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दिल्ली-NCR जैसे हालात राजस्थान में भी, हवा ‘गंभीर’ श्रेणी में दर्ज

जयपुर प्रदेश में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है और हालात अब खतरनाक श्रेणी में पहुंच गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार राज्य के कई शहरों में एयर क्वालिटी इंडेक्स गंभीर स्तर पर दर्ज किया गया। भिवाड़ी में AQI 369 दर्ज किया गया, जो हवा में अत्यधिक प्रदूषण का संकेत है। राजधानी जयपुर में भी हवा की गुणवत्ता खतरनाक मोड़ पर पहुंचकर 233 तक दर्ज हुई। वहीं श्रीगंगानगर, नागौर, जालौर और कोटा जैसे शहर भी ‘पुअर’ और ‘वेरी पुअर’ कैटेगरी में रहे। राजस्थान के प्रमुख शहरों का AQI इस प्रकार रहा : टोंक- 227, भिवाड़ी- 369 कोटा- 271 डूंगरपुर- 254 जयपुर- 233 जालौर- 237 नागौर- 222 चुरू- 225 बीकानेर- 226 झुंझुनूं- 221 जोधपुर- 217 राजसमंद- 213 झालावाड़- 205 पाली- 204 उदयपुर- 202 गंगानगर- 191 मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों तक मौसम शुष्क रहने और हवाओं की रफ्तार कम होने से प्रदूषण फैलने के बजाय नीचे ही जमा हो रहा है। इसलिए फिलहाल राहत की कोई संभावना नहीं दिख रही। वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो प्रदेश में श्वास संबंधी बीमारियों, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं। राजधानी दिल्ली-एनसीआर जैसी परिस्थिति राजस्थान में भी बनने का खतरा दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि सुबह-शाम बाहर निकलने से बचें, मास्क का उपयोग करें, बच्चों और बुजुर्गों को प्रदूषित जगहों से दूर रखें, घर में एयर प्यूरीफायर या पौधों का इस्तेमाल करें। राजस्थान में हवा की सेहत बिगड़ती जा रही है और यदि हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

हवा में ज़हर! प्रदूषण बढ़ा रहा गंभीर बीमारियों का खतरा, डॉक्टर ने बताए शुरुआती संकेत

नवंबर लंग कैंसर अवेयरनेस महीने के रूप में मनाया जाता है। यह मौका है लोगों को याद दिलाने का कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ़ स्मोकिंग करने वालों की बीमारी नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि एयर पॉल्यूशन, सेकंड हैंड स्मोक और जेनेटिक कारणों से गैर-स्मोकर्स में भी इसका खतरा बढ़ता है। शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दें ➤ लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के लगते हैं, जैसे: ➤ लंबे समय तक खांसी ➤ सांस लेने में तकलीफ़ या घरघराहट ➤ बार-बार थकान महसूस होना ➤ सीने या पीठ में दर्द ➤ थूक में खून या बार-बार इन्फेक्शन स्मोकिंग न करने वाले भी सुरक्षित नहीं मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉ. अनादि पचौरी और एंड्रोमेडा कैंसर हॉस्पिटल के डॉ. अरुण कुमार गोयल के अनुसार, स्मोकिंग न करने वालों में भी प्रदूषण, सेकंड हैंड स्मोक और जेनेटिक कारणों से फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। ये दोनों विशेषज्ञ बताते हैं कि धुएँ में मौजूद हज़ारों केमिकल DNA को नुकसान पहुँचाते हैं और कैंसर का कारण बन सकते हैं। कैसे कम करें जोखिम ➤ स्मोकिंग पूरी तरह छोड़ें। ➤ सेकंड हैंड स्मोकिंग से बचें। ➤ एयर पॉल्यूशन वाले दिनों में मास्क पहनें और घर में एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल करें। ➤ ज्यादा प्रदूषण वाले इलाकों में कम समय बिताएँ। ➤ रेगुलर हेल्थ चेकअप और फ्लू/निमोनिया वैक्सीनेशन कराएँ। ➤ उच्च जोखिम वाले लोग कम डोज़ वाले CT स्कैन के लिए डॉक्टर से संपर्क करें। हेल्दी लाइफस्टाइल और फेफड़ों की सुरक्षा डॉ. पचौरी और डॉ. गोयल के अनुसार, स्वस्थ भोजन और एक्सरसाइज फेफड़ों को मजबूत रखते हैं। ➤ हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, फल और नट्स खाएँ। ➤ जंक फूड और तले-भुने खाने से बचें। ➤ रोजाना 30–45 मिनट एक्सरसाइज करें। ➤ प्राणायाम और गहरी सांस लेने की प्रैक्टिस फेफड़ों के लिए लाभकारी है। स्मोकिंग छोड़ चुके लोगों के लिए सलाह जो लोग स्मोकिंग छोड़ चुके हैं, उन्हें: ➤ कभी भी दोबारा स्मोकिंग न शुरू करें। ➤ सालाना फेफड़ों की जांच करवाएँ। ➤ 50–80 साल के भारी स्मोकर्स कम डोज़ वाले CT स्कैन कराएँ। ➤ स्वस्थ भोजन और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएँ।  

