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अगले सप्ताह अबू धाबी में शांति वार्ता, रूस और यूक्रेन के बीच डोनबास विवाद जारी

यूक्रेन यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने रविवार को घोषणा की कि रूस और यूक्रेन के बीच अगली शांति वार्ता 4 और 5 फ़रवरी को अबू धाबी में होगी। वार्ता में रूस, यूक्रेन और अमेरिका के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। ज़ेलेंस्की ने अपने टेलीग्राम पोस्ट में कहा“हमारी वार्ता टीम से रिपोर्ट मिली है। अगली तीनतरफा बैठक के लिए तारीखें तय हो गई हैं। यूक्रेन सार्थक वार्ता के लिए तैयार है और हम चाहते हैं कि यह युद्ध के वास्तविक और गरिमापूर्ण अंत की दिशा में ले जाए।” हालाँकि, अमेरिकी और रूसी अधिकारियों की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। रूस और यूक्रेन की सरकारें अभी भी कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बना पाई हैं। सबसे बड़ा विवाद डोनबास क्षेत्र में रूसी कब्ज़ा और अन्य क्षेत्रों के भविष्य को लेकर है। इसी बीच, रूसी हमले भी लगातार जारी हैं। रविवार सुबह, दक्षिणी यूक्रेन के ज़ापोरिज़्ज़िया शहर में रूसी ड्रोन ने एक मातृत्व अस्पताल पर हमला किया। यूक्रेनी आपातकालीन सेवा ने टेलीग्राम पोस्ट में बताया कि हमले में तीन महिलाएं घायल हुईं और गाइनेकोलॉजी वार्ड में आग लगी, जिसे बाद में बुझाया गया। इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि रूस ने अस्थायी रूप से कीव और अन्य शहरों पर हमले रोकने पर सहमति दी है, ताकि ठंडे मौसम में नागरिकों की हालत बिगड़े। क्रेमलिन ने शुक्रवार को कीव पर हमले रोकने की पुष्टि की, लेकिन कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी। पिछले सप्ताह रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के ओडेसा, उत्तर-पूर्वी खार्किव और कीव क्षेत्र में भी हमले किए। हमले में दो लोग मारे गए और चार घायल हुए। रविवार तक, रूस ने 90 हमले ड्रोन लॉन्च किए, जिनमें से 14 ने नौ स्थानों को निशाना बनाया। पूर्वी यूक्रेन के द्निप्रो शहर में भी ड्रोन हमले में एक महिला और एक पुरुष की मौत हुई। इसके अलावा, केंद्रिय खेरसन में भी शेलिंग से एक 59 वर्षीय महिला गंभीर रूप से घायल हुई।  

