samacharsecretary.com

श्रद्धा का प्रतीक बेलपत्र: क्यों महादेव को अति प्रिय है यह पत्ता, क्या है जन्म कथा

हिंदू धर्म में बेलपत्र (बिल्व पत्र) को भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्र माना जाता है। शिव पूजा बेलपत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। इसे शिवद्रुम भी कहा जाता है। बेलपत्र के तीन पत्ते त्रिशूल और त्रिनेत्र का प्रतीक हैं। शास्त्रों में बेलपत्र को मोक्षदायी बताया गया है। मान्यता है कि अगर किसी की शवयात्रा बेल वृक्ष की छाया से गुजर जाए, तो उसे मोक्ष मिल जाता है। बेल वृक्ष को सींचने से पितरों को तृप्ति मिलती है। लिंग पुराण के अनुसार, बेल वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु, शाखाओं में ऋषि-मुनि और पत्तियों में शिव का वास है। इसलिए बेलपत्र अर्पित करना त्रिदेवों की संयुक्त पूजा के समान फल देता है। लेकिन भगवान शिव को बेलपत्र इतना प्रिय क्यों है? इसका जवाब जानने के लिए बेलपत्र की पौराणिक उत्पत्ति की कहानी जाननी जरूरी है। बेलपत्र की पौराणिक उत्पत्ति कथा शिवपुराण और अन्य पुराणों में बेलपत्र की उत्पत्ति की कथा वर्णित है। एक बार देवी पार्वती तपस्या में लीन थीं। तपस्या के दौरान उनके शरीर से पसीने की बूंदें धरती पर गिरीं। उन्हीं बूंदों से बेल वृक्ष की उत्पत्ति हुई। चूंकि बेल वृक्ष माता पार्वती के पसीने से उत्पन्न हुआ, इसलिए इसमें माता पार्वती के अनेक दिव्य स्वरूपों का वास माना गया है। जड़ में माता गिरिजा, तने में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षिणायनी, पत्तियों में स्वयं पार्वती, फलों में कात्यायनी और फूलों में माता गौरी का रूप निवास करता है। इतना ही नहीं, इस वृक्ष में मां लक्ष्मी की कृपा भी व्याप्त है। इस कारण बेलपत्र को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना गया। भगवान शिव को बेलपत्र क्यों इतना प्रिय है? बेलपत्र में माता पार्वती का अंश होने के कारण यह भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। शिव-पार्वती की संयुक्त ऊर्जा का प्रतीक होने से बेलपत्र चढ़ाने पर शिव-पार्वती दोनों प्रसन्न होते हैं। शिवपुराण में कहा गया है कि बेलपत्र चढ़ाने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। बेलपत्र के तीन पत्ते त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक हैं। इसे अर्पित करना त्रिदेवों की पूजा के समान फल देता है। जो भक्त श्रद्धा से बेलपत्र चढ़ाता है, उसे पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और कालसर्प दोष से छुटकारा मिलता है। शिव जी को बेलपत्र इसलिए प्रिय है, क्योंकि यह माता पार्वती का अंश है और शिव-पार्वती का प्रेम इस पत्र में समाहित है। बेलपत्र का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बेलपत्र पाप नाशक और मोक्षदायी माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि बेलपत्र चढ़ाने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं। अगर किसी की शवयात्रा बेल वृक्ष की छाया से गुजर जाए, तो उसे मोक्ष प्राप्ति होती है। बेल वृक्ष को सींचने से पितरों को तृप्ति मिलती है और पितृ दोष दूर होता है। आयुर्वेद में भी बेल वृक्ष को औषधीय माना गया है। बेल का फल पाचन तंत्र को मजबूत करता है, पेट रोगों में लाभकारी है और पत्ते-जड़ भी औषधीय गुणों से युक्त हैं। बेलपत्र चढ़ाने से ग्रह बाधाएं, कालसर्प दोष और शनि-राहु के प्रभाव शांत होते हैं। यह पत्र शिव भक्ति का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है। बेलपत्र चढ़ाने की विधि और लाभ बेलपत्र चढ़ाने की विधि बहुत सरल है। शिवलिंग पर बेलपत्र उल्टी तरफ (तने की ओर) चढ़ाएं। तीन पत्ते एक साथ चढ़ाने चाहिए। श्रावण मास में रोज बेलपत्र चढ़ाने से विशेष फल मिलता है। अगर तीर्थ यात्रा ना कर पाएं, तो श्रावण में बेल वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करने से समस्त तीर्थों का पुण्य मिलता है। बेलपत्र चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं, पाप नष्ट होते हैं और शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। यह पत्र भक्त को मोक्ष मार्ग पर ले जाता है। भगवान शिव को बेलपत्र इसलिए प्रिय है, क्योंकि यह माता पार्वती के पसीने से उत्पन्न हुआ और शिव-पार्वती की संयुक्त ऊर्जा का प्रतीक है। श्रद्धा से बेलपत्र चढ़ाएं तो जीवन में सुख, शांति और मोक्ष प्राप्ति होती है।

