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ट्रंप का दावा मेलोनी ने फोटो के लिए मिन्नतें कीं, इटली PM ने किया खंडन

वॉशिंगटन  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जियो मेलोनी हाल ही में फ्रांस में हुई G7 समिट में मिले थे। इस ग्लोबल समिट में शामिल होने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गए थे। फ्रांस में समिट के पूरा होने के बाद डोनल्ड ट्रंप और जॉर्जियो मेलोनी के बीच फोटो खिंचवाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ट्रंप ने दावा किया कि इटली की प्रधानमंत्री ने उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए मिन्नतें कीं। 'वह फिर से दोस्त बनना चाहती हैं' ट्रंप के इस बयान के सामने के बाद जॉर्जिया मेलोनी ने शुक्रवार, 19 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके ट्रंप के इन सभी दावों को खारिज कर दिया और कहा- न मैं और न ही इटली ने कभी किसी से भीख मांगी है। अब इस मामले को लेकर ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट शेयर किया है और कहा है कि जॉर्जिया मेलोनी उनसे फिर से दोस्ती करना चाहती हैं। 'मेलोनी ने बार-बार फोटो लेने के लिए कहा' अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'फ्रांस में G-7 मीटिंग के दौरान इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने बार-बार मेरे साथ तस्वीर खिंचवाने की गुजारिश की।' ट्रंप ने आगे बताया, 'इटली में उनकी लोकप्रियता का स्तर गिर रहा है, शायद इसलिए क्योंकि जब ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने या बनाने से रोकने की बात आई, तो उन्होंने अमेरिका का साथ देने से इनकार कर दिया (हालांकि NATO ने भी ऐसा ही किया था!)।' अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे लिखा, 'उन्होंने हमें इटली के लैंडिंग स्ट्रिप्स या रनवे का इस्तेमाल भी नहीं करने दिया, जिससे बहुत बड़ी लॉजिस्टिकल दिक्कत हुई और यह तब हुआ जब अमेरिका इटली और दूसरे तथाकथित NATO सहयोगियों की सुरक्षा के लिए हर साल अरबों डॉलर खर्च करता है।' ट्रंप ने आगे बताया, 'अब, जब अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से हरा दिया है, तो वह अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए फिर से दोस्ती करना चाहती हैं। नहीं, शुक्रिया!'

अमेरिका-ईरान डील पर सियासी घमासान तेज, रिपब्लिकन पार्टी में भी मतभेद गहराए

 वाशिंगटन  ईरान के साथ हुए समझौते को आलोचकों द्वारा कमजोर और आत्मसमर्पण करार दिए जाने के बाद चौतरफा घिरे राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया कि वह तेहरान के सामने झुक गए हैं या उसे भारी वित्तीय राहत सौंपने जा रहे हैं। ट्रंप ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा, "हम किसी बेबसी में नहीं मिले थे, बल्कि ईरान हताश था। वे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं! हम 60 दिनों की इस अवधि को देखेंगे। उन्हें कोई पैसा नहीं मिल रहा, 10 सेंट भी नहीं!" जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद वर्साय में ट्रंप द्वारा दूरस्थ रूप से हस्ताक्षरित इस प्रारंभिक समझौते का उद्देश्य एक व्यापक शांति की दिशा में 60 दिनों की तेज गति से काम शुरू करना था। इसके विपरीत, इस कदम ने देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। रिपब्लिकन खेमे में दरार रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के रुख से अलग हटकर इस समझौते की तीखी आलोचना की है। उन्होंने इसे दशकों की सबसे खराब विदेश नीति की भूल करार दिया है। दूसरी ओर, लेट-नाइट कॉमेडियन्स और सोशल मीडिया ट्रोल्स के लिए यह एक बड़ा मुद्दा बन गया है, जो इस समझौते की तुलना युद्ध जीतने और उसकी रसीद खो देने से कर रहे हैं। हालांकि इस उपहास का बड़ा हिस्सा राजनीतिक है, लेकिन व्हाइट हाउस के लिए सबसे गंभीर समस्या यह है कि अब आलोचना सिर्फ डेमोक्रेट्स तक ही सीमित नहीं रह गई है। ट्रंप ने खुद भी ऐसे बयान देकर अपनी मुश्किलें बढ़ा दी हैं जिसने अमेरिका के इजरायल-समर्थक गुटों को हैरान कर दिया है। उन्होंने ईरान के कुछ बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता रखने के अधिकार का समर्थन किया और ईरान के संवर्धित यूरेनियम के भंडार के महत्व को कम करके आंका। अमेरिकी राष्ट्रपति अब अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को भी स्वीकार कर रहे हैं, जो उनके पुराने वादे से बिल्कुल उलट है जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका यूरेनियम के किसी भी संवर्धन की अनुमति नहीं देगा। हालांकि, वह अब भी इस बात पर अड़े हैं कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ओबामा बनाम ट्रंप नीति पर विशेषज्ञों ने घेरा हालांकि, ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह समझौता एक मास्टरस्ट्रोक है और बराक ओबामा के 2015 के जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन(JCPOA) से कहीं बेहतर है, लेकिन नीति विशेषज्ञ इस दावे को चुनौती दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां ओबामा का समझौता कई सौ पन्नों का एक बेहद विस्तृत और तकनीकी दस्तावेज था, वहीं ट्रंप का यह महज डेढ़ पन्ने का अधूरा मसौदा केवल एक हाथ मिलाने के बदले तेहरान को सब कुछ सौंप देता है। इस स्थिति के कारण अब कैपिटल हिल के सांसद खुलकर बगावत पर उतर आए हैं, जिनमें कई ऐसे रिपब्लिकन वफादार भी शामिल हैं जो आमतौर पर ट्रंप की बातों को पत्थर की लकीर मानते हैं। पाकिस्तान को पछाड़ कतर बना नया बिचौलिया इस बीच, वेंस की स्विट्जरलैंड यात्रा स्थगित होने से मध्यस्थता करने वाले देशों का क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह बदल गया है। पाकिस्तान, जिसने खुद को मुख्य राजनयिक मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया था और अप्रैल में आमने-सामने की वार्ताओं की गर्व से मेजबानी की थी, अचानक खुद को इस रेस से बाहर पा रहा है। इस्लामाबाद के अधिकारी इस उम्मीद में थे कि वे अमेरिका और ईरान के बीच इस ऐतिहासिक समझौते को अमली जामा पहनाकर एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक जीत हासिल करेंगे। लेकिन कतर के अचानक एक अमीर और पसंदीदा मध्यस्थ के रूप में उभरने से पाकिस्तान की स्थिति बेहद असहज हो गई है। वह अब उस शादी के मेहमान जैसा दिख रहा है जिसे ऐन वक्त पर पता चला कि शादी का वेन्यू ही बदल गया है। मागा गठबंधन में फूट इस समझौते का असली नुकसान मागा गठबंधन की आंतरिक शांति को हुआ है। एक तीखे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वेंस ने कूटनीतिक शालीनता को छोड़ सीधे यरुशलम पर हमला बोला। उन्होंने इजरायली अधिकारियों को दोटूक शब्दों में कहा कि वे जागें और जमीनी हकीकत को समझें। इसके साथ ही उन्होंने इजरायली कैबिनेट को याद दिलाया कि उनके दो-तिहाई रक्षा हथियारों का खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स उठाते हैं। वेंस ने गुस्से में कहा कि अगर मैं इजरायल सरकार की कैबिनेट में होता, तो मैं पूरी दुनिया में बचे अपने इकलौते शक्तिशाली सहयोगी पर इस तरह हमला नहीं कर रहा होता। यह सार्वजनिक टकराव मागा व्हाइट हाउस और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों में आई अचानक गिरावट को उजागर करता है। देश में आगामी चुनावों का सामना कर रहे इजरायली पीएम ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को हटाने से साफ इनकार कर दिया है, जो एक तरह से ट्रंप के युद्धविराम के प्रस्ताव को खारिज करना है। इस अभूतपूर्व दरार ने अमेरिका-इजरायल संबंधों को एक बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मोड़ पर खड़ा कर दिया है।  

