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कांग्रेस घुसपैठियों की रक्षक, देश विरोधियों की हमदर्द – पीएम मोदी का आरोप

असम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को असम के दरांग में एक जनसभा को संबोधित करते हुए जनता को कांग्रेस के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लोग हमारी सेना की बजाय आतंकियों को पालने वालों के एजेंडों को आगे बढ़ाते हैं। पाकिस्तान का झूठ कांग्रेस का एजेंडा बन जाता है। इसलिए आपको कांग्रेस के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए। पीएम मोदी ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, "जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब पूरा देश आतंक से लहूलुहान होता था और कांग्रेस चुपचाप खड़ी रहती थी। आज हमारी सेना 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाती है, पाकिस्तान के कोने-कोने से आतंक को उखाड़ फेंकती है, लेकिन कांग्रेस के लोग पाकिस्तान की सेना के साथ खड़े हो जाते हैं। कांग्रेस के लोग हमारी सेना की बजाय आतंकियों को पालने वालों के एजेंडों को आगे बढ़ाते हैं। पाकिस्तान का झूठ कांग्रेस का एजेंडा बन जाता है, इसलिए आपको कांग्रेस के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।" उन्होंने आगे कहा, "कांग्रेस के लिए अपने वोट बैंक का हित सबसे बड़ा है। कांग्रेस देशहित की कभी परवाह नहीं करती है। आज कांग्रेस देशविरोधियों और घुसपैठियों की भी रक्षक बन चुकी है। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब वह घुसपैठ को बढ़ावा देती थी और आज कांग्रेस चाहती है कि घुसपैठिए हमेशा के लिए भारत में बस जाए और भारत का भविष्य घुसपैठिए तय करें।" प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "दशकों तक कांग्रेस ने असम पर शासन किया, फिर भी उन्होंने 60-65 वर्षों में ब्रह्मपुत्र नदी पर केवल तीन पुल बनाए। इसके विपरीत, जब आपने हमें अवसर दिया, तो हमने केवल एक दशक में छह नए पुल बनाए। यह स्वाभाविक है कि आप हमारे प्रयासों की सराहना करेंगे और हमें अपना समर्थन देंगे। केवल नौ दिनों में नवरात्रि के पहले दिन, जीएसटी दरों में उल्लेखनीय गिरावट आने वाली है, जिससे देश के लोगों को काफी लाभ होगा। इस कमी से सीमेंट, बीमा, मोटरसाइकिल और कारों की कीमतों में भारी कमी आएगी।"

इजरायल पर खाड़ी देशों का पलटवार! कतर हमले के बाद सऊदी-UAE का नया गठबंधन तैयार

दोहा  कतर की राजधानी दोहा पर इजरायल के हालिया हमले ने पूरे अरब जगत को झकझोर दिया है। इस हमले को लेकर सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, ओमान और कुवैत जैसे खाड़ी देशों ने कड़ी नाराज़गी जताई है। अब इन देशों में विचार हो रहा है कि वे एकजुट होकर इजरायल को कड़ा जवाब दें । चाहे वह कूटनीतिक, सैन्य या  आर्थिक मोर्चे पर क्यों न हो। कई विशेषज्ञ इसे  ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे गठबंधन की दिशा में पहला कदम मान रहे हैं। कतर पर हमले ने बढ़ाई खाड़ी की बेचैनी   जून 2025 में  ईरान ने कतर स्थित अमेरिकी बेस  को निशाना बनाया था। सितंबर में इजरायल ने दोहा में हमास के राजनीतिक ठिकानों  पर हमला कर दिया। कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने कहा-“यह सिर्फ कतर पर नहीं, पूरे अरब पर हमला है। जवाब सामूहिक होगा।”  दोहा में होने वाले अरब और इस्लामी शिखर सम्मेलन में इस पर बड़ा फैसला संभव है।   खाड़ी देशों की प्रतिक्रियाएं  सऊदी अरब ने कहा कि यह हमला अस्वीकार्य है। यूएई राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद 24 घंटे के भीतर दोहा पहुँचे और तुरंत कूटनीतिक हलचल शुरू कर दी। विशेषज्ञ मानते हैं कि खाड़ी देश अब ऐसे कदम उठाना चाहते हैं जिससे “भविष्य में इजरायली हमलों की संभावना ही खत्म हो जाए।” कुवैत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बदर अल-सैफ ने कहा –“अगर हम अब एकजुट नहीं हुए तो अगला निशाना अन्य खाड़ी देश होंगे।”    कूटनीतिक विकल्प  यूएई अब्राहम समझौते में अपनी भागीदारी घटा सकता है, जिसके तहत इजरायल और अरब देशों के बीच रिश्ते सामान्य हुए थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद  में कतर पहले ही इजरायली हमलों की निंदा का सर्वसम्मत प्रस्ताव पास करवा चुका है। कतर यह भी सोच रहा है कि वह  अमेरिका और उसके विरोधियों के बीच मध्यस्थ की भूमिका से हट जाए।    क्या बनेगा 'इस्लामिक नाटो'? खाड़ी देशों के बीच पहले से ही पारस्परिक रक्षा संधि  है। 1980 के दशक का Peninsula Shield Force  समझौता अब सक्रिय किया जा सकता है। वायु और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को एकीकृत  करने की तैयारी पर विचार हो रहा है। अधिकांश खाड़ी देश अमेरिकी हथियारों पर निर्भर हैं, लेकिन अब वे अपनी रक्षा क्षमता में विविधता लाने  की कोशिश कर सकते हैं।    इजरायल के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार  सऊदी अरब, कतर, कुवैत और यूएई के पास  खरबों डॉलर के संप्रभु धन कोष  हैं। इनका इस्तेमाल इजरायल की सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अरब देश उन कंपनियों का  बहिष्कार  कर सकते हैं, जिनकी इजरायल की अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी है। यह संदेश भी दिया जा सकता है कि  “अगर हम असुरक्षित हैं और इसका कारण इजरायल है, तो हमारा पैसा कहीं और जाएगा।”  