गंडमूल नक्षत्र का रहस्य: जन्म के बाद 27 दिनों तक पिता-दर्शन क्यों वर्जित?

हिंदू ज्योतिष और मान्यताओं में गंडमूल नक्षत्र का विशेष महत्व माना गया है. जब भी किसी घर में बच्चे की किलकारी गूंजती है, तो खुशियों के साथ-साथ ग्रह-नक्षत्रों की गणना भी शुरू हो जाती है. इसी गणना में अगर गंडमूल का जिक्र आता है, तो अक्सर बड़े-बुजुर्ग पिता को बच्चे का चेहरा 27 दिन तक देखने से मना कर देते हैं. आइए जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे की असल कहानी क्या है और इसमें पिता की ममता और ज्योतिष का क्या मेल है. क्या होते हैं गंडमूल नक्षत्र? ज्योतिष शास्त्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं. इनमें से 6 नक्षत्रों को गंडमूल नक्षत्र की श्रेणी में रखा गया है, अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती. माना जाता है कि जब राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त हो रहे हों और नए शुरू हो रहे हों (संधि काल), तो उस समय पैदा होने वाले बच्चों पर ग्रहों का प्रभाव थोड़ा भारी होता है. इसे ही गंड दोष कहा जाता है. पिता को चेहरा न दिखाने के पीछे का तर्क! अनिष्ट की आशंका: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन नक्षत्रों में जन्मे बच्चे का तेज इतना प्रबल और अलग होता है कि यदि पिता तुरंत उसे देख ले, तो पिता के स्वास्थ्य, मान-सम्मान या आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ सकता है. 27 दिनों का विज्ञान: चंद्रमा को सभी 27 नक्षत्रों का चक्र पूरा करने में लगभग 27 दिन लगते हैं. जब 27 दिन बाद वही नक्षत्र दोबारा आता है जिसमें बच्चे का जन्म हुआ था, तब गंडमूल शांति पूजा की जाती है. इस पूजा के बाद ही ग्रह शांत माने जाते हैं और पिता-पुत्र का मिलन शुभ माना जाता है. भावनात्मक सुरक्षा: पुराने समय में इस नियम को इसलिए भी कड़ाई से माना जाता था ताकि परिवार पूरी सावधानी बरते और बच्चे व पिता के बीच एक सुरक्षा कवच बना रहे. क्या वाकई यह डराने वाली बात है? आज के आधुनिक दौर में कई लोग इसे अंधविश्वास मान सकते हैं, लेकिन गंडमूल में जन्मा बच्चा अशुभ नहीं होता होता है बस ज्योतिष के जानकार इसे सावधानी का नाम देते हैं. पूजा और समाधान नक्षत्र शांति: इसके नकारात्मक प्रभाव को दूर करने के लिए 27वें दिन मूल शांति’ या ‘सतैसा पूजा की जाती है. दान-पुण्य: इस दौरान छाया दान कांसे की कटोरी में घी भरकर चेहरा देखना और दान करना का विशेष महत्व है. पिता का मिलन: पूजा पूरी होने के बाद पिता शुभ मुहूर्त में अपने बच्चे को देख सकते हैं और उसे अपनी गोद में ले सकते हैं.

