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पंचक आज आधी रात से प्रभावी, भूलकर भी ये शुभ कार्य किए तो हो सकता है नुकसान

हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में समय की गणना को बहुत महत्व दिया गया है. शुभ कार्यों के लिए जहां हम मुहूर्त देखते हैं, वहीं कुछ समय ऐसा भी होता है जिसे वर्जित माना गया है. ऐसा ही एक समय है पंचक. आज यानी 20 जनवरी की देर रात से पंचक शुरू हो रहे हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पंचक के दौरान कुछ विशेष कार्यों को करने से बचना चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि इस दौरान किए गए अशुभ कार्य का प्रभाव पांच गुना बढ़ जाता है. कब से कब तक है पंचक? ज्योतिष गणना के अनुसार, इस बार पंचक की अवधि कुछ इस प्रकार रहेगी. पंचक का आरंभ: 21 जनवरी 2026 (बुधवार) को रात 01:35 AM से (यानी आज 20 जनवरी की आधी रात के बाद). पंचक का समापन: 25 जनवरी 2026 (रविवार) को दोपहर 01:35 PM पर. चूंकि यह पंचक बुधवार से शुरू हो रहा है, इसलिए इसे ज्योतिष की भाषा में शुभ फल देने वाला राज पंचक भी कहा जाता है, लेकिन कुछ सावधानियां फिर भी जरूरी हैं. क्या होता है पंचक? जब चंद्रमा धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों में विचरण करता है, तो उस काल को पंचक कहा जाता है. सरल शब्दों में कहें तो जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में होता है, तब पंचक लगता है. शास्त्रों के अनुसार, पंचक का अर्थ है ‘पांच’. ऐसी मान्यता है कि इस दौरान होने वाली कोई भी शुभ या अशुभ घटना पांच बार दोहराई जा सकती है. पंचक में भूलकर भी न करें ये 5 काम लकड़ी इकट्ठा करना: पंचक के दौरान ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करना या घास-फूस इकट्ठा करना अशुभ माना जाता है. इससे अग्नि का भय बना रहता है. घर की छत डलवाना: अगर आप घर बनवा रहे हैं, तो ध्यान रखें कि पंचक के दौरान छत न डलवाएं. माना जाता है कि इससे घर में क्लेश और धन की हानि हो सकती है. चारपाई या बेड बनवाना: पंचक काल में नया बेड, चारपाई बुनना या खरीदना शुभ नहीं माना जाता. यह सुख-शांति में बाधा उत्पन्न कर सकता है. दक्षिण दिशा की यात्रा: दक्षिण दिशा को यम की दिशा माना गया है. पंचक के दौरान इस दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह कष्टकारी हो सकती है. अंतिम संस्कार में सावधानी: यदि पंचक के दौरान किसी की मृत्यु हो जाए, तो अंतिम संस्कार विशेष नियमों के साथ किया जाता है. शांति के लिए शव के साथ पांच पुतले बनाकर जलाए जाते हैं. पंचक में क्या करें ? क्या करें: आप पूजा-पाठ, नामकरण, और नियमित व्यापारिक कार्य कर सकते हैं. चूंकि यह राज पंचक है, इसलिए सरकारी कामकाज और संपत्ति के लेन-देन में सफलता मिलने के योग बनते हैं. बस ध्यान रखें कि ऊपर बताए गए पांच वर्जित काम न करें. मन में श्रद्धा रखें और किसी भी नए बड़े काम की शुरुआत से पहले अपने कुलदेवता का स्मरण जरूर करें.

बसंत पंचमी और पीले रंग का गहरा संबंध: क्या है इसके पीछे की मान्यता?

