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संघ भाजपा के लिए अगली नई पीढ़ी तैयार करना चाहता, रबर स्टांप अध्यक्ष की जगह एक मजबूत नेतृत्व की तलाश

नईदिल्ली   कौन बनेगा भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष? भगवा पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से लेकर सियासी पंडितों के मन में यह सवाल गूंज रहा है। अभी तक इस पद को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो सकी है। सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा नेतृत्व के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पा रही है। सूत्र यह भी बताते हैं कि हाल ही में दो-दो केंद्रीय मंत्रियों के नाम भाजपा अध्यक्ष के पद के लिए आरएसएस को भेजे गए थे, लेकिन उनमें से किसी के नाम पर भी सहमति नहीं बन सकी है। भाजपा की तरफ से केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए भेजा गया था। दोनों ही नेताओं को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है। आरएसएस का मानना है कि भाजपा को 2029 के बाद के युग के लिए तैयार करना जरूरी है। संघ भाजपा के लिए अगली और एक नई पीढ़ी तैयार करना चाहता है। आरएसएस चाहता है कि भाजपा को एक रबर स्टांप अध्यक्ष की जगह एक मजबूत नेतृत्व मिले जिसे पार्टी के कार्यकर्ता भी पसंद करते हों। वह नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा को संभालने में सक्षम हो। एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “आरएसएस और भाजपा के वर्तमान नेतृत्व के बीच तीन दौर की बैठकों के बाद भी सहमति नहीं बनी है। आगे और चर्चा होनी है।” चर्चा में और भी कई नाम इससे पहले खबर आई थी कि भाजपा अपने इतिहास में पहली बार किसी महिला नेता के हाथों में पार्टी की कमान सौंप सकती है। उनमें केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का नाम प्रमुख था। इसके अलावा दो और केंद्रीय मंत्रियों के नाम इस रेस में थे, जनमें मनोहर लाल खट्टर और शिवराज सिंह चौहान शामिल हैं। कौन बनेगा यूपी का अध्यक्ष? राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम के चयन के साथ-साथ भाजपा के लिए देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के अगले प्रदेश अध्यक्ष के नाम की भी चुनौती बनी हुई है। सूत्रों का कहना है कि यूपी में भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति पर भी अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच सहमति नहीं बन सकी है। कौन बनेगा भाजपा का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष?  भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए तैयारी कर रही है। कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा हो चुकी है। उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों में इसकी घोषणा बाकी है। इस सबके बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवा पार्टी का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष कैसा होगा। आपको बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत से चूकने के बाद BJP एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। सत्ता में तो है पर पहले जैसा अजेय दबदबा नहीं है। अब जब पार्टी गठबंधन सरकार चला रही है, तो RSS का हस्तक्षेप अधिक स्पष्ट और मुखर हो गया है।  अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि RSS प्रमुख मोहन भागवत की हालिया टिप्पणियों को भाजपा के लिए मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है। संघ प्रमुख ने सत्ता में बढ़ती अहंकार की भावना और संवादहीनता की आलोचना की तो इसे सीधे तौर पर BJP नेतृत्व के व्यक्तित्व केंद्रित मॉडल पर कटाक्ष माना जाने लगा है। क्या चाहता है संघ? >> आरएसएस एक ऐसा अध्यक्ष चाहता है जो अपेक्षाकृत युवा हो। जो संगठन के साथ जुड़ा हो। वह केवल रणनीतिकार न हो, बल्कि वैचारिक मार्गदर्शक भी हो। >> आरएसएस व्यक्तिगत प्रभुत्व नहीं बल्कि संगठन आधारित नेतृत्व की चाह रखता है। भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कैडर से संवाद, फीडबैक को स्वीकार करने वाला और अंदरूनी लोकतंत्र को पुनर्स्थापित करने वाला नेता हो। >> पार्टी में बढ़ते टेक्नोक्रेट्स और राजनीतिक प्रवासियों की भूमिका पर आरएसएस ने चिंता जताई है। संघ का कहना है कि भाजपा का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष तकनीक नहीं, तपष्या से बना नेता हो। >> भाजपा का नया अध्यक्ष उन लोगों से जुड़ा हो जो शाखा, प्रांत प्रचारक और बूथ स्तर पर काम कर रहे हैं। उसकी वैचारिक स्पष्टता को भी ध्यान में रखा जाए। समान नागरिक संहिता (UCC), जनसंख्या नीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों पर उसके विचार स्पष्ट हों। 28 प्रदेश अध्यक्ष बदले गए BJP ने अब तक 36 में से 28 राज्यों में नए या फिर से नियुक्त अध्यक्षों की घोषणा कर दी है। बाकी महत्वपूर्ण राज्य जैसे कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और गुजरात की घोषणा बाकी है। इस जमीनी पुनर्गठन से पार्टी एक नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन के लिए मंच तैयार कर रही है। BJP या RSS में 75 की उम्र से रिटायरमेंट की कोई औपचारिक नीति नहीं है, लेकिन मोहन भागवत का हालिया बयान जिसमें उन्होंने 75 पार कर चुके लोगों के उत्तराधिकार तय करने की आवश्यकता पर बल दिया, ने हलचल मचा दी है।

