले सांसदों ने भी चेतावनी दी है कि रूसी ईंधन की बिक्री से मॉस्को को युद्ध के लिए अतिरिक्त संसाधन मिल सकते हैं. फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम यह संकेत देता है कि ट्रंप की प्राथमिकता यूक्रेन को बिना शर्त समर्थन देने के बजाय अमेरिकी आर्थिक हितों और रूस के साथ संभावित समझौते को आगे बढ़ाना है. इससे जेलेंस्की पर दबाव बढ़ रहा है और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं।   

ट्रंप का बड़ा ऐलान: भारत समेत 5 देशों पर अब नहीं लगेगा 100% टैरिफ

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत पांच देशों को रूस से तेल और गैस खरीदने पर टैरिफ से छूट देने का ऐलान किया है. यह फैसला 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के तहत लगाया गया था, जिसमें इन देशों को राष्ट्रीय हित के तहत छूट दी गई है. ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इन पांच देशों को रूस से ऊर्जा खरीदने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा, जिससे उनके आर्थिक और ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।  चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान इन पांच देशों में शामिल है. अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कार्यकारी आदेश ऐसे समय में आया है, जब रूस को लेकर वे नरम रुख अपना रहे हैं. वहीं, सार्वजनिक रूप से वे यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की आलोचना भी कर रहे हैं।  ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए 'रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी अधिनियम' के तहत लगाए गए प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों से छूट देने का फैसला किया है. शुक्रवार शाम जारी एक कार्यकारी आदेश में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ग्राहम एक्ट' के तहत लगाए जाने वाले प्रतिबंधों, पाबंदियों और टैरिफ से छूट का ऐलान किया है. ट्रंप ने आदेश में कहा कि वह राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए यह फैसला ले रहे हैं।  ट्रंप ने पिछले महीने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों पर सख्ती बढ़ाने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें रूस के बड़े तेल खरीदारों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था. इसकी समयसीमा 18 अक्टूबर को खत्म होने वाली थी. लेकिन शुक्रवार देर रात जारी कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने फिलहाल इन टैरिफ और संबंधित प्रतिबंधों को लागू करने से छूट दे दी. उन्होंने कांग्रेस को बताया कि मौजूदा समय में यह छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. हालांकि राहत को स्थायी फैसला नहीं माना जा सकता. ट्रंप बाद में परिस्थितियों के अनुसार फिर से टैरिफ लगाने का विकल्प अपने पास रख सकते हैं. यही वजह है कि भारत को राहत तो मिली है लेकिन व्यापारिक अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।  ट्रंप ने किस कानून के तहत टैरिफ लगाने की तैयारी की थी?     इस विवाद की जड़ रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाला कानून है जिसे ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम से बताया गया है. इसका मकसद रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना था. कानून में रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ उन विदेशी देशों पर भी कार्रवाई का प्रावधान था जो रूस से तेल खरीदते हैं।      इसके तहत भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुलता. इसके अलावा रूस के ऊर्जा उत्पादों के अमेरिकी आयात पर 500 फीसदी तक टैरिफ और रूसी संस्थाओं के खिलाफ प्रतिबंधों का प्रावधान भी बताया गया था. हालांकि कार्यकारी आदेश के बाद ये उपाय फिलहाल लागू नहीं किए जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा कानून रद्द हो गया है।  आखिर अमेरिका ने आखिरी वक्त पर क्यों लिया यू-टर्न?     