ट्रंप बोले इजरायल के साथ मजबूत साझेदारी, लेकिन नेतन्याहू को रखना होगा “संतुलित”

 वाशिंगटन  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने शनिवार को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तारीफ करते हुए उन्हें योद्धा पीएम कहा है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब लेबनान में इजरायली सैन्य अभियानों को लेकर दोनों नेताओं के बीच गंभीर मतभेद और तनाव की खबरें सामने आ रही हैं। वाशिंगटन के पास कतर द्वारा उपहार में दिए गए एक नए एयर फोर्स वन विमान का अनावरण करने के बाद बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ बहुत अच्छी तरह से लड़ाई लड़ी। वह 28 फरवरी को शुरू हुए उस युद्ध का जिक्र कर रहे थे जिसे दोनों देशों ने मिलकर शुरू किया था। ट्रंप ने कहा कि जाहिर है कि हमने इजरायल के साथ मिलकर बहुत अच्छी लड़ाई लड़ी और इजरायल के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। हम बहुत मजबूत थे। और बीबी नेतन्याहू एक योद्धा प्रधानमंत्री हैं, और उन्हें इसी रूप में पहचाना जाना चाहिए। उन्हें इसका पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब इजरायली प्रधानमंत्री पर लेबनान में युद्ध जारी रखने के लिए भारी राजनीतिक दबाव बना हुआ है। थोड़ा संतुलित रखने की कोशिश एक्सिओस न्यूज आउटलेट के अनुसार, एक अलग साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू के साथ उनके मजबूत लेकिन बेहद नियंत्रित संबंध हैं। उन्होंने को बताया कि यह अच्छा है, लेकिन हमें उन्हें थोड़ा संतुलित रखना पड़ता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह इस क्षेत्र में इजरायली सैन्य कार्रवाइयों, विशेष रूप से लेबनान पर संभावित हमलों को प्रभावित कर सकते हैं, तो उन्होंने कहा कि वह ऐसे निर्णयों पर नियंत्रण रखने में पूरी तरह सक्षम होंगे। ट्रंप ने कहा कि हां, मैं ऐसा कर सकूंगा। मेरा मतलब है, वे मेरा बहुत सम्मान करते हैं, और वे वही करते हैं जो मैं कहता हूं। ट्रंप ने नेतन्याहू पर निकाला था गुस्सा इससे पहले ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते के बावजूद, लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल के अभियान पर गहरी निराशा व्यक्त की थी। इस महीने की शुरुआत में एक फोन कॉल के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू पर जमकर भड़ास भी निकाली थी। एक्सिओस की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जून को जब इजरायल के लेबनान पर हमलों के कारण ईरान ने कथित तौर पर शांति वार्ता रोक दी थी, तब ट्रंप ने फोन पर नेतन्याहू पर चिल्लाते हुए कहा था कि तुम बिल्कुल पागल हो गए हो। अगर मैं नहीं होता तो तुम जेल में होते। मैं तुम्हें बचा रहा हूं। अब हर कोई तुमसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इजरायल से नफरत कर रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की चेतावनी द वाशिंगटन पोस्ट ने मौजूदा और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने ट्रंप प्रशासन को चेतावनी दी है कि बेंजामिन नेतन्याहू ऐसे कदम उठा सकते हैं जिससे ईरान के साथ हुआ शांति समझौता कमजोर हो सकता है। अधिकारियों के अनुसार, खुफिया रिपोर्टों से पता चलता है कि इजरायल हिजबुल्लाह के खिलाफ अपना सैन्य अभियान जारी रखने का इरादा रखता है। नई खुफिया जानकारी से परिचित एक अमेरिकी अधिकारी का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल के अंत में इजरायल में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों के कारण नेतन्याहू की राजनीतिक नैया इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी घरेलू जनता को यह दिखाएं कि वह लेबनान से सेना वापस नहीं बुलाएंगे और हिजबुल्लाह के साथ लड़ाई तेज करने का इरादा रखते हैं। रिपोर्ट में ट्रंप के शांति ज्ञापन की शर्तों पर इजरायल की हताशा का भी वर्णन किया गया है। इजरायल और हिजबुल्लाह युद्धविराम पर सहमत लेबनान में दोनों पक्षों के बीच हुए घातक हमलों के बाद शुक्रवार को इजरायल और हिजबुल्लाह युद्धविराम पर सहमत हो गए। इन हमलों ने ईरान युद्ध को समाप्त करने वाले डोनाल्ड ट्रंप के शांति समझौते को उस पर हस्ताक्षर होने के दो दिन से भी कम समय में मुश्किल में डाल दिया था। एक अमेरिकी अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच यह संघर्ष विराम अमेरिका और कतर के मध्यस्थों द्वारा इजरायल और ईरान के साथ की गई वार्ता के बाद सुनिश्चित कराया गया है। अमेरिका में इजरायल के राजदूत येहिएल लेटर ने कहा कि इजरायल लेबनान में तत्काल युद्धविराम के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन केवल तभी जब हिजबुल्लाह समझौते का सम्मान करेगा और अपनी शत्रुता को समाप्त करेगा। दोनों पक्ष पहले अप्रैल में भी एक युद्धविराम पर सहमत हुए थे लेकिन उन्होंने एक-दूसरे पर हमले बंद नहीं किए थे। इस बीच, अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची कथित तौर पर आगे की वार्ता के लिए स्विट्जरलैंड की ओर जा रहे हैं।  

