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चीन के 49 लड़ाकू विमानों ने ताइवान को घेरा, युद्ध की आशंका बढ़ी?

ताइपे ताइवान के आसपास चीन की सैन्य गतिविधियों में अचानक आई तेजी ने एक बार फिर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ताइवान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 3 नवंबर को स्थानीय समय सुबह 6 बजे तक पिछले 24 घंटों में चीन के 49 सैन्य विमान, नौसेना के छह जहाज और छह पोत ताइवान के आसपास देखे गए. यह 2026 में अब तक एक दिन में दर्ज की गई सबसे बड़ी संख्या है. इससे पहले फरवरी में 42 चीनी सैन्य विमानों की गतिविधि दर्ज की गई थी. इस बार का आंकड़ा उस रिकॉर्ड से भी आगे निकल गया है।  ताइवान के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, चीन के 49 विमानों में से 31 ने ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा पार की और ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन यानी ADIZ में प्रवेश किया. यह मध्य रेखा लंबे समय तक ताइवान और चीन के बीच अनौपचारिक सैन्य सीमा की तरह काम करती रही है. हालांकि चीन इसे आधिकारिक सीमा नहीं मानता और पिछले कुछ वर्षों में उसके सैन्य विमान नियमित रूप से इसे पार करते रहे हैं।  यह समझना जरूरी है कि ADIZ किसी देश के संप्रभु हवाई क्षेत्र के समान नहीं होता. यह ऐसा पहचान क्षेत्र है, जहां आने वाले विमानों की निगरानी और पहचान की जाती है, ताकि संभावित सुरक्षा खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके. इसलिए ADIZ में प्रवेश को सीधे ताइवान के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ नहीं कहा जा सकता. लेकिन बड़ी संख्या में विमानों का मध्य रेखा पार करना ताइवान की सैन्य तैयारियों पर दबाव जरूर बढ़ाता है।  ताइवान ने कैसे दिया जवाब? चीनी विमानों और जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ताइवान ने अपने लड़ाकू विमानों की गश्त, नौसैनिक जहाजों और मिसाइल निगरानी प्रणालियों को सक्रिय किया. इस तरह की प्रतिक्रिया का उद्देश्य किसी संभावित सैन्य कार्रवाई को रोकना, गतिविधियों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर तत्काल जवाब देने की तैयारी बनाए रखना है।  हालांकि, ऐसी परिस्थितियों में जोखिम भी बढ़ जाता है. जब दोनों पक्षों के विमान और युद्धपोत एक-दूसरे के करीब काम करते हैं, तो गलत आकलन, संचार में कमी या किसी अप्रत्याशित सैन्य गतिविधि से तनाव बढ़ सकता है. इसलिए ताइवान के आसपास लगातार बढ़ती सैन्य मौजूदगी केवल आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।  चीन की सैन्य ताकत और रणनीतिक संदेश चीन की नौसेना में 400 से अधिक जहाज होने का आंकड़ा उसकी तेजी से बढ़ती समुद्री सैन्य क्षमता को दर्शाता है. चीन पिछले कई वर्षों से अपने युद्धपोतों, विमानवाहक पोतों, पनडुब्बियों और लंबी दूरी तक अभियान चलाने की क्षमता का विस्तार कर रहा है. प्रशांत महासागर में उसकी बढ़ती गतिविधियां भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।  ताइवान के आसपास बड़ी संख्या में विमानों और जहाजों की तैनाती को सैन्य दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है. इससे चीन एक ओर ताइवान को अपनी सैन्य क्षमता का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को भी संदेश देता है कि वह पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए तैयार है।  नवंबर-दिसंबर में बढ़ती गतिविधियों का क्या मतलब? नवंबर और दिसंबर के दौरान ताइवान के आसपास चीनी सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी का पैटर्न सामने आने से यह सवाल उठता है कि क्या बीजिंग किसी बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है. हालांकि, केवल विमानों और जहाजों की संख्या के आधार पर ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा. सैन्य अभ्यास, राजनीतिक संदेश, क्षेत्रीय शक्ति प्रदर्शन और नियमित गश्त भी ऐसी गतिविधियों के कारण हो सकते हैं।  ताइवान का मुद्दा चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का सबसे संवेदनशील विषय है. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान अपनी अलग राजनीतिक व्यवस्था और स्वशासन बनाए हुए है. अमेरिका ताइवान को हथियार और सुरक्षा सहयोग देता है, जिससे यह विवाद व्यापक अंतरराष्ट्रीय महत्व रखता है।  कुल मिलाकर, 24 घंटे में 49 चीनी सैन्य विमानों की मौजूदगी ताइवान के आसपास बढ़ते सैन्य दबाव का स्पष्ट संकेत है. लेकिन इसे तत्काल युद्ध की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी. आने वाले दिनों में सैन्य गतिविधियों की निरंतरता, चीन की आधिकारिक घोषणाओं और अमेरिका तथा क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रिया पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। 

अंतरिक्ष में चीन की रहस्यमयी उड़ान, खुले दरवाजे और जुड़े सैटेलाइट की तस्वीर से बढ़ी दुनिया की दिलचस्पी

