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मीर यार बलूच ने जयशंकर को चेतावनी दी, ‘बलूचिस्तान में चीन की सेना की घुसपैठ हो सकती है’

नई दिल्ली बलूचिस्तान के एक नेता ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर को एक खुला पत्र लिखा है. इस चिट्ठी में बलूच नेता ने चेतावनी देते हुए कहा कि चीन आने वाले महीनों में बलूचिस्तान में सैन्य बल तैनात कर सकता है, जिससे न केवल इस क्षेत्र में बल्कि भारत के लिए भी एक गंभीर खतरा पैदा होगा.  मीर यार बलूच ने जयशंकर को संबोधित करते हुए एक जनवरी 2026 को लिखे इस पत्र में खुद को बलूचिस्तान का प्रतिनिधि बताते हुए आगाह किया कि अगर बलूचिस्तान की रक्षा और स्वतंत्रता सेनाओं को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा, तो चीन वहां अपने सैनिक तैनात कर सकता है. उन्होंने ऐसे किसी भी कदम को भारत और बलूचिस्तान दोनों के भविष्य के लिए खतरा बताया. पत्र में कहा गया कि अगर बलूचिस्तान की रक्षा और स्वतंत्रता सेनाओं की क्षमताओं को और मजबूत नहीं किया गया और उन्हें पुराने तौर-तरीकों के अनुसार अनदेखा किया जाता रहा, तो यह पूरी तरह संभव है कि चीन आने वाले कुछ महीनों में बलूचिस्तान में अपनी सैन्य टुकड़ियां तैनात कर दे. उन्होंने कहा कि छह करोड़ बलूच लोगों की इच्छा के बिना बलूचिस्तान की धरती पर चीनी सैनिकों की मौजूदगी भारत और बलूचिस्तान—दोनों के भविष्य के लिए एक अकल्पनीय खतरा और चुनौती होगी. उन्होंने  चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि पाकिस्तान और चीन के बीच रणनीतिक गठजोड़ अब CPEC के उस चरण में पहुंच चुका है, जिसे उन्होंने इसका अंतिम चरण बताया. उनके अनुसार, इससे हालात और अधिक खतरनाक हो गए हैं. उन्होंने भारत और बलूचिस्तान के बीच ठोस और पारस्परिक सहयोग की मांग करते हुए कहा कि दोनों को जिन खतरों का सामना करना पड़ रहा है, वे वास्तविक और तत्काल हैं. मीर यार बलूच ने भारत और बलूचिस्तान के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का भी जिक्र किया. उन्होंने हिंगलाज माता मंदिर जैसे पवित्र स्थलों का हवाला देते हुए इन्हें साझा विरासत का प्रतीक बताया. इस चिट्ठी में उन्होंने मोदी सरकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई कार्रवाइयों की सराहना भी की. उन्होंने कहा कि इस अभियान में किस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के ठिकानों को निशाना बनाया गया और यह पहलगाम आतंकी हमले के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और न्याय के प्रति असाधारण साहस और दृढ़ प्रतिबद्धता का उदाहरण है. आखिरी में मीर यार बलूच ने हमारे दो महान राष्ट्रों के बीच और अधिक मजबूत सहयोग की उम्मीद जताई.

