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चावल की खेती से निकलती है मीथेन गैस, ग्लोबल वार्मिंग पर IISER भोपाल की रिसर्च ने खींचा ध्यान

भोपाल  आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है। देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है। इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है। धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है। मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है।  धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े? आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है।  इसलिए बढ़ रहा है तापमान यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है।  दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण? इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें।  पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है।  मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक? मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है।  औद्योगिक काल से पहले 30 प्रतिशत था मीथेन का योगदान  औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर … Read more

मुख्यमंत्री की सराहना से बढ़ी विष्णु भोग चावल की मांग, रायपुर से पहुंचे ग्राहक ने खरीदा 50 किलो चावल

रायपुर : सीएम की तारीफ का बड़ा असर – सोशल मीडिया पर वीडियो देख रायपुर से जीपीएम पहुंचे ग्राहक, खरीदा 50 किलो विष्णु भोग चावल सुशासन तिहार में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सराहा था स्थानीय उत्पाद, बाजार में बढ़ी सुगंधित पारंपरिक चावल की मांग रायपुर, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा छत्तीसगढ़ के स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के प्रयासों का असर अब जमीनी स्तर पर दिखने लगा है। सुशासन तिहार के दौरान मुख्यमंत्री द्वारा गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के पारंपरिक विष्णु भोग चावल की तारीफ किए जाने के बाद इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। हालत यह है कि अब जिले के बाहर से भी लोग इस विशेष सुगंधित चावल को खरीदने के लिए उत्पादकों तक सीधे पहुंच रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो बना जरिया          गौरतलब है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने मरवाही विकासखंड की ग्राम पंचायत निमधा में आयोजित जनचौपाल के दौरान स्थानीय किसानों और महिला समूहों द्वारा उपजाए गए विष्णु भोग चावल की विशेष सराहना की थी। मुख्यमंत्री के इस संबोधन का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ। इसी वीडियो को देखकर रायपुर निवासी अजय कुमार इस पारंपरिक चावल की विशेषताओं और गुणवत्ता से इतने प्रभावित हुए कि वे अपने साथियों के साथ सीधे गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले पहुंच गए। कलेक्टर की मौजूदगी में 7 हजार की सीधी खरीदी         जिले में पहुंचे इन ग्राहकों ने कलेक्टर डॉ. संतोष कुमार देवांगन की विशेष उपस्थिति में तिपान महिला फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से सीधे 50 किलोग्राम विष्णु भोग चावल की खरीदी की। इस खरीदी की कुल कीमत 7 हजार रुपये रही। रायपुर से आए ग्राहकों ने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा उत्पाद की तारीफ किए जाने के बाद ही उनकी रुचि इस चावल के प्रति जगी थी और वे खुद इसकी सुगंध और स्वाद का अनुभव करना चाहते थे। उन्होंने भविष्य में भी इस चावल की खरीदी जारी रखने की बात कही। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही है मजबूती         इस मौके पर तिपान महिला फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताते हुए कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की राज्य सरकार की नीति रंग ला रही है। इससे किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों और उत्पादक संगठनों को सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है और उनके लिए बाजार के नए रास्ते खुल रहे हैं। कृषि समृद्धि का नया प्रतीक बना विष्णु भोग        अपनी विशिष्ट सुगंध, बेहतरीन स्वाद और उच्च गुणवत्ता के लिए पहचाना जाने वाला विष्णु भोग चावल अब सिर्फ एक स्थानीय फसल नहीं, बल्कि जिले की कृषि समृद्धि और महिला उद्यमिता का एक सफल ब्रांड बनकर उभर रहा है। मुख्यमंत्री की इस अनूठी पहल से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीदें काफी मजबूत हो गई हैं।