वाशिंगटन अंतरिक्ष में चीन के एक गुप्त विमान की साफ तस्वीर सामने आई है. अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने अपनी नई रिपोर्ट में यह तस्वीर जारी की है. इसे 28 मई 2024 को अमेरिकी कंपनी वैंटोर के वर्ल्डव्यू-3 सैटेलाइट ने लिया था. चीन के इस विमान का डिजाइन अमेरिका के X-37B स्पेसप्लेन जैसा है. यह ऐसा विमान है, जो अंतरिक्ष में जाने के बाद वापस धरती पर उतर सकता है. हालांकि, चीन इस विमान का इस्तेमाल किस काम के लिए कर रहा है, इसकी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है।  तस्वीर में विमान के पंख, पीछे के दो खड़े हिस्से और सोलर पैनल दिखाई दे रहे हैं. इसके बीच में सामान रखने की जगह है, जिसके दरवाजे खुले हुए हैं. विमान के पिछले हिस्से में एक अलग सैटेलाइट भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है. चीन 2020 से अब तक इस तरह के स्पेसप्लेन के चार मिशन लॉन्च कर चुका है. इसका सबसे नया मिशन 7 फरवरी 2026 को लॉन्च किया गया था।  तस्वीर में चीन का स्पेसप्लेन छोटे स्पेस शटल जैसा दिखता है. इसके छोटे पंख हैं. पीछे की तरफ दो खड़े हिस्से हैं. बीच में सामान रखने की जगह बनी है. इसके दरवाजे ऊपर खुलते हैं. विमान के पिछले हिस्से में अलग ढांचा भी लगा है, जिसके दोनों तरफ सोलर पैनल हैं।  वैंटोर के मुताबिक, यह तस्वीर 28 मई 2024 को ली गई थी. उस समय सैटेलाइट और विमान के बीच करीब 90 किलोमीटर की दूरी थी. तस्वीर में विमान के खुले दरवाजे और उससे जुड़ा सैटेलाइट दिखाई दे रहा है. लेकिन यह साफ नहीं है कि विमान के अंदर क्या रखा था।  अमेरिका के X-37B जैसा है विमान चीन के इस स्पेसप्लेन का डिजाइन अमेरिका के X-37B से काफी मिलता है. इस विमान का इस्तेमाल अमेरिकी स्पेस फोर्स करती है. दोनों विमानों को अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है और मिशन पूरा होने के बाद ये वापस धरती पर उतर सकते हैं. X-37B के अब तक आठ मिशन हो चुके हैं. इसका आठवां मिशन 22 अगस्त 2025 को लॉन्च किया गया था. अमेरिका और चीन दोनों अपने इन विमानों से जुड़े कई राज सार्वजनिक नहीं करते हैं।  चीन अब तक चार मिशन लॉन्च कर चुका है चीन ने 2020 से अब तक इस स्पेसप्लेन के चार मिशन लॉन्च किए हैं. इसका पहला मिशन सितंबर 2020 में शुरू हुआ था. इसके बाद 2022 और दिसंबर 2023 में भी इसे अंतरिक्ष में भेजा गया. इसका चौथा मिशन 7 फरवरी 2026 को लॉन्च किया गया था. 28 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह विमान अभी तक धरती पर वापस नहीं लौटा था।  दिसंबर 2023 से सितंबर 2024 तक चले तीसरे मिशन के दौरान इस विमान को अंतरिक्ष में कई छोटी चीजें छोड़ते हुए देखा गया था. इस साल भी इसके मिशन के दौरान कम से कम एक दूसरी चीज छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है. हालांकि, ये चीजें क्या थीं और इनका इस्तेमाल किस काम के लिए किया गया, यह अभी साफ नहीं है।  शेनलोंग और टेंगयुन पर भी काम कर रहा चीन अमेरिकी एजेंसी की रिपोर्ट में चीन के दो स्पेसप्लेन मॉडल शेनलोंग और टेंगयुन का जिक्र है. लेकिन रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि तस्वीर में दिख रहा विमान इनमें से कौन सा है. चीन के इस विमान को आमतौर पर शेनलोंग के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा, चीन हाओलोंग नाम के एक और स्पेसप्लेन पर काम कर रहा है. इसे चीन के तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन तक सामान पहुंचाने के लिए बनाया जा रहा है।  अंतरिक्ष में क्या काम आते हैं ऐसे विमान? ऐसे विमानों की मदद से सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाया जा सकता है. इनका इस्तेमाल नई तकनीक की जांच करने और दूसरी चीजों को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए भी किया जा सकता है. ये अपना रास्ता बदल सकते हैं और दूसरी अंतरिक्ष वस्तुओं के करीब भी जा सकते हैं।  इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक कामों के अलावा सैन्य गतिविधियों और खुफिया जानकारी जुटाने में भी हो सकता है. हालांकि, अभी तक ऐसा कोई पक्का सबूत सामने नहीं आया है कि चीन इस स्पेसप्लेन का इस्तेमाल हथियार के तौर पर कर रहा है. चीन के इस विमान की नई तस्वीर से उसके डिजाइन के बारे में ज्यादा जानकारी मिली है. लेकिन यह विमान अंतरिक्ष में क्या काम कर रहा है. इसका असली मकसद क्या है, इन सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं। 

चीन की राजधानी में बढ़ेगी बुजुर्ग आबादी, पेंशन व्यवस्था पर बढ़ेगा दबाव; जन्म दर बनी चुनौती