दम घोंट रही दिल्ली की हवा: जहरीले धुएं में घिरी राजधानी, बढ़ा अस्थमा व खांसी का खतरा

नई दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और इससे सटे एनसीआर क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का कहर जारी है। हवा की गुणवत्ता लगातार गंभीर  श्रेणी में बनी हुई है जिससे लोगों को सांस लेने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के सोमवार सुबह के आंकड़ों ने भयावह स्थिति की पुष्टि की है।  मुख्य क्षेत्रों का हाल सोमवार सुबह 7 बजे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) उच्च स्तर पर दर्ज किया गया:     दिल्ली (औसत): 346 (यह गंभीर श्रेणी की शुरुआत है)     नोएडा: 336     गाजियाबाद: 302 दिल्ली के प्रमुख इलाकों में AQI CPCB के अनुसार दिल्ली के कई निगरानी केंद्रों में वायु प्रदूषण 'बहुत खराब' से 'गंभीर' श्रेणी के बीच रहा जबकि कुछ स्थानों पर यह 400 के पार चला गया:   इलाका AQI स्तर (सोमवार सुबह) श्रेणी बवाना 412 गंभीर आनंद विहार 379 बहुत खराब बुराड़ी 389 बहुत खराब अशोक विहार 373 बहुत खराब आईटीओ (ITO) 378 बहुत खराब मुंडका 378 बहुत खराब अलीपुर 351 बहुत खराब चांदनी चौक 365 बहुत खराब ओखला 347 बहुत खराब पूसा (PUSA) 348 बहुत खराब     वायु गुणवत्ता का मतलब AQI का 401 से 500 के बीच होना 'गंभीर' माना जाता है जो स्वस्थ लोगों को भी प्रभावित करता है और पहले से बीमार लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है। 301 से 400 के बीच का AQI 'बहुत खराब' माना जाता है। प्रदूषण के इस बढ़ते स्तर को देखते हुए प्रशासन द्वारा ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के तहत सख्त कदम उठाए जाने की संभावना है।  

