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बिना मेकअप दिखें खूबसूरत

संवरने-संवारने की कला स्त्री को जन्मजात मिली है। यह आर्ट उसे सुंदर दिखने को भी प्रेरित करती है। भागदौड़ भरी जिंदगी में रोज अच्छी तरह मेकअप करना तो संभव नहीं, मगर डाइट और लाइफस्टाइल को सही रखकर खुद को आकर्षक बनाया जा सकता है मेकअप एक कला है। कई बार इससे चेहरे पर कमाल हो सकता है। रोज आईने के सामने काफी वक्त बिताती हैं स्त्रियां ताकि वे सुंदर दिख सकें। कई स्त्रियां मानती हैं कि बिना मेकअप के वे सुंदर नहीं दिख सकतीं। हालांकि सादगी का अपना महत्व है और बिना बहुत वक्त या पैसा खर्च किए भी सुंदर बने रहा जा सकता है। एक प्याली गर्म पानी सुबह की शुरुआत के लिए इससे अच्छी कोई आदत नहीं है। सुबह उठने के बाद चाय के बजाय गर्म पानी पिएं। इसमें नींबू की कुछ बूंदें डालें। ओवरवेट होने या डाइबिटीज जैसी समस्या न हो तो थोड़ा शहद भी मिला सकती हैं। इससे ताजगी का अहसास होगा। एसपीएफ युक्त क्रीम उम्र बढन के साथ-साथ धूप, धूल और समय का प्रभाव चेहरे पर पडने लगता है। इसलिए सनक्रीम हमेशा साथ रखें। तेज धूप हो या नहीं, इसका इस्तेमाल करें। इसके प्रयोग से आप बहुत सी समस्याओं से बची रह सकती हैं। आदतें सुधारें चेहरे को सिकोड़ते हुए बात करने, माथे पर बल डालने, आखें मिचमिचाने, हथेलियों को गालों पर टिकाने, पिंपल्स नोचने, आंखें मलने जैसी आदतें त्वचा को नुकसान पहुंचाती हैं। चेहरे की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए इस पर दाग-धब्बे बहुत पड़ते हैं। ये आदतें झुर्रियों को न्यौता भी दे सकती हैं। अति से बचें नियमित फेशियल से चेहरे की मांसपेशियों में कसाव आता है, रक्त संचार ठीक होता है और चेहरा साफ व सुंदर दिखता है, मगर ब्लीच का इस्तेमाल सोच-समझकर करें। ज्यादा मसाज व ब्लीच से संवेदनशील त्वचा को नुकसान हो सकता है। स्क्रबिंग-क्लेंजिंग रोज सोने से पहले क्लेंजिंग मिल्क से चेहरा साफ करें। हफ्ते में एक बार स्क्रबिंग करें। इससे डेड स्किन हटेगी। क्लेंजर से त्वचा बैक्टीरिया रहित होगी, अतिरिक्त तेल व डेड स्किन सेल्स निकलेंगी। ड्राई स्किन के लिए मॉइश्चराइजर वाला क्लेंजर अच्छा है। पानी खूब पिएं रोज सात-आठ गिलास पानी पीना चाहिए। शरीर से हानिकारक तत्व निकालने का यह सर्वोत्तम उपाय है। यह सौंदर्य को बढ़ाता है और त्वचा को समस्या रहित रखता है। मॉइश्चराइजर मुलायम त्वचा के लिए मॉइश्चराइजर जरूरी है। प्रदूषण, मौसम, धूप और धूल से त्वचा को क्षति पहुंचती है। स्किन को सही पोषण और नमी मिले तो रिंकल्स कम पडेंगे और वह ड्राई होने से बची रहेगी। चेहरे और गर्दन के अलावा हाथों और पैरों पर भी मॉइश्चराइजर का प्रयोग करें। टोनर टोनर से न सिर्फ त्वचा में कसाव आता है, बल्किइससे रोमछिद्र भी भरते हैं और चेहरे से अतिरिक्त तेल बाहर निकल जाता है। शैंपू सप्ताह में कम से कम तीन दिन बालों को किसी अच्छे शैंपू से धोएं और कंडीशनर का इस्तेमाल करें। चिपचिपे-गंदे बाल चेहरे का लुक बिगाड़ देते हैं। दिन में दो-तीन बार और सोने से पहले बालों में कंघी करना न भूलें। -बालों की समय-समय पर ट्रिमिंग कराएं, ताकि वे दोमुंहे न हों और खराब न दिखें। -नाखून चबाने की आदत से बचें। उन्हें सही ढंग से तराशें और अच्छा शालीन नेल पेंट लगाएं। -अत्यधिक कॉफी या चाय पीने से बचें। -कम से कम सात घंटे की अच्छी नींद लें। -दांतों की सुबह-शाम सफाई करें। कई बार ब्रश करने से दांतों का इनैमल कम होता है और वे पीले दिखने लगते हैं। दिनभर में दो बार ब्रश करना काफी है। -उठने-बैठने और चलने-फिरने में अपने बॉडी पोस्चर का ध्यान रखें। -तले-भुने खाद्य पदार्थों, मैदे से बनी चीजों का इस्तेमाल कम करें। तरल पदार्र्थों का सेवन अधिक करें। -सही फिटिंग के कपड़े पहनें और ऐसे फैशन ट्रेंड्स का अनुकरण करने से बचें जो आपके व्यक्तित्व पर न फबें। जिस ड्रेस में कंफर्टेबल महसूस करती हों, वही पहनें।  

आंखों की सेहत पर बड़ा सवाल: क्या कॉन्टैक्ट लेंस चश्मे से ज्यादा सुरक्षित हैं?