ताइवान सीमा पर तनाव, ड्रैगन ने रॉकेटों से किया सैन्य प्रदर्शन

बीजिंग  ताइवान के समुद्री किनारों पर चीन की सेनाओं की कारगुजारियां युद्ध जैसी ही हैं. चीन की आर्मी ताइवान को चारों ओर से घेर रही है. लंबी दूरी के लाइव रॉकेट फायर कर रही है और जंगी जहाजों को तैनाती असली जंग को ध्यान में रखकर की गई है.  चीन ने ताइवान के आस-पास दो दिन की मिलिट्री ड्रिल में 10 घंटे की लाइव फायरिंग ड्रिल की है. इस दौरान चीनी सेना ने ताइवान को घेरने और उसके मुख्य बंदरगाहों को ब्लॉक करने का अभ्यास किया. इन अभ्यासों में ताइवान और उसके मुख्य बंदरगाहों, कीलुंग और काओशुंग की नाकेबंदी का भी अभ्यास किया गया. चीन की सेना ने शक्ति प्रदर्शन के साथ-साथ ताइवान के खिलाफ इन्फॉर्मेशन वॉर भी तेज कर दिया है. एक विदेशी चीनी मिलिट्री कमेंटेटर ने कहा कि इस कैंपेन का मकसद विदेशी लोगों को यह यकीन दिलाना है कि ताइवान की सेना और उपकरण PLA के हमले का सामना नहीं कर पाएंगे.  उकसावे की इतनी कार्रवाई के बाद भी चीन ताइवान को माहौल बिगाड़ने का दोषी ठहरा रहा है.  चीन के विदेश मंत्री  वांग यी ने कहा कि, "ताइवान का मुद्दा चीन का अंदरूनी मामला है और यह चीन के मुख्य हितों का केंद्र है. ताइवान की आजादी की ताकतों की लगातार उकसावे वाली हरकतों और अमेरिका द्वारा ताइवान को बड़े पैमाने पर हथियार बेचने के जवाब में, हम निश्चित रूप से उनका कड़ा विरोध करेंगे और जवाबी कार्रवाई करेंगे." चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि, 'कानून के अनुसार ताइवान का पूरी तरह से एकीकरण हासिल करना और हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना हमारा ऐतिहासिक मिशन है जिसे हमें पूरा करना ही है.' सोमवार को PLA के ईस्टर्न थिएटर कमांड ने ताइवान के आस-पास के पानी और एयरस्पेस में नौसेना के जहाजों और विमानों के साथ मिलकर जॉइंट ड्रिल की. इन अभ्यासों में समुद्र और जमीन पर मौजूद टारगेट पर नकली हमले, एयर-कंट्रोल ऑपरेशन और एंटी-सबमरीन मिशन पर फोकस किया गया. इन ड्रिल्स का मकसद चीन की वायु सेना और नौसेना के बीच बेहतर तालमेल दिखाना था. मंगलवार को ताइवान के आस-पास के पानी में लंबी दूरी के लाइव-फायर अभ्यासों के साथ ये और तेज हो गए. बता दें कि चीन की ओर से उकसावे वाली ये हरकतें वाशिंगटन द्वारा 18 दिसंबर को ताइवान को नए हथियारों की बिक्री की घोषणा के बाद शुरू हुईं है. अमेरिका ने ताइवान को 11 बिलियन डॉलर की हथियारों की बिक्री की घोषणा की है. ये डील ताइवान के लिए सबसे बड़ी डील है.  इस डील में रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम, लंबी दूरी की मिसाइलें, सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर, मानवरहित निगरानी प्लेटफॉर्म और संबंधित मिलिट्री सॉफ्टवेयर शामिल हैं. ताइवान के कोस्टगार्ड ने बताया कि मुख्य द्वीप के आसपास दो ड्रिल ज़ोन में सात रॉकेट दागे गए.  अलजजीरा ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि उसने सोमवार सुबह 6 बजे से मंगलवार सुबह 6 बजे के बीच चीनी विमानों की 130 हवाई उड़ान, 14 नौसैनिक जहाजों और आठ "आधिकारिक जहाजों" को ट्रैक किया है.  इन 24 घंटों के दौरान, 90 हवाई उड़ानें ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन ज़ोन (ADIZ) में घुस गईं, जो ताइपे द्वारा मॉनिटर किया जाने वाला जमीन और समुद्र का एक इलाका है. ताइवान ने कहा कि यह 2022 के बाद इस तरह की दूसरी सबसे बड़ी घुसपैठ है. चीन के ड्रिल को देखते हुए ताइवान ने मंगलवार को 80 से ज़्यादा घरेलू उड़ानें रद्द कर दीं और चेतावनी दी कि लाइव-फायर ड्रिल के दौरान फ्लाइट रूट बदलने की वजह से 300 से ज़्यादा इंटरनेशनल फ्लाइट्स में देरी हो सकती है.  ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि कोस्टगार्ड ने बाहरी द्वीपों के पास अभ्यासों पर नजर रखी और यह भी बताया कि नौसेना के कुछ जहाज भी पास में तैनात किए गए थे, जिनकी संख्या नहीं बताई गई है. ताइपे ने अपने ADIZ में होने वाली सभी घुसपैठ पर भी नज़र रखी, जिसमें ताइवान जलडमरूमध्य, तटीय चीन के कुछ हिस्से और ताइवान के आसपास का पानी शामिल है.  

