samacharsecretary.com

12 हजार की नौकरी, लेकिन खाते से ₹165 करोड़ का ट्रांजैक्शन! CBI जांच में सामने आया पैसों का स्रोत

भिलाई खुर्सीपार निवासी अनिमेष सिंह के बैंक खाते में वर्ष 2020 में आए 165 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन मामले की जांच कर रहे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो4 (सीबीआई) ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डबल बेंच के समक्ष बताया है कि उसे इस राशि के स्रोत और उसके आगे कहां-कहां हस्तांतरित किए जाने संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो गई है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल की खंडपीठ में हुई। सीबीआई ने न्यायालय को अवगत कराया कि जांच के दौरान बैंकिंग रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेजों का विश्लेषण किया गया है। एजेंसी को अब यह जानकारी मिल चुकी है कि संबंधित राशि किन माध्यमों से खाते में पहुंची और बाद में उसका उपयोग अथवा हस्तांतरण किस प्रकार किया गया। सीबीआई ने कोर्ट से कहा है कि वह अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट आगामी सुनवाई में प्रस्तुत करेगी। मामले की अगली सुनवाई जुलाई के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित है। यस बैंक के खाते में हुई थी धनवर्षा यह मामला वर्ष 2020 में तब चर्चा में आया था, जब लगभग 12 हजार रुपये प्रतिमाह आय वाले खुर्सीपार निवासी अनिमेष सिंह के यस बैंक खाते में 165 करोड़ रुपये के लेनदेन की जानकारी सामने आई थी। मामले को लेकर शिकायतें दर्ज कराई गईं और धन के स्रोत को लेकर सवाल उठे। इसके बाद अधिवक्ता सतीश त्रिपाठी, सामाजिक कार्यकर्ता प्रभु नाथ मिश्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की थी। शुरुआत से ही राज्य सरकार में स्पष्टता का अभाव अधिवक्ता सतीश त्रिपाठी का कहना है कि इस मामले में राज्य सरकार का रवैया शुरू से ही स्पष्ट नहीं रहा। उनके अनुसार, प्रारंभिक चरण में सरकार की ओर से न्यायालय को बताया गया था कि मामले की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (एसीबी-ईओडब्ल्यू) से कराई जा रही है, लेकिन बाद में जांच की प्रगति और निष्कर्षों को लेकर लगातार अस्पष्टता बनी रही। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले कांग्रेस सरकार और बाद में भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी न्यायालय के समक्ष मामले से संबंधित पूरी और सटीक जानकारी प्रस्तुत नहीं की गई, जिसके कारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी खिंचती रही। परत दर परत मामला उजागर होने की आशा त्रिपाठी का कहना है कि अब जब हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआई जांच कर रही है, तब मामले की परत-दर-परत जानकारी सामने आ रही है। उनका दावा है कि जांच आगे बढ़ने के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हो सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें जुलाई के अंतिम सप्ताह में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें सीबीआई अपनी विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।  

1.25 करोड़ रुपये के SBI घोटाले का आरोपी नेपाल से लौटकर छिपा था, CBI ने दबोचा

 धनबाद  Dhanbad SBI Scam स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की मुख्य शाखा, बैंक मोड़ में करीब दो दशक पहले हुए करोड़ों रुपये के घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) को बड़ी सफलता मिली है। रविवार को चलाए गए समन्वित अभियान में सीबीआई ने बृजभूषण प्रसाद को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगांव से तथा करतार सिंह को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से गिरफ्तार कर लिया। करीब 20 वर्षों की फरारी के बाद हुई इन गिरफ्तारियों को सीबीआई एसीबी धनबाद की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। दोनों आरोपियों में एक को आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए धनबाद न्यायालय में पेश किया गया जहां से न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। वर्ष 2005 से फरार चल रहे दोनों आरोपी लंबे समय तक नेपाल में छिपे रहे और बाद में भारत लौटकर पहचान बदलकर अलग-अलग राज्यों में रह रहे थे। CBI के अनुसार, आरसी-11(ए)/2005-डी के तहत 31 अगस्त 2005 को मामला दर्ज किया गया था। जांच में सामने आया था कि नवंबर 2002 से जून 2005 के बीच एसबीआई की मुख्य शाखा, बैंक मोड़, धनबाद से करीब 1.25 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और गबन किया गया था। मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के दौरान आरोपी बृजभूषण प्रसाद और करतार सिंह फरार हो गए थे। सीबीआई की कार्रवाई तेज होने पर दोनों नेपाल भाग गए। न्यायालय ने उन्हें घोषित अपराधी करार दिया था। उनकी गिरफ्तारी के लिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था तथा नकद इनाम की भी घोषणा की गई थी। सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक, नेपाल से लौटने के बाद दोनों आरोपी अपनी असली पहचान छिपाकर अलग-अलग राज्यों में रह रहे थे, ताकि गिरफ्तारी और न्यायिक कार्रवाई से बच सकें। पिछले तीन-चार महीनों से सीबीआई एसीबी धनबाद की टीम मानव स्रोतों और तकनीकी निगरानी के जरिए उनके ठिकानों का पता लगाने में जुटी थी। धनबाद सीबीआइ के सूत्रों ने बताया कि दूसरे आरोपित को भी लाया जा रहा है। न्यायालय में पेश करने के बाद उसे भी न्यायिक हिरासत में जेल भेजा जाएगा।  

