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NDA को राज्यसभा में बड़ा लाभ, बिना मतदान के बढ़ा आंकड़ा; विपक्ष की चिंता बढ़ी

 नई दिल्ली राज्यसभा चुनाव के बाद केंद्र में सत्तारूढ़ NDA की सीटों का ग्राफ और बढ़ गया है। अब खबर है कि गठबंधन को भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम से भी समर्थन मिल गया है। हालांकि, सांसद के लालतलुआंगकिमा ने समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। हालांकि, उन्होंने इसे लिए कुछ शर्तें भी रखीं हैं। खास बात है कि दो तिहाई बहुमत के मामले में एनडीए जादुई आंकड़े के करीब बढ़ रहा है। समर्थन देने तैयार, पर शर्तें लागू लालतलुआंगकिमा ने कहा कि वह राज्य के विकास और लोगों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन का समर्थन करेंगे। लालतलुआंगकिमा सत्तारूढ़ जोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) के सदस्य हैं। जेडपीएम एक क्षेत्रीय दल है, जिसकी स्थापना 2017 में हुई थी। यह पार्टी न तो NDA और न ही विपक्षी INDIA गठबंधन के साथ है। लालतलुआंगकिमा ने कुल 36 मतों में से 26 वोट हासिल किए थे और विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) की जोथानसांगी ह्मार को हराया था। जोथानसांगी को उनकी पार्टी के विधायकों के सभी 10 वोट मिले। जेडपीएम नेता ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा कि वह और पार्टी के एकमात्र लोकसभा सदस्य रिचर्ड वानलालहमंगाइहा संसद में तटस्थ रहेंगे। लालतलुआंगकिमा ने कहा, 'हम संसद में तटस्थ सदस्य के रूप में रहेंगे। हालांकि, मुद्दों के आधार पर केंद्र सरकार को हमारा समर्थन मिलेगा।' भाजपा और कांग्रेस दोनों ही थे वोटिंग से दूर इस सीट पर हुए चुनाव में तीन विधायकों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जिनमें भाजपा विधायक के बेइचहुआ और के हराहमो के साथ-साथ कांग्रेस के एकमात्र विधायक सी न्गुनलिआनचुंगा भी शामिल हैं। राल्ते ने बताया कि विधायक डब्ल्यू छुआनावमा स्वास्थ्य कारणों से वोट नहीं डाल पाए। मिजोरम की 40 सदस्यीय विधानसभा में जेडपीएम के 27, एमएनएफ के 10, भाजपा के दो और कांग्रेस का एक विधायक है। अब कितनी हैं NDA की सीटें हाल ही में 27 सीटों पर हुए राज्यसभा चुनावों में एनडीए ने 19 सीटें अपने नाम की थीं। 245 सीटों वाले उच्च सदन में गठबंधन 152 पर पहुंच गया है। यहां बहुमत का आंकड़ा 164 है। वहीं, अब मिजोरम सांसद के समर्थन के बाद आंकड़ा 153 पर पहुंच गया है। इधर, तृणमूल कांग्रेस के 4 सांसद उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं। संभावनाएं जताई जा रही हैं कि भाजपा इन सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर सकती है। मॉनसून सत्र में हो सकती ही बड़ी उथल पुथल खास बात है कि अप्रैल में केंद्र सरकार परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल लेकर आई थी, जो पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण पास नहीं हो सका था। दरअसल, संविधान संशोधन से जुड़े विधेयकों को पास कराने के लिए दो तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में संभावनाएं जताई जा रही हैं कि अगर NDA जरूरी संख्या हासिल कर लेता है, तो बिल दोबारा पेश किया जा सकता है।