नई दिल्ली इन दिनों नजरों का कमजोर होना आम बात हो चुकी है। लगातार स्क्रीन का इस्तेमाल और खानपान में लापरवाही अक्सर इसकी वजह बनती है। ऐसे में आंखों की कम होती रोशनी के लिए लोग अक्सर कॉन्टैक्ट लेंस या चश्मे का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, इसे लेकर अक्सर बहस होती रहती है कि इन दिनों में से क्या ज्यादा बेहतर है। कई लोग चश्मे का सपोर्ट करते हैं, तो वहीं कुछ लैंस को बेहतर मानते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर दोनों में से ज्यादा बेहतर क्या है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए हमने आई 7 हॉस्पिटल लाजपत नगर और विजन आई क्लिनिक, नई दिल्ली में सीनियर मोतियाबिंद एवं रेटिना सर्जन डॉ. पवन गुप्ता से बातचीत की। कॉन्टैक्ट लेंस पहनें या नहींं? डॉक्टर ने बताया कि कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल करने वाले लोग लेंस को सुविधाजनक और फैशनेबल होने की वजह से पसंद करते हैं, लेकिन कुछ जोखिम भी हैं। कॉन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को सही हाइजीन के नियमों का पालन करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। सोने से पहले लेंस उतारना जरूरी है; अगर इन्हें पहनकर सोया जाए, तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सभी सही तरीकों के बावजूद, आंखों में कोई बाहरी चीज के जाने से कभी-कभी कुछ देर जलन या अन्य समस्याएं हो सकती हैं। कॉन्टैक्ट लेंस के नुकसान कॉन्टैक्ट लेंस के इस्तेमाल की वजह से कॉर्निया को समस्या हो सकती है। कॉर्निया एक पारदर्शी परत है, जो आंख के सामने होती है। यह आंख की एकमात्र परत है, जिसे हवा से ऑक्सीजन मिलती है और जब कॉन्टैक्ट लेंस इस पर लगाए जाते हैं, तो यह ऑक्सीजन कम हो जाती है। लंबे समय तक कॉन्टैक्ट लेंस पहनने से कॉर्निया में इस्केमिया या ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। ऑक्सीजन की इस लगातार कमी की वजह कॉर्निया के किनारों पर नई ब्लड वेसल्स विकसित हो सकती हैं, जिससे विजन कम हो जाती है और आंखों का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इसलिए चश्मा है बेहतर! भले ही कॉन्टैक्ट लेंस पहनने से कॉर्निया में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है, लेकिन चश्मे से ब्लड वेसल्स बनने का कोई खतरा नहीं होता। कांच (और अन्य पारदर्शी लेंस) साफ विजन देते देते हैं और इससे कॉर्निया तक ऑक्सीजन पहुंचने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भले ही अगर कुछ सावधानियां बरती जाएं, तो कॉन्टैक्ट लेंस का सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है। कैसे करें कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल? हालांकि, लोग सावधानियों का पालन करते हुए कॉन्टैक्ट लेंस पहनकर सुरक्षित रूप से काम कर सकते हैं। कॉन्टैक्ट लेंस पहनने के लिए जरूरी है कि पूरी तरह से स्वच्छता बनाए रखें। उन्हें लगाने से पहले हाथ साफ करें, उन्हें अच्छी तरह से साफ करके रखें, और दूसरों को उन्हें इस्तेमाल करने से रोकें। साथ ही घर से बाहर निकलते ही कॉन्टैक्ट लेंस उतार देने चाहिए और लेंस पहनकर नहीं सोना चाहिए। कुल मिलाकर चश्मा और कॉन्टैक्ट लेंस दोनों ही विजन सुधारने के प्रभावी साधन हैं, फिर भी रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए चश्मा ही सुरक्षित विकल्प है। अगर कोई कॉन्टैक्ट लेंस पहनना पसंद करता है, तो उसे लंबे समय बाद होने वाले नुकसान से बचने के लिए स्वच्छता और उपयोग संबंधी दिशानिर्देशों का ध्यान रखते हुए जिम्मेदारी से पहनना चाहिए।  