बैंक घोटाला केस में नया मोड़! हरियाणा के दो वरिष्ठ IAS अफसरों की भूमिका पर CBI की नजर

चंडीगढ़ हरियाणा में हुए 661 करोड़ रुपए के कथित बैंकिंग फ्रॉड मामले की जांच अब ऐसे दौर में पहुंचती दिख रही है, जहां एजेंसियां सिर्फ बैंक रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन पर नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ढांचे को भी समझने में जुट गई हैं जिसके भीतर पूरा घटनाक्रम आकार लेता गया। इसी कड़ी में अब जांच को लेकर एक बड़ा इनपुट सामने आया है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) हरियाणा के दो आईएएस अधिकारियों को सरकारी गवाह बनाए जाने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रही है। जानकारी यह भी सामने आई है कि जिन दो अधिकारियों के नाम पर विचार किया जा रहा है, वे मूल रूप से हरियाणा सिविल सेवा (एचसीएस) से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। प्रशासनिक स्तर पर लंबे अनुभव और विभागीय प्रक्रियाओं की समझ के कारण एजेंसी मान रही है कि उनके पास ऐसी सूचनाएं हो सकती हैं जो इस पूरे मामले की कई अधूरी कड़ियों को जोड़ने में मदद करें। जांच से जुड़े सूत्रों ने क्या कहा? जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एजेंसी का मौजूदा फोकस केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि सरकारी धन किन खातों तक पहुंचा। अब कोशिश यह समझने की भी है कि सरकारी विभागों के खाते किस प्रक्रिया से संचालित हुए, कथित फर्जी एफडीआर कैसे तैयार हुए, रकम के ट्रांसफर को किस स्तर पर मंजूरी मिली और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था में कहां-कहां चूक या मिलीभगत की संभावना बनी। जांच एजेंसियों का मानना है कि बड़े वित्तीय मामलों में केवल बैंक एंट्री पूरी कहानी नहीं बताती। कई बार फाइलों की आवाजाही, विभागीय आदेश, प्रशासनिक स्वीकृतियां और फैसलों की शृंखला असली तस्वीर सामने लाती है। ऐसे में सिस्टम के भीतर काम कर चुके अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। फिलहाल इस पूरे मामले की जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दोनों स्तरों पर जारी है। पहले ही कई व्यक्तियों और कथित संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ चुकी है। साथ ही, कुछ अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति दिए जाने के बाद मामला प्रशासनिक जवाबदेही के दायरे में भी आ गया है। अब नजर उस संभावित कदम पर टिकी है जिसमें दो आईएएस अधिकारियों को सरकारी गवाह बनाया जा सकता है। पहले पूछताछ हुई, अब गवाही के विकल्प पर मंथन सूत्रों के मुताबिक जिन अधिकारियों को लेकर चर्चा चल रही है, उनसे पहले भी पूछताछ की जा चुकी है। पूछताछ के दौरान उपलब्ध कराए गए दस्तावेज, विभागीय नोटिंग और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर एजेंसी को कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जिन्होंने जांच को नया आयाम दिया। बताया जा रहा है कि अब एजेंसी यह आकलन कर रही है कि क्या इन अधिकारियों के पास उपलब्ध जानकारी को औपचारिक रूप से सरकारी गवाही के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो जांच को घटनाओं का क्रम समझने, निर्णय लेने वाले स्तरों की पहचान करने और अन्य संभावित भूमिकाओं तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। सूत्र यह भी मानते हैं कि अंदरूनी गवाही कई बार उन सवालों के जवाब दे देती है जो दस्तावेजों में सीधे दिखाई नहीं देते। दिल्ली-एनसीआर तक पहुंचा सर्च ऑपरेशन, जांच का दायरा बढ़ा मामले में हाल के दिनों में जांच एजेंसी ने पहली बार हरियाणा और चंडीगढ़ से बाहर जाकर दिल्ली-एनसीआर तक कार्रवाई का विस्तार किया। कई स्थानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया गया। जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस कार्रवाई के दौरान डिजिटल उपकरण, वित्तीय दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड और कुछ प्रशासनिक सामग्री एजेंसी के कब्जे में आई है। अब इनकी तकनीकी जांच और दस्तावेजी मिलान की प्रक्रिया चल रही है। एजेंसी यह समझने की कोशिश कर रही है कि सरकारी खाते खोलने, धन को अलग-अलग माध्यमों से स्थानांतरित करने और वित्तीय दस्तावेजों के उपयोग के बीच क्या संबंध मौजूद थे। नोएडा लिंक के बाद और गहरे हुए सवाल जांच के दौरान नोएडा स्थित एक निजी कंपनी तक पहुंचने के बाद एजेंसियों ने कथित वित्तीय प्रवाह के दूसरे स्तरों की भी पड़ताल तेज कर दी है। संदेह यह है कि सरकारी स्रोतों से निकलने वाली रकम आगे कई चरणों से होकर अन्य खातों या संरचनाओं तक पहुंची हो सकती है। इस दिशा में जुटाए गए रिकॉर्ड और डिजिटल डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि धन के प्रवाह की पूरी शृंखला को समझा जा सके।  