भारत त्योहारों का देश माना जाता है. यहां जो भी पर्व मनाए जाते हैं, उसके पीछे कोई न कोई रहस्य अवश्य छिपा होता है. माघ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन हर साल बंसत पंचमी मनाई जाती है. ये पर्व विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित किया गया है. इस पर्व को ‘श्री पंचमी’ या ‘ज्ञान पंचमी’ के नाम से भी जाना जाता है. ये पर्व बंसत ऋतु के आने का प्रतीक माना जाता है. इस दिन विधि-विधान से माता सरस्वती का पूजन किया जाता है. छात्रों के लिए ये पर्व बहुत विशेष और महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन माता सरस्वती का पूजन करने से विद्या और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता है. इस दिन चारों ओर एक ही रंग छाया रहता है और वो होता है पीला रंग. पीला रंग सकारत्मकता और शुभता का कारक माना जाता है. ये उत्सव की आत्मा माना जाता है. इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनें जाते हैं. आइए जानते हैं कि इसके पीछे रहस्य क्या है? बसंत पंचमी कब है? हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 को शाम 06 बजकर 15 मिनट पर हो रही है. वहीं इस तिथि का समापन 23 जनवरी 2026 को रात 08 बजकर 30 मिनट पर हो जाएगा. चूंकि 23 जनवरी को सूर्योदय पर पंचमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा का पर्व इस साल 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा. बसंत ऋतु मौसमों का राजा बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ यानी मौसमों का राजा माना जाता है. यह पीलापन नई फसल के आने और जीवन में खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. लोग प्रकृति के इसी सुंदर रूप के साथ स्वयं को जोड़ने की कोशिश करते हैं, इसलिए पीले वस्त्र धारण करते हैं. धार्मिक दृष्टि से पीला रंग शुद्धता, सादगी और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. मां सरस्वती को ये रंग बहुत प्रिय है. मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता बढ़ती है मान्यताओं के अनुसार, पीला रंग पहनने से मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता बढ़ती है. भक्त इस दिन पीले वस्त्र पहनकर और पीले फूल अर्पित करके मां सरस्वती का पूजन करते हैं. पीला रंग सकारात्मक ऊर्जा का कारक माना जाता है. ये रंग सूर्य के प्रकाश का प्रतिनिधित्व भी करता है. इस रंग से जीवन में शुभता आती है.

हनुमान से बजरंगबली तक: इस नाम के पीछे छिपी है अद्भुत और प्रेरक कहानी