मुठ्ठी भर चावल से दूर होगी पैसों से जुड़ी दिक्कत

कई बार ऐसा होता है ना कि अच्छी-खासी कमाई होने के बावजूद भी पैसा हाथ में टिक नहीं पाता है। इसके पीछे कई तरह की वजहें जैसे फालतू के खर्चे, गलत आर्थिक फैसले या घर की नकारात्मक ऊर्जा। अगर आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो फेंगशुई का एक बहुत ही आसान सा उपाय इस समस्या को दूर करने में आपकी मदद कर सकता है। फेंगशुई के अनुसार घर में रखी हुई छोटी से छोटी हर एक चीज हमें प्रभावित करती है। सही जगह पर रखी गई चीजें पॉजिटिविटी लेकर आती हैं। तो वहीं चीजों का गलत प्लेसमेंट धन हानि और पैसों की तमाम दिक्कत लेकर आती है। अगर आप बार-बार पैसों की तंगी या धन हानि जैसी समस्या से जूझते आ रहे हैं तो अब फेंगशुई की मदद से जिंदगी में पॉजिटिव बदलाव ला सकता है। फेंगशुई का आसान उपाय फेंगशुई के इस उपाय से आप आसानी से पैसे की बर्बादी या फिर फालतू के खर्चे पर लगाम लगा सकते है। नियम के अनुसार मुठ्ठी भर चावल को एक लाल रंग के कपड़े में बांध लें। इस बात का ध्यान रखें की ये कपड़ा साफ हो और नया हो। चावल को बांधने के बाद इसे अपने घर के मेनगेट के आगे कहीं पर टांग दें। फेंगशुई के नियम के हिसाब से इसे आप बाईं ओर ही टांगें। मान्यता है कि इस दिशा में धन को रोकने या बांधने की शक्ति होती है। घर का ये हिस्सा धन स्थान का रिप्रेजेंट करता है। चावल की मदद से घर में मौजूद किसी भी तरह की नेगेटिविटी दूर हो जाएगी। साथ ही ये धन संबंधी हर तरह की दिक्कत को जिंदगी से निकाल फेंकेगा। चावल वाली पोटली को एक हफ्ते तक वहां रहने दें। इसके बाद इसे घर के बाहर किसी पेड़ के पास रख दें। मेनगेट पर लगा सकते हैं ये चीजें इसके अलावा आप मेनगेट पर कुछ और चीजें लगातार अपने घर की नेगेटिविटी को दूर कर सकते हैं। विंड चाइम की मदद से भी आप घर में मौजूद बुरी नजर और नेगेटिविटी को आसानी से बाहर कर सकते हैं। साथ ही यहां पर मनी प्लांट या बैंबू प्लांट लगाना भी सही होता है। इसके अलावा आप मेनगेट के ऊपर एक छोटा सा शीशा रख सकते हैं। इससे घर के बाहर मौजूद नेगेटिविटी कभी भी अंदर नहीं आ पाएगी। डिस्क्लेमर- इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं।

गुयाना, सोमालिया और अफ्रीका के देशों में बालाघाट चावल का क्रेज, सेहत के लिए भी रामबाण

बालाघाट  वे लोग जो चावल खाने के शौकीन हैं लेकिन बीमारियों की वजह से नहीं खा पाते उनके लिए खास तरह का पारबॉइल्ड चावल बेहद कारगर होता है. खास बात यह है कि मध्य प्रदेश के बालाघाट के किसान इसको अपने खेतों में उगा रहे हैं, जिसकी डिमांड दुनिया भर के कई देशों में हो रही है. आइए जानते हैं इस खास किस्म में चावल की क्या हैं खासियतें- मध्य प्रदेश में धान का कटोरा, विदेशों में चावल की माँग बालाघाट जिसे घाटों वाला जिला भी कहा जाता है यहां पैदा होने वाले चावल की मांग भारत के अलावा विदेशों में भी बढ़ी है. जिले का पारबॉइल्ड चावल अफ्रीकी और खाड़ी देशों में विशेष रूप से पसंद किया जाता है. IR-64 किस्म के धान से बने चावल की गुयाना, सोमालिया, बेनिन, टोगो जैसे अफ्रीकी देशों में काफी डिमांड है. क्या होता है पारबॉइल्ड चावल बालाघाट राइस मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोनू भगत ने बताया "पारबॉइल्ड चावल ऐसे चावल होते हैं जो आंशिक रूप से चावल के भूसे के अंदर ही उबाल दिए जाते हैं. इसके तीन मेन स्टेप्स में इन्हें धोना, स्टीम करना और ड्राई करना शामिल होता है. मोटे पारबॉइल्ड चावल की सबसे ज्यादा डिमांड विदेशों में है जो IR-64 और IR-36 धान से बनता है." मप्र में धान का कटोरा है बालघाट बालाघाट के उपसंचालक कृषि फूल सिंह मालवीय ने बताया "बालाघाट में 2.67 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान का उत्पादन होता है, जिसमें लगभग 82,77,000 क्विंटल धान पैदा होती है. बालाघाट को "प्रदेश का धान का कटोरा" भी कहा जाता है और यहां की अर्थव्यवस्था धान की खेती पर ही निर्भर है. किसानों से यहां की राइस मिल के व्यापारी और मप्र सरकार धान की खरीदी करती है. फिर से मिलों के ज़रिए चावल बनाकर तैयार किया जाता है." मप्र में चिन्नौर धान को मिला है जीआई टैग केंद्र सरकार की "एक जिला, एक उत्पाद" योजना में शामिल होने वाली चिन्नौर धान मध्य प्रदेश से जीआई टैग प्राप्त करने वाली पहली चावल की किस्म है. जीआई टैग से इसका अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रचार हो रहा है. इसे 14 सितंबर 2021 को भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री द्वारा मान्यता दी गई थी. यह मध्य प्रदेश का पहला चावल है जिसे जीआई टैग मिला और इसने बालाघाट को पहचान दी. 