बंगाल में जांच एजेंसियों को बड़ी राहत! शुभेंदु सरकार ने CBI पर लगी रोक हटाई

 कोलकाता पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में सीबीआई को जांच करने की पूरी छूट देने का बड़ा फैसला किया है. होम एंड हिल अफेयर्स विभाग की तरफ से 8 जून 2026 को जारी अधिसूचना के मुताबिक, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (डीएसपीई) एक्ट, 1946 के तहत सीबीआई को राज्य में केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मियों और उनसे जुड़े मामलों की जांच करने की अनुमति दी गई है।  इस नोटिफिकेशन का सीधा मतलब यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने CBI को राज्य में कुछ मामलों की जांच करने के लिए फिर से सामान्य सहमति (General Consent) दे दी है, लेकिन यह छूट पूरी तरह बिना शर्त नहीं है।  यह अधिकार दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) एक्ट, 1946 की धारा 6 के तहत दिया गया है. नोटिफिकेशन 8 जून 2026 से तत्काल प्रभाव से लागू हो रहा है।  किन मामलों में जांच कर सकेगी CBI?     केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामले.     केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के कर्मचारियों से जुड़े मामले.     अगर किसी शख्स पर केंद्रीय कर्मचारियों या केंद्रीय उपक्रमों के कर्मचारियों के साथ मिलकर अपराध करने का आरोप हो, तो उनके खिलाफ भी जांच की जा सकेगी. किन मामलों में CBI सीधे जांच नहीं कर सकेगी? पश्चिम बंगाल सरकार के नियंत्रण वाले राज्य सरकारी कर्मचारियों के मामलों में सीबीआई सीधे जांच नहीं कर सकती है. ऐसे मामलों में सीबीआई को पहले राज्य सरकार से लिखित अनुमति लेनी होगी. यह कहना कि 'बंगाल ने CBI को सभी मामलों की जांच की पूरी छूट दे दी' पूरी तरह सही नहीं होगा. नोटिफिकेशन पढ़ने पर साफ है कि छूट मुख्य रूप से केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय उपक्रमों और उनसे जुड़े मामलों के लिए दी गई है. राज्य सरकार के अधिकारियों पर CBI अभी भी बिना अनुमति सीधे जांच नहीं कर सकती।  भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई की सीबीआई को दी खुली छूट  मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि पिछली सरकार ने 4 वर्षों से सीबीआई की कार्रवाई को रोक रखा था. कानून के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने या अभियोजन शुरू करने के लिए राज्य सरकार की अनुमति जरूरी होती है।  ममता बनर्जी पर भ्रष्ट नौकरशाहों को संरक्षण देने का आरोप मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी की सरकार ने जान-बूझकर इन फाइलों को अटकाये रखा, ताकि उनके खास अधिकारियों को बचाया जा सके. मुख्यमंत्री ने बताया कि फिलहाल 3 प्रमुख विभागों में भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों के खिलाफ जांच की सीबीआई को आवश्यक मंजूरी दे दी गयी है. इसकी प्रतियां केंद्रीय एजेंसी को भेज दी गयी हैं।  रडार पर शिक्षक भर्ती और नगर निकाय भर्ती घोटाले के मास्टरमाइंड     शिक्षक भर्ती घोटाला (WBSSC) स्कूलों में अवैध नियुक्तियों से जुड़ा मामला है. इस केस में कई बड़े अधिकारियों के खिलाफ अब सीबीआई सीधे आरोपपत्र दाखिल कर सकेगी।      नगर निकाय भर्ती घोटाला वो केस है, जिसमें बंगाल के विभिन्न नगरपालिकाओं में हुई नौकरियों की बंदरबांट हुई थी. अब इसकी जांच तेजी से आगे बढ़ेगी।  कानून का हथियार बनाकर भ्रष्टाचारियों को दिया गया था सुरक्षा कवच मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली सरकार ने कानून को ढाल बनाकर भ्रष्टाचारियों को कवच प्रदान किया था. उन्होंने कहा- भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है. जो फाइलें सचिवालय की आलमारियों में बंद थीं, उन्हें अब खोल दिया गया है, ताकि जनता का पैसा लूटने वालों को सजा मिल सके। 