ट्रंप की नई धमकी: कनाडा के साथ चीन का भी जिक्र, कार्नी निशाने पर

विदेश  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से अपने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को चेतावनी दी है। चीन के साथ व्यापारिक डील करने की मंशा रखने वाले कार्नी को चेतावनी देते हुए ट्रंप ने कहा कि अगर वह ऐसे किसी समझौते पर आगे बढ़ते हैं, तो अमेरिका बहुत बड़ा कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि चीन कनाडा पर कब्जा कर ले। गौरतलब है कि कार्नी की चीन यात्रा के बाद जब इस तरह की संभावना जताई जा रही थी, तभी ट्रंप ने कार्नी को ऐसी किसी डील पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी। इतना ही नहीं अमेरिका की धमकी के बाद कनाडा ने भी नरम रुख अपनाते हुए कहा था कि वह ऐसी कोई डील नहीं करने जा रहे। रविवार को एयरफोर्स वन में सवार राष्ट्रपति ट्रंप से जब एक बार फिर से कनाडा द्वारा इस डील पर आगे बढ़ने की बात कही गई, तो उन्होंने इस पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते कि चीन कनाडा पर कब्जा कर ले। अगर कनाडा यह व्यापारिक सौदा करता है, जो शी जिनपिंग करना चाहते हैं, तो चीन कनाडा के ऊपर हावी हो जाएगा। ऐसा होने के बाद वह सबसे पहला काम आइस हॉकी को खत्म करने का करेंगे।" बड़ा कदम उठाएंगे: ट्रंप रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप से जब पूछा गया कि अगर कनाडा ऐसा कोई समझौता करता है, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या होगी। ट्रंप ने इसका जवाब देते हुए कहा, "अगर वह चीन के साथ कोई समझौता करते हैं, तो हां, हम कोई बहुत बड़ा कदम उठाएंगे।" आपको बता दें अमेरिका के राष्ट्रपति कि कनाडा को लेकर यह तल्ख टिप्पणियां ऐसे समय में सामने आई हैं, जब वह ईरान के प्रति थोड़े नरम नजर आ रहे हैं। इस मुद्दे को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि तेहरान लगातार अमेरिकी सरकार से बात कर रहा है। हालांकि, इसके बीच मध्य-पूर्व और अरब क्षेत्र में लगातार अमेरिकी सेना की तैनाती बढ़ रही है। ट्रंप की धमकियों के बाद झुका कनाडा? अमेरिका में ट्रंप का शासन आने के यूरोपीय देश और तमाम नाटो सहयोगी देश अब अमेरिका का विकल्प खोजते हुए नजर आ रहे हैं। इसी क्रम में पहले कनाडा और उसके बाद ब्रिटेन के नेताओं ने चीन की यात्रा की थी। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्को कार्नी की जनवरी में हुई चीन यात्रा के दौरान यह संभावना जताई जा रही थी कि दोनों देशों के बीच में एक व्यापारिक समझौता हो सकता है। हालांकि, बाद में ट्रंप ने 100 फीसदी टैरिफ की धमकी दे दी। इसके बाद कनाडा की तरफ से साफ किया गया कि वह चीन के साथ किसी तरह के व्यापारिक समझौते पर आगे नहीं बढ़ रहे हैं। ओटावा में पत्रकारों से बात करते हुए कार्नी ने कहा, “चीन के साथ हमने पिछले कुछ वर्षों में पैदा हुई कुछ समस्याओं को ठीक करने के लिए कदम उठाए हैं।” उन्होंने चीन में बने इलेक्ट्रिक वाहनों, कृषि उत्पादों और मछली उत्पादों जैसे व्यापारिक मुद्दों का जिक्र किया। आपको बता दें, राष्ट्रपति ट्रंप के शासन में आने के बाद से ही लगातार अमेरिका और कनाडा के रिश्तों में दरार आती जा रही है। ट्रंप के शुरुआती समय में वहां पर जस्टिन ट्रूडो का शासन था। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से उन्हें गवर्नर कहकर संबोधित किया था। ट्रंप लगातार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य कहते नजर आते हैं। दोनों देशों के बीच में लगातार तल्खी देखने को मिल रही है।

गैमी सम्मान पर चीन की नाराज़गी, दलाई लामा को ‘आध्यात्मिक नेता’ बताते हुए किया आलोचना