राजनीति में नई करवट? उद्धव-फडणवीस मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चा गर्म

मुंबई  महाराष्ट्र में क्या एक बार फिर से सियासत नई करवट लेने वाली है? क्या शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और बीजेपी फिर से साथ आने वाले हैं? यह सब अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के महाराष्ट्र की बीजेपीनीत एनडीए सरकार के साथ आने का ऑफर देने के एक दिन बाद गुरुवार को उद्धव ठाकरे की सीएम से मुलाकात हुई है। महाराष्ट्र सीएम और उद्धव ठाकरे के बीच यह मुलाकात लगभग 20 मिनट तक चली। बुधवार को विधान परिषद में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र सरकार का हिस्सा बनने का ऑफर दिया था। विधान परिषद में नेता विपक्ष अंबादास दानवे के विदाई समारोह में बोलते हुए फडणवीस ने मजाकिया अंदाज में कहा था कि उद्धव जी, 2029 तक मेरी तो उस तरफ (विपक्ष) आने की संभावना नहीं है, लेकिन अगर आप इधर (सत्ता पक्षा की तरफ) आना चाहें तो रास्ता निकाला जा सकता है। कुछ अलग तरीके से सोचना पड़ेगा। इसके बाद अटकलें लगने लगी थीं कि क्या उद्धव और बीजेपी एक बार फिर से साथ आएंगे? हालांकि, पिछले कुछ सालों में शिवसेना (यूबीटी) चीफ ने इन अटकलों को खारिज किया है। हाल ही में दो दशक बाद मराठी भाषा के मुद्दे पर उद्धव और राज ठाकरे साथ दिखाई दिए थे। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो सका है कि उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस के बीच 20 मिनट तक चली यह मुलाकात किस मुद्दे पर हुई। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच क्या बात हुई, लेकिन सीएम द्वारा ऑफर दिए जाने के एक दिन बाद हुई इस मुलाकात के बाद तमाम तरह की अटकलें फिर से लगने लगी हैं। दोनों नेताओं के बीच यह मीटिंग विधान परिषद के सभापति राम शिंदे के कार्यालय में हुई और लगभग 20 मिनट तक दोनों बातचीत करते रहे। उल्लेखनीय है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना और बीजेपी महाराष्ट्र में लंबे समय तक गठबंधन में रहे। लेकिन 2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ढाई-ढाई साल तक मुख्यमंत्री के मुद्दे पर दोनों का गठबंधन टूट गया। इसके बाद, उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2022 के मध्य में शिवसेना में बड़ी फूट हुई और सरकार गिर गई। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के कई विधायक और सांसदों ने उद्धव से नाता तोड़ लिया और पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई।  