सरकारी फंड घोटाला मामला: CBI ने दिल्ली-NCR सहित 6 ठिकानों पर की कार्रवाई

 चंडीगढ़   हरियाणा और चंडीगढ़ के सरकारी विभागों के 661 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच कर रही सीबीआई  ने शनिवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर में छह जगहों पर छापे मारे। जांच के दायरे में हरियाणा के कुछ वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, बैंक अधिकारी और एक निजी कंपनी भी हैं। सीबीआई के मुताबिक यह मामला हरियाणा सरकार के आठ विभागों और चंडीगढ़ प्रशासन के दो विभागों नगर निगम चंडीगढ़ और क्रेस्ट चंडीगढ़ के सरकारी फंड में गड़बड़ी से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी धन को गलत तरीके से खातों के जरिए दूसरी जगह भेजकर हड़प लिया गया। जांच एजेंसी के मुताबिक हरियाणा कैडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के घरों के अलावा नोएडा स्थित वीपम कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक के ठिकानों पर की गई। जांच में सामने आया है कि कुछ अधिकारियों ने बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर खाते खुलवाने, सरकारी पैसे के ट्रांसफर और बाद में उसे अन्य खातों में भेजने में मदद की। इसके बदले उन्हें फायदा मिलने के भी आरोप हैं। सीबीआई ने बताया कि वीपम कंसल्टेंसी के खाते में भी कथित तौर पर घोटाले का पैसा पहुंचा था, जिसे बाद में कंपनी के निदेशक के निजी खाते में ट्रांसफर किया गया। तलाशी के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल उपकरण और संपत्ति से जुड़े कागजात बरामद किए गए हैं। यह जांच सीबीआई ने हरियाणा विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो से एक मामला अपने हाथ में लेने और चंडीगढ़ पुलिस के आर्थिक अपराध थाने में दर्ज दो मामलों को अपने अधीन लेने के बाद शुरू की थी। तीनों मामलों में आपराधिक साजिश, सरकारी धन के गबन और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है। सीबीआई पहले ही इस मामले में पंचकूला की विशेष अदालत में पहली चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। इसमें हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी का कहना है कि सरकारी धन को IDFC फर्स्ट बैंक और AU फाइनेंस बैंक में रखे खातों से सुनियोजित तरीके से दूसरी जगह भेजा गया। सीबीआई का कहना है कि जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में और लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। मामले में जल्द ही अतिरिक्त चार्जशीट भी दाखिल की जाएगी।