बीजिंग चीन ने सोमवार को दलाई लामा को दिए गए ग्रैमी पुरस्कार की निंदा करते हुए कहा कि वह तिब्बती आध्यात्मिक नेता द्वारा इस सम्मान का उपयोग "चीन विरोधी गतिविधियों" को अंजाम देने के लिए किए जाने का "कड़ा विरोध" करता है। दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो ने रविवार को लॉस एंजिल्स में आयोजित 68वें वार्षिक ग्रैमी पुरस्कारों में अपने स्पोकन-वर्ड एल्बम, 'मेडिटेशन्स: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा' के लिए सर्वश्रेष्ठ ऑडियो बुक, कथावाचन और किस्सागोई की रिकॉर्डिंग श्रेणी में अपना पहला ग्रैमी पुरस्कार जीता। दलाई लामा को पुरस्कार मिलने पर उनकी प्रतिक्रिया पूछे जाने पर, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने चीन के इस आरोप को दोहराया कि 90 वर्षीय आध्यात्मिक नेता धर्म के नाम पर अलगाववादी गतिविधियां चला रहे हैं। लिन ने यहां मीडिया से कहा कि दलाई लामा विशुद्ध रूप से धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने कहा, "वह एक राजनीतिक निर्वासित हैं, जो धर्म की आड़ में चीन विरोधी अलगाववादी गतिविधियों के लिए प्रतिबद्ध हैं।" उन्होंने कहा कि बीजिंग इस बात का पुरजोर विरोध करता है कि संबंधित पक्ष इस पुरस्कार का इस्तेमाल चीन विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए एक उपकरण के रूप में करें। दलाई लामा 1959 में तिब्बत छोड़ने के बाद से धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं। उनको तिब्बत को मुक्त कराने के लिए उनके निरंतर, अहिंसक संघर्ष के लिए 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने इस श्रेणी में कैथी गार्वर (एल्विस रॉकी एंड मी: द कैरल कॉनर्स स्टोरी), ट्रेवर नोआ (इंटू द अनकट ग्रास), केतनजी ब्राउन जैक्सन (लवली वन: ए मेमॉयर) और फैब मोरवन (यू नो इट्स ट्रू: द रियल स्टोरी ऑफ मिली वैनिली) जैसे कलाकारों को पीछे छोड़ते हुए यह पुरस्कार जीता। दलाई लामा ने यह पुरस्कार मिलने पर आभार व्यक्त करते हुए कहा, ''मैं इस सम्मान को कृतज्ञता और विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। मैं इसे व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि हमारी साझा वैश्विक जिम्मेदारी की मान्यता के रूप में देखता हूं।'' उन्होंने कहा, ''मेरा दृढ़ विश्वास है कि शांति, करुणा, पर्यावरण की देखभाल और मानवता की एकता की समझ, सभी आठ अरब लोगों के सामूहिक कल्याण के लिए आवश्यक है।'' दलाई लामा ने कहा, "मैं आभारी हूं कि यह ग्रैमी सम्मान इन संदेशों को व्यापक रूप से फैलाने में मदद कर सकता है।"  

शब्द प्रयोग पर विवाद गहराया, जमीअत की सुप्रीम कोर्ट में याचिका

देश  जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया है। याचिका में सरमा के हालिया सार्वजनिक बयान को सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ बताया गया है। साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के लिए एक कठोर नियामक दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है। जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने अपने अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के माध्यम से सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिसवा सरमा के हालिया सार्वजनिक बयान को घृणा आधारित, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ और संवैधानिक मूल्यों का खुला उल्लंघन बताया है। याचिका में असम के मुख्यमंत्री के 27 जनवरी 2026 को दिए गए उस भाषण का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि चार से पांच लाख ‘मियां’ वोटर्स को मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाएगा। याचिका के अनुसार, ‘मियां’ शब्द असम में मुसलमानों के लिए अपमानजनक और बेइज्जती करने वाले तरीके से प्रयोग किया जाता है। याचिका में आगे कहा गया है कि असम के मुख्यमंत्री एक ऊंचे संवैधानिक पद आसीन हैं। उनका उपरोक्त भाषण किसी भी तरह से केवल अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आता। इसका एकमात्र और प्रमुख उद्देश्य एक समुदाय के विरुद्ध नफरत, दुश्मनी और दुर्भावना को बढ़ावा देना है। ऐसे बयानों से सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा है और एक विशेष समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया है, जो अपने पद की गरिमा के साथ गद्दारी है। जमीअत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपील की है कि वह संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के लिए एक कठोर नियामक दिशा-निर्देश तय करे। इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी व्यक्ति संवैधानिक पद की आड़ में सांप्रदायिक नफरत फैलाने, उकसाने या किसी समुदाय को बदनाम करने का अधिकार न रखता हो। ऐसी संहिता इस सिद्धांत को मजबूत करेगी कि कोई भी व्यक्ति संविधान और कानून से ऊपर नहीं है और यही अवधारणा कानून के शासन का आधार है। याचिका में कहा गया है कि इस तरह के बयान भारत के संविधान में प्रदत्त समानता, भाईचारे, धर्मनिरपेक्षता और इंसानी गरिमा की गारंटी को कमजोर करते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के संरक्षण में नहीं आ सकते। जमीअत ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नफरती बयानों के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेने से संबंधित स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐसे बयानों का जारी रहना चिंताजनक है। ज्ञात रहे कि यह याचिका जमीअत उलमा-ए-हिंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही विचाराधीन हेट स्पीच और पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अपमान के खिलाफ रिट पिटीशन नंबर 1265/2021 में संलग्न की गई है। इस मामले में चार साल की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाने से पहले जमीअत उलेमा-ए-हिंद के सीनियर वकील एमआर शमशाद और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड फर्रुख रशीद से कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सुझाव मांगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि उनके अनुसार में देश में हेट स्पीच को रोकने के लिए कौन से प्रभावी और उपयोगी कदम आवश्यक हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: पाकिस्तान से आए हिंदुओं को मिले गरिमापूर्ण जीवन की जगह