मुहांसे हटाने का ये उपाय पड़ सकता है भारी, चेहरे को पहुंचा सकता है नुकसान

नई द‍िल्‍ली चेहरे पर पिम्पल निकलना किसी को भी परेशान कर सकता है। खासकर तब जब किसी खास मौके या मीटिंग से पहले ये मुहांसों की तरह चेहरे पर उभर जाएं। ऐसे समय में बहुत से लोग खुद से इन्हें दबाकर या फोड़कर खत्म करने की कोशिश करने लगते हैं। शायद आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा कि शीशे में चेहरा देखते ही आपका ध्यान सीधा पिम्पल पर गया हो और मन किया हो कि इसे तुरंत हटा दिया जाए। ये एक आम समस्या है, जो उम्र, हार्मोनल बदलाव, खानपान और लाइफस्टाइल के कारण किसी को भी हो सकती है। कभी ये छोटे-छोटे दानों की तरह दिखते हैं तो कभी सूजन के साथ चेहरे पर न‍िकल आते हैं। तब लोग इन्हें हाथ से छूने या फोड़ने की गलती कर बैठते हैं। हालांकि ये कुछ ही दिनों में अपने आप भी ठीक हो जाते हैं। लेक‍िन अगर ब‍िना सोचे समझे आपने इन्‍हें फोड़ने की काेश‍िश की तो इसके गंभीर नुकसान आपको झेलने पड़ सकते हैं। आज हम आपको अपने इस लेख में इससे होने वाले नुकसानों के बारे में बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं व‍िस्‍तार से – इन्‍फेक्‍शन का बढ़ जाता है खतरा आपको बता दें क‍ि अगर आप प‍िम्‍पल को फोड़ने की गलती करते हैं तो इससे इन्‍फेक्‍शन का खतरा बढ़ जाता है। दरअसल, हमारे हाथों और नाखूनों में न जाने क‍ितने बैक्टीरिया होते हैं, जाे घाव में जा सकते हैं। इससे पिम्‍पल और भी बड़ा हो सकता है। चेहरे पर पड़ सकते हैं न‍िशान इन प‍िम्‍पल्‍स को फोड़ने से आपके चेहरे पर निशान भी पड़ सकते हैं। इससे आपका चेहरे का लुक भी ब‍िगड़ सकता है। इसे फोड़ने से स्‍क‍िन के नीचे की ट‍िशू को नुकसान पहुंचता है। इस कारण सूजन की समस्‍या हो सकती है। हो सकता है ब्रेकआउट अगर आप बार-बार प‍िम्‍पल्‍स को फोड़ते हैं ताे इसमें से जो ल‍िक्‍व‍िड न‍िकलता है, वो चेहरे पर कहीं भी लग सकता है। ऐसे में एक मुंहासे को फोड़ने के चक्‍कर में चेहरे पर और भी प‍िम्‍पल्‍स निकल सकते हैं। देर से भरते हैं घाव प‍िम्‍पल्‍स अपने आप से ही ठीक होता है। ऐसे में अगर आप इसे बार-बार छूते हैं या फ‍िर फोड़ने की कोशि‍श करते हैं ताे इससे हील‍िंग प्रॉसेस धीमा हो सकता है। इसे ठीक होने में ज्‍यादा समय लगेगा और सूजन की समस्या भी बढ़ सकती है। क्‍या करें?     गुनगुने पानी से चेहरे को साफ करें।     चेहरे को छूने से पहले अपने हाथों को साफ करना न भूलें।     ऐसे प्रोडक्‍ट्रस का इस्तेमाल करें जो पोर्स को क्लॉग नहीं करते हैं।     कुछ घरेलू नुस्‍खे ट्राई करें।     द‍िक्‍कतें बढ़ने पर डॉक्‍टर से सलाह लें।  

बारिश में कैसा हो पहनावा, पढ़ें 6 टिप्स

मौसम के अनुसार कपड़ों का चयन फैशन और स्वास्थ, दोनों के लिहाज से बिल्कुल फिट होता है। हर मौसम में हम पहनावा चुनते समय हम अपनी सुविधा अनुसार कुछ सावधानियां जरूर रखते हैं। उसी प्रकार बरसात के दिनों में भी कुछ सावधानियां रखकर कपड़ों का चयन किया जाए तो आपको अधकि सुविधा होती है। जानते हैं, कैसा हो बारिश में कपड़ों का चयन। जार्जेट या शिफॉन:- इन कपड़ों का एक सकारात्मक पक्ष यह है, कि ये कपड़े भीगने के बाद गर्मी या हवा में जल्दी और आसानी से सूख भी जाते हैं। इन कपड़ों में जरा भी नमी लगी या फिर भीग गए तो ये पारदर्शी हो सकते हैं, और आप गीलेपन से परेशान होंगे सो अलग। इसीलिए सोच समझ कर इस तरह के कपड़ों का चयन करें। बारिश के दिनों में कॉटन यानि सूती कपड़े पहन सकते हैं। बारिश के दिनों में मौसम में नमी बहुत होती है, और सूती कपड़े नमी को सोखने का काम करते हैं। ऐसे में आप हल्की फुल्की बारिश में भीग भी गए, तो गीलेपन के कारण होने वाली परेशानी या चिड़चिड़ाहट नहीं होगी। लेकिन भीगने के बाद ये असानी से नहीं सूखते, इस बात का ध्यान रखें।   नाइलॉन फेब्रिक:- भीगते मौसम में नाइलॉन फेब्रिक काफी आरामदायक साबित हो सकता है। यह कपड़ा पानी को टिकने नहीं देता और गर्मी पैदा करता है। इस कपड़े की भी यह खासियत है, कि यह बहुत जल्दी सूखता है, इसीलिए बारिश में आप इसे पहनने के बारे में सोच सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि ये कपड़े एकदम फिट न हों। स्किन टाइट से बचें:- इस मौसम में बहुत टाइट या स्किन फिटिंग के कपड़े पहनने से बचें, क्योंकि ये नमी लगने पर तुरंत पारदर्शी होते हैं। ऐसे में आपका शरीर या अंतर्वस्त्र भी दिखाई दे सकते हैं, और सर्दी लगने का खतरा भी होता है। स्कार्फ रखें पास:- बारिश के दिनों में आप जो भी कपड़े पहनते हैं, उसके साथ एक मैचिंग या कलरफल स्कार्फ या दुपट्टा जरूर साथ रखें, ताकि प्राथमिक तौर बाल, कान, उपरी वस्त्र की रक्षा कर सकें। कपड़ों के भीग कर पारदर्शी हो जाने पर यह स्कार्फ आपका सहयोग करेगा। चटक रंगों का चुनाव:- अन्यआ मौसम में भले ही चटक रंग बिल्कुलल न भाते हों, लेकिन बारिश के मौसम में ये खूब पसंद किए जाते हैं। आप रेट, पिंक, येलो, लइट ग्रीन के ब्राइट कलर्स को चुन सकते हैं।   फ्लोरल प्रिंट चुनें:- बारिश के मौसम में फ्लोरल प्रिंट काफी पसंद किए जाते हैं। क्योंुकि बारिश हरियाली और बहार का मौसम होता है। ऐसे में रंगीन अंदाज हर किसी को भाता है।  