इजरायल में ट्रंप की लोकप्रियता को झटका, सिर्फ 11% लोगों ने माना युद्ध का विजेता

यरुशलम मिडिल-ईस्ट में हालिया संघर्ष के बाद सामने आए एक इजरायली चैनल के सर्वे ने वहां की राजनीति और अमेरिका-इजरायल संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. चैनल 12 के सर्वे के मुताबिक, बड़ी तादाद में इजरायली नागरिक न तो इस जंग में अपने देश को स्पष्ट विजेता मानते हैं और न ही उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा है कि वे ईरान के साथ किसी समझौते में इजरायल के हितों की रक्षा करेंगे।  सर्वे में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं, जिससे इजरायल की घरेलू राजनीति में बढ़ती असंतुष्टि के संकेत मिले हैं।  गुरुवार को पब्लिश हुए एक टेलीविज़न पोल में पाया गया कि बहुत कम इजरायली मानते हैं कि उनका देश ईरान के साथ हुई लड़ाई जीता है, या उन्हें भरोसा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस्लामिक रिपब्लिक के साथ डील करते वक्त उनके हितों का ध्यान रखेंगे। . नेतन्याहू के बर्ताव पर सवाल! चैनल 12 न्यूज़ के मुताबिक, ज़्यादातर इजरायली नागरिकों का मानना ​​है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बर्ताव से US-ईरान समझौते में इजरायल के हितों को नुकसान पहुंचा है. ये आंकड़े उस मजबूत समर्थन से बिल्कुल अलग हैं, जो इजरायली लोग सालों से हर पोल में ट्रंप को देते आए हैं।   हालांकि, अब इस हफ्ते साइन किए गए US-ईरान मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग की शर्तों को लेकर पूरे इजरायल में गहरी चिंता है, जबकि ट्रंप और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दोनों की तरफ से हाल ही में इजरायली अधिकारियों की कड़ी सार्वजनिक आलोचना से US-इजरायल संबंधों में दरार का संकेत मिलता है।  चैनल 12 के पोल में यह पूछा गया कि क्या नेतन्याहू के बर्ताव से US-ईरान समझौते में इजरायली हितों को फायदा हुआ या नुकसान; इसमें पाया गया कि 52% लोगों का कहना है कि इससे नुकसान हुआ, जबकि 24% को लगता है कि इससे मदद मिली और बाकी 24% को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।  यह पूछे जाने पर कि क्या वे ईरान के साथ समझौते में इजरायली हितों का ध्यान रखने के लिए ट्रंप पर भरोसा करते हैं? इस पर 71% लोगों ने कहा कि वे ऐसा नहीं करते हैं, जबकि केवल 13% ने कहा कि वे ऐसा करते हैं और अन्य 16% को नहीं पता. ये संख्या पिछले हफ्ते से इस सवाल पर ट्रंप के लिए गिरावट का संकेत देती हैं, जब आंकड़ा 62% से 21% था।  इन सवालों को एक सर्वे के हिस्से के रूप में शामिल किया गया था कि अगर अक्टूबर में आम चुनाव आज होते हैं, तो इजरायल के लोग किसको वोट देंगे, जिसमें दिखाया गया है कि जायोनी विपक्षी दल नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों की तुलना में ज्यादा सीटें जीतेंगे, लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों के बहुमत से कम रहेंगे।  ‘बिबी का समर्थन करने की सबसे ज्यादा संभावना’ ट्रंप प्रशासन और इजरायल के बीच मौजूदा मतभेद को और साफ करते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति ने गुरुवार को कहा कि वे आने वाले चुनावों में नेतन्याहू का समर्थन 'शायद' करेंगे, लेकिन पहले यह देखना चाहते हैं कि उनके खिलाफ और कौन चुनाव लड़ रहा है।  ट्रंप ने 'कान' (Kan) पब्लिक ब्रॉडकास्टर को फोन पर दिए इंटरव्यू में नेतन्याहू के निकनेम का इस्तेमाल करते हुए कहा, "मुझे देखना होगा कि कौन चुनाव लड़ रहा है, लेकिन मुझे बिबी बहुत पसंद हैं. सबसे ज्यादा संभावना यही है कि मैं उनका समर्थन करूंगा।  ट्रंप ने आगे कहा, "वह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें थोड़ा और समझदारी से काम लेना चाहिए." ऐसा लगता है कि वे लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायल के हमलों का जिक्र कर रहे थे, जिनके बारे में अमेरिका का दावा है कि वे बिना सोचे-समझे किए गए थे।   

