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ईरान को ट्रंप की खुली चेतावनी, G7 मंच से बोले- समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई फिर संभव

वाशिंगटन ईरान के साथ चल रही बातचीत के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील को लेकर बेहद सख्त संकेत दिया है. अरब रिपब्लिक ऑफ मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़ा मौजूदा मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) अभी अंतिम रूप में नहीं है. यदि उन्हें ये समझौता पसंद नहीं आया, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के रास्ते पर वापस लौट सकता है।  राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत के बाद एक बेहद मजबूत डील तैयार की गई है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक कोई पूरी तरह नहीं जानता कि इसका अंतिम स्वरूप क्या होगा।  उनका दावा था कि ज्यादातर लोग इस समझौते से खुश नजर आ रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते का विकल्प पूरी दुनिया में आर्थिक अस्थिरता और मंदी हो सकता है. कुछ लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं।  ट्रंप ने कहा कि जो लोग दुनिया में मंदी देखना चाहते हैं, वे बेवकूफ हैं. उनके मुताबिक ऐसे लोग वैश्विक अर्थव्यवस्था और स्थिरता की अहमियत नहीं समझते. ट्रंप ने यह भी कहा, "नंबर एक, स्ट्रेट कभी नहीं खुलेगा।  हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि वह किस समुद्री मार्ग की बात कर रहे थे. इसके अलावा ट्रंप ने अमेरिका की ओर से ईरान में बड़े निवेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें 300 बिलियन डॉलर की बात है।  उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें पूरी तरह झूठी हैं. अमेरिका इस समझौते के हिस्से के रूप में किसी तरह का 300 बिलियन डॉलर का निवेश नहीं कर रहा है. ईरान के साथ बातचीत की स्थिति स्पष्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि मौजूदा MOU अभी फाइनल नहीं हुआ है।  उन्होंने कहा कि यदि उन्हें अंतिम एग्रीमेंट पसंद नहीं आया तो अमेरिका युद्ध में लौट सकता है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सैन्य कार्रवाई का विकल्प मेज पर होगा।  जी7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप के इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी माना जा रहा है. एक तरफ अमेरिका समझौते की संभावना को खुला रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश भी दे रहा है कि वो अपने रणनीतिक हितों से किसी तरह का समझौता नहीं केरगा।  अब्देल फत्ताह अल-सिसी के साथ हुई इस बैठक ने साफ कर दिया है कि ईरान पर अमेरिकी नीति अभी भी डिप्लोमेसी और दबाव के दोहरे फार्मूले पर बढ़ रही है। 

ट्रंप और ईरान समझौते पर उठे सवाल, एक्सपर्ट्स बोले- यह इज्जत बचाने की रणनीति हो सकती है

