samacharsecretary.com

अंतरिक्ष में कबाड़ हटाने के लिए भारत-जापान साथ आए, निष्क्रिय सैटेलाइट के मलबे पर नजर

नई दिल्ली     अंतरिक्ष में पुराने सैटेलाइट और उनके टुकड़ों से होने वाले खतरे को कम करने के लिए भारत और जापान की दो कंपनियां साथ काम करेंगी. भारत की सैमटेल एवियोनिक्स और जापान की बुल कंपनी ने इस दिशा में अपनी साझेदारी आगे बढ़ाई है.  गुरुग्राम में दोनों कंपनियों के अधिकारियों ने इस योजना पर चर्चा की. इसका मकसद ऐसी तकनीक पर काम करना है, जिससे अंतरिक्ष में पहले से मौजूद मलबे को हटाने और आगे कचरा बढ़ने से रोकने में मदद मिल सके।  अंतरिक्ष में कई सैटेलाइट काम करते हैं. इनकी मदद से मौसम की जानकारी मिलती है और संचार जैसी जरूरी सेवाएं चलती हैं. लेकिन जब कोई सैटेलाइट काम करना बंद कर देता है, तो उसका मलबा अंतरिक्ष में रह जाता है. इसके टुकड़े दूसरे सैटेलाइट से टकराकर उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसी समस्या को कम करने के लिए दोनों कंपनियां अपनी तकनीक को एक साथ इस्तेमाल करने की योजना पर काम कर रही हैं।  सितंबर में हुआ था समझौता सैमटेल एवियोनिक्स और बुल कंपनी के बीच सितंबर 2026 में बेंगलुरु स्पेस एक्सपो के दौरान समझौता हुआ था. अब दोनों कंपनियां अपनी तकनीक को जोड़ने और उसे बेहतर बनाने के तरीकों पर काम कर रही हैं. वे यह भी देख रही हैं कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. सैमटेल एवियोनिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ पुनीत कौरा ने कहा कि अंतरिक्ष को सुरक्षित रखना किसी एक कंपनी के लिए आसान नहीं है. इसके लिए अलग-अलग कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।  क्या है जापानी कंपनी की तकनीक? बुल कंपनी की तकनीक को पोस्ट-मिशन डिस्पोजल (पीएमडी) कहा जाता है. इसका काम सैटेलाइट का मिशन पूरा होने के बाद उसे अंतरिक्ष में बेकार पड़े रहने से रोकने में मदद करना है. इससे आगे चलकर अंतरिक्ष में नया कचरा बनने की समस्या कम हो सकती है. लेकिन यह तकनीक पहले से अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को नहीं हटा सकती. इसी वजह से इसे सैमटेल के डेब्रिस रिमूवल व्हीकल (डीआरवी) के साथ जोड़ने की योजना पर विचार किया जा रहा है।  दोनों कंपनियां यह भी देख रही हैं कि बुल के उपकरण की मदद से पहले से अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को हटाने में कैसे मदद मिल सकती है. अभी इस योजना पर काम चल रहा है. कंपनियों ने किसी खास मिशन या रॉकेट लॉन्च की तारीख नहीं बताई है।  अंतरिक्ष में कचरा हटाना क्यों जरूरी? बुल कंपनी के सीईओ और संस्थापक यासुहितो उटो ने कहा कि अंतरिक्ष पूरी दुनिया के लिए जरूरी है. उनकी कंपनी की तकनीक आगे चलकर नया कचरा बनने से रोकने में मदद कर सकती है. लेकिन पुराने मलबे को हटाने के लिए दूसरी तकनीकों की भी जरूरत है।  अंतरिक्ष में मौजूद मलबे से काम कर रहे सैटेलाइट को नुकसान पहुंच सकता है. इससे मौसम, संचार और दूसरी सेवाओं पर भी असर पड़ने का खतरा रहता है. इसलिए सैटेलाइट का काम पूरा होने के बाद उसे सही तरीके से हटाना जरूरी है।  सैमटेल और बुल कंपनी इसी समस्या का हल खोजने के लिए साथ काम कर रही हैं. हालांकि, अभी यह शुरुआती तैयारी है. आगे यह देखना होगा कि दोनों कंपनियां अपनी तकनीक को किस तरह इस्तेमाल करती हैं और मलबा हटाने का काम कब शुरू हो पाता है। 