ट्रंप के बदले सुर से मची हलचल, समझौते के बाद ईरान की मिसाइलों पर दिया चौंकाने वाला बयान

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो ईरान की मिसाइलों के जखीरे को खत्म करना चाहते थे, वो अब अपनी बात से पलट चुके हैं. उन्होंने कहा कि ईरान को कुछ बैलिस्टिक मिसाइलें रखने की इजाजत दी जा सकती है. जी-7 सम्मेलन के दौरान फ्रांस में ट्रंप ने इस बात का बचाव किया. उन्होंने कहा कि अगर दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान को भी कुछ रखने की अनुमति मिलनी चाहिए।  ट्रंप ने स्पष्ट किया कि मिसाइलें कोई बड़ी समस्या नहीं हैं क्योंकि वे सिर्फ एक जगह को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन न्यूक्लियर हथियार पूरे ग्रह को तबाह कर सकते हैं. उन्होंने सऊदी अरब और कतर जैसे देशों का उदाहरण दिया जिनके पास मिसाइलें हैं।  ट्रंप का कहना है कि ईरान को भी अनुपात में कुछ मिसाइलें रखने की छूट मिलनी चाहिए. इस बयान से अमेरिकी नीति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं क्योंकि पहले ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने पर जोर दिया जा रहा था।  ईरान के साथ समझौते की पृष्ठभूमि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. उस समय ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना और उसके न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश को रोकना मुख्य लक्ष्य था. लेकिन अब ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को कम महत्व दे रहा है।  ट्रंप ने कहा कि अगर यह समझौता नहीं होता तो और तीन-चार हफ्ते बमबारी जारी रखी जाती, लेकिन इससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो जाता और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी तबाही आ जाती. ट्रंप ने कहा कि अगर हम बमबारी जारी रखते तो रोज 500-700 मिलियन डॉलर का खर्च होता. हम चार हफ्तों में हथियारों के भंडार खत्म कर देते।  उन्होंने समझौते को आर्थिक तबाही से बचाने वाला बताया. ईरानी विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने इस MOU पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. समझौते का पूरा टेक्स्ट अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसकी वजह से आलोचना हो रही है।  यूरेनियम स्टॉक पर ट्रंप की नरम राय समझौते में ईरान को अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम स्टॉक को सौंपने की शर्त नहीं रखी गई है. यह स्टॉक 11 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त माना जाता है. इसके बजाय दोनों देश अगले दो महीनों में इस मुद्दे पर बातचीत करेंगे. ट्रंप ने कहा कि ईरान इन स्टॉक तक पहुंच ही नहीं सकता क्योंकि अमेरिका ने उसके तीन मुख्य न्यूक्लियर साइटों को बमबारी से तबाह कर दिया है।   ट्रंप का दावा है कि न्यूक्लियर डस्ट मलबे के नीचे दबा हुआ है और सिर्फ अमेरिका व चीन के पास उसे निकालने का उपकरण है. उन्होंने इसे मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण बताया लेकिन व्यावहारिक रूप से कम मूल्यवान माना. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास अन्य जगहों पर भी कम संवर्धित यूरेनियम का स्टॉक हो सकता है. ट्रंप ने फिर भी कहा कि अगले दो महीनों में यह मुद्दा चर्चा का मुख्य विषय रहेगा।  आगे की बातचीत और धमकी ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ईरान समझौते का उल्लंघन करता है तो अमेरिका फिर से बमबारी करेगा. उन्होंने कहा कि अगर वे समझौते का पालन नहीं करेंगे तो हम उन पर भारी बमबारी करेंगे. MOU एक सामान्य दस्तावेज है जिसमें सख्त कानूनी बाध्यता नहीं है. ट्रंप का कहना है कि बमबारी की धमकी ही काफी है।  उन्होंने यह भी माना कि यह स्थायी रोक तभी तक है जब तक वे राष्ट्रपति हैं. अगर कोई कमजोर राष्ट्रपति आया तो स्थिति बदल सकती है. अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि अगले 60 दिनों में स्विट्जरलैंड में और बातचीत होगी. इस दौरान ईरान को कुछ प्रतिबंधों में छूट दी जा रही है, खासकर तेल निर्यात पर. अमेरिका का कहना है कि यह छूट बहुत ज्यादा नहीं है क्योंकि ईरान पहले भी छूट-छूटकर तेल बेच रहा था।  आर्थिक और वैश्विक प्रभाव ट्रंप ने कहा कि ज्यादा बमबारी से वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू जातीं और आर्थिक संकट आ जाता. अब समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहेगा. तेल आपूर्ति बनी रहेगी. अमेरिका ईरानी फंड्स को भी वापस करने पर विचार कर रहा है जो पहले फ्रीज किए गए थे. ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका वह पैसा नहीं लौटाएगा तो कोई भी डॉलर में निवेश नहीं करेगा।  ईरान पर युद्ध से सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. इसके मुकाबले प्रतिबंधों में छूट सिर्फ कुछ अरब डॉलर की है. अमेरिकी अधिकारी इसे न्यायसंगत समझौता बता रहे हैं. हालांकि इजरायल इस समझौते से संतुष्ट नहीं दिख रहा है. ट्रंप ने इजरायल को MOU की कॉपी भेजने की बात कही, लेकिन इजरायली मीडिया में पहले खबर आई थी कि अमेरिका ने इजरायल को टेक्स्ट दिखाने से इनकार कर दिया था।  समझौते की कमियां और आलोचना यह समझौता काफी सामान्य है. इसमें ईरान सिर्फ यह दोहराता है कि वह न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाएगा. ट्रंप का दावा है कि यह ईरान को स्थाई रूप से न्यूक्लियर हथियार से रोकेगा, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह सिर्फ शब्दों का खेल है. ईरान ने स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक को टालने का संकेत दिया है।  अमेरिका का कहना है कि अगले दो महीनों की बातचीत में असली रियायतें ली जाएंगी. इस बीच तेल निर्यात बढ़ाने की कोशिश की जा रही है ताकि अगर फिर युद्ध हुआ तो दुनिया तैयार रहे. कतर के साथ साझा गैस फील्ड का उदाहरण देकर अमेरिका ने कहा कि पैसा या तो विकास में लगाया जा सकता है या आतंकवाद को बढ़ावा देने में।  आगे क्या होगा? यह समझौता अमेरिका-ईरान संबंधों में नया मोड़ है. ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे ईरान को बहुत ज्यादा छूट देने वाला समझौता मान रहे हैं. अगले दो महीनों में होने वाली बातचीत बहुत महत्वपूर्ण होगी. अगर ईरान ने रियायतें दीं तो स्थायी समझौता हो सकता है, वरना फिर तनाव बढ़ सकता है।  ट्रंप की नीति शक्ति के साथ शांति की लगती है- एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ बमबारी की धमकी. दुनिया अब देख रही है कि यह रणनीति कितनी सफल होती है. ईरान के पास मिसाइलें रहने की इजाजत, यूरेनियम पर ढील और तेल निर्यात पर छूट- ये सब मिलकर मध्य पूर्व की राजनीति को नया रूप … Read more