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते को लेकर तरह-तरह की चर्चा है. इस बीच वेस्ट एशिया मामलों के एक्सपर्ट इसे अलग नजरिये से देखते हैं. उनका मानना है कि यह डील महज जंग से पहले की स्थिति पर वापसी भर है. आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन उद्देश्यों को हासिल कर पाते हैं या नहीं, जिनके नाम पर उन्होंने ईरान के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन शुरू किया था।  क्या है समझौते का मुख्य उद्देश्य? वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो विल टॉडमैन ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा कि शुरुआती समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच दुश्मनी को खत्म करना, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना है. उनके अनुसार यह समझौता मूल रूप से हालात को उसी स्थिति में वापस ले जाता है, जहां वे अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों से पहले थे।  टॉडमैन ने कहा, 'अमेरिका अब तक उनमें से एक भी उद्देश्य या लक्ष्य नहीं पा सका, जिनका ऐलान उसने जंग के शुरू करने से पहले किया था.' उन्होंने कहा कि युद्ध के बाद बनी परिस्थितियां बताती हैं कि इस मिलिट्री ऑपरेशन से अमेरिका को जैसी अपेक्षा थी, वैसी रणनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई है।  दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को होर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमति बनी. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है. इस मार्ग के खुलने से ग्लोबल एनर्जी बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है और तेल आपूर्ति नॉर्मल होने का रास्ता साफ हो सकता है. हालांकि समझौते की पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं. ईरान ने संकेत दिया है कि समझौते को औपचारिक रूप से लागू करने की प्रक्रिया हस्ताक्षर समारोह के बाद शुरू होगी।  60 दिन तक बातचीत के बाद खुलेगी समझौते की राह बातचीत में मिडिएटर की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के अनुसार यह हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित किया जा सकता है. समझौते में एक महत्वपूर्ण प्रावधान 60 दिनों की वार्ता अवधि (बातचीत के लिए 60 दिनों का समय) भी है. इस दौरान ईरान के एनरिच (हाई लेवल पर संवर्धित) यूरेनियम के भंडार और उसके परमाणु प्रोग्राम से जुड़े विवादित मुद्दों पर बातचीत होगी. यही वह स्टेप होगा, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कितनी प्रभावी शर्तें लागू करा पाते हैं।  खाड़ी देशों से संबंधों में नुकसान टॉडमैन का कहना है कि तीन महीने से अधिक चले इस युद्ध ने अमेरिका के पश्चिम एशियाई सहयोगियों के साथ संबंधों को भी नुकसान पहुंचाया है. उनके मुताबिक खाड़ी के कई अरब देशों को महसूस हुआ कि अमेरिका ने युद्ध के दौरान उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।  उन्होंने कहा, 'अरब खाड़ी देशों को लगता है कि अमेरिका ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान निर्णय लेते समय उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया.' टॉडमैन के अनुसार इसका परिणाम यह हो सकता है कि खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अन्य देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारियां विकसित करें।  विशेषज्ञ का मानना है कि अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बना विश्वास का संकट जल्दी दूर होने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन या भविष्य की कोई भी अमेरिकी सरकार इस भरोसे की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पूंजी खर्च करने के लिए तैयार नहीं दिखती।  इस जंग से अमेरिका और इजरायल के बीच भी पनपे मतभेद ऐसे में आने वाले वर्षों में दोनों पक्षों के संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं. टॉडमैन ने यह भी कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका और इजरायल के बीच भी एक असामान्य प्रकार का मतभेद पैदा कर दिया है. उनके अनुसार इजरायली सरकार को आशंका है कि मौजूदा समझौता ईरान से उत्पन्न सुरक्षा खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं करता और भविष्य में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं को भी सीमित कर सकता है।  उन्होंने कहा, 'इजरायल का मानना है कि समझौता ईरान के खतरे को पूरी तरह बेअसर नहीं बनाता. इसके अलावा इजरायल को लगता है कि लेबनान में उसका अभियान अभी अधूरा है.' लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि लेबनान में संघर्ष आगे न बढ़े, क्योंकि इससे ईरान के साथ हुआ समझौता खतरे में पड़ सकता है।  विशेषज्ञ के अनुसार युद्ध का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा. इससे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी दूरी बढ़ी है. यूरोप के कई देशों ने युद्ध का समर्थन नहीं किया था और उन्होंने कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया था।  टॉडमैन ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नाटो की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि गठबंधन ने युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया. उनके मुताबिक यह विवाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल युद्धविराम और होरमुज का खुलना एक पॉजिटिव संकेत है, लेकिन असली चुनौती अगले 60 दिनों की बातचीत में होगी।  अगर परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम भंडार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तो यह समझौता केवल अस्थायी राहत साबित हो सकता है. ऐसे में आने वाले दो महीने न सिर्फ अमेरिका और ईरान, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं।   