ये फ्री एप करेंगे आपकी परेशानी को दूर

एंड्राइड फोन यूजर्स की परेशानी को दूर करने के लिए हम आपको बता रहे हैं। ऐसे एप्स जो बिलकुल फ्री हैं। इन एप्स को आप बिलकुल फ्री पा सकते हैं। ट्रू कॉलर: यह ऐप किसी भी अज्ञात नंबर से फोन आने पर व्यक्ति का नाम बता देता है। ट्रू कॉलर के डेटाबेस में करोड़ों ऐसे नंबर हैं जो नाम के साथ रजिस्टर्ड हैं। ऐसे में अगर आपके फोन पर आने वाला नंबर उसके डेटाबेस में उपलब्ध है तो फोन नंबर के साथ उस व्यक्ति का नाम भी यह एप्लीकेशन आपको बता देती है। इसकी सहायता से आप हर वक्त परेशान करने वाले टेली कॉलिंग कॉल्स को उठान से बच सकते हैं। साथ ही यह एप्लीकेशन आपको किसी नंबर को ब्लॉक करने की भी सुविधा प्रदान करती है। यह एप्लीकेशन न सिर्फ मोबाइल नंबर की बल्कि लैंडलाइन नंबर्स और स्पैम कॉल्स की भी जानकारी देता है। डीयू बैटरी सेवर एंड वीजेट्स: अगर आपके फोन की बैटरी बार-बार डाउन हो जाती है और इसे बार-बार चार्ज करना पड़ता है तो इस परेशानी का हल है डीयू बैटरी सेवर एंड विजेट्स एप्लीकेशन में है। यह एप्लीकेशन आपके फोन की बैटरी को 50 प्रतिशत तक बढ़ा देता। यह एप आपके फोन की चार्जिंग को बेहतर बनाता है और फोन की बैटरी कंजम्शन को सुधारता है। क्लीन मास्टर: यह एप आपके फोन को वायरस से बचाता है। इस एप की मदद से फोन मौजूद आपके प्राइवेट डेटा को पासवर्ड के माध्यम से सुरक्षित कर सकते हैं। जैसे फेसबुक, एसएमएस, कॉन्टेक्ट्स, गैलरी आदि। क्लीन मास्टर डाउनलोड करने के बाद एपलॉक नाम का फीचर आपने फोन में एक्टिवेट हो जाता है। यह सॉफ्टवेयर आपके फोन से गैर जरूरी डेटा को खुद व खुद डिलीट कर देता है। जैसे एक जैसी दो फोटो, कैशे या रेसिडुअल फाइल्स आदि। ऐसा करने से फोन की मेमोरी खाली हो जाती है और फोन की स्पीड को बढ़ाने में मदद मिलती है। इस एप में आपके फोन के सीपीयू को कूल डाउन करने का ऑप्शन भी होता है। यह ऐप आपके फोन की फंक्शीनिंग को और बेहतर कर देता है।  

कहीं आपको हाइपर एसिडिटी तो नहीं!