ईरान को ट्रंप की खुली चेतावनी, G7 मंच से बोले- समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई फिर संभव

वाशिंगटन ईरान के साथ चल रही बातचीत के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील को लेकर बेहद सख्त संकेत दिया है. अरब रिपब्लिक ऑफ मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़ा मौजूदा मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) अभी अंतिम रूप में नहीं है. यदि उन्हें ये समझौता पसंद नहीं आया, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के रास्ते पर वापस लौट सकता है।  राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत के बाद एक बेहद मजबूत डील तैयार की गई है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक कोई पूरी तरह नहीं जानता कि इसका अंतिम स्वरूप क्या होगा।  उनका दावा था कि ज्यादातर लोग इस समझौते से खुश नजर आ रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते का विकल्प पूरी दुनिया में आर्थिक अस्थिरता और मंदी हो सकता है. कुछ लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं।  ट्रंप ने कहा कि जो लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं, वे बेवकूफ हैं. उनके मुताबिक ऐसे लोग वैश्विक अर्थव्यवस्था और स्थिरता की अहमियत नहीं समझते. ट्रंप ने यह भी कहा, "नंबर एक, स्ट्रेट कभी नहीं खुलेगा।  हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि वह किस समुद्री मार्ग की बात कर रहे थे. इसके अलावा ट्रंप ने अमेरिका की ओर से ईरान में बड़े निवेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें 300 बिलियन डॉलर की बात है।  उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें पूरी तरह झूठी हैं. अमेरिका इस समझौते के हिस्से के रूप में किसी तरह का 300 बिलियन डॉलर का निवेश नहीं कर रहा है. ईरान के साथ बातचीत की स्थिति स्पष्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि मौजूदा MOU अभी फाइनल नहीं हुआ है।  उन्होंने कहा कि यदि उन्हें अंतिम एग्रीमेंट पसंद नहीं आया तो अमेरिका युद्ध में लौट सकता है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सैन्य कार्रवाई का विकल्प मेज पर होगा।  जी7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप के इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी माना जा रहा है. एक तरफ अमेरिका समझौते की संभावना को खुला रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश भी दे रहा है कि वो अपने रणनीतिक हितों से किसी तरह का समझौता नहीं केरगा।  अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ हुई इस बैठक ने साफ कर दिया है कि ईरान पर अमेरिकी नीति अभी भी डिप्लोमेसी और दबाव के दोहरे फार्मूले पर बढ़ रही है। 

