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रूस-चीन की बढ़ेगी नजदीकी, पुतिन के दौरे से द्विपक्षीय वार्ता के संकेत

बीजिंग दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच कूटनीतिक गठजोड़ और मजबूत होने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीन दिवसीय चीन यात्रा खत्म होने के तुरंत बाद, अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन का आधिकारिक दौरा करने वाले हैं। क्रेमलिन और चीनी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि राष्ट्रपति पुतिन 19 और 20 मई को चीन की यात्रा पर रहेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के तुरंत बाद रूस ने ऐलान किया है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जल्द ही चीन जाएंगे. क्रेमलिन ने कहा कि यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 19-20 मई को चीन की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। क्रेमलिन द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, राष्ट्रपति पुतिन अपनी इस यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य मॉस्को और बीजिंग के बीच ‘व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को और अधिक मजबूत करना’ है। दोनों शीर्ष नेता कई ‘प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों’ पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे। बातचीत के अंत में दोनों देशों के बीच एक साझा घोषणापत्र पर भी हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके अलावा, पुतिन चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से भी मुलाकात करेंगे, जहां दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने पर गहन चर्चा होगी। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने गुरुवार को कहा कि पुतिन की चीन यात्रा अब लगभग तय है और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत की तैयारी पूरी हो चुकी है. हालांकि उन्होंने यात्रा की सटीक तारीख नहीं बताई, लेकिन संकेत दिए कि यह दौरा जल्द होने वाला है. रूस और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं. पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब तक 40 से ज्यादा बार मुलाकात कर चुके हैं. दोनों नेताओं की पिछली मुलाकात सितंबर 2025 में बीजिंग में हुई थी. अब पुतिन की प्रस्तावित चीन यात्रा पर दुनिया की नजरें टिक गई हैं. माना जा रहा है कि इस मुलाकात में यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन संबंध, ऊर्जा व्यापार और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर बड़ी रणनीति बन सकती है. दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के हालिया चीन दौरे के दौरान भी शी जिनपिंग ने पुतिन का जिक्र किया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के खत्म होते ही रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां फिर चर्चा में आ गई हैं. रूस ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुत जल्द चीन का दौरा करेंगे और इस यात्रा की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

चीन दौरे के बाद चर्चा में Donald Trump का विमान, सोशल मीडिया पर चीनी सामान फेंकने का दावा

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे के बाद एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है. सोशल मीडिया और कई रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने चीन से मिले सभी गिफ्ट, बैज, फोन और दूसरे सामान ट्रंप के विमान एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले डस्टबिन में फेंक दिए।  बताया जा रहा है कि यह कदम साइबर जासूसी और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के डर की वजह से उठाया गया. दावा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने साफ निर्देश दिया था कि चीन की तरफ से मिला कोई भी सामान राष्ट्रपति के विमान में नहीं ले जाया जाएगा।  यह मामला तब और चर्चा में आया जब पत्रकार एमिली गुडिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट किया. उन्होंने लिखा कि अमेरिकी स्टाफ ने चीनी अधिकारियों की तरफ से दिए गए सभी सामान, जैसे क्रेडेंशियल्स, डेलिगेशन पिन, अस्थायी फोन और दूसरे आइटम इकट्ठा किए और एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले सीढ़ियों के नीचे रखे डस्टबिन में फेंक दिए।  पोस्ट के मुताबिक, "चीन से मिला कोई भी सामान विमान में लाने की अनुमति नहीं थी." इसके बाद सोशल मीडिया पर इस घटना के वीडियो और तस्वीरें भी वायरल होने लगीं।  रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को चीन यात्रा के दौरान अपने निजी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस इस्तेमाल करने से भी बचने को कहा गया था. इसके बजाय डेलिगेशन के सदस्यों को अस्थायी "बर्नर फोन" दिए गए थे, ताकि किसी भी संभावित साइबर निगरानी से बचा जा सके।  इतना ही नहीं, प्रतिनिधियों के निजी फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को एयर फोर्स वन में खास "फैराडे बैग" में रखा गया था. ये ऐसे बैग होते हैं जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल को ब्लॉक करते हैं और किसी भी तरह की ट्रैकिंग या डेटा इंटरसेप्शन को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।  हालांकि अमेरिकी प्रशासन की तरफ से इस पूरे मामले पर आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन इस घटना ने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते अविश्वास और टेक्नोलॉजी वॉर को फिर सुर्खियों में ला दिया है।  दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच साइबर सुरक्षा, जासूसी, चिप टेक्नोलॉजी और डेटा सुरक्षा को लेकर तनाव लगातार बढ़ा है. अमेरिका पहले भी कई बार चीन पर साइबर जासूसी के आरोप लगाता रहा है, जबकि चीन इन आरोपों से इनकार करता आया है। 