जब गलत खानपान और अपच के कारण पेट में पित्त के विकृत होने पर अम्ल की अधिकता हो जाती है, तो उसे अम्लपित्त कहते हैं। यही अम्लपित्त हाईपर एसिडिटी कहलाता है। आइए जानते हैं, इसके कारण, लक्षण और इससे बचने के उपाय… हाइपर एसिडिटी के कारण:- अत्यधिक गर्म, तीखा, मसालेदार भोजन करने, अत्यधिक खट्टी चीजों का सेवन, देर से पचने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन, नशीले पदार्थों का सेवन करने से हाइपर एसडिटी की समस्या पैदा होती है। भोजन को पचने के लिए पर्याप्त समय न देना और अपच के बावजूद खाते रहना, आपकी इस समस्या को बढ़ा सकता है। लक्षण:- भोजन का पाचन नहीं होना, बगैर किसी मेहनत के ज्यादा थकावट होना, कड़वी या खट्टी डकार आना, शरीर में भारीपन, हृदय के पास या पेट में जलन होना, कभी-कभी उल्टी होना, उल्टी में अम्ल या खट्टे पदार्थ का निकलना, मिचली होना और मुंह से खट्टा पानी आना, सिरदर्द, आंखों में जलन, जीभ का लाल होना जैसे लक्षण हाइपर एसिडिटी में सामने आते हैं।   हाइपर एसिडिटी की समस्या से बचने के लिए आप घर पर ही कुछ उपाय और सावधानियां अपना सकते हैं जिससे आपको यह समस्या न हो… -गेहूं या जौ के आटे की बनी चपातियां ही खाएं, क्योंकि यह पाचन संबंधी समस्या पैदा नहीं करती, ना ही इससे गैस बनने जैसी समस्या होती है। बल्कि यह आपकी पाचनक्रिया को बेहतर करेगी।   -मूंग की दाल, लौकी, तरोई, परवल, गिलकी, टिंडे, कद्दू जैसी सब्जिुयों को अनदेखा बिल्कुल न करें। यह आपके पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखती है, और हाइपर एसिडिटी से आपको बचाती है। -फलों में पपीता, मौसंबी, अनार आदि को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं। इसके अलावा नारियल और नारियल पानी का भी भरपूर सेवन करें।   -मुनक्का, आंवले का मुरब्बा, कच्चा आंवला भी खाना बेहतर होगा। -अनार और आंवले के अलावा, खट्टी चीजों का अत्यधिक सेवन करने से बचें। इससे एसिडिटी बढ़ सकती है। -नींबू और टमाटर जैसी चीजों को भी नियंत्रित करें, इनके प्रयोग से आपकी यह समस्या बढ़ने में मदद मिलती है। -अत्यधिक गर्म, तीखा व मसालेदार भोजन करने से बचें। भारी खाद्य पदार्थों को भी खाने से बचें, ये आसानी से नहीं पचते जिससे आपकी समस्या कम होने के बजाए बढ़ जाती है।   -दही और छाछ का ज्यादा सेवन न करें और उड़द की दाल की बनी चीजों व शराब या अन्य नशीले पदार्थों से दूरी बनाए रखें। -हल्का व आसानी से जल्दी पचने वाला भोजन ही करें, अन्यथा आपको बहुत अधिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।   -गुलकंद व गुलाब से बनी चीजों का सेवन आपके लिए फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह आपके पेट में जाकर ठंडक पैदा करता है, जिससे एसिडिटी में राहत मिलती है।  

इतनी सी गलती से महंगा फोन बन सकता है ‘खाली डिब्बा’

नई दिल्ली आज स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है. ये छोटे से डिवाइस हमारे कई काम आसान कर देते हैं. AI और नई तकनीक की वजह से फोन पहले से भी ज्यादा स्मार्ट हो गया है. स्मार्टफोन कंपनियां समय-समय पर नए सॉफ्टवेयर अपडेट लाती रहती हैं. इन अपडेट्स में नए फीचर्स, सुधार और सुरक्षा पैच होते हैं. लेकिन कई यूजर्स इन्हें अनदेखा कर देते हैं. ऐसा करना आपके फोन के लिए कई परेशानियां पैदा कर सकता है. आइए जानते हैं, फोन अपडेट न करने के 5 बड़े नुकसान: 1. बढ़ता है सिक्योरिटी खतरा: हर महीने कंपनियां सिक्योरिटी पैच जारी करती हैं, जो हैकर्स से बचाने में मदद करते हैं. अगर आप अपडेट नहीं करते तो आपका फोन साइबर अटैक और डेटा चोरी के लिए कमजोर हो सकता है. 2. नए फीचर्स नहीं मिलेंगे: हर अपडेट में नए फीचर्स और बेहतर यूजर एक्सपीरियंस भी आता है. अपडेट न करने पर ये सुविधाएँ आपके फोन तक नहीं पहुँच पातीं. 3. ऐप्स में दिक्कत: ज़्यादातर ऐप्स लेटेस्ट OS के हिसाब से डिजाइन किए जाते हैं. अगर आपका फोन पुराना सॉफ्टवेयर चला रहा है तो ऐप्स क्रैश कर सकते हैं या कभी काम ही करना बंद कर सकते हैं. 4. बैटरी और परफॉर्मेंस कम होना: फोन अपडेट न करने से उसकी परफॉर्मेंस और बैटरी लाइफ कम हो सकती है. नए अपडेट में बैटरी और प्रोसेसर के लिए ऑप्टिमाइजेशन भी होता है. इन्हें स्किप करना फोन को स्लो कर सकता है. 5. बग्स और डेटा लॉस का खतरा: पुराने वर्जन में बग्स की वजह से फोन हैंग करने लगता है और कभी-कभी डेटा लॉस का खतरा भी बढ़ जाता है. अपडेट करने से बग्स सही होते हैं और परफॉर्मेंस भी बेहतर हो जाती है. फोन अपडेट करना सिर्फ नए फीचर्स के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा और बेहतर प्रदर्शन के लिए भी जरूरी है. इसलिए समय पर अपने फोन को अपडेट करते रहें.

