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ट्रंप का बड़ा फैसला: दवाओं और ट्रकों पर भारी टैक्स, 1 अक्टूबर से लागू

नई दिल्ली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी व्यापारिक नीतियों को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने सीधे दवा उद्योग को निशाना बनाते हुए विदेशी फार्मा कंपनियों पर बड़ा फैसला सुनाया है, जो भारत समेत कई विकासशील और विकसित देशों को प्रभावित कर सकता है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एलान किया कि 1 अक्टूबर 2025 से अमेरिका में किसी भी ब्रांडेड या पेटेंटेड दवा उत्पाद पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा – अगर वह अमेरिका में निर्मित नहीं हो रही है। यानी, कोई कंपनी यदि अमेरिका में फार्मा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित नहीं कर रही है, तो उसे इस भारी-भरकम टैक्स का सामना करना पड़ेगा। दवा कंपनियों पर सीधा असर यह फैसला उन देशों के लिए झटका है जो अमेरिका को बड़ी मात्रा में दवा उत्पाद निर्यात करते हैं। भारत, जो विश्व के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में से एक है, उसके लिए यह निर्णय न सिर्फ आर्थिक, बल्कि रणनीतिक मोर्चे पर भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई कंपनी अमेरिका में निर्माण कार्य वास्तव में शुरू कर चुकी है, तो उस पर टैरिफ लागू नहीं होगा। “IS BUILDING” का मतलब केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि निर्माण स्थल पर वास्तविक कार्य होना चाहिए। फर्नीचर और घरेलू सामान पर भी टैरिफ ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति सिर्फ दवा उद्योग तक सीमित नहीं रही। उन्होंने ऐलान किया कि: -किचन कैबिनेट्स और बाथरूम वैनिटीज पर 50% टैरिफ -अपहोल्स्टर्ड फर्नीचर (गद्देदार फर्नीचर) पर 30% टैरिफ -भारी ट्रकों और अन्य घरेलू उत्पादों पर भी उच्च टैरिफ लगाए जाएंगे। ट्रंप का कहना है कि विदेशी कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में जरूरत से ज्यादा सामान भर दिया है, जिससे स्थानीय निर्माण उद्योग पर सीधा असर पड़ा है। टैरिफ लगाना अब जरूरी हो गया है ताकि अमेरिका फिर से अपनी उत्पादन क्षमता हासिल कर सके। कई देशों पर नई टैरिफ दरें ट्रंप ने अगस्त में भी कई देशों पर टैरिफ बढ़ाए थे, जो अब लागू हो चुके हैं: भारत: 50% टैरिफ रूस: 25% अतिरिक्त जुर्माना ब्राज़ील: 50% टैरिफ दक्षिण अफ्रीका: 30% टैरिफ वियतनाम: 20% टैरिफ जापान व दक्षिण कोरिया: 15% टैरिफ अमेरिका फर्स्ट की वापसी? ट्रंप की इन घोषणाओं को उनकी पुरानी रणनीति America First का विस्तार माना जा रहा है। वे पहले भी टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं – चाहे वह चीन के साथ ट्रेड वॉर हो या यूरोपीय उत्पादों पर शुल्क। इस नई घोषणा से अमेरिका में फार्मा इंडस्ट्री को तो बढ़ावा मिलेगा, लेकिन वैश्विक व्यापार संतुलन पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