चीन को ट्रंप का कड़ा संदेश! मिले उपहार कूड़ेदान में फिंकवाए, दुनिया भर में चर्चा तेज

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आई एक रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति और साइबर सुरक्षा जगत में हलचल मचा दी है।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप और उनके प्रतिनिधिमंडल ने चीन में मिले कई गिफ्ट्स, बैज और स्मृति चिह्नों को अमेरिका वापस ले जाने के बजाय फेंक दिया।  क्यों फेंके गए गिफ्ट्स? अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को आशंका थी कि इन छोटे उपहारों में जासूसी डिवाइस, माइक्रोफोन या साइबर बग छिपे हो सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों को पहले से सख्त निर्देश दिए गए थे कि चीन यात्रा के दौरान मिला कोई भी सामान Air Force One पर नहीं ले जाया जाएगा। इसी वजह से वापसी के समय कई वस्तुओं को नष्ट कर दिया गया या डस्टबिन में फेंक दिया गया। दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से साइबर जासूसी को लेकर तनाव बना हुआ है।अमेरिकी खुफिया एजेंसियां पहले भी आरोप लगा चुकी हैं कि चीन आधुनिक तकनीक के जरिए विदेशी सरकारों, अधिकारियों और संस्थानों की निगरानी करता है। फोन भी फेंकने या पूरी तरह नष्ट करने के निर्देश विशेषज्ञों का मानना है कि छोटी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या स्मृति चिह्नों में बेहद सूक्ष्म जासूसी उपकरण छिपाए जा सकते हैं, जो बातचीत रिकॉर्ड करने या डेटा चोरी करने में सक्षम होते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने इस यात्रा के दौरान अपने निजी मोबाइल फोन और लैपटॉप भी साथ नहीं रखे। इसके बजाय उन्होंने “बर्नर फोन” का इस्तेमाल किया। ये अस्थायी फोन होते हैं जिन्हें सीमित समय तक उपयोग करने के बाद नष्ट कर दिया जाता है। अमेरिका लौटने से पहले इन फोन को भी फेंकने या पूरी तरह नष्ट करने के निर्देश दिए गए थे। बंद डिवाइस भी हो सकते हैक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जासूसी तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि बंद पड़े डिवाइस भी निशाना बनाए जा सकते हैं। इसी वजह से अमेरिकी टीम ने अतिरिक्त सतर्कता बरती और किसी भी संदिग्ध वस्तु को साथ ले जाने से बचा। ट्रंप का बयान भी चर्चा में जब पत्रकारों ने ट्रंप से चीन की कथित जासूसी गतिविधियों पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कहा, “वे हम पर जासूसी करते हैं और हम भी उन पर नजर रखते हैं।” ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने Xi Jinping से साफ कहा था कि अमेरिका भी चीन के खिलाफ साइबर ऑपरेशन चलाता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, डेटा सुरक्षा और साइबर हमलों के आरोपों के कारण तनाव लगातार बढ़ा है। Huawei जैसी चीनी कंपनियों पर अमेरिका पहले भी सुरक्षा और जासूसी से जुड़े आरोप लगा चुका है, जबकि चीन इन आरोपों से इनकार करता रहा है।