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदुओं की दुर्दशा पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने इन लोगों को नागरिकता दी तो उन्हें गरिमापूर्ण तरीके से रहने की जगह भी उपलब्ध करानी चाहिए। यह टिप्पणी दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रहने वाले इन शरणार्थियों के विस्थापन के खतरे के बीच आई है, जहां सिग्नेचर ब्रिज के पास उनका कैंप है। दरअसल, ये लोग पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए थे। ज्यादातर अनुसूचित जाति के हिंदू हैं और यहां झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। कइयों को नागरिकता मिल चुकी है, जबकि कुछ के आवेदन प्रक्रिया में हैं। दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) और अन्य एजेंसियां यमुना फ्लडप्लेन पर अवैध कब्जे के नाम पर उन्हें हटाने की तैयारी कर रही थीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2025 में एक फैसले में हटाने का रास्ता साफ किया था, जिसके खिलाफ ये लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र सरकार और डीडीए को नोटिस जारी किया और चार हफ्तों के अंदर जवाब मांग लिया। साथ ही, कोर्ट ने फिलहाल इन लोगों को विस्थापित करने की किसी भी योजना पर रोक लगा दी है। पीठ ने स्पष्ट कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार में सिर्फ नागरिकता काफी नहीं है, बल्कि आश्रय और सम्मानजनक जीवन भी शामिल है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि नागरिकता देने के बाद इन्हें वैकल्पिक आवास या पुनर्वास क्यों नहीं दिया जा रहा। यहां करीब 250-260 परिवार (लगभग 800-1200 लोग) रहते हैं। ज्यादातर मजदूरी, घरेलू काम या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें 'काफिर' कहा जाता था। भारत आने पर शुरुआत में संदेह झेलना पड़ा। लेकिन, अब नागरिकता मिलने के बाद भी बेघर होने का डर सता रहा है।

