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मेवात पहुंचेंगे CJI सूर्यकांत, खाप 360 के प्रधान करेंगे स्वागत, कार्यक्रम को लेकर उत्साह

मेवात. आगामी 12 जुलाई को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के दौरे को लेकर क्षेत्र के लोगों में भारी उत्साह है। पहली बार मेवात की ऐतिहासिक भूमि पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। कार्यक्रम के दौरान सीजेआई सूर्यकांत के आगमन पर 360 खाप के प्रधान महेंद्र सिंह ठाकरान और 84 खाप के प्रधान शिवदत्त सहरावत क्षेत्र के प्रबुद्ध लोगों के साथ उनका भव्य स्वागत करेंगे। विभिन्न समितियों का गठन किया गया दोनों खापों के प्रतिनिधियों ने बताया कि क्षेत्र के लोगों में कार्यक्रम को लेकर उत्साह का माहौल है। स्वागत की तैयारियों के लिए जिला प्रशासन तो तैयारियों में जुटा ही है। साथ ही विभिन्न समितियों का गठन किया गया है और कार्यक्रम स्थल पर व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और गणमान्य लोगों के शामिल होने की संभावना है। समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिल रहा 360 के प्रधान महेंद्र सिंह ठाकरान ने कहा कि सीजेआई सूर्यकांत के स्वागत के लिए सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। वहीं, तावड़ू 84 प्रधान शिवदत्त सहरावत ने बताया कि कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिल रहा है।

पूर्व सिविल जज केस की सुनवाई में CJI सूर्यकांत का सख्त रुख, अदालत में वकीलों को लगाई फटकार

चंडीगढ़   सुप्रीम कोर्ट में एक अनोखे मामले की सुनवाई के दौरान CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने काफी अहम और सख्‍त टिप्‍पणी की है. CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि 3 से 4 तथाकथित सीनियर वकील माहौल खराब कर रहे हैं. साथ ही उन्‍होंने कहा कि इस मामले पर वे खुद नजर रखे हुए हैं. यह मामला एक पूर्व सिविल जज से जुड़ा है. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की 4 बेंच इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर चुकी है. अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है, जहां CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने इसपर सुनवाई की. शीर्ष अदालत ने पंजाब-हर‍ियाणा हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस को मामले की सुनवाई करने के लिए तत्‍काल दो जजों की खंडपीठ गठित करने का निर्देश दिया है।  पूर्व सिविल जज अमरीश कुमार जैन की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट को उनकी याचिका की सुनवाई के लिए नया डिवीजन बेंच गठित करने का निर्देश दिया है. यह मामला उस समय शीर्ष अदालत पहुंचा जब हाईकोर्ट की चार अलग-अलग पीठ ने इस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई में अब और देरी नहीं होनी चाहिए और इसे जुलाई 2026 के दूसरे सप्ताह में अंतिम रूप से सुना जाए. भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बुधवार को सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि वे दो जजों वाली एक पीठ का गठन करें, जो अमरीश कुमार जैन की याचिका पर सुनवाई करे. अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित जजों को सलाह दी जाए कि किसी भी परिस्थिति में वे मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग न करें।  हाईकोर्ट के रजिस्‍ट्रार को रिपोर्ट देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई प्रतिदिन के आधार पर की जाए और 13 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में इसे अंतिम रूप से सुना जाए. साथ ही हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद अनुपालन रिपोर्ट सर्वोच्च अदालत में प्रस्तुत करने को कहा गया है. सुनवाई के दौरान अमरीश कुमार जैन अपने वकील अभय प्रताप सिंह के साथ अदालत में उपस्थित हुए. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने उनसे उन जजों के नाम पूछे जिन्होंने मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया था. इस पर जैन ने बताया कि सबसे पहले जस्टिस लिसा गिल ने खुद को अलग किया, इसके बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने फैसला 6 महीने तक सुरक्षित रखने के बाद मामले से दूरी बना ली. बाद में जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा तथा जस्टिस दीपक सिब्बल की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. जैन ने अदालत को यह भी बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में अपने पेंशन संबंधी लाभ जारी करने के लिए आवेदन दिया था, ताकि वह अपने बेटे की एलएलबी की अंतिम वर्ष की फीस जमा कर सकें, लेकिन उनकी यह मांग भी स्वीकार नहीं की गई।  CJI की सीनियर वकीलों पर सख्‍त टिप्‍पणी CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वे खुद मामले की निगरानी करेंगे और हाईकोर्ट को पीठ गठित करने का निर्देश देंगे. उन्होंने जैन को चेतावनी भी दी कि यदि वह किसी प्रकार की अनुचित गतिविधि या शरारत करने की कोशिश करेंगे तो उसके गंभीर परिणाम होंगे. अदालत ने कहा कि मामले का निष्पक्ष और समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाएगा. ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, CJI ने यह भी टिप्पणी की कि जैन को अपना पक्ष स्वयं रखना चाहिए. उन्होंने संकेत दिया कि कुछ वरिष्ठ वकील जजों के बार-बार खुद को अलग करने जैसी परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं. CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वह ऐसे मामलों पर करीबी नजर रखे हुए हैं और कुछ तथाकथित वरिष्ठ वकील न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं. इस पर जैन ने कहा कि वह पहले भी दो पीठों के समक्ष स्वयं बहस कर चुके हैं और आगे भी खुद अपना पक्ष रखने के लिए तैयार हैं।  दो दशक पुराना मामला अमरीश कुमार जैन ने नवंबर 2005 में पंजाब ज्‍यूडिशियल सर्विसेज में प्रवेश किया था और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर कार्यरत थे. वर्ष 2009 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की प्रशासनिक सिफारिशों के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. जैन ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि वर्ष 2007 में जालंधर के तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश उनके प्रति पूर्वाग्रह रखते थे और इसी कारण उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की गईं. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अक्टूबर 2018 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया था. अदालत ने उन्हें वरिष्ठता, सेवा की निरंतरता, वेतनवृद्धि और प्रमोशन जैसे सभी लाभ देने का निर्देश दिया था, हालांकि बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया गया था।  दोबारा टर्मिनेशन हाईकोर्ट के इस फैसले को जनवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था. इसके बाद मार्च 2019 में जैन को फिर से सेवा में बहाल कर दिया गया. हालांकि, मार्च 2022 में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक पक्ष से एक बार फिर उनकी सेवा समाप्त करने की सिफारिश की और 18 अप्रैल 2022 को उन्हें दोबारा पद से हटा दिया गया. जैन का कहना है कि इस कार्रवाई से न केवल उनका रोजगार छिन गया बल्कि वे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से भी वंचित हो गए. अब इस पूरे विवाद की सुनवाई नए सिरे से हाईकोर्ट की विशेष पीठ के समक्ष होगी, जिसकी निगरानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट करेगा। 