ट्रंप और ईरान समझौते पर उठे सवाल, एक्सपर्ट्स बोले- यह इज्जत बचाने की रणनीति हो सकती है

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते को लेकर तरह-तरह की चर्चा है. इस बीच वेस्ट एशिया मामलों के एक्सपर्ट इसे अलग नजरिये से देखते हैं. उनका मानना है कि यह डील महज जंग से पहले की स्थिति पर वापसी भर है. आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन उद्देश्यों को हासिल कर पाते हैं या नहीं, जिनके नाम पर उन्होंने ईरान के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन शुरू किया था।  क्या है समझौते का मुख्य उद्देश्य? वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो विल टॉडमैन ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा कि शुरुआती समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच दुश्मनी को खत्म करना, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना है. उनके अनुसार यह समझौता मूल रूप से हालात को उसी स्थिति में वापस ले जाता है, जहां वे अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों से पहले थे।  टॉडमैन ने कहा, 'अमेरिका अब तक उनमें से एक भी उद्देश्य या लक्ष्य नहीं पा सका, जिनका ऐलान उसने जंग के शुरू करने से पहले किया था.' उन्होंने कहा कि युद्ध के बाद बनी परिस्थितियां बताती हैं कि इस मिलिट्री ऑपरेशन से अमेरिका को जैसी अपेक्षा थी, वैसी रणनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई है।  दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को होर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमति बनी. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है. इस मार्ग के खुलने से ग्लोबल एनर्जी बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है और तेल आपूर्ति नॉर्मल होने का रास्ता साफ हो सकता है. हालांकि समझौते की पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं. ईरान ने संकेत दिया है कि समझौते को औपचारिक रूप से लागू करने की प्रक्रिया हस्ताक्षर समारोह के बाद शुरू होगी।  60 दिन तक बातचीत के बाद खुलेगी समझौते की राह बातचीत में मिडिएटर की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के अनुसार यह हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित किया जा सकता है. समझौते में एक महत्वपूर्ण प्रावधान 60 दिनों की वार्ता अवधि (बातचीत के लिए 60 दिनों का समय) भी है. इस दौरान ईरान के एनरिच (हाई लेवल पर संवर्धित) यूरेनियम के भंडार और उसके परमाणु प्रोग्राम से जुड़े विवादित मुद्दों पर बातचीत होगी. यही वह स्टेप होगा, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कितनी प्रभावी शर्तें लागू करा पाते हैं।  खाड़ी देशों से संबंधों में नुकसान टॉडमैन का कहना है कि तीन महीने से अधिक चले इस युद्ध ने अमेरिका के पश्चिम एशियाई सहयोगियों के साथ संबंधों को भी नुकसान पहुंचाया है. उनके मुताबिक खाड़ी के कई अरब देशों को महसूस हुआ कि अमेरिका ने युद्ध के दौरान उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।  उन्होंने कहा, 'अरब खाड़ी देशों को लगता है कि अमेरिका ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान निर्णय लेते समय उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया.' टॉडमैन के अनुसार इसका परिणाम यह हो सकता है कि खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अन्य देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारियां विकसित करें।  विशेषज्ञ का मानना है कि अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बना विश्वास का संकट जल्दी दूर होने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन या भविष्य की कोई भी अमेरिकी सरकार इस भरोसे की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पूंजी खर्च करने के लिए तैयार नहीं दिखती।  इस जंग से अमेरिका और इजरायल के बीच भी पनपे मतभेद ऐसे में आने वाले वर्षों में दोनों पक्षों के संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं. टॉडमैन ने यह भी कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका और इजरायल के बीच भी एक असामान्य प्रकार का मतभेद पैदा कर दिया है. उनके अनुसार इजरायली सरकार को आशंका है कि मौजूदा समझौता ईरान से उत्पन्न सुरक्षा खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं करता और भविष्य में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं को भी सीमित कर सकता है।  उन्होंने कहा, 'इजरायल का मानना है कि समझौता ईरान के खतरे को पूरी तरह बेअसर नहीं बनाता. इसके अलावा इजरायल को लगता है कि लेबनान में उसका अभियान अभी अधूरा है.' लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि लेबनान में संघर्ष आगे न बढ़े, क्योंकि इससे ईरान के साथ हुआ समझौता खतरे में पड़ सकता है।  विशेषज्ञ के अनुसार युद्ध का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा. इससे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी दूरी बढ़ी है. यूरोप के कई देशों ने युद्ध का समर्थन नहीं किया था और उन्होंने कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया था।  टॉडमैन ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नाटो की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि गठबंधन ने युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया. उनके मुताबिक यह विवाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल युद्धविराम और होरमुज का खुलना एक पॉजिटिव संकेत है, लेकिन असली चुनौती अगले 60 दिनों की बातचीत में होगी।  अगर परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम भंडार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तो यह समझौता केवल अस्थायी राहत साबित हो सकता है. ऐसे में आने वाले दो महीने न सिर्फ अमेरिका और ईरान, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं।   