उद्धव ठाकरे की बढ़ी मुश्किलें, 20 विधायकों पर खतरा; आज करेंगे बड़ी बैठक

मुंबई  महाराष्ट्र विधानसभा का तीन सप्ताह का मानसून सत्र सोमवार 22 जून 2026 से शुरू होने जा रहा है. 10 जुलाई तक चलने वाला यह सत्र राजनीतिक उठापटक और मौसम संबंधी चुनौतियों के बीच काफी हंगामेदार रहने की संभावना है. एक ओर कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर सियासी माहौल गर्म है, वहीं दूसरी ओर अनियमित मानसून और किसानों की समस्याएं सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. महाराष्‍ट्र विधानसभा सत्र से पहले राज्य की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ चर्चा का केंद्र बना हुआ है. विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के कुछ लोकसभा सांसदों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है. शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने हाल ही में पार्टी के 60वें स्थापना दिवस पर कथित बागी नेताओं को बेशर्म और एहसान फरामोश बताते हुए तीखा हमला बोला था।  इस बार विधानसभा और विधानपरिषद दोनों सदनों में आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष नहीं होने की संभावना है. ऐसे में सत्ता पक्ष इस स्थिति का लाभ उठाकर अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा. वहीं, शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के जवाब में ‘ऑपरेशन वुल्फ’ शुरू करने की चेतावनी दी है, जिससे सदन में विपक्ष के आक्रामक रुख के संकेत मिल रहे हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन मानसून सत्र के पहले सप्ताह में विधानपरिषद के उपसभापति पद के लिए चुनाव कराने की तैयारी में है. शिवसेना नेता नीलम गोरहे के दोबारा विधान परिषद सदस्य चुने जाने के बाद उन्हें फिर से इस पद पर बैठाने की संभावना जताई जा रही है. सदन के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच राज्य के किसानों की समस्याएं भी प्रमुख मुद्दा रहेंगी. महाराष्ट्र में अनियमित और लंबे समय तक कमजोर मानसून ने कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी हैं. सरकार किसानों को जल्दबाजी में बुवाई न करने और मौसम विभाग की अगली सलाह का इंतजार करने की अपील कर चुकी है।  राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सत्र सामान्य विधायी कार्यवाही से ज्यादा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और दबदबा स्थापित करने की लड़ाई का मंच बनेगा. पूरक बजट मांगों की मंजूरी के साथ शुरू होने वाले इस सत्र में तीखी बहस, नारेबाजी, वॉकआउट और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकते हैं. महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह मानसून सत्र राज्य के राजनीतिक और आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।  'बेशर्मी से बिक गई तुम्हारी वफादारी', बागी सांसदों पर भड़के आदित्‍य ठाकरे शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों पर आदित्य ठाकरे ने तीखा हमला बोला है. आदित्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि दल बदलने वाले सांसदों ने यह साबित कर दिया है कि उनकी वफादारी और साख बेशर्मी से बिकाऊ है. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष राजनीतिक फायदे के लिए सरकारी संसाधनों और जनता के पैसे का इस्तेमाल कर रहा है. आदित्य ठाकरे ने कहा कि जो सांसद अब पाला बदल रहे हैं, वे महाविकास अघाड़ी (MVA) और INDIA गठबंधन के मंच पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. उनके लिए शिवसेना (यूबीटी), कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं ने प्रचार किया था और मतदाताओं ने उन्हें NDA के खिलाफ वोट दिया था. उन्होंने बागी सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा कि विचारधारा या गठबंधन बदलने की दलीलें अब नहीं चलेंगी, क्योंकि सच्चाई यह है कि लालच के कारण उन्होंने रातों-रात अपने वोटरों के जनादेश से विश्वासघात किया है।  शिवसेना-यूबीटी के बागी सांसद आज शाम 4 बजे थामेंगे शिंदे गुट का हाथ  महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक और बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है. सूत्रों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे गुट के बागी सांसद आज शाम 4 बजे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल हो सकते हैं. इस संभावित राजनीतिक घटनाक्रम को उद्धव गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से राज्य की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं और इसी बीच यह खबर सामने आई है. हालांकि, अभी तक संबंधित सांसद या दोनों गुटों की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. अगर यह शामिल होना होता है, तो महाराष्ट्र की सियासत में इसका असर और बढ़ सकता है।  शिवसेना-यूबीटी के सांसद बागी कैसे – मनोज झा RJD सांसद मनोज झा ने शिवसेना(UBT) के कई सांसदों के आज शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल होने की संभावना पर कहा, ‘उन्हें बागी कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने शिवसेना (UBT) के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था. जब शिवसेना UBT, TMC या किसी भी पार्टी में यह इंजीनियरिंग होती है, तो यह उनका संकट नहीं है, यह लोकतंत्र का संकट है. यह उद्धव ठाकरे के साथ धोखा नहीं है, यह उन मतदाताओं के साथ धोखा है, जिन्होंने विकल्प देखकर उन्हें चुना और वोट दिया. क्या आप उनके साथ अन्याय नहीं कर रहे हैं?’