17 फरवरी 2026 को पहला सूर्य ग्रहण, धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में, जानें भारत में सूतक काल की स्थिति

 नई दिल्ली Surya Grahan 2026: साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण आज से ठीक एक महीने बाद यानी 17 फरवरी को लगने वाला है. यह सूर्य ग्रहण धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में लगने वाला है. ज्योतिषविदों का कहना है कि यह एक कंकण सूर्य ग्रहण होगा. इसे वलयाकार सूर्य ग्रहण भी कहा जाता है. इस तरह के ग्रहण में चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के ठीक बीच में आ जाता है, लेकिन वो सूर्य को पूरी तरह नहीं ढक पाता है, जिससे सूर्य एक चमकदार कंगन की तरह प्रतीत होने लगता है. खगोलविदों की भाषा में इसे रिंग ऑफ फायर भी कहते हैं. आइए जानते हैं कि इस ग्रहण का भारत पर क्या प्रभाव रहने वाला है. कितने बजे लगेगा सूर्य ग्रहण? साल का यह पहला सूर्य ग्रहण भारतीय समयानुसार, 17 फरवरी को दोपहर 03.56 बजे से लेकर शाम 07.57 बजे तक रहने वाला है.  क्या भारत में दिखेगा सूर्य ग्रहण? साल का यह पहला सूर्य ग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा. इसलिए भारतवर्ष पर इसका कोई खास प्रभाव भी नहीं रहने वाला है क्या भारत में लगेगा सूतक काल? सूर्य ग्रहण से ठीक 12 घंटे पहले सूतक काल मान्य हो जाता है. इस दौरान पूजा-पाठ और खान-पान जैसी चीजें वर्जित होती हैं. इतना ही नहीं, सूतक काल में मंदिरों के कपाट भी बंद रहते हैं और भगवान की प्रतिमा का स्पर्श वर्जित माना गया है. हालांकि सूतक तभी मान्य होता है, जब ग्रहण भारत में दृश्यमान हो. चूंकि आगामी सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिख रहा, इसलिए इसका सूतक काल भी यहां मान्य नहीं होगा. कहां-कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण? यह सूर्य ग्रहण दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अर्जेंटीना और अंटार्कटिका के क्षेत्रों में देखा जा सकेगा. यह वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें सूर्य के चारों ओर आग की अंगूठी जैसी आकृति दिखाई देगी. 2026 के तीन अन्य ग्रहण कब कब लगेंगे? दूसरा सूर्य ग्रहण: 12 अगस्त वर्ष का दूसरा सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026, बुधवार को लगेगा. यह पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें सूर्य पूरी तरह ढक जाएगा. भारत में यह दृश्य नहीं होगा, क्योंकि उस समय यहां रात्रि होगी. यह ग्रहण आर्कटिक, ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन, रूस और पुर्तगाल में देखा जाएगा. पहला चंद्र ग्रहण: 3 मार्च 2026 का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च, मंगलवार को होली के संयोग में लगने वाला है. यह ग्रहण भारत सहित एशिया के कई देशों में दिखाई देगा. इस ग्रहण का सूतक काल भी भारत में मान्य होगा. यह एक खंडग्रास चंद्र ग्रहण होगा, जिसे ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका समेत के क्षेत्रों में भी देखा जा सकेगा. दूसरा चंद्र ग्रहण: 28 अगस्त साल 2026 का दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को पड़ेगा. यह भारत में दृश्य नहीं होगा, लेकिन उत्तर और दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में दिखाई देगा.