वेनेजुएला और ईरान पर बयान के बीच ट्रंप बोले—तेल कीमतें जल्द और घटेंगी

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका के पास तेल, गैस, कोयला और अन्य ऊर्जा संसाधनों की इतनी भारी मात्रा है कि कोई अन्य देश इसकी तुलना नहीं कर सकता। एयर फोर्स वन में प्रेस से बातचीत करते हुए ट्रंप ने बताया कि वेनेजुएला के साथ अच्छे संबंध बनने के कारण अमेरिका की स्थिति और मजबूत हो गई है। उन्होंने दावा किया कि वेनेजुएला को मिलाकर अमेरिका के पास लगभग 64 प्रतिशत ऊर्जा संसाधन हैं, जो विश्व के लिए अद्भुत है। ट्रंप ने कहा कि बड़े तेल कंपनियां वहां पहले से ही काम शुरू कर चुकी हैं और लाखों बैरल तेल निकाला जाएगा। उन्होंने गैसोलीन निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के सवाल पर जोर देकर कहा कि उनके पास कई विकल्प उपलब्ध हैं लेकिन अमेरिका की प्राकृतिक संपदा सबसे बड़ी ताकत है। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी तेल कंपनियों की उत्पादन क्षमता पर बोलते हुए कहा कि उनके पास सब कुछ है जो जरूरी है। उन्होंने बताया कि दुनिया को उम्मीद थी कि तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी, लेकिन वर्तमान में यह 96-97 डॉलर प्रति बैरल पर है। उन्होंने ईरान के साथ सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा और उसकी स्थिति कमजोर है। ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल परिवहन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अमेरिकी नौसेना की मदद से बहुत सारा तेल लाया जा रहा है, जिसकी वजह से कीमतें नियंत्रण में हैं। ट्रंप बोले- पूरी दुनिया को फायदा होगा अमेरिका के राष्ट्रपति ने आयोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि तीन महीने पहले गैसोलीन की कीमत 1.85 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब और बेहतर हो सकती है। ट्रंप की इस यात्रा के दौरान उन्होंने चिपेवा फॉल्स की ओर जाते हुए मीडिया से खुलकर बात की। उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका की ऊर्जा नीति न सिर्फ खुद को मजबूत बनाएगी बल्कि पूरी दुनिया को फायदा पहुंचाएगी। वेनेजुएला के लोगों को अमेरिका से प्यार है और देश खुशहाल हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जल्द ही पूरा मुद्दा सुलझ जाएगा और तेल की कीमतें और नीचे आएंगी। उन्होंने ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का भी जिक्र किया, जिसमें अमेरिकी बलों ने कई हमलों को नाकाम किया। फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ओर आने वाले ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराया। ईरान ने कुवैत और बहरीन की ओर मिसाइलें दागीं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की ऊर्जा प्रभुसत्ता और सैन्य ताकत दोनों ही मजबूत हैं, जो भविष्य में तेल बाजार को स्थिर रखेगी। ट्रंप का ताजा बयान अमेरिका की ऊर्जा स्वतंत्रता और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।

Trump Tariff Plan से बढ़ सकती है ट्रेड टेंशन, भारत-चीन पर नया टैरिफ प्रस्ताव

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर नया टैरिफ प्लान (Donald Trump Tariff Plan) तैयार कर लिया है और नए अमेरिकी टैरिफ रेट प्रस्तावित किए गए हैं. अमेरिका अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों से किए जाने वाले आयात पर कम से कम 10 फीसदी का टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहे हैं और उनका ये प्रपोजल जबरन श्रम प्रथाओं की जांच के बाद आया है.  रिपोर्ट्स की मानें, भारत और चीन को लेकर भी नया टैरिफ तय कर लिया गया है, जो 12 फीसदी से ज्यादा हो सकता है।  India-China समेत किन देशों पर कितना टैरिफ?  ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नए टैरिफ रेट्स को देखें, तो भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और स्विट्जरलैंड जैसे देशों से आने वाले सामानों पर ट्रंप 12.5 फीसदी का टैरिफ लगा सकते हैं. वहीं दूसरी ओर अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने साफ किया है कि कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय यूनियन, ताइवान और ब्रिटेन समेत अन्य देशों से आयात पर 10 फीसदी की टैरिफ दर लागू होगी।  इधर डील पर बात, उधर टैरिफ प्लान गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा दुनिया के तमाम देशों पर लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. अब ट्रंप उन टैरिफ को फिर से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. भारत को लेकर ये खास इसलिए भी है, क्योंकि Donald Trump Tariff Plan ऐसे समय में सामने आया है, जबकि US के मुख्य वार्ताकार द्विपक्षीय व्यापार समझौते (India-US BTA) को अंतिम रूप देने के लिए नई दिल्ली में भारतीय अधिकारियों के साथ तीन दिनों की बातचीत कर रहे हैं।  धारा 301, 60 जांचें, टैरिफ तैयारी रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि ने धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों के निष्कर्ष जारी किए हैं, जिनमें भारत को उन 54 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया है, जिन्होंने जबरन लेबर बेस्ड सामानों के आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाया है या प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया है।  अमेरिकी व्यापार मंत्रालय (USTR) के एक नोटिस में कहा गया है कि जिन अर्थव्यवस्थाओं में जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध है, या जिन्होंने पारस्परिक व्यापार समझौते के माध्यम से प्रतिबद्धता जताई है, या जिनके पास कुछ जबरन श्रम से बने उत्पादों को प्रतिबंधित करने वाली सीमित व्यवस्थाएं हैं, उन्हें अतिरिक्त 10% शुल्क का सामना करना पड़ेगा।  भारत सहित अन्य अर्थव्यवस्थाओं के लिए, अमेरिकी व्यापार मंत्रालय ने 12.5% ​​की हाई एक्स्ट्रा टैरिफ रेट प्रस्तावित किए हैं. ट्रंप प्रशासन के इस ने टैरिफ प्रपोजल में कपड़ों पर आयात का जिक्र भी किया गया है. जो कुछ अर्थव्यवस्थाओं से अमेरिका में एक निश्चित मात्रा में कपड़ा आयात को धारा 301 के तहत कम टैरिफ रेट पर करने की अनुमति देता है। 