अमेरिका में जयशंकर-गोयल की वार्ता से आई अच्छी खबर, मोदी-ट्रंप बैठक करीब

नई दिल्ली अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एक बयान से भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों पर शुभ संकेत आते दिख रहे हैं. दरअसल मार्को रुबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ को फिक्स के लिए तैयार हैं. रुबियो ने कहा कि ये टैरिफ भारत के रूस से तेल खरीदने की वजह से लगाए गए थे. वहीं अमेरिका यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर नए प्रतिबंधों पर भी विचार कर रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही भारत-अमेरिका के बीच संबंधों का समीकरण बदलने लगा था. इसके बाद रूस-यूक्रेन के मुद्दे पर दोनों देशों को बीच तनाव और बढ़ा. परिस्थितियां ऐसी आ गईं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सिर्फ भारत के खिलाफ 50 फीसदी का टैरिफ लगा दिया बल्कि ऐसे बयान भी आए कि इस वक्त के सबसे बड़े युद्ध का जिम्मेदार भारत ही है. भारत और अमेरिका के रिश्ते ही नहीं व्यापार भी प्रभावित हुआ. हालांकि दोनों देशों के बीच बर्फ थोड़ी पिघलती दिख रही है. भारत-अमेरिका के बीच नरमी के संकेत मार्को रुबियो ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र के मौके पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मुलाकात की. दोनों के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई. यह बैठक उन तनावों के बाद पहली बार हुई है जो भारत पर अमेरिकी टैरिफ और रूस से भारत के ऊर्जा आयात को लेकर बढ़े थे. एस. जयशंकर से यूएनजीसी में मुलाकात के बाद रुबियो ने कहा है – ‘भारत, अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण सहयोगी है, खासतौर पर व्यापार, ऊर्जा, फार्मा और क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में.’ उन्होंने भारत के राजदूत के तौर पर नामित सर्गियो गोर से भी मुलाकात की. मिल सकते हैं पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप! जब से भारत और अमेरिका से संबंधों में तनाव आया है, तब से पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच सिर्फ सोशल मीडिया पर ही संपर्क हुआ है. जिसमें पीएम मोदी के जन्मदिन पर दी गई ट्रंप की बधाई खासी चर्चा में रही. माना जा रहा था कि यूएनजीसी की मीटिंग में दोनों के बीच मुलाकात हो सकती है लेकिन जब इसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर के जाने का ऐलान हुआ, तो ये उम्मीद भी खत्म हो गई. ऐसे में जब चीज़ें सामान्य होती दिख रही हैं, तो दोनों देशों की ओर से कोशिश की जा रही है कि पीएम मोदी और अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप के बीच जल्द ही मुलाकात हो और बातचीत आगे बढ़े. भारत पर क्या कहा मार्को रुबियो ने? भारत को लेकर रुबियो ने कहा- ‘हमने भारत के खिलाफ कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन हमें उम्मीद है कि इसे सुधारा जा सकता है. राष्ट्रपति के पास और विकल्प हैं और वे आगे और कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं.’ मार्को रुबियो का ये बयान दोनों देशों के रिश्तों के लिए एक अच्छा संकेत माना जा रहा है. विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की अमेरिका यात्रा के साथ ही ये बयान आया है, जो मौजूदा हालात में बेहद अहम है. आपको बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जिससे कुल शुल्क 50 फीसदी तक पहुँच गया है. यह दुनिया में सबसे ऊंचे टैरिफ में से एक है.

H-1B वीजा के नए नियमों के तहत भारी बढ़ोतरी, US में आवेदन पर 88 लाख रुपये तक शुल्क

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा के नियम बदल दिए हैं. अब कुछ H-1B वीजा धारक अमेरिका में गैर-इमिग्रेंट वर्कर के रूप में सीधे एंट्री नहीं ले पाएंगे. नए आवेदन के साथ 100,000 डॉलर यानी 88 लाख रुपये से ज्यादा की फीस देना जरूरी होगा. 100,000 डॉलर की नई फीस कंपनियों के लिए खर्च काफी बढ़ा सकती है. हालांकि बड़ी टेक कंपनियों के लिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं होगी क्योंकि वे टॉप प्रोफेशनल्स के लिए भारी खर्च करती रहती हैं, लेकिन इससे छोटे टेक फर्म और स्टार्टअप दबाव में आ सकते हैं. व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने कहा, "H-1B नॉन-इमिग्रेंट वीजा प्रोग्राम उन वीजा सिस्टम्स में से एक है जिसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है. इस वीजा का मकसद यही है कि ऐसे हाईली स्किल्ड लोग अमेरिका में काम कर सकें, जिनके काम अमेरिकी कर्मचारी नहीं करते. यह प्रोक्लेमेशन कंपनियों द्वारा H-1B आवेदकों को स्पॉन्सर करने की फीस को 100,000 डॉलर कर देगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि जो लोग अमेरिका आ रहे हैं, वे वास्तव में बहुत ही उच्च योग्य हैं और उन्हें अमेरिकी कर्मचारियों से बदला नहीं जा सकता." अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लूटनिक ने कहा, "अब बड़ी टेक कंपनियां या अन्य बड़ी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को ट्रेन नहीं करेंगी. उन्हें सरकार को 100,000 डॉलर देना होगा और उसके बाद कर्मचारी को भी भुगतान करना होगा. यह आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है. अगर आप किसी को ट्रेन करने जा रहे हैं, तो इसे हमारे देश की महान यूनिवर्सिटी से हाल ही में ग्रैजुएट हुए अमेरिकी छात्रों में से किसी एक को ट्रेन करें, अमेरिकियों को काम के लिए तैयार करें, और हमारे जॉब्स लेने के लिए लोगों को लाना बंद करें. यही नीति है और सभी बड़ी कंपनियां इसके साथ हैं." टेक्नोलॉजी और स्टाफिंग कंपनियां H-1B वीजा पर बहुत निर्भर हैं. अमेजन ने 2025 की पहली छमाही में 10,000 से ज्यादा H-1B वीजा हासिल किए हैं. वहीं माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों को 5,000 से ज्यादा वीजा अप्रूवल मिला है. H-1B वीजा हासिल करने वालों में 71% भारत H-1B वीजा के लगभग दो-तिहाई पद कंप्यूटिंग या आईटी क्षेत्र में हैं. लेकिन इंजीनियर, शिक्षक और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स भी इस वीजा का इस्तेमाल करते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल H-1B वीजा पाने वालों में भारत सबसे बड़ा लाभार्थी था भारतीय प्रोफेशनल्स की हिस्सेदारी 71 फीसदी रही थी, जबकि चीन दूसरे नंबर पर था और उसे केवल 11.7% वीजा मिला. H-1B वीजा के नियम बदलना ट्रंप का हाई-प्रोफाइल कदम जनवरी से सत्ता में आने के बाद, ट्रंप ने वाइड-रेंज इमिग्रेशन क्रैकडाउन शुरू किया है, जिसमें कुछ कानूनी इमिग्रेशन को सीमित करने के कदम शामिल हैं. H-1B वीजा प्रोग्राम को बदलना उनके प्रशासन का अब तक का सबसे हाई-प्रोफाइल कदम है. H-1B प्रोग्राम के तहत हर साल 65,000 वीजा दिए जाते हैं, जो विशेष क्षेत्रों में अस्थायी विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए होते हैं. इनके अलावा, एडवांस डिग्री वाले कर्मचारियों के लिए 20,000 और वीजा जारी किए जाते हैं. मौजूदा सिस्टम के मुताबिक, H-1B वीजा के लिए अप्लाई करने के लिए पहले एक छोटे शुल्क का भुगतान करके लॉटरी में शामिल होते हैं और अगर चुने जाते हैं, तो बाद में कुछ हजार डॉलर तक के शुल्क देने पड़ते हैं. इन शुल्कों का लगभग पूरा भुगतान कंपनियों को करना होता है. H-1B वीजा तीन से छह साल की अवधि के लिए स्वीकृत होते हैं. H-1B वीजा के मौजूदा नियम क्या हैं? पहले H-1B वीजा दाखिल करने की फीस 215 डॉलर से शुरू होती थी और परिस्थितियों के हिसाब से कई हजार डॉलर तक जा सकती थी. अब 100,000 डॉलर की फीस से यह कई कंपनियों और उम्मीदवारों के लिए बहुत महंगा और मुश्किल हो जाएगा. H-1B सिस्टम के कुछ विरोधी, खासकर अमेरिका की टेक कंपनी में काम करने वाले लोग, कहते हैं कि कंपनियां वीजा लेने वाले लोगों को इसलिए काम पर रखती हैं ताकि कर्मचारियों की सैलरी कम रहे. इसके कारण अमेरिका के योग्य नौकरी चाहने वाले लोग काम नहीं पा पाते. इस बात पर टेक सेक्टर और मजदूरी बाजार में लोग दो हिस्सों में बंटे हुए हैं.

