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बिना ATM कार्ड के भी मिल जाएगा कैश! UPI से पैसे निकालने का नया तरीका समझें

नई दिल्ली आपको पता है कि आप ATM से UPI के जरिए भी पैसे निकाले जा सकते हैं। इसका मतलब है कि ATM से पैसे निकालने के लिए डेबिट कार्ड का पास होना जरूरी नहीं है। दरअसल अब ज्यादातर बैंकों ने अपने ATM में QR Code Scan या UPI Money का ऑप्शन देना शुरू कर दिया है। UPI के जरिए ATM से पैसा निकालना न सिर्फ आसान है बल्कि यह कार्ड क्लोनिंग और स्किमिंग जैसे बड़े साइबर खतरों से भी सुरक्षित रखता है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसका पता होना चाहिए। UPI से कैश निकालने के फायदे UPI से कैश निकालने के कई फायदे हैं। अगर आपके पास कार्ड न हो या आप उसे घर भूल गए हों, तो भी आप जरूरत पड़ने पर आसानी से ATM से कैश निकाल सकते हैं। यह प्रोसेस न सिर्फ तेज है बल्कि आसान भी है, क्योंकि आपको बार-बार कार्ड डालने या पिन छुपाकर टाइप करने का झंझट नहीं रहता। बस एक QR कोड स्कैन करते ही आपका काम हो जाता है। इसकी वजह से आपको फिजिकल डेबिट कार्ड साथ रखने की जरूरत नहीं रहती। इससे कार्ड के खोने या चोरी होने का डर भी खत्म हो जाता है। यह नई तकनीक आपको 'कार्ड क्लोनिंग' और 'स्किमिंग' जैसे खतरनाक साइबर फ्रॉड से भी बचाती है। कैसे निकालें UPI से कैश     इसके लिए सबसे पहले एटीएम मशीन के पास जाएं और वहां स्क्रीन पर दिख रहे 'UPI Cash Withdrawal' के ऑप्शन को चुनें।     अब ATM मशीन पर वह राशि टाइप करें जिसे आप निकालना चाहते हैं।     इसके बाद ATM मशीन पर एक QR कोड दिखाई देगा, उसे UPI ऐप के जरिए स्कैन करें। याद रहे कि इस QR कोड का इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है।     अपब अपने फोन पर UPI PIN डालें।     PIN डालते ही आपको ATM मशीन से पैसे मिल जाएंगे। ध्यान रखने वाली बातें ATM से UPI के जरिए कैश निकालते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:     ATM में UPI फीचर उपलब्ध हो। इसे आप मशीन में कैश निकालने के लिए दिए गए ऑप्शन से समझ सकते हैं।     इसके अलावा, आपके पास अपना फोन और फोन में कोई चालू UPI ऐप होनी चाहिए। इसके साथ ही ऐप अपडेटेड भी हो।     आपके फोन का इंटरनेट काम कर रहा हो।     आपको अपना UPI PIN याद हो।     इस फीचर का इस्तेमाल कर आप 5000 से 10000 रुपये तक ही निकाल सकते हैं।

स्पेस में प्रेग्नेंसी: क्या अंतरिक्ष में बच्चे का जन्म हो सकता है?

जैसे-जैसे इंसान मंगल और चंद्रमा पर बस्तियां बसाने की योजना बना रहा है, एक बड़ा सवाल वैज्ञानिकों के सामने खड़ा है- 'क्या अंतरिक्ष में गर्भधारण और बच्चे का जन्म सुरक्षित है?' अब तक की रिसर्च इशारा करती है कि तकनीकी रूप से यह संभव तो है, लेकिन बिना पृथ्वी के सुरक्षा कवच (गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडल) के, एक नए जीवन का विकास किसी बड़े खतरे से कम नहीं होगा। हड्डियों और मांसपेशियों पर संकट पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हमारे शरीर की हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती देने में प्राथमिक भूमिका निभाता है। अंतरिक्ष की माइक्रोग्रैविटी में भ्रूण (Fetus) के विकास के दौरान उसकी हड्डियों के घनत्व (Density) में भारी कमी आ सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीरो ग्रेविटी के कारण बच्चे का ऊपरी शरीर तो विकसित हो सकता है, लेकिन निचले हिस्से और पैरों की मांसपेशियां बेहद कमजोर रह सकती हैं।   ब्रेन और विजन पर असर अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण शरीर के तरल पदार्थ (Body Fluids) सिर की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की खोपड़ी के अंदर दबाव बढ़ सकता है। यह असामान्य दबाव बच्चे के मस्तिष्क विकास (Brain Development) और आंखों की रोशनी को प्रभावित कर सकता है, जिससे भविष्य में न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा होने का खतरा रहता है। 