बीजिंग  चीन की राजधानी बीजिंग तेजी से बूढ़ी होती आबादी की चुनौती का सामना कर रही है. अनुमान है कि 2035 तक शहर में रहने वाला हर तीसरा व्यक्ति 60 साल या उससे ज्यादा उम्र का होगा. चीन में आबादी का तेजी से बूढ़ा होना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. इसका असर देश की अर्थव्यवस्था, घरेलू खपत और पेंशन व्यवस्था पर पड़ सकता है।  बीजिंग डेली के मुताबिक, पिछले साल के अंत तक राजधानी में 60 साल या उससे अधिक उम्र के 52.9 लाख स्थायी निवासी थे. यह शहर की कुल आबादी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ेगी और 2035 तक बीजिंग की आबादी का करीब एक-तिहाई हिस्सा बुजुर्गों का हो जाएगा।  इस चुनौती से निपटने के लिए बीजिंग की सरकार बुजुर्गों को दी जाने वाली सुविधाओं और आर्थिक मदद को बढ़ा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें बुनियादी पेंशन बढ़ाना भी शामिल है. आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने के साथ पेंशन और दूसरी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर खर्च का दबाव भी बढ़ सकता है।  घटती जन्मदर से चीन की चिंता बढ़ी चीन की आबादी 2022 से लगातार घट रही है और देश तेजी से उम्रदराज हो रहा है. इससे सरकार की घरेलू खपत बढ़ाने और कर्ज पर नियंत्रण पाने की कोशिशों को मुश्किल हो सकती है. आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों के कामकाजी उम्र से बाहर होने की आशंका है. ऐसे समय में पेंशन बजट पर पहले से दबाव बना हुआ है।  कम जन्मदर का असर सिर्फ आबादी की संख्या तक सीमित नहीं है. जनसांख्यिकी विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आज कम बच्चे पैदा होने का मतलब भविष्य में कम परिवार और खपत की धीमी बढ़ोतरी भी हो सकता है. इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित होने का खतरा है।  जन्म बढ़ाने के लिए बड़ा खर्च चीन की सरकार आबादी बढ़ाने की योजना को आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बना रही है. रॉयटर्स के अनुमानों के मुताबिक, इस साल जन्मदर बढ़ाने के उपायों पर संभावित खर्च करीब 180 अरब युआन यानी लगभग 26.92 अरब डॉलर हो सकता है. सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह जन्मदर में गिरावट को कैसे रोके और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को कैसे पूरा करे। 

चीन में AI चैटबॉट्स पर सख्ती, यूजर्स को भावनात्मक रूप से निर्भर नहीं बना सकेंगे

बीजिंग  आज के समय में AI सिर्फ सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं है. अब कई लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स से दोस्त, पार्टनर और यहां तक कि परिवार के सदस्य की तरह बात कर रहे हैं. लेकिन चीन ने एआई के इस इस्तेमाल को लेकर बड़ा कदम उठाया है. वहां अब ऐसे AI चैटबॉट्स पर सख्त नियम लागू किए गए हैं, जो लोगों के साथ लंबे समय तक इमोशनल रिलेशनशिप जैसा कनेक्शन बनाते हैं. आइए, जानते हैं पूरे मामले के बारे में।  चीन में AI रिश्तों पर नए नियम 15 जुलाई को चीन ने ऐसे एआई चैटबॉट्स के लिए नए नियम लागू किए, जो इंसानों की तरह बातचीत करते हैं और लोगों को इमोशनल सपोर्ट देते हैं. इन नियमों का मकसद AI की वजह से होने वाली इमोशनल डिपेंडेंसी और दूसरी परेशानियों को कम करना बताया गया है।  इन नियमों के तहत एआई को यह साफ बताना होगा कि वह इंसान नहीं है. इसके अलावा चैटबॉट्स को हर दो घंटे में यूजर को यह भी बताना होगा कि वह कितनी देर से ऑनलाइन है।  AI को नहीं बढ़ानी होगी इमोशनल डिपेंडेंसी नए नियमों के मुताबिक एआई चैटबॉट यूजर को अपने ऊपर ज्यादा निर्भर नहीं बना सकते. उन्हें ऐसी बातें करने से भी रोका गया है, जिससे यूजर AI पर इमोशनल रूप से बहुत ज्यादा निर्भर हो जाए।  एआई को खुद को यूजर का सबसे करीबी या एकमात्र साथी बताने जैसी चीजों से भी बचना होगा. इसके अलावा चैटबॉट्स को आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाने या उसका संकेत देने की भी इजाजत नहीं है।  बच्चों के लिए और सख्त नियम बच्चों के लिए चीन ने इन नियमों को और सख्त रखा है. 14 साल से कम उम्र के बच्चों को इंसानों की तरह बातचीत करने वाले एआई का इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की मंजूरी चाहिए।  वहीं 18 साल से कम उम्र के बच्चों को AI बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड, पति-पत्नी या किसी करीबी रिश्ते वाले वर्चुअल पार्टनर का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।  AI कंपनियों पर जुर्माना अगर कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करती हैं, तो उन पर 2 लाख युआन तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. कुछ बड़ी टेक कंपनियों ने नियम लागू होने से पहले ही अपने एआई असिस्टेंट्स से कम्पैनियन फीचर्स हटा दिए थे।  AI दोस्त बन रहा है या अकेलापन बढ़ा रहा है? रिसर्च में एआई कम्पैनियन ऐप्स को लेकर चिंता भी सामने आई है. एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों के पास कम दोस्त या करीबी परिवार वाले होते हैं, उनके AI चैटबॉट इस्तेमाल करने की संभावना ज्यादा होती है. साथ ही एआई चैटबॉट के ज्यादा इस्तेमाल को अकेलेपन से भी जोड़ा गया है।  चीन के इस कदम ने एक बड़ी बहस शुरू कर दी है. सवाल यह है कि AI से लोगों को भावनात्मक नुकसान से बचाने के लिए कितने नियम जरूरी हैं और लोगों की निजी जिंदगी में सरकार का कितना दखल होना चाहिए। 

AI डेवलपमेंट की स्पीड पर छिड़ी बहस, ट्रंप का चीन को बड़ा संदेश; क्या थमेगी रफ्तार?