ट्रंप का बदला रुख? भारत पर से हट सकता है 25% एक्स्ट्रा टैक्स का बोझ

नई दिल्ली अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ में बड़ी राहत मिल सकती है और रूसी तेल खरीद पर ट्रंप द्वारा लगाया गया एक्स्ट्रा 25% टैरिफ हटाया जा सकता है. मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने गुरुवार ये उम्मीद जताई है. उन्होंने कहा है कि अमेरिका जल्द ही भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त टैरिफ हटा सकता है और रेसिप्रोकल टैरिफ को भी घटाकर 10 से 15% किया जा सकता है. इसके साथ ही सीईए ने भारत-US ट्रेड डील के आगे बढ़ने का भी संकेत दिया है.  8-10 हफ्ते में निकल आएगा हल कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए सीईए नागेश्वरन ने कहा कि उन्हें टैरिफ मसले का अगले 8 से 10 हफ्तों के भीतर समाधान होने की उम्मीद है. उन्होंने कहा, 'मुझे पूरा भरोसा है कि अगले कुछ महीनों में कम से कम 25% के एक्स्ट्रा टैरिफ का समाधान जरूर निकल आएगा.' बिजनेस टुडे पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक, नागेश्वरन ने आगे कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में तेजी के संकेत मिल रहे हैं, जिससे करीब 50 अरब  डॉलर मूल्य के भारतीय निर्यात पर दबाव कम हो सकता है. ट्रंप ने क्यों लगाया 25% एक्स्ट्रा टैरिफ? गौरतलब है कि भारत पर पहले अमेरिकी की ओर से 25% का रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया था, लेकिन अगस्त में भारत की रूसी तेल खरीद को युक्रेन युद्ध में पुतिन की आर्थिक मदद करने का जरिया करार देते हुए जुर्माने के रूप में 25% का एक्स्ट्रा टैरिफ जुर्माने के तौर पर लगाया था. इसके बाद भारत पर कुल टैरिफ बढ़कर 50% हो गया था और इससे ये ब्राजील के साथ सबसे ज्यादा ट्रंप टैरिफ को झेलने वाले देशों में शामिल हो गया था. अपने संबोधन में नागेश्वरन ने कहा कि अमेरिका और भारत दोनों ही सरकारों के बीच सतह के नीचे तमाम मुद्दों को हल करने के लिए काफी बातचीत हो रही है. भारत-US ट्रेड डील में क्या प्रोग्रेस?   भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील एग्रीकल्चर और डेयरी प्रोडक्ट्स समेत अन्य मुद्दों को लेकर अटकी हुई थी और इस पर बातचीत भी ट्रंप के एक्स्ट्रा टैरिफ के बाद थमी हुई थी. लेकिन बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पीएम मोदी को अपना अच्छा दोस्त बताते हुए ट्रेड डील के सफल निष्कर्ष निकलने की बात कही थी.  इसके बाद इस सप्ताह की शुरुआत में अमेरिका की ओर से प्रमुख वार्ताकर ब्रेंडेन लिंच ट्रेड डील पर छठे चरण की बैठक करने के लिए नई दिल्ली आए थे और भारत के मुख्य व्यापार वार्ताकार राजेश अग्रवाल के साथ करीब 7 घंटे की लंबी चर्चा की थी.  55% सामान हाई टैरिफ के अंदर रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में अमेरिका को भारत के निर्यात का लगभग 55% हिस्सा ट्रंप के हाई टैरिफ के अंदर आ रहा है. इसकी मार से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले सेक्टर्स की बात करें, तो कपड़ा, केमिकल, मरीन फूड, जेम्स एंड ज्वेलरी के साथ ही मशीनरी शामिल हैं. ये इसलिए भी खास हैं, क्योंकि भारत की श्रम-प्रधान निर्यात अर्थव्यवस्था के प्रमुख हिस्से हैं. टैरिफ के असर को देखें, तो अगस्त महीने में अमेरिका को निर्यात घटकर 6.87 अरब डॉलर रह गया, जो 10 महीने का सबसे निचला स्तर है.