पहली वजह: अमेरिका में मिड टर्म चुनाव नजदीक हैं. ऐसे समय में ईंधन की कीमतें और महंगाई आम मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे बन सकती हैं. यदि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाते तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर उसका असर पड़ सकता था. इससे कीमतें बढ़ने का जोखिम भी रहता. इसलिए घरेलू आर्थिक दबाव ट्रंप प्रशासन के फैसले को प्रभावित करने वाला एक कारण है।      दूसरी वजह: रूस दुनिया के बड़े तेल सही ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है. उसके तेल के प्रवाह पर बहुत ज्यादा रोक लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. अमेरिका के लिए भी महंगी ऊर्जा आर्थिक चुनौती बन सकती है. ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की योजना को फिलहाल रोकना बाजार में अनिश्चितता कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि ट्रंप के आदेश में अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने की इच्छा को वजह नहीं बताया गया है।  आधिकारिक तौर पर फैसला राष्ट्रीय हित के आधार पर लिया गया है.     तीसरी वजह: टैरिफ को फिलहाल टालने से अमेरिका के पास आगे की बातचीत और रणनीति के लिए विकल्प खुले रहते हैं. यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो ट्रंप प्रशासन इन शुल्कों को फिर लागू करने पर विचार कर सकता है. यानी यह कदम रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव की नीति को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे कुछ समय के लिए रोकने जैसा है।  भारत को कितनी बड़ी राहत मिली? भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस उसके प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है. यदि भारतीय सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती थी. इससे भारत के निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने और अमेरिकी खरीदारों की मांग घटने का खतरा था।  भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में पिछले साल रूसी तेल की खरीद को लेकर तनाव बढ़ा था. उस समय ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सामान्य टैरिफ के अलावा रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ा अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाया था. हालांकि फरवरी 2026 में अतिरिक्त शुल्क हटा दिया गया और पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी किया गया. ऐसे में नया 100 फीसदी टैरिफ लागू होना व्यापार संबंधों के लिए एक और बड़ी चुनौती बन सकता था. फिलहाल इस आशंका से राहत मिली है। 

ट्रंप के समर्थन में फिर खुला एलन मस्क का खजाना, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले बड़ी तैयारी

न्यूयॉर्क दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क राष्ट्रपति ट्रम्प की रिपबल्किन पार्टी को मिडटर्म चुनाव में जिताने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते है। इस बार वे पिछले चुनाव से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई से सितंबर तक के 3 महीने में ही रिपब्लिकन पार्टी को 276 मिलियन डॉलर यानी करीब 2,600 करोड़ रुपए से ज्यादा चंदा दिया गया है। इतना पैसा अब तक किसी शख्स ने मिडटर्म चुनाव में खर्च नहीं किया। मस्क ने अकेले इतना चंदा दिया कि डेमोक्रेटिक पार्टी को उस तिमाही में अपने सभी चंदा देने वालों से मिलाकर भी इतनी रकम नहीं मिली। पिछले चुनाव से ₹700 करोड़ ज्यादा मदद दी मस्क ने 2025-26 में अब तक रिपब्लिकन पार्टी को करीब 366 मिलियन डॉलर (करीब 3500 करोड़ रुपए) दिए हैं। यह रकम 2023-24 के चुनाव में दिए गए उनके करीब 290 मिलियन डॉलर (करीब 2800 करोड़ रुपए) से ज्यादा है। मस्क की दी नई रकम से मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को आर्थिक बढ़त मिली है। वहीं इसके मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी का कोई भी अरबपति चंदा देने वाला व्यक्ति मस्क जितना पैसा खर्च नहीं कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने रिपब्लिकन पार्टी के सीनेट लीडरशिप फंड को 158 मिलियन डॉलर का योगदान दिया। इसके अलावा, उन्होंने अमेरिका PAC को 76 मिलियन डॉलर दिए। यह राजनीतिक समूह रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करता है और कई चुनावी क्षेत्रों में पार्टी के पक्ष में अभियान चलाता है। मस्क ने 2024 में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करने के लिए अमेरिका PAC की स्थापना की थी।