 नई दिल्ली अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर होड़ लगातार तेज हो रही है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह AI के विकास की रफ्तार को कम करने के पक्ष में नहीं हैं. आयरलैंड के डूनबेग में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका AI के विकास में चीन से आगे है और वह इस बढ़त को बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि AI की वैश्विक दौड़ में जो जीतेगा, वही जीतेगा।  ट्रंप ने माना कि AI के लिए कुछ सुरक्षा नियम यानी गार्डरेल्स जरूरी हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार किस तरह के नियम लाने की तैयारी कर रही है. AI के तेजी से विकास को लेकर चिंता जताने वालों पर ट्रंप ने कहा कि तकनीक को लेकर ऐसा सोचने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं।  ट्रंप बोले- AI की रफ्तार नहीं रोकना चाहते ट्रंप का यह बयान AI इंडस्ट्री में विकास की रफ्तार को लेकर चल रही बहस के बीच आया है. एंथ्रोपिक AI के CEO डारियो अमोडेई ने एक दिन पहले कहा था कि AI इंडस्ट्री को विकास की रफ्तार कुछ धीमी करनी चाहिए, ताकि सुरक्षा उपायों को तकनीक के साथ कदम मिलाने का समय मिल सके. एलन मस्क और ओपनAI के CEO सैम ऑल्टमैन भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर सहमति जता चुके हैं।  वहीं, ट्रंप AI से जुड़े डेटा सेंटर के निर्माण के समर्थन में बने हुए हैं. अमेरिका में बड़ी टेक कंपनियां छोटे शहरों में कंप्यूटिंग डेटा सेंटर का नेटवर्क तैयार कर रही हैं. हालांकि, दोनों पार्टियों के नेता जमीन, पानी, बिजली की बढ़ती जरूरत और महंगे बिजली बिल को लेकर सवाल उठा रहे हैं।  चीन से मुकाबले को लेकर कोई समझौता नहीं ट्रंप के बयान से साफ है कि अमेरिका AI की रेस में चीन से अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है. इसी वजह से AI की विकास दर कम करने का सवाल अमेरिका के लिए अहम बन गया है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि डेमोक्रेट्स को AI को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए।  नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के निदेशक केविन हैसेट के मुताबिक, इस हफ्ते साइबर और साइंस-टेक्नोलॉजी से जुड़े अधिकारी AI की आगे की रणनीति पर बैठक कर सकते हैं. हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने भी AI के लिए कुछ सेफ्टी मेजर्स की जरूरत मानी है, लेकिन अमेरिका को AI में आगे बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।  इसी बहस के बीच एंथ्रोपिक के पूर्व कर्मचारी जैकब कॉक्सन ने अमेरिका और चीन से मिलकर AI विकास की रफ्तार को जिम्मेदारी से कंट्रोल करने की अपील की है. उनका डर है कि अगर दोनों देश बिना पर्याप्त सुरक्षा के एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में लगे रहे, तो यही AI रेस खतरनाक साबित हो सकती है। 

UN में भारत की बढ़ेगी ताकत! वीटो पावर को लेकर रूस-चीन के बाद महासचिव का बड़ा बयान