हनुमान जी को भक्त 'बजरंगबली' कहकर पुकारते हैं। यह नाम उनकी अपार शक्ति और वज्र जैसी मजबूती का प्रतीक है। 'बजरंग' शब्द 'वज्रांग' से निकला है, जिसका अर्थ है अंग वज्र (इंद्र के अस्त्र) जैसे कठोर हों। हनुमान जी का शरीर इतना बलशाली था कि इंद्र के वज्र प्रहार से भी उन्हें कोई हानि नहीं हुई। इस नाम की कहानी बाल्यकाल की एक घटना से जुड़ी है, जो उनकी दिव्य शक्ति और अमरता को दर्शाती है। आइए जानते हैं इस नाम की पूरी कहानी और महत्व। बजरंगबली नाम का मूल अर्थ 'बजरंगबली' दो शब्दों से मिलकर बना है – 'बजरंग' और 'बली'। 'बली' का अर्थ है बलशाली या महाबली। 'बजरंग' शब्द संस्कृत के 'वज्रांग' से अपभ्रंशित रूप है। 'वज्र' इंद्र का दिव्य अस्त्र है, जो हीरे से भी कठोर होता है। 'वज्रांग' का अर्थ है – जिसके अंग वज्र जैसे मजबूत हों। हनुमान जी के शरीर की मजबूती इतनी थी कि वज्र प्रहार भी उन्हें चोट नहीं पहुंचा सका। इसी कारण उन्हें 'वज्रांग बली' कहा गया, जो लोक भाषा में 'बजरंगबली' बन गया। यह नाम उनकी अजेय शक्ति और अमरता का प्रतीक है। बाल्यकाल की घटना – सूर्य को फल समझकर निगलने की कथा हनुमान जी के बचपन में एक प्रसिद्ध घटना हुई, जिससे उनका नाम 'बजरंगबली' पड़ा। बाल हनुमान ने आकाश में लाल-नारंगी सूर्य को फल समझ लिया। वे उड़कर सूर्य को निगलने के लिए पहुंच गए। देवताओं में हड़कंप मच गया। इंद्र ने अपने वज्र से हनुमान जी पर प्रहार किया। वज्र प्रहार से हनुमान जी का ठुड्डी (हनु) टूट गया और वे बेहोश होकर गिर पड़े। इसी कारण उनका नाम 'हनुमान' पड़ा, जिसका अर्थ है – जिसका हनु (ठुड्डी) टूटा हो। लेकिन वज्र प्रहार से भी वे मरे नहीं, बल्कि और अधिक बलशाली बन गए। इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि उनके अंग वज्र जैसे कठोर हैं। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी का योगदान मूल वाल्मीकि रामायण में 'बजरंगबली' शब्द का प्रयोग नहीं है। वहां हनुमान जी को 'मारुति', 'कपिश्रेष्ठ', 'अंजनिपुत्र' या 'हनुमान' कहा गया है। 'वज्रांग' या 'बजरंग' का उल्लेख नहीं मिलता है। लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब अवधी भाषा में श्री रामचरितमानस लिखी, तब उन्होंने 'वज्रांग' को लोक भाषा में 'बजरंग' लिखा। तुलसीदास जी की रामचरितमानस में 'बजरंग बली' शब्द का प्रयोग हुआ, जिससे यह नाम जन-जन तक पहुंचा। तुलसीदास जी ने ही इस नाम को लोकप्रिय बनाया, जो आज भी हनुमान जी का सबसे प्रिय नाम है। बजरंगबली नाम का महत्व और प्रतीक 'बजरंगबली' नाम हनुमान जी की अजेय शक्ति, अमरता और वज्र जैसी मजबूती का प्रतीक है। यह नाम भक्तों को साहस, बल और सुरक्षा का संदेश देता है। जब भी कोई संकट आए, भक्त 'बजरंगबली' नाम जपते हैं और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करते हैं। यह नाम बताता है कि सच्ची भक्ति और बल से कोई भी बाधा नहीं रोक सकती है। बजरंगबली नाम से हनुमान जी की पूजा करने से भय, रोग और शत्रु दूर होते हैं। यह नाम भक्तों के जीवन में साहस और आत्मविश्वास भरता है। हनुमान जी को 'बजरंगबली' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उनके अंग वज्र जैसे कठोर थे और इंद्र के वज्र प्रहार से भी वे अडिग रहे। यह नाम तुलसीदास जी की कृपा से लोकप्रिय हुआ। बजरंगबली नाम जपने से जीवन में बल, साहस और सुरक्षा मिलती है।