अमेरिका PAC के प्रवक्ता एंड्रयू रोमियो के मुताबिक, इस तरह के बड़े आर्थिक योगदान से रिपब्लिकन पार्टी को अपना संदेश मतदाताओं तक पहुंचाने में मदद मिलती है। हालांकि, चुनाव में किसी पार्टी की सफलता कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें उम्मीदवारों की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं का रुख शामिल हैं। मस्क की राजनीतिक सक्रियता के पीछे उनके कारोबारी हितों को लेकर भी चर्चा होती रही है। उनकी कंपनी स्पेसएक्स को अमेरिकी सरकार से बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिलते हैं। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद उनके प्रशासन में मस्क की भूमिका को लेकर भी बहस हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक सांसद मस्क के सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स और डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) में उनकी भूमिका की जांच की मांग करते रहे हैं।गौरतलब है कि ट्रंप और मस्क के बीच पिछले साल गंभीर मतभेद सामने आए थे। हालांकि, बाद में दोनों के संबंध फिर बेहतर हुए। ट्रंप ने मस्क को नेशनल मेडल ऑफ साइंस से सम्मानित किया और उन्हें आज के दौर का एडिसन बताया।अब अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में मस्क की भारी फंडिंग ने राजनीतिक चंदे और बड़े कारोबारियों के प्रभाव को लेकर बहस तेज कर दी है। आने वाले चुनावों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रिपब्लिकन पार्टी को मिले इस आर्थिक समर्थन का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ता है। मस्क के चंदे से यह भी साफ हुआ है कि वे अमेरिकी राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहना चाहते हैं। मई 2025 में उन्होंने कहा था कि भविष्य में वे राजनीतिक खर्च काफी कम कर देंगे। ट्रम्प की मस्क से फिर नजदीकी बढ़ी मस्क के पास कई बड़ी कंपनियां हैं, जिनमें से कुछ को अमेरिकी सरकार से बड़े ठेके भी मिले हैं। पिछले साल ट्रम्प के साथ विवाद के बाद से मस्क ने अपने राजनीतिक कामकाज को लेकर काफी कम सार्वजनिक बयान दिए थे। बता दें कि, दोनों के बीच पिछले साल विवाद इतना बढ़ गया था कि ट्रम्प ट्विटर छोड़ ट्रुथ पर अपना बयान जारी करने लगे। पिछले साल जनवरी में ट्रंप ने सरकारी खर्च कम करने के लिए मस्क को ‘डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी’ (DOGE) का इंचार्ज बनाया था, लेकिन कुछ महीनों बाद ही दोनों के बीच गंभीर मतभेद पनप गए. हालांकि बाद में मस्क ट्रंप के खेमे में लौट आए और उनके करीबी बने हुए हैं. ट्रंप ने मस्क को प्रतिष्ठित ‘नेशनल मेडल ऑफ साइंस’ से सम्मानित किया. SpaceX के प्रमुख और पांच अन्य टेक्नोलॉजी लीडर्स को सम्मान देने के समारोह में ट्रंप ने मस्क को “आज के दौर का एडिसन” बताया था।  हालांकि, चुनाव नजदीक आने के बाद अब दोनों के रिश्ते फिर सुधरते दिख रहे हैं। पिछले दो हफ्तों में दोनों तीन कार्यक्रमों में साथ दिखाई दिए और एक-दूसरे की तारीफ भी की। ट्रम्प मस्क को अपने साथ चीन के दौरे पर भी लेकर गए थे। मस्क के इतना पैसा खर्च करने से जाहिर है कि वे दक्षिणपंथी राजनीति के साथ अपनी भागीदारी बनाए रखना चाहते हैं। 3,000 लोगों की टीम घर-घर जाकर वोट मांग रही रिपब्लिकन पार्टी को ज्यादातर चंदा मस्क के बनाए राजनीतिक संगठन अमेरिका PAC के जरिए मिलता है। यह संगठन रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करता है। अमेरिका PAC के प्रवक्ता एंड्रयू रोमियो ने कहा कि अगर नवंबर में डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव जीत जाती है तो अमेरिका का कम्युनिष्ट, वोक और बिना सीमा वाला देश बनने का खतरा है। उन्होंने कहा कि मस्क के बड़े निवेश से रिपब्लिकन पार्टी को अपना पक्ष लोगों तक पहुंचाने का मौका मिला है, ताकि वह चुनाव में इतिहास के रुझान को बदलने की कोशिश कर सकें। मस्क सिर्फ बेहिसाब पैसा खर्च नहीं कर रहे, बल्कि उनकी टीम के 3000 लोग घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क भी कर रहे हैं। वे उन मतदाताओं को वोट डालने के लिए तैयार कर रहे हैं, जो