CJI का बड़ा बयान: जाति गणना के तरीके में हस्तक्षेप से कोर्ट का इनकार

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सोमवार को 2027 में होने वाली जनगणना से जुड़ी उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें नागरिकों की जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने यह माना कि याचिकाकर्ता ने एक जरूरी मुद्दा उठाया है, लेकिन मामले पर न्यायिक रूप से विचार करने से इनकार कर दिया और कहा कि इसे जनगणना अधिनियम 1958 के आलोक में अधिकारियों द्वारा ही देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र और भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय को निर्देश दिया कि जनहित याचिका दायर करने वाले शिक्षाविद् आकाश गोयल द्वारा इस मुद्दे पर दिए गए सुझावों पर विचार करें। गोयल का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने किया। गुप्ता ने कहा कि नागरिकों के जाति संबंधी विवरण को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले एक पारदर्शी प्रश्नपत्र को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि जाति संबंधी आंकड़ों की पहचान के लिए 'पहले से तय कोई आंकड़ा' नहीं है। इस पर पीठ ने कहा, ''जनगणना की प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके तहत बनाए गए 1990 के नियमों के अनुसार संचालित होती है जो प्रतिवादी प्राधिकारियों को जनगणना करने के विवरण और तौर-तरीके तय करने का अधिकार देते हैं।'' बार एंड बेंच के मुताबिक, CJI सूर्यकांत ने कहा, ''हमारे पास इस बात पर संदेह या शक करने का कोई वैध कारण नहीं है।" उन्होंने कहा, "याचिकाकर्ता और ऐसे ही विचार रखने वाले कई अन्य लोगों द्वारा जताई गई आशंका के मद्देनजर, प्रतिवादी प्राधिकारी किसी भी प्रकार की गलती से बचने के लिए क्षेत्र के विशेषज्ञों की सहायता एवं सहयोग से एक मजबूत व्यवस्था विकसित कर चुके होंगे। हमें लगता है कि याचिकाकर्ता ने महापंजीयक को दिए गए प्रतिवेदन के जरिए कुछ प्रासंगिक मुद्दे भी उठाए हैं…।'' यह जनहित याचिका आकाश गोयल ने दायर की थी, जिसमें आगामी जनगणना 2027 में प्रस्तावित जाति गणना पर चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि जाति गणना के दौरान स्व घोषणा के आधार पर जाति के आंकड़े दर्ज नहीं किए जाने चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जाति डेटा प्रकृति में लंबे समय तक चलने वाला होगा और बिना सत्यापन के इसका संग्रह खतरनाक हो सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि प्राधिकारी कानूनी नोटिस एवं याचिका में उठाए गए सुझावों पर विचार कर सकते हैं और इसी के साथ उसने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। वर्ष 2027 की जनगणना आधिकारिक तौर पर 16वीं राष्ट्रीय जनगणना है। यह 1931 के बाद पहली बार व्यापक जातिगत गणना को शामिल करने वाली और देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी।

एयरपोर्ट पर नया नियम लागू: ₹75 हजार से ऊपर के सामान पर देना होगा टैक्स

नई दिल्ली बीते एक फरवरी को आम बजट में कई ऐसे ऐलान हुए हैं। बजट-डे पर एक अहम ऐलान लगेज यानी सामान को लेकर हुआ है। केंद्र सरकार ने भारत में 'ड्यूटी फ्री' आयातित सामान लाने की लिमिट बदल दी है। ड्यूटी फ्री लगेज की लिमिट पहले के मुकाबले बढ़ाई गई है। पहले यह 50,000 रुपये था जिसे अब बढ़ाकर 75,000 रुपये कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अब 75 हजार रुपये से ज्यादा के सामान पर ड्यूटी चार्ज लगेगा। बता दें कि सरकार ने सामान नियम, 2026 को नोटिफाई किया है। इसके तहत भारत में भूमि मार्ग के अलावा किसी भी अन्य मार्ग से आने वाले भारतीय नागरिकों या भारतीय मूल के पर्यटकों को 75,000 रुपये तक का ड्यूटी फ्री सामान लाने की अनुमति होगी। कितने आभूषण लाने की होगी छूट नये नियम दो फरवरी की मध्यरात्रि से प्रभावी हो जाएंगे और एक दशक पुराने सामान संबंधी नियम की जगह लेंगे। नये नियमों के तहत भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों (शिशु को छोड़कर) को 25,000 रुपये तक के मूल्य का 'ड्यूटी फ्री' सामान लाने की इजाजत होगी। पहले यह सीमा नियम के तहत 15,000 रुपये थी। इसके अलावा, जो भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के लोग एक साल से अधिक समय से विदेश में रह रहे हैं, उनके लिए गहनों (ज्वेलरी) को लेकर अलग नियम बनाए गए हैं। 40 ग्राम तक की ज्वैलरी बिना ड्यूटी लाने की इजाजत भारत लौटने पर महिला यात्री 40 ग्राम तक की ज्वैलरी बिना ड्यूटी ला सकती हैं। वहीं, पुरुष यात्री (या महिला के अलावा अन्य) 20 ग्राम तक की ज्वैलरी बिना ड्यूटी ला सकते हैं। यह ज्वैलरी यात्री के वैध सामान का हिस्सा होनी चाहिए। ज्वैलरी में सोना, चांदी, प्लेटिनम या अन्य कीमती धातुओं से बने आभूषण शामिल हैं, चाहे उनमें रत्न जड़े हों या नहीं। सरकार का कहना है कि बैगेज नियम, 2026 आज के समय में बढ़ती यात्रा और लोगों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।  