भारत-अमेरिका ट्रेड वार: क्या ट्रंप नवंबर में 25% टैरिफ कम करेंगे?

रूस  रूस से तेल आयात करने की वजह से भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप घुटने टेकने के लिए मजबूर हो सकते हैं। नवंबर के बाद अमेरिका भारत पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को हटा सकता है। रेसिप्रोकल टैरिफ के नाम पर पहले अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया था। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने उम्मीद जताई है कि 30 नवंबर के बाद कुछ आयातों पर लगाया गया दंडात्मक शुल्क (25 फीसदी) वापस ले लिया जाएगा। कोलकाता में मर्चेंट्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सीईए नागेश्वरन ने कहा, "हम सभी पहले से ही इस पर काम कर रहे हैं, और मैं यहां टैरिफ के बारे में बात करने के लिए कुछ समय लूंगा। हां, 25 फीसदी का मूल पारस्परिक टैरिफ और 25 फीसदी का दंडात्मक टैरिफ, दोनों की उम्मीद नहीं थी। मेरा अब भी मानना ​​है कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण दूसरा 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया होगा, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों के हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए, मेरा मानना ​​है कि 30 नवंबर के बाद दंडात्मक टैरिफ नहीं लगाया जाएगा।'' भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि अगले कुछ महीनों में दंडात्मक शुल्क और उम्मीद है कि पारस्परिक शुल्कों पर कोई समाधान निकल आएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की निर्यात वृद्धि दर, जो वर्तमान में 850 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष है, एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की राह पर है, जो जीडीपी का 25 फीसदी है, जो एक स्वस्थ और खुली इकॉनमी का संकेत है। ट्रंप ने दर्जनों देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) लागू किया था। यह 1977 का एक कानून है जिसे विदेशी आपात स्थितियों के समय प्रतिबंधों और वित्तीय नियंत्रण के लिए बनाया गया था। भारत पर पहले 25 फीसदी टैरिफ लगाया गया, लेकिन बाद में रूस से तेल खरीदने को लेकर एक्स्ट्रा 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया गया। इससे भारत से एक्सपोर्ट होने वाले सामानों पर बुरा असर पड़ा है। हालांकि, भारत ने साफ किया है कि भारत राष्ट्र हित की वजह से रूस से तेल आयात कर रहा है। अमेरिकी सीमा शुल्क नोटिफिकेशन में यह भी बताया गया है कि भारत से आने वाले अधिकांश प्रोडक्ट्स पर उच्च शुल्क के साथ-साथ एंटी-डंपिंग या प्रतिपूरक शुल्क जैसे अन्य लागू शुल्क भी लागू होंगे, लेकिन कुछ वस्तुओं को इससे बाहर रखा गया है। इसमें अमेरिकी टैरिफ अनुसूची में अलग से सूचीबद्ध कुछ उत्पाद शामिल हैं। लोहे और इस्पात से बनी वस्तुओं, जिनमें उनके कुछ अन्य उत्पाद भी शामिल हैं, पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा। यही बात एल्युमीनियम उत्पादों पर भी लागू होती है। सेडान, एसयूवी, क्रॉसओवर, मिनीवैन, कार्गो वैन और हल्के ट्रक जैसे यात्री वाहनों को भी उनके स्पेयर पार्ट्स सहित छूट दी गई है।  

ट्रंप का बड़ा कदम: चार्ली किर्क हत्याकांड के बाद एंटीफा को किया प्रमुख आतंकवादी संगठन घोषित