थाइरॉएड में शुगर और सोया से दूरी क्यों जरूरी है

थाइरॉएड, गर्दन के सामने वाले हिस्से में तितली के आकार की ग्रंथि है। इससे निकलने वाले हार्मोंस शरीर की भोजन को ऊर्जा में बदलने की क्षमता को काबू में रखते हैं। इस ग्रंथि में गड़बड़ी आने पर हाइपो या हाइपर थाइरॉएडिज्म होता है और वजन तेजी से कम या बढ़ने लगता है। हृदय, बाल, नाखून व नींद पर भी इसका असर होता है। दवाओं के अलावा थाइरॉएड पीड़ितों के लिए खान-पान का ध्यान रखना भी जरूरी है। आयोडीन शरीर में थाइरॉएड हार्मोन बनने के लिए आयोडीन की जरूरत होती है। चूंकि शरीर स्वयं आयोडीन नहीं बनाता, इसलिए उसे डाइट में लेना जरूरी हो जाता है। आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करें। ध्यान रखें कि समुद्री नमक या डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले नमक में आयोडीन नहीं होता। नमक या उत्पाद खरीदते समय इसका ध्यान रखें। समुद्री भोजन मछली, झींगा आदि तमाम तरह के समुद्री भोजन में आयोडीन प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। यदि हाइपर थाइरॉएडिज्म की शिकायत है, तो समुद्री भोजन अधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए। अगर थाइरॉएड ग्रंथि अधिक मात्रा में हार्मोन बनाती है तो अतिरिक्त आयोडीन स्थिति को और गंभीर बना देता है। उदाहरण के लिए समुद्री घास में आयोडीन बहुत अधिक मात्रा में होता है। हरी पत्तेदार सब्जियां, मेवे और बीज मैग्नीशियम की कमी से हाइपो थाइरॉएडिज्म होता है, जिससे थकावट व मांसपेशियों में खिंचाव रहने लगता है। इसके लिए पालक, लेट्यूस, हरी पत्तेदार सब्जियां, काजू, बादाम और सीताफल के बीज खाएं। ब्राजील मेवों में मैग्नीशियम के साथ सेलेनियम भी होता है। सोयाबीन विशेषज्ञों के अनुसार सोयाबीन लेना हाइपोथाइरॉएडिज्म की आशंका बढ़ाता है। यदि पर्याप्त आयोडीन नहीं ले रहे हैं तो सोया उत्पाद जैसे दूध व टोफू आदि में पाए जाने वाले रसायन थाइरॉएड की हार्मोन बनाने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। चीनी हाइपोथाइरॉएडिज्म में वजन तेजी से बढ़ता है। इसके लिए शुगर की मात्रा को कम रखना चाहिए। खासतौर पर ऐसे उत्पाद जिनमें कैलोरी अधिक व पोषक तत्व कम होते हैं, खाने से बचना चाहिए। दवाएं कुछ दवाएं थाइरॉएड दवाओं के असर को कम करती हैं। खासतौर पर अगर वे लगभग एक ही समय ली जा रही हों। मल्टी विटामिंस, आयरन कैल्शियम सप्लीमेंट्स, एंटासिड, अल्सर या कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली दवाएं इनमें प्रमुख हैं। यदि आप ऐसी ही दवाएं ले रहे हैं तो थाइरॉएड व अन्य दवाओं में कुछ घंटे का अंतर अवश्य रखें। गोभी व ब्रोकली गाइट्रोजेंस, तत्व का असर थाइरॉएड ग्रंथि के आकार बढ़ने के रूप में दिखायी देता है जैसे गॉइटर। शरीर में आयोडीन की कमी से यह समस्या होती है। ऐसी स्थिति में गोभी, ब्रोकली, बंद गोभी खाना आयोडीन ग्रहण करने की क्षमता को कम करता है। जरूरी है तो इन्हें पकाकर ही खाएं। ग्लुटेन ग्लुटेन, गेहूं व जौ में पाया जाने वाला प्रोटीन है। ग्लूटेन की एलर्जी वालों को छोड़ दें तो ग्लूटन थाइरॉएड पर असर नहीं डालता। हां, अगर गेहूं आदि से एलर्जी है तो ग्लूटेन छोटी आंत को नुकसान पहुंचा कर थाइरॉएड ग्रंथि की प्रक्रिया को तेज या धीमा कर सकता है।  