ट्रंप को करारा झटका, चावल के दाने पर रुक गई करोड़ों की डील

नई दिल्ली  हर देश की अपनी कुछ सांस्कृतिक और लोक मान्यताएं होती हैं. इसकी वजह से वो किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करते हैं. ये न सिर्फ राजनीतिक बल्कि कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव ले आती हैं. कई बार ये सामने आ जाती हैं तो कई बार समझने पर पता चलता है कि जो दिख रहा है, वैसा है नहीं. कुछ ऐसा ही चल रहा है इस वक्त जापान में, जहां अमेरिका से साथ टैरिफ घटाने पर होने वाली एक डील होते-होते रुक गई. 550 अरब डॉलर के मेगा निवेश समझौते की प्रक्रिया अचानक ही रुक गई. जापान के कारोबार सलाहकार रयोसेई अकाजावा ने अमेरिका जाना था लेकिन उनका दौरा आखिरी मिनट में रद्द कर दिया. अकाजावा का यह दौरा अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के साथ फाइनल बातचीत के लिए तय था. निवेश पैकेज की घोषणा इसी हफ्ते की जानी थी, जिसमें मुनाफे के बंटवारे जैसी अहम बातें तय होनी थी. क्या है ये पूरा निवेश समझौता, जो थम गया अमेरिका और जापान के बीच सहमति बनी थी कि अगर जापान यह 550 अरब डॉलर का मेगा इनवेस्टमेंट करता है, तो टोक्यो पर लगने वाले टैरिफ 25% से घटाकर 15% कर दिए जाएंगे. हालांकि इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक अजीबोगरीब बयान देते हुए कहा – ‘यह पैसा हमारा है, हम जैसे चाहें वैसे लगाएंगे’. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस इनवेस्टमेंट का 90 फीसदी मुनाफा अपने पास रखेगा, बस यहीं जापान की बात बिगड़ गई. जापानी सरकार की ओर से कहा गया है कि कुछ अहम बिंदुओं पर सहमति नहीं बनने की वजह से दौरा रद्द किया गया है. इसमें ऑटो पार्ट्स पर तुरंत टैरिफ हटाना और पुराने कार्यकारी आदेश में बदलाव करना शामिल है. ‘चावल’ का है अहम रोल इस पूरे मामले में अहम भूमिका जापानी चावल की है. दरअसल जापान और अमेरिका के समझौते की प्रक्रिया मई से ही चल रही है. अब मु्द्दा ये है कि डोनाल्ड ट्रंप हमेशा की तरह अपनी शर्तों पर निवेश चाहते हैं. उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ये भी लिख दिया था कि जापान ने अमेरिका के लिए अपना एग्रीकल्चर सेक्टर खोल दिया है. यहां मामला सीधा चावल से जुड़ा था. जापानी किसान कभी नहीं चाहते हैं कि अमेरिका का चावल जापानी बाजारों में आए, जिसे लेकर पहले भी विरोध हो चुका है. दशकों से यहां अमेरिकी चावल का विरोध होता रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि ये सस्ता चावल किसानों के बाजार को खत्म कर देगा. जापानी लोग स्टिकी राइस खाते हैं और वे इसे पौष्टिक मानते हैं. दूसरी तरफ चावल जापान में सांस्कृतिक पहचान माना जाता है. जापानी लोग इसे अपने गांव से जोड़कर देखते हैं. भले ही जापान में बाकी भोजन आयात होता हो लेकिन उनकी कोशिश रहती है कि चावल घरेलू उत्पादन तक ही सीमित रहे, भले ही उनकी कीमतें ज्यादा हों. जापान का चावल आयात वैसे तो जापान में चावल का आयात होता लेकिन अमेरिकी चावल का ज्यादा विरोध है क्योंकि ये सस्ता होता है. जापान टैरिफ बढ़ने की सूरत में जापान से चावल का आयात कम कर चुका ह, जिसे अमेरिका बढ़ाना चाहता है. वहीं भारत का जापान में चावल का निर्यात पिछले दो सालों में बढ़ा है. साल 2024 में जापान ने भारत से $5.74 मिलियन का चावल आयात किया जो साल 2023 ( $2.08 मिलियन) की तुलना में दोगुने से ज्यादा था. ऐसे में अमेरिका से अगर जापान चावल आयात नहीं करता, तो भारत से उसकी डील हो सकती है.