CBI ने मेरठ कैंट बोर्ड के नामित सदस्य को रिश्वत लेते रंगे हाथ दबोचा

मेरठ यूपी में भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी मुहिम के तहत धड़ाधड़ कार्रवाई की जा रही है। विजिलेंस, एंटी करप्शन के बाद अब सीबीआई ने भी रिश्वतखोरों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। मेरठ में सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए मेरठ कैंट बोर्ड के मनोनीत सदस्य डॉ. सतीश चंद्र शर्मा को तीन लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार किया है। सीबीआई की टीम देर रात तक इस मामले में पूछताछ करती रही। हालांकि पूरी कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। ​प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा नेता और कैंट बोर्ड के मनोनीत सदस्य डॉ. सतीश शर्मा ने किसी सरकारी कार्य के एवज में एक ठेकेदार से रिश्वत की मांग की थी। ठेकेदार ने इसकी शिकायत सीबीआई से की जिसके बाद टीम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जाल बिछाया। जैसे ही ठेकेदार ने रिश्वत की रकम डॉ. सतीश शर्मा को सौंपी मौके पर मौजूद सीबीआई की टीम ने उन्हें रंगेहाथ दबोच लिया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद सीबीआई की टीम ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए मेरठ के पल्लवपुरम स्थित अंसल टाउन में छापेमारी की। सूत्रों के अनुसार डॉ. सतीश शर्मा के आवास और अन्य ठिकानों पर दस्तावेजों की गहन छानबीन की जा रही है। ​सीबीआई की टीम फिलहाल मामले से जुड़े अन्य तथ्यों और संलिप्त लोगों की जानकारी जुटाने में लगी है। देर रात तक आगे की पूछताछ और कार्रवाई जारी थी। ​ कैंट बोर्ड में मचा हड़कंप ​कैंट बोर्ड के सदस्य की इस तरह से गिरफ्तारी के बाद से स्थानीय प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। यह घटना भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा संदेश मानी जा रही है। डॉ. सतीश चंद्र शर्मा भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, भाजपा नेता होने के नाते ही उन्हें कैंट बोर्ड में फरवरी-2022 में सदस्य नामित किया गया था। तब से उन्हें हर छह माह पर अवधि विस्तार दिया जा रहा है। हापुड़ से जीएसटी विभाग का स्टेनो 24 हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार वहीं दूसरी ओर हापुड़ में विजिलेंस की टीम ने रिश्वतखोर को रंगे हाथ गिरफ्तार किया। टीम ने जीएसटी विभाग में सहायक आयुक्त राज्य कर खंड-4 के स्टेनो को 24 हजार रुपये रिश्वत लेते पकड़ा है। ग्राम दादरी निवासी चमन सिंह ने विजिलेंस टीम से शिकायत कर बताया था कि मोदीनगर रोड पर उसकी सावित्री बीज भंडार नाम से दुकान है। उन्होंने इसका जीएसटी नंबर लिया हुआ है। सहायक आयुक्त राज्य कर खंड-4 के स्टेनो जयदीप ने उनसे आठ मई को फोन कर अपने ऑफिस में आकर मिलने को कहा था। जब वह उनके ऑफिस गया तो स्टेनो जयदीप ने अपने कम्प्यूटर की स्क्रीन पर 48,000 रुपये का टैक्स शिकायतकर्ता की तरफ दिखाया। स्टेनो ने कहा कि अगर इसके आधे 24 हजार रुपये उसे दे दें तो वह सारे टैक्स को अपने स्तर पर खत्म कर देगा। चमन सिंह ने कहा कि उनके ऊपर ऐसा कोई टैक्स नहीं बनता है और न ही उसे किसी तरह का नोटिस दिया गया। अगर ऐसा कोई टैक्स बनता है तो वह उसे जमा करने को तैयार हैं। लेकिन स्टेनो जयदीप द्वारा 24 हजार रुपये की लगातार मांग की जाती रही। शिकायत के बाद विजिलेंस टीम ने आरोपी की धरपकड़ को जाल बिछाना शुरू कर दिया। शुक्रवार सुबह विजिलेंस टीम निरीक्षक रेनूका सिंह के नेतृत्व में रेवती कुंज स्थित जीएसटी कार्यालय पहुंची। चमन सिंह, स्टेनो जयदीप के पास पहुंचा और रिश्वत की रकम उसे सौंपी। जैसे ही आरोपी ने रुपये लिए विजिलेंस टीम ने तत्काल उसे दबोच लिया। कोतवाली प्रभारी निरीक्षक मनीष चौहान ने बताया विजिलेंस टीम की तहरीर पर स्टेनो जयदीप के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जा रहा है।

रिश्वत मामले में CBI का बड़ा एक्शन, चंडीगढ़ से ठेकेदार और पिता-पुत्र गिरफ्तार

चंडीगढ़  विजिलेंस में लंबित शिकायत बंद कराने के बदले 13 लाख रुपये की रिश्वत मामले में सीबीआई ने ठेकेदार पिता-पुत्र समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। तीनों को सोमवार को चंडीगढ़ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में पेश किया गया, जहां से सीबीआई ने पिता-पुत्र को तीन दिन के रिमांड पर लिया है जबकि तीसरे आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। मामले में पंजाब डीजीपी विजिलेंस के रीडर ओपी राणा की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है। ओपी राणा फिलहाल फरार बताया जा रहा है। सीबीआई ने सोमवार रात मोहाली और मलोट में छापा मारा था। मोहाली में विजिलेंस का दफ्तर सील कर दिया था। मंगलवार सुबह सीबीआई फिर विजिलेंस दफ्तर पहुंची और जांच शुरू कर कुछ रिकॉर्ड जब्त कर लिए थे। बता दें, यह मामला पंजाब के एक राज्य कर अधिकारी की शिकायत पर दर्ज किया गया था।  शिकायतकर्ता के अनुसार ठेकेदार विकास उर्फ विक्की गोयल और उसका बेटा राघव गोयल विजिलेंस में लंबित शिकायत बंद करवाने के बदले 20 लाख रुपये की मांग कर रहे थे। आरोपियों ने खुद को पंजाब विजिलेंस के वरिष्ठ अधिकारियों, खासकर डीजीपी विजिलेंस के रीडर ओपी राणा का करीबी बताते हुए मामला निपटाने का भरोसा दिया था। जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों को पंजाब पुलिस की ओर से सुरक्षाकर्मी उपलब्ध करवाए गए थे। एके-47 से लैस सुरक्षाकर्मियों की तैनाती और उनकी भूमिका की भी जांच की जा रही है। सीबीआई अब पूरे नेटवर्क और इसमें शामिल अन्य लोगों की भूमिका खंगाल रही है।  