एक गोली में लंबी जिंदगी का राज! क्या सच में रुक सकता है बुढ़ापा?

जुटे वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिलने का दावा किया गया है। चीन के शेनझेन स्थित एक स्टार्टअप ने एक ऐसी प्रयोगात्मक दवा विकसित करने का दावा किया है, जो इंसानी शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर उसे 150 वर्ष तक जीवित रहने में मदद कर सकती है। यह शोध मुख्य रूप से शरीर के भीतर मौजूद उन 'घातक' कोशिकाओं को निशाना बनाता है, जो बुढ़ापे और बीमारियों की जड़ मानी जाती हैं। क्या है 'जॉम्बी सेल्स' का रहस्य? वैज्ञानिक भाषा में इन्हें सेनेसेंट सेल्स कहा जाता है, लेकिन अपनी प्रकृति के कारण ये 'जॉम्बी सेल्स' के नाम से मशहूर हैं। ये वे कोशिकाएं हैं जो बूढ़ी हो चुकी हैं और अब विभाजित नहीं होतीं। ये खत्म होने के बजाय शरीर में जमा रहती हैं और जहरीले रसायनों का स्राव करती हैं, जिससे सूजन बढ़ती है। यही कोशिकाएं हृदय रोग, गठिया और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देती हैं। अंगूर के बीज से निकलेगा 'जवानी का अर्क' रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रयोगात्मक दवा में अंगूर के बीज से निकाले गए विशेष तत्वों का उपयोग किया गया है। यह दवा 'सेनोलिटिक' (Senolytic) श्रेणी की है, जिसका मुख्य कार्य शरीर को स्कैन करके इन 'जॉम्बी कोशिकाओं' को चुन-चुनकर नष्ट करना है। कैसे काम करेगी यह गोली? कंपनी का दावा है कि जब शरीर से खराब कोशिकाएं हट जाएंगी, तो:     ऊतकों (Tissues) को होने वाला नुकसान कम होगा।     शरीर की आंतरिक सूजन में भारी गिरावट आएगी।     अंगों की कार्यक्षमता फिर से युवा जैसी होने लगेगी। शुरुआती जानवरों के परीक्षण में इसके उत्साहजनक परिणाम मिले हैं, जहां जीवों की शारीरिक शक्ति में सुधार और उम्र के लक्षणों में कमी देखी गई है। विशेषज्ञों की चेतावनी: अभी राह लंबी है भले ही यह खबर सुनने में क्रांतिकारी लगे, लेकिन वैश्विक विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। लैब के नतीजों को इंसानों पर प्रभावी साबित करने के लिए कई चरणों के कड़े परीक्षणों की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि ये दवाएं स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान न पहुंचाएं। किसी भी ऐसी दवा को आम जनता के लिए उपलब्ध होने में अभी कई वर्षों का समय लग सकता है।