वेनेजुएला और ईरान पर बयान के बीच ट्रंप बोले—तेल कीमतें जल्द और घटेंगी

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका के पास तेल, गैस, कोयला और अन्य ऊर्जा संसाधनों की इतनी भारी मात्रा है कि कोई अन्य देश इसकी तुलना नहीं कर सकता। एयर फोर्स वन में प्रेस से बातचीत करते हुए ट्रंप ने बताया कि वेनेजुएला के साथ अच्छे संबंध बनने के कारण अमेरिका की स्थिति और मजबूत हो गई है। उन्होंने दावा किया कि वेनेजुएला को मिलाकर अमेरिका के पास लगभग 64 प्रतिशत ऊर्जा संसाधन हैं, जो विश्व के लिए अद्भुत है। ट्रंप ने कहा कि बड़े तेल कंपनियां वहां पहले से ही काम शुरू कर चुकी हैं और लाखों बैरल तेल निकाला जाएगा। उन्होंने गैसोलीन निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के सवाल पर जोर देकर कहा कि उनके पास कई विकल्प उपलब्ध हैं लेकिन अमेरिका की प्राकृतिक संपदा सबसे बड़ी ताकत है। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी तेल कंपनियों की उत्पादन क्षमता पर बोलते हुए कहा कि उनके पास सब कुछ है जो जरूरी है। उन्होंने बताया कि दुनिया को उम्मीद थी कि तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी, लेकिन वर्तमान में यह 96-97 डॉलर प्रति बैरल पर है। उन्होंने ईरान के साथ सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा और उसकी स्थिति कमजोर है। ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल परिवहन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अमेरिकी नौसेना की मदद से बहुत सारा तेल लाया जा रहा है, जिसकी वजह से कीमतें नियंत्रण में हैं। ट्रंप बोले- पूरी दुनिया को फायदा होगा अमेरिका के राष्ट्रपति ने आयोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि तीन महीने पहले गैसोलीन की कीमत 1.85 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब और बेहतर हो सकती है। ट्रंप की इस यात्रा के दौरान उन्होंने चिपेवा फॉल्स की ओर जाते हुए मीडिया से खुलकर बात की। उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका की ऊर्जा नीति न सिर्फ खुद को मजबूत बनाएगी बल्कि पूरी दुनिया को फायदा पहुंचाएगी। वेनेजुएला के लोगों को अमेरिका से प्यार है और देश खुशहाल हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जल्द ही पूरा मुद्दा सुलझ जाएगा और तेल की कीमतें और नीचे आएंगी। उन्होंने ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का भी जिक्र किया, जिसमें अमेरिकी बलों ने कई हमलों को नाकाम किया। फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ओर आने वाले ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराया। ईरान ने कुवैत और बहरीन की ओर मिसाइलें दागीं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की ऊर्जा प्रभुसत्ता और सैन्य ताकत दोनों ही मजबूत हैं, जो भविष्य में तेल बाजार को स्थिर रखेगी। ट्रंप का ताजा बयान अमेरिका की ऊर्जा स्वतंत्रता और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।

Trump Tariff Plan से बढ़ सकती है ट्रेड टेंशन, भारत-चीन पर नया टैरिफ प्रस्ताव

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर नया टैरिफ प्लान (Donald Trump Tariff Plan) तैयार कर लिया है और नए अमेरिकी टैरिफ रेट प्रस्तावित किए गए हैं. अमेरिका अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों से किए जाने वाले आयात पर कम से कम 10 फीसदी का टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहे हैं और उनका ये प्रपोजल जबरन श्रम प्रथाओं की जांच के बाद आया है.  रिपोर्ट्स की मानें, भारत और चीन को लेकर भी नया टैरिफ तय कर लिया गया है, जो 12 फीसदी से ज्यादा हो सकता है।  India-China समेत किन देशों पर कितना टैरिफ?  ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नए टैरिफ रेट्स को देखें, तो भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और स्विट्जरलैंड जैसे देशों से आने वाले सामानों पर ट्रंप 12.5 फीसदी का टैरिफ लगा सकते हैं. वहीं दूसरी ओर अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने साफ किया है कि कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय यूनियन, ताइवान और ब्रिटेन समेत अन्य देशों से आयात पर 10 फीसदी की टैरिफ दर लागू होगी।  इधर डील पर बात, उधर टैरिफ प्लान गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा दुनिया के तमाम देशों पर लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. अब ट्रंप उन टैरिफ को फिर से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. भारत को लेकर ये खास इसलिए भी है, क्योंकि Donald Trump Tariff Plan ऐसे समय में सामने आया है, जबकि US के मुख्य वार्ताकार द्विपक्षीय व्यापार समझौते (India-US BTA) को अंतिम रूप देने के लिए नई दिल्ली में भारतीय अधिकारियों के साथ तीन दिनों की बातचीत कर रहे हैं।  धारा 301, 60 जांचें, टैरिफ तैयारी रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि ने धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों के निष्कर्ष जारी किए हैं, जिनमें भारत को उन 54 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया है, जिन्होंने जबरन लेबर बेस्ड सामानों के आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाया है या प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया है।  अमेरिकी व्यापार मंत्रालय (USTR) के एक नोटिस में कहा गया है कि जिन अर्थव्यवस्थाओं में जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध है, या जिन्होंने पारस्परिक व्यापार समझौते के माध्यम से प्रतिबद्धता जताई है, या जिनके पास कुछ जबरन श्रम से बने उत्पादों को प्रतिबंधित करने वाली सीमित व्यवस्थाएं हैं, उन्हें अतिरिक्त 10% शुल्क का सामना करना पड़ेगा।  भारत सहित अन्य अर्थव्यवस्थाओं के लिए, अमेरिकी व्यापार मंत्रालय ने 12.5% ​​की हाई एक्स्ट्रा टैरिफ रेट प्रस्तावित किए हैं. ट्रंप प्रशासन के इस ने टैरिफ प्रपोजल में कपड़ों पर आयात का जिक्र भी किया गया है. जो कुछ अर्थव्यवस्थाओं से अमेरिका में एक निश्चित मात्रा में कपड़ा आयात को धारा 301 के तहत कम टैरिफ रेट पर करने की अनुमति देता है। 