न की सेनाओं ने ताइवान को घेरा, सर्द मौसम में फ्लाइट्स रद्द, ताइवान एयर अथॉरिटीज ने जताई चिंता

 ताइपे भारत और चीन समेत दुनिया के कई देश इन दिनों भीषण सर्दी के दौर से गुजर रहे हैं। इस सर्द मौसम में भी चीन ने तापमान बढ़ा दिया है और एक युद्ध की आशंका से दुनिया को भर दिया है। चीन ने अपनी तीनों सेनाओं थल, जल और वायु को ताइवान के सीमांत इलाकों के पास बड़े पैमाने पर तैनात किया है। इसके अलावा ताइवान के एकदम बॉर्डर पर युद्धाभ्यास किए जा रहे हैं। इसमें वायुसेना भी शामिल है और इसके चलते आसपास के आसमान से विमानों के गुजरने से भी परहेज किया जा रहा है। ताइवान की एयर अथॉरिटीज का कहना है कि चीनी हरकतों के चलते बड़ी संख्या में फ्लाइट्स को रद्द करना पड़ रहा है। इस वजह से दुनिया भर के करीब एक लाख यात्रियों पर असर पड़ेगा। पिछले दिनों अमेरिका की ओर से ताइवान को 11 अरब डॉलर तक के हथियार देने के लिए मंजूरी दी गई थी। इससे चीन भड़का हुआ है और वह ताइवान को वन चाइना प्लान के तहत अपना हिस्सा मानता है। ऐसी स्थिति में उसने अमेरिका के फैसले पर ऐतराज जताया है। यही नहीं पिछले दिनों जापान के प्रधानमंत्री सानाये ताकाची ने कहा था कि यदि चीन ने ताइवान पर कब्जा करने का प्रयास किया तो हमारी सेना भी जंग में शामिल होगी। जापान के इस बयान से चीन और बौखला गया है। यही नहीं चीनी नेतृत्व ने कहा है कि यह सही समय है, जब ताइवान को हमारे शासन के अंतर्गत आ जाना चाहिए। सोमवार को जारी बयान में चीन ने अमेरिका या फिर जापान का उल्लेख नहीं किया है। लेकिन उसके विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा कि अमेरिका की मदद से ताइवान आजादी चाहता है। वहीं ताइवान का कहना है कि हम किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं और अपने सुरक्षा बलों को अलर्ट कर दिया है। ताइवान बोला- शांति को खत्म करने वाला देश है चीन ताइवान ने कहा कि चीन दुनिया में शांति को खत्म करने वाला देश है। हमने अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है ताकि किसी भी तरह के खतरे से निपटा जा सके। फिलहाल चीनी सेनाओं ने ताइवान को चारों तरफ से घेरकर डेरा डाल रखा है। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के प्रवक्ता ने कहा कि हमारा सैन्य अभ्यास ताइवान की खाड़ी में हो रहा है। इसके अलावा उत्तर, दक्षिण पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा में भी चल रहा है।

चीन ने बनाई दुनिया की सबसे लंबी टनल, 4 घंटे की यात्रा अब सिर्फ 20 मिनट में पूरी होगी