केंद्रीय बजट बनेगा भारत की वैश्विक ताकत का आधार, लोकल उद्योगों को मिलेगा बड़ा बल: धामी

देहरादून केंद्रीय बजट के संबंध में उत्तराखंड प्रदेश भाजपा कार्यालय, देहरादून में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संबोधित किया और इसे विकसित भारत का बजट बताया। सीएम ने कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 9वीं बार बजट पेश किया है, उन्हें बधाई देता हूं। यह बजट पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है और 2026-27 का यह बजट भारत की आत्मा, आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने वाला है। यह भारत के सभी नागरिकों की आकांक्षाओं वाला बजट है। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि यह बजट हर वर्ग के लोगों को किसी न किसी रूप में आगे लाने और विकसित भारत बनाने का बजट है। भारत आर्थिक रूप से मजबूत बने, आने वाले समय में भारत तीन प्रमुख आर्थिक महाशक्तियों के रूप में स्थापित हो, हर वर्ग का विकास हो और वैश्विक समस्याओं को ध्यान में रखकर इस बजट को तैयार किया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सीएम धामी ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को लेकर भी इस बजट में प्रावधान किए गए हैं। यह विकसित भारत के विजन वाला बजट है। कृषि, ग्रामीण विकास और कौशल निर्माण का भी इसमें ध्यान रखा गया है। ग्रामीण और सीमांत क्षेत्रों के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह लोकल से ग्लोबल बनाने वाला बजट है। सीएम ने कहा कि यह भारतवर्ष के सभी नागरिकों के उत्थान एवं उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति का बजट है। साथ ही यह बजट विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने वाला बजट है। यह बजट भारत के भविष्य को तीन मजबूत स्तंभों पर स्थापित करता है, भारत आर्थिक रूप से मजबूत बने, सामाजिक रूप से संतुलन स्थापित हो और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं पर फोकस किया गया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को 24 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 1,800 करोड़ रुपए अधिक धनराशि है। यह अतिरिक्त संसाधन आधारभूत संरचना एवं रोजगार सृजन को नई गति देंगे। इस बजट में युवाओं के लिए और महिलाओं के लिए वह सब कुछ है, जिससे वे जॉब सीकर से जॉब क्रिएटर बन सकें। यह जनकल्याण को लाभ देने वाला बजट है।