अभिषेक बनर्जी का उदय और टीएमसी में डिजिटल राजनीति का बदलता चेहरा

  पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बीच का रिश्ता सिर्फ एक पारिवारिक बंधन नहीं बल्कि बंगाल की सत्ता और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भविष्य को तय करने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक समीकरण रहा है। वर्तमान में अभिषेक बनर्जी की स्थिति टीएमसी में ममता बनर्जी के बाद नंबर दो की है, जिसे चुनौती देने वाला फिलहाल पार्टी में कोई दूसरा चेहरा नहीं है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे अशांत और अस्तित्व के संकट वाले दौर से गुजर रही है। पार्टी में आंतरिक बगावत है। इससे पहले टीएमसी को सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा। अभिषेक बनर्जी इस पूरे चक्रव्यूह के केंद्र में आ गए हैं। समर्थकों के लिए वे पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव का चेहरा हैं तो आलोचकों के लिए वे बंगाल के सबसे बड़े नेपो किड हैं, जिन पर पार्टी की मौजूदा दुर्दशा का ठीकरा फोड़ा जा रहा है। कैसे हुआ अभिषेक का उदय? ममता बनर्जी के कई भतीजे और भांजे हैं, लेकिन पार्टी के पुराने रणनीतिकारों का मानना है कि ममता के भाई अमित और भाभी लता के बेटे अभिषेक का उनकी राजनीतिक दुनिया में हमेशा एक विशेष स्थान रहा। जब ममता बनर्जी वाम मोर्चा के खिलाफ सड़कों पर एक बेहद कठिन और हिंसक राजनीतिक लड़ाई लड़ रही थीं, तब परिवार के युवा सदस्यों में अभिषेक ही थे जो उनकी इस राजनीतिक यात्रा के साथ जुड़े रहे। पश्चिम बंगाल में 2011 में टीएमसी की जीत के बाद अभिषेक बनर्जी को युवा मंच की कमान सौंपी गई। वरिष्ठ नेताओं ने इसे मुख्य संगठन के समानांतर एक नया पावर सेंटर माना, जिससे पार्टी के भीतर पहली बार असहजता पैदा हुई। 2014 के लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर सीट से लोकसभा में उनकी एंट्री होती है। इसके बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। टीएमसी का बदला स्टाइल पारंपरिक बंगाली राजनेताओं के विपरीत अभिषेक बनर्जी ने राजनीति में एक प्रबंधन की नीति को पेश किया। कोलकाता और फिर बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले अभिषेक ने तकनीक, डिजिटल आउटरीच, सोशल मीडिया अभियान और डेटा-आधारित चुनावी रणनीति को पार्टी का मुख्य हथियार बनाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने बंगाल में बड़ी बढ़त हासिल की, तब अभिषेक के नेतृत्व में ही टीएमसी ने अपना सबसे बड़ा कायाकल्प किया। उन्होंने राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC को जिम्मेदारी सौंपी, जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। क्यों बने विलेन? भले ही कॉरपोरेट और रणनीतिक तरीके से चुनाव जीत लिए गए हों, लेकिन इसने पार्टी के भीतर के पुराने और जमीन से जुड़े नेताओं को नाराज कर दिया। वरिष्ठ नेताओं की शिकायत थी कि दशकों के जमीनी काम से बने उनके राजनीतिक अनुभव को कंप्यूटर प्रेजेंटेशन और कंसल्टेंट्स के सुझावों से रिप्लेस किया जा रहा है। अभिषेक बनर्जी आज टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, लेकिन अनौपचारिक रूप से वे सर्वशक्तिमान नंबर दो हैं। यही कारण है कि आज जब पार्टी में सांसदों और विधायकों की सामूहिक बगावत हो रही है, तो सारा ठीकरा उन्हीं के सिर फूट रहा है। विपक्ष और नाराज नेताओं का मानना है कि सारी शक्ति एक नेता और उसके आंतरिक घेरे के पास केंद्रित हो गई है, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का मोहभंग हुआ है। अभिषेक बनर्जी अपनी इस राजनीतिक विरासत और व्यक्तिगत उपलब्धि के बीच एक नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। सत्ता की निकटता और उसकी पूर्ण कमान हासिल करने के इस संघर्ष के बीच, वे अपनी ही पार्टी की इस अभूतपूर्व और अप्रत्याशित संकट की घड़ी में कई गुटों के लिए विलेन बनकर उभरे हैं, जिससे पार पाना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल, उद्धव ठाकरे गुट से 6 सांसदों के टूटने की तैयारी

महाराष्ट्र महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है. शिवसेना यूबीटी खेमे में आज फूट का औपचारिक ऐलान होने के संकेत मिल रहे हैं. जानकारी के मुताबिक, 6 बागी सांसदों के अलग होने की तैयारी पूरी हो चुकी है. कई दिनों की ज़बरदस्त अटकलों, आरोपों और तीखी टिप्पणियों के बाद, आज शिवसेना (उद्धव ठाकरे) खेमे में फूट की औपचारिक घोषणा होने की संभावना है. सूत्रों के मुताबिक, बागी सांसद रविवार को संयुक्त रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, जिसमें वे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ अपनी बैठक की तस्वीरें और वीडियो फुटेज जारी करेंगे. इसके साथ ही, स्पीकर को सौंपे गए पत्र की एक कॉपी भी पेश करेंगे. उम्मीद की जा रही है कि बागी सांसद उद्धव ठाकरे खेमे से अलग होने के पीछे की वजहों का भी जिक्र करेंगे. कब क्या हुआ? पूरी टाइमलाइन…. उद्धव ठाकरे खेमे में पाला बदलने की चर्चा तेज होने के बाद महाराष्ट्र के सियासी हलकों में नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला है. संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल अष्टिकर और संजय दीना पाटिल सहित 6 बागी सांसद पहले देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली पहुंचे, नोएडा के एक होटल में रुके और दिल्ली में एकनाथ शिंदे तथा उनके बेटे श्रीकांत के साथ मीटिंग में शामिल हुए. अगली सुबह, श्रीकांत और निंबालकर दोनों ने सुबह करीब 7 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की. सुबह करीब 10.20 बजे, बाकी पांच सांसदों ने स्पीकर से मुलाकात की और एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय कर रहे हैं और सदन में उनके बैठने की जगह बदलने की गुजारिश की. मीटिंग के बाद, सांसद चेन्नई, वाराणसी, पुणे और मुंबई सहित अलग-अलग जगहों के लिए रवाना हो गए. आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो सांसद चेन्नई से और दो कोलकाता से मुंबई पहुंचेंगे, जबकि एक सांसद पहले से ही मुंबई में है और दूसरा पुणे में है.