Android और iPhone के लिए 5 शानदार ऐप्स जो आपको ज़रूर इस्तेमाल करने चाहिए

यदि आप बोरिंग एप्स की लिस्ट से अलग कुछ चाहते हैं तो पेश है कुछ ऐसे ही शानदार एप्स, इनमें सें कुछ गेम्स के लिए हैं और बाकि के आपके मनोरंजन के लिए। एंड्रायड के लिए चीजबर्गर चीजबर्गर एप के साथ आप फनी इमेज, जिफ, वीडियोज को फॉलो कर सकते हैं। ये कूल और फनी इमेज डिवाइस में सेव भी किए जा सकते हैं और दोस्तों के साथ शेयर भी कर सकते हैं। रिंगड्रोईड एंड्रायड के लिए रिंगड्रोईड एक ओपन सोर्स रिंगटोन एडिटर है, इसकी मदद से आप डिवाइस में मौजूद मयुजिकध्ऑडियो फाइल्स और नया रिकार्ड कर पर्सनल रिंगटोंस, अलार्म और नोटिफिकेशन साउंट बना सकते हैं। स्काई मैप अपने एंड्रायड फोन का उपयोग कर गूगल स्काई मैप की मदद से आप यूनिवर्स को खंगाल सकते हैं। इस एप की मदद से आप तारों, ग्रहों और अन्य खगोलिय पिंडों के सटीक स्थिति का पजा लगा पाएंगे। इसके लिए बस आपको आसमान की तरफ अपने फोन को प्वाइंट करना होगा और इसके बाद आसमान में मौजूद सभी चीजों को आप गूगल स्काई मैप पर आसानी से देख सकेंगे। मोविज बाय फ्लिक्स्टर मोविज बाय फ्लिक्स्टर एक सरल और शानदार एप है जिससे कौन सी मूवी चल रही है इसका पता लग जाएगा। इसमें मीडिया स्ट्रीमिंग और न्यूज जैसे कई रोचक टूल्स भी हैं, जो काफी शिक्षाप्रद है। ड्रोप कांटैक्स्ट एंड डिलर्स यह एप आपके पुराने फोनबुक एप की जगह ले सकता है। यह एप कंटैक्ट्स व कम्युनिकेशन एप्स को एक साथ लाता है, जो आपके स्क्रीन से एक्सेस किया जा सकता है। अब आईओएस एप्स फिश फूड फ्रैंजी फन यह काफी साधारण गेम है और कभी कभी यह चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है। इस गेम में ज्यादा से ज्यादा बराबर या अपने से छोटी मछलियों को खाना है। जितनी अधिक मछलियों को खाएंगे आप बड़े होते जाएंगे। हाॅरिजोन कैमरा वीडियो लवर्स के लिए यह पसंदीदा एप साबित होगा। हाॅरिजोन कैमरा हमेशा पोट्रेट रिकार्डिंग लेता है। एप में आयताकार इंडिकेटर है जो हमेशा स्क्रीन के केंद्र में होता है और रिकार्ड वीडियोज को क्लिक करना आसान बनाता है। अमेरिकन इंटीरियर अमेरिकन इंटीरियर एप को पेंगुइन ने बनाया है। यह एक ऐसा एप है जो कहानी सुनाता है। इस एप में 100 अलग अलग एंट्री हैं, इसमें आर्टवर्क, एनिमेशन, कहानियां, फिल्म क्लिप और ऑरिजिनल म्युजिक है। हेज कई वेदर एप्स में से हेज भी एक है। इस एप के साथ आप अपने फोरकास्ट में कुछ रंग डाल सकते हैं। आप इसमें तापमान, बारिश आदि देख सकते हैं और मौसम के विवरण का हाल भी ले सकते हैं। स्लीप बैटर स्लीप बैटर एप के साथ आप अपनी नींद को ट्रैक कर सकते हैं, सपनों को मॉनिटर कर सकते हैं, अपने बेडटाइम आदतों को और अच्छा बना सकते हैं।  