कामयाबी की राह: भगवद् गीता के 5 श्लोक जो हर किसी को याद रखने चाहिए

कुछ लोगों के लिए सक्सेज पाना सपने के जैसा होता है। क्योंकि वो लाइफ में ज्यादातर कामों में फेलियर का सामना करते हैं और निराश रहते हैं। ऐसे निराश और हताश लोगों को अपनी आदतों में सुधार के साथ ही भगवद्गीता के इन श्लोकों को पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि यहीं वो श्लोक हैं जो लाइफ में सक्सेज पाने और उसे बरकरार रखने में मदद करते हैं। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन कर्म करो फल की चिंता ना करो। ये श्लोक उन लोगों के लिए बेहद जरूरी है जो हर वक्त रिजल्ट की चिंता करते हैं। जिसकी वजह से ठीक तरीके से परफार्मेंस पर फोकस नहीं कर पाते। भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि हमेशा अपनी परफार्मेंस को अच्छा करने की चिंता करनी चाहिए। फल की चिंता में परफार्मेंस को बिल्कुल नहीं खराब होने देना चाहिए। बदलाव प्रकृति का नियम है गीता में कहा गया है कि इस दुनिया में कुछ भी परमानेंट नही है। जो आज है वो कल नहीं होगा। आप हमेशा सफल बने रहो ऐसा जरूरी नहीं। कई बार सफल होने के बाद आपको फेलियर का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिए मन में किसी तरह के तनाव को लेना नहीं चाहिए बल्कि अपने काम पर फोकस करना चाहिए। डर का त्याग जरूरी है गीता में कहा गया है कि हमेशा निडर होकर अपने काम को करना चाहिए। किसी सपने को पूरा करने के लिए आगे बढ़कर कोशिश करनी चाहिए। फेलियर के डर से पीछे नहीं हटना चाहिए। किसी काम को शुरू करने के लिए पहली जरूर हिम्मत की भी होती है। फिर चाहे वो करियर में हो या फिर लाइफ में। फेल होने, नयी चीजों को सीखने और फिर आगे बढ़ने के लिए साहस जरूरी है। जिस दिन फेलियर का डर छोड़कर आगे बढ़ेंगे उसी दिन सक्सेज मिलेगी। सक्सेज केवल पर्सनल नहीं होती कई बार खुद के बारे में सोचने से ऊपर उठकर सोसायटी और फैमिली के बारे में सोचने की जरूरत होती है। जब आप दूसरों के लिए कुछ करते हैं तो मन में गर्व के साथ संतुष्टि की फीलिंग आती है और ये भी एक सक्सेज ही है। जो आपको पावरफुल बनाती है। मन को जीतने वाले के लिए मन ही मित्र है जिस इंसान में मन को कंट्रोल नहीं किया उसके लिए मन किसी दुश्मन की तरह है। वहीं जो मन को अपने वश में कर लेता है, मन उसका फ्रेंड बन जाता है। जिसकी मदद से वो हर सफलता पा सकता है। खुद पर शंका करना, डरना और आलस जैसी बाधाओं को दूर भगा लेता है वहीं सक्सेज पाता है।  