चंद्रमा से लौटते वक्त 192 करोड़ का टॉयलेट हुआ जाम, 4 यात्री फंसे अजीब समस्या में

 नई दिल्ली चंद्रमा के चारों ओर सफल यात्रा के बाद ओरियन स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की ओर लौट रहा है. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन $23 मिलियन (करीब 192 करोड़ रुपये) का टॉयलेट अचानक खराब हो गया. यूरिन को स्पेस में फेंकने वाली व्यवस्था बंद हो गई है. NASA का मानना है कि यूरिन सिस्टम में एक केमिकल रिएक्शन की वजह से यह समस्या हुई है. पॉटी निकालने वाली अलग व्यवस्था ठीक काम कर रही है।  एस्ट्रोनॉट क्रिस्टीना कोच ने कहा कि यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम से जलती हुई हीटर जैसी बदबू आ रही है. फ्लाइट डायरेक्टर रिक हेनफ्लिंग ने बताया कि टॉयलेट अब भी काम कर रहा है, लेकिन समस्या वेस्टवॉटर टैंक को खाली करने में है. वेंट यानी निकासी कम हो गया है. इसलिए क्रू को बैकअप का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अभी चारों एस्ट्रोनॉट्स व्यक्तिगत दोबारा इस्तेमाल होने वाले कंटेनर यानी कॉलेप्सिबल कंटिंजेंसी यूरिन डिस्पोजल डिवाइसेस का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह समस्या लिफ्टऑफ के कुछ घंटों बाद ही शुरू हो गई थी. क्रिस्टीना कोच ने सिस्टम के कंट्रोल्स एडजस्ट किए. मिशन कंट्रोल की मदद से रीस्टार्ट किया।  पहले लगा कि समस्या सुलझ गई है. कोच ने कहा कि मैं खुद को स्पेस प्लंबर कहने पर गर्व महसूस कर रही हूं. उन्होंने टॉयलेट को स्पेसक्राफ्ट का सबसे जरूरी उपकरण बताया।  समस्या अभी भी बनी हुई है समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई. एस्ट्रोनॉट्स अब भी यूरिन को स्पेस में फेंक नहीं पा रहे हैं. यह मुद्दा ह्यूस्टन के जॉनसन स्पेस सेंटर में हर प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय बन गया है. यह वही केंद्र है जहां 1970 में अपोलो 13 के दौरान एस्ट्रोनॉट जैक स्विगर्ट ने कहा था कि ह्यूस्टन, हमारी समस्या है. उस समय ऑक्सीजन टैंक फटने से मिशन रद्द हो गया था, लेकिन तीनों एस्ट्रोनॉट्स सुरक्षित वापस लौट आए थे।  NASA की नई थ्योरी: बर्फ नहीं, केमिकल रिएक्शन   पहले NASA को लगा कि फिल्टर में बर्फ जमने से समस्या हुई है. इसलिए स्पेसक्राफ्ट को सूरज की तरफ घुमाया गया और हीटर चालू किए गए. लेकिन रिक हेनफ्लिंग ने बताया कि समस्या बर्फ की नहीं है. अब नई थ्योरी यह है कि यूरिन को बैक्टीरिया और माइक्रोऑर्गेनिज्म से बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल के रिएक्शन से कुछ कचरा बन रहा है, जो फिल्टर में फंस गया है।  ओरियन का टॉयलेट ISS जैसा, लेकिन पहली बार डीप स्पेस में ओरियन स्पेसक्राफ्ट में लगा टॉयलेट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) वाले टॉयलेट जैसा है. लेकिन यह पहली बार किसी क्रूड डीप स्पेस मिशन में इस्तेमाल हो रहा है. अपोलो मिशन के एस्ट्रोनॉट्स के पास टॉयलेट नहीं था, वे विशेष बैग इस्तेमाल करते थे. ओरियन 5 मीटर चौड़ा और 3 मीटर ऊंचा है।  टॉयलेट फ्लोर के नीचे है – यही एकमात्र जगह है जहां एस्ट्रोनॉट्स अकेले रह सकते हैं. अंदर बहुत शोर होता है, इसलिए कान की सुरक्षा जरूरी है. माइक्रोग्रैविटी में काम करने के लिए सक्शन सिस्टम लगा है. मल को डिस्पोजेबल बैग में रखकर दबाया जाता है. पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा।  NASA की एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर लोरी ग्लेज ने कहा कि जैसे ही स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी पर उतरेगा, हम अंदर जाकर समस्या की जड़ तक पहुंचेंगे. ओरियन शुक्रवार को प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन करेगा. यह छोटी-सी समस्या स्पेस मिशन की जटिलता दिखाती है. $23 मिलियन का टॉयलेट भी पूरी तरह परफेक्ट नहीं है।   

स्पेस में प्रेग्नेंसी: क्या अंतरिक्ष में बच्चे का जन्म हो सकता है?

जैसे-जैसे इंसान मंगल और चंद्रमा पर बस्तियां बसाने की योजना बना रहा है, एक बड़ा सवाल वैज्ञानिकों के सामने खड़ा है- 'क्या अंतरिक्ष में गर्भधारण और बच्चे का जन्म सुरक्षित है?' अब तक की रिसर्च इशारा करती है कि तकनीकी रूप से यह संभव तो है, लेकिन बिना पृथ्वी के सुरक्षा कवच (गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडल) के, एक नए जीवन का विकास किसी बड़े खतरे से कम नहीं होगा। हड्डियों और मांसपेशियों पर संकट पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हमारे शरीर की हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती देने में प्राथमिक भूमिका निभाता है। अंतरिक्ष की माइक्रोग्रैविटी में भ्रूण (Fetus) के विकास के दौरान उसकी हड्डियों के घनत्व (Density) में भारी कमी आ सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीरो ग्रेविटी के कारण बच्चे का ऊपरी शरीर तो विकसित हो सकता है, लेकिन निचले हिस्से और पैरों की मांसपेशियां बेहद कमजोर रह सकती हैं।   ब्रेन और विजन पर असर अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण शरीर के तरल पदार्थ (Body Fluids) सिर की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की खोपड़ी के अंदर दबाव बढ़ सकता है। यह असामान्य दबाव बच्चे के मस्तिष्क विकास (Brain Development) और आंखों की रोशनी को प्रभावित कर सकता है, जिससे भविष्य में न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा होने का खतरा रहता है।