Google Pixel Watch 4 और Buds Pro 2 बाजार में उतरे, जानें कीमत और फीचर्स

मुंबई  Google Pixel Watch 4 को कंपनी ने बुधवार शाम हुए Made by Google इवेंट में लॉन्च किया है. वॉच का डिजाइन पिछले वर्जन यानी Watch 3 जैसा ही है. इसमें आपको दो साइज का विकल्प मिलेगा. कंपनी की मानें, तो Google Pixel Watch 4 में Gemini का क्विक एक्सेस मिलेगा.  यूजर्स सिर्फ अपना हाथ उठाकर वॉयस असिस्टेंट को एक्सेस कर सकते हैं. वॉच में 40 से ज्यादा एक्सरसाइज मोड्स के साथ कई हेल्थ फीचर्स भी दिए गए हैं. सिंगल चार्ज में आप स्मार्ट वॉच को 40 घंटे तक इस्तेमाल कर सकते हैं. आइए जानते हैं इसकी डिटेल्स.  कितनी है कीमत?  Google Pixel Watch 4 की कीमत 39,900 रुपये से शुरू होती है. ये कीमत वॉच के 41mm (Wi-Fi) वेरिएंट की है. वहीं 45mm डायल वाले वेरिएंट की कीमत 43,900 रुपये है. अमेरिका और कुछ अन्य मार्केट में कंपनी ने वॉच का LTE वेरिएंट भी लॉन्च किया है. Google Pixel Watch 4 को आप कई कलर ऑप्शन में खरीद सकते हैं.  क्या हैं स्पेसिफिकेशन्स?  Google Pixel Watch 4 में पिछले वर्जन की तरह ही कर्व्ड डिस्प्ले मिलेगा. हालांकि, कंपनी का कहना है कि इसमें कई इम्प्रूवमेंट किए गए हैं. वॉच में बेजल और ब्राइटनेस को लेकर बदलाव किए गए हैं. इसमें Actua 360 ऑल्वेज ऑन डिस्प्ले मिलेगा और स्क्रीन की पीक ब्राइटनेस 3000 Nits है.  इसमें Snapdragon W5 Gen 2 प्रोसेसर दिया गया है. Pixel Watch 4 में स्मार्ट रिप्लाई और Gemini का क्विक एक्सेस दिया गया है. ये वॉच Material 3 एक्सप्रेसिव UI पर काम करता है. स्मार्टवॉच ECG, SpO2, HRV और ब्रीदिंग डिटेक्शन के साथ आता है.  ईयरबड्स भी हुए हैं लॉन्च  Google Pixel Buds 2a को कंपनी ने भारत में 12,999 रुपये में लॉन्च किया है. इसे आप Flipkart से खरीद सकते हैं. वहीं Pixel Buds Pro 2 को कंपनी ने 22,900 रुपये में लॉन्च किया है. ये वेरिएंट सिर्फ एक कलर मूनस्टोन में आता है.

अब मातृत्व का सपना टाले बिना पूरा करें करियर गोल्स, जानें Egg Freezing से जुड़े जरूरी तथ्य

