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500 से ज्यादा ग्रामीणों के बैंक खाते बने साइबर ठगों का हथियार, 15 करोड़ का लेन-देन उजागर

पटना ग्रामीणों के नाम पर फर्जी बैंक खाते खुलवाकर साइबर ठगी करने के मामले में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि बीते तीन वर्षों के भीतर इन खातों में 15 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मंगाई गई। साइबर ठगों द्वारा रोजाना लाखों रुपये के अवैध लेन-देन के लिए 500 से अधिक ग्रामीणों के खातों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इस भारी-भरकम राशि के नेटवर्क का पर्दाफाश होने के बाद पुलिस ने अपनी तफ्तीश तेज कर दी है। मामले की जांच में जुटी साइबर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए गिरोह की महिला सदस्य, बाढ़ के सलेमपुर निवासी सीता कुमारी को गिरफ्तार किया था। आरोपित महिला संगठन जीविका से जुड़ी बताई जाती है। हालांकि, इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड नालंदा जिले का सरपंच संतोष मुखिया और उसका मुख्य साथी आजाद फरार है। अन्य राज्यों की पुलिस के पटना पहुंचने के बाद जब पीड़ितों ने शिकायत दर्ज कराई, तब इस 15 करोड़ के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। साइबर थाना प्रभारी संगीता कुमारी के मुताबिक, आरोपियों के ठिकाने से 12 मोबाइल फोन, 13 सिम कार्ड, एक बायोमीट्रिक डिवाइस, 2 पासबुक, दो एटीएम और एक चेकबुक बरामद की गई थी। पुलिस अब इन खातों में आए 15 करोड़ रुपये के ट्रांसफर ट्रेल और संदिग्ध बैंक मित्रों की भूमिका को खंगालने में जुटी है।

1965 का पटना विश्वविद्यालय: अनुशासन, बोटिंग क्लब और अशोक राजपथ की चाय में बसती थी छात्र जिंदगी