आदिवासी प्रतिनिधियों से बोले राहुल गांधी – हमारी मेहनत, उनकी माइक पर कहानी

नई दिल्ली लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने आज (गुरुवार, 17 जुलाई को) अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस द्वारा आयोजित एक बैठक में देश भर से आए आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उनके प्रमुख मुद्दों पर गहन चर्चा की। इस दौरान छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा समेत अन्य इलाकों से आए आदिवासी नेताओं ने कहा कि उनके जल, जंगल जमीन पर हमले हो रहे हैं और भाजपा शासित राज्यों में उनकी जमीनें छीनकर अडाणी-अंबानी को दी जा रही हैं। एक आदिवासी नेता की शिकायत पर राहुल गांधी ने कहा कि काम हम करते हैं लेकिन लाउडस्पीकर वो (भाजपा वाले) चला रहे हैं क्योंकि उनके पास प्रचार तंत्र है। इस दौरान महाराष्ट्र से आए एक अन्य आदिवासी नेता ने कहा कि कांग्रेस हमारे साथ है, संविधान हमारे साथ है, कानून हमारे साथ है लेकिन जमीन पर उसे अमल में नहीं लाया गया, खासकर महाराष्ट्र में आदिवासी समुदाय उपेक्षित है। उन्होंने कहा कि अगर हमें आदिवासियों के हितों की रक्षा करनी है तो हमें एससी,एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी को भी साथ लेकर चलना होगा, तभी अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेंगे और विकास कर सकेंगे। अन्यथा हम बंटकर रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि समाज में सद्भाव के बिना विकास नहीं हो सकता। आदिवासियों का फंड लैप्स हो रहा उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समुदाय के विकास के लिए आया फंड लैप्स हो जाता है या दूसरे मद में खर्च कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए अनिवार्य मुफ्त शिक्षा का कानून लागू कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा से ही आदिवासी समुदाय के अंदर व्याप्त घोर गरीबी को दूर किया जा सकता है। एक अन्य नेता ने कहा कि आदिवासी इलाकों में करीब 10 हजार स्कूलों को बंद कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे स्कूल बंद होने के बाद बच्चों को जबरन सरस्वती शिशु मंदिर भेजा जा रहे है। हमारे जंगल को हमसे छीना जा रहा छत्तीसगढ़ से आई एक महिला नेता ने कहा कि उनके यहां छोटी-बड़ी 153 कंपनियां हैं। वहां के लोगों की यही मांग है कि हम जल, जंगल, जमीन को बचाना चाहते हैं लेकिन जनप्रतिनिधि या राज्य सरकार आदिवासियों की मदद नहीं कर रही। उन्होंने कहा कि उनके गांव के बगल में अडाणी के लिए जमीन अधिग्रहण किया गया है और जंगलों की कटाई हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आदिवासियों को खत्म करना चाहती है। हमारे जंगल को हमसे छीनना चाहती है। आदिवासी समुदाय सीधा-सादा है, इसलिए आवाज नहीं उठा पाता है। हमारे हाथ में प्रचार तंत्र नहीं: राहुल एक अन्य नेता ने जैसे ही कहा कि जब तक कांग्रेस की सरकार रही है, तब तक 100 फीसदी आदिवासी समुदाय कांग्रेस के साथ रहा है लेकिन अब वे सभी हमारी पहुंच से बाहर निकल रहे हैं। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे हाथ में प्रचार तंत्र नहीं है। उसका सिस्टम हमारे पास नहीं है। राहुल ने कहा, "प्रचार करने का सिस्टम बीजेपी और आरएसएस के हाथ में है। काम हम करते हैं, लाउडस्पीकर वो चलाते हैं।"  

अमित अमित चावड़ा? जिन्हें दी गई गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी

अहमदाबाद गुजरात कांग्रेस से जुडी बड़ी खबर सामने आई है। अमित चावड़ा को गुजरात कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वे शक्ति सिंह गोहिल का स्थान लेंगे। साथ ही डॉ. तुषार चौधरी को गुजरात में कांग्रेस विधायक दल का नेता नियुक्त किया गया है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एक बार फिर विवादों में, दुकानदार को WhatsApp स्टेटस के कारण पीटा