नीतीश कुमार का पुराना बयान वायरल, एनकाउंटर विवाद में सम्राट सरकार पर विपक्ष का तीखा हमला

पटना  बिहार के भोजपुर में हुए भरत तिवारी कथित एनकाउंटर मामले ने राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। इस मुठभेड़ के बाद उठ रहे गंभीर सवालों के बीच वर्तमान सम्राट सरकार विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों के निशाने पर है। विवाद इतना बढ़ चुका है कि सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं। इसी सियासी हलचल के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का करीब तीन साल पुराना एक बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा में है। लोग इस पुराने बयान के जरिए मौजूदा कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्रवाई की तुलना कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने एनकाउंटर पर क्या कहा था? 17 अप्रैल 2023 को नीतीश कुमार ने मीडिया से कहा था, 'अपराधियों का सफा माने मार दीजिए, यह कोई तरीका है? इसका मतलब जो जेल में जाएगा तो उसको मार दीजिए। ऐसा कोई नियम है? आप बताइए तो अरे तो कोर्ट ना फैसला करता है ? अगर, किसी को यह भी सजा होती है कि उसको फांसी होगी। फांसी हो जाती है। लेकिन, बाकी को साल तक (सजा) का होता है कितने तक का होता है? सजा या कोई जेल में हो तो इलाज के लिए ले जा रहा है या किसी काम के लिए ले जा रहा है और रास्ते में हो गया (एनकाउंटर) ये बहुत दुखद है।' नीतीश कुमार यहीं नहीं रूके। उन्होंने कहा, 'इसपर तो निश्चित रूप से लोगों को एक्शन करना चाहिए। क्या ठीक है? किसी को सजा होती है या किसी पर केस होता है, कोई जेल में है उस पर हमको नहीं कुछ करना है। हमारा यह है कि कोई भी जेल में रहेगा और कोई भी किस तरह से बाहर जाए और उसको ऐसे ही मार दें? ये तो बड़ा दुखद बात है ना?' अपराधियों का सफा माने मार दीजिए, यह कोई तरीका है? इसका मतलब जो जेल में जाएगा तो उसको मार दीजिए। भरत तिवारी कथित मुठभेड़ से मुश्किल में सम्राट सरकार भोजपुर में पुलिस कार्रवाई के दौरान मारे गए भरत तिवारी के मामले ने तूल पकड़ लिया है। घटना के सामने आए कुछ वीडियो साक्ष्यों के बाद पुलिस की थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसके चलते राज्य की सम्राट चौधरी सरकार बैकफुट पर है। सरकार ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल इंक्वायरी) के आदेश जारी कर दिए हैं, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। नीतीश कुमार के पुराने बयानों की दुहाई देकर अब विपक्ष सम्राट सरकार पर चौतरफा हमले कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस एनकाउंटर ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि जेडीयू और बीजेपी के बीच नीतिगत मतभेदों को भी हवा दे दी है। अब सभी की नजरें इस मामले में आने वाली न्यायिक जांच की रिपोर्ट पर टिकी हैं। भरत तिवारी कथित मुठभेड़ मामला क्या है?     बिहार के भोजपुर में पुलिस ने कथित एनकाउंटर किया।     पुलिस मुठभेड़ में आरोपी भरत तिवारी की मौत हो गई।     वायरल वीडियो में सरेंडर के बाद गोली मारते देखा गया।     मानवाधिकार उल्लंघन और फर्जी एनकाउंटर के गंभीर आरोप लगे।     चौतरफा सियासी दबाव के बाद न्यायिक जांच के आदेश दिए।  