मुठ्ठी भर चावल से दूर होगी पैसों से जुड़ी दिक्कत

कई बार ऐसा होता है ना कि अच्छी-खासी कमाई होने के बावजूद भी पैसा हाथ में टिक नहीं पाता है। इसके पीछे कई तरह की वजहें जैसे फालतू के खर्चे, गलत आर्थिक फैसले या घर की नकारात्मक ऊर्जा। अगर आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो फेंगशुई का एक बहुत ही आसान सा उपाय इस समस्या को दूर करने में आपकी मदद कर सकता है। फेंगशुई के अनुसार घर में रखी हुई छोटी से छोटी हर एक चीज हमें प्रभावित करती है। सही जगह पर रखी गई चीजें पॉजिटिविटी लेकर आती हैं। तो वहीं चीजों का गलत प्लेसमेंट धन हानि और पैसों की तमाम दिक्कत लेकर आती है। अगर आप बार-बार पैसों की तंगी या धन हानि जैसी समस्या से जूझते आ रहे हैं तो अब फेंगशुई की मदद से जिंदगी में पॉजिटिव बदलाव ला सकता है। फेंगशुई का आसान उपाय फेंगशुई के इस उपाय से आप आसानी से पैसे की बर्बादी या फिर फालतू के खर्चे पर लगाम लगा सकते है। नियम के अनुसार मुठ्ठी भर चावल को एक लाल रंग के कपड़े में बांध लें। इस बात का ध्यान रखें की ये कपड़ा साफ हो और नया हो। चावल को बांधने के बाद इसे अपने घर के मेनगेट के आगे कहीं पर टांग दें। फेंगशुई के नियम के हिसाब से इसे आप बाईं ओर ही टांगें। मान्यता है कि इस दिशा में धन को रोकने या बांधने की शक्ति होती है। घर का ये हिस्सा धन स्थान का रिप्रेजेंट करता है। चावल की मदद से घर में मौजूद किसी भी तरह की नेगेटिविटी दूर हो जाएगी। साथ ही ये धन संबंधी हर तरह की दिक्कत को जिंदगी से निकाल फेंकेगा। चावल वाली पोटली को एक हफ्ते तक वहां रहने दें। इसके बाद इसे घर के बाहर किसी पेड़ के पास रख दें। मेनगेट पर लगा सकते हैं ये चीजें इसके अलावा आप मेनगेट पर कुछ और चीजें लगातार अपने घर की नेगेटिविटी को दूर कर सकते हैं। विंड चाइम की मदद से भी आप घर में मौजूद बुरी नजर और नेगेटिविटी को आसानी से बाहर कर सकते हैं। साथ ही यहां पर मनी प्लांट या बैंबू प्लांट लगाना भी सही होता है। इसके अलावा आप मेनगेट के ऊपर एक छोटा सा शीशा रख सकते हैं। इससे घर के बाहर मौजूद नेगेटिविटी कभी भी अंदर नहीं आ पाएगी। डिस्क्लेमर- इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं।

हनुमान चालीसा पढ़ते वक्त एकाग्रता सहित 10 नियमों का करें पालन

शनिवार और मंगलवार को लोग बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। कहते हैं कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं। ऐसे में जो भक्त सच्ची श्रद्धा बजरंगबली को याद करता है उनकी पूजा करता है उनपर हनुमान जी की विशेष कृपा बरसती है, पलभर में संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन हनुमान चालीसा का पाठ यदि नियम से किया जाए, तो ही इसका फल प्राप्त होता है। वरना गलत तरीके से किए गए पाठ से बजरंगबली नाराज हो जाते हैं। जैसे कि गलत स्थान व गलत समय पर पाठ करना आदि। चलिए जानते हैं कि हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किन गलतियों से बचना चाहिए। हनुमान चालीसा के दौरान ना करें ये गलतियां – हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किसी भी तरह की नकारात्मकता अपने दिल में नहीं लानी चाहिए। -जो लोग निर्बलों को बिना बात के सताते हैं, उन पर कभी भी हनुमान जी की कृपा नहीं बरसती है। – हनुमान चालीसा का पाठ करते समय साधक को किसी भी व्यक्ति से बातचीत नहीं करनी चाहिए। – कुछ समय ऐसे भी हैं जब हनुमान चालीसा का पाठ नहीं करना चाहिए। सूर्यास्त के तुरंत बाद पाठ करने से बचना चाहिए। – गुस्से, चिड़चिड़े मन या मानसिक अशांति की अवस्था में भी पाठ नहीं करना चाहिए। – बिना स्नान, अशुद्ध अवस्था, जल्दबाजी या दोपहर के समय किया गया पाठ भी फलदायी नहीं माना जाता। हनुमान चालीसा पाठ के 10 जरूरी नियम 1. हनुमान चालीसा पाठ में साफ-सफाई और पवित्रता का खास ख्याल रखना चाहिए। ऐसे में जहां आप हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं या पूजा स्थल की साफ-सफाई अच्‍छे से कर लें। 2. हनुमान चालीसा का पाठ हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। इसके लिए सुबह और शाम का समय परफेक्ट रहता है। 3. हनुमान चालीसा के पाठ के दौरान उपयोग किए गए फूल लाल रंग के रखें। 4. हनुमान चालीसा के पाठ के पहले बजरंगबली के सामने दीपक जरूर जलानी करना चाहिए। 5. ध्यान रखें कि दीपक में जो बाती लगा रहे हैं, वह भी लाल सूत (धागे) की होनी चाहिए। आप दीपक में चमेली का तेल या शुद्ध घी का इस्तेमाल होनी चाहिए। 6. हनुमानजी चालीसा के पाठ के बाद उन्हें गुड़ और चने का प्रसाद जरूर ‍अर्पित करें। 7. आप केसरिया बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, चूरमा, मालपुआ या मलाई मिश्री का भोग भी लगा सकते हैं। 8. हनुमान चालीसा पाठ के दौरान सिर्फ एक वस्त्र पहनकर ही चालीसा का पाठ करें या उनकी पूजा करें। 9. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनिवार या रविवार के दिन 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। 10. अगर आप 100 बार नहीं कर सकते हैं, तो आप 11, 9, 5, 3 या 1 बार शनिवार, मंगलवार या फिर रोज कर सकते हैं।