मुंबई  राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) एक बार फिर विवादों में है। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के विक्रोली इलाके में एक राजस्थानी दुकानदार की पिटाई कर दी। दुकानदार के एक व्हाट्सऐप स्टेटस को एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक मानते हुए उसकी पिटाई कर दी। घटना विक्रोली के टैगोर नगर क्षेत्र की है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। एमएनएस कार्यकर्ताओं ने दुकानदार से जबरन माफी मंगवाई, थप्पड़ मारे और मराठी मानुष के खिलाफ कुछ भी लिखने से बचने की चेतावनी भी दी। पीड़ित दुकानदार मारवाड़ी समुदाय से है। उसने अपने व्हाट्सऐप पर लिखा था, "देख लिया राजस्थानी का पावर। हम मारवाड़ी, हमारे सामने किसी की नहीं चलती।" इस स्टेटस को एमएनएस कार्यकर्ताओं ने मराठी लोगों का अपमान मानते हुए हमला कर दिया। वीडियो में दुकानदार कानों को पकड़कर माफी मांगते हुए कहता है, “ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।” वीडियो बना कर खुद ही किया वायरल एमएनएस कार्यकर्ताओं ने इस पूरी घटना का वीडियो खुद बनाया और एडिट कर सोशल मीडिया पर फैलाया। इसमें मराठी गीत और संदेश लिखा है, “जो मराठी लोगों के खिलाफ बोलेगा, उसके साथ ऐसा ही होगा।” इस वीडियो में एमएनएस का लोगो भी स्पष्ट रूप से दिखता है। राज ठाकरे खुद कार्यकर्ताओं को ऐसी रिकॉर्डिंग से मना कर चुके हैं ताकि कानूनी रूप से फंसने से बचा जा सके। इसके बावजूद एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने ऐसा किया है। मारपीट के बाद दुकानदार को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और शिकायत दर्ज की गई। स्थानीय एमएनएस नेता विश्वजीत ढोलम ने दुकानदार के कारोबार के बहिष्कार की अपील की और कहा, “ऐसे व्यापारियों से सामान न खरीदें जो मराठी लोगों का अपमान करते हैं।” आपको बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल के कुछ समय में मराठी भाषा और पहचान के नाम पर हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। एक जुलाई को ठाणे में एक स्ट्रीट फूड वेंडर की इसलिए पिटाई हुई क्योंकि उसने मराठी बोलने से इनकार कर दिया। इस घटना में शामिल एमएनएस के सात कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। बीते 8 जुलाई के मीरा-भायंदर में एमएनएस, शिवसेना (उद्धव) और एनसीपी (शरद पवार गुट) ने मराठी अस्मिता के समर्थन में मार्च निकाला। वहीं, विरार स्टेशन के पास उत्तर प्रदेश के ऑटो चालक ने "मैं हिंदी बोलूंगा" कहा, तो एमएनएस और शिवसेना (उद्धव गुट) के कार्यकर्ताओं ने उसे पीटकर सार्वजनिक माफी मंगवाई। शिवसेना (UBT) के स्थानीय प्रमुख उदय जाधव ने कहा, “जो महाराष्ट्र और मराठी भाषा का अपमान करेगा, उसे शिवसेना स्टाइल में जवाब मिलेगा।” इन घटनाओं ने एक बार फिर मराठी बनाम बाहरी बहस को हवा दी है।