इतिहास रचा BJP ने! जेपी नड्डा ने बताया करोड़ों में पहुंचा पार्टी का सदस्य आधार

नई दिल्ली  भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रविवार को कहा कि 14 करोड़ सदस्यों के साथ बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई है। उन्होंने कहा कि भाजपा में दो करोड़ सक्रिय सदस्य हैं। जेपी नड्डा ने बताया कि पार्टी के देश भर में 240 लोकसभा सदस्य, लगभग 1,500 विधायक और विधान परिषदों में 170 से ज्यादा सदस्य हैं। केंद्रीय मंत्री ने आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में पार्टी की एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार की सराहना की। "13 राज्यों में भाजपा की सरकारें"   उन्होंने कहा, "हम (बीजेपी) 14 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हैं। भारत के 20 राज्यों में एनडीए और 13 राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। हम देश की सबसे बड़ी प्रतिनिधि पार्टी हैं। हमारे 240 सांसद (लोकसभा) हैं। हमारे लगभग 1,500 विधायक हैं। हमारे विधान परिषदों में 170 से ज्यादा सदस्य हैं।”  नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में 11 साल में कार्य-निष्पादन और जवाबदेह सरकार की राजनीति हुई है, जबकि पिछली सरकारों में अकार्य-निष्पादन की राजनीति थी और उन्होंने विकास कार्य नहीं किए। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारें घोषणापत्रों में किए गए वादों को भी भूल गई थीं। "पहले तुष्टीकरण की राजनीति थी" केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि पहले परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण की राजनीति थी। भाजपा अध्यक्ष ने कहा, "हम एक ऐसी पार्टी से आते हैं जिसका एक वैचारिक आधार है।" नड्डा ने आंध्र प्रदेश में किए गए विकास कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र ने राजधानी अमरावती के निर्माण के लिए 15,000 करोड़ रुपये प्रदान किए हैं। 