बीजिंग  चीन ने इंजीनियरिंग और तकनीक के क्षेत्र में एक बार फिर वैश्विक कीर्तिमान स्थापित करते हुए दुनिया की सबसे लंबी एक्सप्रेस-वे टनल का निर्माण पूरा कर लिया है। शिनजियांग प्रांत में स्थित इस 'तियानशान शेंगली टनल' की कुल लंबाई 22.13 किलोमीटर है। इस सुरंग के शुरू होने से दुर्गम पर्वतीय रास्तों पर होने वाला 4 घंटे का सफर अब मात्र 20 मिनट में पूरा हो सकेगा। समय और दूरी में भारी कटौती यह विशाल टनल 324 किलोमीटर लंबे उरुमकी-युली एक्सप्रेस-वे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पूरे प्रोजेक्ट के तैयार होने से उरुमकी और कोरला के बीच लगने वाला समय भी 7 घंटे से घटकर केवल 3 घंटे रह गया है। करीब 60 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार यह प्रोजेक्ट चीन की ढांचागत शक्ति का प्रमाण है। अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा इस निर्माण के साथ चीन ने अपना ही पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इससे पहले दुनिया की सबसे लंबी एक्सप्रेस-वे टनल का खिताब चीन की ही 18.04 किलोमीटर लंबी सुरंग के नाम था। वर्ष 2020 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अपनी चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों के कारण चर्चा में रहा, लेकिन पाँच साल के कड़े परिश्रम के बाद अब यह यातायात के लिए तैयार है।  

देखने में महिला जैसी, काम में चमत्कारी, चीन का नया फीमेल रोबोट

चीन की रोबोटिक्स कंपनी नोएटिक्स ने एक नया ह्यूमनॉइड रोबोट पेश किया है, जिसका नाम Hobbs W1 है। यह रोबोट खास तौर पर सर्विस के कामों के लिए बनाया गया है। इसका चेहरा असली इंसान जैसा दिखता है और यह महिला जैसी शक्ल वाला है। यही कारण है कि इसे फीमेल रोबोट कहा जा रहा है। कंपनी का कहना है कि यह रोबोट असली दुनिया में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह लोगों से बात कर सकता है, इमोशन समझ सकता है और आसानी से घूम-फिर सकता है। Hobbs W1 को रिसेप्शनिस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां यह मेहमानों का स्वागत करेगा और उन्हें रास्ता दिखाएगा। असली जैसी स्किन लगी है इंटरेस्टिंग इंजीनियरिंग की रिपोर्ट (Ref.) कहती है, Hobbs W1 के हाथों में छह डिग्री ऑफ फ्रीडम है, यानी यह हाथ बहुत फ्लेक्सिबल हैं और हर तरफ घूम सकते हैं। इसके बाजू में पांच डिग्री ऑफ फ्रीडम है। इससे यह रोबोट इशारे कर सकता है, चीजें पकड़कर दे सकता है और छोटे-मोटे काम कर सकता है। ज्यादातर सोशल रोबोट सिर्फ बात करते हैं, लेकिन यह रोबोट काम भी कर सकता है। इसका चेहरा बायोनिक तरीके से बनाया गया है, जिसमें असली जैसी स्किन लगाई गई है। एक बड़ा स्क्रीन भी है जो जो इसके इमोशन दिखाती है। यह रोबोट होटल, दुकान, स्कूल या ऑफिस में अच्छा काम कर सकता है। क्या-क्या कर लेगा यह रोबोट? यह रोबोट पूरी तरह खुद चल सकता है। यह कमरों का नक्शा बना सकता है और मुश्किल जगहों में आसानी से घूम सकता है। बिना किसी की मदद के यह रिसेप्शन का काम संभाल सकता है, लोगों को गाइड कर सकता है और रोज के कामों में मदद दे सकता है। यह लोगों के साथ चलते हुए बात कर सकता है। कंपनी का कहना है कि यह रोबोट इंसानों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी मदद करेगा। बार-बार आने वाले काम यह लगातार कर सकता है, जिससे इंसान बड़े कामों पर ध्यान दे सकें। यह रोबोट कई तरह की जगहों पर अच्छे से फिट हो जाता है। कंपनी का दूसरा रोबोट 'बूमी' नोएटिक्स कंपनी ने अक्टूबर में एक और रोबोट लॉन्च किया था, जिसका नाम बूमी है। यह बच्चे के आकार का है और इसकी कीमतकाफी कम बताई जा रही है।पहले ह्यूमनॉइड रोबोट लाखों रुपये के होते थे, लेकिन बूमी ने कीमत को बहुत कम कर दिया। कंपनी को हाल में करीब 41 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली थी, जिसकी मदद से यह संभव हुआ। कंपनी ने बूमी के कई पार्ट्स खुद ही बनाए, जैसे कंट्रोल बोर्ड और मोटर ड्राइवर। इससे बाहर से महंगे पार्ट्स खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। दूसरा, रोबोट को हल्का बनाया। इसका वजन सिर्फ 12 किलो है, क्योंकि इसमें कंपोजिट सामग्री का इस्तेमाल किया और सिर्फ जरूरी जगहों पर मेटल लगाई। तीसरा, सारे पार्ट्स चीन से ही लिए, जिससे खर्च कम हुआ। नोएटिक्स अब ह्यूमनॉइड रोबोट को हर घर में पहुंचाना चाहती है।