प्रदूषित हवा का कहर: अब कैंसर का नया खतरा बन रहा है Air Pollution

हम जिस हवा में सांस लेते हैं, वही अब हमारी सेहत के लिए सबसे बड़ा दुश्मन बनती जा रही है। कभी जीवन का आधार रही यह हवा आज अदृश्य जहर में बदल चुकी है। यह सिर्फ खांसी, सांस की तकलीफ या एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे यह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी जन्म दे रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बाहरी वायु प्रदूषण और उसमें मौजूद बारीक कणों को ग्रुप-1 कार्सिनोजेन यानी “कैंसर पैदा करने वाले प्रमुख तत्वों” की सूची में रखा है। इसका मतलब यह है कि हवा में मौजूद ये जहरीले तत्व उतने ही खतरनाक हैं जितना तंबाकू का धुआं या एस्बेस्टस। राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस के मौके पर आइए डॉ. मीनू वालिया से समझते हैं कि हवा में घुला यह जहर किस तरह हमारे शरीर को अंदर से बीमार बना रहा है और हम इससे कैसे बच सकते हैं। फेफड़ों की गहराई तक घुसने वाला जहर हवा में मौजूद सबसे घातक तत्व हैं PM2.5 कण- ये इतने छोटे होते हैं कि शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली भी इन्हें रोक नहीं पाती। ये कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं और वहां से खून में मिल जाते हैं। इनमें अक्सर भारी धातुएं, हाइड्रोकार्बन और दूसरे रासायनिक जहर चिपके रहते हैं। जब ये शरीर में पहुंचते हैं, तो कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे कैंसर की शुरुआत होती है। यही कारण है कि आज गैर-धूम्रपान करने वालों में भी फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन का कनेक्शन लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से शरीर लगातार एक सूक्ष्म सूजन की स्थिति में रहता है। इस दौरान शरीर में Reactive Oxygen Species (ROS) नामक तत्व बनते हैं, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। यह स्थिति ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कहलाती है- यानी जब शरीर की प्राकृतिक रक्षा क्षमता टूटने लगती है। इससे कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और कैंसर के लिए अनुकूल माहौल बन जाता है। यह प्रभाव सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मूत्राशय और स्तन कैंसर जैसे मामलों में भी देखा गया है। खून के रास्ते पूरे शरीर में फैलता है जहर वायु प्रदूषण का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है। बेहद छोटे प्रदूषक कण खून में घुसकर जिगर, गुर्दे और मस्तिष्क जैसे अन्य अंगों तक पहुंच जाते हैं। हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने वाले लोगों में मस्तिष्क, कोलन और मूत्र तंत्र से जुड़ी कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण है- पूरे शरीर में सूजन और डीएनए मरम्मत प्रणाली का कमजोर होना। जीन्स पर प्रदूषण का असर विज्ञान की नई शाखा एपिजेनेटिक्स बताती है कि प्रदूषण हमारे जीन्स के ढांचे को नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को बदल देता है। हवा में मौजूद रासायनिक तत्व DNA methylation की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जिससे कुछ महत्वपूर्ण जीन्स “खराब” हो जाते हैं जो कैंसर को रोकते हैं, जबकि कुछ जीन्स “एक्टिव” हो जाते हैं जो ट्यूमर को बढ़ावा देते हैं। यह बदलाव अदृश्य होते हैं, लेकिन असर गहरा होता है- यानी हवा हमारे जेनेटिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। शहरों की 'साइलेंट किलर' हवा शहरों में प्रदूषण का असर और भी ज्यादा होता है, क्योंकि यहां हवा के साथ-साथ शोर, तनाव, खराब खानपान और नींद की कमी जैसे अन्य कारक भी शरीर को कमजोर करते हैं। जो लोग मुख्य सड़कों, फैक्टरियों या औद्योगिक क्षेत्रों के पास रहते हैं, वे लगातार कई पर्यावरणीय जोखिमों का सामना करते हैं। यह सब मिलकर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है और कैंसर जैसी बीमारियों का रास्ता आसान बना देता है। छोटी कोशिशों से होगा बड़ा असर बेशक प्रदूषण को पूरी तरह रोकना सरकारों और नीतियों की जिम्मेदारी है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर भी हम कई कदम उठा सकते हैं जो हमारे जोखिम को कम कर सकते हैं:     घर के अंदर की हवा शुद्ध रखें: एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें और पौधे लगाएं।     बाहर निकलते समय सावधानी: स्मॉग या प्रदूषण वाले दिनों में N95 या बेहतर मास्क पहनें।     स्मार्ट ट्रैवल करें: निजी गाड़ियों की बजाय सार्वजनिक परिवहन या कारपूल का उपयोग करें।     खानपान में बदलाव लाएं: हरी सब्जियां, फलों और एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर आहार लें ताकि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से शरीर लड़ सके।     हेल्थ चेकअप कराएं: नियमित चेकअप से शुरुआती लक्षणों की पहचान जल्दी हो सकती है।  

सांस लेना हुआ मुश्किल: प्रदूषण से मौतों का आंकड़ा चौंकाने वाला, नई रिपोर्ट में बड़े खुलासे