नई दिल्ली मातृत्व का सफर महिलाओं के लिए हमेशा से एक भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दा रहा है. मां बनना, अपनी गोद में अपने अंश को देखना आज भी हर महिला के लिए सबसे अहम है लेकिन कई बार करियर की दौड़, परिवार की जिम्मेदारियां या सही साथी न मिल पाने की वजह से यह सपना पूरा नहीं हो पाता और समय की बाध्यताएं उनके मातृत्व के सपनों को चुनौती देती हैं. यहीं से आता है एग फ्रीजिंग का चलन. एक ऐसा आधुनिक समाधान जो महिलाओं को उनके सपनों को जीवित रखने का अवसर देता है. भारत में बढ़ा एग फ्रीजिंग का ट्रेंड हाल के वर्षों में, भारत में एग फ्रीजिंग का ट्रेंड काफी प्रचलित हुआ है. एग फ्रीजिंग को मेडिकल भाषा में Oocyte cryopreservation कहते हैं, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें महिलाएं अपने अंडों को भविष्य के लिए संरक्षित कर सकती हैं, ताकि जब वे तैयार हों, तब मां बनने का सपना पूरा कर सकें. यह तकनीक न केवल करियर और मातृत्व के बीच संतुलन लाने में मदद करती है, बल्कि महिलाओं को बिना किसी बंधन के, बिना किसी जल्दबाजी के, अपने समय पर मां बनने का अधिकार देती है. आसान हो रही है egg freezing की प्रक्रिया पिछले पांच सालों में भारत में एग फ्रीजिंग की मांग में काफी वृद्धि हुई है. Egg Preservation Institute of Asia (EIPA) जो भारत में शुरू हुआ एक लीडिंग फर्टिलिटी क्लिनिक है, उसने कुछ समय पहले एट-होम एग फ्रीजिंग की शुरुआत की है. यह सर्विस के जरिए लगभग पूरी एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया को घर में ही निजता और आसानी से किया जा सकता है.   क्यों महिलाएं करा रहीं एग फ्रीज? अंडों को फ्रीज करने का विकल्प महिलाओं को आजादी देता है और उन्हें अपनी इच्छा के मुताबिक संतान पैदा करने का अधिकार देता है. लगातार महंगी हो रही एजुकेशन और करियर के दबाव की वजह से अधिकांश जोड़े आजकल देर से और करियर में सेटल होने के बाद ही मां-बाप बनने की प्लैनिंग कर रहे हैं ताकि संतान आने से पहले ही वो आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएं.  Oocyte cryopreservation महिला की फर्टिलिटी क्लॉक, हेल्थ इश्यूज, मेनापॉस या लाइफस्टाइल से प्रभावित हुए बिना अंडों को संरक्षित रखने में मदद करता है जिसके बाद वो In vitro fertilization (IVF) के जरिए बाद में इन अंडों का उपयोग मां बनने के लिए कर सकती हैं.  कब तक करा लेनी चाहिए egg freezing दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिशियन गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम सूरी egg freezing (अंडे जमाना) के बारे में बात करते हुए 'आजतक डॉट इन' से कहती हैं, भारत समेत पूरी दुनिया में महिलाओं की प्रजनन शक्ति (fertility) पहले से कम हुई है. वहीं, 30-35 वर्ष के बाद महिलाओं के अंडाणु की संख्या और गुणवत्ता तेजी से गिरती है जिससे गर्भधारण के अवसर कम होते जाते हैं. इस वजह से महिलाएं अब अपने अंडों को लैब में फ्रीजिंग कर रही हैं ताकि उन्हें शादी या बच्चे की प्लानिंग के लिए बाद में उपयोग कर सकें. कैसे होता है egg freeze अमेरिका के ओहियो में हाल ही में 30 साल पुराने फ्रीज्ड अंडे से एक दम स्वस्थ बच्चा पैदा हुआ है. इस बारे में डॉ. नीलम बताती हैं कि अंडाणु जमा कराना एक सुरक्षित प्रक्रिया है जिसमें महिला के अंडाशय से अंडाणु निकालकर उन्हें -196 डिग्री सेल्सियस पर फ्रीज कर दिया जाता है जो 20 साल तक सुरक्षित रहते हैं. कैंसर जैसी बीमारियों में भी महिलाओं के लिए एग्स फ्रीजिंग जरूरी होती है क्योंकि रेडियोथेरेपी या कीमोथेरेपी से एग्स नष्ट हो सकते हैं. एग फ्रीजिंग का सक्सेस रेट क्या है इस सवाल के जवाब में डॉक्टर नीलम ने कहा, 'गर्भधारण की सफलता मुख्य रूप से अंडाणु की गुणवत्ता पर निर्भर करती है. 35 साल से पहले अंडा जमाने पर सक्सेस रेट करीब 60-70% होता है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह घटता जाता है. इसलिए एग फ्रीजिंग जितना जल्दी हो उतना बेहतर होता है.  ज्यादातर मामलों में 20-30 वर्ष के बीच ही ऐसा कर लेना चाहिए.'  क्या कोई भी महिला एग फ्रीजिंग करा सकती है  डॉ. नीलम ने बताया कि भारत में एग फ्रीजिंग कानूनी रूप से वैध है और यह महिला के अपने शरीर की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है. इसलिए कोई भी इसे करा सकता है. हालांकि इसके लिए मेडिकल सलाह जरूरी है, खासकर अगर महिला को कोई गंभीर बीमारी है या उसकी फर्टिलिटी गिर रही है. एग फ्रीजिंग का फैसला महिला के व्यक्तिगत कारणों और मेडिकल इंडिकेटर्स पर आधारित होता है. आखिर में वो बताती हैं कि अंडाणु जमाने के बाद भ्रूण में कोई आनुवांशिक समस्या न हो, इसके लिए PGD (preimplantation genetic diagnosis) कराना चाहिए ताकि स्वस्थ बच्चे का जन्म हो सके. egg freezing एक सुरक्षित और प्रभावी तकनीक है. यह उनके लिए फायदेमंद है जो सही पार्टनर ना मिल पाने के कारण लेट मैरिज कर रही हैं, करियर को लेकर ज्यादा फोकस्ड हैं, या फिर किसी मेडिकल कंडीशन से जूझ रही हैं. महिलाएं सीमित अंडों के साथ पैदा होती हैं लखनऊ में सी के बिड़ला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ की सेंटर हेड डॉक्टर श्रेया गुप्ता का कहना है कि पुरुषों की तरह महिलाओं में अंडों का उत्पादन पूरे जीवन भर नहीं होता है. महिलाओं के अंडाणु (Eggs) पहले से निश्चित संख्या में होते हैं जो जन्म के समय सबसे ज्यादा होते हैं लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है उनकी संख्या और गुणवत्ता कम होती जाती है.   उदाहरण के लिए 30 के बाद लगभग बड़ी संख्या में एग्स खत्म हो जाते हैं और 37 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते यह करीब 90% तक कम हो जाते हैं. इस वजह से भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में एग फ्रीजिंग की मांग बढ़ी है. इन बीमारियों के इलाज से पहले करानी चाहिए एग फ्रीजिंग ऑटोइम्यून और कैंसर जैसी कई बीमारियों के इलाज से पहले भी अंडाणु फ्रीज कराए जा सकते हैं क्योंकि कैंसर की दवाएं अंडाणु को नुकसान पहुंचा सकती हैं.  आज के समय में 10 से 15 वर्षों तक अंडाणु सुरक्षित रखे जा सकते हैं. हालांकि अंडाणु में लंबी अवधि तक स्पर्म या भ्रूण (एंब्रियो) की तुलना में कम समय तक सुरक्षित रह सकते हैं.   कुछ महिलाओं के 50 की उम्र के बाद भी पीरियड्स आते हैं लेकिन वो … Read more

मोटापा घटाने का नया विकल्प: गोलियां जल्द आएंगी, इंजेक्शन के मुकाबले असर कितना?