ग्लोबल एनर्जी गेम बदलने की तैयारी: चीन ने खारे पानी से बनाया पेट्रोल, लागत सुनकर उड़ जाएंगे होश

बीजिंग  चीन ने ऊर्जा और जल संकट की दो वैश्विक समस्याओं का एक साथ समाधान पेश कर दुनिया को चौंका दिया है। शानडोंग प्रांत के रिजाओ शहर में स्थापित एक अत्याधुनिक फैक्ट्री समुद्र के खारे पानी को ग्रीन हाइड्रोजन (भविष्य का पेट्रोल) और पीने योग्य अल्ट्रा-प्योर पानी में बदल रही है। इस प्लांट की सबसे खास बात यह है कि यह पारंपरिक बिजली या ईंधन पर निर्भर नहीं है। फैक्ट्री को ऊर्जा मिलती है पास की स्टील और पेट्रोकेमिकल इकाइयों से निकलने वाली बेकार गर्मी (वेस्ट हीट) से, जिसे अब तक बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था। यही वजह है कि इसकी उत्पादन लागत बेहद कम हो गई है। इस तकनीक को विशेषज्ञ “वन इनपुट, थ्री आउटपुट” मॉडल कह रहे हैं। इसमें इनपुट के रूप में समुद्र का खारा पानी और इंडस्ट्रियल वेस्ट हीट का इस्तेमाल होता है, जबकि आउटपुट में तीन उपयोगी चीजें मिलती हैं। पहला, हर साल लगभग 450 क्यूबिक मीटर साफ पीने योग्य पानी, जिसका इस्तेमाल घरेलू और औद्योगिक दोनों जरूरतों के लिए किया जा सकता है। दूसरा, सालाना करीब 1,92,000 क्यूबिक मीटर ग्रीन हाइड्रोजन, जो स्वच्छ ईंधन के रूप में इस्तेमाल होती है। तीसरा, करीब 350 टन खारा घोल (ब्राइन), जिसे समुद्री केमिकल्स बनाने में प्रयोग किया जाता है।   इस तरह इस फैक्ट्री में कुछ भी बेकार नहीं जाता। हर उत्पाद का दोबारा उपयोग होता है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता। लागत की बात करें तो समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने में सिर्फ 2 युआन यानी लगभग 24 रुपये प्रति क्यूबिक मीटर खर्च आ रहा है। यही कारण है कि इस तकनीक को अमेरिका और सऊदी अरब जैसी उन्नत तकनीकों से भी आगे माना जा रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन इतना है कि उससे 100 बसें लगभग 3,800 किलोमीटर तक चल सकती हैं। समुद्र से घिरे देशों के लिए यह तकनीक भविष्य में पानी की कमी और स्वच्छ ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान बन सकती है।    