नई दिल्ली अगर आपको भी लग रहा है कि एयर क्वालिटी खराब हो रही है और प्रदूषण से होने वाली मौंते ज्यादा हो रही हैं, तो ऐसा महसूस करने वाले आप अकेले नहीं हैं। वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों की कुल संख्या, जो मुख्य रूप से जनसंख्या वृद्धि, वृद्धावस्था और लगातार प्रदूषण के कारण बहुत ज्यादा बनी हुई है। और कुछ विश्लेषणों में तो और भी बढ़ गई है। नई "स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025" रिपोर्ट ताजा वैश्विक आंकड़ों को दिखाती है बताती है कि वायु प्रदूषण दुनिया भर में लाखों अकाल मौतों का कारण बन रहा है। जानलेवा साबित हो रहा वायु प्रदूषण स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 ताजा PM2.5 और ओजोन एक्सपोजर आंकड़ों और डिजीज बर्डन मॉडल का इस्तेमाल करके एयर क्वालिटी और स्वास्थ्य परिणामों की जांच करता है। इसका शीर्षक है: वायु प्रदूषण दुनिया भर में सबसे बड़े जानलेवा कारकों में से एक बना हुआ है, और इनमें से लगभग दस में से नौ मौतें गैर-संचारी रोगों जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक, पुरानी फेफड़ों की बीमारी और फेफड़ों के कैंसर से होती हैं। संक्षेप में, वायु प्रदूषण अब केवल "फेफड़ों की समस्या" नहीं रह गया है; यह अब मुख्य रूप से दिल के दौरे, स्ट्रोक और पुरानी हृदय रोगों को बढ़ावा देता है। वायु प्रदूषण कैसे बनता है मौत का कारण? वायु प्रदूषण PM2.5, ओजोन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि नामक सूक्ष्म कणों का एक जटिल मिश्रण है, लेकिन सबसे घातक घटक सूक्ष्म कणिकीय पदार्थ (PM2.5) है।      सूक्ष्म कण फेफड़ों में प्रवेश करते हैं- PM2.5 इतना सूक्ष्म होता है कि यह फेफड़ों की गहरी वायुकोशियों तक पहुंच जाता है। इससे फेफड़ों के ऊतकों में जलन होती है और सूजन हो जाती है।     सूजन बढ़ती जाती है- सूजे हुए फेफड़ों से संकेत रक्तप्रवाह में पहुंचते हैं, जिससे पूरे शरीर में सूजन बढ़ जाती है, जिससे धमनी पट्टिकाएं अस्थिर हो जाती हैं। इससे दिल का दौरा और स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है।     रक्त और वाहिकाओं पर सीधा प्रभाव- प्रदूषक खून के थक्के जमने के तरीके को बदल सकते हैं और रक्त वाहिकाओं के कार्य को कम कर सकते हैं, जिससे घातक हृदय संबंधी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।     दीर्घकालिक क्षति- लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), फेफड़ों का कैंसर और हृदय रोग जैसी दीर्घकालिक बीमारियां बढ़ जाती हैं, जो समय से पहले मृत्यु का कारण बनती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और लॉन्गटर्म स्टडी के अनुसार, प्रदूषण से संबंधित अधिकांश मौतें इस्केमिक हृदय रोग और स्ट्रोक के कारण होती हैं, इसके बाद COPD, निचले श्वसन संक्रमण और फेफड़ों का कैंसर होता है। वायु प्रदूषण से मृत्यु के जोखिम को कम करने के प्रोटोकॉल इसमें बड़ी कमी लाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा, यातायात नियंत्रण और औद्योगिक नियमों जैसी नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। लेकिन व्यक्ति और परिवार, जोखिम को कम करने के लिए अभी से व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं।     स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन या कुशल चूल्हे का उपयोग करें; रसोई को हवादार रखें; घर के अंदर कचरा जलाने से बचें। घरेलू प्रदूषण अभी भी कई अकाल मौतों का कारण बनता है, खासकर बच्चों में।     दोबारा इस्तेमाल होने वाला मास्क या प्यूरीफायर का उपयोग करने वाले परिवार प्रमाणित उपकरण चुनें और उनका उचित रखरखाव करें।     जब AQI अधिक हो, तो बाहर काम कम करें, खासकर यदि आप वृद्ध हैं या आपको हृदय/फेफड़ों की बीमारी है। व्यायाम स्वास्थ्यवर्धक है, लेकिन बहुत प्रदूषित हवा में नहीं।     बहुत प्रदूषित स्थानों में N95/FFP2 जैसे उपयुक्त मास्क का उपयोग करें क्योंकि सही तरीके से लगाए जाने पर ये साँस के द्वारा अंदर जाने वाले PM2.5 को कम करते हैं।     यदि आप उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्र में रहते हैं, तो HEPA फिल्टर वाले इनडोर एयर क्लीनर पर विचार करें क्योंकि ये इनडोर PM2.5 को कम करते हैं और संवेदनशील लोगों की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं।     बुजुर्गों और हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सलाह का पालन करना चाहिए और अपनी दवाइयां नियमित रखनी चाहिए और सीने में दर्द, अचानक सांस लेने में तकलीफ होने पर तुरंत डॉक्टर की सहायता लेनी चाहिए। 2025 की ग्लोबल एयर कंडीशन और अन्य ग्लेबल एनालिसिस एक बात स्पष्ट करते हैं कि वायु प्रदूषण दुनिया भर में सबसे बड़े जानलेवा कारकों में से एक बना हुआ है, और हालांकि दुनिया के कुछ हिस्सों में प्रगति हो रही है, फिर भी कुल बोझ बहुत बड़ा है क्योंकि इसका प्रभाव अभी भी व्यापक है और आबादी बूढ़ी हो रही है। घरेलू और व्यक्तिगत उपायों के साथ नीतिगत कार्रवाई ही कम मौतों का रास्ता है।  