हम नेतृत्व करेंगे, CM मैं ही बनूंगा – NDA सहयोगी दल का बड़ा बयान

चेन्नई  ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) प्रमुख एडप्पादी के पलानीस्वामी ने  यहां कहा कि तमिलनाडु में पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अटूट है और भाजपा समेत इसके घटक दलों के बीच फूट डालने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन के संबंध में उनका निर्णय अंतिम होगा। विधानसभा में विपक्ष के नेता ने मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के ‘उंगलुदन स्टालिन’ संपर्क कार्यक्रम की भी आलोचना की और इसे एक 'नाटक' बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले तमिलनाडु के लोगों को 'गुमराह' करना है। पलानीस्वामी ने पूछा कि इस सरकार के बचे हुए आठ महीनों में लोग अपने मुद्दों के क्या ही समाधान की उम्मीद कर सकते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा अगले साल राज्य में राजग के चुनाव जीतने पर गठबंधन सरकार बनाने संबंधी कथित टिप्पणी के बारे में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए, पलानीस्वामी ने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता ने केवल इतना कहा कि गठबंधन सत्ता में आएगा। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, 'उनका कहना है कि हमारा गठबंधन सरकार बनाएगा। मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है — इस गठबंधन का नेतृत्व कौन कर रहा है? तो यह मेरा फैसला है, है ना? कौन मुख्यमंत्री बनेगा, कौन सरकार बनाएगा – हम दोनों (शाह और मैं) यह स्पष्ट कर चुके हैं।' यह स्पष्ट कर दिया गया है कि अन्नाद्रमुक राज्य में राजग का नेतृत्व करेगा और अगर गठबंधन विजयी होता है तो वह मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्होंने कहा, 'गठबंधन में फूट डालने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी। यह एक अटूट गठबंधन है।' पलानीस्वामी ने दावा किया कि द्रमुक को यह उम्मीद नहीं थी कि अन्नाद्रमुक गठबंधन करेगा और इसलिए वह 'डर के कारण' विपक्षी गठजोड़ की आलोचना कर रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि द्रमुक ने अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन किया था और सवाल किया कि क्या द्रविड़ पार्टी का तब ऐसा करना स्वीकार्य था, लेकिन अब अन्नाद्रमुक ने जब भाजपा के साथ गठबंधन किया है तो वह भाजपा को 'सांप्रदायिक' बता रही है।  रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने बताया है कि ईपीएस ने शाह से कह दिया है कि जीत की स्थिति में 'न्यूनतम स्तर पर' पावर शेयरिंग पर विचार किया जा सकता है। दरअसल, शाह ने साफतौर पर कहा था, 'हम चुनाव एडप्पाडी जी के नेतृत्व में लड़ेंगे।' साथ ही उन्होंने 'गठबंधन सरकार' का जिक्र किया था। कहा जा रहा है कि इसके चलते AIADMK नेताओं में हलचल तेज हुई थी। कहा जा रहा है कि ईपीएस की तरफ से इस बात पर जोर दिया जाना भाजपा और एआईएडीएमके के बीच एक समझ स्थापित होने के संकेत दे रहा है, जिसके तहत यह साफ हो चुका है कि चुनाव से पहले गठबंधन सरकार की बात को बढ़ाना देना नुकसान करा सकता है। इसकी वजह कोर द्रविड़ मतदाताओं के विरोध का डर माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ईपीएस की टिप्पणियों को जनता की धारणा बदलने की ठोस कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अखबार को एक सूत्र ने बताया कि गठबंधन काफी प्रगति कर रहा है। उन्होंने कहा, 'हम दोनों पहले ही तय कर लिया है कि AIADMK नेतृत्व कर रहा है। ईपीएस सीएम बनेंगे। आप और क्या जानना चाहते हैं।' रिपोर्ट के अनुसार, AIADMK और भाजपा के बीच बातचीत की जानकारी रखने वाले राज्य के ही एक वरिष्ठ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य ने कहा था, 'अगर गठबंधन सरकार की बात होती है, तो AIADMK कैडर खुश नहीं होगा। ईपीएस ने शाह को बता दिया है कि वह जीत की स्थिति में अपनी पार्टी के नेताओं को पावर शेयरिंग के लिए मना लेंगे। इसकी घोषणा चुनाव से पहले करना आत्महत्या करने जैसा होगा। भाजपा इस पर सहमत हो गई है। हालांकि, शाह के बयान को किस तरह से लिया जा रहा है, इस पर असहमति हो सकती है।'