खुद को ‘डीलमेकर’ और नेतन्याहू को ‘हार्डलाइनर’ बता रहे ट्रंप? वायरल दावे से सियासी हलचल

यरुशलम तुम्हारा दिमाग खराब हो चुका है, अगर मैं न होता, तो तुम अब तक जेल में होते. ये मैं हूं जो तुम्हारी जान बचा रहा हूं. अब हर कोई तुमसे नफरत करता है. इसी वजह से हर कोई इजरायल से भी नफ़रत करता है। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्राध्यक्ष की भाषा तो कतई नहीं है. तो फिर क्या हुआ कि ट्रंप अपने सबसे करीबी साथी इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर इस तरह बिफर गए।  हैरान करने वाले ये जुमले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की है. जो उन्होंने फोन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बेहद गुस्से में कहे. इस टकराव का खुलासा अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में की है।  ये झगड़ा नहीं स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है तो क्या अमेरिकी राष्ट्रपति सचुमच इजरायली प्रधानमंत्री से नाराज है. ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव मुख्य रूप से ईरान डील और लेबनान/हेजबुल्लाह पर है. यह कोई पुराना व्यक्तिगत झगड़ा नहीं, बल्कि ईरान-इजराइल-यूएस टेंशन के बीच का स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है।  दरअसल ट्रंप की प्राथमिकता अब एक ऐसी डील है जिसे वह अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें. ट्रंप ईरान के साथ डील में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं।  उन्होंने हाल ही में दावा किया कि ईरान के साथ समझौता निकट हो सकता है और बातचीत तेज गति से चल रही है. लेकिन ये वार्ता बार बार डिरेल हो रही है.  दूसरी ओर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों और लेबनान में बढ़ते संघर्ष ने इन वार्ताओं को बार-बार बाधित किया है. ईरान ने भी आरोप लगाया है कि इजरायली हमले कूटनीतिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  नेतन्याहू 'हार्डलाइनर' और ट्रंप 'डीलमेकर' विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति दोहरी हो सकती है. पहला वह ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका बातचीत के लिए गंभीर है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला पक्ष हमेशा वॉशिंगटन नहीं है. तेल अवीव भी ऐसा करता है. दूसरा वह नेतन्याहू पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाना चाहते हैं कि इजरायल की सैन्य कार्रवाइयां अमेरिकी कूटनीतिक लक्ष्यों को बाधित न करें।  कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि ट्रंप को लगता है कि समझौता उनकी राजनीतिक जीत साबित हो सकता है, तो वह नेतन्याहू को "कठोर नेता" की छवि में दिखाकर खुद को "डीलमेकर" के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं. इसलिए वह ट्रंप को कथित रूप से कड़वे शब्द कह रहे हैं।  एक्सियोस के अनुसार लेबनान में ऑपरेशन के लिए ट्रंप ने नेतन्याहू को खरी-खोटी सुनाई और अपशब्दों तक का प्रयोग कर डाला. ट्रंप इजरायल द्वारा लेबनान में शुरू की जा रही सैन्य कार्रवाई से बेहद खफा थे. खासकर बेरूत पर हमले की योजना से. इजरायल का ये कदम  ट्रंप की ईरान के साथ चल रही डिप्लोमेसी को बर्बाद कर सकती थी।  इजरायल को सता रहा अलग डर वहीं इजरायली पक्ष को डर है कि ट्रंप ईरान को कमजोर करने के बजाय अस्थायी डील पर राजी हो जाएंगे, जिससे तेहरान को सांस लेने का मौका मिलेगा और हेजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी मजबूत होंगे।  ट्रंप ईरान के साथ अपनी डील को पूरा करने के लिए इजरायल की कार्रवाइयों को समस्या के रूप में पेश कर सकते हैं. इससे अमेरिकी जनता और गल्फ सहयोगियों में इजरायल पर दबाव बढ़ेगा।  ट्रंप के लिए ईरान युद्ध जल्द खत्म करना राजनीतिक जरूरत है. अमेरिका की इकोनॉमी, तेल कीमतें और 2026 के मध्यावधि चुनावों को देखते हुए ट्रंप इसे किसी भी कीमत पर पूरा करने चाह रहे हैं।  इजरायल को 'प्रॉब्लम' दिखाकर ट्रंप ईरान पर भी डील के लिए राजी होने का अप्रत्यक्ष दबाव डाल रहे हैं. इसके बाद ट्रंप के पास इजरायल को ये कहने का अधिकार होगा कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इजरायल को लेबनान पर हमला करने से रोक दिया अब ईरान की बारी है कि वो डील के शर्तों पर राजी हो।  ईरान बातचीत तेज करने का दावा कर रहा है, लेकिन लेबनान में छोटे-मोटे हमले जारी हैं. ट्रंप की 'आर्ट ऑफ डील' फिर परीक्षा की कसौटी पर है. क्या वे इजरायल को काबू में रख ईरान को मना पाएंगे, या क्षेत्र फिर आग की चपेट में आ जाएगा?   