पटना  पटना विश्वविद्यालय को सिर्फ कक्षाओं, परीक्षाओं और डिग्रियों से समझना मुश्किल है। इसका असली संसार उन घंटों में भी बसता था, जो कक्षा में शिक्षक छात्र-छात्राओं को विषय के बारे में विस्तृत जानकारी देते थे। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए शिक्षकों द्वारा दी गई जानकारी ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। गंगा गंगा की ओर खुलती खिड़कियों से आती हवा, पुराने बरामदों में चलती बहसें, पुस्तकालय में देर तक खुली किताबों ने यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार दिया। विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी शायद उसके भवन नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी हजारों स्मृतियां हैं। पटना विवि के पूर्व छात्र और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. आलोक कुमार ने यादें साझा की। बताया कि यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों में अनुशासन के साथ शिक्षकों के प्रति सम्मान बहुत था। पढ़ाई के दौरान कोई भी विद्यार्थी कक्षा से बाहर इधर-उधर नहीं घूम सकता था। इसके लिए सख्त मनाही थी। विद्यार्थी पुस्तकालय में बैठ कर पुस्तकों का अध्ययन करते थे। पटना विश्वविद्यालय में एडमिशन होना बड़ी बात थी 1965 में यहां मेरा नामांकन हुआ था। ज्यादातर छात्र-छात्राएं गांव देहात के होते थे। जो पारिवारिक रूप से कमजोर होते थे लेकिन पढ़ाई के मामले में इनका कोई जोर नहीं होता था। पटना विश्वविद्यालय में नामांकन होना ही बड़ी बात होती थी। अच्छे अंकों के आधार और प्रतियोगिता लेकर नामांकन होता था। यहां स्नातक करने वाले बच्चों का सपना सिविल सर्विस में जाने का होता था। पढ़ाई के साथ विद्यार्थी सिविल सेवा की तैयारी साथ में करते थे। इसका परिणाम हुआ कि प्रतिवर्ष यहां के छात्र-छात्राएं सिविल सेवा के लिए चयनित होकर विश्वविद्यालय का नाम बढ़ाते रहे। वहीं जो सिविल सेवा में नहीं गए वे प्रोफेसर बनते थे। खेल के प्रति रहता था उत्साह पढ़ाई के साथ यहां पढ़ने वाले बच्चों में खेल के प्रति काफी लगाव रहता था। उन दिनों फुटबाल काफी लोकप्रिय खेलों में से एक होता था। वैसे तो कालेज परिसर में टेनिस, बैंडमिंटन का भी महत्व था। यहां पर बोटिंग क्लब हुआ करता था। विश्वविद्यालय परिसर से गंगा नजदीक होने के कारण बच्चे कुशल प्रशिक्षकों के निर्देशन में गंगा की लहरों पर बोटिंग का आनंद उठाते थे। वहीं बच्चों के बीच वाद-विवाद प्रतियोगिता होती थी। इसके लिए बच्चों में काफी उत्साह होता था। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बच्चे पूरी तैयारी करके आते थे। यहां पर वार्षिक खेलकूद काफी रोमांच और आनंद के साथ मनाया जाता था। इसके लिए काफी तैयारी होती थी। इस दौरान दानापुर से बिहार मिलिट्री का बैंड आता था। जीत के साथ बैंड धुन बजाता था। बच्चे भी अनुशासन के साथ कार्यक्रम का आनंद उठाते थे। वहीं एक वर्ष बाद प्रो. महेंद्र प्रसाद प्राचार्य बने। वे अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। जिस क्लास में शिक्षक देर से आते थे वे वहां जाकर पढ़ाने लगते थे। नोटिस बोर्ड पर सूचना दी जाती थी। कालेज का ऐसा माहौल था कि सभी शिक्षक और कर्मचारी समय से पहले आ जाते थे। पिंटू होटल का रसगुल्ला था लोकप्रिय उन दिनों पिंटू होटल में भोजन करना बड़ी बात होती थी। वहां का समोसा और रसगुल्ला काफी लोकप्रिय होता था। कालेज में पढ़ने वाले बच्चे अपना पैकेट मनी बचा कर यदा-कदा यहां समोसा और रसगुल्ला का आनंद उठाते थे। वहीं मनोरंजन के लिए उन दिनों शहर में छह सिनेमाघर हुआ करता था। रिजेंट, एलिफिस्टिन, पर्ल, वीणा, रुपक, अशोक आदि थे। कालेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं मनोरंजन के लिए सिनेमा का भी आनंद उठाते थे। ऐतिहासिक फिल्मों को देखने का आनंद कुछ और होता था। दशहरा में होता था सांस्कृतिक कार्यक्रम दशहरा के समय उन दिनों हर जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम की धूम रहती थी। गोविंद मित्रा रोड, लंगर टोली, हार्डिंग पार्क, पटना जंक्शन के सामने आदि स्थानों पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शानदार आयोजन होता था। देश के नामचीन कलाकारों में पंडित बिरजू महाराज, गिरिजा देवी, लच्छू महाराज आदि नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुति से लोगों को पूरी रात आनंदित करते थे। दशहरा पर तीन से चार दिनों तक लगातार कार्यक्रम होता था। पूरा शहर जागता था। उन दिनों सुरक्षा व्यवस्था के साथ लोगों में एक दूसरे के प्रति भाईचारे और प्रेम का वातावरण था। मेले घूमने के दौरान महिलाएं परिवार के साथ रात भर घूमते थे। कहीं कोई घटना नहीं होती थी। उन दिनों रिक्शा यातयात का प्रमुख साधन हुआ करता था। मेले में पांच एवं 10 रुपये घंटे के हिसाब से रिक्शे की बुकिंग होती थी। रिक्शा वाला पूरी रात लोगों को मेले का सैर कराता था। अशोक राजपथ पर रहती थी चहल-पहल पटना विश्वविद्यालय की कहानी अशोक राजपथ के बिना अधूरी है। विश्वविद्यालय से निकलते ही सड़क का संसार जैसे परिसर का विस्तार बन जाता था। किताबों की दुकानें, चाय की प्यालियां, दोस्तों की मंडलियां और आने-जाने वाले विद्यार्थियों की भीड़। मानो अशोक राजपथ खुद एक खुली पाठशाला होती थी।किसी दुकान पर परीक्षा की तैयारी पर चर्चा होती तो कहीं साहित्य की नई किताब पर बहस। चाय के छोटे से गिलास के साथ बड़ी-बड़ी योजनाएं बनतीं। किसी को प्रशासनिक सेवा में जाना था, किसी को साहित्य में पहचान बनानी थी तो कोई शोध की दुनिया में जाना चाहता था। इन सपनों का कोई औपचारिक पाठ्यक्रम नहीं था, लेकिन विश्वविद्यालय जीवन उन्हें दिशा देता था। गंगा भी इस पूरे संसार की मौन साक्षी थी। शाम ढलते ही कई विद्यार्थी नदी किनारे पहुंच जाते। दिनभर की भाग दौड़ के बाद वहां बैठना, बातचीत करना और भविष्य के बारे में सोचना विद्यार्थी जीवन का हिस्सा था। गंगा की धारा और विश्वविद्यालय की हलचल के बीच जैसे एक पूरा शहर अपनी युवा ऊर्जा के साथ सांस लेता था।  

IAS छोड़ने के बाद क्या करेंगी दिव्या मित्तल? 29 सितंबर सुबह 8:30 बजे करेंगी बड़ा खुलासा