खराब हवा से देश में बढ़ी मौतें, सालाना 20 लाख लोग समय से पहले गंवा रहे जान: रिपोर्ट

नई दिल्ली दुनिया की हवा पर रिसर्च करने वाली संस्था State of Global Air Report की नई रिपोर्ट आ गई है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत और चीन में 2023 में खराब हवा में सांस लेने के चलते 20 लाख लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया जैसे देशों में भी दो लाख मौतें हुई हैं। इंडोनेशिया, म्यांमार, मिस्र का भी हाल खराब है और यहां एक साल के अंदर 1 लाख लोग खराब हवा के चलते ही मारे गए। रिपोर्ट का कहना है कि दुनिया में अकाल मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण अब एयर पलूशन बन गया है और पहले नंबर पर अब भी हाई ब्लड प्रेशर है। बोस्टन स्थित हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया की 36 फीसदी आबादी भीषण एयर पलूशन की शिकार है। डिमेंशिया जैसी बीमारी भी इस समस्या के चलते हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023 में एयर पलूशन जनित बीमारियों ने दुनिया भर में 79 लाख लोगों की जान ले ली। इस तरह दुनिया में होने वाली 8 मौतों में से हर एक की वजह एयर पलूशन रही है। इनमें से 49 लाख लोग तो ऐसे रहे हैं, जो हवा में पीएम 2.5 के बढ़ने के कारण बीमारियों के शिकार हुए। अहम तथ्य यह है कि इनमें से 28 लाख लोग तो ऐसे ही थे, जो आमतौर पर घर में ही रहते थे। खराब हवा से 90 फीसदी मौतें अकेले एशिया में सबसे खराब हाल भारत और चीन का है, जहां दुनिया की बड़ी आबादी बसती है। दोनें देशों में 2023 में 20-20 लाख लोगों की मौत हुई है। रिपोर्ट कहती है कि एयर पलूशन से होने वाली 90 फीसदी मौतें तो एशिया में ही हुई हैं। इनमें भी लोअर-मिडल इनकम वाले देशों की स्थिति ज्यादा खराब है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हार्ट की बीमारी, डिमेंशिया और डायबिटीज जैसी समस्याएं भी एयर पलूशन के चलते हो रही हैं। अनुमान है कि 2023 में स्वस्थ मानव जीवन के 11.6 मिलियन वर्ष 2023 में ही कम हो गए। एयर पलूशन के चलते लोगों के फेफड़े बीमार हो रहे हैं और वे गंभीर समस्याओं के शिकार हो रहे हैं। 25 फीसदी हार्ट की बीमारियों का कारण है एयर पलूशन इसके अलावा 25 फीसदी हार्ट की बीमारियों का कारण एयर पलूशन है। डिमेंशिया के शिकार लोगों में भी 25 फीसदी की वजह एयर पलूशन बताई जाती है। खराब एयर क्वालिटी डायबिटीज की भी वजह बन रही है। अब सवाल है कि सबसे ज्यादा खराब हवा का सामना कौन कर रहा है। इन देशों में भारत, चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ब्राजील और कुछ अफ्रीकी मुल्क शामिल हैं। सीधी बात यह है कि अधिक आबादी के चलते मकान, बाजार की जरूरतें बढ़ी हैं। जंगल खत्म हुए हैं तो प्रदूषण में इजाफा दिखा है।