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देवउठनी एकादशी 2025: खुलेंगे विवाह और मांगलिक कार्यों के द्वार, जानिए इसका धार्मिक महत्व

पंचांग के अनुसार, देवउठनी एकादशी यानी देवउथान एकादशी का पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और इसके साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. देवउठनी एकादशी 2025, तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 01 नवंबर को सुबह 09 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी और 02 नवंबर को सुबह 07 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में देवउठनी एकादशी का पर्व 1 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा. पारण (व्रत खोलने) का समय: 02 नवंबर 2025, दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से 03 बजकर 23 मिनट तक रहेगा. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें. घर के आंगन या पूजा स्थल को साफ कर, गेरू और आटे से चौक (रंगोली) बनाएँ. इस पर भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बनाना शुभ माना जाता है. एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. उन्हें गंगाजल से स्नान कराएँ और पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, फल, मिठाई, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें. धूप-दीप जलाकर पूजा करें. शाम के समय पूजा स्थल पर गन्ने का मंडप बनाएं इस मंडप में भगवान विष्णु की प्रतिमा और तुलसी का पौधा रखें. इस दौरान शंख और घंटी बजाकर, भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जागने का आह्वान करें.तुलसी और शालिग्राम का विधिवत विवाह कराया जाता है. तुलसी को चुनरी ओढ़ाकर और शालिग्राम जी को वस्त्र पहनाकर विवाह की रस्में पूरी की जाती हैं. एकादशी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें. इसके बाद श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें. भगवान को मौसमी फल, बेर, सिंघाड़ा, और गन्ना आदि का भोग लगाएं. इसके बाद जागरण करें और अगले दिन द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें. देवउठनी एकादशी का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) पर भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन के लिए चले जाते हैं और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं. इस चार महीने की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है. शुभ कार्यों की शुरुआत: भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागृत होते ही सृष्टि का कार्यभार पुनः उनके हाथों में आ जाता है. इसीलिए इस दिन से विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, और नए कार्यों की शुरुआत जैसे सभी मांगलिक कार्य बिना किसी मुहूर्त के शुरू हो जाते हैं, हालांकि पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त देखना श्रेष्ठ होता है. तुलसी विवाह: इस दिन तुलसी और शालिग्राम (भगवान विष्णु का पाषाण स्वरूप) का विवाह कराया जाता है. तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है और यह विवाह उनके जाग्रत होने की खुशी में आयोजित किया जाता है. पापों से मुक्ति: मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. यह व्रत सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का संचार करता है.