आज का राशिफल 20 जनवरी: ग्रहों की स्थिति से जानें दिन कैसा रहेगा

मेष राशि- इस समय पढ़ाई-लिखाई और नई चीजें सीखने में मन लगेगा। जो लोग किसी परीक्षा, इंटरव्यू या ट्रेनिंग की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए समय ठीक है। मन में उतार-चढ़ाव रहेंगे, कभी बहुत जोश तो कभी चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है। बातचीत में संयम रखें, गुस्से में कही बात बाद में पछतावा दे सकती है। सेहत में थकान या सिरदर्द हो सकता है। नौकरी में बदलाव, ट्रांसफर या नई जिम्मेदारी के योग हैं। आमदनी बढ़ने के संकेत हैं। वृषभ राशि- कामकाज में धीरे-धीरे स्थिरता आएगी। जो मेहनत आप काफी समय से कर रहे थे, उसका फल मिलने लगेगा। परिवार का सहयोग बना रहेगा और घर से जुड़ा कोई अच्छा समाचार मिल सकता है। खर्च बढ़ सकता है, इसलिए फिजूलखर्ची से बचें। सेहत सामान्य रहेगी, लेकिन खान-पान में लापरवाही न करें। नौकरी में स्थिति मजबूत होगी। मिथुन राशि- यह समय बातचीत और संपर्कों के लिए अच्छा है। लोगों से मिलने-जुलने से नए मौके मिल सकते हैं। नौकरी या बिज़नेस में नया प्रस्ताव आ सकता है। मन थोड़ा भटका हुआ रहेगा, एक साथ कई बातें सोचेंगे। निर्णय लेते समय जल्दबाज़ी न करें। सेहत में नींद की कमी या तनाव हो सकता है। कर्क राशि- भावनात्मक रूप से समय थोड़ा संवेदनशील है। छोटी-छोटी बातों को दिल पर लेने से बचें। परिवार का साथ मिलेगा और घर में आपकी बात मानी जाएगी। काम में मेहनत ज़्यादा करनी पड़ेगी, लेकिन परिणाम धीरे-धीरे दिखेंगे। सेहत का ध्यान रखें, खासकर पेट और नींद से जुड़ी दिक्कत हो सकती है। सिंह राशि- आत्मविश्वास बढ़ेगा और आप खुलकर अपनी बात रख पाएंगे। नौकरी में सीनियर या अधिकारियों से सहयोग मिल सकता है। काम में आपकी पहचान बनेगी। खर्च बढ़ सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखें। सेहत ठीक रहेगी, बस ज्यादा तनाव न लें। कन्या राशि- काम में ध्यान अच्छा रहेगा और अधूरे काम पूरे होंगे। आप हर चीज को बारीकी से देखेंगे, लेकिन जरूरत से ज्यादा सोचने से बचें। नौकरी में स्थिरता रहेगी। सेहत में पेट, गैस या थकान की परेशानी हो सकती है। समय पर आराम जरूरी है। तुला राशि- रिश्तों के लिए समय अच्छा है। पुराने मतभेद दूर हो सकते हैं। कामकाज में संतुलन बनाकर चलना फायदेमंद रहेगा। नया मौका या नई ज़िम्मेदारी मिल सकती है। आर्थिक स्थिति सामान्य से बेहतर रहेगी। सेहत ठीक रहेगी। वृश्चिक राशि- मन में कुछ पुरानी बातें चलती रहेंगी, जिससे बेचैनी हो सकती है। धैर्य रखें, समय आपके पक्ष में आएगा। पुराने रुके काम पूरे होने लगेंगे। नौकरी में जिम्मेदारी बढ़ सकती है। खर्च पर नियंत्रण रखें। सेहत में कमजोरी या थकान महसूस हो सकती है। धनु राशि- भाग्य का अच्छा साथ मिलेगा। जो काम अटके हुए थे, उनमें गति आएगी। पढ़ाई, यात्रा या किसी नए कोर्स के योग हैं। काम में आत्मविश्वास रहेगा। आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। सेहत अच्छी रहेगी। मकर राशि- काम का दबाव ज्यादा रहेगा, लेकिन आप अपनी मेहनत से हालात संभाल लेंगे। नौकरी में स्थिरता बनी रहेगी। सीनियर आपकी मेहनत नोटिस करेंगे। सेहत में थकान या कमर-दर्द जैसी परेशानी हो सकती है। आराम जरूरी है। कुंभ राशि- नए विचार और योजनाएं दिमाग में आएंगी। दोस्त या पुराने संपर्क आपके काम आएंगे। नौकरी या काम में नया अवसर मिल सकता है। आय के योग अच्छे हैं। सेहत सामान्य रहेगी, लेकिन रूटीन बिगड़ने न दें। मीन राशि- मन शांत रहेगा और आध्यात्मिक सोच बढ़ेगी। काम में धीरे-धीरे सुधार आएगा। किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह फायदेमंद रहेगी। सेहत का ध्यान रखें, खासकर नींद और तनाव को लेकर। धैर्य रखेंगे तो स्थितियाँ आपके पक्ष में बनेंगी।