पटना का कुख्यात गैंगस्टर भोला सिंह गिरफ्तार, फर्जी पहचान से रह रहा था गुजरात में

पटना  बिहार के मोस्ट वांटेड क्रिमिनल भोला सिंह को CBI की टीम ने गुजरात से दबोच लिया है। सूरत से गिरफ्तार भोला सिंह पटना जिले के पंडारक का रहने वाला है। वो अपना नाम बदल कर सूरत में रह रहा था। उसकी गिरफ्तारी अपहरण के 12 साल पुराने मामले में हुई है। बिहार का वांटेड भोला सिंह गिरफ्तार भोला सिंह को बिहार अलग-अलग थानों की पुलिस भी ढूंढ रही थी। उस पर इन थानों में 11 केस दर्ज हैं। भोला सिंह किडनैपिंग, मर्डर समेत कई बडे़ अपराधों का आरोपी है। बिहार पुलिस अब भोला सिंह को रिमांड पर लेने की तैयारी में है। उधर सीबीआई के अनुसार कोलकाता के दो लोग 14 जुलाई 2014 को ही गायब हुए थे। पुलिस जांच के बाद कोलकाता हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद CBI ने इस केस में भोला सिंह के खिलाफ FIR दर्ज की थी। 11 साल से फरार भोला को CBI ने दबोचा भोला सिंह इस केस में 11 साल से फरार था। 2015 में सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की थी और तभी से भोला सिंह अंडरग्राउंड हो गया था। भोला सिंह ने सूरत में अमित शर्मा के नाम से फर्जी आईडी बनवा ली थी और सूरत जाकर भूमिगत हो गया था। सीबीआई ने इसी बीच टेक्निकल सर्विलांस के साथ मुखबिरों का जाल बिछाया तो उसके ठिकाने का पता चल गया। इसके बाद ट्रैप लगाकर उसे गिरफ्तार कर लिया गया। सीबीआई के गिरफ्तार किए जाने के बाद भोला सिंह को कोलकाता पुलिस ने पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया है।     कभी मोकामा विधायक अनंत सिंह के लिए काम करता था भोला सिंह     अनंत सिंह के साथ NTPC में भोला सिंह करता था ठेकेदारी     15 साल पहले अनंत सिंह से हुआ विवाद तो हो गया अलग     बाद में भोला के भाई मुकेश ने अनंत सिंह के साथ कर ली थी सुलह CRPF कमांडो की ट्रेनिंग ले रखी है भोला ने पटना जिले से सटे पंडारक का रहने वाला भोला सिंह CRPF में भी भर्ती हुआ था और कमांडो की ट्रेनिंग भी ली थी। इसके बाद एक बाहुबली के साथ भोला सिंह ने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया। कई बड़ी वारदातों को अंजाम देने के बाद भोला सिंह फरार हो गया था। उस वक्त पुलिस ने भोला और उसके भाई मुकेश पर 3 लाख रुपयों का इनाम भी रखा था। बाद में मुकेश सिंह ने आत्मसमर्पण कर बेल ले ली थी। 3 लेयर सिक्योरिटी में रहता था गैंगस्टर भोला सिंह गैंगस्टर भोला सिंह अपनी सुरक्षा को लेकर भी हद से ज्यादा सतर्क रहता था। उसने अपने लिए 3 लेयर सिक्योरिटी बनाई थी, जिसमें कुख्यात शूटर उसकी सुरक्षा करते थे। भोला सिंह ने साल 2008 में अनंत सिंह के रिश्तेदार विवेका पहलवान के भाई कॉन्ट्रैक्टर संजय सिंह की हत्या की थी। 2010 में उसकी दुश्मनी उसी बाहुबली के साथ हो गई, जिसके साथ उसने काम शुरू किया था। तब 2 करोड़ रुपयों के विवाद में भोला बाहुबली के खिलाफ हो गया था। पटना में ही 2013 में उसने खुलेआम कुख्यात राजीव सिंह को गोलियों से भून मौत के घाट उतार दिया था