तुलसी के 5 संकेत बदल सकते हैं किस्मत

नई दिल्ली. तुलसी का पौधा हर घर की आत्मा माना जाता है। यह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि वास्तु और स्वास्थ्य के नजरिए से भी बेहद अहम है। अक्सर हम देखते हैं कि कभी तुलसी अचानक हरी-भरी हो जाती है, तो कभी बिना किसी कारण के सूखने लगती है। मान्यताओं के अनुसार, तुलसी के ये बदलाव हमारे जीवन में आने वाली खुशियों या परेशानियों का पहले ही संकेत दे देते हैं। यहां तुलसी के पौधे से जुड़े उन शुभ संकेतों और नियमों के बारे में बताया गया है, जो घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी की कृपा लाते हैं: 1. तुलसी का अचानक हरा-भरा होना अगर आपके आंगन में लगी तुलसी अचानक बहुत ज्यादा हरी-भरी और घनी हो गई है, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ रहा है और जल्द ही आपको कोई अच्छी खबर या धन लाभ मिल सकता है। 2. मंजरियों का आना तुलसी के पौधे पर मंजरी आना शुभ माना जाता है, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर मंजरी बहुत ज्यादा हो जाएं, तो उन्हें समय-समय पर हटाकर भगवान विष्णु को अर्पित कर देना चाहिए। कहा जाता है कि बहुत ज्यादा मंजरी पौधे पर रहने से तुलसी 'तनाव' महसूस करती है, और उन्हें हटाने से घर का बोझ कम होता है। 3. पक्षियों का आगमन अगर आपके घर की तुलसी पर चिड़ियां या अन्य पक्षी आकर बैठते हैं और चहचहाते हैं, तो समझ लीजिए कि आपके घर में खुशहाली का समय आने वाला है। पक्षियों का तुलसी के पास आना वातावरण के शुद्ध और मंगलमय होने का प्रतीक माना जाता है। 4. तुलसी के पास छोटे पौधों का उगना अगर मुख्य तुलसी के गमले के आसपास अपने आप छोटे-छोटे तुलसी के पौधे उगने लगें, तो यह वंश वृद्धि और सौभाग्य का सूचक है। यह दर्शाता है कि देवी लक्ष्मी आपसे प्रसन्न हैं। तुलसी की देखभाल के जरूरी नियम दिशा का चुनाव: तुलसी को हमेशा उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में लगाना चाहिए। इस दिशा में रखने से घर में सुख-शांति बनी रहती है। शाम का दीपक: रोजाना शाम को तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। विशेष दिनों का ध्यान: एकादशी, रविवार और सूर्य ग्रहण के दिन तुलसी को जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही इसके पत्ते तोड़ने चाहिए।

ज्योतिष अलर्ट: शनि जब इन 7 ग्रहों के साथ आते हैं तो शुरू होती हैं समस्याएं और बीमारियां