उद्धव से ममता तक, क्यों बिखर रहे विपक्षी दल? भाजपा नेताओं ने बताई बड़ी वजह

नई दिल्ली भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों से लगातार बगावत का दौर जारी है। विपक्ष में कांग्रेस के बाद नंबर दो आने का दावा करने वाली तीन पार्टियों में एक के बाद एक टूट हुई है। पहले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद टूटकर भाजपा में शामिल हो गए। उसके बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई नजर आई। अब 2022 की टूट के बाद बाकी बची उद्धव ठाकरे की पार्टी में एक बार फिर से बागवत हुई है। पार्टी के 9 में से 6 सांसद शिंदे की तरफ जाने की कतार में हैं। विपक्षी पार्टियों ने इस बगावत का आरोप भारतीय जनता पार्टी के ऊपर लगाया है, तो भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसके लिए नेताओं के असंतोष को वजह बताया। हिन्दुस्तान से बात करते हुए भाजपा के वरिष्ठ सांसद ने इन पार्टियों में हुई टूट की वजह का भी जिक्र किया। नाम न देने की शर्त पर सांसद ने कहा कि इन पार्टियों के भीतर नेतृत्व की कमी साफ तौर पर नजर आ रही है। इसलिए सांसद और नेता भी साथ छोड़ते हुए नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, "विधायक या सांसद दल बदलने का फैसला कुछ कारणों से करते हैं। पहला यह कि उन्हें उस पार्टी में अपना राजनीतिक भविष्य नजर ना आ रहा हो। दूसरा, नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच में संबंध सही नहीं हों। तीसरा होता है कोई अन्य लाभ, जिसमें पैसे और अन्य चीजें शामिल होती हैं।" भाजपा नेता ने कहा कि उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी की पार्टी के नेता नेतृत्व को लेकर असंतुष्ट थे। इसलिए वह उनसे अलग हुए हैं। उन्होंने कहा, "शिवसेना में एक समय था कि बालासाहब ठाकरे यह सुनिश्चित करते थे कि पार्टी में नेताओं और कार्यकर्ताओं की पर्याप्त देखभाल हो। लेकिन अब उद्धव गुट में ऐसी कोई बात नहीं है। वहां नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच में अब कोई जुड़ाव नहीं रह गया। अभी भी जो लोग वफादारी की वजह से उद्धव के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें कई लोगों को यह लगता है कि पार्टी ने कांग्रेस के साथ समझौता करके हिंदुत्व की रक्षा वाली अपनी छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है।" बंगाल में नेताओं ने ममता बनर्जी की पार्टी नहीं छोड़ी, यह तख्तापलट: भाजपा नेता भाजपा के एक दूसरे नेता ने पश्चिम बंगाल की स्थिति पर बात करते हुए कहा कि यहां पर विधायकों ने ममता बनर्जी की पार्टी छोड़ा नहीं है बल्कि तख्ता पलट किया है। उन्होंने कहा, "यह सिर्फ एक या दो नेताओं का नाराज होकर पार्टी छोड़ना नहीं है। लगभग सभी विधायकों ने मिलकर तख्ता पलट जैसी स्थिति बनाकर रितब्रत बनर्जी को विधानसभा नेता प्रतिपक्ष बना दिया है। दूसरी तरफ 20 सांसद एनसीपीआई में शामिल हो गए हैं। इतने बड़े परिवर्तन के पीछे केवल एक ही वजह है कि इन लोगों को पार्टी नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा। ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस को एक जागीर की तरह चला रही थीं। इसमें चुनकर आए नेताओं की कोई आवाज नहीं थी। इसलिए जैसे ही सत्ता गई, लोग भी साथ छोड़ते गए।" विपक्षी पार्टियों की टूट से सत्ता पक्ष को फायदा बता दें, भारतीय जनता पार्टी की तरफ से भले ही इन पार्टियों को तोड़ने की बात से इनकार किया जा रहा हो। लेकिन विपक्ष इसके लिए केंद्रीय सत्ताधारी पार्टी को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया है कि सरकार संसद में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उनके सांसदों को तोड़ रही है, ताकि दो-तिहाई बहुमत हासिल करके महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक जैसे मुद्दों को निपटाया जा सके। आंकड़ों की बात करें, तो विपक्षी पार्टियों में होने वाली इस टूट का फायदा भारतीय जनता पार्टी और केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन एनडीए को मिलना तय है। क्योंकि अभी तक जिस भी पार्टी के नेता बगावत पर उतरे हैं उन्होंने केंद्र सरकार को समर्थन देने की बात कही है। इस समय पर एनडीए के पास लोकसभा के 293 सांसद हैं। अब इन बाकी सांसदों का साथ मलने के बाद यह संख्या 319 तक पहुंच जाएगी। इससे भाजपा कई मुद्दों को एक साथ निपटाने में भी कामयाब होगी।

विवाद के बीच शशि थरूर का पलटवार: “भारतीय नाविकों की सुरक्षा राजनीति नहीं हो सकती”