बिल्डरों पर शिकंज,CBI की 77 ठिकानों पर देशभर में छापेमारी

फरीदाबाद फरीदाबाद में एक मशहूर रियल एस्टेट कंपनी समेत कई रियल एस्टेट कंपनियों के दफ्तरों पर मंगलवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने जांच की. सूत्रों के अनुसार, दिल्ली से आई CBI की 4 सदस्यीय टीम सुबह करीब 7 बजे दफ्तर पहुंची, और करीब 10 घंटे तक वहां मौजूद बैंक से जुड़े दस्तावेजों की जांच करती रही. जांच के दौरान CBI अधिकारियों ने बिल्डर द्वारा खरीदारों को बेचे गए घरों से जुड़े दस्तावेजों और कागजातों की भी पड़ताल की. वित्तीय लेनदेन में अनियमितता की जांच अधिकारियों ने इन कागजों के माध्यम से यह समझने की कोशिश की कि घरों की बिक्री और उनसे जुड़े वित्तीय लेनदेन में किसी प्रकार की अनियमितता तो नहीं हुई है.  बताया जा रहा है कि जांच के दौरान कंपनी के कर्मचारियों ने अधिकारियों के साथ पूरा सहयोग किया, और मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए.  शाम करीब 4 से 5 बजे के बीच जांच की प्रक्रिया समाप्त हुई, जिसके बाद CBI की टीम जरूरी दस्तावेज लेकर दिल्ली लौट गई. 77 ठिकानों पर छापेमारी दरअसल यह कार्रवाई देशभर में चल रही एक बड़ी जांच का हिस्सा है.  CBI ने बिल्डरों और वित्तीय संस्थानों के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से जुड़े मामलों में 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 77 स्थानों पर एक साथ छापेमारी की है.  CBI ने मंगलवार को एक प्रेस नोट जारी कर इस पूरी कार्रवाई की जानकारी दी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई CBI की यह कार्रवाई भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर की जा रही जांच के तहत की गई है. एजेंसी ने विभिन्न बिल्डरों के खिलाफ 22 नए मामले दर्ज किए हैं. आरोप है कि कुछ बिल्डरों और वित्तीय संस्थानों के अधिकारियों ने मिलीभगत कर घर खरीदने वाले लोगों के साथ धोखाधड़ी की और उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया. CBI ने बताया कि इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर 28 मामले दर्ज किए गए थे, जिनकी जांच लगभग पूरी होने वाली है. इन 22 नए मामलों के साथ अब तक कुल 50 मामले दर्ज हो चुके हैं.

ठाकुर दिलीप सिंह पर भगोड़ा नोटिस, CBI कोर्ट से 8 अप्रैल तक का समय; भैणी साहिब गद्दी विवाद और मर्डर केस में शामिल