साइबर क्राइम पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, CJI सूर्यकांत बोले- समाज को नुकसान पहुंचाते हैं ऐसे अपराधी

नई दिल्ली भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साइबर धोखाधड़ी के मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए एक आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि साइबर अपराधी “परजीवी” की तरह होते हैं, जो लोगों की मेहनत की कमाई ठगकर समाज को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं. CJI ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसे अपराधियों के प्रति नरमी नहीं बरती जानी चाहिए और समाज के हित में इन्हें जेल में रखना ही बेहतर है।  साइबर अपराध का नेटवर्क देशभर में फैला हुआ :  CJI सूर्यकांत उन्होंने यह भी कहा कि साइबर अपराध का नेटवर्क देशभर में फैला हुआ है. आरोपी एक राज्य में ठगी करते हैं और फिर दूसरे राज्यों में जाकर अपनी गतिविधियां जारी रखते हैं, जिससे इन अपराधों पर नियंत्रण पाना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे संगठित अपराध से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने जरूरी हैं।  बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ‘डिजिटल अरेस्ट' और साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों का स्वतः संज्ञान लिया था. यह कदम अंबाला के एक बुजुर्ग दंपत्ति द्वारा लिखे गए पत्र के बाद उठाया गया, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुई ठगी की घटना का हवाला दिया था. इस घटना में उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी चली गई थी।  इससे पहले शीर्ष अदालत ने जांच एजेंसी CBI को देशभर में डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में कार्रवाई करने की खुली छूट दी थी और केंद्र व राज्य सरकारों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए सख्त दिशा-निर्देश भी जारी किए थे। 

UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, CJI सूर्यकांत बोले—‘सीमा पार कर रही हैं ऐसी याचिकाएं’