लखनऊ उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की पूर्व जिलाधिकारी (DM) और चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने 30 अगस्त को प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया था। इसके 14 दिन बाद 14 सितंबर को उनका इस्तीफा स्वीाकर कर लिया गया। उन्होंने इसकी जानकारी एक्स हैंडल पर दी थी। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद सोशल मीडिया पर उनके भविष्य को लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं, इन दावों पर विराम लगाते हुए दिव्या मित्तल ने अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट शेयर की है। जिसमें उन्होंने संकेत दिया है कि वह 29 सितंबर को सुबह अपने भविष्य के प्लान का एलान करने वाली हैं। सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे कयासों का किया जिक्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए पोस्ट में पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने अपनी पोस्ट में उन तमाम अटकलों और कयासों का जिक्र किया, जिसको लेकर उनके इस्तीफे के बाद से कयास लगाए जा रहे थे। उन्होंने लिखा, "आगे क्या करना है? मैंने पढ़ा: बच्चे छोटे हैं। अब घर। अच्छा पैकेज मिलेगा। वापस विदेश। IAS पर किताब लिखी है। कोचिंग। टिकट पक्का हो गया होगा। राजनीति। 29 सितंबर, सुबह 8:30 बजे बताऊंगी।" दिव्या मित्तल के इस पोस्ट के बाद उनके अगले कदम को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गई है और लोग उन्हें आगे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दे रहे हैं। कुछ लोगों ने लिखा है कि हमें इंतजार है। ऐसे में अब सभी 29 सितंबर को सुबह 8:30 बजे का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जब दिव्या मित्तल स्वयं अपने अगले कदम का खुलासा करेंगी। कौन हैं पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल? गौरतलब है कि पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल का जन्म हरियाणा राज्य के रेवाड़ी जिले में हुआ है। दिव्या मित्तल ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए की पढ़ाई की है। शादी के बाद वह अपने पति गगनदीप के साथ लाखों के पैकेज पर लंदन चली गईं। कुछ समय बाद वह लंदन की नौकरी छोड़ वापस अपने देश भारत लौट आईं। यहां आकर वह यूपीएससी की तैयारी में जुट गई। इसके बाद साल 012 में दिव्या मित्तल यूपीएससी ने क्रैक किया। उनका सेलेक्शन आईपीएस के लिए हुआ, लेकिन वह आईएएस बनना चाहती थी। दूसरे प्रयास में 2013 में आईएएस बन गईं। दिव्या मित्तल अपने कार्यकाल के दौरान मिर्जापुर, बस्ती, देवरिया जिले में डीएम रहीं। इसके अलावा उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर जिम्मेदारी संभाली।  

बेल्जियम से यूपी पहुंचा 200 टन का विशाल वेसल, 308 पहियों वाले ट्रक ने मचाई हलचल

लखनऊ  Balrampur News बेल्जियम देश से समुद्र के रास्ते भारत पहुंचे विशालकाय वेसल की देश भर में चर्चा है। हर किसी को इसके बारे में जानने की इच्छा है। लगभग 200 टन वजनी इस वेसल को 308 पहियों वाला ट्रक लेकर यूपी के बलरामपुर की तरफ बढ़ रहा है।  ये ट्रक जिस भी शहर से गुजर रहा है वहां इसे देखने वालों का हुजूम उमड़ रहा है। कोई सेल्फी ले रहा तो कोई वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहा है। आइए यहां जानते हैं कि इस ट्रक और इसपर लदे इस विशालकाय वेसल के बारे में पूरी डिटेल। कैसे भारत पहुंचा वेसल जानकारी के अनुसार, ये वेसल ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर उतरा और फिर इसे 308 पहियों वाले विशालकाय ट्रेलर पर क्रेन की मदद से रखा गया। इसके बाद ये ट्रक झारखंड और बिहार के रास्ते उत्तर प्रदेश पहुंचा। अब तक किन शहरों से होकर गुजरा वायरल ट्रक ओडिशा से शुरू हुई इस ट्रक की यात्रा झारखंड और बिहार से होते हुए उत्तर प्रदेश पहुंची है। सफर के दौरान ये ट्रक झारखंड की राजधानी रांची के पास नगड़ी टोल प्लाजा और पिस्का रेलवे क्रॉसिंग से होते हुए गुजरा। इसके बाद इस ट्रक ने बिहार में प्रवेश किया जहां ये औरंगाबाद, रोहतास और कैमूर के रास्ते आगे बढ़ा। आखिर में ये ट्रक अब यूपी में प्रवेश कर चुका है। जहां ये चंदौली और वाराणसी के रास्ते अपने गंतव्य बलरामपुर चीनी मिल की और बढ़ रहा है। रोजाना केवल 10 से 12 किलोमीटर की दूरी हो रही तय इस वेसल के भारी वजन को सड़क पर संतुलित करने के लिए ट्रक में 308 पहिये लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि अत्यधिक वजन के कारण यह महाट्रक रोजाना केवल 10 से 12 किलोमीटर की ही दूरी तय कर पा रहा है। इस ट्रक ने अभी तक के सफर में लगभग 2 करोड़ रुपए का डीजल इस्तेमाल किया है। किस काम आएगा ये 200 टन का वेसल बेल्जियम से आया ये 200 टन का बाहूबली वेसल बलरामपुर चीनी मिल से जुड़े एथनॉल प्लांट के लिए ले जाया जा रहा है। इस वेसल में वैक्यूम बॉयलर जैसे इंटस्ट्रियल बॉयलर उपकरण हैं। 308 पहियों वाले ट्रक के लिए बनाना पड़ा स्पेशल रूट इसका बड़ा आकार होने के कारण आम सड़कों से निकालने के लिए स्पेशल रूट बनाने की जरूरत पड़ी। कई शहरों में कई मार्गों को बंद करना पड़ा तो कहीं बिजली के खंभे और तारों को हटाना भी पड़ा। कैमूर में इसे निकालने के लिए पुल तोड़ने की भी जरूर पड़ी। इस ट्रक के साथ पुलिस प्रशासन की टीम भी लगातार चल रही है। बता दें कि ये ट्रक अब वाराणसी से होते हुए गाजीपुर की तरफ बढ़ रहा है और जल्दी ही बलरामपुर पहुंचाया जाएगा।  