नई दिल्ली  कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक बयान ने एक बार फिर सियासी हलचल तेज कर दी है। जी-7 समिट में पीएम नरेंद्र मोदी के रुख की सराहना करने वाले उनके बयान को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला बोला है। उधर विवाद बढ़ने पर थरूर ने एक्स पर अपनी सफाई भी पेश की है। दरअसल, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने फ्रांस में जी-7 समिट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से उठाए गए मुद्दों पर अपनी बात कही है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दे को मजबूती से रखा है। थरूर के इस बयान के बाद देश में राजनीतिक बवाल मच गया। 'भारतीयों की जान राजनीति का मुद्दा नहीं' विवाद बढ़ने के बाद थरूर ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हो रही है कि भारतीय नागरिक नाविकों की सुरक्षा से जुड़े बयान को राजनीतिक विवाद बनाया जा रहा है। उन्होंने लिखा, 'तीन भारतीयों की जान चली गई। मेरी बात सिर्फ हमारे नागरिकों की सुरक्षा और इस सिद्धांत की थी कि नागरिक नाविकों को कभी भी सैन्य कार्रवाई का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर कुछ लोग इस चिंता पर ध्यान देने के बजाय राजनीतिक फायदा उठाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, तो यह मेरे बारे में नहीं बल्कि उनके बारे में ज्यादा बताता है।' उन्होंने यह भी कहा कि भारतीयों की जान की चिंता देश को जोड़ने वाली होनी चाहिए, बांटने वाली नहीं। बीजेपी का राहुल पर तंज बीजेपी ने शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए दावा किया कि वह अपनी ही पार्टी में समर्थन खो रहे हैं। बीजेपी के प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर की पीएम मोदी की तारीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारतीय नाविकों के मुद्दे पर मोदी के रुख को लेकर की गई टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा,' यह राहुल गांधी के रुख से बिल्कुल अलग है।' पूनावाला ने तंज कसते हुए कहा, 'यह शर्मनाक है। कल राहुल गांधी का जन्मदिन था, लेकिन उन्हें कोई तोहफा नहीं मिला।' उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। मतभेदों के बीच राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई इस विवाद के बीच शशि थरूर ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विश्वास जताया कि अब समय आ गया है जब देश में कांग्रेस के पक्ष में राजनीतिक माहौल बदलेगा और पार्टी आने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करेगी। इसे पार्टी के प्रति एकजुटता का संदेश देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। राहुल से मुलाकात, गुलदस्ता और किताब की भेंट शुक्रवार को शशि थरूर कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड पहुंचे, जहां उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए गुलदस्ता और एक किताब भेंट की। मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में थरूर ने राहुल गांधी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की और कहा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करेगी।  