‘जेल भेजने आए थे, खुद हैं जमानत पर’ — राहुल पर सीएम सरमा की सीधी चोट

गुवाहाटी  राहुल गांधी ने असम दौरे पर कांग्रेस नेताओं से कहा कि हिमंत बिस्वा सरमा को जेल भेजा जाएगा। इस पर असम के सीएम सरमा ने पलटवार करते हुए कहा कि खुद राहुल गांधी देशभर में कई मामलों में जमानत पर हैं। उन्होंने राहुल को तंज कसते हुए असम की मेहमाननवाजी का आनंद लेने की सलाह दी। असम की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी के असम दौरे पर दिए गए कथित बयान को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखा पलटवार किया है। सरमा ने एक्स पर राहुल गांधी के बंद कमरे में बोले गए कथित बयान का जिक्र करते हुए कहा कि जो खुद देशभर में कई मामलों में जमानत पर हैं, वो दूसरों को जेल भेजने की बात कर रहे हैं। यह टिप्पणी कांग्रेस की असम में रणनीतिक बैठक के बाद सामने आई है। राहुल गांधी असम दौरे पर थे, जहां उन्होंने कांग्रेस की राज्य स्तरीय राजनीतिक मामलों की समिति के साथ एक बंद बैठक की। इस बैठक में उन्होंने कथित रूप से कहा कि लिख कर ले लीजिए, हिमंत बिस्वा सरमा को जेल जरूर भेजा जाएगा। सरमा खुद को ‘राजा’ समझते हैं, लेकिन असम की जनता उन्हें भ्रष्टाचार के लिए जेल भेजेगी। राहुल ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री और उनके परिवार को घोटालों का जवाब देना होगा। वहीं, मुख्यमंत्री सरमा ने इस बयान को राहुल की दुर्भावना और राजनीतिक प्रतिशोध की भावना बताया। सात ही उन्होंने इसे राजनीतिक मंच का दुरुपयोग कहा। सीएम हिमंत का पलटवार हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गांधी के बयान का जवाब एक्स पर एक पोस्ट के जरिए दिया। उन्होंने लिखा कि राहुल गांधी बड़े आराम से भूल गए कि वे स्वयं देशभर में दर्ज कई आपराधिक मामलों में जमानत पर हैं। सरमा ने राहुल को तंज कसते हुए असम की मेहमाननवाजी का आनंद लीजिए। इसके साथ ही आगे उन्होंने कहा कि केवल मुझे जेल भेजने की बात कहने के लिए राहुल गांधी असम आए हैं। कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग इस बयानबाजी के बाद असम की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और भाजपा के मुख्यमंत्री सरमा के बीच यह तकरार सीधे तौर पर दोनों दलों की रणनीति और विचारधारा को सामने रखती है। कांग्रेस राज्य में भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार और तानाशाही के आरोप लगाती रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस को परिवारवाद और कानूनी मामलों में घिरा हुआ बताती है। क्या हैं राहुल गांधी के खिलाफ केस? मुख्यमंत्री सरमा के बयान के मुताबिक, राहुल गांधी देश के कई हिस्सों में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं और इन मामलों में उन्हें जमानत मिली हुई है। इसमें सबसे चर्चित मामला 'मोदी सरनेम' टिप्पणी वाला है, जिसमें मानहानि का आरोप लगा और उन्हें दो साल की सजा भी सुनाई गई थी, हालांकि बाद में सजा पर रोक लगी और उन्हें जमानत मिली।  इतना ही नहीं राहुल गांधी पर और भी मामले दर्ज हैं।  