US Federal Appeals Court ने ट्रांसजेंडर सैन्य कर्मियों की बर्खास्तगी पर लगाई रोक

वाशिंगट  अमेरिकी फेडरल अपीलीय कोर्ट ने अमेरिकी सेना (पेंटागन) से ट्रांसजेंडर सैनिकों को हटाने पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने अपने फैसले में ट्रांसजेंडर सैनिकों पर लगाए गए प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया है और सरकार के इस कदम को भेदभावपूर्ण माना है। जज ने ट्रंप प्रशासन को फटकार लगाते हुए साफ कहा कि यह फैसला किसी सेना के भले के लिए नहीं, बल्कि समाज के एक खास तबके को सिर्फ और सिर्फ नुकसान पहुंचाने के लिए लिया गया लगता है। अदालत ने यह फैसला 2-1 के बहुमत से सुनाया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने रक्षा मंत्रालय के हाथ बांध दिए थे। जेंडर के आधार पर नहीं जाएगी नौकरी इस फैसले के बाद अब सरकार सेना में पहले से मौजूद किसी भी ट्रांसजेंडर सैनिक को उसकी जेंडर पहचान के आधार पर नौकरी से नहीं निकाल पाएगी। डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सेना में ट्रांसजेंडरों की सेवा पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इससे सेना की युद्ध क्षमता पर असर पड़ता है। ट्रंप के इस फरमान के बाद सेना में हड़कंप मच गया था और नौकरी से निकाले जाने के डर से ट्रांसजेंडर सैनिकों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।  

अमेरिकी टैरिफ में बड़ी राहत! Donald Trump ने अचानक घटाई ड्यूटी, इन उद्योगों की चमकी किस्मत