नई दिल्ली UGC यानी विश्विद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में फिर याचिका दाखिल हुई है। बुधवार को इस याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि याचिका मीडिया में पब्लिसिटी हासिल करने के मकसद से की गई है। उन्होंने पूछा कि इस याचिका में अन्य याचिकाओं से अलग क्या है। एडवोकेट ने कहा, 'मेरा आधार यह है कि नियमों को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बनाया गया है।' हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इक्विटी रेगुलेशंस के खिलाफ किसी ने शीर्ष न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इसपर सीजेआई ने कहा कि इसके जरिए मीडिया में चर्चा में आने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, 'यह जनहित याचिका (PIL) क्यों? अब यह हद से ज्यादा हो रहा है। यह सब केवल बाहर मीडिया को संबोधित करने के लालच में किया जा रहा है। वरना आप यूट्यूब पर कैसे आएंगे! इस याचिका में ऐसा क्या अलग है जो दूसरी याचिकाओं में नहीं था?' जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक सुप्रीम कोर्ट ने नियमों पर जनवरी में रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा कि यह प्रारूप 'प्रथम दृष्टया अस्पष्ट' है, इसके 'बहुत व्यापक परिणाम' हो सकते हैं और इसका प्रभाव 'खतरनाक रूप से' समाज को विभाजित करने वाला भी हो सकता है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा था कि विनियमों में 'कुछ अस्पष्टताएं' हैं और 'इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।' दरअसल, नियमों को लेकर दलीलें दी गईं थीं कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की 'गैर-समावेशी' परिभाषा अपनाई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है। इन नियमों के खिलाफ देश में कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें छात्र समूहों और संगठनों ने इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की। इन याचिकाओं में इस विनियम को इस आधार पर चुनौती दी गई कि जाति-आधारित भेदभाव को सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में ही परिभाषित किया गया है। क्या हैं नियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 में यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से तथा दिव्यांग एवं महिला सदस्य शामिल होने चाहिए।  

कोर्ट में बढ़ी तल्खी: अडानी-अंबानी का नाम लेते ही CJI सूर्यकांत ने वकील को चेताया

नई दिल्ली भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान नाराज हो गए। खबर है कि इसकी वजह वकील की तरफ से पेश की गई दलील थी, जिसमें उन्होंने अदालत पर सुनवाई नहीं करने के आरोप लगाए थे। नौबत यहां तक आ गई कि सीजेआई ने वकील को दो टूक कह दिया कि वह अदालत में पेश होने और सामग्री पेश करने के दौरान सावधान रहें। वाकया सोमवार का है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दौर चल रहा था। उस दौरान एडवोकेट मैथ्यूज नेदुम्पारा की बात पर सीजेआई ने आपत्ति जताई थी। लाइव लॉ के अनुसार, एडवोकेट नेदुम्पारा ने कहा अडानी और अंबानी के लिए बेंच बन रहीं हैं, लेकिन NJAC की चुनौती पर सुनवाई नहीं हो रही है। इतना कहते ही सीजेआई ने उन्हें जमकर फटकार लगाई और चेतावनी भी दे दी। सीजेआई ने कहा, 'मिस्टर नेदुम्पारा, आप जो भी मेरी कोर्ट में पेश कर रहे हैं, उसे लेकर जरा सावधान रहें। आपने मुझे चंडीगढ़ में देखा है, दिल्ली में देखा है…। मैं आपको चेतावनी दे रहा हूं, सावधान रहें। ऐसा बिल्कुल भी मत सोचिएगा कि आप जिस तरह की बदतमीजी कर रहे हैं, वैसा ही करते रहेंगे। मैं आपको चेतावनी दे रहा हूं।' इससे पहले एक जनहित याचिका पर जताई थी आपत्ति बीते गुरुवार को सीजेआई एक जनहित याचिका देखकर भी नाराज हुए थे। उन्होंने कहा था, 'अगर भारत के शीर्ष न्यायालय के सामने याचिकाओं का ऐसा स्तर है, तो भगवान याचिका के कानून को बचाए।' साथ ही उन्होंने इसपर सुनवाई करने से भी इनकार कर दिया था। इससे पहले वह वकीलों की तरफ से AI यानी आर्टिफिशिलय इंटेलिजेंस की मदद से याचिकाएं लिखने पर भी नाराज हो गए थे। आज इन मामलों पर होगी सुनवाई सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई होनी है। कोर्ट दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति पर विचार करेगा। इसके साथ ही, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर भी सुनवाई की जाएगी। एक अन्य प्रमुख मामले में, अदालत मेटा और व्हाट्सएप की उन याचिकाओं पर गौर करेगी जिसमें भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा उनकी गोपनीयता नीति के कारण लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को चुनौती दी गई है।  