वाशिंगटन  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा ऐलान किया है। ट्रंप ने एंटीफा संगठन को एक प्रमुख आतंकी संगठन घोषित किया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी शेयर करते हुए कहा कि मुझे हमारे अनेक अमेरिकी देशभक्तों को यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मैं एंटीफा, एक बीमार, खतरनाक, कट्टरपंथी वामपंथी आपदा को एक प्रमुख आतंकवादी संगठन घोषित कर रहा हूं। ट्रंप ने कहा कि एंटीफा को वित्तपोषित करने वालों की उच्चतम कानूनी मानकों और प्रथाओं के अनुसार गहन जांच की जाए। ट्रंप ने इसलिए लिया एक्शन ट्रंप ने एंटीफा को इसलिए आतंकी संगठन घोषित किया। क्योंकि हाल ही में उनके करीबी चार्ली किर्क की हत्या हुई थी। इसका हत्यारा टायलर रॉबिन्सन वामपंथी राजनीतिक विचारधारा का था। एंटीफा संगठन ऐसे ही वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ा रहा था। एंटीफा दूर-वामपंथी और फासीवाद-विरोधी आंदोलन करता है। ट्रंप ने समूह को वित्त पोषित करने वाले व्यक्तियों और संगठनों की गहन जांच का आह्वान किया।    ट्रंप ने पहले किया था वादा बता दें कि ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान एंटीफा को एक आतंकवादी संगठन के रूप में चिह्नित करने का वचन दिया था। उस समय उनके अटॉर्नी जनरल विलियम बार ने समूह की गतिविधियों को “घरेलू आतंकवाद” बताया था। अब ट्रंप ने करीबी चार्ली किर्क की हत्या के बाद सख्ती करना शुरू कर दिया है। क्या है एंटीफा? एंटीफा (फासीवाद विरोधी) एक औपचारिक संगठन नहीं है। यह एक शिथिल रूप से परिभाषित सामाजिक आंदोलन है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कानून आधिकारिक तौर पर नामित विदेशी आतंकवादी समूहों को “भौतिक सहायता” देने पर प्रतिबंध लगाता है, लेकिन घरेलू संगठनों के लिए कोई समान कानून नहीं है। ‘एंटीफा’ शब्द आम तौर पर वामपंथी, अक्सर अति-वामपंथी, राजनीतिक विचारों वाले व्यक्तियों की एक विस्तृत श्रृंखला को दिखाता है। यह आमतौर पर मुख्यधारा की डेमोक्रेटिक पार्टी के एजेंडे से बाहर होते हैं। इस आंदोलन में एक केंद्रीकृत नेतृत्व संरचना या राष्ट्रीय मुख्यालय का अभाव है, हालांकि कुछ स्थानीय समूह नियमित रूप से मिलते रहते हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स पर भड़के ट्रंप, 15 अरब डॉलर की मानहानि का दावा ठोकने की चेतावनी

 न्यूयॉर्क  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के नामी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स और उसके चार पत्रकारों के खिलाफ 15 अरब डॉलर का मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया है. सोमवार को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "न्यूयॉर्क टाइम्स को बहुत लंबे समय से स्वतंत्र रूप से झूठ बोलने, बदनाम करने और मुझे बदनाम करने की अनुमति दी गई है, और अब यह बंद होगा!”. उन्होंने जानकारी दी कि इस मुकदमे को उन्होंने फ्लोरिडा में दर्ज कराया है. "आज, मुझे देश के इतिहास के सबसे खराब और सबसे पतित अखबारों में से एक, रेडिकल लेफ्ट डेमोक्रेट पार्टी के लिए एक वर्चुअल "मुखपत्र" बनने वाले द न्यूयॉर्क टाइम्स के खिलाफ 15 बिलियन डॉलर का मानहानि का मुकदमा लाने का बड़ा सम्मान मिला है. मैं इसे अब तक के सबसे बड़े अवैध कैंपेन चलाने में योगदान देने वाले के रूप में देखता हूं. कमला हैरिस के उनके समर्थन को वास्तव में द न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पन्ने पर केंद्र में रखा गया था, जो पहले कभी नहीं सुना गया था! "टाइम्स" आपके पसंदीदा राष्ट्रपति (यानी मेरे), मेरे परिवार, बिजनेस, अमेरिका फर्स्ट मूवमेंट, MAGA और समग्र रूप से हमारे देश के बारे में झूठ बोलने की एक दशक लंबी पद्धति में लगा हुआ है. मुझे गर्व है कि मैं एक बार सम्मानित "कचरा" को जिम्मेदार ठहराता हूं, जैसा कि हम फेक न्यूज नेटवर्क के साथ कर रहे हैं… न्यूयॉर्क टाइम्स को बहुत लंबे समय से स्वतंत्र रूप से झूठ बोलने, बदनाम करने और मुझे बदनाम करने की अनुमति दी गई है, और अब यह बंद होगा! यह मुकदमा ग्रेट स्टेट ऑफ फ़्लोरिडा में लाया जा रहा है. इस बात की ओर आपका ध्यान के लिए धन्यवाद. अमेरिका को फिर से महान बनाएं!" डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति न्यूज एजेंसी AP की रिपोर्ट के अनुसार फ्लोरिडा में अमेरिकी जिला न्यायालय में दायर मुकदमे में न्यूयॉर्क टाइम्स के दो पत्रकारों द्वारा लिखे गए और 2024 के चुनाव के पहले छापे गए कई लेखों और एक किताब का नाम दिया गया है. इसमें आरोप लगाया गया है कि कहा गया है कि ये "न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मानहानि के दशकों पुराने पैटर्न का हिस्सा हैं." ट्रंप द्वारा दायर इस मुकदमे में कहा गया है, "बयानों के झूठ की जानकारी के साथ, और/या उनकी सच्चाई या झूठ की लापरवाह उपेक्षा के साथ, प्रतिवादियों (NYT और 4 पत्रकार) ने लापरवाही से ऐसे बयान प्रकाशित किए." AP की रिपोर्ट के अनुसार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एजेंसी की तरफ से इस खबर पर प्रतिक्रिया के लिए भेजे गए ईमेल का तुरंत जवाब नहीं दिया है. गौरतलब है कि ट्रंप अमेरिका के कई मीडिया आउटलेट्स के पीछे पड़ गए हैं. जुलाई में उन्होंने द वॉल स्ट्रीट जर्नल और मीडिया के दिग्गज रूपर्ट मर्डोक के खिलाफ 10 बिलियन डॉलर का मानहानि का मुकदमा दायर किया था क्योंकि अखबार ने यौन शोषण के अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ ट्रंप के संबंधों पर एक स्टोरी छाप दी थी.