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ कट का ऐलान किया है. US Tariff में ये कटौती कुछ सेलेक्टेड एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स और औद्योगिक उपकरणों पर की गई है. अब तक इन सामानों पर अमेरिका की ओर से 25% का टैरिफ लागू किया गया था, जिसे ट्रंप ने घटाकर 15% करने का ऐलान किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से कृषि और इंडस्ट्रियल उपकरणों की एक विस्तृत रेंज पर टैरिफ में अस्थायी कटौती अगले साल दिसंबर 2027 तक लागू रहेगी। अमेरिका की ओर से ये फैसला निवेश को प्रोत्साहित करने और अमेरिकी अर्थव्यवस्था (US Economy) के प्रमुख क्षेत्रों का समर्थन करने के लिए लिया गया है. इससे सस्ते आयात के साथ-साथ अमेरिकी इस्पात और एल्यूमीनियम के अधिक उपयोग को प्रोत्साहन मिलेगा।  क्यों लिया ट्रंप ने ये फैसला?  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई घोषणा के तहच ये टैरिफ कटौती दिसंबर 2027 तक प्रभावी रहेगी. इस कदम का उद्देश्य घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और कृषि उत्पादन को मजबूत करते हुए इस सेक्टर से जुड़े व्यवसायों के लिए लागत को कम करना है. Tariff Cut कंबाइन, हार्वेस्टर और अन्य कृषि उपकरणों समेत कई प्रकार की दूसरी कृषि मशीनों पर लागू होगी. व्हाइट हाउस (US White House) की ओर से कहा गया है कि कम टैरिफ से किसानों और कृषि उत्पादकों को कम लागत पर नए उपकरण खरीदने में मदद मिलेगी।  ट्रंप प्रशासन ने कम टैरिफ रेट के लिए इंडस्ट्रियल उपकरणों की लिस्ट में बढ़ोतरी की है. खास बात ये है कि टैरिफ कट का ये ऐलान ऐसे समय में किया गया है, जबकि अमेरिका अपनी ट्रेड एंड इंडस्ट्रियल पॉलिसी के एक प्रमुख हिस्से के रूप में टैरिफ का इस्तेमाल जारी रखे हुए है. व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह अस्थायी कटौती कृषि, आवास और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को समर्थन देने के साथ-साथ कंपनियों को उपकरण और उत्पादन क्षमता में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन की गई है।  क्या भारत को मिलेगा लाभ? रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका की ओर से टैरिफ कट (US Tariff Cut) की ये राहत उन देशों को दी गई है, जिनके साथ ट्रेड समझौता है. यानी अमेरिका के व्यापार समझौतों के अंतर्गत आने वाले देशों से आयात किए जाने वाले बुलडोजर, फोर्कलिफ्ट और इसी तरह की औद्योगिक मशीनरी और फार्म उपकरणों पर अब 15% का टैरिफ लगेगा, जो पहले 25% था. यहां बता दें कि भारत को इसका फायदा मिलता नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि अभी तक US-Iran Trade Deal फाइनल नहीं हुई है।  ट्रंप ने ये स्कीम भी शुरू की Donald Trump प्रशासन ने घरेलू स्तर पर उत्पादित स्टील और एल्यूमीनियम की डिमांड को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक अतिरिक्त प्रोत्साहन योजना की भी शुरुआत का ऐलान किया है. इसके तहत, विदेशी निर्माता 10% के और भी कम टैरिफ रेट का लाभ उठा सकेंगे, इसके लिए शर्त ये होगी कि उनके द्वारा आयात किए गए कैपिटल इक्विपमेंट में वजन के हिसाब से कम से कम 85% स्टील या एल्युमीनियम अमेरिका का यूज हो। 

होर्मुज को लेकर बढ़ा तनाव, ट्रंप बोले- शांति समझौता करीब; ईरान ने कहा- सब झूठ

तेहरान  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओऱ से ईरान के साथ संभावित समझौते का दावा किए जाने के तुरंत बाद ईरानी मिलिट्री के जुड़ी मीडिया ने उनके बयानों को खारिज कर दिया. ट्रंप ने कहा था कि तेहरान बिना किसी शुल्क के होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए 'मजबूर' हो गया है, लेकिन ईरान ने इसे तथ्यों और झूठ का मिश्रण बताते हुए कहा कि यह तेहरान में विचाराधीन समझौते का सही ड्रॉफ्ट नहीं है।  'काल्पनिक जीत दिखाने की कोशिश में ट्रंप' ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी समाचार एजेंसी फर्स न्यूज ने वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से कहा कि ट्रंप के बयान "काल्पनिक जीत दिखाने की कोशिश" हैं।  रिपोर्ट के मुताबिक, 'Commitment for Commitment' नाम से प्रस्तावित समझौता ईरान में अंतिम मंजूरी के चरण में है, हालांकि अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. व्हाइट हाउस में वेस्ट एशिया क्राइसिस को लेकर एक अहम बैठक में शामिल होने से पहले ट्रंप ने दावा किया था कि होर्मुज जलडमरूमध्य में लगी पाबंदियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं और समुद्री यातायात सामान्य होने लगा है. यह जलमार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल परिवहन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  क्या है अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा? ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'ईरान तुरंत बचे हुए बारूदी सुरंगों को हटाएगा या निष्क्रिय करेगा. हमारी अभूतपूर्व नौसैनिक नाकेबंदी अब हटाई जा रही है और जलडमरूमध्य में फंसे जहाज अपने घर लौटने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं.' उन्होंने यह भी कहा कि 'अगली सूचना तक कोई धनराशि का आदान-प्रदान नहीं होगा' और कुछ अन्य मुद्दों पर भी सहमति बन चुकी है।  'होर्मुज को फिर खोलने की प्रोसेस ईरान की शर्तों पर' हालांकि ईरानी मीडिया ने दोहराया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की प्रक्रिया ईरान की शर्तों के अनुसार होगी. इसमें जहाजों की निगरानी, निरीक्षण, समुद्री सेवाएं और सुरक्षा संबंधी उपाय शामिल हो सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि बिना किसी शुल्क या शर्त के जलडमरूमध्य खोलने पर सहमति बनने का ट्रंप का दावा गलत है और मसौदा समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।  फ्रीज संपत्तियों को जारी करना भी ड्राफ्ट का हिस्सा फर्स न्यूज ने ट्रंप के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान अपने परमाणु सामग्री भंडार को नष्ट करेगा. रिपोर्ट के अनुसार, जानकार सूत्रों ने इस दावे को पूरी तरह निराधार बताया है और कहा है कि समझौता ज्ञापन (MoU) में ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते के ड्राफ्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान की लगभग 12 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियों को तत्काल जारी करना है. तेहरान का कहना है कि जब तक यह राशि जारी नहीं की जाती, तब तक वह बातचीत के अगले स्टेप में आगे नहीं बढ़ेगा।  इसके अलावा लेबनान में पूर्ण युद्धविराम, जो हिज्बुल्लाह के रुख के अनुरूप हो, भी बातचीत का एक अहम मुद्दा बताया गया है. ईरानी अधिकारियों के अनुसार, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब उसकी प्रमुख शर्तें पूरी होंगी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि किसी भी अंतिम समझौते का आधार ईरान की "रेड लाइन्स" और अमेरिका के प्रति उसका 'पूर्ण अविश्वास' रहेगा।   