साजिश पर CJI सूर्यकांत की कड़ी चेतावनी, जयराम को लगाई फटकार

नई दिल्ली  राज्यसभा सांसद जयराम रमेश की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कांग्रेस सांसद जयराम रमेश पर नाराजगी जताते हुए फटकार लगाई. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें. हम इसके पीछे की साजिश जानते हैं. सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत की तल्खी देखते हुए कांग्रेस सांसद और पूर्व मंत्री जयराम रमेश की तरफ से याचिका वापस ले ली गई. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी गुरुवार 12 फरवरी को कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश की एक्स-पोस्ट फैक्टो एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस (EC) दिए जाने के खिलाफ दायर की गई रिट पिटीशन पर सुनवाई की. याचिका देखते ही सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया. इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने जयराम रमेश से टफ सवाल पूछे. यहां एक्स-पोस्ट फैक्टो एनवायरमेंट क्लीयरेंस (कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी) उन परियोजनाओं को दी जाने वाली मंजूरी है, जो बिना पहले से अनिवार्य पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) लिए शुरू हो चुकी हैं. सीजेआई ने पूछा तीखा सवाल सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत (CJI) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने वनशक्ति रिव्यू जजमेंट में एक्स-पोस्ट फैक्टो EC पर यूनियन के ऑफिस मेमोरेंडम को मंजूरी दी है तो रिट पिटीशन कैसे फाइल की जा सकती है? इस सवाल के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद और पूर्व मंत्री जयराम रमेश पर नाराजगी जताई. इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माना लगाने की धमकी भी दी. SC की जयराम रमेश को फटकार जयराम रमेश से नाराजगी जताते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘आप एक जिम्मेदार नेता हैं. अगर यह गलत साबित हुआ तो इसकी भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें. हम इसके पीछे की साजिश जानते हैं.’ दरअसल, जयराम रमेश ने केंद्र द्वारा जारी उस कार्यालय ज्ञापन को चुनौती दी है. इसमें पर्यावरण संबंधी पूर्वव्यापी मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने का प्रावधान है. सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ, सीजेआई ने और क्या-क्या कहा?     सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कार्यालय ज्ञापन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए है, इसलिए चुनौती फैसले को दी गई है.     सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्या कोई रिट याचिका के जरिए फैसले को चुनौती दे सकता है? यह तो सिर्फ मीडिया के लिए है.     जब सुप्रीम कोर्ट ने भारी जुर्माने की चेतावनी दी तो कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली.  

सुखना झील पर सख्त टिप्पणी: ‘अब और कितना नुकसान?’ बीच सुनवाई में क्यों नाराज़ हुए CJI सूर्यकांत

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज (बुधवार, 21 जनवरी को) अरावली पहाड़ियों से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान पीठ ने अवैध निर्माण का मुद्दा उठाते हुए चंडीगढ़ की मशहूर सुखना झील के सूखने पर चिंता जताई। हरियाणा सरकार को पिछली गलतियों को न दोहराने की चेतावनी देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अधिकारियों और बिल्डर माफिया की मिलीभगत के कारण सुखना झील "पूरी तरह से खराब" हो चुकी है। पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल हैं।   बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान CJI ने कहा, "राज्य के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से बिल्डर माफिया काम कर रहा है… आप सुखना झील को कितना सुखाओगे? आपने झील को तो पूरी तरह से खराब कर दिया है।" दरअसल, बारिश के पानी पर निर्भर सुखना झील कभी चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटन केंद्र हुआ करती थी, लेकिन बीते वर्षों में लगातार गिरते जलस्तर ने इसकी सुंदरता और अस्तित्व दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अरावली पहाड़ियों से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान आई। नई परिभाषा को लेकर देशभर में विरोध के बाद, अदालत ने पिछले वर्ष अपने आदेश पर रोक लगाते हुए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, ताकि इस मुद्दे की विस्तृत जांच की जा सके। इससे पहले केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिभाषा को अदालत ने स्वीकार कर लिया था, जिसमें कहा गया था कि 100 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली पहाड़ियां’ माना जाएगा और 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां, उनके बीच की जमीन सहित पहाड़ियों को ‘अरावली रेंज’ माना जाएगा। बता दें कि अरावली पर्वतमाला हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। ‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषा अलग सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर से कहा कि वे सभी पक्षों और हितधारकों के सुझावों को शामिल करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत नोट दाखिल करें। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगामी आदेश में ‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषाओं को अलग-अलग रखा जाएगा। अदालत ने कहा, “वन की परिभाषा को अलग से और व्यापक दृष्टि से देखा जाएगा, जबकि अरावली का मुद्दा अपेक्षाकृत संकीर्ण रहेगा।” अवैध खनन पर सख्ती इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि राज्य में चल रहे अवैध खनन को तुरंत प्रभाव से रोका जाए। पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी एक बार फिर यह संकेत देती है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और अवैध गतिविधियों पर अदालत किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।  