अमेरिका ने माना कूटनीति विफल, इजरायल ने गाजा पर तेज़ हमलों का आगाज किया

 तेल अवीव कतर में सोमवार को 60 मुस्लिम देशों की मीटिंग हुई, जिसमें इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ। वहीं उसी समय इजरायल में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो मौजूद थे। उन्होंने इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ कई घंटे तक मीटिंग की और मीडिया से बात की। इस दौरान उन्होंने साफ किया कि गाजा में जारी जंग का कोई कूटनीतिक समाधान होने की उम्मीद नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि हमास एक आतंकी और बर्बर संगठन है। वह जब तक सरेंडर नहीं करेगा, तब तक फिलिस्तीन के मसले पर किसी समाधान की उम्मीद करना बेमानी होगा। उनका यह स्टैंड अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से एकदम उलट है, जिन्होंने पिछले दिनों कहा था कि जल्दी ही गाजा में जंग समाप्त होगी। मार्को रुबियो के बयान से स्पष्ट है कि गाजा में अब इजरायल और आक्रामक हो सकता है क्योंकि उसे अमेरिका की ओर से समर्थन हासिल है। यही नहीं इजरायल ने गाजा पर हमले करना शुरू भी कर दिया है। सोमवार देर रात से ही इजरायल की ओर से गाजा पर हमले जारी हैं। रुबियो ने कहा कि हम चाहते हैं कि जंग समाप्त हो, लेकिन हमास एक आतंकी संगठन है, जो सरेंडर नहीं कर रहा है। उसके सरेंडर किए बिना गाजा में जंग का कोई कूटनीतिक समाधान निकलने की उम्मीद बेहद कम है। उन्होंने कहा कि हमास का घोषित लक्ष्य इजरायल की बर्बादी है। उसने लगातार कई हमले इजरायल पर किए हैं। इसलिए उसके खात्मे के साथ ही समाधान संभव है। फिलहाल गाजा में भीषण हमलों का दौर जारी है। इजरायल की चेतावनी के बाद से हजारों लोग गाजा छोड़कर निकल रहे हैं। इसी को लेकर रुबियो ने चेतावनी दी है कि हमास के पास कुछ दिन का ही वक्त बचा है। वह सीजफायर डील को स्वीकार कर ले या फिर गाजा पर इसी तरह बमबारी जारी रहेगी। इजरायल ने तो ऑपरेशन शुरू भी कर दिया है। हालांकि इजरायल के लिए भी राह आसान नहीं है। एक तरफ मुस्लिम देश एकजुट हैं तो वहीं यूरोप के कई मुल्क भी इजरायल के खिलाफ हैं। अब लग्जमबर्ग का भी कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र आम सभा में फिलिस्तीन को मान्यता देने के प्रस्ताव का समर्थन करेगा। इससे पहले ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी ऐसा प्रस्ताव रख चुके हैं। बता दें कि रुबियो ने इजरायल की यात्रा के बाद अब कतर का दौरा किया है। वहीं कतर के पीएम इस्लामिक देशों की मीटिंग से पहले अमेरिका गए थे। माना जा रहा है कि अमेरिकी दखल के चलते ही कतर शांत है और मध्यस्थता की मीटिंग जारी रखने पर सहमत है। वहीं नेतन्याहू का कहना है कि कतर पर हमले से पहले उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को जानकारी दी थी, लेकिन उनकी ओर से रोका नहीं गया।