मंगल का महागोचर 27 अक्टूबर को, इन 5 राशियों के लिए है सतर्क रहने का समय

27 अक्टूबर को मंगल का गोचर वृश्चिक राशि में होने जा रहा है. मंगल का यह परिवर्तन बहुत ही खास माना जा रहा है क्योंकि वह अपनी ही राशि में प्रवेश करने वाले हैं. ज्योतिष शास्त्र में मंगल देवता को सभी ग्रहों का सेनापति माना जाता है. साथ ही, इनको साहस, पराक्रम, ऊर्जा, शक्ति, भूमि, संपत्ति और युद्ध जैसे विषयों का कारक भी माना जाता है.  जब कुंडली में मंगल की स्थिति शुभ होती है, तो व्यक्ति निडर और साहसी होता है. वहीं, मंगल की अशुभ स्थिति होने पर व्यक्ति को रक्त संबंधी समस्याएं और जीवन में कठिनाइयां आ सकती हैं. तो चलिए जानते हैं कि 27 अक्टूबर को होने जा रहे मंगल के गोचर से किन राशियों को सावधान रहने की जरूरत है. 1. मेष मंगल का गोचर मेष राशि वालों का आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ अहंकार भी बढ़ा सकता है. इस समय गुस्से पर नियंत्रण रखना जरूरी है. किसी विवाद या कानूनी मामले में न उलझें. कार्यक्षेत्र में झगड़े की स्थिति बन सकती है. वाहन चलाते समय सावधानी रखें और दुर्घटना की आशंका है. 2. वृषभ इस गोचर के दौरान खर्चो में अचानक बढ़ोतरी संभव है. कुछ पुराने निवेश नुकसान दे सकते हैं. पारिवारिक रिश्तों में टकराव या संवाद की कमी से मानसिक तनाव रह सकता है. सेहत के लिहाज से भी यह समय ठीक नहीं माना जा रहा है. धैर्य और संयम बनाए रखें. यात्रा के दौरान सावधानी रखें. जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें. व्यवसाय में पार्टनरशिप टूटने या झगड़े की स्थिति बन सकती है. 3. कर्क मंगल के गोचर से कार्यस्थल का माहौल आपके खिलाफ हो सकता है. सहकर्मियों से विवाद या बॉस से मतभेद संभव है. मानसिक दबाव बढ़ सकता है, जिससे नींद और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होंगे. घरेलू जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी, इसलिए खुद पर नियंत्रण रखना जरूरी है. पैसों से जुड़े नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है. 4. तुला मंगल का गोचर तुला राशि वालों के धन और आत्मसम्मान पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा. खर्च बढ़ेंगे और आय में रुकावट आएगी. क्रोध से निर्णय गलत हो सकता है. व्यापार में उतार-चढ़ाव रहेगा. घर के लोगों के साथ मतभेद संभव हैं. संयम और बचत से ही राहत मिलेगी. गुस्से में कोई कदम न उठाएं, वरना स्थिति बिगड़ सकती है.  5. धनु   इस गोचर से आपके खर्च और मानसिक शांति दोनों प्रभावित हो सकते हैं. धन से जुड़ी योजनाएं बिगड़ सकती हैं. और फालतू खर्चो में इजाफा होगा. कोई पुराना निवेश नुकसान दे सकता है. परिवार में भी किसी छोटी बात को लेकर मतभेद हो सकता है.

25 अक्टूबर 2025 का राशिफल: मकर राशि पर किस्मत मेहरबान, जानें सभी 12 राशियों का भविष्यफल

मेष राशि- आज के दिन आप कई कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन खुद की देखभाल को प्राथमिकता देना आवश्यक है। धैर्य और क्रिएटिविटी पर जोर देना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि सभी योजनाएं उम्मीद के मुताबिक सामने नहीं आएंगी। वृषभ राशि- आज के दिन आज सफलता के अर्थ पर विचार कर सकते हैं। अपनी इच्छाओं को प्राप्त करना संतुष्टि देता है। आज इस बात पर गौर करें की आपके लक्ष्य आपकी वास्तविक जरूरतों और इच्छाओं के साथ संरेखित हो रहे या नहीं। मिथुन राशि- आज के दिन याद रखें कि संतुष्टि ऐसे विकल्प चुनने से आती है, जो आपके लक्ष्य के अनुरूप हों। आप वास्तव में जो चाहते हैं उस पर ध्यान देकर आप जीवन के नए अवसरों से गुजरने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होंगे। कर्क राशि- आज के दिन याद रखें अपने रिश्ते को मजबूत करना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना। अपने गोल्स पर फोकस करने के लिए समय निकालें और उस पर ध्यान केंद्रित करें, जो वास्तव में आपके लिए मायने रखता है। सिंह राशि- आज के दिन अपने इंट्यूशन पर भरोसा करें और उन रिस्क के बारे में क्लियर रहें जिन्हें आप लेना चाहते हैं। अगर कुछ ज्यादा रिस्की लगता है तो दूसरों को काम सौंपने या हेल्प लेने में संकोच न करें। कन्या राशि- आज के दिन आपके रोमांटिक जीवन में शांति की हल्की हवा बहेगी। अगर आप इसे अकेले महसूस कर रहे हैं, तो उस व्यक्ति को अपनी भावनाओं को जाहिर क्यों न करें जिसका ध्यान आप चाहते हैं? तुला राशि- आज के दिन रोमांस को जीवित रखने के लिए अपनी फीलिंग्स जाहिर करें। चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कुछ बदलाव आपको परेशान कर सकते हैं, लेकिन सावधानी से आगे बढ़ना और अपने टास्क में समझदारी बरतना महत्वपूर्ण है। वृश्चिक राशि- आज के दिन रोमांचक जीवन जिएं, पार्टियों में जाएं, कोई नया शौक आजमाएं या ऑनलाइन डेटिंग के लिए साइन अप करें। खुद से प्यार करने पर ज्यादा ध्यान दें। काम पर फोकस करें। धनु राशि- आज के दिन काम और प्यार पर फोकस रहेगा। व्यस्त कार्यक्रम का सामना करते हुए एक साथ क्वालिटी टाइम बिताने पर फोकस करें। अपने कार्यभार के बारे में खुले रहें। एक-दूसरे के लक्ष्य को समझने से चीजें आसान हो जाएंगी। मकर राशि- आज के दिन तनाव कम लें। अगर कमिटेड हैं, तो अपना समय रिश्ते में निवेश करें ताकि चुनौतियों से निपटना आसान हो जाए। साथ में बिताए गए कुछ पल भी रिश्ते को मजबूत बना सकते हैं। कुंभ राशि- आज के दिन आप विलासिता की इच्छा महसूस कर सकते हैं। किसी अजनबी के साथ आपकी बात-चीत रोमांचकारी हो सकती है। तुरंत डीसीजन लेने से बचने के लिए सावधानी बरतें। मीन राशि- आज के दिन आपके प्रेम जीवन में बदलाव लाएगा। ब्रह्मांड आपको अपने बाहर निकलने और किसी आकर्षक व्यक्ति को खोजने का संकेत दे रहा है। अगर कमिटेड हैं, तो आपका रिश्ता तब मजबूत बनेगा, जब आप खुद को पैटर्न से मुक्त कर लेंगे

डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य: छठ व्रत के समय पूजा का महत्व

लोक आस्था का महापर्व छठ  25 अक्टूबर से ‘नहाय-खाय’ के साथ शुरू हो रहा है और 28 अक्टूबर को ‘उषा अर्घ्य’ के साथ इसका समापन होगा. चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में सूर्य देव और छठी मैया की उपासना की जाती है. इस पर्व की सबसे अनूठी और महत्वपूर्ण रीत है डूबते हुए सूर्य (संध्या अर्घ्य) और उगते हुए सूर्य (उषा अर्घ्य) को अर्घ्य देना. हिंदू धर्म में आमतौर पर उगते सूर्य को ही जल चढ़ाया जाता है, लेकिन छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें पहले अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य और फिर उदयगामी (उगते) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. आइए जानते हैं छठ पूजा में सुबह और शाम की पूजा में क्या अंतर है. छठ पूजा: शाम की पूजा (डूबते सूर्य को अर्घ्य) तीसरा दिन छठ पर्व के तीसरे दिन, यानी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे संध्या अर्घ्य भी कहते हैं. मान्यता है कि शाम के समय सूर्य देव अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की अंतिम किरण हैं. इसलिए इस अर्घ्य को प्रत्यूषा अर्घ्य भी कहा जाता है. डूबते सूर्य को अर्घ्य देना इस बात का प्रतीक है कि जीवन में हर उत्थान (उगने) के बाद पतन (डूबना) निश्चित है और हमें अपने जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करना चाहिए. इस अर्घ्य से भक्तों के जीवन से अंधकार दूर होता है. इस दिन व्रती महिलाएं और पुरुष कमर तक पानी में खड़े होकर, बांस के सूप या पीतल की टोकरी में फल, ठेकुआ, गन्ना आदि पूजा सामग्री रखकर अर्घ्य देते हैं. छठ पूजा: सुबह की पूजा (उगते सूर्य को अर्घ्य) चौथा दिन छठ पर्व के चौथे और अंतिम दिन, यानी सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि सूर्योदय के समय सूर्य देव अपनी पत्नी ऊषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की पहली किरण हैं और जिन्हें भोर की देवी भी कहा जाता है. इसलिए इसे उदयगामी अर्घ्य या ऊषा अर्घ्य कहते हैं. उगते सूर्य को अर्घ्य देना नवजीवन, वर्तमान और सुनहरे भविष्य का प्रतीक है. व्रती सूर्य देव से शक्ति, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और संतान के दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगते हैं. उदयगामी अर्घ्य देने के बाद ही छठ महापर्व का विधिवत समापन होता है और व्रती अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत खोलते हैं. इस दिन व्रती फिर से नदी या तालाब में खड़े होकर, सूर्य की पहली किरण को दूध और जल से अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्य देव की आराधना करते हैं. डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व माना जाता है कि संध्या अर्घ्य जहां जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की प्रार्थना है, वहीं उषा अर्घ्य सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और नए जीवन के आरंभ का प्रतीक है. इस प्रकार, छठ महापर्व न केवल सूर्य की उपासना का त्योहार है, बल्कि यह पवित्रता, अनुशासन, और जीवन के हर पड़ाव को सम्मान देने की भारतीय संस्कृति के गहरे मूल्यों को भी दर्शाता है.