नई दिल्ली भारत में फिलहाल वजन कम करने वाली और डायबिटीज को कंट्रोल करने वाली 2 दवाएं औपचारिक रूप से लॉन्च हो चुकी हैं. इनमें अली लिली की मौनजारो और नोवो नॉर्डिस्क की वेगोवी शामिल हैं. दुनिया भर में ओजेम्पिक, मौनजारो और वेगोवी जैसी दवाएं कई देशों में इंजेक्शन के रूप में मौजूद हैं लेकिन अब खबर आई है कि एली लिली और नोवो नॉर्डिस्क कंपनी जल्द ही मोटापे के इलाज की गोलियां भी मार्केट में लॉन्च करने जा रही है. इन वजन कम करने वाली गोलियों की अमेरिका में कीमतें उनके वजन घटाने वाले इंजेक्शनों के बराबर होंगी. हालांकि दोनों ही कंपनियों ने इन दवाओं की कीमतों का अभी तक कोई खुलासा नहीं किया है. उनका कहना है आने वाली दवाओं को मंजूरी मिलने और लॉन्च होने में अभी कुछ महीनों का समय है इसलिए कीमतें बदल सकती हैं. कब लॉन्च होंगी गोलियां? डेनमार्क स्थित नोवो को इस साल के अंत में मंजूरी मिलने और उसके तुरंत बाद लॉन्च होने की उम्मीद है जबकि इंडियानापोलिस स्थित लिली को अगस्त 2026 तक लॉन्च होने की उम्मीद है. नोवो की वेगोवी और लिली की जेपबाउंड (टिरजेपेटाइड, टाइप 2 डायबिटीज और वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक दवा) जो वीकली इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. यह GLP-1 हार्मोन को टारगेट करने वाली एकमात्र अत्यधिक प्रभावी वजन घटाने वाली दवाएं हैं और इनका अमेरिका में सबसे बड़ा मार्केट है. अमेरिका में इनकी कीमत लगभग ₹83,000 से ₹85,000 प्रति माह या उससे अधिक है. दोनों कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस बीमा की जगह नकद भुगतान करने वाले ग्राहकों को ₹41,417 से ₹42,415 मासिक में दवा प्रदान करती है. अगर भारत की बात करें तो भारत में मौनजारो (Mounjaro) की 1 महीने (4 इंजेक्शन) की खुराक की कीमत लगभग 14,000 रुपये से 17,500 रुपये तक है, जबकि वेगोवी (Wegovy) की 1 महीने की खुराक की कीमत करीब 17,345 रुपये से 26,015 रुपये के बीच है. इंजेक्शन और गोली में से क्या अधिक इफेक्टिव? दोनों कंपनियों ने कहा है कि उन्होंने मरीजों की जरूरतों को पूरा करने और बाजार तक पहुंच बढ़ाने के लिए, मुंह से ली जाने वाली वजन घटाने वाली दवाएं विकसित की हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कुछ लोग इंजेक्शन से परहेज करते हैं. हालांकि, गोलियां इंजेक्शन से अधिक असरदार नहीं हैं. लिली ने इस महीने कहा कि उसकी गोली ऑर्फोर्ग्लिप्रॉन ने एक परीक्षण में 72 हफ्तों के बाद 12.4 प्रतिशत वजन कम किया. वहीं इसकी तुलना नोवो की रोजाना ली जाने वाली सेमाग्लूटाइड से 15 प्रतिशत वजन कम होने से की जा सकती है. दोनों ही लिली के इंजेक्शन से 21 प्रतिशत तक पीछे हैं. यूबीएस के विश्लेषक ट्रुंग हुइन्ह ने कहा कि कीमत शायद आज की मौजूदा दवाओं के बराबर या थोड़ी कम होंगी. वहीं टीडी कोवेन के विश्लेषक माइकल नेडेलकोविच ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नोवो की गोली वेगोवी की कीमत के आसपास ही शुरू होगी. उन्होंने अपनी डायबिटीज की गोली राइबेलसस की कीमत का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी डायबिटीज की गोली ओजेम्पिक जो वेगोवी का डायबिटिक-ट्रीटमेंट वैरिएंट है, उसके इंजेक्शन के बराबर कीमत रखी गई है. नोवो के अधिकारियों ने इस महीने विश्लेषकों को बताया कि वे नई गोली के लिए रियायती मूल्य निर्धारित करने की जल्दी में नहीं हैं. विश्लेषकों के अनुसार, ओरल जीएलपी-1 दवाएं इंजेक्शन की जगह लेने के बजाय एक विशिष्ट स्थान भरेंगी. टीडी कोवेन का अनुमान है कि 2030 तक मध्य किशोरावस्था में गोलियां ग्लोबल ओबेसिटी की दवा बाजार में 1 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर लेंगी, जो तब तक करीब 12.45 लाख करोड़ तक पहुंच सकती हैं.