चीन की आक्रामक गश्त: ताइवान के नजदीक दिखे सैन्य विमान और नौसैनिक जहाज

 ताइपे ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय (एमएनडी) ने रविवार को बताया कि उसके क्षेत्र के आस-पास चीनी सेना (पीएलए) के दो विमान उड़ान भरते हुए और सात नौसैनिक (पीएलएएन) जहाज गतिविधि करते हुए दिखाई दिए। इसी समय एक चीनी गुब्बारा भी देखा गया। मंत्रालय ने एक्स पर जानकारी साझा करते हुए कहा, आज सुबह छह बजे (स्थानीय समयानुसार) तक ताइवान के आसपास पीएलए के दो विमानों और पीएलएएन के सात जहाजों की गतिविधि दर्ज की गई। इसी समय एक चीनी गुब्बारा भी पाया गया। ताइवान के रक्ष बलों ने स्थिति की निगरानी और प्रतिक्रिया दी। शनिवार को ताइवान के आसपास चीनी सैन्य गतिविधियां बढ़ गईं। उस दिन चीन के 29 लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी और छह नौसैनिक जहाजों की गतिविधि देखी गई। इस बीच, जो बाइडन प्रशासन के पूर्व रक्षा अधिकारी एलि रैटनर ने जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के बयान को समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि ताइवान की रक्षा में जापान के शामिल होने की संभावना पर चीन की प्रतिक्रिया अनुचित है। ताइपे टाइम्स के मुताबिक, एलि रैटनर 2021 से इस वर्ष तक हिंद-प्रशांत सुरक्षा मामलों के लिए सहायक रक्षा सचिव थे। उन्होंने कहा कि ताइवान पर टिप्पणी कर ताकाइची ने केवल जापान की आधिकारिक नीति दोहराई है। सात नवंबर को जापानी प्रधानमंत्री ने संसद में कहा था कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो इसे 'जापान के अस्तित्व के लिए खतरा' माना जा सकता है और जापान को कदम उठाना पड़ सकता है। ताकाइची दशकों में पहली जापानी नेता हैं, जिन्होंने खुलकर कहा कि ताइवान जलडमरूमध्य में संकट के समय जापान की सेना शामिल हो सकती है। उनके बयान से चीन नाराज हुआ और उसने जापान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए कई कदम उठाए, जिनमें जापान की यात्रा और शिक्षा पर चेतावनी और जापानी समुद्री भोजन के आयात को रोकना शामिल है।

200 देशों को कर्ज देने वाला चीन, अमेरिका को सबसे अधिक कर्ज, ट्रंप की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