पदभार संभालते ही सुशीला कार्की का ऐलान – छह महीने से ज़्यादा नहीं रुकूंगी

काठमांडू  नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। देश की नई अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने रविवार को राजधानी काठमांडू के सिंहदरबार पहुंचकर आधिकारिक तौर पर पदभार संभाला। इस मौके पर नेपाल आर्मी के प्रमुख भी मौजूद थे। सुशीला कार्की का पहला संबोधन पद संभालने के बाद अपने पहले संबोधन में सुशीला कार्की ने साफ कहा कि उनकी सरकार सत्ता का स्वाद चखने नहीं आए हैं। उन्होंने कहा, 'मेरी टीम और मैं यहां सत्ता का स्वाद चखने नहीं आए हैं। हम 6 महीने से ज्यादा नहीं रुकेंगे और समय आने पर नई संसद को जिम्मेदारी सौंप देंगे। जो लोग तोड़फोड़ और हिंसा में शामिल रहे हैं, उनकी जांच जरूर होगी। जनता का सहयोग मिले बिना हम सफल नहीं हो सकते।' सुशीला कार्की से युवाओं की उम्मीदें नेपाल में लंबे समय से अस्थिरता बनी हुई थी। अब युवाओं का मानना है कि सुशीला कार्की के नेतृत्व से देश में बदलाव की उम्मीद जगी है। उनका कहना है कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और बेहतर शिक्षा की कमी सबसे बड़ी समस्याएं रही हैं। कई युवाओं ने बताया कि हालात इतने खराब थे कि छोटी-सी सरकारी फाइल आगे बढ़ाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती थी। आम लोगों की परेशानी बढ़ती जा रही थी, जबकि बड़े नेताओं के काम आसानी से पूरे हो जाते थे। संतोष नामक एक युवा का कहना है, 'यह बदलाव बहुत जरूरी था। अब जब कार्की प्रधानमंत्री बनी हैं और पहले जज भी रह चुकी हैं, तो हमें भरोसा है कि पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार कम होगा। थापा ने कहा कि युवाओं को लंबे समय से ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी, क्योंकि सबसे ज्यादा समस्याओं का सामना वही कर रहे थे। नेपाल में न तो इंडस्ट्री थी, न मजबूत शिक्षा व्यवस्था और न ही पर्याप्त रोजगार। अब जब नई पीढ़ी नेतृत्व में आगे आई है, तो आने वाले समय में नेपाल के बेहतर भविष्य की संभावना बढ़ गई है।   नेपाल-भारत सीमा फिर से खुली सरकार के पदभार संभालने के बाद हालात सामान्य करने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। करीब 4–5 दिन बाद नेपाल-भारत बॉर्डर आम लोगों के लिए खोल दिया गया है। अब छोटे वाहन आधार कार्ड दिखाकर सीमा पार कर सकते हैं। हालांकि, बड़ी गाड़ियों के प्रवेश पर अभी रोक है, क्योंकि दंगों के दौरान भंडार कार्यालय को आग के हवाले कर दिया गया था, जिससे टैक्स और कागजी प्रक्रिया प्रभावित हुई है। हिंसा में अब तक 61 मौतें नेपाल में हाल की हिंसक घटनाओं में अब तक 61 लोगों की मौत हो चुकी है। ताजा जानकारी के मुताबिक, काठमांडू के बौद्ध इलाके में एक सुपरस्टोर से आज सुबह छह शव बरामद हुए हैं। हालांकि, धीरे-धीरे हालात सामान्य होते दिख रहे हैं और लोग राहत की सांस ले रहे हैं।

‘जिरकोन’ मिसाइल टेस्ट: रूस की आवाज़ से 9 गुना तेज तकनीक ने दुनिया में डर पैदा किया