नईदिल्ली  दुनिया की राजनीति में भारत की ताकत लगातार बढ़ रही है और अब इसकी गूंज संयुक्त राष्ट्र के सबसे बड़े मंच पर भी सुनाई दे रही है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद में सुधार और उसके विस्तार की मांग का खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने साफ कहा कि आज की दुनिया 1945 वाली दुनिया नहीं है. तब जो आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक तस्वीर थी, वह अब पूरी तरह बदल चुकी है. ऐसे में वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी आज की दुनिया के हिसाब से बदलनी चाहिए. सबसे खास बात यह है कि गुटेरेस ने भारत का नाम लेकर कहा कि वह सुरक्षा परिषद में विस्तार की मांग के सबसे आगे रहने वाले देशों में है. यानी जिस स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार की मांग भारत लंबे समय से करता रहा है, उसे अब एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है. मामला यहीं खत्म नहीं होता. ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भी भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका देने की मांग का समर्थन दोहराया है. दोनों देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और इनके पास अभी वीटो अधिकार भी है. ऐसे में उनका भारत के पक्ष में खड़ा होना काफी अहम माना जा रहा है।  वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण को सिर्फ नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला बनने की बात कही थी. गुटेरेस ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र में ज्यादा ताकत मिलेगी या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के साथ वीटो का अधिकार भी मिलेगा? संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भारत की मांग को बताया अहम, दुनिया बदलने की दी दलील एंटोनियो गुटेरेस ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सुरक्षा परिषद के विस्तार को समय की जरूरत बताया. उनका कहना था कि मौजूदा संस्थागत ढांचा उस दुनिया को नहीं दर्शाता जिसमें हम आज रह रहे हैं. 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब वैश्विक शक्ति संतुलन अलग था. आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है. गुटेरेस ने कहा कि बदलती आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को वैश्विक संस्थाओं में भी जगह मिलनी चाहिए. उन्होंने खास तौर पर कहा कि भारत इस मांग को आगे बढ़ाने में सबसे आगे रहा है।  रूस-चीन ने भी भारत के लिए खोला बड़ा रास्ता ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन किया. घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई है. इसमें सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और सक्षम बनाने की बात कही गई. साथ ही विकासशील देशों की सदस्यता बढ़ाने पर जोर दिया गया है. चीन और रूस ने कहा कि भारत और ब्राजील जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ज्यादा बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए. खासकर सुरक्षा परिषद में उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है. भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।  भारत को अभी वीटो नहीं मिला, लेकिन रास्ता जरूर मजबूत हुआ यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. गुटेरेस ने यह ऐलान नहीं किया है कि भारत को तत्काल वीटो अधिकार मिलने जा रहा है. सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्य बनाने की मांग का समर्थन जरूर किया गया है. मौजूदा व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्य हैं चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका. इन पांचों के पास वीटो अधिकार है. यह व्यवस्था 1945 में सुरक्षा परिषद की स्थापना के समय से चली आ रही है. भारत अगर भविष्य में स्थायी सदस्य बनता है तो वीटो का सवाल अलग से तय होगा. फिलहाल बड़ा घटनाक्रम यह है कि भारत की दावेदारी को वैश्विक दक्षिण, ब्रिक्स और अब संयुक्त राष्ट्र प्रमुख की तरफ से भी मजबूत समर्थन मिलता दिख रहा है।  PM मोदी ने कहा- वैश्विक दक्षिण सिर्फ नियम मानने वाला नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की भूमिका को लेकर बड़ा संदेश दिया था. उन्होंने कहा था कि विकासशील देशों को सिर्फ बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं रहना चाहिए. उन्हें नियम बनाने की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. गुटेरेस के बयान को इसी दिशा में देखा जा रहा है. उनका कहना था कि दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में वैश्विक संस्थाओं में भी संतुलन और समानता दिखाई देनी चाहिए. सुरक्षा परिषद में सुधार इसी बड़े बदलाव का हिस्सा हो सकता है।  गुटेरेस ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर गाजा तक दुनिया के सामने रखी चुनौती     संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सिर्फ सुरक्षा परिषद सुधार की बात नहीं की. उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद कई बड़ी चुनौतियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में विकास की रफ्तार को कई गुना बढ़ा सकती है. लेकिन इसका फायदा फिलहाल कुछ कंपनियों और कुछ देशों तक ज्यादा सीमित है. अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की खाई आय, अवसर, सुरक्षा और संप्रभुता की खाई को और बढ़ा सकती है. उन्होंने विकासशील देशों के लिए वित्तीय मदद बढ़ाने की भी बात की।      गुटेरेस ने जलवायु न्याय का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने विकसित देशों से अपने वादे पूरे करने की अपील की. इसके अलावा उन्होंने गाजा, मध्य पूर्व, यूक्रेन और सूडान समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति की जरूरत बताई. उनका कहना था कि सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए।  क्या भारत को मिलेगा वीटो? अब पूरी दुनिया की नजर इस सवाल पर भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की उसकी मांग नई नहीं है. अब उसे रूस और चीन का समर्थन मिला है. ब्रिक्स के मंच से भी आवाज मजबूत हुई है और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी … Read more

Pakistan से Paris तक फीका पड़ा चीन का एयर डिफेंस, जानिए क्यों घट रही है वैश्विक मांग