घर और ऑफिस में तांबे का सूरज लगाएं, करें करियर और मान-सम्मान की वृद्धि

वास्तु के अनुसार घर की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए हम कई तरह के उपायों को आजमाना पसंद करते हैं। घर के हर एक कोने में हम वास्तु के अनुसार ही चीजों का प्लेसमेंट करते हैं, जिससे समृद्धि बनी रहे। ऐसी ही चीजों में से एक है घर में तांबे का सूरज लगाना। वास्तुशास्त्र के अनुसार, तांबे का सूरज घर में लगाना न केवल सौंदर्य बढ़ाता है बल्कि यह एक सकारात्मक और सशक्त वातावरण भी प्रदान करता है। तांबे का सूरज घर में लगाने के कई फायदे होते हैं। तांबा एक महत्वपूर्ण धातु है, जिसे सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। तांबे का सूरज घर के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करने से विशेष लाभ मिलता है। तांबा सूर्य का प्रतीक है, जो जीवन और ऊर्जा का स्रोत है। इसे घर में लगाने से घर में सकारात्मकता और जीवन शक्ति का संचार होता है। इससे परिवार के सदस्यों में स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि बढ़ती है। तांबा गर्मी को संतुलित करता है। यह घर के वातावरण को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। इस प्रकार घर में ताजगी और शांति बनी रहती है। तांबे का सूरज व्यक्ति की मनोबल को भी बढ़ाता है। यह आत्मविश्वास और ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक होता है, जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्यों को बेहतर तरीके से प्राप्त कर सकता है। वास्तु की मानें तो घर में तांबे का सूर्य पूरे घर के लिए ऊर्जा का एक उत्कृष्ट स्रोत माना जाता है। यदि आप सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक तांबे का सूरज घर में लगाते हैं तो आपके घर के चारों तरफ यश, र्कीति और खुशहाली बनी रहती है। तांबे को एक प्रभावशाली धातु के रूप में जाना जाता है और मान्यता है कि इस तरह का सूरज घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह घर के लोगों के बीच सामंजस्य बनाए रखने में मदद करता है और इससे निकलने वाली ऊर्जा वातावरण में समृद्धि जोड़ती है, जिससे पारिवारिक कलह से मुक्ति मिलती है। यदि आप लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं तो अपने घर में तांबे का सूर्य अवश्य लगाना चाहिए। यदि आप किसी कार्यस्थल पर इसे लगाते हैं तो यह सफलता दिलाने में मदद करता है।