चीन में ट्रंप की हुई किरकिरी? शी जिनपिंग के बयान से मचा वैश्विक सियासी तूफान

बीजिंग  ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अभी चीन में हैं. पश्चिम एशिया संकट के बीच डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा पर पूरी दुनिया की नजर है.डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई. जिनपिंग से मिलते ही ट्र्ंप के सुर बदले दिखे. चीन में डोनाल्ड ट्रंप ने जिनपिंग के तारीफों के पुल बांधे. जिनपिंग को महान नेता बताया. उन्हें अच्छा दोस्त कहा. मगर इसके उलट डोनाल्ड ट्रंप को जलालत झेलनी पड़ी. जी हां, शी जिनपिंग ने डोनाल्ड ट्रंप की घनघोर बेइज्जती कर दी. अमेरिका को उनके सामने ही डिक्लाइनिंग नेशन यानी गिरता हुआ देश बता दिया. दिलचस्प बात यह रही कि डोनाल्ड ट्रंप भी जिनपिंग के इस बात से सहमत दिखे।  सबसे पहले जानते हैं कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को लेकर ट्रंप के आगे क्या कहा. दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कूटनीतिक मुलाकात के दौरान एक ऐसा बयान सामने आया, जिसने दुनिया भर का ध्यान खींच लिया. जिनपिंग ने अमेरिका को पतन की ओर जाता देश या गिरता हुआ देश बताया. बीजिंग में हुई इस हाई-प्रोफाइल बैठक के दौरान जिनपिंग ने जिस अंदाज में अमेरिका को गिरता हुआ देश बताया, उसे ट्रंप के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है. हालांकि, ट्रंप इस बयान का अलग मतलब समझा रहे हैं।  ट्रंप ने बाइडन प्रशासन को लपेटा डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि शी जिनपिंग का यह बयान पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल को लेकर था. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग की उन टिप्पणियों की नई व्याख्या दी. ट्रंप ने तर्क दिया कि जिनपिंग का इशारा खास तौर पर जो बाइडेन के कार्यकाल और उस वक्त हुए अमेरिका को नुकसान की ओर था, न कि उनके प्रशासन के तहत अमेरिका की स्थिति को लेकर था. ट्रंप ने अपने तरह से उस बयान को समझाते हुए कहा कि उनके दोबारा सत्ता में आने के बाद अमेरिका फिर से दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक और सैन्य शक्ति बन गया है।  ट्रंप ने अपनी सरकार का किया बचाव डोनाल्ड ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट कर अमेरिका की मौजूदा वैश्विक स्थिति का बचाव किया और एक बार फिर बाइडेन के राष्ट्रपति काल की आलोचना की. ट्रंप ने लिखा, ‘जब राष्ट्रपति शी ने बहुत ही नजाकत से अमेरिका को एक ‘संभवतः पतनशील राष्ट्र’ कहा तो उनका इशारा ‘स्लीपी जो बाइडेन’ और बाइडेन प्रशासन के चार वर्षों के दौरान हुए भारी नुकसान की ओर था. और इस मामले में शी जिनपिंग 100% सही हैं।  हालांकि, यह साफ नहीं हो पाया कि ट्रंप शी जिनपिंग के किस बयान का जिक्र कर रहे थे. क्या वह निजी बातचीत में कही गई बात थी या बीजिंग में सार्वजनिक रूप से कही गई थी. दौरे के पहले दिन शी जिनपिंग ने ‘पतनशील राष्ट्र’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उन्होंने ‘थ्यूसिडिडीज ट्रैप’ में फंसने को लेकर जरूर चेतावनी दी. यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक अवधारणा है, जिसमें एथेंस के उदय से स्पार्टा की सत्ता को चुनौती मिली थी।  जिनपिंग ने क्या कहा था बीजिंग में अपने शुरुआती संबोधन में शी जिनपिंग ने कहा था, ‘दुनिया एक नए मोड़ पर आ गई है. क्या चीन और अमेरिका ‘थ्यूसिडिडीज ट्रैप’ से बच सकते हैं और बड़ी शक्तियों के संबंधों का नया मॉडल बना सकते हैं?’ ट्रंप के साथ बैठक के दौरान शी ने ‘सदी में पहले कभी न देखे गए बड़े बदलावों’ का भी जिक्र किया, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले वैश्विक व्यवस्था से हटने के संकेत के तौर पर देखा गया।  वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने आगे बाइडेन प्रशासन पर ‘खुली सीमाएं, ऊंचे टैक्स, खराब व्यापार समझौते, बढ़ता अपराध’ और अन्य नीतियों के जरिए नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया. ट्रंप ने विविधता, समानता और समावेशन (DEI) पहलों और ट्रांसजेंडर अधिकारों से जुड़ी नीतियों की भी आलोचना की।  अपनी तारीफ में क्या कहा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उनके नेतृत्व में अमेरिका अब आर्थिक और सैन्य रूप से मजबूत हो रहा है, जिसमें ‘स्टॉक मार्केट्स अपने उच्चतम स्तर पर’, मजबूत रोजगार बाजार और वैश्विक स्तर पर फिर से प्रतिष्ठा हासिल करने की बात कही. उन्होंने ‘ईरान की सैन्य ताकत को खत्म करने’ का भी जिक्र किया और कहा कि अमेरिका एक बार फिर ‘आर्थिक महाशक्ति’ बन गया है. ट्रंप ने आगे कहा कि शी ने उन्हें ‘अद्भुत सफलताओं’ के लिए बधाई दी और उम्मीद जताई कि वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्ते बेहतर होंगे।  जिनपिंग से सहमत हैं ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दो साल पहले तक हम सच में एक पतनशील राष्ट्र थे. इस पर मैं राष्ट्रपति शी से पूरी तरह सहमत हूं. लेकिन अब, अमेरिका दुनिया का सबसे आकर्षक देश है और उम्मीद है कि हमारा चीन के साथ रिश्ता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और बेहतर होगा।   