बीजिंग  दुनिया के नक्शे पर आज चीन केवल एक प्रोडक्शन सेंटर या आर्थिक शक्ति नहीं रह गया है, बल्कि अब वह दूसरे मुल्कों को कर्ज और वित्तीय सहायता देकर दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला बड़ा खिलाड़ी बन चुका है. अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान जैसे देशों से लेकर छोटे और गरीब देशों तक, लगभग हर कोने में चीन का पैसा पहुंच चुका है. हैरानी की बात यह है कि जिन देशों को चीन उधार दे रहा है, उनमें सबसे ऊपर नाम अमेरिका का है. बढ़ते तनाव, टकराव और प्रतिस्पर्धा के बावजूद ‘अंकल सैम’ ही चीन से सबसे बड़ा उधार लेने वाला देश है, यह फैक्ट दुनिया को चौंका देने के लिए काफी है. डैन वोंग नामक एक लेखक ने अपनी किताब ब्रेकनेक (Breakneck) में लिखा है कि चीन की इंजीनियरिंग क्षमता, निर्माण की गति और शहरी बदलाव सिर्फ विकास की कहानी नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं. उनका सवाल सीधा है- “क्या चीन इतना आगे निकल चुका है कि अब अमेरिका ही पीछे छूटने से डर रहा है?” इसी बीच AidData रिसर्च लैब की रिपोर्ट ने इस बहस को और तीखा कर दिया है. रिपोर्ट बताती है कि साल 2000 से 2023 तक चीन ने दुनियाभर में कर्ज और अनुदान के रूप में 2.2 ट्रिलियन डॉलर बांटे हैं, और करीब 200 देशों व क्षेत्रों को इससे फायदा या कर्ज का बोझ मिला है. दुनिया का सबसे बड़ा आधिकारिक कर्जदाता चीन ने यह पैसा केवल आर्थिक रूप से कमजोर देशों को नहीं दिया. सिर्फ 6 फीसदी रकम की सहायता ग्रांट या सस्ते कर्ज के रूप में दी है. 47 फीसदी गरीब देशों ने और 43 फीसदी अमीर व विकसित देशों ने चीन से कर्ज लिया. यानी जितने विकासशील देश चीन पर निर्भर होते जा रहे हैं, उतने ही डेवलप हो चुके और अमीर देश भी चीन पर वित्तीय रूप से निर्भर हो गए हैं. AidData के अनुसार, चीन अब दुनिया का सबसे बड़ा आधिकारिक कर्जदाता (official creditor) बन चुका है. सिर्फ इतना ही नहीं, चीन की राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियां और बैंक पूरी दुनिया में बुनियादी ढांचा, खनिज संसाधन, एयरपोर्ट, पाइपलाइन, डेटा सेंटर और हाई-टेक कंपनियों में निवेश कर रहे हैं. रिपोर्ट कहती है कि चीन की रकम 2,500 अमेरिकी परियोजनाओं में लगी है, जिनमें टेस्ला (Tesla), अमेज़न (Amazon), डिज्नी (Disney) और बोइंग (Boeing) जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में खूब लगाया पैसा दुनिया अक्सर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की चर्चा करती है, लेकिन आंकड़ों के अनुसार BRI चीन की कुल विदेशी उधारी का सिर्फ 20 फीसदी हिस्सा है. चीन का बहुत सारा पैसा अमीर देशों की टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में भी जा रहा है. यानी वह केवल सड़कें और पुल नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक पर भी अपना नियंत्रण मजबूत कर रहा है. अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया… भारत भी… सब कर्जदार 2000 में चीन का सिर्फ 11 प्रतिशत कर्ज अमीर देशों को जाता था, लेकिन 2023 तक यह बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया. यानी अमीर दुनिया गरीब देशों की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से चीन के पैसों पर निर्भर होती गई है. चीन के 10 सबसे बड़े कर्जदार देशों की सूची में सबसे ऊपर है संयुक्त राज्य अमेरिका (202 बिलियन डॉलर), उसके बाद रूस (172 बिलियन डॉलर), ऑस्ट्रेलिया (130 बिलियन), वेनेज़ुएला (106 बिलियन) जैसे देश आते हैं. भारत भी इससे बाहर नहीं है. भारत ने चीन से 11.1 बिलियन डॉलर कर्ज और अनुदान के रूप में प्राप्त किए हैं. इन सभी आंकड़ों से एक बात साफ उभरती है कि चीन का खेल केवल डेवलपमेंट हेतु मदद का नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक प्रभाव का है. कर्ज और निवेश के माध्यम से चीन न केवल देशों में बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, बल्कि वैश्विक राजनीतिक समीकरणों को भी अपने हित में मोड़ रहा है. और यही वजह है कि भविष्य की दुनिया की राजनीति, तकनीक और व्यापार में चीन की भूमिका पहले से कहीं अधिक निर्णायक होती जा रही है.

भारतीय रक्षा शक्ति में बड़ा इजाफा: 1000 किलो बम का सफल निर्माण, दुश्मन देशों में हड़कंप