कब मनाई जाएगी बसंत पंचमी—22 या 23 जनवरी? तिथि, पूजा समय और विधि की पूरी जानकारी

बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान और जीवन में नई ऊर्जा के आगमन का उत्सव है. इस दिन चारों ओर पीले रंग की छटा, मन में उमंग और दिल में उम्मीदें खिल उठती हैं. मां सरस्वती की कृपा पाने के लिए श्रद्धालु पूरे मन से इस दिन पूजा-अर्चना करते हैं. ऐसे में हर साल की तरह इस बार भी लोगों के मन में सवाल है कि बसंत पंचमी 22 जनवरी को है या 23 जनवरी को? आइए पंचांग के आधार पर इस कंफ्यूजन को दूर करते हैं. कब है बसंत पंचमी: 22 या 23 जनवरी? हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पंचमी तिथि का आगमन 22 जनवरी की शाम से ही हो रहा है, लेकिन उदया तिथि और शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार, पूजा का विधान अगले दिन श्रेष्ठ माना गया है. बसंत पंचमी तिथि: 23 जनवरी 2026, शुक्रवार पंचमी तिथि का प्रारंभ: 22 जनवरी 2026, शाम 06:15 बजे से पंचमी तिथि का समापन: 23 जनवरी 2026, रात 08:30 बजे तक चूंकि 23 जनवरी को सूर्योदय के समय पंचमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा का पर्व 23 जनवरी, शुक्रवार को ही मनाया जाएगा. पूजा का शुभ मुहूर्त मां सरस्वती की पूजा के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है. 23 जनवरी को पूजा के लिए शुभ समय इस प्रकार है. पूजा का समय: सुबह 07:13 से दोपहर 12:33 तक रहेगा. अमृत काल: सुबह 08:45 से 10:20 तक रहेगा. सरस्वती पूजा की विधि इस दिन का रंग पीला है, जो ऊर्जा, उत्साह और शुद्धता का प्रतीक है माना जाता है. इस दिन सुबह जल्दी उठकर पीले रंग के वस्त्र धारण करें. एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर मां सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. साथ ही भगवान गणेश को भी विराजमान करें. मां के सम्मुख कलश रखें और धूप-दीप जलाएं. मां को पीले फूल खासकर गेंदा या सरसों के फूल, पीला चंदन, केसर और अक्षत अर्पित करें. इस दिन अपनी पुस्तकें, कलम या संगीत वाद्ययंत्रों को मां के पास रखकर उनकी पूजा करें. बच्चों के लिए ‘अक्षर अभ्यास’ शुरू करने का यह सबसे शुभ दिन है. मां को पीले मीठे चावल, बूंदी के लड्डू या केसरिया हलवे का भोग लगाएं. सबसे आखिर में सरस्वती माता की आरती करें और उनसे सद्बुद्धि का आशीर्वाद मांगें. बसंत पंचमी का महत्व बसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि जड़ता से चेतनता की ओर बढ़ने का उत्सव है. कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो चारों ओर मौन था. तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का और मां सरस्वती प्रकट हुईं. मां के वीणा वादन से पूरी सृष्टि में सुर और वाणी का संचार हुआ. इसीलिए, यह दिन हमारी बुद्धि, कला और ज्ञान को मां के चरणों में समर्पित करने का दिन है.

सावधान! इस समय किया गया लेन-देन रोक सकता है आर्थिक प्रगति

हिंदू परंपरा में धन को मां लक्ष्मी की कृपा, शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, केवल धन कमाना ही नहीं बल्कि उसका सही समय पर आदान-प्रदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। मान्यता है कि सप्ताह के हर दिन की अपनी अलग ऊर्जा और ग्रहों का प्रभाव होता है, जो हमारे आर्थिक फैसलों और धन प्रवाह को प्रभावित करता है। वास्तु शास्त्र में कुछ दिन ऐसे बताए गए हैं, जब पैसों का लेन-देन समृद्धि और स्थिरता बढ़ाता है, जबकि कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब किया गया आर्थिक व्यवहार मां लक्ष्मी की नाराजगी का कारण बन सकता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि धन से जुड़े कार्यों के लिए कौन-से दिन शुभ और कौन-से अशुभ माने जाते हैं। धन के लेन-देन के लिए शुभ दिन शुक्रवार वास्तु शास्त्र के अनुसार शुक्रवार को पैसों के लेन-देन के लिए सबसे शुभ दिन माना गया है। यह दिन मां लक्ष्मी और शुक्र ग्रह से जुड़ा होता है। शुक्र ग्रह को ऐश्वर्य, सुख-सुविधा और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना गया है। शुक्रवार को किया गया धन संबंधी लेन-देन आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और धन प्रवाह बढ़ाने में सहायक होता है। सोमवार सोमवार भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन किया गया धन का आदान-प्रदान मानसिक शांति के साथ-साथ आर्थिक बाधाओं को भी दूर करता है। व्यापार या जरूरी आर्थिक लेन-देन के लिए यह दिन शुभ माना गया है। गुरुवार गुरुवार भगवान विष्णु और गुरु बृहस्पति का दिन होता है। वास्तु के अनुसार, इस दिन किया गया लेन-देन धन वृद्धि और स्थिरता लाने वाला माना जाता है। खासकर निवेश या उधार देने के लिए गुरुवार अनुकूल माना गया है। इन दिनों पैसों का लेन-देन करने से बचें शनिवार शनिवार शनि देव से संबंधित होता है, जिन्हें कर्म और न्याय का देवता माना जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पैसों का लेन-देन करने से आर्थिक अस्थिरता, देरी और रुकावटें आ सकती हैं। मंगलवार मंगलवार को धन उधार देना या लेना भी शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि इस दिन दिया गया पैसा लंबे समय तक वापस नहीं आता, जिससे आर्थिक तनाव बढ़ सकता है। तिथियों का भी रखें विशेष ध्यान वास्तु शास्त्र के अनुसार केवल दिन ही नहीं, बल्कि तिथियों का भी धन के लेन-देन में विशेष महत्व होता है। अमावस्या के दिन पैसों का लेन-देन नहीं करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अमावस्या तिथि नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है, जिससे धन हानि और अस्थिरता हो सकती है। वास्तु विशेषज्ञों की सलाह यदि आर्थिक मजबूती और मां लक्ष्मी की कृपा बनाए रखना चाहते हैं, तो धन से जुड़े हर निर्णय में शुभ दिन और तिथि का ध्यान अवश्य रखें। छोटे-छोटे वास्तु नियम अपनाकर भी जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