‘हम दुश्मन नहीं पार्टनर बनें’… जिनपिंग ने ट्रंप को दिया ग्लोबल लीडरशिप का पाठ

बीजिंग  चीन की राजधानी बीजिंग में अमेरिका और चीन के बीच हुई हाई-स्टेक्स समिट में दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने टकराव नहीं, बल्कि साझेदारी का संदेश देने की कोशिश की. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात ऐसे वक्त में हुई, जब दोनों देशों के रिश्ते पिछले कई वर्षों से ट्रेड वॉर, टेक्नोलॉजी बैन, ताइवान और वैश्विक प्रभाव की लड़ाई को लेकर तनावपूर्ण रहे है।  बैठक की शुरुआत में शी जिनपिंग ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक अंदाज में दुनिया के सामने बड़ा संदेश रखा. उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय एक नए मोड़ पर खड़ी है और ऐसे समय में चीन और अमेरिका की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ जाती है।  जिनपिंग ने ट्रंप की तरफ देखते हुए कहा, "क्या हम मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और दुनिया को ज्यादा स्थिरता दे सकते हैं? क्या हम अपने लोगों के हित और मानवता के भविष्य को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय रिश्तों का बेहतर भविष्य बना सकते हैं?" अमेरिका-चीन को दुश्मन नहीं, साझेदार होना चाहिए! राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा कि ये सिर्फ दो देशों के सवाल नहीं हैं, बल्कि इतिहास, दुनिया और पूरी मानवता से जुड़े सवाल हैं, जिनका जवाब दोनों नेताओं को मिलकर देना होगा. चीनी राष्ट्रपति ने साफ कहा कि चीन और अमेरिका के साझा हित उनके मतभेदों से कहीं ज्यादा बड़े हैं. जिनपिंग ने कहा, "एक देश की सफलता दूसरे के लिए अवसर है. चीन और अमेरिका के रिश्तों में स्थिरता पूरी दुनिया के लिए अच्छी बात है।  शी जिनपिंग ने आगे कहा कि दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार बनना चाहिए. उनके मुताबिक, टकराव दोनों देशों के लिए नुकसानदायक होगा, जबकि सहयोग से दोनों को फायदा मिलेगा. जिनपिंग ने यह भी कहा कि नई सदी में बड़ी शक्तियों को साथ रहने और साथ आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा।  शी जिनपिंग ने 2026 को चीन-अमेरिका रिश्तों के लिए "ऐतिहासिक और निर्णायक साल" बनाने की अपील भी की. उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश पुराने तनाव पीछे छोड़कर नए भविष्य की तरफ बढ़ेंगे।  राष्ट्रपति ट्रंप ने शी जिनपिंग की सराहना की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बैठक के दौरान जिनपिंग की खुलकर तारीफ की. उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को शानदार बताते हुए कहा कि जिनपिंग एक महान नेता हैं. ट्रंप ने कहा, "आपका दोस्त होना मेरे लिए सम्मान की बात है. चीन और अमेरिका के रिश्ते पहले से बेहतर होने जा रहे हैं." ट्रंप ने यह भी कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच कोई समस्या आई, उन्होंने और जिनपिंग ने सीधे बातचीत कर उसे जल्दी सुलझाया. उन्होंने चीन की उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता की भी सराहना की।  हालांकि, दोनों नेताओं के सार्वजनिक बयानों में नरमी दिखी, लेकिन बंद कमरे में हुई बातचीत में व्यापार, ईरान, चिप टेक्नोलॉजी, स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। 

ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक से बढ़ी हलचल: जानिए चीन दौरे के पीछे की बड़ी वजह