शरद पवार से उद्धव ठाकरे तक: गठबंधन और बगावत की कहानी

 मुंबई महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय जो कुछ भी हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। राज्य के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पार्टियों में टूट, गठबंधनों का बदलना, पार्टी के चुनाव चिह्नों पर विरोधी दावे, रातों-रात बनने वाली सरकारें और एक साझा प्रतिद्वंद्वी को सत्ता से दूर रखने के लिए विरोधियों का हाथ मिलाना आम बात रही है। शिवसेना को अपनी चपेट में लेने वाला यह नया संकट एक ऐसी कहानी का अगला अध्याय है, जिसकी शुरुआत दशकों पहले 1960 के दशक के अंत में कांग्रेस के विभाजन और एक युवा विद्रोही के रूप में शरद पवार के उदय के साथ हुई थी। जैसे-जैसे शिवसेना के दोनों गुट पार्टी की स्थापना के 60 साल पूरे कर रहे हैं, बाल ठाकरे द्वारा बनाया गया यह संगठन आज बंटा हुआ नजर आता है। फिर भी, महाराष्ट्र को इस मुकाम तक लाने वाला रास्ता बहुत पहले ही तैयार हो चुका था। कांग्रेस का विभाजन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे निर्णायक क्षणों में से एक नवंबर 1969 में आया, जब कांग्रेस पार्टी ने एक ऐतिहासिक टूट का सामना किया। राष्ट्रपति चुनाव के बाद से यह संकट महीनों से पनप रहा था। इसका चरम तब हुआ जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित करने का असाधारण कदम उठाया। इस कदम ने कांग्रेस के भीतर सत्ता के दो केंद्रों के बीच खुले टकराव को जन्म दिया। तीन घंटे की बैठक के बाद, पार्टी अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा के नेतृत्व में वर्किंग कमेटी के 21 में से 11 सदस्यों ने एक नए नेता के चुनाव के लिए कांग्रेस संसदीय दल की तत्काल बैठक बुलाई। समिति में शामिल गांधी के समर्थक 10 सदस्यों ने इस बैठक का बहिष्कार किया। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों ने वर्किंग कमेटी के फैसले को अवैध और अमान्य बताते हुए खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि जब तक उन्हें सांसदों का बहुमत प्राप्त है, तब तक वह कांग्रेस की सदस्य और संसदीय दल की नेता बनी रहेंगी। संसद में 167 कांग्रेस सांसदों का एक समूह एक प्रतिद्वंद्वी पार्टी मुख्यालय में इकट्ठा हुआ और लोकतंत्र और समाजवाद की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा करते हुए इंदिरा गांधी के नेतृत्व को अपना समर्थन दिया। शरद पवार की पहली राजनीतिक बगावत 1969 के विभाजन के बाद, महाराष्ट्र के कई नेताओं ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) या रिक्विजिशनिस्ट का पक्ष लिया। इनमें यशवंतराव चव्हाण और उनके राजनीतिक शिष्य शरद पवार भी शामिल थे। हालांकि, महाराष्ट्र में गहरा विभाजन 1977 के आम चुनाव में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की हार के बाद उभरा। तब तक कांग्रेस एक बार फिर टूट चुकी थी। गांधी के गुट को कांग्रेस (आई) के नाम से जाना जाने लगा, जहां आई का अर्थ इंदिरा था, जबकि प्रतिद्वंद्वी गुट कांग्रेस यूनाइटेड के रूप में उभरा। पवार ने यशवंतराव चव्हाण के साथ कांग्रेस (यू) के साथ रहना चुना। दोनों कांग्रेस गुटों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, लेकिन बाद में जनता पार्टी को महाराष्ट्र में सत्ता से बाहर रखने के लिए हाथ मिला लिया। वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने और पवार एक मंत्री के रूप में सरकार में शामिल हुए। यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल पाई। उसी वर्ष, पवार कांग्रेस (यू) से अलग हो गए, जनता पार्टी के समर्थन से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) नामक एक गठबंधन बनाया और 38 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए। यह राज्य के इतिहास में राजनीतिक विद्रोह के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक था। उनका पहला कार्यकाल 1980 में समाप्त हुआ जब केंद्र में सत्ता में लौटीं इंदिरा गांधी ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। फिर भी पवार का कांग्रेस के साथ रिश्ता स्थायी रूप से शत्रुतापूर्ण होने के बजाय लचीला बना रहा। 1987 में वह पार्टी में लौट आए, बाद में यह स्पष्ट करते हुए कि वह शिवसेना के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते थे। शिवसेना का उदय एक ओर जहां कांग्रेस के गुट वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे, वहीं महाराष्ट्र में एक और ताकत उभर रही थी। 1966 में बाल केशव ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की, जिन्हें बालासाहेब ठाकरे के नाम से जाना जाता है। पेशे से कार्टूनिस्ट और समाज सुधारक केशव प्रबोधनकार ठाकरे के बेटे बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र की मराठी भाषी आबादी के हितों को लेकर इस पार्टी का निर्माण किया। समय के साथ, शिवसेना ने विशेष रूप से मुंबई में एक मजबूत जमीनी संगठन विकसित किया। इसके कार्यकर्ता अपने आक्रामक सड़क-स्तर के लामबंदी और पार्टी नेतृत्व के प्रति अटूट वफादारी के लिए जाने जाने लगे। पार्टी के उभार ने अंततः इसे भाजपा के साथ दीर्घकालिक गठबंधन में ला खड़ा किया। लगभग 25 वर्षों तक शिवसेना और भाजपा राजनीतिक भागीदार बने रहे। उस अवधि के अधिकांश समय में, शिवसेना को व्यापक रूप से महाराष्ट्र में सीनियर भागीदार के रूप में माना जाता था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, वह संतुलन 2014 के बाद बदलना शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी। पहली शिवसेना-भाजपा सरकार वर्ष 1995 एक और ऐतिहासिक क्षण लेकर आया। महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा गठबंधन सत्ता में आया। मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने, जबकि गोपीनाथ मुंडे ने उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। यह सरकार केवल औपचारिक गठबंधन पर ही नहीं, बल्कि निर्दलीय और बागी विधायकों के समर्थन पर भी निर्भर थी। अविभाजित शिवसेना ने अंततः तीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे दिए। फिर भी, किसी ने भी पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया। पवार का कांग्रेस से दूसरी बार नाता टूटना 1999 में, महाराष्ट्र ने एक और बड़ी राजनीतिक टूट देखी। शरद पवार सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हो गए और एक अलग राजनीतिक दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। विभाजन के बावजूद, राजनीति ने एक बार फिर अप्रत्याशित साझेदारियां पैदा कीं। शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सरकार बनाने से रोकने के लिए चुनाव के बाद कांग्रेस और पवार की नई पार्टी ने हाथ मिला लिया। विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने। 2004 से 2014 तक, पवार केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के भीतर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए और केंद्रीय मंत्री के … Read more

शिवसेना विवाद: उद्धव गुट के 6 सांसदों के बगावत की अटकलें, ‘ऑपरेशन टाइगर’ चर्चा में