शनि ग्रह का गोचर और उनकी अन्य ग्रहों के साथ युति किसी व्यक्ति के जीवन में तमाम पहलुओं पर गहरा प्रभाव डालती है. इसमें स्वास्थ्य, रिश्ते और आर्थिक स्थिति भी शामिल है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि लगभग ढाई वर्ष तक एक राशि में रहते हैं. प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. बसवराज गुरुजी ने इस अवधि के दौरान शनि के साथ अन्य ग्रहों की युति होने पर पड़ने वाले प्रभावों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में जानकारी दी है. उनका कहना है कि ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक जब शनि अकेले प्रभाव में होते हैं, तो इससे गठिया रोग, तंत्रिका संबंधी कमजोरी, कमजोरी, पक्षाघात, गुर्दे और यकृत की विफलता, अस्थमा, श्वसन संबंधी समस्याएं, निमोनिया, तेज बुखार, बेहोशी, बालों का झड़ना, अपच और व्यसनों की ओर झुकाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. जब अन्य ग्रह शनि के साथ युति बनाते हैं तो भी तमाम तरह के विशिष्ट प्रभाव पड़ते हैं. आइए जानते हैं कि किस ग्रह के साथ युति बनाने पर कौन-कौन समस्या हो सकती है? शनि और सूर्य की युति जब सूर्य और शनि एक साथ युति में होते हैं, तो शरीर में कमजोरी, दृष्टिहीनता, सुस्ती और उत्साह की कमी होती है. वरिष्ठों से परेशानी, ससुर या ससुर से दूरी या उनकी बीमारी की चिंता, अत्यधिक खर्च और मानसिक शांति का ह्रास हो सकता है. शनि और चंद्रमा की युति जब चंद्रमा शनि के साथ युति बनाते हैं तो मतिभ्रम, सीने में दर्द, एनीमिया, चेहरे की चमक में कमी, चेहरे पर मुंहासे, सुस्ती और रुचि की कमी हो सकती है. शनि और बुध की युति जब बुध और शनि एक साथ युति में होते हैं तो हकलाना, त्वचा रोग, कान में दर्द और कान से स्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं. छोटे बच्चों के लिए बुध को शांत कराना उचित होता है. शनि और बृहस्पति की युति जब बृहस्पति और शनि एक साथ युति में होते हैं तो पाचन संबंधी समस्याएं, अत्यधिक बुद्धि, अजीब व्यवहार, स्मृति हानि और भोजन के प्रति उदासीनता हो सकती है. शनि और शुक्र की युति जब शुक्र और शनि एक साथ युति में होते हैं तो गले में खराश, प्रतिभा में कमी, टॉन्सिल की समस्या, बवासीर और छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. शनि और राहु की युति जब राहु शनि के साथ युति में होते हैं तो जहर, बांझपन और हड्डियों में दर्द का डर हो सकता है. साथ ही, यह डर भी हो सकता है कि खाया गया भोजन जहर में परिवर्तित हो जाएगा. शनि और केतु की युति जब केतु शनि के साथ युति में होते हैं तो इससे रक्तचाप (बीपी), रक्त संबंधी समस्याएं और शरीर में हर तरह का दर्द हो सकता है. गुरुजी ने सलाह दी है कि ज्योतिष से संबंधित इन सभी समस्याओं के लिए चिकित्सा उपचार के साथ-साथ संबंधित ग्रहों की शांति पूजा करना जरूरी है.