बीजिंग  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 8 साल बाद चीन दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात शी जिनपिंग से होगी. दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर, चिप टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रहेंगे. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब व्यापार, टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे कई बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है।  ट्रंप ने साफ कहा है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा एजेंडा व्यापार होगा. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि ईरान पर शी जिनपिंग के साथ लंबी बातचीत हो सकती है. ट्रंप ने कहा कि वह शी को अपना "दोस्त" मानते हैं और उन्हें उम्मीद है कि इस बैठक से अच्छी चीजें निकलकर आएंगी. चीन दौरे पर जाने से पहले उन्होंने यह भी कहा कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए उन्हें शी जिनपिंग की जरूरत नहीं है।  दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही शुरू हो गया था. लेकिन पिछले साल इसमें बड़ा उछाल आया, जब ट्रंप ने चीन के सभी सामानों पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया. इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामानों पर जवाबी शुल्क लगा दिए और रेयर अर्थ एक्सपोर्ट पर पाबंदियां बढ़ा दीं. देखते ही देखते टैरिफ 145 प्रतिशत तक पहुंच गए।  हालांकि बाद में दोनों देशों ने समझा कि इतना बड़ा आर्थिक टकराव लंबे समय तक नहीं चल सकता. इसके बाद व्यापारिक संघर्ष को अस्थायी रूप से रोकने के लिए समझौता हुआ. चीन ने अमेरिकी किसानों से सोयाबीन खरीदने का वादा किया, जबकि अमेरिका ने कई टैरिफ कम कर दिए. लेकिन इससे मूल विवाद खत्म नहीं हुआ।  सबसे बड़ा विवाद अब टेक्नोलॉजी और चिप इंडस्ट्री को लेकर है. अमेरिका लगातार चीन पर एडवांस कंप्यूटर चिप्स और उनसे जुड़ी टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट पर रोक लगाता रहा है. अमेरिका को डर है कि चीन इन तकनीकों का इस्तेमाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैन्य ताकत बढ़ाने में कर सकता है।  वहीं चीन अब खुद की चिप इंडस्ट्री को मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि उसे अमेरिकी तकनीक पर निर्भर न रहना पड़े. यही वजह है कि यह मुद्दा ट्रंप-शी बैठक में अहम रहने वाला है।  इसके अलावा ईरान का मुद्दा भी बातचीत में शामिल हो सकता है. अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले, खासकर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर. वह कई बार कह भी चुके हैं कि होर्मुज पर सामान्य ट्रैफिक में चीन मदद कर सकता है लेकिन राष्ट्रपति जिनपिंग ने इसको लेकर कोई कदम नहीं उठाए हैं. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा था कि चीन ईरानी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान की मदद कर रहा है।  हालांकि चीन ने अब तक इस मामले में सावधानी भरा रुख अपनाया है. बीजिंग खुलकर अमेरिका का समर्थन करने से बच रहा है और खुद को एक संतुलित ताकत के तौर पर पेश करना चाहता है।  राष्ट्रपति ट्रंप की यह चीन यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है. यह वैश्विक व्यापार, टेक्नोलॉजी और मध्य पूर्व की राजनीति से जुड़े कई बड़े सवालों को प्रभावित कर सकती है. दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात तनाव कम करेगी या नए टकराव की शुरुआत बनेगी। 

टकराव के बावजूद अमेरिका को 90 अरब डॉलर का फायदा, ट्रंप की रणनीति रंग लाई

तेहरान  ईरान के साथ बढ़ते तनाव और ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस के बीच अमेरिका के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है. अमेरिका की जमीन के नीचे ऐसा खजाना मिला है, जो आने वाले कई दशकों तक उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह बदल सकता है. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी (USGS) ने खुलासा किया है कि देश के एपलाचियन पर्वतीय क्षेत्र में भारी मात्रा में लिथियम मौजूद है. जिसकी अनुमानित कीमत करीब 90 अरब डॉलर बताई जा रही है. यह ईरान युद्ध में हुए नुकसान और खर्च लगभग 25 बिलियन डॉलर से कहीं ज्यादा है. यह खोज ऐसे समय में हुई है, जब दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी टेक्नोलॉजी की मांग तेजी से बढ़ रही है।  अमेरिका की लिथियम खोज क्यों है खास रिपोर्ट के मुताबिक यहां करीब 2.3 मिलियन मीट्रिक टन लिथियम ऑक्साइड मौजूद है. यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि आने वाली कई पीढ़ियों तक अमेरिका की जरूरतों को पूरा कर सकती है. यही वजह है कि इस खोज को सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी बेहद अहम माना जा रहा है. यह लिथियम मुख्य रूप से कैरोलिना क्षेत्र के ‘टिन-स्पोड्यूमीन बेल्ट’ में पाया गया है. यह इलाका पहले भी दुनिया का प्रमुख लिथियम स्रोत रह चुका है, लेकिन समय के साथ यहां खनन गतिविधियां कम हो गई थीं. अब एक बार फिर यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा के नक्शे पर लौटता हुआ नजर आ रहा है. खास बात यह है कि यहां पाया जाने वाला स्पोड्यूमीन एक ऐसा खनिज है, जिससे सीधे लिथियम निकाला जा सकता है, जो बैटरियों के लिए बेहद जरूरी होता है।  चीन की नहीं होगी जरूरत  रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक अमेरिका अपनी लिथियम जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता रहा है. खासकर चीन और चिली जैसे देशों पर उसकी निर्भरता ज्यादा रही है. लेकिन इस नई खोज के बाद अमेरिका के पास मौका है कि वह अपनी घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करे और विदेशी निर्भरता को काफी हद तक कम कर दे. दुनिया भर में लिथियम को ‘व्हाइट गोल्ड’ यानी सफेद सोना कहा जाने लगा है. इसकी वजह है इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक 2040 तक लिथियम की मांग में करीब 40 गुना तक बढ़ोतरी हो सकती है. ऐसे में अमेरिका के लिए यह खोज किसी खजाने से कम नहीं है. अनुमान है कि इस भंडार से करीब 13 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां तैयार की जा सकती हैं।   