Middle East में नया तनाव, ट्रंप की मांग पर अमेरिका और सऊदी आमने-सामने

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब एक नई जंग पर्दे के पीछे शुरू होती दिख रही है. इस बार मामला सीधे वॉशिंगटन और उसके सबसे पुराने अरब सहयोगी सऊदी अरब के बीच का है. वजह बनी है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह नई रणनीति, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ संभावित शांति समझौते को अब्राहम अकॉर्ड्स से जोड़ दिया। 25 मई को ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए एक बड़ा संदेश दिया. उन्होंने कहा कि ईरान के साथ किसी भी शांति समझौते का हिस्सा बनने के लिए मुस्लिम देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करने होंगे. ट्रंप ने खास तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान का नाम लेते हुए इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की बात कही। लेकिन ट्रंप की यह अपील खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब को बिल्कुल पसंद नहीं आई. कुछ ही घंटों बाद रियाद की तरफ से संकेत दिया गया कि सऊदी का पुराना रुख नहीं बदला है. सऊदी अधिकारियों ने साफ कहा कि जब तक फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के लिए "स्पष्ट रास्ता" तय नहीं होता, तब तक इजरायल के साथ सामान्य संबंध संभव नहीं हैं। कई अरब देशों ने इजरायल संग स्थापित किए रिश्ते इस प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया कि गाजा युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति पहले जैसी नहीं रही. 2020 में जब अब्राहम अकॉर्ड्स हुए थे, तब कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे. बाद के दौर में सऊदी अरब ने भी इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने की कोशिश की। हालांकि, इस बीच गाजा से हमास ने इजरायल पर हमला कर दिया और फिर एक बड़ी जंग शुरू हो गई. यही वजह रही कि सऊदी-इजरायल के बीच रिश्ते स्थापित नहीं हो पाए, लेकिन मौजूदा हालात में सऊदी अरब किसी जल्दबाजी में कदम उठाने के मूड में नहीं दिख रहा। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सऊदी की नाराजगी यह विवाद सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है. इसके पीछे होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ता तनाव भी बड़ा कारण है. मई की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने "प्रोजेक्ट फ्रीडम" नाम से एक सैन्य मिशन शुरू करने की कोशिश की थी. इसका मकसद होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था, क्योंकि ईरान वहां अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने इस ऑपरेशन की घोषणा खाड़ी सहयोगियों से पूरी सहमति लिए बिना कर दी. इससे सऊदी नेतृत्व नाराज हो गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी सेना को अपने एयरस्पेस और सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया. प्रिंस सुल्तान एयरबेस से अमेरिकी उड़ानों पर रोक लगा दी गई. इसके बाद अमेरिकी ऑपरेशन को भारी झटका लगा और "प्रोजेक्ट फ्रीडम" सिर्फ 36 घंटे के भीतर ठप पड़ गया। अब सोच-समझकर फैसला लेगा सऊदी अरब! सऊदी अरब अब अमेरिका की हर रणनीति का आंख बंद करके समर्थन नहीं करना चाहता. इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान का सीधा खतरा है. तेहरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर किसी खाड़ी देश ने अमेरिकी या इजरायली सैन्य कार्रवाई के लिए अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने दिया, तो उसे भी जवाबी हमले का सामना करना पड़ेगा। 2019 में सऊदी अरब के अबकैक और खुरैस तेल प्लांट्स पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमले अब भी रियाद के लिए बड़ी चेतावनी बने हुए हैं. यही कारण है कि सऊदी नेतृत्व किसी सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहता है. इसके अलावा सऊदी अरब खुद को इस्लाम की सबसे पवित्र जगहों मक्का और मदीना का संरक्षक मानता है. ऐसे में फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज करके इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करना उसके लिए आसान नहीं है. गाजा युद्ध के बाद अरब देशों की जनता में इजरायल के खिलाफ गुस्सा भी काफी बढ़ा है। उधर ईरान इस पूरी घटना को अपने लिए रणनीतिक मौके की तरह देख रहा है. अमेरिका जहां एक बड़ा एंटी-ईरान गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं ईरान खाड़ी देशों और वॉशिंगटन के बीच बढ़ती दूरी का फायदा उठाने में लगा है. विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की "अब्राहम अकॉर्ड्स फर्स्ट" वाली रणनीति ने उल्टा असर किया है. इससे अमेरिका के सहयोगी देश ही असहज हो गए हैं और वे अब अपने सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।  