महतारी वंदन योजना से लक्ष्मी मांझी की जिंदगी में आया बदलाव, सिलाई मशीन ने खोली आत्मनिर्भरता की राह

रायपुर महतारी वंदन योजना महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में नई राह खोल रही है। योजना के तहत मिलने वाली नियमित आर्थिक सहायता से महिलाएं अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ स्वरोजगार की दिशा में भी कदम बढ़ा रही हैं। गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के गौरेला विकासखंड के ग्राम पंचायत गोरखपुर के आवास मोहल्ला निवासी लक्ष्मी मांझी की कहानी भी इसी बदलाव की एक प्रेरक मिसाल है। लक्ष्मी मांझी बताती हैं कि महतारी वंदन योजना के तहत उन्हें लगातार आर्थिक सहायता मिल रही है। योजना की 31वीं किस्त की राशि भी उनके बैंक खाते में प्राप्त हुई है। इस आर्थिक सहायता ने उनके लिए न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करना आसान बनाया, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर भी दिया। सिलाई मशीन खरीदकर शुरू किया स्वरोजगार लक्ष्मी मांझी ने महतारी वंदन योजना से प्राप्त राशि को बचाकर सिलाई मशीन खरीदने का निर्णय लिया। सिलाई मशीन मिलने के बाद उन्होंने घर से ही सिलाई का काम शुरू कर दिया। अब वे आसपास की महिलाओं और परिवार के लोगों के कपड़े सिलकर अपनी आय अर्जित कर रही हैं। पहले जहां अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भरता रहती थी, वहीं अब सिलाई के काम से होने वाली आमदनी के माध्यम से लक्ष्मी मांझी परिवार की आर्थिक व्यवस्था में स्वयं योगदान दे रही हैं। घर से ही काम करने की सुविधा के कारण वे घरेलू जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए स्वरोजगार भी कर पा रही हैं। बच्चों की पढ़ाई में भी कर रहीं सहयोग लक्ष्मी मांझी बताती हैं कि सिलाई से होने वाली आय और महतारी वंदन योजना से मिलने वाली सहायता राशि का उपयोग वे परिवार की आवश्यकताओं के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में भी कर रही हैं। बच्चों की शैक्षणिक जरूरतों को पूरा करने में सहयोग कर पाना उनके लिए संतोष और आत्मविश्वास का विषय है। वे कहती हैं कि नियमित आर्थिक सहायता मिलने से परिवार की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करने में सहूलियत हुई है। इसी सहायता को बचाकर उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और आज यही मशीन उनके लिए अतिरिक्त आय का जरिया बन गई है। इससे उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ा है और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक नई शुरुआत हुई है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से घरेलू जीवन भी हुआ आसान लक्ष्मी मांझी को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन का लाभ भी प्राप्त हुआ है। इससे खाना बनाने के लिए स्वच्छ ईंधन की सुविधा मिली है और घरेलू कार्य पहले की तुलना में अधिक आसान हुए हैं। महतारी वंदन योजना और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना सहित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने से उनके परिवार के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। सरकारी योजनाओं का लाभ बन रहा आत्मनिर्भरता का आधार लक्ष्मी मांझी का कहना है कि सरकार की योजनाओं का लाभ जब जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचता है, तो उसका असर केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों को आगे बढ़ने और अपने लिए नए अवसर तैयार करने का रास्ता भी मिलता है। महतारी वंदन योजना से प्राप्त राशि का उपयोग उन्होंने अपनी जरूरतों के साथ-साथ स्वरोजगार शुरू करने में किया, जिससे अब वे स्वयं आय अर्जित कर रही हैं। लक्ष्मी मांझी ने महतारी वंदन योजना सहित शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने पर प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जी एवं मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय जी के प्रति आभार व्यक्त किया है। उनका कहना है कि सरकार की योजनाओं से मिली सहायता ने उनके परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया है। लक्ष्मी मांझी की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि यदि आर्थिक सहायता का सही उपयोग किया जाए तो सरकारी योजनाएं परिवार की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता का आधार भी बन सकती हैं।

अयोध्या-बस्ती में आपदा प्रभावित परिवारों तक पहुंची सरकारी मदद, प्रभारी मंत्री ने सौंपे चेक