लुधियाना  नामधारी संप्रदाय के सतगुरु जगजीत सिंह की मौत के बाद उत्तराधिकार विवाद में ठाकुर दिलीप सिंह अब फंसते नजर आ रहे हैं। सीबीआई स्पेशल कोर्ट मोहाली ने ठाकुर दिलीप सिंह को भगोड़ा (PO) घोषित करने के लिए पब्लिक नोटिस जारी कर दिया है। यह आदेश 9 साल से चल रही जांच और आरोपी के लगातार गायब रहने के बाद आया है। कोर्ट ने ठाकुर दिलीप सिंह के पीओ घोषित करने के लिए बाकायदा पब्लिक नोटिस भी पब्लिश करवा दिए हैं। आरोपी को 8 अप्रैल तक कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं। अगर ठाकुर दिलीप सिंह कोर्ट में तय तिथि तक पेश नहीं हुए तो उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया जाएगा। ठाकुर दिलीप सिंह के खिलाफ तीन अलग-अलग थानों में केस दर्ज थे। माता चंद कौर की हत्या, सतगुरु उदय सिंह व माता चंद कौर के दामाद जगतार सिंह पर हमले की साजिश और नामधारी अवतार सिंह की हत्या में ठाकुर दिलीप सिंह का नाम आया। 2017 में ये तीनों मामले मर्ज करके सीबीआई को भेज दिए गए। सीबीआई ने चंडीगढ़ में मामला दर्ज करके इसकी जांच शुरू की, लेकिन ठाकुर दिलीप सिंह इस मामले में कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए। जिसकी वजह से कोर्ट ने पीओ नोटिस जारी किया है। भगोड़ा घोषित हुए तो CBI और पुलिस दिलीप सिंह की संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेड कॉर्नर नोटिस के जरिए उनकी तलाश तेज की जाएगी। ठाकुर दिलीप सिंह कौन हैं? ठाकुर दिलीप सिंह नामधारी संप्रदाय के दिवंगत सतगुरु जगजीत सिंह के बड़े भतीजे हैं। 5 अगस्त 1953 को भैणी साहिब (लुधियाना) में महाराज बीर सिंह के घर जन्मे दिलीप सिंह सिरसा स्थित अपने डेरे से नामधारी संगत के एक हिस्से का नेतृत्व करते हैं। 2012 में सतगुरु जगजीत सिंह की मौत के बाद उत्तराधिकार का विवाद भड़का। माता चंद कौर ने छोटे भाई उदय सिंह का समर्थन किया, जबकि दिलीप सिंह खुद गद्दी पर दावा कर रहे थे। इस विवाद ने संप्रदाय को दो गुटों में बांट दिया। श्री भैणी साहिब में उत्तराधिकार को लेकर उपजे विवाद में सीबीआई की जांच…     2012 में सतगुरु जगजीत सिंह की मौत: 2012 में श्री भैणी साहिब के प्रमुख सतगुरु जगजीत सिंह की मौत हुई। मौत से पहले उन्होंने सार्वजनिक तौर पर किसी को उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया। उनकी मौत के साथ ही उत्तराधिकार विवाद शुरू हुआ। ठाकुर उदय सिंह व ठाकुर दिलीप सिंह दावेदार थे।     सतगुरु उदय सिंह बने प्रमुख: ठाकुर उदय सिंह को श्री भैणी साहिब में नामधारी संप्रदाय की कमान सौंपी गई। उन्हें सतगुरु जगजीत सिंह की जगह सतगुरु बनाया गया। वहीं से ठाकुर दिलीप सिंह ने इस फैसले का विरोध करना शुरू किया।     जालंधर में टिफिन बम ब्लास्ट की साजिश: CBI जांच के अनासार ठाकुर दिलीप सिंह पर दिसंबर 2015 में एक खौफनाक आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप है। साजिश यह थी कि जालंधर के फेमस 'हरिबल्लभ संगीत सम्मेलन' (25 दिसंबर 2015) के दौरान नामधारी संप्रदाय के वर्तमान प्रमुख सतगुरु उदय सिंह और माता चंद कौर के दामाद जगतार सिंह को टिफिन बम धमाके में मार दिया जाए। जांच एजेंसी का दावा है कि इस हमले का मास्टरमाइंड दिलीप सिंह ही थे। इस मामले की एफआईआर जालंधर में दर्ज की गई।     माता चंद कौर हत्याकांड: यह संप्रदाय के इतिहास का सबसे हाई-प्रोफाइल मर्डर केस रहा। 4 अप्रैल 2016 को नामधारी संप्रदाय के मुख्यालय भैणी साहिब (लुधियाना) के भीतर माता चंद कौर की दो अज्ञात हमलावरों ने गोलियां मारकर हत्या कर दी थी। माता चंद कौर ने ठाकुर उदय सिंह को सतगुरु बनाने की घोषणा की थी, जिससे ठाकुर दिलीप सिंह गुट नाराज था। इस मामले की एफआईआर थाना कुमकलां लुधियााना में दर्ज की गई।     नामधारी अवतार सिंह की हत्या: माता चंद कौर की हत्या के बाद नामधारी समुदाय के अवतार सिंह की हत्या अज्ञात हमलावरों ने 2017 में की। इस हत्या में भी ठाकुर दिलीप सिंह का नाम सामने आया। इस मामले की एफआईआर साहनेवाल थाने में दर्ज की गई।     पुलिस जांच नहीं कर पाई तो सीबीआई को दिया केस: पुलिस जब इन तीनों मामलों को हल नहीं कर पाई तो राज्य सरकार ने इसे सीबीआई जांच के लिए भेज दिया। तीनों केस नामधारी समुदाय से संबंधित थे और उनका कनेक्शन दिलीप सिंह से बताया। सीबीआई ने तीनों केसों को मर्ज करके 2017 में एक नई एफआईआर दर्ज की और उसके बाद जांच शुरू की। जांच के बाद सीबीआई ने कई अहम खुलासे किए। सीबीआई जांच में यह बात सामने आई कि इन घटनाओं से सतगुरु उदय सिंह व उनके समर्थकों को डराना था।     मामले में निकाल थाइलैंड कनेक्शन: पंजाब पुलिस ने अमृतसर के पास से कुछ संदिग्धों को गिरफ्तार किया था, जिन्होंने कबूला कि उन्हें सिरसा गुट (दिलीप सिंह) से निर्देश मिले थे। बाद में CBI ने इस साजिश की अंतरराष्ट्रीय कड़ियों (थाइलैंड कनेक्शन) की जांच शुरू की।     ड्राइवर की गिरफ्तारी से खुला था राज: इस मामले में दिलीप सिंह का पूर्व ड्राइवर पलविंदर सिंह उर्फ डिंपल मुख्य कड़ी साबित हुआ। डिंपल को साल 2018 में बैंकॉक (थाइलैंड) से गिरफ्तार कर भारत लाया गया था। उसके बयानों के आधार पर ही साजिश की कड़ियां जुड़ीं। अन्य आरोपियों में जगमोहन सिंह, हरदीप सिंह और हरभेज सिंह शामिल हैं।