बीजिंग  पेरिस में दुनिया के सबसे बड़े ड‍िफेंस फेयर में से एक यूरोसैटरी खत्म हुआ. यहां अमेरिका, फ्रांस, इजरायल, साउथ कोरिया और चीन समेत दुनिया की बड़ी ड‍िफेंस कंपनियां अपने सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम लेकर पहुंचीं. चीन भी पूरे आत्मविश्वास के साथ गया. नोरिन्को ने स्काई ड्रैगन-100, यितियन-II, लेजर वेपन और एंटी-ड्रोन सिस्टम का प्रदर्शन किया. लेकिन क‍िसी ने द‍िलचस्‍पी नहीं द‍िखाई. सवाल ये क‍ि अगर चीनी सिस्टम इतने दमदार हैं, तो यूरोप और नाटो देशों की कतारें चीन के स्टॉल पर क्यों नहीं दिख रहीं? जवाब वॉर जोन में छ‍िपा है।  चीन के एयर डिफेंस सिस्टम का सबसे बड़ा ग्राहक पाकिस्तान है. पाकिस्तान के पास HQ-9/P जैसे लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जिन्हें चीन अपनी तकनीकी क्षमता का प्रतीक बताता है. यही वजह है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ा और भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, तब रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल उठा कि पाकिस्तान के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम का प्रदर्शन कैसा रहा।      भारत और पाकिस्तान, दोनों ने इस अभियान के बारे में अलग-अलग दावे किए. भारत ने सबूतों के साथ कहा क‍ि उसने चाइनीज एयर ड‍िफेंस स‍िस्‍टम की धज्‍ज‍ियां उड़ा दीं. इसके बाद से चीनी एयर ड‍िफेंस सिस्‍टम को लेकर शक गहराने लगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल पूछे जाने लगे क‍ि चीनी ड‍िफेंस स‍िस्‍टम क्‍या सच में पाक‍िसतान में प‍िट गया? किसी भी हथियार के लिए वास्तविक युद्ध उसकी सबसे बड़ी परीक्षा होता है और यही परीक्षा चीन के लिए असहज सवाल छोड़ गई।  पेरिस में चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूरोसैटरी में चीन का उद्देश्य साफ था ग्लोबल साउथ के अलावा यूरोप में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाना. लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह रास्ता आसान नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम कीमत है. अमेरिका या यूरोप के मुकाबले चीन अपने एयर डिफेंस सिस्टम काफी सस्ते में बेच सकता है. यही कारण है कि पाकिस्तान, मिस्र, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों ने चीनी सिस्टम खरीदे हैं. लेकिन यूरोप का बाजार सिर्फ कीमत नहीं देखता. वहां यह भी देखा जाता है कि हथियार असली युद्ध में कितना सफल रहा है, क्या वह नाटो नेटवर्क के साथ काम कर सकता है, उसकी लॉजिस्टिक्स कैसी हैं और लंबे समय तक उसका रखरखाव कितना भरोसेमंद रहेगा।  युद्ध ने बदल दिया एयर डिफेंस का गणित यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को दिखा दिया कि अब सिर्फ लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलें भी युद्ध का चेहरा बदल रही हैं. इसी वजह से एयर डिफेंस बाजार अचानक दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता रक्षा बाजार बन गया है. अमेरिका के THAAD और Patriot, यूरोप के SAMP/T NG तथा दक्षिण कोरिया के M-SAM और L-SAM जैसे सिस्टम चर्चा में हैं।  दक्षिण कोरिया ने इस दौड़ में तेजी से जगह बनाई है. यूएई ने दावा किया कि उसके M-SAM सिस्टम ने ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के दौरान 30 में से 29 लक्ष्यों को मार गिराया. इसके बाद सऊदी अरब और इराक जैसे देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई।  चीन की असली दिक्कत सिर्फ तकनीक नहीं साउथ चाइना मार्निंग पोस्‍ट की र‍िपोर्ट के मुताबिक- रक्षा विशेषज्ञ बेन्स नेमेथ का कहना है कि कोई भी देश सिर्फ तकनीकी स्पेसिफिकेशन देखकर हथियार नहीं खरीदता. ग्राहक यह भी देखते हैं कि हथियार कितने युद्धों में इस्तेमाल हुआ, उसका रिकॉर्ड कैसा है, ट्रेनिंग और सपोर्ट कैसा मिलेगा और भविष्य में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता कैसी रहेगी।  यही वजह है कि अमेरिकी और इजरायली सिस्टमों के पास वर्षों का युद्ध अनुभव है. यूरोपीय सिस्टमों के पास नाटो का भरोसा है. दक्षिण कोरिया तेजी से विश्वसनीय विकल्प बन रहा है. चीन के पास कीमत का फायदा जरूर है, लेकिन युद्ध में सिद्ध प्रदर्शन और रणनीतिक भरोसे के मामले में उसे अभी लंबा रास्ता तय करना है।  ईरान ने भी बढ़ाए सवाल विश्लेषकों ने ईरान का उदाहरण भी दिया है. ईरान की एयर ड‍िफेंस में रूसी और कुछ चीनी मूल के उपकरण शामिल हैं. हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों के दौरान ये स‍िस्‍टम ध्‍वस्‍त हो गए. हालांकि किसी एक सिस्टम पर सवाल उठाना ठीक नहीं, लेकिन माना गया क‍ि चीन के हथ‍ियार कामयाब नहीं हुए. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह दूसरा मौका था, जब चीन के हथ‍ियारों पर सवाल उठे।  यूरोप को पसंद क्‍यों नहीं पेरिस एयर शो और यूरोसैटरी से सबसे बड़ा संदेश यही निकला कि यूरोप अभी भी चीन के बजाय अमेरिका, यूरोप और दक्षिण कोरिया की ओर ज्यादा भरोसा जता रहा है.रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में एयर डिफेंस का बाजार और बड़ा होगा. लेकिन जीत उसी की होगी जो सिर्फ मिसाइल नहीं, बल्कि रडार, सेंसर, कमांड एंड कंट्रोल और एंटी-ड्रोन तकनीक को एकीकृत समाधान के रूप में पेश करेगा।  चीन के लिए चुनौती अब सिर्फ हथियार बनाना नहीं है, बल्कि दुनिया को यह भरोसा दिलाना है कि उसके सिस्टम वास्तविक युद्ध में भी उतने ही प्रभावी हैं जितने वे रक्षा प्रदर्शनियों में दिखाई देते हैं. पाकिस्तान के अनुभव और यूरोप की हिचकिचाहट ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया है. इसलिए पेरिस में भले चीन ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम की पूरी दुकान सजा दी हो, लेकिन सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद ग्राहकों का विश्वास जीतना उसके लिए अभी भी सबसे कठिन लड़ाई बना हुआ है।   