युगों पुरानी छठ परंपरा की कहानी: जानें इसका आरंभ कहाँ हुआ

लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा कल से शुरू हो रही है. छठ पूजा छठी मैया और भगवान सूर्य को समर्पित की गई है. छठ पूजा में भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा की जाती है. ये महापर्व चार दिनों तक चलता. कल से शुरू होने वाली छठ पूजा का समापन 28 अक्टूबर को होगा. कल नहाय-खाय से ये महापर्व शुरू होगा. 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही महापर्व का समापन हो जाएगा. छठ पूजा वर्तमान में नहीं, बल्कि युगों से होती हुई चली आ रही है. छठ पूजा की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. छठ पूजा की शुरुआत बिहार एक जिले से हुई थी. आइए जानते हैं कि बिहार का वो कौनसा जिला है, जहां से छठ महापर्व की शुरुआत हुई? मुंगेर से हुई थी छठ पूजा की शुरुआत छठ पूजा की शुरुआत सबसे पहले बिहार के मुंगेर से हुई थी.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सीता ने सबसे पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर किया था. इसके बाद छठ महापर्व की शुरुआत हुई. वाल्मीकि और आनंद रामायण के अनुसार मुंगेर में माता सीता ने छह दिनों तक रहकर छठ पूजन किया था. दरअसल, भगवान राम को रावण वध का पाप लगा था. इस पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के कहने पर प्रभु ने फैसला किया वो राजसूय यज्ञ कराएंगे. इसके बाद मुग्दल ऋषि को आमंत्रण भेजा गया, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम और माता सीता आदेश दिया कि वो दोनों ही उनके आश्रम में आएं. इसके बाद बाद मुग्दल ऋषि ने माता सीता को सूर्य की अराधना करने की सलाह दी. मुग्दल ऋषि के कहने पर माता सीता ने व्रत किया. माता सीता ने की थी सूर्य देव की अराधना ऋषि के आदेश पर माता सीता ने कार्तिक मास की षष्ठी तिथि पर मुंगेर के बबुआ गंगा घाट के पश्चिमी तट पर भगवान सूर्य की अराधना की. सूर्य देव की अराधना के दौरान माता सीता ने अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर उदयगामी सूर्य को पूर्व दिशा की ओर अर्घ्य दिया था. जिस जगह पर माता सीता ने व्रत किया, वह सीता चारण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. इतना ही नहीं मंदिर के गर्भ गृह में पश्चिम और पूर्व दिशा की ओर माता सीता के चरणों के निशान आज भी मौजूद हैं. साथ ही शिलापट्ट पर सूप, डाला और लोटा के निशान हैं.

महिलाओं के लिए छठ का महत्व: कठिन व्रत में छिपा सुख और समर्पण

लोक आस्था का महापर्व ‘छठ पूजा’ न केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. यह चार दिवसीय व्रत कठोर तपस्या, प्रकृति प्रेम और सूर्य देव के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है. दिवाली के ठीक बाद, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तक मनाया जाने वाला यह पर्व महिलाओं द्वारा मुख्य रूप से अपनी संतान की लंबी आयु, परिवार के सुख-समृद्धि और मनोवांछित संतान की प्राप्ति के लिए रखा जाता है. आइए, जानते हैं कि महिलाएं क्यों रखती हैं यह कठिन व्रत और क्या है इसका महत्व. संतान सुख की कामना और छठी मैया का आशीर्वाद छठ व्रत का सबसे बड़ा और प्राथमिक महत्व संतान सुख से जुड़ा है. संतान की दीर्घायु और कुशलता: महिलाएं अपनी संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए यह 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं. संतान प्राप्ति का वरदान: यह व्रत नि:संतान दंपत्तियों के लिए भी बहुत लाभदायक माना जाता है. मान्यता है कि छठी मैया (षष्ठी देवी) की आराधना से उन्हें पुत्र या पुत्री रत्न की प्राप्ति होती है और उनकी सूनी गोद भर जाती है. छठी मैया कौन हैं? पौराणिक कथाओं के अनुसार, छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है. वे सृष्टि की रचना करने वाली देवी प्रकृति का छठा अंश हैं. यह भी मान्यता है कि ये सूर्य देव की बहन हैं, इसलिए छठ पर्व पर सूर्य के साथ छठी मैया की भी पूजा की जाती है. सूर्य देव की उपासना से आरोग्य और सौभाग्य छठ पूजा में प्रत्यक्ष देवता सूर्य देव की उपासना की जाती है. सूर्य को आरोग्य, ऊर्जा और जीवन का दाता माना गया है. स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति: सूर्य को आरोग्य का देवता कहा जाता है. छठ व्रत रखने से व्रतियों और उनके परिवार को उत्तम स्वास्थ्य, तेज और दीर्घायु की प्राप्ति होती है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी, सुबह और शाम के समय सूर्य को अर्घ्य देने से सूर्य की ऊर्जा शरीर को लाभ पहुंचाती है और रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है. सुख-समृद्धि और सौभाग्य: सूर्य देव को अर्घ्य देने से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए भी यह व्रत रखती हैं. छठ व्रत इतना कठिन क्यों? निर्जला व्रत (36 घंटे तक): यह व्रत लगभग 36 घंटों तक चलता है, जिसमें व्रती (व्रत रखने वाला) को न तो कुछ खाना होता है और न ही पानी पीना होता है. इतने लंबे समय तक बिना पानी के रहना शारीरिक सहनशक्ति की एक कठिन परीक्षा है. कठोर शुद्धता और नियम: छठ पर्व की शुरुआत से लेकर समापन तक शुद्धता और पवित्रता के बहुत कड़े नियम होते हैं, जिनका चार दिनों तक सख्ती से पालन करना होता है. इसमें व्रती को अपने हाथ से ही सारा काम करने की निष्ठा रखनी पड़ती है. ठंडे जल में खड़े होकर पूजा: कार्तिक मास की ठंडी ऋतु में व्रती को नदी, तालाब या घाट पर ठंडे जल में घंटों खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देना होता है, जो शारीरिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. चार दिनों का महापर्व: तिथियां 2025 छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है और समापन ‘उषा अर्घ्य’ के साथ होता है.     पहला दिन 25 अक्टूबर नहाय-खाय: नदी में स्नान और शुद्ध, सात्विक भोजन ग्रहण.     दूसरा दिन 26 अक्टूबर खरना: दिनभर उपवास, शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू.     तीसरा दिन 27 अक्टूबर संध्या अर्घ्य: डूबते सूर्य को अर्घ्य देना.     चौथा दिन 28 अक्टूबर उषा अर्घ्य: उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण (समापन) प्रकृति और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, जल और सूर्य की उपासना से जुड़ा लोक संस्कृति का अद्भुत पर्व है. इस दौरान घाटों को सजाया जाता है, पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं, और प्रसाद में ठेकुआ, चावल के लड्डू और मौसमी फलों का उपयोग होता है, जो शुद्धता और सादगी का प्रतीक है. यही कारण है कि यह महापर्व करोड़ों लोगों के लिए केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक, परिवार के कल्याण और प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक अनूठा माध्यम है.