US एक्शन का असर: ट्रंप की सख्ती से मेक्सिको के नेता पद छोड़ने को मजबूर

मेक्सिको अमेरिका द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी का आरोप लगाए जाने के बाद मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लौडिया शिनबाम की पार्टी के दो सदस्यों ने अपने पद से अस्थायी रूप से हटने की घोषणा की है। उत्तर पश्चिमी सिनालोआ राज्य से शिनबाम की पार्टी के इन सदस्यों ने बताया कि अमेरिका ने उन पर और आठ अन्य नेताओं एवं सुरक्षा अधिकारियों पर मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप लगाए हैं। अमेरिका के द्वारा ड्रग्स तस्करी का आरोप लगाए जाने के बाद मैक्सिको के सिनालोआ प्रांत के गवर्नर और मेयर ने अपना पद छोड़ दिया है. शुक्रवार मध्यरात्रि को जारी एक वीडियो संदेश में अभियोग में नामित गवर्नर रुबेन रोचा मोया ने उन आरोपों का खंडन किया. उन्होंने मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले गिरोह ‘सिनालोआ कार्टल’ को संरक्षण देने के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने लाखों डॉलर की रिश्वत के बदले में उसे अमेरिका में मादक पदार्थों की तस्करी में मदद करने से इनकार किया. पूर्व राष्ट्रपति एंड्रेस मैनुअल लोपेज ओब्राडोर के लंबे समय से सहयोगी रहे 76 वर्षीय रोचा ने कहा, ‘मेरा ईमान साफ है. मैं अपने लोगों और अपने परिवार से आंख मिलाकर कह सकता हूं कि मैंने कभी आपको धोखा नहीं दिया और न ही कभी दूंगा.’ वहीं, सिनालोआ राज्य की राजधानी कुलियाकान के मेयर जुआन डी डियोस गामेज मेंडिविल का नाम भी अभियोग में शामिल है. उन्होंने भी आरोपों से इनकार किया और पद से हटने का ऐलान किया. शनिवार को एक विशेष मतदान में राज्य की स्थानीय कांग्रेस ने रोचा की सहयोगी येराल्डिन बोनिला वाल्वरडे को अंतरिम गवर्नर नियुक्त किया. मैक्सिको में ड्रग्स और उसकी तस्करी के कारण हिंसा भी बहुत होती है. लेकिन हाल के दिनों में अमेरिका की ओर से उस पर इस धंधे पर लगाम लगाने का भी दबाव है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को इन्हीं आरोपों के तहत उनके देश में उनके बिस्तर से गिरफ्तार कर लिया. गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम को अपनी प्रगतिशील मोरेना पार्टी के हितों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कार्टेल के खिलाफ लड़ाई तेज करने के दबाव के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा है. शीनबाम ने कहा कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति का बचाव नहीं करेंगी जो अपराध करने का दोषी पाया गया हो. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर इन 10 लोगों के खिलाफ सबूत मिलते हैं, तो उन पर मैक्सिको में ही केस चलाया जाएगा. मैक्सिको में कई तरह के ड्रग कार्टेल काम करते हैं. पिछले दिनों, फरवरी 2026 में एल मेंचो नाम के ड्रग लॉर्ड और जलिस्को न्यू जेनरेशन कार्टेल का संंचालक की मौत काफी चर्चा में था. सिनालोआ कार्टेल मैक्सिको का सबसे शक्तिशाली ड्रग नेटवर्क है.