नई दिल्ली सैन्य रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भारत ने 1000 किलो का बम बनाया है। भारत ने न सिर्फ ये बम बनाया है बल्कि इसका सफल परीक्षण भी कर लिया है। इस स्वदेशी बम को ‘गौरव’ नाम दिया गया है, जो लक्ष्य को दूर से ही सटीकता के साथ नष्ट करने में सक्षम है। DRDO ने Su-30MKI फाइटर जेट से ‘गौरव’ लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम का सफल परीक्षण किया है। 1000 किलो वजनी यह देसी बम दुश्मन की वायु सुरक्षा सीमा के बाहर से सटीक हमला करेगा। DRDO ने इस हथियार को दो स्वरूपों में तैयार किया है। पहला वर्जन Gaurav-PCB है, जिसे मजबूत संरचनाओं और जमीनी बंकरों को भेदने के लिए तैयार किया गया है। यह पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन की स्थिति में उपयोगी साबित हो सकता है। दूसरा संस्करण Gaurav-PF है, जिसका उपयोग खुले ठिकानों, सैन्य तैनाती या रणनीतिक लक्ष्य पर एक साथ कई हिस्सों में नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ‘गौरव’ वह हथियार है, जो विमान को जोखिम में डाले बिना दुश्मन पर प्रहार कर सकता है। यह हवा से छोड़े जाने के बाद काफी दूरी तक ग्लाइड करता है और ठीक उसी स्थान पर जाकर वार करता है, जहां लक्ष्य मौजूद हो। ज्यादा दूरी से हमला करने की वजह से यह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चुनौती देता है। इसका भारी वजन और उच्च विनाश क्षमता इसे बंकर, किलेबंद ठिकानों और पहाड़ी ठिकानों पर बेहद कारगर बनाती है। Su-30MKI के साथ ‘गौरव’ का जुड़ना भारतीय वायुसेना का Su-30MKI पहले से ही कई एडवांस हथियारों से लैस है। इसके साथ Rudram मिसाइल, SAAW हथियार प्रणाली और BrahMos-A पहले से जुड़े हैं और अब ‘गौरव’ के जुड़ जाने से यह विमान लंबी दूरी से जमीन पर हमला करने में और भी सक्षम हो गया है। यह संयोजन वायु सेना को आधुनिक युद्ध के लिए ऐसी क्षमता देता है, जिसे दुनिया की बड़ी सेनाएं भी महत्व देती हैं। भारत क्यों तेजी से बना रहा है अपने इंजन और डिफेंस सिस्टम फाइटर जेट इंजन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता लंबे समय से भारत की बड़ी चुनौती रही है। यही कारण है कि तेजस Mk2 और AMCA जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमानों के प्रोजेक्ट में देरी हुई। अब सरकार और DRDO दोनों मिलकर अपने इंजन और हथियार प्रणाली को देश में ही विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। बम, मिसाइल, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तकनीक। ऐसे सभी क्षेत्रों में तेज प्रगति हो रही है ताकि आने वाले वर्षों में भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सके।

भारत-चीन के बीच हवाई सफर का नया अध्याय, कोलकाता से उड़ी पहली फ्लाइट

कोलकाता कई दौर की बैठकों और 5 साल के लंबे अंतराल के बाद भारत और चीन के बीच सीधी हवाई सेवा फिर से शुरू हो गई है। इंडिगो एयरलाइंस की एक उड़ान के साथ ही दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच व्यापार, पर्यटन और लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा देने के लिए यह सेवा दोबारा बहाल हुई है। कोलकाता से चीन के लिए पहली उड़ान इंडिगो के विमान 6E1703 ने रविवार रात 10:07 बजे कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट से चीन के ग्वांगझू  के लिए उड़ान भरी। यह फ्लाइट ग्वांगझू बैयुन अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर स्थानीय समयानुसार सुबह 4:05 बजे पहुंचेगी। एयरपोर्ट डायरेक्टर ने इस ऐतिहासिक उड़ान का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए सेवा शुरू होने की पुष्टि की।    विस्तार योजना और उद्देश्य इस सेवा को फिर से शुरू करने का मुख्य उद्देश्य व्यापार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क को आसान बनाना है जो पिछले 5 वर्षों से ठप पड़ी थी।     कोलकाता-ग्वांगझू रूट: इंडिगो इस रूट पर अब प्रतिदिन नॉन-स्टॉप उड़ानें संचालित करेगा।          आगामी रूट्स:         दिल्ली और ग्वांगझू के बीच अतिरिक्त उड़ानें 10 नवंबर से शुरू होंगी।         शंघाई-दिल्ली रूट पर उड़ानें 9 नवंबर से फिर से शुरू होंगी। इस कदम से दोनों देशों के बीच यात्रियों और माल ढुलाई की आवाजाही में बड़ी सहूलियत मिलने की उम्मीद है।