बच्चों के लिए कितनी नींद है जरूरी? उम्र के अनुसार जानें सही स्लीप टाइम

कई पेरेंट्स अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके पर्याप्त सोते नहीं है। वहीं, कुछ इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके बच्चे ज्यादा सोते हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि हेल्दी रहने के लिए अच्छी नींद जरूरी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बच्चों के लिए पर्याप्त नींद क्या होती है। इसका जवाब आपकी सोच से परे है। आज इस आर्टिकल में हम इसी के बारे में जानेंगे कि किस उम्र के बच्चे को कितनी देर सोना जरूरी है। क्या आपका बच्चा पूरी नींद ले रहा है? नींद सिर्फ थकान मिटाने के लिए नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए भी बेहद जरूरी है। नेशनल स्लीप फाउंडेशन (NSF) के अनुसार, बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से अलग-अलग घंटों की नींद चाहिए होती है। हालांकि, अमेरिका में हुए एक नए सर्व में यह पता चलता है कि लगभग 44% बच्चे (खासकर छोटे बच्चे) अपनी उम्र के हिसाब से पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। नींद सिर्फ एक बच्चे की नहीं, पूरे परिवार की समस्या है बचपन की नींद यह तय करती है कि बड़े होने पर इंसान का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य कैसा रहेगा। जॉन हॉप्किंस यूनिवर्सिटी की डॉ. लौरा स्टर्नी भी यह मानती हैं कि अगर बच्चा ठीक से नहीं सोता, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। सर्वे में शामिल 80% माता-पिता ने माना कि बच्चे की नींद खराब होने से उनकी खुद की नींद और रूटीन भी बिगड़ जाता है। वहीं, 86% का मानना है कि अच्छी नींद से बच्चे का मूड और व्यवहार दोनों बेहतर होते हैं। बच्चों में क्यों हो रही नींद की समस्या?     टेंशन ज्यादा, नींद कम: 74% माता-पिता रोजाना औसतन दो घंटे सिर्फ इस बात की चिंता में बिता देते हैं कि उनका बच्चा ठीक से सो रहा है या नहीं।     नींद का गलत अनुमान: अक्सर माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे को कम नींद की जरूरत है। खासकर 0 से 3 महीने के बच्चों के मामले में 78% माता-पिता यह गलती करते हैं और बच्चों को जरूरत से एक घंटा कम सुलाते हैं।     बातचीत की कमी: माता-पिता बच्चों की नींद को लेकर चिंतित तो हैं, लेकिन वे बच्चों से 'अच्छी नींद क्यों जरूरी है' इस बारे में कभी बात नहीं करते। बच्चों में अच्छी नींद की आदत कैसे डालें?     सिर्फ लाइट बंद करने का समय फिक्स न करें, बल्कि सोने से पहले का एक रूटीन बनाएं। जैसे- कमरे की रोशनी कम करना, पर्दे गिराना या कहानी सुनाना। इससे बच्चे के दिमाग को सिग्नल मिलता है कि अब सोने का समय हो गया है।     सोने से पहले टीवी, मोबाइल या वीडियो गेम्स पूरी तरह बंद कर दें। इसकी जगह शांत संगीत सुनें या किताबें पढ़ें।     सुबह उठते ही बच्चे को नेचुरल लाइट (धूप) दिखाएं। इससे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक (सर्कैडियन रिदम) सेट होती है।     बच्चों को दिन में अच्छी तरह खेलने-कूदने दें, लेकिन सोने से ठीक पहले हेवी एक्सरसाइज या उछल-कूद से बचाएं।  