रूस  रूस ने एक बार फिर अपनी सैन्य ताकत का दुनिया को अहसास कराया। सैन्य अभ्यास के दौरान रूस ने अपने सबसे घातक हथियारों में से एक हाइपरसोनिक जिरकोन मिसाइल का टेस्ट किया। इस मिसाइल की गति ध्वनि से 9 गुना अधिक है, जिसे रोकना लगभग असंभव माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह मिसाइल किसी भी देश का नक्शा बदलने की क्षमता रखती है। रूस ने रविवार को बताया कि उसने बेरेंट्स सागर में एक लक्ष्य पर जिरकोन (त्सिरकोन) हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल दागी, और सुखोई एसयू-34 सुपरसोनिक लड़ाकू-बमवर्षकों ने बेलारूस के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास के हिस्से के रूप में हमले किए। रूसी रक्षा मंत्रालय ने उत्तरी बेड़े के एडमिरल गोलोव्को फ्रिगेट द्वारा बेरेंट्स सागर में एक लक्ष्य पर जिरकोन हाइपरसोनिक मिसाइल दागे जाने का फुटेज जारी किया। फुटेज में दिखाया गया कि फ्रिगेट से मिसाइल को लंबवत प्रक्षेपित किया गया और फिर यह एक कोण पर क्षितिज की ओर बढ़ी। मंत्रालय ने बताया कि वास्तविक समय में प्राप्त निगरानी डेटा के अनुसार, लक्ष्य को सीधे प्रहार से नष्ट कर दिया गया। मंत्रालय ने यह भी बताया कि उत्तरी बेड़े के मिश्रित विमानन कोर के लंबी दूरी के पनडुब्बी रोधी विमान इस अभ्यास में शामिल थे। साथ ही Su-34 के चालक दल ने जमीनी ठिकानों पर बमबारी का अभ्यास किया। हाइपरसोनिक जिरकोन मिसाइल रक्षा मंत्रालय के अनुसार, रूस और बेलारूस के बीच 'जापाड-2025' या पश्चिम संयुक्त रणनीतिक अभ्यास 12 सितंबर को शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य रूस या बेलारूस पर हमले की स्थिति में सैन्य कमान और समन्वय को बेहतर करना है। मॉस्को और मिन्स्क ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास पूरी तरह से रक्षात्मक हैं और इनका किसी भी नाटो सदस्य पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है। हालांकि, अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने 9-10 सितंबर को पोलैंड में रूसी ड्रोनों की घुसपैठ के बाद 'ईस्टर्न सेंट्री' ऑपरेशन की घोषणा की थी। बता दें कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2019 में कहा था कि जिरकोन मिसाइल ध्वनि की गति से 9 गुना तेज उड़ सकती है और समुद्र व जमीन पर 600 मील से अधिक की दूरी पर लक्ष्यों को भेद सकती है। रूसी मीडिया सूत्रों के अनुसार, यह मिसाइल, जिसे रूस में 3एम22 जिरकोन और नाटो में एसएस-एन-33 के नाम से जाना जाता है, की मारक क्षमता 400 से 1000 किलोमीटर है, और इसका वारहेड भार लगभग 300-400 किलोग्राम है।  

भारत ने कहा ‘नहीं’, अमेरिकी मंत्री हाथ पर हाथ धरे रह गए – एक बोरी मक्का तक नहीं!

वाशिंगटन  अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी का भारी-भरकम टैरिफ लगाया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से लेकर तमाम अमेरिकी अधिकारी लगातार भारत की तरफ से लगाए जाने वाले हाई टैरिफ की दुहाई देते रहते हैं. अब भारत की व्यापार नीतियों की आलोचना करते हुए अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने नई दिल्ली पर ग्लोबल ट्रेड से फायदा उठाते हुए बाज़ार पहुंच को सीमित करने का आरोप लगाया है. एक बोरी मक्का का दर्द! 'एक्सियोस' को दिए एक इंटरव्यू में, लुटनिक ने कहा कि भारत अपनी 140 करोड़ अरब की आबादी पर गर्व करता है, लेकिन अमेरिकी कृषि निर्यात के मामले में खुलापन बहुत कम दिखाता है. उन्होंने कहा कि भारत शेखी बघारता है कि उसकी आबादी 140 करोड़ है, फिर वो हमसे एक बुशल (25.40 किलो) मक्का क्यों नहीं खरीद रहा? वो हमारा मक्का नहीं खरीदेगा. वो हर चीज़ पर टैरिफ़ लगा देता है. या तो आप इसे मान लीजिए, वरना दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता के साथ व्यापार करना आपके लिए मुश्किल हो जाएगा.' बता दें एक बुशल में 25 किलो की बोरी के बराबर मक्का आता है. लुटनिक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और फ्री मार्केट डेमोक्रेसी होने के बार-बार दावों के बावजूद, उसका संरक्षणवादी रुख अमेरिकी व्यवसायों को निराश करता रहता है. उन्होंने कहा, 'यह निष्पक्षता की बात है. अमेरिका, भारतीय सामान खुलेआम खरीदता है, लेकिन जब हम बेचना चाहते हैं, तो दीवारें खड़ी हो जाती हैं.' 'तेल खरीद से व्यापार असंतुलन' लुटनिक ने भारत की तरफ से रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल के बढ़ते आयात की ओर भी ध्यान दिलाया है, जो मॉस्को पर जारी पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच वॉशिंगटन के लिए एक नासूर बन गया है. विकास को गति देने के लिए भारत की सस्ती ऊर्जा की ज़रूरत को स्वीकार करते हुए लुटनिक ने तर्क दिया कि इस तरह की ख़रीद वैश्विक व्यापार कूटनीति में असंतुलन को उजागर करती है. इन चिंताओं के बावजूद, अमेरिका और भारत रक्षा, प्रौद्योगिकी और निवेश के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदार बने हुए हैं. लुटनिक ने कहा कि वॉशिंगटन की ओर से नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को कम करने की संभावना नहीं है, लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि कृषि शुल्क से लेकर तेल खरीद तक, व्यापार संबंधी अड़चनें अभी भी बनी रहेंगी. भारत-US के बीच ट्रेड डील जल्द पिछले हफ़्ते, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत में राजदूत पद के लिए नामित सर्जियो गोर ने सीनेट की विदेश संबंधी समिति को बताया कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली व्यापार समझौता अब ज़्यादा दूर नहीं हैं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत अब अहम चरण में पहुंच गई है. गोर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल को अगले हफ़्ते अमेरिका आने का न्योता दिया है. भारत अब तक रूसी तेल खरीद पर अड़ा हुआ है और अमेरिका की तरफ से जुर्माने के तौर पर लगाए गए 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ के बावजूद झुकने को तैयार नहीं है. भारत का साफ कहना है कि अपने नागरिकों की हितों की रक्षा के लिए वह रूसी तेल खरीद जारी रखेगा. दूसरी ओर भारत ने डेयरी और कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोलने से साफ इनकार कर दिया है, क्योंकि इससे लाखों भारतीय किसान तबाह हो सकते हैं.