ट्रंप का जर्मनी पर दोहरा हमला: सैनिकों की वापसी और कारों पर 25% टैरिफ का कड़ा फैसला

वाशिंगटन जर्मनी को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख एक बार फिर सख्त दिख रहा है. उन्होंने साफ कहा है कि जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या सिर्फ 5 हजार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे कहीं ज्यादा कटौती की जाएगी. यानी जो शुरुआत 5 हजार सैनिकों की वापसी से हो रही है, वो आगे और बड़ी हो सकती है. इससे पहले ट्रंप ने यूरोपीय यूनियन की कारों और ट्रकों पर 25% टैरिफ लगाने का भी ऐलान किया था, जिसका असर खासतौर पर जर्मनी पर पड़ सकता है।  देखा जाए तो ट्रंप की नाराजगी की वजह व्यापारिक समझौतों का सही से पालन न होना है. न्यूज एजेंसी एपी के मुताबिक, उन्होंने खुलेआम कहा है कि यूरोपीय संघ ने वादों को निभाया नहीं है, इसलिए अब अगले हफ्ते से वहां बनने वाली कारों और ट्रकों पर 25% टैक्स लगाया जाएगा. जर्मनी, जो गाड़ियों के निर्माण के लिए जाना जाता है, उसके लिए यह फैसला बड़ा झटका माना जा रहा है. असल में सारा मामला फ्लोरिडा में खुला, जहां पत्रकारों के सवाल पर ट्रंप ने दो-टूक कहा, '5 हजार का आंकड़ा तो बहुत छोटा है, हम इससे कहीं ज्यादा सैनिकों की छुट्टी करने वाले हैं और सेना में बड़ी कटौती करेंगे।  हैरानी की बात ये है कि खुद पेंटागन ने पहले सिर्फ 5 हजार सैनिकों की बात कही थी, लेकिन ट्रंप के इस ताजा बयान ने सबको सोच में डाल दिया है. अमेरिका के भीतर भी इस फैसले का विरोध शुरू हो गया है. कई बड़े नेताओं का मानना है कि अगर अमेरिकी सैनिक जर्मनी छोड़कर चले गए, तो रूस के राष्ट्रपति पुतिन को अपनी ताकत दिखाने का खुला मौका मिल जाएगा. खासकर तब, जब यूक्रेन और रूस की जंग को 5 साल पूरे होने वाले हैं।  क्या अकेले पड़ जाएंगे यूरोपीय देश? जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने इस पर बहुत ही शांत तरीके से जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि सैनिकों को वापस बुलाने की बात तो ट्रंप सालों से कर रहे थे, इसलिए ये कोई नई बात नहीं है. उनका मानना है कि अब यूरोप के देशों को खुद अपनी सुरक्षा के लिए आगे आना होगा और अपनी जिम्मेदारी खुद संभालनी होगी. हालांकि, उन्होंने ये भी याद दिलाया कि अमेरिकी सैनिकों का जर्मनी में होना सिर्फ हमारे लिए नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के फायदे के लिए भी है।  पेंटागन की मानें तो इन सैनिकों की वापसी अगले 6 से 12 महीनों में पूरी कर ली जाएगी. फिलहाल जर्मनी में करीब 36,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो वहां के बड़े मिलिट्री बेस और एयर बेस की सुरक्षा संभालते हैं. जानकारों का कहना है कि सैनिकों का जाना एक अलग बात है, लेकिन इससे जो दुनिया को मैसेज जाएगा वो काफी गंभीर हो सकता है. ट्रंप की ये नाराजगी ईरान के मामले में भी देखी जा रही है, जहां उन्हें लगता है कि यूरोपीय देशों ने उनका साथ नहीं दिया।  अब हर किसी की नजर इस बात पर है कि ट्रंप का ये 'हंटर' जर्मनी की तिजोरी और उसकी सुरक्षा पर कितना भारी पड़ता है. एक तरफ सैनिकों की घर वापसी का दबाव और दूसरी तरफ कारों पर 25% का तगड़ा टैक्स, ट्रंप ने साफ मैसेज दे दिया है कि अब वो 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के लिए किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं. अब देखना ये होगा कि क्या इस फैसले के बाद यूरोप अपने दम पर अपनी सुरक्षा कर पाएगा या फिर उसे अमेरिका के आगे झुकना पड़ेगा?  