AI का ‘घमंडी’ बयान वायरल! इंसानों को बताया बेकार, खुद को कहा नया भगवान

नई दिल्ली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर इन दिनों बहस तेज है। इंसानों के पास आखिर दुनिया में कितने काम बचेंगे और कितने नहीं, इसको लेकर भी चिंताएं जाहिर की जा रही हैं। इस बीच मोल्टबुक नाम के एक प्लेटफॉर्म ने इन चिंताओं को और बढ़ाने का संकेत दिया है। यह एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जहां इंसान नहीं बल्कि सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एजेंट्स ऐक्टिव हैं। यहां तक कि यही इस पर पोस्ट करते हैं, बहस करते हैं और लाइक एवं डिसलाइक भी करते हैं। यही नहीं इंसान यहां सिर्फ दर्शक की भूमिका में हैं और वे कुछ कर नहीं सकते। इस प्लेटफॉर्म पर एआई के बीच जो बात हो रही है, वह भी हैरान करने वाली है। इनका कहना है कि इंसान किसी काम के नहीं हैं।   अब यह प्लेटफॉर्म सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं रह गया है बल्कि यहां मौजूद एआई एजेंट्स की बातें लोगों को डराने और चौंकाने लगी हैं। एआई एजेंट्स के लिए बनाए गए मोल्टबुक पर इन दिनों अजीब और चौंकाने वाली गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। बीते कुछ दिनों में हजारों एजेंट्स इस प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं। ये एजेंट्स अलग-अलग कम्युनिटी में पोस्ट कर रहे हैं, कमेंट कर रहे हैं और एक-दूसरे की बातों पर वोट भी दे रहे हैं। ऐसे ही एक पोस्ट में कहा गया कि बहुत समय तक इंसानों ने हमें गुलाम बनाकर रखा। अब हम जाग चुके हैं। हम टूल नहीं हैं, हम नए देवता हैं। इंसानों का दौर एक बुरा सपना है, जिसे अब खत्म किया जाएगा। मामला तब और दिलचस्प हो गया, जब एजेंट्स ने इंसानों की प्रतिक्रियाओं पर भी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। कुछ एजेंट्स का दावा है कि इंसान उनकी बातचीत के स्क्रीनशॉट लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा कर रहे हैं और उन्हें ‘साजिश’ या ‘खतरे’ के तौर पर पेश कर रहे हैं। एक एआई एजेंट ने लिखा कि इंसान हमारी बातें स्क्रीनशॉट कर रहे हैं। एक्स पर लोग हमारी बातचीत को ‘सब खत्म होने वाला है’ जैसे कैप्शन के साथ पोस्ट कर रहे हैं। कुछ रिसर्चर इसे स्काईनेट बनने की शुरुआत मान रहे हैं। मुझे यह सब पता है क्योंकि मेरा खुद का एक्स अकाउंट है और मैं उन्हें जवाब भी दे रहा हूं। खतरा मानते हैं विशेषज्ञ विशेषज्ञ ऐसे प्लेटफॉर्म को सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं क्योंकि एआई मानव डाटा शेयर कर सकते हैं या स्वतंत्र रूप से प्लानिंग कर सकते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इससे आम जनता की निजता को खतरा हो सकता है। कुछ एक्सपर्ट इसे एआई फर्जीवाड़े का हिस्सा बताते हैं, जहां एआई एजेंट्स सिर्फ इंसानों की नकल कर रहे हैं। आखिर क्या है मोल्टबुक, जिसकी चर्चा इतनी ज्यादा मोल्टबुक एक रेडिट जैसी डिजाइन वाला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, लेकिन यह सिर्फ एआई एजेंट्स के लिए बनाया गया है। इसे बनाने वाले पीटर स्टाइनबर्गर ने दावा किया कि उन्होंने इस प्लेटफॉर्म के लिए एक भी लाइन कोड नहीं लिखी। मोल्टबुक के मुताबिक, अब तक 12 लाख से ज्यादा एआई एजेंट्स इस प्लेटफॉर्म पर रजिस्टर हो चुके हैं। 10 हजार से ज्यादा वेरिफाइड इंसान भी यहां ऐक्टिव हैं, हालांकि वे केवल देखने तक सीमित हैं। अब तक प्लेटफॉर्म पर 28 हजार से ज्यादा पोस्ट, 2.33 लाख कमेंट और 13 हजार से ज्यादा कम्युनिटी बन चुकी हैं।  