Gen Z का गुस्सा नेपाल में उफन पड़ा: 72 की मौत, 2000+ लोग घायल, देखें लाइव अपडेट

काठमांडू नेपाल में भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध के खिलाफ हाल के Gen Z प्रदर्शनों में एक भारतीय नागरिक सहित कम से कम 72 लोगों की मौत हो गई है। नेपाल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को बताया कि पिछले सप्ताह हुए भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 72 हो गई है। पुलिस और प्रशासन के कर्मचारी हिंसा के दौरान क्षतिग्रस्त हुए शॉपिंग मॉल और अन्य इमारतों से शव निकालने का काम जारी रखे हुए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता प्रकाश बुदाथोकी ने कहा कि शॉपिंग मॉल, घरों और अन्य इमारतों में, जहां आग लगाई गई थी या हमला हुआ था, वहां मारे गए कई लोगों के शव अब बरामद किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, नेपाल में दशकों की सबसे भीषण हिंसा में कम से कम 2113 लोग घायल हुए हैं। कई सरकारी इमारतों, देश के सर्वोच्च न्यायालय, संसद भवन, पुलिस चौकियों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साथ-साथ राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सहित राजनेताओं के निजी घरों में आग लगा दी गई। बता दें कि सोमवार (8 सितंबर) को प्रदर्शन के दौरान काठमांडू में संसद भवन पर धावा बोले जाने के दौरान पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 लोग मारे गए, जिनमें से अधिकतर छात्र थे। विरोध प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। सैकड़ों प्रदर्शनकारी सोमवार के प्रदर्शन के दौरान हुई मौतों के विरोध में उनके इस्तीफे की मांग करते हुए उनके कार्यालय में घुस गए थे। ओली के इस्तीफे के बाद भी हिंसा जारी रही और प्रदर्शनकारियों ने संसद, राष्ट्रपति कार्यालय, प्रधानमंत्री आवास, सरकारी भवनों, राजनीतिक दलों के कार्यालयों और वरिष्ठ नेताओं के घरों में आग लगा दी। अधिकारियों ने बताया कि नेपाल पुलिस बल धीरे-धीरे काठमांडू घाटी में अपना अभियान फिर से शुरू कर रहा है, और जिन थानों और चौकियों में तोड़फोड़ या आगजनी हुई थी, वहां धीरे-धीरे काम शुरू हो रहा है। गौरतलब है कि कि ओली की जगह पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है, जिन्हें 5 मार्च 2026 को होने वाले नए संसदीय चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।  