छत्तीसगढ़ में एक सप्ताह के लिए बढ़ी ‘चावल उत्सव’ की समयसीमा, 51% लोगों को सात दिन में बांटना होगा तीन महीने का चावल

 रायपुर प्रदेश में एक साथ तीन माह का चावल वितरण करने की सरकार की योजना आधे रास्ते में अटक गई है। 30 जून वितरण की अंतिम तिथि थी, लेकिन अब तक कुल एपीएल कार्डधारियों में से सिर्फ 49 प्रतिशत लोगों को ही चावल मिल पाया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शासन ने अब वितरण की समयसीमा को सात दिन के लिए और बढ़ा दिया है। खास बात यह है कि एपीएल कार्डधारियों के लिए अधिकांश राशन दुकानों में चावल उपलब्ध ही नहीं कराया गया, जिससे हजारों लोग खाली हाथ लौटते रहे। इसके चलते राशन वितरण में भारी असंतोष फैल गया। आंकड़े कर रहे सच्चाई बयां राज्य में कुल 8,55,626 एपीएल कार्डधारी हैं, जिनमें से सिर्फ 5,23,265 कार्डधारियों को ही अब तक चावल का वितरण किया गया है। रायपुर जिले की बात करें तो 1,25,674 एपीएल कार्डधारियों में से महज 62,066 कार्डधारियों को ही राशन मिला है। यानी शहर में आधे से ज्यादा लोग अब भी चावल के इंतजार में हैं। लापरवाही पर गिरी गाज, जीएम हेलिना तिग्गा हटाई गईं चावल वितरण में लापरवाही को लेकर शासन ने सख्त रुख अपनाते हुए रायपुर नागरिक आपूर्ति निगम की महाप्रबंधक हेलिना तिग्गा को मुख्यालय अटैच कर दिया है। उनकी जगह अब संजय तिवारी को रायपुर का नया महाप्रबंधक बनाया गया है। माना जा रहा है कि यह कार्रवाई वितरण व्यवस्था में बार-बार सामने आ रही गड़बड़ियों को लेकर की गई है। नईदुनिया ने प्रमुखता से उठाया था मुद्दा नईदुनिया ने लगातार अपनी खबर में राशन वितरण की जमीनी हकीकत को उजागर किया था। शहर की अधिकांश राशन दुकानों में एपीएल कार्डधारियों के लिए चावल उपलब्ध न होने, हितग्राहियों को बार-बार चक्कर लगाने और सिस्टम की सुस्ती की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित की गई थीं। उसी का असर है कि शासन ने न केवल समय सीमा बढ़ाई, बल्कि जिम्मेदार अफसर पर कार्रवाई भी की। अब सात दिन और मिलेगा समय खाद्य विभाग के नियंत्रक भूपेंद्र मिश्रा के अनुसार, अब तीन माह के चावल वितरण के लिए सात जुलाई तक की समयसीमा निर्धारित की गई है। इस दौरान सभी जिलों के खाद्य अधिकारियों को लक्ष्य पूरा करने के निर्देश जारी किए गए हैं। शासन का दावा है कि इस अवधि में शेष सभी पात्र हितग्राहियों तक चावल पहुंचा दिया जाएगा। राहत की उम्मीद अब देखना होगा कि शासन के इस समयसीमा विस्तार और प्रशासनिक सख्ती के बाद वितरण कार्य कितना गति पकड़ता है। फिलहाल एपीएल कार्डधारियों में असंतोष व्याप्त है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अगले सप्ताह के भीतर राशन की आपूर्ति सामान्य हो सकेगी। सुबह 10 से रात 10 बजे तक बांटना पड़ रहा है चावल तीन माह का राशन एक साथ बांटने की योजना ग्राम नरदहा में अव्यवस्था का कारण बन गई है। राजधानी से महज दो किलोमीटर दूर इस गांव में 1,773 राशन कार्डधारियों को चावल देना है, लेकिन स्टाफ और संसाधनों की भारी कमी के चलते सुबह 10 से रात 10 बजे तक वितरण चल रहा है। हर कार्डधारी को छह बार अंगूठा लगाना पड़ रहा है, जिससे प्रतिदिन सिर्फ 50-60 लोगों को ही राशन मिल पा रहा है। बाकी सैकड़ों हितग्राही खाली हाथ लौट रहे हैं। मात्र एक कर्मचारी वितरण कार्य संभाल रहा है। दुकान में जगह कम होने से चावल का स्टॉक बाहर रखना पड़ रहा है और उसे रोज लाकर तौलना पड़ता है। मशीन की स्लो स्पीड कर रही काम को बाधित मशीन की धीमी स्पीड और नेटवर्क की समस्या से काम और बाधित हो रहा है। मजदूरों की रोजी पर भी असर पड़ रहा है। काम छोड़कर लाइन में लगने से उनकी आमदनी रुक रही है। ग्राम प्रमुख अनिल टंडन ने कहा, यह संवेदनहीनता का त्योहार बन गया है। उन्होंने समय और स्टाफ बढ़ाने की मांग की है, लेकिन शासन की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया है।