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में भारी बारिश और प्राकृतिक आपदा के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रभावित परिवारों तक तत्काल राहत पहुंचाने की संवेदनशीलता और तत्परता दिखाई है। अयोध्या और बस्ती में तेज आंधी-पानी से प्रभावित परिवारों के बीच जनपद के प्रभारी मंत्री एवं कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही पहुंचे और पीड़ित परिजनों को ढांढस बंधाया। उन्होंने सीएम योगी के निर्देश पर प्रभावित परिवारों को दैवीय आपदा राहत कोष से घटना के 24 घंटे के अंदर चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता के चेक सौंपे। अयोध्या में अतिवृष्टि और आंधी-तूफान के कारण चार लोगों की असामयिक मृत्यु हुई। इनमें सोहावल तहसील के शिवदासपुर, शुक्ला का पुरवा निवासी 18 वर्षीय आकाश वर्मा, मिल्कीपुर तहसील निवासी 12 वर्षीय आर्यन, रुदौली तहसील निवासी 76 वर्षीय रामस्वरूप और 40 वर्षीय धर्मराज शामिल हैं। इन सभी की मृत्यु पेड़ गिरने के कारण हुई। प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने अयोध्या सर्किट हाउस में आकाश वर्मा, रामस्वरूप और धर्मराज के परिजनों को चार-चार लाख रुपये के चेक सौंपे। वहीं बस्ती में भी आपदा प्रभावित दो परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता दी गई। बस्ती में भी पीड़ित परिवारों को मिली राहत बस्ती सदर तहसील के चौबाह गांव निवासी मोतीराम की आंधी में छप्पर गिरने से मृत्यु हुई थी, उनकी पत्नी कैलाशा देवी को चार लाख रुपये की सहायता दी गई। वहीं महुली पश्चिम के ग्राम बलुआ निवासी प्रशांत की सर्पदंश से मृत्यु के बाद उनकी माता मीरा देवी को भी चार लाख रुपये का चेक सौंपा गया। हर नागरिक के सुख-दुःख में अभिभावक की तरह खड़ी है सरकार कृषि मंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा, सेवा और सहायता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री योगी के स्पष्ट निर्देश हैं कि दैवीय या प्राकृतिक आपदा की स्थिति में प्रभावित परिवारों को अविलंब राहत, चिकित्सीय सुविधा और आर्थिक संबल उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने जिला प्रशासन को सभी प्रभावितों को हरसंभव सहायता तत्काल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

सेवा की कहानी: अमृत सरोवर बना महिलाओं की आजीविका का आधार, मछली पालन से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े कदम

रायपुर  गांव में बना अमृत सरोवर अब जल संरक्षण के साथ ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का जरिया भी बन रहा है। सरगुजा जिले के बतौली विकासखंड की ग्राम पंचायत बिरीमकेला के ज्योति स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने अमृत सरोवर में मछली पालन शुरू कर आय की नई राह बनाई है। पहले किसी आयमूलक गतिविधि से नहीं जुड़ी इन महिलाओं को सरोवर के रूप में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधन मिला तो उन्होंने सामूहिक प्रयास से इसे अपनी आजीविका का माध्यम बना लिया। पहली बार मछलियों की बिक्री से हुई आमदनी ने समूह का हौसला बढ़ाया है और अब महिलाओं ने दोबारा मछली पालन शुरू कर दिया है। पहली बिक्री से मिली आमदनी ने बढ़ाया महिलाओं का हौसला ज्योति स्व-सहायता समूह की सदस्य रजनी चौहान बताती हैं कि अमृत सरोवर मिलने के बाद समूह ने पहली बार मछली पालन की गतिविधि शुरू की। तैयार हुई मछलियों में से लगभग 15 किलो मछली की बिक्री की गई, जिससे समूह को पहली बार इस गतिविधि से आमदनी हुई। मछली पालन से मिली इस शुरुआती सफलता ने समूह की महिलाओं को इसे आगे भी जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। अब महिलाएं इस गतिविधि को नियमित आजीविका के साधन के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। दोबारा शुरू किया मछली पालन, नियमित आजीविका बनाने की तैयारी रजनी बताती हैं कि समूह ने एक बार फिर अमृत सरोवर में मछलियां डाली हैं। इस बार 10 पैकेट डाले गए हैं। समूह की महिलाएं मिलकर मछली पालन का काम कर रही हैं और आने वाले समय में इससे अपनी आमदनी को और बढ़ाना चाहती हैं। अमृत सरोवर से जुड़ने से पहले समूह के पास ऐसी कोई आयमूलक गतिविधि नहीं थी। अब स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जल संसाधन का उपयोग करते हुए महिलाएं सामूहिक रूप से मछली पालन कर रही हैं। इससे उन्हें गांव में ही काम और आय का अवसर मिला है। “आजीविका बढ़ाएंगे और अपने पैरों पर खड़े होंगे” रजनी चौहान ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “पहले हम लोग समूह में कुछ नहीं करते थे। अब अमृत सरोवर मिला है, जिसमें मछली पालन कर रहे हैं और हमारी आजीविका बढ़ रही है। आगे भी हम लोग आजीविका बढ़ाएंगे और अपने पैरों पर खड़े होंगे।” उन्होंने समूह की ओर से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। जल संरक्षण के साथ आजीविका का भी बना माध्यम सेवा संकल्प अभियान के तहत ज्योति स्व-सहायता समूह की यह ‘सेवा की कहानी’ बताती है कि गांव में तैयार जल संरचनाओं को आजीविका गतिविधियों से जोड़कर ग्रामीण महिलाओं के लिए आय के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं। अमृत सरोवर में मछली पालन से रजनी और उनकी साथी महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है। अब उनका प्रयास इस गतिविधि को आगे बढ़ाकर अपनी आमदनी मजबूत करने और अपने पैरों पर खड़े होने का है।