क्या आप सही तरीके से पढ़ते हैं हनुमान चालीसा? जानिए 10 जरूरी नियम और आम भूलें

शनिवार और मंगलवार को लोग बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। कहते हैं कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं। ऐसे में जो भक्त सच्ची श्रद्धा बजरंगबली को याद करता है उनकी पूजा करता है उनपर हनुमान जी की विशेष कृपा बरसती है, पलभर में संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन हनुमान चालीसा का पाठ यदि नियम से किया जाए, तो ही इसका फल प्राप्त होता है। वरना गलत तरीके से किए गए पाठ से बजरंगबली नाराज हो जाते हैं। जैसे कि गलत स्थान व गलत समय पर पाठ करना आदि। चलिए जानते हैं कि हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किन गलतियों से बचना चाहिए। हनुमान चालीसा के दौरान ना करें ये गलतियां हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किसी भी तरह की नकारात्मकता अपने दिल में नहीं लानी चाहिए। जो लोग निर्बलों को बिना बात के सताते हैं, उन पर कभी भी हनुमान जी की कृपा नहीं बरसती है। हनुमान चालीसा का पाठ करते समय साधक को किसी भी व्यक्ति से बातचीत नहीं करनी चाहिए। कुछ समय ऐसे भी हैं जब हनुमान चालीसा का पाठ नहीं करना चाहिए। सूर्यास्त के तुरंत बाद पाठ करने से बचना चाहिए। गुस्से, चिड़चिड़े मन या मानसिक अशांति की अवस्था में भी पाठ नहीं करना चाहिए। बिना स्नान, अशुद्ध अवस्था, जल्दबाजी या दोपहर के समय किया गया पाठ भी फलदायी नहीं माना जाता। हनुमान चालीसा पाठ के 10 जरूरी नियम हनुमान चालीसा पाठ में साफ-सफाई और पवित्रता का खास ख्याल रखना चाहिए। ऐसे में जहां आप हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं या पूजा स्थल की साफ-सफाई अच्‍छे से कर लें। हनुमान चालीसा का पाठ हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। इसके लिए सुबह और शाम का समय परफेक्ट रहता है। हनुमान चालीसा के पाठ के दौरान उपयोग किए गए फूल लाल रंग के रखें। हनुमान चालीसा के पाठ के पहले बजरंगबली के सामने दीपक जरूर जलानी करना चाहिए। ध्यान रखें कि दीपक में जो बाती लगा रहे हैं, वह भी लाल सूत (धागे) की होनी चाहिए। आप दीपक में चमेली का तेल या शुद्ध घी का इस्तेमाल होनी चाहिए। हनुमानजी चालीसा के पाठ के बाद उन्हें गुड़ और चने का प्रसाद जरूर ‍अर्पित करें। आप केसरिया बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, चूरमा, मालपुआ या मलाई मिश्री का भोग भी लगा सकते हैं। हनुमान चालीसा पाठ के दौरान सिर्फ एक वस्त्र पहनकर ही चालीसा का पाठ करें या उनकी पूजा करें। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनिवार या रविवार के दिन 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। अगर आप 100 बार नहीं कर सकते हैं, तो आप 11, 9, 5, 3 या 1 बार शनिवार, मंगलवार या फिर रोज कर सकते हैं।