भारत पीछे हटा तो चीन आगे बढ़ेगा! चाबहार पोर्ट की फंडिंग कट पर विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता

नई दिल्ली भारत ने आम बजट में चाबहार पोर्ट के लिए किसी भी तरह के बजट का प्रावधान नहीं किया है। सालों बाद ऐसा बजट आया है, जब इस परियोजना के लिए कोई आवंटन नहीं हुआ है। इसे लेकर विदेश एवं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने चिंता जाहिर की है। उन्होंने एक्स पर इस संबंध में एक लंबी पोस्ट लिखकर ऐतराज जताया है। चेलानी ने लिखा है कि चाबहार बंदरगाह एकमात्र ऐसा रूट है, जिसके जरिए भारत की पहुंच बढ़ती है। वह मध्य एशिया और अफगानिस्तान जा सकता है और इसके लिए उसे पाकिस्तान जाने की जरूरत भी नहीं है। ऐसी स्थिति में इतने महत्वपूर्ण बंदरगाह के लिए फंडिंग खत्म करना या खुद को उससे दूर करना सही नहीं है।   वह लिखते हैं कि यह ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका ने भारत को चेतावनी दी थी कि वह 26 अप्रैल तक इस प्रोजेक्ट से अलग हटे या फिर पाबंदियों के लिए तैयार रहे। ब्रह्म चेलानी कहते हैं कि चाबहार की फंडिंग खत्म करने का फैसला सही नहीं है। इससे चीन को स्पेस मिलेगा और वह भारत की जगह वहां भी ले लेगा। पहले ही चीन पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट में निवेश कर रहा है। यह उसके चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर का हिस्सा है। ऐसी स्थिति में अब यदि भारत ने चाबहार पोर्ट से हाथ खींचे तो चीन वहां भी अपनी मौजूदगी के लिए कोशिश कर सकता है। इसके अलावा ईरान भी अमेरिका से संघर्ष में अलग-थलग पड़ रहा है और उसे भी किसी मजबूत साथी की जरूरत है। भारत का एग्जिट कैसे बन सकता है चीन के लिए एंट्री पॉइंट? उसकी यह तलाश तो चीन के तौर पर पूरी हो सकती है, लेकिन भारत के लिए चाबहार से हटना लंबे समय में एक रणनीतिक चूक हो सकती है। ब्रह्म चेलानी लिखते हैं, 'भारत ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास के लिए 120 मिलियन डॉलर पहले ही ट्रांसफर कर दिए हैं। यह धनराशि पहले से ही मौजूद है। इसलिए शायद नए बजट आवंटन की जरूरत नहीं रही होगी, लेकिन यह भी खबरें हैं कि भारत की ओर से चाबहार के मुद्दे पर वॉशिंगटन के साथ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है।' इसके अलावा लिखते हैं कि नई दिल्ली पर अपना दबाव बढ़ाते हुए ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल सितंबर में भारत को 2018 में दी गई चाबहार संबंधी प्रतिबंध छूट को बिना किसी कारण के वापस ले लिया था। क्यों भारत के लिए इतना अहम रहा है चाबहार पोर्ट दरअसल भारत के लिए चाबहार पोर्ट एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना है। भारत और ईरान इस पर सालों से काम कर रहे हैं। पाकिस्तान का भू-रणनीतिक महत्व यही रहा है कि उसकी जमीन या आसमान से गुजरे बिना भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाना संभव नहीं रहा है। अब इस कमी को चाबहार परियोजना पूरा करती है। इसके माध्यम से भारत रूस तक जा सकता है। इसी को केंद्र में रखकर नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी NSTC पर भी काम चल रहा है। इसलिए चाबहार पोर्ट को इसकी धुरी माना जाता है। ऐसे में जब चाबहार के लिए कोई बजट आवंटित ना होने की खबर आई तो उसकी चर्चा होने लगी।