अधिकारियों को युद्धस्तर पर काम कर जल्द से जल्द विद्युत आपूर्ति सामान्य करने के निर्देश

लखनऊ प्रदेश में लगातार हो रही बारिश से प्रभावित विद्युत आपूर्ति को जल्द सामान्य करने के लिए योगी सरकार ने निगरानी और राहत कार्य तेज कर दिए हैं।  प्रमुख सचिव ऊर्जा एवं यूपी पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष रणवीर प्रसाद ने अधिकारियों को युद्धस्तर पर काम कर जल्द से जल्द विद्युत आपूर्ति सामान्य करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं की शिकायतों का फीडरवार निस्तारण सुनिश्चित किया जाए और 1912 पर आने वाली प्रत्येक सूचना को गंभीरता से लिया जाए। प्रमुख सचिव ने निर्देश दिया कि उपभोक्ताओं को यह भी बताया जाए कि उनकी विद्युत आपूर्ति कब तक बहाल होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अस्पताल, पेयजल सहित आवश्यक सेवाओं की बिजली आपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर बहाल की जाए। बारिश और पेड़ों के गिरने से 33 और 11 केवी फीडरों में बड़े पैमाने पर ब्रेकडाउन हुआ है। कई स्थानों पर बिजली के पोल भी टूटे हैं। इन्हें बदलने के साथ ही क्षतिग्रस्त लाइनों की मरम्मत का काम दिन-रात जारी है। दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में भी टीमें लगातार कार्य कर रही हैं। शहरी क्षेत्रों में आपूर्ति लगभग सामान्य डिस्कॉम अधिकारियों ने बताया कि लखनऊ सहित प्रदेश के अधिकांश शहरी क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति लगभग सामान्य कर दी गई है। मध्यांचल में बरेली मंडल को छोड़कर शहरी क्षेत्रों में आपूर्ति सामान्य है। 33 केवी के छह सबस्टेशन बंद हैं, जिन्हें शाम तक चालू करने का लक्ष्य है। पूर्वांचल में बस्ती और संतकबीरनगर को छोड़कर अधिकांश शहरी क्षेत्रों में आपूर्ति सामान्य है। पश्चिमांचल में अमरोहा, बिजनौर, संभल और मुरादाबाद के ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़कर आपूर्ति सामान्य है। दक्षिणांचल में इटावा, कन्नौज, औरैया और फर्रुखाबाद को छोड़कर अन्य शहरों में बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई है। केस्को क्षेत्र में 33 केवी का कोई ब्रेकडाउन नहीं है। सब जगह आपूर्ति नॉर्मल कर दी गई है।  24 घंटे सक्रिय कंट्रोल रूम, मैनपावर की कमी ना हो अधिक प्रभावित जिलों में अंबेडकरनगर, भदोही, आजमगढ़, बलिया, बहराइच, बस्ती, बरेली, गोंडा, देवरिया, लखीमपुर, मऊ, सिद्धार्थनगर, कानपुर देहात, हमीरपुर, शाहजहांपुर, आगरा, फिरोजाबाद, कानपुर नगर, बुलंदशहर, गोरखपुर और वाराणसी ग्रामीण शामिल हैं। लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। मुख्यालयों से अधिकारियों को जिलों में भेजा गया है। आरडीएसएस और बिजनेस प्लान के कार्यों में लगी कार्यदायी संस्थाओं को भी अनुरक्षण कार्य में लगाया गया है।  शक्तिभवन और डिस्कॉम के कंट्रोल रूम 24 घंटे सक्रिय यूपीपीसीएल अध्यक्ष ने कहा कि विद्युत आपूर्ति बहाली के कार्य में मैनपावर की कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। जिला और फीडरवार लगातार मॉनिटरिंग करते हुए कार्य कराया जाए और एक भी फीडर छूटने न पाए। अस्पताल, पेयजल सहित अन्य आवश्यक सेवाओं की विद्युत आपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर बहाल की जाए। उन्होंने कहा कि सामग्री की पर्याप्त उपलब्धता है। शक्ति भवन और सभी डिस्कॉम के कंट्रोल रूम 24 घंटे सक्रिय हैं। डिस्कॉम के प्रबंध निदेशकों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपने-अपने क्षेत्रों में आई समस्याओं और चल रहे अनुरक्षण कार्यों की विस्तृत जानकारी दी। यूपीपीसीएल के प्रबंध निदेशक नितेश कुमार ने भी अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

बीजों की कोठरी में सहेजी है पीढ़ियों की खुशहाली, मझगवां के आदिवासी परिवारों ने बचाकर रखी देसी अनाज की विरासत