ईरान तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव, करीबी नेताओं के विरोधी खेमे में जाने से हलचल तेज

वाशिंगटन  अमेरिका की सीनेट में  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा. ईरान युद्ध को सीमित करने वाले प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान उसके ही चार सांसदों ने अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स का साथ दे दिया. यह प्रस्ताव वॉर पॉवर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई की शक्तियों को सीमित करने से जुड़ा है. सीनेट में यह प्रस्ताव 50-47 वोटों से पास हुआ, जिसमें तीन रिपब्लिकन सांसद वोटिंग में शामिल नहीं हुए. रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी ने ट्रंप के खिलाफ वोट किया, वहीं डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।  ये सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा नहीं था, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बुरा संकेत भी है. अब तक सिर्फ बयान आ रहे थे लेकिन इसे ट्रंप के खिलाफ उनकी ही पार्टी की ओर से एक दुर्लभ सार्वजनिक नाराजगी माना जा रहा है. अब तक रिपब्लिकन पार्टी और उसके समर्थक ईरान युद्ध में ट्रंप के साथ खड़े रहे हैं, लेकिन 81 दिन से जारी इस युद्ध का कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में पार्टी के भीतर भी नाराजगी नजर आने लगी है।  ट्रंप को हटाने के लिए 25वें संशोधन की भी मांग मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच कई बार ऐसे सवाल भी उठे हैं कि क्यों उन्हें संविधान का सहारा लेकर हटा न दिया जाए? डेमोक्रेट्स ने 25वें संशोधन की मांग की और डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी कई बार ये कह चुके हैं कि उपराष्ट्रपति और कैबिनेट को तुरंत 25वें संशोधन की धारा 4 लागू करनी चाहिए.अमेरिका के कई सांसद और नेता कह रहे हैं कि ट्रंप का ईरान युद्ध को लेकर बार-बार शब्द बदलना, रणनीति बदलना और यह गाली भरा पोस्ट लिखना, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाता है. ईरान युद्ध में हजारों मौतें हो चुकी हैं और ट्रंप लगातार पूर्ण हवाई नियंत्रण का दावा करते हैं, लेकिन ईरानी हमले खत्म नहीं हो रहे. ऐसे में लोग चिंतित हैं कि राष्ट्रपति का यह व्यवहार देश और दुनिया के लिए खतरा बन सकता है।  कैसे जा सकती है ट्रंप की कुर्सी? इस सवाल का सीधा जवाब है – 25वां संशोधन और उसकी धारा 4. यह अमेरिकी संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो 1967 में राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी की हत्या के बाद पास किया गया. इसका मकसद होता है – अगर राष्ट्रपति मर जाए, इस्तीफा दे दे, हटा दिया जाए या अक्षम हो जाए तो उपराष्ट्रपति को सत्ता सौंपने की प्रक्रिया तय करना. इसकी धारा 4 की मांग की जा रही है।  धारा 4: यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उपराष्ट्रपति और कैबिनेट के बहुमत (15 में से 8) को अधिकार है कि वे लिखित रूप से घोषणा करें कि राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं. इसके बाद उपराष्ट्रपति तुरंत एक्टिंग राष्ट्रपति बन जाता है. अगर राष्ट्रपति कहे कि वह ठीक है तो 4 दिन में कैबिनेट और उपराष्ट्रपति को कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत से साबित करना पड़ता है।