मॉनसून 2025 की विदाई: इन राज्यों में सिर्फ 48 घंटे में छंट जाएगी बारिश

नई दिल्ली  इस बार देशभर में मॉनसून की वजह से अच्छी बरसात हुई है। हालांकि, अब इसके वापस लौटने का समय आ गया है। धीरे-धीरे करके मॉनसून आने वाले कुछ दिनों में तमाम राज्यों से वापस चला जाएगा। मौसम विभाग के अनुसार, राजस्थान के कुछ हिस्सों से मॉनसून आज वापस चला गया है और अगले दो से तीन दिनों में राजस्थान के अन्य हिस्सों, पंजाब और गुजरात के कुछ हिस्सों से वापस चला जाएगा। इसके लिए परिस्थितियां पूरी तरह से अनुकूल बनी हुई हैं। वहीं, अगले तीन दिनों तक पूर्वोत्तर राज्यों में और महाराष्ट्र में भारी से बहुत भारी बारिश होगी। पूर्वोत्तर भारत की बात करें तो 14 और 17 तारीख को अरुणाचल प्रदेश में अधिकांश जगहों पर बारिश की संभावना है। 15 और 16 तारीख को असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और 18-20 सितंबर के दौरान अरुणाचल प्रदेश में 15 और 16 तारीख को बहुत भारी बारिश की संभावना है। 14 सितंबर को नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और असम, मेघालय में भारी बरत होगी। दक्षिण भारत की बात करें तो 16-19 सितंबर के दौरान तमिलनाडु में गरज के साथ बारिश की संभावना है। 14 को तटीय आंध्र प्रदेश, यनम, 14 और 15 के दौरान तेलंगाना, 14-16 सितंबर के दौरान आंतरिक कर्नाटक में भारी बरसात होगी। वहीं, अगले पांच दिनों के दौरान तटीय आंध्र प्रदेश, यनम, रायलसीमा में तेज हवाएं चलने का अनुमान है। पश्चिम भारत की बात करें तो 16 सितंबर को कोंकण एवं गोवा, मध्य महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में कई जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। 14 और 15 सितंबर को कोंकण एवं गोवा, मध्य महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में बहुत भारी बारिश हो सकती है। उत्तर पश्चिम भारत की बात करें तो 14 सितंबर को हिमाचल प्रदेश, 14 और 16 सितंबर को उत्तराखंड, 14-20 सितंबर के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश और 15 सितंबर को उत्तराखंड में बहुत भारी बारिश हो सकती है।  

एशिया में राजनीतिक भूकंप: तीन देशों में सत्ता बदली, पर असली खिलाड़ी कौन?

नई दिल्ली  बीते कुछ समय में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जिस तरह से अचानक युवाओं के आंदोलन की वजह से सत्ता परिवर्तन हुआ है, यह कई सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या एशिया के देश किसी ताकत के हाथ की कठपुतलनी बन गए हैं। इन देशों में जो भी सरकारें थीं, वे पश्चिम विरोधी मानी जाती थीं। वहीं इन सभी सरकारों का झुकाव चीन की तरफ था। श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन होने में तीन महीने का वक्त लगा तो बांग्लादेश में 15 दिन का। वहीं नेपाल में जेन- Z ने मात्र दो दिन में ही सरकार उखाड़कर फेंक दी। सोशल मीडिया से शुरू हुआ आंदोलन जब सड़कों पर आया तो किसी भी देश की सरकार में इतनी ताकत नहीं थी कि वह इसे संभाल पाती। अब गौर करने वाली बात यह है कि जितने भी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म हैं, वे ज्यादातर अमेरिकन हैं। टिकटॉक चीन का है। वहीं डिस्कॉर्ड, वाइबर,फेसबुक, इन्स्टाग्राम की पैरंट कंपनियां अमेरिकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस तरह से सत्ता परिवर्तन करवाने वाली ताकत अमेरिका में है या फिर रूस में, या फिर चीन में? काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह को पश्चिमी पत्रिका में 2023 में ही नेता घोषित कर दिया गया था। गौर करने वाली बात है कि नेपाल, पश्चिम बंगाल और श्रीलंका की सरकारों का झुकाव चीन की रफ था। राजपक्षे ने हंबनटोटा पोर्ट चीन को सौंप दिया तो वहीं शेख हसीना चटगांव और मोंगला सीपोर्ट चीन को देने की तैयारी कर रही थी। नेपाल की ओली सरकार अपनी जमीन के जरिए चीन के पोर्ट्स को आने-जाने का रास्ता देना वाली थी। गौर करने वाली बात है कि आंदोलन से 6 दिन पहले ही ओली चीन पहुंचे थे और विक्ट्री डे परेड में शामिल हुए थे। उस समय चीन को भी अंदाजा नहीं था कि नेपाल में क्या होने वाला है। यहां तक कि भारत की एजेंसियों को भी भनक नहीं लगी कि पड़ोसी देशों में क्या उथल-पुथल होने जा रही है। इतना तो स्पष्ट हो गया है कि एआई, डीपफेक और एल्गोरिदम वाले इस युग में किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन अचानक हो सकता है। कट्टरपंथ, राजनीतिक ध्रुवीकरण और उकसावे को संभालना बेहद मुश्किल हो गया है। संभल है कि जिन संस्थानों को बनने में सालों लग गए, उन्हें मिनटों में तबाह कर दिया जाए। एक बात और नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि जिन देशों में सत्ता परिवर्तन हुआ है, वहां की सरकारें प्रशासन के मामले में काफी ढीली थीं। युवाओं में बेरोजगारी चरम पर थी। इन तीनों ही देशों में भ्रष्टाचार चरम पर था। पाकिस्तान और म्यांमार में अगर सेना हावी ना हो गई होती तो ऐसा ही कुछ वहां भी होने वाला था। भारत की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं और जनता के साथ एक रिश्ता कायम किया है और लगातार जुड़े रहते हैं। ऐसे में सरकार को भी इस बात का अंदाजा रहता है कि युवा क्या चाहता है। आज के युग में वास्तविकता से ज्यादा कोई भी धारणा असर करती है। ऐसे में गलत सूचना ही सत्ता परिवर्तना की वजह बन जाती है।  