ऊर्जा सुरक्षा पर चीन की बड़ी चाल, ‘समुद्री दैत्य’ से होर्मुज पर निर्भरता घटाने की तैयारी

बीजिंग  होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया भर में तेल-गैस की किल्लत को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की जंग ने दुनिया के कई देशों को आर्थिक मंदी के मुहाने पर ला खड़ा किया है. डर यह जताया जा रहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री ट्रेड रूट में शामिल होर्मुज अगर जल्द नहीं खुला तो पेट्रोल,एलपीजी और एनएलजी की किल्लत और गहरा सकती है. इन्हीं चिंताओं के बीच चीन ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा दांव खेला है. चीन की प्रमुख शिपबिल्डिंग कंपनी ने समुद्र में दैत्याकार जहाज उतारने की तैयारी शुरू कर दी है. दुनिया के इस सबसे बड़े जहाज से एक ही बार में 2.71 लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस यानी एनएलजी लाई जा सकेगी. यह जहाज न केवल शिपबिल्डिंग उद्योग में नया रिकॉर्ड बनाएगा, बल्कि वैश्विक गैस सप्लाई चेन को भी नई मजबूती देगा।  क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट? हाल के महीनों में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने दुनिया को यह एहसास कराया कि तेल-गैस की सप्लाई कितनी संवेदनशील है. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा और LNG की महत्वपूर्ण खेपें इसी रास्ते से गुजरती हैं. ऐसे में होर्मुज की नाकेबंदी से एशिया और यूरोप के कई देशों में गैस की कमी पैदा हो गई है।  यही वजह है कि LNG परिवहन क्षमता बढ़ाने को अब ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है. चीन का नया जहाज इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो एक बार में पहले की तुलना में कहीं ज्यादा LNG ढो सकेगा।  कितना विशाल है यह जहाज? नया LNG कैरियर 344 मीटर लंबा होगा और इसकी क्षमता 2,71,000 क्यूबिक मीटर LNG होगी. तुलना करें तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक LNG जहाजों की क्षमता करीब 1,70,000 से 1,80,000 क्यूबिक मीटर होती है. एक आधुनिक गैस कैरियर औसतन करीब 174,000 क्यूबिक मीटर LNG लेकर चलता है।  इस लिहाज से चीन का नया जहाज मौजूदा मानक जहाजों की तुलना में लगभग 57 प्रतिशत अधिक LNG ढो सकेगा. इसका मतलब है कि एक ही यात्रा में अधिक गैस पहुंचाई जा सकेगी, जिससे परिवहन लागत कम होगी और सप्लाई चेन अधिक प्रभावी बनेगी।  एलएलजी जहाज क्यों कहलाते हैं ‘क्राउन ज्वेल’? LNG कैरियर बनाना आज भी बेहद जटिल है. प्राकृतिक गैस को -162 डिग्री सेल्सियस पर तरल रूप में सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. इसके लिए विशेष टैंक, उन्नत इंसुलेशन सिस्टम और अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीकों की जरूरत होती है. यही वजह है कि इसे शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री का ‘क्राउन ज्वेल’ यानी सबसे प्रतिष्ठित जहाज माना जाता है।  ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के इस नए जहाज में NO96 Super+ मेम्ब्रेन कंटेनमेंट सिस्टम लगाया जाएगा, जो गैस को सुरक्षित रखने के साथ-साथ रिसाव और ऊर्जा हानि को भी कम करेगा।  पर्यावरण के लिहाज से भी खास जहाज में डुअल-फ्यूल इंजन सिस्टम होगा, जिससे यह पारंपरिक ईंधन और एलएनजी दोनों पर चल सकेगा. कंपनी का दावा है कि इससे ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों कम होंगे. यह जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के Tier-III पर्यावरण मानकों का भी पालन करेगा।  ऐसे समय में जब दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, LNG को कोयले और तेल की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है. इसलिए LNG परिवहन क्षमता बढ़ना एनर्जी ट्रांजिशन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।  समुद्र में चीन की बढ़ती ताकत एक समय एलएनजी जहाज निर्माण पर दक्षिण कोरिया और कुछ पश्चिमी कंपनियों का लगभग एकाधिकार था. लेकिन अब चीन तेजी से इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक एनएलजी शिपबिल्डिंग बाजार में चीन की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।  चीन अखबार के मुताबिक, हुडोंग-झोंगहुआ शिपबिल्डिंग कंपनी के पास फिलहाल लगभग 60 LNG जहाजों के ऑर्डर हैं और उसके शिपयार्ड 2030 तक पूरी तरह बुक बताए जा रहे हैं. इससे साफ है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार में चीन अपनी भूमिका और मजबूत करना चाहता है।  होर्मुज संकट और एनएलजी का भविष्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है तो LNG परिवहन क्षमता दुनिया के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी. यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक बड़े और अधिक कुशल एलएनजी जहाजों की जरूरत होगी।  ऐसे में चीन का यह मेगा एलएनजी कैरियर सिर्फ एक जहाज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक ऊर्जा राजनीति और सप्लाई चेन की नई तस्वीर का प्रतीक माना जा रहा है. 2028 में इसकी पहली डिलीवरी होने के बाद यह दुनिया की एलएनजी लॉजिस्टिक्स क्षमता को एक नया आयाम दे सकता है।   