बाल नहीं बढ़ रहे? दही के इन 5 हेयर मास्क से पाएँ तेजी से लंबी और घनी हेयर ग्रोथ

बालों की खूबसूरती और मजबूती के लिए हम अक्सर महंगे प्रोडक्ट्स पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन असली खजाना हमारी रसोई में ही छिपा है। दही न केवल स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि यह बालों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड, प्रोटीन और विटामिन बालों की जड़ों को पोषण देते हैं। साथ ही, यह स्कैल्प को एक्सफोलिएट करके डेड सेल्स और गंदगी साफ करता है। इसलिए अगर आप गिरते बालों या रुकी हुई हेयर ग्रोथ से परेशान हैं, तो दही से बने ये 5 हेयर मास्क आपके लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। दही और करी पत्ता मास्क करी पत्ता बीटा-कैरोटीन और प्रोटीन से भरपूर होता है, जो बालों को झड़ने से रोकता है। इस हेयर मास्क को बनाने के लिए आधा कप दही में एक मुट्ठी करी पत्तों का पेस्ट मिलाएं। इसे स्कैल्प पर लगाकर 30 मिनट छोड़ दें और फिर माइल्ड शैम्पू से धो लें। दही, शहद और नींबू अगर डैंड्रफ की वजह से आपके बाल नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह मास्क सबसे बेस्ट है। नींबू के एंटी-बैक्टीरियल गुण और शहद की नमी बालों को रेशमी बनाती है। इसके लिए एक कटोरी दही में एक चम्मच शहद और आधा नींबू का रस मिलाएं। इसे बालों की जड़ों में लगाएं और 20 मिनट बाद धो लें। यह स्कैल्प के pH लेवल को बैलेंस करता है। दही और अंडा मास्क बाल मुख्य रूप से केराटिन से बने होते हैं। अंडा और दही मिलकर बालों को जबरदस्त प्रोटीन डोज देते हैं। इसे बनाने के लिए एक अंडा फेंटें और उसमें 2-3 चम्मच दही मिलाएं। इसे पूरे बालों में लगाएं। 30 मिनट बाद ठंडे पानी से धोएं। गर्म पानी का इस्तेमाल न करें, वरना अंडा बालों में चिपक सकता है। यह मास्क बालों को घना बनाता है। दही और मेथी दाना मेथी में निकोटिनिक एसिड होता है जो बालों की री-ग्रोथ में मदद करता है। इसे बनाने के लिए रात भर भीगी हुई मेथी को पीसकर पेस्ट बना लें और इसे दही में मिलाएं। इसे स्कैल्प पर लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें और 45 मिनट बाद धो लें। यह बालों को जड़ों से मजबूती देता है। दही और एलोवेरा रूखे और बेजान बालों की ग्रोथ अक्सर रुक जाती है। एलोवेरा दही के साथ मिलकर स्कैल्प को हाइड्रेट करता है। इसे बनाने के लिए ताजे एलोवेरा जेल को दही के साथ बराबर मात्रा में मिलाएं। इसे बालों की लंबाई और जड़ों पर लगाएं। 1 घंटे बाद धो लें। इससे बाल उलझना कम होंगे और टूटना बंद हो जाएंगे। इन बातों का रखें ध्यान     ताजा दही- हमेशा ताजे और सादे दही का ही इस्तेमाल करें।     नियमितता- अच्छे परिणाम के लिए इनमें से कोई भी मास्क हफ्ते में कम से कम एक बार जरूर लगाएं।     पैच टेस्ट- अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है, तो इस्तेमाल से पहले एक छोटा पैच टेस्ट जरूर कर लें।  

क्या घर में रहकर भी लगानी चाहिए सनस्क्रीन? एक्सपर्ट्स बताते हैं क्यों है ये जरूरी