मुंबई  महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) और एकनाथ शिंदे गुट के बीच एक बार फिर राजनीतिक तनाव और जुबानी जंग चरम पर पहुंच गया है। पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 के शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलों और 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चाओं के बीच, संजय राउत ने सोशल मीडिया पर बेहद तल्ख पोस्ट साझा किया है। एक्स पर एक पोस्ट में संजय राउत ने एक इन्फोग्राफिक साझा किया, जिसमें लिखा है, "कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं लेकिन वफादार नहीं होते।" उन्होंने पोस्ट को कैप्शन दिया "जय महाराष्ट्र!" दरअसल, संजय राउत की यह टिप्पणी एकनाथ शिंदे के उस बयान के बाद आई है जिसमें उन्होंने उद्धव खेमे पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, शेर अकेला आता है। शिंदे ने अपने गुट को बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी बताने की कोशिश की। शिंदे ने दिया था कुत्ते वाला बयान शिंदे ने उद्धव गुट पर कटाक्ष करते हुए कहा, "कुछ कुत्ते भौंकते रहते हैं। कल और परसों भी वे भौंकते रहेंगे। मैं आपको एक बात बताता हूं कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला आता है। जब शेर शिकार करता है तो कुत्ते भौंकते रहते हैं। जब शेर दहाड़ता है तो कुत्ते भौंकते रहते हैं। यही शिवसेना है। यही शिवसेना है। और आज यह शिवसेना महाराष्ट्र में मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही है।" छह सासंद नहीं हुए थे बैठक में शामिल बताते चलें कि यह दोनों गुटों में यह राजनीतिक बयानबाजी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के भीतर एक नए विभाजन की बढ़ती अटकलों की पृष्ठभूमि में हुआ है, जब पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण संसदीय दल की बैठक में भाग नहीं लिया, जिससे यह अफवाहें तेज हो गईं कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। यह ताजा संजय विवाद राउत द्वारा गुरुवार को की गई उस घोषणा के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि पार्टी ने अनुपस्थित छह सांसदों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। उन्होंने कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए गए हैं। संजय राउत ने पत्रकारों से कहा, "कार्रवाई करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हम उन्हें अयोग्य घोषित कराने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। यदि लोकसभा अध्यक्ष नियमों, कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं, तो ये लोग अयोग्य घोषित हो जाएंगे।" शिंदे गुट में 6 सांसद जाने के लिए तैयार 'ऑपरेशन टाइगर' को लेकर अटकलों को तब और बल मिला जब शिवसेना एमएलसी चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों ने शिंदे के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है और उनके गुट में शामिल होने के लिए तैयार हैं। इस संकट ने उद्धव ठाकरे खेमे को एक और बड़े विभाजन की संभावना का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है, लगभग चार साल बाद जब शिंदे के 2022 के विद्रोह के कारण महा विकास अघाड़ी सरकार का पतन हुआ और अंततः शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता मिली।

महाराष्ट्र राजनीति: उद्धव गुट में बगावत, 6 सांसद मीटिंग से गायब, नोटिस जारी

महाराष्ट्र महाराष्ट्र की राजनीति में उथल-पुथल का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना में बगावत के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को एक बड़ा बयान दिया। कोल्हापुर में आयोजित एक धन्यवाद रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने स्पष्ट किया कि अब कोई 'गुट' नहीं बचा है; बल्कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी ही असली और इकलौती शिवसेना है। अमित शाह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत उद्धव खेमे के कई सांसदों के बागी होने की खबरें हैं और पार्टी पूरी तरह टूटने की कगार पर खड़ी नजर आ रही है। 'पहले कहना पड़ता था शिंदे गुट…' कोल्हापुर की रैली में शाह ने कहा, "पहले हमें एकनाथ शिंदे के नाम पर 'शिवसेना शिंदे गुट' कहना पड़ता था। लेकिन अब कोई गुट नहीं बचा है। अब केवल एक ही शिवसेना है इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कोल्हापुर के प्रसिद्ध माता अंबाबाई मंदिर में पूजा-अर्चना भी की। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की ओर से कराए जा रहे माता अंबाबाई मंदिर परिसर और कॉरिडोर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण कार्य की आधारशिला रखी। शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन 'विकास भी, विरासत भी' का जिक्र करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है और राज्य के सभी ज्योतिर्लिंगों तथा शक्तिपीठों का पुनर्विकास किया जा रहा है, जो हम सभी के लिए गर्व की बात है। 'ऑपरेशन टाइगर' से उद्धव खेमे में खलबली शाह का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उद्धव खेमे में मचे मौजूदा घमासान से जुड़ा है। दरअसल, 'ऑपरेशन टाइगर' के बीच उद्धव गुट के कई सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की खबरें हैं। सांसदों के गायब होने और खुलेआम बगावती तेवर दिखाने के कारण पार्टी भारी संकट से गुजर रही है। मीटिंग से 6 सांसद गायब, दल-बदल कानून के तहत चेतावनी उद्धव गुट की यह कलह गुरुवार को नई दिल्ली में तब खुलकर सामने आ गई, जब पार्टी नेतृत्व की ओर से बुलाई गई अनिवार्य संसदीय दल की बैठक से ज्यादातर सांसद नदारद रहे। लोकसभा में शिवसेना (UBT) के कुल 9 सांसद हैं, लेकिन पार्टी व्हिप द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 3 सांसद- अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ही पहुंचे। बाकी के 6 सांसद- नागेश आष्टीकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे बैठक से पूरी तरह नदारद रहे। इस खुली बगावत के बाद शिवसेना (UBT) ने सख्त एक्शन लिया है। लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप अनिल देसाई ने गायब रहे सभी सांसदों को 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया है। 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम पार्टी की तरफ से बागी सांसदों को लिखित स्पष्टीकरण देने के लिए 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दिया गया है। नोटिस में साफ चेतावनी दी गई है कि अगर तय समय के भीतर उनका जवाब नहीं आता है, तो पार्टी यह मान लेगी कि उन्होंने स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ दी है। इसके बाद इन सांसदों के खिलाफ भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी 'दल-बदल विरोधी कानून' के तहत कार्रवाई की जाएगी।