आमतौर पर चुनाव में कम हिस्सा लेते हैं। टेक्सास में सबसे बड़ा दांव, एक उम्मीदवार पर ₹1500 करोड़ खर्च मस्क के चुनावी अभियान का सबसे दिलचस्प हिस्सा टेक्सास का सीनेट चुनाव है। यहां रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन के समर्थन में करीब 1500 करोड़ रुपए के विज्ञापन अभियान की शुरुआत हुई है। मस्क के लिए टेक्सास का चुनाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि वे राज्य की राजधानी ऑस्टिन में रहते हैं और यहां उनका बड़ा कारोबारी निवेश है। उनकी टीम सिर्फ टीवी विज्ञापनों के जरिए प्रचार नहीं कर रही, बल्कि घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क भी कर रही है। प्रचारक लोगों के दरवाजों पर पर्चे लगा रहे हैं। इन पर्चों में दावा किया जा रहा है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता पूरे अमेरिका में चुनाव जीत रहे हैं और टेक्सास … Read more

व्हाइट हाउस में केटी जकारिया की पहली ब्रीफिंग का मजेदार पल, ट्रंप और पति के नाम पर हुईं कन्फ्यूज

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई प्रेस सेक्रेटरी केटी जकारिया ने व्हाइट हाउस के प्रेस ब्रीफिंग रूम में मंगलवार को पहली बार पत्रकारों का सामना किया. लेकिन उनका डेब्यू लंबा नहीं चला. करीब 14 मिनट की इस ब्रीफिंग में उन्होंने सिर्फ तीन मीडिया संस्थानों से सवाल लिए और फिर अचानक सेशन खत्म कर दिया।  ब्रीफिंग की शुरुआत में जकारिया ने ट्रंप की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि वह राष्ट्रपति के साथ काम करने को लेकर सम्मानित महसूस कर रही हैं और लंबे समय से उनके लिए काम करना चाहती थीं. इसके बाद उन्होंने ट्रंप प्रशासन की नीतियों और उपलब्धियों पर तैयार बयान पढ़ा।  ब्रीफिंग का सबसे चर्चित पल तब आया, जब उनसे पूछा गया कि व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी जैसी व्यस्त जिम्मेदारी के साथ वह अपने चार बच्चों के लिए समय कैसे निकालेंगी.जकारिया ने जवाब में अपने पति का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि बच्चों के साथ शाम का वक्त न बिताना उनके लिए स्वीकार्य नहीं है. इसी दौरान शब्दों का ऐसा उलटफेर हुआ कि वह ट्रंप को अपना पति कह बैठीं.उन्होंने कहा- मेरे प्रेसिडेंट… माफ कीजिए, मेरे पति… जब जकारिया को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने इसे मजाक में लेते हुए कहा कि यह अच्छा वाला था. इसके तुरंत बाद उन्होंने फिर ट्रंप की तारीफ की और कुछ ही देर में ब्रीफिंग खत्म कर दी।  सिर्फ 14 मिनट चली पहली ब्रीफिंग जकारिया की पहली प्रेस ब्रीफिंग में सवाल-जवाब का हिस्सा बेहद छोटा रहा. उन्होंने ब्राइटबार्ट, फॉक्स न्यूज और डेली मेल से सवाल लिए. इसके बाद उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्द मरीन वन से अलास्का की यात्रा के लिए रवाना होने वाले हैं और पत्रकार उनसे वहीं सवाल पूछ सकते हैं।  हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप करीब डेढ़ घंटे बाद व्हाइट हाउस से रवाना हुए. इस वजह से ब्रीफिंग को अचानक खत्म करने का उनका तर्क भी चर्चा में रहा. ट्रंप ने हालांकि जकारिया के प्रदर्शन की आलोचना नहीं की. पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें लगा कि जकारिया ने “बहुत अच्छा” काम किया।  कौन हैं केटी जकारिया? केटी जकारिया कैलिफोर्निया की रहने वाली हैं और लंबे समय से रिपब्लिकन राजनीति से जुड़ी रही हैं. उन्होंने पेपरडाइन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और 2011 में कानून की डिग्री हासिल की. वह फॉक्स न्यूज समेत दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ट्रंप की नीतियों का बचाव करती नजर आती रही हैं।  2026 में उन्होंने कुछ समय होमलैंड सिक्योरिटी विभाग में प्रवक्ता के तौर पर काम किया. इसके बाद वह ट्रंप की सोशल मीडिया कंपनी से जुड़ीं और कम्युनिकेशन एडवाइजर के तौर पर काम किया. ट्रंप ने 9 अक्टूबर को उन्हें व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी बनाने का ऐलान किया. उन्होंने अगस्त में पद छोड़ने वाली करोलिन लेविट की जगह ली है।   

रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने की मांग, जेलेंस्की पर क्यों भड़के डोनाल्ड ट्रंप?