कांग्रेस का हमला तेज: बालासोर केस को लेकर ओडिशा सरकार पर इस्तीफा देने का दबाव

भुवनेश्वर  कांग्रेस ने बालासोर की घटना पर ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का इस्तीफा मांगा है। इसके साथ राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गई है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महिला विंग की अध्यक्ष अलका लांबा बुधवार को भुवनेश्वर पहुंचीं, जहां उन्होंने मीडिया से बात करते हुए सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। अलका लांबा ने आरोप लगाया कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के तहत ओडिशा महिलाओं के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। उन्होंने छात्रा की मौत के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही घटना को प्रशासनिक असफलता व जवाबदेही की कमी का नतीजा बताया। अलका लांबा ने कहा कि राज्य मशीनरी पूरी तरह असफल हो गई है। एक लड़की को न्याय मांगने के लिए खुद को आग लगानी पड़ी। मीडिया से बातचीत में अलका लांबा ने कहा, "आज हकीकत यह कहती है कि पूरा ओडिशा बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री (मोहन चरण माझी) अनुभवहीन हैं। यह एक साल में फेल साबित हुए हैं। इन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।" उन्होंने कहा, "जब कानून-व्यवस्था चरमरा जाए, अपराधी खुलेआम घूमें और पीड़ित न्याय के इंतजार में दम तोड़ दें, तब मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना जरूरी होता है। हम उनका तुरंत इस्तीफा मांगते हैं और ओडिशा में राष्ट्रपति शासन लागू करने का आग्रह करते हैं।" अलका लांबा ने कथित तौर पर छात्रा के इलाज में देरी और प्रशासन की ओर से तुरंत कार्रवाई न करने की भी निंदा की। उन्होंने कहा, "उसे (छात्रा) समय पर इलाज से बचाया जा सकता था। जब एक बच्ची जल रही थी, तब व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही।" कांग्रेस की महिला नेता ने जानकारी दी कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी बालासोर का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, "राहुल गांधी ने संवेदनशीलता दिखाते हुए छात्रा के पिता से बात की। पिता भावुक थे, राहुल गांधी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि तब तक न्याय नहीं मिल जाता है कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। राहुल गांधी दोबारा लौटेंगे और प्रियंका गांधी भी आएंगी।" उन्होंने कहा कि ओडिशा के सभी अभिभावकों को हम विश्वास दिलाने आए हैं कि आप अकेले नहीं हैं। कांग्रेस न्याय का हक मिलने तक साथ खड़ी है। इस दौरान अलका लांबा ने राज्य की जनता से 17 जुलाई को 'ओडिशा बंद' में हिस्सा लेने की अपील की।

चीन से फंडिंग पाने वालों को विदेश नीति पर बोलने का हक नहीं: तरुण चुघ

नई दिल्ली  कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विदेश मंत्री एस जयशंकर पर भारत की विदेश नीति को कमजोर करने का आरोप लगाया है। इसी पर अब भाजपा नेता तरुण चुघ की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने एजेंसी से बातचीत में कहा कि राहुल गांधी हमें विदेश नीति पर ज्ञान दे रहे हैं। वह हमें किसी भी प्रकार का ज्ञान नही दें, तो बेहतर रहेगा, क्योंकि इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है कि राहुल गांधी ही वह शख्स हैं, जो छुप-छुप कर चीनी अधिकारियों से मुलाकात किया करते थे। भाजपा नेता ने कहा कि जिन लोगों ने चीन के साथ एमओयू साइन किया है, वे हमें कैसे विदेश नीति पर ज्ञान दे सकते हैं। राहुल गांधी ने हमेशा से ही भारत की विदेश नीति को नीचा दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि देश अब इस बात को जान चुका है कि गांधी परिवार का चीन प्रेम बहुत पुराना है। देश इस बात को भूला नहीं है कि जब कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा देकर देश की झोली में 1962 का युद्ध डाला था। तरुण चुघ ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भारत की विदेश नीति कमजोर थी, सभी लोग भारत को छोटी नजरों से देखा करते थे। लेकिन, आज ऐसी स्थिति नहीं है। आज की तारीख में भारत की विदेश नीति काफी मजबूत हुई है। आज की तारीख में पूरी दुनिया में भारत को सम्मान की दृष्टि से देखा जा रहा है। कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए वैश्विक मंच पर देश की विदेश नीति को कमजोर करने का अपनी तरफ से भरसक प्रयास किया था। लेकिन, आज जब देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, तो कुछ लोगों के पेट में दर्द हो रहा है। इसके अलावा, शंघाई सहयोग संगठन में विदेश मंत्री एस जयशंकर की तरफ से पहलगाम आतंकी हमले को उठाए जाने की तारीफ की और कहा कि विदेश मंत्री ने वैश्विक मंच पर आतंक के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने पूरी दुनिया में यह संदेश फैलाने की कोशिश की कि भारत आतंकवाद के विरुद्ध है। भारत ने हमेशा से ही आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करके रखा और आगे भी रखेगा।

बिहार चुनावी रण से पहले बेंगलुरु में कांग्रेस का दांव: OBC को 50% से ज्यादा आरक्षण का संकल्प