सफल जीवन का रहस्य: नीम करोली बाबा की 5 बातें जो बदल सकती हैं आपकी किस्मत

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम, आध्यात्मिक गुरु, नीम करोली बाबा, का आश्रम है। नीम करोली बाबा आज भले ही भौतिक रूप से लोगों के बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई शिक्षाएं आज भी उनके अनुयायियों के माध्यम से लोगों को प्रेरित करके हुए सुखी सफल जीवन जीने का रास्ता बताती रहती हैं। नीम करोली बाबा के ज्ञान को अपनाते हुए अपनी कुछ नकारात्मक आदतों को त्यागकर, कोई भी व्यक्ति अपना जीवन बदलकर पैसा कमा सकता है। आइए जानते हैं पैसा और कामयाबी हासिल करने के लिए नीम करोली बाबा ने कौन सी 5 आदतों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया है। अहंकार का त्याग नीम करोली बाबा के अनुसार, अहंकार व्यक्ति को हमेशा गलत राह पर ले जाता है। अगर आप अपने रिश्तों को मजबूत बनाए रखते हुए जीवन को सफल बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने अहंकार का त्याग करें। याद रखें, विनम्रता न केवल व्यक्ति को सम्मान अर्जित करवाती है, बल्कि उसके लिए नए अवसरों के दरवाजे भी खोलती है। क्रोध पर नियंत्रण नीम करोली बाबा के अनुसार क्रोध में लिए गए ज्यादातर निर्णय अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनते हैं। क्रोध व्यक्ति की आंतरिक शांति को नष्ट करके उसके निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर बना देता है।जो लोग अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाते, उन्हें अकसर जीवन में सफलता पाने में कठिनाई होती है। लालच से बचें नीम करोली बाबा के अनुसार व्यक्ति का जरूरत से ज्यादा लालच उसे जीवन में कभी भी आगे नहीं बढ़ने देता है। लालच में डूबा व्यक्ति धन संचय करने या उसे बनाए रखने के लिए संघर्ष करता रहता है। ईर्ष्या से करें परहेज नीम करोली बाबा व्यक्ति को कभी भी दूसरों की सफलता से ईर्ष्या न करने की सलाह देते थे। उनका मानना था कि दूसरों की उपलब्धियों से जलन रखने की जगह व्यक्ति को हमेशा अपनी प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कड़ी मेहनत और लगन सच्ची सफलता दिलाते हैं, जबकि ईर्ष्या केवल नकारात्मकता और भटकाव की ओर ले जाती है। नकारात्मकता से रहें दूर नीम करोली बाबा की शिक्षाओं के अनुसार आत्म-अनुशासन, आंतरिक शांति और सकारात्मक सोच ही स्थायी सफलता की कुंजी हैं। ऐसे में व्यक्ति को हमेशा अहंकार, क्रोध, लोभ और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक आदतों को त्याग करना चाहिए।