जानें कौन सा घर का कोना है धनवृद्धि का मार्ग, बस रखें खाली फ्लावर पॉट

घर में खुशहाली और आर्थिक समृद्धि बनाए रखना हर किसी की इच्छा होती है। वास्तु शास्त्र में कुछ आसान लेकिन असरदार उपाय बताए गए हैं, जो जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। इनमें से एक सरल और प्रभावशाली तरीका है- घर के सही कोने में खास रंग का खाली फ्लावर पॉट रखना। यह न केवल घर की ऊर्जा को संतुलित करता है, बल्कि अनावश्यक खर्चों को कम करने में भी मदद करता है। बस दो छोटे उपायों को अपनाकर आप अपने घर और जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। फ्लावर पॉट के लिए सही कोने का चयन वास्तु के अनुसार, घर के उत्तर-पूर्वी या दक्षिण-पश्चिमी कोने में खाली फ्लावर पॉट रखना शुभ माना जाता है। यह कोना सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है और घर के वातावरण में संतुलन बनाता है। साथ ही घर-परिवार में खुशहाली और समृद्धि बनी रहती है। फ्लावर पॉट के लिए रंगों का महत्व वास्तु के अनुसार, फ्लावर पॉट का रंग भी बहुत मायने रखता है। इसलिए घर में खाली फ्लावर पॉट रखते समय रंगों का चयन करना भी बहुत जरूरी है। घर में सफेद, हरे, नीले रंग के फ्लावर पॉट रखने चाहिए क्योंकि यह शांति और मानसिक स्थिरता को स्थिर रखते हैं और धन, समृद्धि बढ़ाने में सहायक होते हैं। साथ ही इन रंगों के फ्लावर पॉट रखने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक स्पष्टता बनी रहती है।