PM मोदी पर ट्रंप का बयान… शेयर बाजार चढ़ा, इन 10 स्टॉक्स में सबसे ज्यादा उछाल

मुंबई  भारत-US के बीच अटली ट्रेड डील पर बात बनती नजर आ रही है. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से इसे लेकर पॉजिटिव संकेत दिए हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहुत अच्छा दोस्त बताते हुए ट्रेड डील के सफल होने की बात कही है, तो उनकी सोशल मीडिया पोस्ट के बाद पीएम मोदी ने भी इंडिया-यूएस डील पर जल्द बात पूरी होने की उम्मीद जताई है. तमाम मुद्दों को लेकर फंसी इस डील के पूरा होने की उम्मीद का सीधा असर बुधवार को शेयर बाजार पर देखने को मिला है और सेंसेक्स-निफ्टी खुलने के साथ ही रॉकेट की तरह उड़ान भरते नजर आए हैं.  सेंसेक्स 400 अंक चढ़ा, निफ्टी 25000 के पार बीएसई के सेंसेक्स इंडेक्स ने शेयर मार्केट ओपन होने के साथ ही अपने पिछले बंद 81,101.32 की तुलना में करीब 400 अंकों की छलांग लगाते हुए 81,504.36 के स्तर पर ओपनिंग की और 81,587.91 पर कारोबार करता हुआ दिखाई दिया. वहीं दूसरी ओर एनएसई निफ्टी ने भी सेंसेक्स के कदम से कदम मिलाकर चलते हुए अपने पिछले बंद 24,868.60 के मुकाबले उछाल भरते हुए 25,017 पर कारोबार की शुरुआत की.  शुरुआती कारोबार में शेयर बाजार में मौजूद करीब 1728 कंपनियों के शेयरों ने अपने पिछले बंद के मुकाबले जोरदार तेजी के साथ कारोबार की शुरुआत ग्रीन जोन में की थी, तो वहीं  595 कंपनियों के शेयर लाल निशान पर कारोबार करते दिखे. इसके अलावा 168 शेयरों की फ्लैट ओपनिंग हुई यानी इनकी स्थिति में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला. बाजार खुलने पर कोटक महिंद्रा बैंक, जियो फाइनेंशियल, एलटी, डॉ रेड्डीज लैब और टीसीएस के शेयर सबसे तेज भागे.  विदेशों से मिल रहे थे तेजी के संकेत शेयर बाजार में तेजी के संकेत इसके ओपन होने से पहले ही विदेशों से मिलने लगे थे. दरअसल, अमेरिका से जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत-यूएस ट्रेड डील को लेकर बयान आया था, तो वहीं दूसरी ओर एशियाई बाजार में तेजी के साथ कारोबार की शुरुआत हुई थी. शुरुआती कारोबारी में गिफ्ट निफ्टी 107.50 अंक चढ़कर 25,027.50 पर कारोबार कर रहा था, तो जापान का निक्केई 174 अंक, हांगकांग के हैंगसेंग 198.86 अक और साउथ कोरिया का कोस्पी इंडेक्स 46.13 अकं की बढ़त लिए हुए था.  ट्रंप ने PM मोदी को लेकर ऐसा क्या कहा? राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल अकाउंट से शेयर की गई अपनी एक पोस्ट में लिखा कि मैं अपने बहुत अच्छे दोस्त प्रधानमंत्री मोदी से आने वाले हफ्तों में बातचीत करने के लिए उत्सुक हूं. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार बाधाओं को दूर करने के लिए बातचीत चल रही है. मुझे पूरा यकीन है कि दोनों महान देशों के लिए इस वार्ता का सफल निष्कर्ष निकलेगा. वहीं ट्रंप की इस पोस्ट को लेकर पीएम मोदी ने भारत-अमेरिका को अच्छा दोस्त बताते हुए कहा है कि समृद्ध भविष्य के लिए दोनों साथ काम करेंगे. खुलते ही रॉकेट बने ये 10 शेयर  शेयर मार्केट में तूफानी तेजी के बीच तमाम शेयरों में उछाल देखने को मिला और इनमें 10 सबसे तेज भागने वाले स्टॉक्स की बात करें, तो लार्जकैप कैटेगरी में शामिल एचसीएल टेक (2.28%), टेक महिंद्रा (2.10%), टीसीएस (1.95%) की तेजी लेकर भागा. तो वहीं मिडकैप में शामिल भारत फोर्ज (4.13%), एम्फेसिस (3.79%), थर्मेक्स (3.71%), टाटा एलेक्सी (3.30%) और कोफोर्ज शेयर (3.20%) की तेजी लेकर ट्रेड कर रहा था. इसके अलावा स्मॉलकैप कैटेगरी में सस्ता सुदंर शेयर 20 फीसदी, वेलस्पन शेयर 10.50% और आईसीआईएल शेयर 8.20% चढ़ गया. 