बेंगलुरु बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने पिछड़ा वर्ग को रिझाने के लिए शिक्षा, नौकरियों और अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ने का संकल्प लिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कांग्रेस की ओबीसी परिषद की बैठक में इसका ऐलान किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओबीसी सलाहकार परिषद की दो दिवसीय बैठक बेंगलुरु में आयोजित की गई थी। आज बैठक का दूसरा और आखिरी दिन है। कांग्रेस द्वारा गठित ओबीसी सलाहकार परिषद को देश भर में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाने का काम सौंपा गया है। परिषद की बैठक में केंद्र से तेलंगाना जाति सर्वेक्षण के मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तावित जातिगत गणना कराने का आह्वान किया गया। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व में यहां हुई दो दिवसीय बैठक में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। सिद्धरमैया ने परिषद में पारित प्रस्तावों को ‘बेंगलुरु घोषणा’ नाम देते हुए कहा,‘‘जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति और जाति के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक, रोज़गार, राजनीतिक पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि दूसरा प्रस्ताव आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को समाप्त करने का था, जिससे शिक्षा, सेवा, राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों में ओबीसी के लिए उपयुक्त आरक्षण सुनिश्चित हो सके। सिद्धरमैया ने बुधवार को बेंगलुरु में हुई परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण सिद्धरमैया ने कहा कि बैठक में पारित तीसरे प्रस्ताव में कहा गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के अनुसार निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण होना चाहिए। सलाहकार परिषद ने सर्वसम्मति से ‘न्याय योद्धा’ राहुल गांधी को समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद दिया। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘राहुल जी के दृढ़ निश्चय ने मनुवादी मोदी सरकार को भारत में जातिगत गणना की न्यायोचित और संवैधानिक मांग के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया। भारत के सभी पिछड़े वर्गों की ओर से, परिषद हृदय से उनकी सराहना करता है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए राहुल गांधी के योगदान को श्रेय देता है।’’ जातिगत गणना मील का पत्थर जातिगत गणना को लेकर केंद्र द्वारा किये गए फैसले को मील का पत्थर बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह भारतीय संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक छोटा सा कदम है। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘न्याय योद्धा राहुल गांधी जी के साहसी और अडिग नेतृत्व में, भारत सामाजिक सशक्तिकरण के अंतिम संवैधानिक उद्देश्य को साकार करने और प्राप्त करने के लिए नियत है, जिससे हमारे महान राष्ट्र में एक समतावादी और समान समाज का निर्माण होगा।’’ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने परिषद से राष्ट्रव्यापी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक जाति जनगणना पूरी करने के लिए मौजूदा सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाने का आग्रह करते हुए कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए 75% आरक्षण या जाति जनगणना के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। उन्होंने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की वकालत की। …तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता सिद्धारमैया ने जोर देकर कहा कि अगर अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) सहित अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों की बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता। ओबीसी परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अगर ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों – यानी अहिंदा समुदायों – की सिर्फ़ गिनती की जाती है, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता।" यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं: सिद्धारमैया उन्होंने आगे कहा, "यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों के लिए सम्मान, पहचान और असली ताकत की लड़ाई है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से इससे वंचित रखा गया है।" अहिंदा कन्नड़ में अल्पसंख्यातरु, हिंदुलिदावरु और दलितरु (अल्पसंख्यक, ओबीसी, एससी) का संक्षिप्त रूप है। कर्नाटक के सामाजिक न्याय के संघर्ष से उपस्थित लोगों को अवगत कराते हुए, मुख्यमंत्री ने 2015 में कंथराज समिति सहित विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों का उल्लेख किया, जिन्होंने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि भाजपा ने रिपोर्ट को चार साल तक रोके रखा। सिद्धारमैया ने आगे कहा, "कर्नाटक सामाजिक न्याय की लड़ाई में अग्रणी रहा है: 1918 में मिलर समिति, 1921 में 75 प्रतिशत आरक्षण, हवानूर आयोग (1975) ने पिछड़े वर्ग के उत्थान की वैज्ञानिक नींव रखी, 1995 में ओबीसी राज्य अधिनियम, 2015 में कंथराज आयोग, जिसने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया। लेकिन भाजपा ने हर प्रगतिशील कदम को रोका या लटकाकर रखा। इसमें कंथराज रिपोर्ट को 4 साल तक रोके रखना भी शामिल है।"