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से यूक्रेनी समकक्ष जेलेंस्की पर निशाना साधा है। यूक्रेन की तरफ से रूस के कच्चा तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों को देखते हुए ट्रंप ने अपना गु्स्सा जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यूक्रेन को उसका नया राष्ट्रपति मिले। बता दें, कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह ऐलान किया था कि उन्होंने रूस के साथ समझौता किया है। इसके तहत अमेरिका रूस से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदेगा। इसके अलावा रूस के वैश्विक बाजार में तेल बेचने पर भी अमेरिका आपत्ति नहीं जताएगा। शनिवार को वाइट हाउस के बाहर मीडिया से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से यूक्रेन को रूसी रिफाइनरियों पर हमला करने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, "उन्हें (यूक्रेन को) यह (रूसी रिफाइनरियों को निशाना बनाना) जरूर बंद कर देना चाहिए।" यूक्रेन की लीडरशिप पर सवाल उठाते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कीव को अब अपना नया नेता चुन लेना चाहिए, जो कि बेहतर तरीके से समझौता कर सकता हो। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप लगातार यूक्रेनी राष्ट्रपति से रूस के तेल रिफाइनरियों को निशाना न बनाने के लिए कह रहे हैं। लेकिन पिछले एक हफ्ते से यूक्रेन लगातार इन्हीं रिफाइनरियों को निशाना बना रहा है। बता दें, यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ट्रंप के इस फैसले का विरोध किया था, जिसमें उन्होंने रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की आलोचना की थी। जेलेंस्की ने कहा था कि अगर अमेरिका रूस से तेल खरीदता है, तो इससे मॉस्को के युद्ध जारी रखने के लिए अलग फंड मिलता रहेगा। इस फैसले से युद्ध को खत्म करने में आसानी नहीं होगी। रूस से डीजल क्यों चाहता है अमेरिका? अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ा सवाल वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती कीमतों का है। ट्रंप को मिडटर्म इलेक्शन का सामना करना है। ऐसे में बढ़ी हुई तेल कीमतें उनके लिए खतरा बन सकती है। चूंकि अमेरिका में ज्यादातर मालढुलाई का काम ट्रकों के जरिए ही होता है। ऐसे में डीजल यहां जरूरी है। होर्मुज के बंद होने के बाद ट्रंप के पास दूसरा कोई बड़ा ऑप्शन है नहीं। वेनेजुएला के तेल पर भले ही ट्रंप का कब्जा हो। लेकिन उसे रिफाइन करने की क्षमता अमेरिका के पास नहीं है। ऐसे में ट्रंप के सामने रूस के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। दूसरी तरफ जेलेंस्की हैं, जिन्हें इस बात का अंदाजा था कि ट्रंप इस फैसले पर ऐक्शन ले सकते हैं। इसलिए वह शुरुआत से ही रूस की रिफाइनरियों पर हमला करके उसकी क्षमता को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। जब ट्रंप ने जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ के जरिए उन्हें रूस पर हमले रोकने के लिए कहा, तो जेलेंस्की ने शर्त रखी थी कि रूस को भी वादा करना होगा कि वह यूक्रेन के बिजली इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना नहीं बनाएगा। हालांकि, ट्रंप ने जोर दिया था कि रूस भले ही कोई वादा करे या न करे, लेकिन कीव को यह हमले रोकने होंगे। इस पर जेलेंस्की ने डील करने से इनकार कर दिया।