रुद्राक्ष पहनने की सोच रहे हैं? पहले पढ़ें ये नियम, वरना हो सकता है नुकसान

रुद्राक्ष बहुत ही पवित्र माना जाता है. लोग इसकी माला पहनते हैं. रुद्राक्ष को धारण करने के लाभ बताए गए हैं. शास्त्रों के अनुसार, रुद्राक्ष की माला का जाप बहुत फलदायी माना जाता है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, रुद्राक्ष की माला का जप करने से कई गुना अधिक फल मिलता है. इस माला का जप करने से अध्यात्मिक उन्नति होती है. रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई बताई जाती है. इसको धारण करने से बहुत से लाभ होते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसे धारण करने के नियम भी बताए गए हैं. इसे शास्त्रों में बताए नियम से ही धारण करना चाहिए. अन्यथा लाभ के स्थान पर नुकसान भी हो सकता है. इस तरह करें रुद्राक्ष धारण रुद्राक्ष को बाजार से लाकर सीधा ही कभी धारण न करें, बल्कि पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करें. उसके बाद इसको धारण करें. शुभ मुहूर्त में 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करें और इसकी प्राण प्रतिष्ठा करें या फिर मंदिर में शिवलिंग से इसको स्पर्श कराएं. फिर रुद्राक्ष को धारण करें. इन बातों का रखें ध्यान रुद्राक्ष धारण करने से पहले शुभ दिन अवश्य देखें. शास्त्रों में बताया गया है कि रुद्राक्ष धारण करने के लिए अमावस्या, पूर्णिमा, सावन, सोमवार या शिवरात्रि का दिन सबसे उत्तम माना जाता है. इसके साथ ही रुद्राक्ष को हमेशा साफ रखें. इतना ही नहीं कभी भी अपना पहना हुआ रुद्राक्ष किसी दूसरे को नहीं दें और ना ही किसी का रुद्राक्ष स्वयं लें. अगर आप इन नियमों की अनदेखी करते हैं, तो आपको रुद्राक्ष के लाभ की जगह अशुभ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं. रुद्राक्ष धारण करने के लाभ नियमानुसार रुद्राक्ष धारण करने से भगवान शिव की कृपा मिलती है. साथ ही यह मन को शांत रखता है. रुद्राक्ष धारण करने से एकाग्रता बढ़ती है. नकारात्मक ऊर्जा व बुरी नजर का प्रभाव दूर रहता है. मन में आने वाले अशुद्ध और बुरे विचार दूर रहते हैं. ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार, ये ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचाता है. इसे धारण करने से हर काम सफल होता है.

चारधाम यात्रा पर बड़ी अपडेट: तय समय से पहले खुलेंगे कपाट, व्यवस्थाओं को लेकर सरकार तैयार

उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा को लेकर इस साल श्रद्धालुओं के लिए अच्छी खबर है. साल 2026 में चारधाम यात्रा पिछले साल की तुलना में 11 दिन पहले शुरू होने जा रही है. यात्रा का आगाज 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ होगा. पिछले वर्ष (2025) चारधाम यात्रा 30 अप्रैल को शुरू हुई थी, लेकिन इस बार तिथियों के शुभ संयोग के कारण यह 19 अप्रैल से ही शुरू हो जाएगी. यात्रा का समय बढ़ने से न केवल देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए अधिक समय मिलेगा, बल्कि स्थानीय होटल कारोबारियों, टैक्सी संचालकों और व्यापारियों के चेहरे भी खिल गए हैं. माना जा रहा है कि इस अतिरिक्त समय से पर्यटन कारोबार में बड़ी बढ़ोत्तरी होगी. क्या होती है अक्षय तृतीया? चारधाम यात्रा के शुभारंभ के लिए अक्षय तृतीया का दिन विशेष माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय (नाश) न हो. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान, जप और पुण्य कर्म अनंत फलदायी होता है. इसी दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है. बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की प्रक्रिया और गंगोत्री-यमुनोत्री के कपाट खोलने के लिए इस दिन को सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि यह दिन नई शुरुआत और समृद्धि का प्रतीक है. बीते साल की चुनौतियों से सबक वर्ष 2025 की यात्रा कई विपरीत परिस्थितियों के कारण प्रभावित रही थी. सीमा पर तनाव और उसके बाद धराली व थराली में आई प्राकृतिक आपदाओं ने श्रद्धालुओं की राह रोकी थी. कई बार प्रशासन को सुरक्षा कारणों से यात्रा रोकनी पड़ी थी. इन अनुभवों को देखते हुए, इस बार प्रशासनिक मशीनरी पहले से ही ‘अलर्ट मोड’ पर है. प्रशासनिक तैयारियां तेज गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडेय ने ऋषिकेश में यात्रा की प्रारंभिक तैयारियों की समीक्षा पूरी कर ली है. सड़कों की मरम्मत, पेयजल व्यवस्था और यात्रियों के पंजीकरण को लेकर खाका तैयार किया जा रहा है. जल्द ही मुख्य सचिव स्तर पर अंतिम समीक्षा बैठक की जाएगी ताकि यात्रियों को किसी भी तरह की अव्यवस्था का सामना न करना पड़े.