भविष्य सफल बनाना है? तो तुरंत छोड़ें ये 5 आदतें

हर इंसान में कुछ अच्छी और कुछ बुरी आदतें होती है। लेकिन खुद को बेहतर इंसान बनाना चाहते हैं तो रोजाना की कुछ आदतों का ध्यान रखना जरूरी होता है क्योंकि यहीं वो आदते हैं जो हमें ना केवल हेल्दी बनाती हैं बल्कि लाइफ में आगे बढ़ने में मदद करती हैं। अगर आपके अंदर ये 5 तरह की आदतें हैं तो उन्हें फौरन छोड़ दें, ये आपकी ग्रोथ को रोकते हैं। दूसरों से तुलना दूसरों से खुद की तुलना करना सबसे बड़ी बुरी आदत है। क्योंकि ये ना केवल आपके मेंटल पीस को खत्म करता है बल्कि लाइफ में मिलने वाली संतुष्टि को खत्म करता है। कई बार दूसरों से तुलना के चक्कर में अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बजाय भटक जाते हैं। जल्दी से हार मान लेना अगर किसी काम में सफलता नहीं मिलती तो फौरन उस काम से हार मान लेना भी एक बुरी आदत है। क्योंकि ये आदत आपको सफल नहीं होने देती है। अगर आप चाहते हैं कि खुद को बेहतर इंसान बनाएं तो आसानी से हार मानने की बजाय बार-बार कोशिश करें। काम टालने की आदत अगर आप भी आज के काम को कल पर टालते हैं तो ये आदत फौरन छोड़ दें। ये आदत आपको बाकी लोगों से पीछे छोड़ देगी क्योंकि आपके कई काम अधूरे होंगे। हमेशा परफेक्ट होने की चाह अगर आपको हर चीज सही समय पर और बिल्कुल परफेक्ट चाहिए तो इस आदत को भी छोड़ दें। कई बार सही समय आने का इंतजार करने के चक्कर में आप नई चीजों को शुरू नहीं करते। हमेशा शिकायत करना सुनकर काफी नॉर्मल सी बात लगती है लेकिन अगर आप लोगों की कंप्लेन करते हैं। तो धीरे-धीरे ये आपकी आदत बन जाती है और आप दूसरों के निगेटिव साइड पर ज्यादा फोकस करने लगते हैं।  

तुलसी के ये उपाय कार्तिक मास में करेंगे आपको मालामाल!

कार्तिक का महीना व्रतों और त्योहारों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होता है. इस माह में करवा चौथ, धनतेरस और दिवाली जैसे त्योहार मनाए जाते हैं. देवउठनी एकादशी भी इसी माह में पड़ती है. जब भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं और चतुर्मास का समापन होता है, जिसके बाद विवाह समेत तमाम मांगलिक कामों की शुरुआत हो जाती है. कार्तिक माह भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है. इस माह में भगवान विष्णु का विधि-विधान से पूजन किया जाता है. इस माह में भगवान विष्णु के साथ माता तुलसी की भी पूजी जाती है. माता तुलसी देवी लक्ष्मी का स्वरूप मानी जाती हैं. ऐसे में इस माह में उनकी पूजा का विशेष महत्व धर्म शास्त्रों में बताया गया है. कार्तिक मास में तुलसी पूजन और कुछ विशेष उपाय करने से माता लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और धन संपदा बढ़ती है. वैदिंक पंचांग के अनुसार, इस साल आठ अक्टूबर से कार्तिक के महीने की शुरुआत हो चुकी है. ये कार्तिक मास अगले महीने पांच नवंबर तक रहेगा. तुलसी के उपाय जल चढ़ाएं कार्तिक मास में रोज जल चढ़ाना चाहिए. ऐसा करना शुभ होता है. इससे माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, लेकिन द्वादशी तिथि को जल नहीं चढ़ाना चाहिए. तुलसी के सामने दीपक जलाएं कार्तिक के पूरे महीने के दौरान तुलसी के सामने घी का दीपक अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए. ऐसा शाम के समय में करना चाहिए. तुलसी पर दूध चढ़ाएं कार्तिक माह में रोजाना जल में थोड़ा सा दूध डालकर माता तुलसी को चढ़ाना चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से आर्थिक तंजी से छुटकारा मिल जाता है. तुलसी पर चढ़ाएं 16 श्रृंगार कार्तिक मास में तुलसी माता को चुनरी चढ़ानी चाहिए. साथ ही 16 श्रृंगार का सामान भी अर्पित करना चाहिए. ऐसा करने से दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है. तुलसी की मिट्टी कार्तिक मास में तुलसी को जल देने के बाद रोजाना उनके जड़ की थोड़ी सी मिट्टी अपने माथे और नाभि पर लगानी चाहिए. ऐसा करने माता तुलसी आशीर्वाद देती हैं.