खुद को ‘डीलमेकर’ और नेतन्याहू को ‘हार्डलाइनर’ बता रहे ट्रंप? वायरल दावे से सियासी हलचल

यरुशलम तुम्हारा दिमाग खराब हो चुका है, अगर मैं न होता, तो तुम अब तक जेल में होते. ये मैं हूं जो तुम्हारी जान बचा रहा हूं. अब हर कोई तुमसे नफरत करता है. इसी वजह से हर कोई इजरायल से भी नफ़रत करता है। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्राध्यक्ष की भाषा तो कतई नहीं है. तो फिर क्या हुआ कि ट्रंप अपने सबसे करीबी साथी इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर इस तरह बिफर गए।  हैरान करने वाले ये जुमले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की है. जो उन्होंने फोन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बेहद गुस्से में कहे. इस टकराव का खुलासा अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में की है।  ये झगड़ा नहीं स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है तो क्या अमेरिकी राष्ट्रपति सचुमच इजरायली प्रधानमंत्री से नाराज है. ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव मुख्य रूप से ईरान डील और लेबनान/हेजबुल्लाह पर है. यह कोई पुराना व्यक्तिगत झगड़ा नहीं, बल्कि ईरान-इजराइल-यूएस टेंशन के बीच का स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है।  दरअसल ट्रंप की प्राथमिकता अब एक ऐसी डील है जिसे वह अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें. ट्रंप ईरान के साथ डील में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं।  उन्होंने हाल ही में दावा किया कि ईरान के साथ समझौता निकट हो सकता है और बातचीत तेज गति से चल रही है. लेकिन ये वार्ता बार बार डिरेल हो रही है.  दूसरी ओर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों और लेबनान में बढ़ते संघर्ष ने इन वार्ताओं को बार-बार बाधित किया है. ईरान ने भी आरोप लगाया है कि इजरायली हमले कूटनीतिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  नेतन्याहू 'हार्डलाइनर' और ट्रंप 'डीलमेकर' विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति दोहरी हो सकती है. पहला वह ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका बातचीत के लिए गंभीर है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला पक्ष हमेशा वॉशिंगटन नहीं है. तेल अवीव भी ऐसा करता है. दूसरा वह नेतन्याहू पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाना चाहते हैं कि इजरायल की सैन्य कार्रवाइयां अमेरिकी कूटनीतिक लक्ष्यों को बाधित न करें।  कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि ट्रंप को लगता है कि समझौता उनकी राजनीतिक जीत साबित हो सकता है, तो वह नेतन्याहू को "कठोर नेता" की छवि में दिखाकर खुद को "डीलमेकर" के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं. इसलिए वह ट्रंप को कथित रूप से कड़वे शब्द कह रहे हैं।  एक्सियोस के अनुसार लेबनान में ऑपरेशन के लिए ट्रंप ने नेतन्याहू को खरी-खोटी सुनाई और अपशब्दों तक का प्रयोग कर डाला. ट्रंप इजरायल द्वारा लेबनान में शुरू की जा रही सैन्य कार्रवाई से बेहद खफा थे. खासकर बेरूत पर हमले की योजना से. इजरायल का ये कदम  ट्रंप की ईरान के साथ चल रही डिप्लोमेसी को बर्बाद कर सकती थी।  इजरायल को सता रहा अलग डर वहीं इजरायली पक्ष को डर है कि ट्रंप ईरान को कमजोर करने के बजाय अस्थायी डील पर राजी हो जाएंगे, जिससे तेहरान को सांस लेने का मौका मिलेगा और हेजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी मजबूत होंगे।  ट्रंप ईरान के साथ अपनी डील को पूरा करने के लिए इजरायल की कार्रवाइयों को समस्या के रूप में पेश कर सकते हैं. इससे अमेरिकी जनता और गल्फ सहयोगियों में इजरायल पर दबाव बढ़ेगा।  ट्रंप के लिए ईरान युद्ध जल्द खत्म करना राजनीतिक जरूरत है. अमेरिका की इकोनॉमी, तेल कीमतें और 2026 के मध्यावधि चुनावों को देखते हुए ट्रंप इसे किसी भी कीमत पर पूरा करने चाह रहे हैं।  इजरायल को 'प्रॉब्लम' दिखाकर ट्रंप ईरान पर भी डील के लिए राजी होने का अप्रत्यक्ष दबाव डाल रहे हैं. इसके बाद ट्रंप के पास इजरायल को ये कहने का अधिकार होगा कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इजरायल को लेबनान पर हमला करने से रोक दिया अब ईरान की बारी है कि वो डील के शर्तों पर राजी हो।  ईरान बातचीत तेज करने का दावा कर रहा है, लेकिन लेबनान में छोटे-मोटे हमले जारी हैं. ट्रंप की 'आर्ट ऑफ डील' फिर परीक्षा की कसौटी पर है. क्या वे इजरायल को काबू में रख ईरान को मना पाएंगे, या क्षेत्र फिर आग की चपेट में आ जाएगा?