सूरज की यूवी किरणों से बचने के लिए सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना जरूरी है। इसलिए  ज्यादातर लोग मानते हैं कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल केवल तभी करना चाहिए जब हम तेज धूप में बाहर जा रहे हों, लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। क्या आपने कभी सोचा है कि घर की चारदीवारी में रहते हुए भी आपकी स्किन पर टैनिंग, हाइपरपिग्मेंटेशन या फाइन लाइन्स क्यों नजर आने लगते हैं? इसका जवाब हो सकता है घर के अंदर सनस्क्रीन का इस्तेमाल न करना। आइए समझते हैं क्यों घर के अंदर भी सनस्क्रीन लगाना जरूरी है। खिड़कियों से आने वाली यूवी किरणें सूरज की किरणें मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं- यूवीए और यूवीबी     यूवीबी किरणें स्किन बर्न का कारण बनती हैं, लेकिन ये कांच को पार नहीं कर पातीं। इसलिए घर के अंदर आपको सनबर्न नहीं होता।     यूवीए किरणें ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि ये बादलों और खिड़की के कांच को आसानी से पार कर सकती हैं। ये किरणें त्वचा की गहराई तक जाती हैं और कोलेजन को डैमेज कर देती हैं। इसलिए अगर आप घर में ऐसी जगह बैठते हैं, जहां खिड़की से रोशनी आती है, तो आपकी त्वचा लगातार यूवीए किरणों के संपर्क में रहती है। इससे चेहरे पर काले धब्बे और झुर्रियां पड़ने का खतरा बना रहता है। डिजिटल स्क्रीन और ब्लू लाइट आज के दौर में हम अपना ज्यादातर समय स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन के सामने बिताते हैं। इन डिजिटल उपकरणों से हाई एनर्जी विजिबल लाइट निकलती है, जिसे हम ब्लू लाइट कहते हैं। लंबे समय तक ब्लू लाइट के संपर्क में रहने से त्वचा में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। यह स्ट्रेस त्वचा की रंगत को असमान बना सकता है और पिगमेंटेशन की समस्या को बढ़ा सकता है। इसलिए भी घर के अंदर सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना जरूरी है।   सही सनस्क्रीन कैसे चुनें? घर के अंदर आपको बहुत भारी या चिपचिपी सनस्क्रीन लगाने की जरूरत नहीं है। आप इन बातों का ध्यान रख सकते हैं-     SPF 30- घर के अंदर के लिए भी कम से कम SPF 30 वाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करें।     ब्रॉड स्पेक्ट्रम- चेक करें कि आपकी सनस्क्रीन UVA और UVB दोनों से सुरक्षा दे।     लाइटवेट फॉर्मूला- जेल या लोशन बेस्ड सनस्क्रीन घर में लगाने के लिए बेहतर हैं, क्योंकि ये लाइट वेट होते हैं।  

Xiaomi ने फैक्ट्री में इंसान जैसे ह्यूमनॉइड रोबोट्स उतारे, अब इंसानों की जरूरत नहीं होगी!

नई दिल्ली चीन की टेक कंपनी Xiaomi अब स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक कार के बाद एक और बड़ी टेक्नोलॉजी रेस में उतर चुकी है. कंपनी के मुताबिक आने वाले कुछ सालों में उनकी फैक्ट्रियों में इंसानों की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट बड़ी संख्या में काम करते दिखाई दे सकते हैं। Xiaomi के CEO ली जुन ने बताया है कि कंपनी अगले पांच साल के भीतर अपने प्रोडक्शन प्लांट्स में बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट तैनात करने की योजना बना रही है. कंपनी के वीडियो में ह्यूमनॉइड रोबोट्स को फैक्ट्री में काम करते हुए देखा जा सकता है। दरअसल Xiaomi ने हाल ही में अपने ऑटोमोबाइल फैक्ट्री में ह्यूमनॉइड रोबोट का ट्रायल शुरू किया है. इस टेस्ट के दौरान रोबोट ने बिना किसी इंसानी मदद के करीब तीन घंटे तक लगातार काम किया और कार असेंबली से जुड़े कई काम पूरे किए। इन रोबोट्स को कार के फ्लोर पर स्क्रू लगाना और छोटे-छोटे पार्ट्स फिट करने जैसे काम दिए गए थे, जिनमें करीब 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर देखने को मिली। Xiaomi के मुताबिक इन रोबोट्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे फैक्ट्री के तेज प्रोडक्शन सिस्टम के साथ तालमेल बिठा सकें. कंपनी की कार फैक्ट्री में एक गाड़ी बनाने में लगभग 76 सेकंड लगते हैं, और रोबोट को उसी गति के साथ काम करने के लिए ट्रेन किया जा रहा है। इन रोबोट्स के पीछे Xiaomi का अपना AI सिस्टम और रोबोटिक्स प्लेटफॉर्म काम करता है. कंपनी ने इसके लिए विज़न-लैंग्वेज-एक्शन मॉडल और मल्टीमॉडल AI टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इससे रोबोट न सिर्फ चीजों को पहचान सकता है बल्कि यह भी समझ सकता है कि उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है. इसी वजह से रोबोट असेंबली लाइन में छोटे-छोटे जटिल काम भी कर पा रहा है। Xiaomi की स्ट्रैटिजी फिलहाल फैक्ट्री-फर्स्ट मानी जा रही है. यानी कंपनी पहले कंट्रोल्ड माहौल वाले इंडस्ट्रियल प्लांट में रोबोट को ट्रेन करेगी, ताकि वे असली दुनिया के काम सीख सकें. बाद में इसी तकनीक को घरों और सर्विस सेक्टर में इस्तेमाल करने की योजना है। दरअसल चीन इस समय आर्टिफिशियल इ्ंटेलिजेंस और रोबोटिक्स को लेकर काफी आक्रामक रणनीति अपना रहा है. कई टेक कंपनियां और स्टार्टअप ह्यूमनॉइड रोबोट विकसित कर रही हैं, जिन्हें मैन्युफैक्चरिंग से लेकर लॉजिस्टिक्स तक के कामों में लगाया जा सकता है। सरकार भी इस सेक्टर को भविष्य की इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी मानकर तेजी से बढ़ावा दे रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह तकनीक सफल होती है तो आने वाले दशक में फैक्ट्रियों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. कई जगहों पर इंसानों की जगह रोबोट काम करते दिखाई देंगे, जिससे उत्पादन तेज और सस्ता हो सकता है। हालांकि इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि बड़े पैमाने पर रोबोट के इस्तेमाल से मानव नौकरियों पर कितना असर पड़ेगा. फिलहाल Xiaomi का यह एक्सपेरिमेंट से ये तो क्लियर है कि आने वाले समय में स्मार्टफोन कंपनियां सिर्फ गैजेट्स नहीं बनाएंगी, बल्कि AI और रोबोटिक्स के जरिए पूरी इंडस्ट्रियल दुनिया को बदलने की कोशिश करेंगी।

ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में 2050 तक भारी बढ़ोतरी, 3.5 मिलियन केस तक पहुंचने का खतरा

नई दिल्ली भारत समेत दुनियाभर में लगातार कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. इस सिलसिले में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी सामने आई है. दरअसल मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट के अनुसार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर की व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.56 मिलियन तक पहुंच सकती है. वही अनुमानित आंकड़े 2.29 मिलियन से 4.83 मिलियन के बीच बताए गए हैं. सिर्फ मामले ही नहीं बल्कि मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक है, रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली वैश्विक मौतें 1.37 मिलियन तक पहुंच सकती है. यह अनुमान 8.41 लाख से लेकर 20.2 लाख तक के दायरे में है. वहीं मौजूदा समय में हर साल करीब 7.64 लाख मौतें हो रही है जो आने वाले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। अगले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं मौतें इस रिसर्च में बताया गया है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो 2050 तक सालाना मौतों की संख्या लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेडिकल साइंस में प्रगति के बाद भी कई देश बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार नहीं है. वहीं कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले देशों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है। भारत में 1990 के बाद बढ़े मामले रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भारत में पिछले 3 दशकों में देश में ब्रेस्ट कैंसर का बोझ 5 गुना बढ़ा है. बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण, देश में मातृत्व, ब्रेस्टफीडिंग में कमी, मोटापे और शुरुआती जांच की कमी को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया है. वहीं भारत में अब यह कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक बन चुका है, खासकर शहरी इलाकों में. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में महिलाओं की पहचान बीमारी के लास्ट स्टेज में होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है। अमीर और गरीब देशों के बीच भी साफ अंतर वहीं इस रिपोर्ट में यह भी साफ बताया गया है कि हाई आय वाले देशों में नए मामलों की दर स्थिर है और मृत्यु दर में कमी आई है. इसका कारण बेहतर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और आधुनिक उपचार व्यवस्थाएं हैं. वहीं कम और मिडिल आय वाले देशों में नए मामलों और मौतों दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इन देशों में रेडियोथेरेपी मशीनों की कमी, कीमोथेरेपी दवाइयों तक सीमित पहुंच और इलाज का ज्यादा खर्च बड़ी समस्या है. वहीं वैश्विक स्तर पर नए मामलों में इन देशों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है, लेकिन ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी कुल बीमारियों और समय से पहले मौतों में इनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है।