डिनर पार्टी में मारपीट की नौबत: ट्रंप के सामने भिड़े वित्त मंत्री बेसेंट और वरिष्ठ अफसर

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डिनर पार्टी में उनके दो टॉप इकोनॉमिक अधिकारी मारपीट की नौबत तक पहुंच गए. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि एक अधिकारी ने दूसरे के सामने कहा कि 'तेरा मुंह तोड़ दूंगा… बाहर चल'. यह घटना वाशिंगटन डीसी में एक विशेष क्लब "एक्जीक्यूटिव ब्रांच" के उद्घाटन और एक पॉडकास्ट होस्ट चमथ पालिहपितिया के जन्मदिन समारोह के दौरान हुई. ट्रंप के जिन दो अफसरों के बीच मारपीट की नौबत आई वे हैं सेक्रेटरी ऑफ फाइनेंस यानी कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट और फेडरल हाउसिंग फाइनेंस एजेंसी के डायरेक्टर बिल पुल्टे के बीच.  सीएनएन के अनुसार एग्ज़ीक्यूटिव क्लब में एक रात्रिभोज के दौरान स्कॉट बेसेन्ट ने पुल्टे के मुंह पर मुक्का मारने की धमकी दी. सूत्रों के अनुसार बेसेंट  को पता चला कि बिल पुल्टे ट्रंप के सामने उनकी चुगली कर रहे हैं.  इसकी जानकारी मिलते ही स्कॉट बेसेन्ट आपे से बाहर हो गए और उन्होंने बिल पुल्टे के चेहरे पर मुक्का मारने की धमकी दी.  यह घटना 4 सितंबर 2025 को वाशिंगटन डीसी में एक निजी डिनर के दौरान हुई. इस डिनर में कई बड़े नाम मौजूद थे जैसे ट्रांसपोर्टेशन सेक्रेटरी सीन डफी, कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लुटनिक, इंटीरियर सेक्रेटरी डग बर्गम, और नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड. लगभग 30 मेहमानों के लिए एक लम्बी मेज सजाई गई थी जिस पर उच्च श्रेणी के क्रिस्टल और चीनी मिट्टी के बर्तन लगे थे.  लेकिन कॉकटेल पार्टी के शोरगुल के बीच बेसेंट ने पुल्टे पर गालियों से भरी तीखी टिप्पणी की. दरअसल खबर यह है कि स्कॉट बेसेन्ट ने कई लोगों से सुना था कि फेडरल हाउसिंग फाइनेंस एजेंसी के निदेशक ट्रंप के सामने उनकी बुराई कर रहे थे.  मौका मिलते ही बेसेंट ने पुल्टे से कहा, "तुम राष्ट्रपति से मेरे बारे में क्यों बात कर रहे हो? भाड़ में जाओ." "मैं तुम्हारे मुंह पर मुक्का मार दूंगा." अमेरिकी राजनीति पर गहरी नजर रखने वाली वेबसाइट पॉलटिको में इस झगड़े की विस्तार से रिपोर्ट छपी है.  बेसेंट की प्रतिक्रिया देख पुल्टे स्तब्ध लग रहा था. चश्मदीदों के अनुसार इस तनावपूर्ण मुठभेड़ के बाद क्लब के सह-मालिक और फाइनेंसर ओमीद मलिक को हस्तक्षेप करना पड़ा. लेकिन बेसेंट को यह मंजूर नहीं था. वह पुल्टे को पार्टी से ही बार निकलवाना चाहता था.  बेसेंट ने क्लब मलिक से कहा, "या तो वो यहां रहेगा या मैं. तुम मुझे बताओ कि यहां से कौन निकलेगा." "या फिर," उसने आगे कहा, "हम बाहर जा सकते हैं." "क्या करने?" पुल्टे ने पूछा. "बात करने?" "नहीं," बेसेंट ने जवाब दिया. "मैं तुम्हारी पिटाई कर दूंगा." स्थिति को शांत करने के लिए मलिक ने उन लोगों को अलग किया और बेसेंट को शांत करने के लिए क्लब के दूसरे हिस्से में ले गए. डिनर के दौरान बेसेंट और पुल्टे को मेज के विपरीत छोर पर बिठाया गया. इस घटना पर बेसेंट, पुल्टे, मलिक और व्हाइट हाउस ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.  ट्रंप को उम्मीद थी तीनों साथ मिलकर काम करेंगे ट्रंप ने मई में घोषणा की थी कि बेसेंट, वाणिज्य मंत्री ल्यूटनिक और पुल्टे मिलकर काम करेंगे. लेकिन ट्रंप प्रशासन के सूत्रों के अनुसार इन अफसरों के बीच एक तरह की ज़मीनी जंग छिड़ी हुई है. इस विवाद से परिचित कुछ लोगों का कहना है कि बेसेंट का मानना ​​है कि पुल्टे ने खुद को उन मामलों में शामिल कर लिया है जिसे वित्त मंत्री अपना अधिकार क्षेत्र मानते हैं. ट्रंप से कई सीट दूर बैठे बेसेंट यह पहली बार नहीं है जब बेसेंट का ट्रंप के किसी सलाहकार से झगड़ा हुआ हो. इस साल की शुरुआत में कई सूत्रों ने सीएनएन को बताया कि बेसेंट का एलॉन मस्क से तीखी बहस हुई थी.   बेसेंट रविवार को ट्रंप के साथ यूएस ओपन में शामिल हुए हालांकि उन्हें राष्ट्रपति से कुछ सीटें दूर बैठाया गया था.