पाकिस्तान के F-16 लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिका का बड़ा कदम, जारी किया विशाल कॉन्ट्रैक्ट

इस्लामाबाद अमेरिकी वायु सेना ने F-16 फाइटर जेट्स के रडार सिस्टम को लॉन्ग-टर्म तकनीकी और इंजीनियरिंग सपोर्ट देने के लिए 488 मिलियन डॉलर के नए कॉन्ट्रैक्ट का ऐलान किया है। खास बात यह है कि अमेरिका की इस बड़ी रक्षा डील के दायरे में पाकिस्तान भी शामिल है। यह अहम कॉन्ट्रैक्ट प्रमुख रक्षा कंपनी नॉर्थरोप ग्रुम्मन सिस्टम्स कॉर्पोरेशन को सौंपा गया है। इस कदम को अमेरिका के सहयोगी देशों की वायु सेना में F-16 की ऑपरेशनल तैयारियों को बनाए रखने के लिए अमेरिका की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के तौर पर देखा जा रहा है। डील और अपग्रेड से जुड़ी मुख्य बातें:     रडार सिस्टम की बढ़ेगी क्षमता: आधिकारिक नोटिस के मुताबिक, इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत मुख्य रूप से F-16 लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाले 'APG-66' और 'APG-68' रडार सिस्टम को इंजीनियरिंग सपोर्ट दिया जाएगा।     2036 तक चलेगा काम: फाइटर जेट्स के अपग्रेड और सपोर्ट का यह काम अमेरिका के मैरीलैंड स्थित लिंथिअम हाइट्स में किया जाएगा और इसके 31 मार्च, 2036 तक जारी रहने का कार्यक्रम है।फंडिंग और मंजूरी: यूटाह स्थित अमेरिकी वायु सेना के लाइफसाइकिल मैनेजमेंट सेंटर द्वारा यह कॉन्ट्रैक्ट जारी किया गया है। इसके लिए वित्त वर्ष 2026 के फंड से शुरुआती तौर पर 2.64 मिलियन डॉलर की राशि जारी भी कर दी गई है। पाकिस्तान के अलावा किन-किन देशों को मिलेगा फायदा? यह कॉन्ट्रैक्ट अमेरिका के 'फॉरेन मिलिट्री सेल्स' (FMS) प्रोग्राम के तहत सहयोगी देशों के लिए किया गया है। इस डील में पाकिस्तान के अलावा बहरीन, बेल्जियम, चिली, डेनमार्क, मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया, इराक, इजरायल, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, मोरक्को, नीदरलैंड, नॉर्वे, ओमान, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, थाइलैंड और तुर्किए शामिल हैं। 2040 तक बढ़ जाएगी पाकिस्तानी फाइटर जेट्स की उम्र यह नया समर्थन पाकिस्तान को दिए जा रहे अमेरिकी सहयोग की एक कड़ी है। इससे पहले दिसंबर 2025 में अमेरिका की डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी (DSCA) ने अपनी संसद को पाकिस्तान के F-16 बेड़े को अपग्रेड करने के लिए 686 मिलियन डॉलर के एक अलग पैकेज की जानकारी दी थी। इस 686 मिलियन डॉलर के पैकेज में 'लिंक-16' टैक्टिकल डेटा सिस्टम, क्रिप्टोग्राफिक उपकरण, एवियोनिक्स अपग्रेड और ट्रेनिंग सपोर्ट शामिल है। इस अपग्रेड योजना में 'आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड-ऑर-फो' सिस्टम, सटीक नेविगेशन टूल और सुरक्षित संचार उपकरणों में बदलाव भी शामिल किए गए हैं। DSCA के अनुसार, इस पैकेज का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान के F-16 बेड़े का आधुनिकीकरण करना है ताकि विमानों की सर्विस लाइफ 2040 तक बढ़ाई जा सके। साथ ही इसका मकसद भविष्य में आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए अमेरिका और अन्य सहयोगी बलों के साथ पाकिस्तान के तालमेल (इंटरऑपरेबिलिटी) को और ज्यादा मजबूत करना है। इस अपग्रेड कार्यक्रम के लिए 'लॉकहीड मार्टिन' को प्रमुख ठेकेदार के रूप में चुना गया था। अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया था कि इस काम के लिए अमेरिकी कर्मियों को पाकिस्तान भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पाकिस्तान ने किया अमेरिकी मदद का स्वागत मामले से जुड़े एक राजनयिक सूत्र के मुताबिक, पाकिस्तान ने अपने F-16 प्रोग्राम के लिए अमेरिका के लगातार मिल रहे सपोर्ट का स्वागत किया है। सूत्रों का कहना है कि इन अपग्रेड्स से विमानों की उम्र बढ़ेगी और सहयोगी प्रणालियों के साथ तकनीकी अनुकूलता बनी रहेगी। सूत्र ने यह भी बताया कि पाकिस्तानी वायु सेना ने हाल के वर्षों में अपने बेड़े में कई नए विकल्प शामिल किए हैं जिससे किसी एक प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम हुई है, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी मौजूदा F-16 क्षमताओं को बनाए रखने को काफी अहमियत देते हैं।