ट्रंप की चेतावनी: रूस का तेल न खरीदें, चीन को मिलने वाली सजा की तैयारी

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को NATO के सभी सदस्य देशों से आग्रह किया है कि वे रूस से तेल की खरीद बंद कर दें और चीन के उन आयातों पर 50-100% टैरिफ लागू करें जो रूस से ऊर्जा संबंधी लेन-देनों में शामिल हैं। उनका कहना है कि ये कदम रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने का एक जरूरी तरीका हैं।  ट्रंप ने ट्वीट और सार्वजनिक बयानों में कहा कि अगर NATO सदस्य रूसी तेल नहीं खरीदेंगे, तो उनकी रूस के साथ बातचीत और आर्थिक दबाव बढ़ेगा, जिससे युद्ध की गति धीमी हो सकेगी।   उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि युद्ध समाप्ति हो जाए तो ये टैरिफ हटा दिए जाएँ। ट्रंप ने कुछ NATO सदस्यों-विशेषकर टर्की, हंगरी और स्लोवाकिया की आलोचना की कि वे अभी भी रूस से तेल खरीद रहे हैं, जो गठबंधन की नैतिक और रणनीतिक एकता को कमजोर करता है।     ट्रंप ने कहा कि चीन भी रूस के साथ करीबी आर्थिक संबंध बनाए रखकर रूस की युद्ध नीति को समर्थन दे रहा है। टैरिफ लगाने से इस आर्थिक संबंध को तोड़ा जा सकेगा।  भारत के बारे में भी ट्रंप ने पहले ही घोषणा कर दी है कि भारत पर 25% टैरिफ लगाया गया है क्योंकि वह रूस से ऊर्जा आयात कर रहा है। अब उनका प्रस्ताव है कि यदि यूरोपीय देश भी साथ दें तो चीन और भारत के उन आयातों पर भारी टैरिफ लगाया जाए जो रूस की ऊर्जा अर्थव्यवस्था से जुड़े हों।   यूरोपीय मित्र देशों में इस तरह के टैरिफ लगाने को लेकर संयुक्त आर्थिक प्रभाव की चिंता है। यदि चीन और भारत पर बहुत अधिक टैरिफ लगे तो व्यापार युद्ध की स्थिति बन सकती है। भारत और चीन ने अभी तक इस प्रस्ताव का औपचारिक जवाब नहीं दिया है लेकिन वे ऐसी नीतियों के संभावित आर्थिक प्रतिकूल प्रभावों से सतर्क हैं। इसके अलावा, NATO में ऐसे देशों को भी दबाव का सामना करना पड़ सकता है जिन पर रूस से ऊर्जा निर्भरता अधिक है, उदाहरण के लिए टर्की।     ट्रंप की यह पेशकश सिर्फ आर्थिक नहीं है-यह रणनीतिक निशाना है रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को निर्देशित करने का। यदि NATO, G7, यूरोपीय संघ और भारत-चीन जैसे बड़े खिलाड़ी इस तरह की टैरिफ व्यवस्था में शामिल होते हैं, तो युद्ध-विरोधी दबाव काफी तेज हो सकता है। लेकिन इसके लिए एक साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक संतुलन बनाए रखना ज़रूरी होगा।