भोपाल खुशियों की दास्तां शहडोल जिले के मझगवां गांव के सलैया टोला में रहने वाले आदिवासी परिवारों के लिए अनाज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की पहचान, परंपरा और खुशियों का आधार है। घर की कोठरियों में सहेजे गए छोटे-छोटे बीज उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं। इन्हीं बीजों से खेतों में फसल लहलहाती है, घर में अनाज आता है और पूरे परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं। आज जब खेती में आधुनिक और हाइब्रिड किस्मों का चलन बढ़ रहा है, वहीं मझगवां के बैगा एवं भूमिया समाज के किसान अपनी पुरानी देसी किस्मों को आज भी संजोए हुए हैं। झोलार, बांसपोर, ठर्री, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी पारंपरिक धान की किस्में यहां के खेतों में आज भी दिखाई देती हैं। इसी तरह लेदरी कोदो, बासिन कोदो, कोदैली कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी, छोटाही कुटकी, भदैली कुटकी, कागुन, समा और मिलो जैसे श्री अन्न भी यहां की खेती और भोजन का हिस्सा हैं। भोल्ली सिंह के लिए बीज ही असली पूंजी मझगवां के किसान भोल्ली सिंह ने अपने खेतों में कई पारंपरिक फसलों को बचाकर रखा है। उनके खेत में झोलार धान, बांसपोर, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी देसी धान की किस्में हैं। साथ ही कोदो, मक्का, मिलो, कागुन, कुटकी, लेदरी कोदो और बासिन कोदो भी उगाए जाते हैं। भोल्ली सिंह के लिए इन फसलों की खुशी सिर्फ अच्छी पैदावार तक सीमित नहीं है। जब खेत से अनाज घर आता है और परिवार के भोजन में शामिल होता है, तो उन्हें अपनी मेहनत सफल होने का एहसास होता है। वे बताते हैं कि मोटा अनाज उनके रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है। उनका कहना है कि 60 वर्ष से अधिक उम्र में भी वे 20 से 25 किलोमीटर तक साइकिल चला लेते हैं और पारंपरिक भोजन को अपनी तंदुरुस्ती से जोड़कर देखते हैं। बिरमतिया बैगा के लिए देसी बीज, अपनी पहचान और अपनी परंपरा मझगवां के सलैया टोला की बिरमतिया बैगा ने भी अपने खेतों में पारंपरिक अनाज और धान की कई किस्मों को सुरक्षित रखा है। उनके खेत में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी फसलें उगाई जाती हैं। अलग-अलग मौसम में इन फसलों की खेती करना और उनसे प्राप्त अनाज को सुरक्षित रखना उनके परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। बिरमतिया बैगा के लिए खेत में उगने वाला हर अनाज केवल फसल नहीं है। उसके साथ उनके परिवार की यादें, पुरखों की खेती की पद्धति और वर्षों से चली आ रही खाद्य परंपरा जुड़ी हुई है। वे पुराने बीजों को संभालकर रखती हैं, ताकि अगली फसल के समय इन्हीं बीजों से फिर खेती की जा सके। इस तरह एक मौसम की फसल अगले मौसम के लिए बीज बन जाती है और पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आगे बढ़ती रहती है। वे बताती हैं कि घर में सुरक्षित रखा अनाज परिवार के भोजन में उपयोग होता है। खेत से निकला अपना धान और मोटा अनाज जब घर की रसोई तक पहुंचता है तो उसमें मेहनत के साथ अपनेपन का एहसास भी जुड़ा होता है। समा, कुटकी, सिकिया और काकुन जैसे अनाज उनके भोजन का हिस्सा हैं, वहीं सरैय्या और ठर्री जैसे पारंपरिक धान की किस्में उनकी खेती की विविधता को बनाए रखती हैं। बिरमतिया के लिए पुराने बीजों को बचाकर रखना अपनी परंपरा को बचाकर रखने जैसा है। उनका मानना है कि इन बीजों की पहचान गांव के खेतों और परिवारों से जुड़ी है। इसलिए उन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि आने वाले समय में भी इन पारंपरिक फसलों की खेती होती रहे और नई पीढ़ी इन अनाजों के बारे में जान सके। उनके घर में रखे बीजों की यह छोटी-सी दुनिया इस बात की गवाही देती है कि मझगवां के आदिवासी परिवारों ने आधुनिक खेती के दौर में भी अपनी पारंपरिक फसलों के लिए जगह बनाए रखी है। बिरमतिया के लिए इन बीजों की सबसे बड़ी खुशी यही है कि वे आज भी खेत में बोए जाते हैं, फसल बनकर घर आते हैं और परिवार के भोजन का हिस्सा बनते हैं। धनवतिया बैगा ने संभाल रखी है बीजों की विरासत धनवतिया बैगा भी देसी अनाज की खेती और बीज संरक्षण से जुड़ी हैं। उनके खेत में झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो, कुटकी, कागुन, भदैला कुटकी और सऊटहा कुटकी जैसी फसलें हैं। जब उनसे इन फसलों के बीजों के बारे में पूछा जाता है तो उनका सहज जवाब होता है कि बीज मिल जाएंगे और जो यहां न मिलें, वे आसपास के पहाड़ी गांवों में मिल जाएंगे। यह जवाब बताता है कि यहां बीजों का संरक्षण केवल एक परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि गांव और आसपास के समुदाय की साझा परंपरा है। सालभर का अनाज, सालभर की निश्चिंतता इन परिवारों की खुशियों का एक बड़ा कारण उनकी खाद्य आत्मनिर्भरता भी है। वे खेतों में उगाए गए अलग-अलग अनाज को घर में सुरक्षित रखते हैं और सालभर उसका उपयोग करते हैं। धान की देसी किस्म हो या कोदो-कुटकी, कागुन या समा—इनका उपयोग परिवार के भोजन में होता है। फसल घर आने के बाद कोठरी में अनाज का सुरक्षित होना इन परिवारों के लिए आने वाले दिनों की निश्चिंतता भी है। मेहनत से उगाया अपना अनाज, अपने घर का भोजन और अपने ही सुरक्षित किए बीज—यही उनकी खुशहाल जिंदगी की सरल कहानी है। पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ा रहे किसान कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति के अनुसार मझगवां क्षेत्र के बैगा और भूमिया समाज के किसान प्राचीन काल से मोटे अनाज और पारंपरिक फसलों की खेती करते आ रहे हैं। इन किसानों ने कई पुरानी किस्मों के बीजों को आज भी सुरक्षित रखा है। मझगवां के किसानों की यह पहल केवल खेती नहीं, बल्कि पारंपरिक कृषि ज्ञान और जैव विविधता को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। उनके घरों की कोठरियों में रखे ये बीज आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक ऐसी विरासत हैं, जिसे उन्होंने मेहनत, विश्वास और अपनी परंपरा से संभालकर रखा है।  