घर में तुलसी की गलत दिशा बन सकती है कंगाली का कारण, पढ़ें क्या कहता है वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर आपने तुलसी का पौधा गलत दिशा में लगाया है, तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा। साथ ही जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं कि किस दिशा में तुलसी का पौधा नहीं लगाना चाहिए। भूलकर भी न लगाएं इस दिशा में तुलसी वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की दक्षिण दिशा पितरों की होती है। इसलिए तुलसी के पौधे को दक्षिण दिशा में भूलकर भी नहीं लगाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि गलत दिशा में तुलसी को लगाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और पूजा सफल नहीं होती है। साथ ही आर्थिक परेशानियां हो सकती हैं। इसलिए तुलसी को लगाने से पहले सही दिशा जरूर जान लें। कौन-सी दिशा में लगाएं तुलसी वास्तु शास्त्र की मानें तो तुलसी को उत्तर दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। इस दिशा को धन के देवता कुबेर की दिशा मानी जाती है। इस दिशा में तुलसी लगाने से धन, सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा उत्तर-पूर्व दिशा में भी तुलसी का पौधा लगा सकते हैं। इस दिशा में देवताओं का स्थान माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन लगाएं तुलसी अगर आप घर में तुलसी लगाना चाहते हैं, तो इसके लिए गुरुवार और शुक्रवार का दिन शुभ माना जाता है, क्योंकि गुरुवार भगवान विष्णु शुक्रवार धन की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित है। इस दिन तुलसी लगाने से शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं। कार्तिक का महीना भी तुलसी लगाने के लिए उत्तम होता है। बता दें कि तुलसी को सोमवार, रविवार और एकादशी के दिन लगाने से बचना चाहिए। इन बातों का रखें ध्यान     तुलसी के पौधे के आसपास सफाई का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि मां लक्ष्मी का वास सफाई वाली जगह पर ही होता है।     तुलसी के पास रोजाना सुबह और शाम देसी घी का दीपक जलाएं।     पौधे के पास जूते-चप्पल न रखें। साथ ही कांटेदार पौधा नहीं लगाना चाहिए।  

गरुड़ पुराण के अनुसार अंतिम संस्कार में 5 प्रकार के लोग नहीं कर सकते भागीदारी

हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का जिक्र किया गया है, जिनमें से एक है अंतिम संस्कार. अंतिम संस्कार को बहुत पवित्र और गंभीर कर्म माना जाता है. दरअसल, इस संस्कार के दौरान मृतक व्यक्ति के शव को मुखाग्नि दे दी जाती है, जिसके बाद उसका शरीर पंचतत्व लीन हो जाता है. गरुड़ पुराण के अनुसार, यह संस्कार आत्मा की शांति और उसकी आगे की यात्रा से संबंधित होता है. इसलिए, अंतिम संस्कार के समय माहौल शांत और संयमित रहना जरूरी होता है. इसी वजह से गरुड़ पुराण में कुछ लोगों को इस दौरान वहां न जाने की सलाह दी गई है. तो आइए गरुड़ पुराण के द्वारा जानते हैं कि अंतिम संस्कार में किन किन लोगों को शामिल नहीं होना चाहिए.  गर्भवती महिलाएं गरुड़ पुराण के अनुसार, श्मशान घाट या अंतिम संस्कार में गर्भवती महिलाओं को शामिल होने की अनुमति नहीं है. दरअसल, अंतिम संस्कार का माहौल दुख और तनाव से भरा होता है, जो कि गर्भवती महिला मन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. श्मशान घाट में नकारात्मक ऊर्जाएं भी सक्रिय होती हैं, जिसका प्रभाव गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ सकता है.  छोटे बच्चे छोटे बच्चों को भी श्मशान घाट या अंतिम संस्कार में जाने की मनाही होती है. गरुड़ पुराण के अनुसार, छोटे बच्चों के लिए श्मशान का दृश्य, जलती चिता और लोगों का रोना मन में डर या बेचैनी पैदा कर सकता है. इसी कारण बच्चों को अंतिम संस्कार में ले जाना सही नहीं माना जाता है.  बीमार लोग बीमार और कमजोर हृदय वाले व्यक्तियों को भी श्मशान घाट या अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होना चाहिए. गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग पहले से बीमारी से जूझ रहे हों, उनके लिए यह माहौल भारी पड़ सकता है. शोक और तनाव उनकी ज्यादा तबीयत और खराब कर सकता है.  जिनके घर सूतक चल रहा हो गरुड़ पुराण के अनुसार, अगर किसी के घर हाल ही में मौत हुई हो और सूतक लगा हो, तो उस दौरान दूसरे अंतिम संस्कार में जाना वर्जित माना जाता है. मान्यता है कि सूतक के समय व्यक्ति को धार्मिक कार्यों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. जो बहुत ज्यादा दुखी या भावुक हों गरुड़ पुराण के अनुसार, अंतिम संस्कार आत्मा की शांति से जुड़ा होता है. इस दौरान शांत मन और संयम जरूरी होता है. इसलिए, अत्यधिक रोना आत्मा की शांति में बाधा बन सकता है, इसलिए ऐसे लोगों को इस कर्म से दूर रहने की सलाह दी जाती है.