रूस-चीन की बढ़ेगी नजदीकी, पुतिन के दौरे से द्विपक्षीय वार्ता के संकेत

बीजिंग दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच कूटनीतिक गठजोड़ और मजबूत होने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीन दिवसीय चीन यात्रा खत्म होने के तुरंत बाद, अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन का आधिकारिक दौरा करने वाले हैं। क्रेमलिन और चीनी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि राष्ट्रपति पुतिन 19 और 20 मई को चीन की यात्रा पर रहेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के तुरंत बाद रूस ने ऐलान किया है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जल्द ही चीन जाएंगे. क्रेमलिन ने कहा कि यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 19-20 मई को चीन की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। क्रेमलिन द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, राष्ट्रपति पुतिन अपनी इस यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य मॉस्को और बीजिंग के बीच ‘व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को और अधिक मजबूत करना’ है। दोनों शीर्ष नेता कई ‘प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों’ पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे। बातचीत के अंत में दोनों देशों के बीच एक साझा घोषणापत्र पर भी हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके अलावा, पुतिन चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से भी मुलाकात करेंगे, जहां दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने पर गहन चर्चा होगी। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने गुरुवार को कहा कि पुतिन की चीन यात्रा अब लगभग तय है और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत की तैयारी पूरी हो चुकी है. हालांकि उन्होंने यात्रा की सटीक तारीख नहीं बताई, लेकिन संकेत दिए कि यह दौरा जल्द होने वाला है. रूस और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं. पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब तक 40 से ज्यादा बार मुलाकात कर चुके हैं. दोनों नेताओं की पिछली मुलाकात सितंबर 2025 में बीजिंग में हुई थी. अब पुतिन की प्रस्तावित चीन यात्रा पर दुनिया की नजरें टिक गई हैं. माना जा रहा है कि इस मुलाकात में यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन संबंध, ऊर्जा व्यापार और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर बड़ी रणनीति बन सकती है. दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के हालिया चीन दौरे के दौरान भी शी जिनपिंग ने पुतिन का जिक्र किया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के खत्म होते ही रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां फिर चर्चा में आ गई हैं. रूस ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुत जल्द चीन का दौरा करेंगे और इस यात्रा की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

चीन को ट्रंप का कड़ा संदेश! मिले उपहार कूड़ेदान में फिंकवाए, दुनिया भर में चर्चा तेज

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आई एक रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति और साइबर सुरक्षा जगत में हलचल मचा दी है।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप और उनके प्रतिनिधिमंडल ने चीन में मिले कई गिफ्ट्स, बैज और स्मृति चिह्नों को अमेरिका वापस ले जाने के बजाय फेंक दिया।  क्यों फेंके गए गिफ्ट्स? अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को आशंका थी कि इन छोटे उपहारों में जासूसी डिवाइस, माइक्रोफोन या साइबर बग छिपे हो सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों को पहले से सख्त निर्देश दिए गए थे कि चीन यात्रा के दौरान मिला कोई भी सामान Air Force One पर नहीं ले जाया जाएगा। इसी वजह से वापसी के समय कई वस्तुओं को नष्ट कर दिया गया या डस्टबिन में फेंक दिया गया। दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से साइबर जासूसी को लेकर तनाव बना हुआ है।अमेरिकी खुफिया एजेंसियां पहले भी आरोप लगा चुकी हैं कि चीन आधुनिक तकनीक के जरिए विदेशी सरकारों, अधिकारियों और संस्थानों की निगरानी करता है। फोन भी फेंकने या पूरी तरह नष्ट करने के निर्देश विशेषज्ञों का मानना है कि छोटी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या स्मृति चिह्नों में बेहद सूक्ष्म जासूसी उपकरण छिपाए जा सकते हैं, जो बातचीत रिकॉर्ड करने या डेटा चोरी करने में सक्षम होते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने इस यात्रा के दौरान अपने निजी मोबाइल फोन और लैपटॉप भी साथ नहीं रखे। इसके बजाय उन्होंने “बर्नर फोन” का इस्तेमाल किया। ये अस्थायी फोन होते हैं जिन्हें सीमित समय तक उपयोग करने के बाद नष्ट कर दिया जाता है। अमेरिका लौटने से पहले इन फोन को भी फेंकने या पूरी तरह नष्ट करने के निर्देश दिए गए थे। बंद डिवाइस भी हो सकते हैक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जासूसी तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि बंद पड़े डिवाइस भी निशाना बनाए जा सकते हैं। इसी वजह से अमेरिकी टीम ने अतिरिक्त सतर्कता बरती और किसी भी संदिग्ध वस्तु को साथ ले जाने से बचा। ट्रंप का बयान भी चर्चा में जब पत्रकारों ने ट्रंप से चीन की कथित जासूसी गतिविधियों पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कहा, “वे हम पर जासूसी करते हैं और हम भी उन पर नजर रखते हैं।” ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने Xi Jinping से साफ कहा था कि अमेरिका भी चीन के खिलाफ साइबर ऑपरेशन चलाता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, डेटा सुरक्षा और साइबर हमलों के आरोपों के कारण तनाव लगातार बढ़ा है। Huawei जैसी चीनी कंपनियों पर अमेरिका पहले भी सुरक्षा और जासूसी से जुड़े आरोप लगा चुका है, जबकि चीन इन आरोपों से इनकार करता रहा है।