ट्रेड शो में बागपत के घेवर का स्वाद चख बोले लोग, सावन के बाद भी खूब भा रहा*

ग्रेटर नोएडा इंडिया एक्सपो मार्ट में चल रहे यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में बागपत का घेवर लोगों को रुकने और स्वाद चखने के लिए मजबूर कर रहा है। वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन के पवेलियन में बागपत के स्टाल पर पहुंच रहे लोग पहले घेवर को बनते देख रहे हैं और फिर उसका स्वाद ले रहे हैं। दिल्ली, गुरुग्राम और गाजियाबाद से आए लोगों ने घेवर की कुरकुराहट और खोये की परत को पसंद किया। कई लोगों के लिए यह भी आकर्षण का विषय रहा कि आमतौर पर सावन की मिठाई माने जाने वाला घेवर यहां सितंबर में भी ताजा तैयार होकर बिक रहा है। बागपत के अमीनगर सराय निवासी ईश्वर दयाल अग्रवाल के परिवार में तीन पीढ़ियों से घेवर बनाने का कारोबार है। इसी परिवार से जुड़े दीपक गोयल ट्रेड शो में स्टाल का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यहां आने वाले कई लोग घेवर देखकर सवाल करते हैं कि यह तो सावन में मिलने वाली मिठाई है, फिर इस समय कैसे तैयार हो रही है। उन्हें बताया जाता है कि बागपत में घेवर की मांग केवल सावन तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों को अलग-अलग मौसम में बागपत के घेवर की उपलब्धता की जानकारी मिल रही है। सामने बन रहा ताजा घेवर ट्रेड शो में बागपत से पांच कारीगर आए हैं। ये कारीगर स्टाल पर ही लोगों के सामने ताजा घेवर तैयार कर रहे हैं। इससे भी लोगों की उत्सुकता बढ़ रही है। दीपक गोयल के अनुसार रोजाना अच्छी बिक्री हो रही है और यहां घेवर 600 रुपये किलो की दर से बेचा जा रहा है। घेवर की खासियत बताते हुए उन्होंने कहा कि शुद्ध दूध से तैयार खोये का इस्तेमाल स्वाद को अलग पहचान देता है। नीचे का कुरकुरा हिस्सा और ऊपर जमी खोये की परत इसकी विशेषता है। बागपत के अलावा दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इसकी मांग रहती है। दिल्ली की सोनाली, गुरुग्राम की रवीना कश्यप और गाजियाबाद के धर्मेंद्र भारद्वाज समेत ट्रेड शो में पहुंचे लोगों ने घेवर का स्वाद लिया। लोगों ने स्टाल पर रुककर घेवर बनाने की प्रक्रिया भी देखी। लोग विशेष तरीके से घेवर बनता देख उत्साहित दिखाई दिए। पहली बार एक जिला एक व्यंजन के तहत प्रदेश के सभी 75 जिलों के प्रसिद्ध व्यंजनों को ट्रेड शो में जगह दी गई है। बागपत से घेवर को इसमें शामिल किया गया है। इससे जिले की पारंपरिक मिठाई को दूसरे जिलों से आए लोगों तक पहुंचने का अवसर मिला है।