‘पायजामा टिप्पणी’ को लेकर सीजेआई सूर्यकांत ने जताई कड़ी नाराजगी

नई दिल्ली देश की सर्वोच्च अदालत ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों द्वारा की जाने वाली टिप्पणियों और फैसले लिखने के तरीके पर एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले पर, जिसमें कहा गया था कि ‘पायजामा का नाड़ा तोड़ना और स्तनों को पकड़ना रेप के प्रयास के आरोप के लिए पर्याप्त नहीं है,’ सीजेआई सूर्य कांत ने बेहद सख्त टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अदालतों को, विशेषकर उच्च न्यायालयों को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से हर हाल में बचना चाहिए. शीर्ष अदालत ने न केवल उस फैसले को खारिज किया, बल्कि यह भी संकेत दिया कि वह अब देश भर की अदालतों के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी करेगी ताकि भविष्य में किसी भी पीड़ित की गरिमा को न्यायिक आदेशों में ठेस न पहुंचे. संवेदनशीलता की कमी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए गहरी चिंता व्यक्त की. कोर्ट ने माना कि जिस तरह से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी के कृत्यों को तकनीकी आधार पर “कम गंभीर” बताया, वह न्यायिक औचित्य के खिलाफ है. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, हम व्यापक दिशानिर्देश जारी करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्यायिक प्रक्रिया में कुछ हद तक संवेदनशीलता बनी रहे. अदालतों को, और खास तौर पर हाईकोर्ट्स को ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से बचना चाहिए जो समाज में गलत संदेश देती हों और पीड़ित के दर्द को कम करके आंकती हों. यह मामला केवल एक फैसले को पलटने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक नजीर (Precedent) बनाने का फैसला किया है. कोर्ट का मानना है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में अगर जज शारीरिक संपर्क की बारीकियों को लेकर असंवेदनशील व्याख्या करेंगे, तो इसका सीधा असर न्याय प्रणाली पर जनता के भरोसे पर पड़ेगा. क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित फैसला? इस पूरे विवाद की जड़ इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला था, जिसने कानूनी जगत और समाज दोनों को हैरान कर दिया था. एक मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) के तहत लगे आरोपों को हटा दिया था. हाईकोर्ट ने अपने तर्क में कहा था कि यद्यपि आरोपी ने पीड़िता के स्तनों को पकड़ा और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ा, लेकिन उसने शारीरिक संबंध बनाने का कोई और प्रयास नहीं किया.” इस आधार पर हाईकोर्ट ने इसे रेप का प्रयास न मानते हुए केवल ‘छेड़छाड़’ या महिला की गरिमा भंग करने का मामला माना था. हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने बेहद आपत्तिजनक माना. शीर्ष अदालत ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया था, जो यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को कितना गंभीर मानता है. पीड़ित ऐसी स्थिति से समझौता नहीं कर पाएंगे सुनवाई के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब जस्टिस सूर्य कांत ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि अगर अदालतें इस तरह का दृष्टिकोण अपनाएंगी, तो पीड़ित न्याय की उम्मीद कैसे करेंगे? उन्होंने टिप्पणी की, पीड़ित ऐसी स्थिति से समझौता नहीं कर पाएंगे. इसका अर्थ स्पष्ट था, जब एक महिला यौन हिंसा का सामना करती है, तो वह न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक आघात से भी गुजरती है. ऐसे में अगर अदालत यह कहे कि ‘नाड़ा तोड़ना’ रेप की कोशिश नहीं है क्योंकि आरोपी आगे नहीं बढ़ा, तो यह उस मानसिक आघात को नकारने जैसा है जो पीड़िता ने उस क्षण में महसूस किया होगा. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अपराध की गंभीरता को केवल शारीरिक क्रिया की पूर्णता से नहीं, बल्कि आरोपी के इरादे (Intent) और पीड़िता पर पड़े प्रभाव से मापा जाना चाहिए. दिशानिर्देश बनाने का सही समय सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर स्पष्ट गाइडलाइन्स बनाई जाएं. कोर्ट ने कहा, दिशानिर्देश बनाने का यही सही समय है, नहीं तो इसका पीड़ितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. अक्सर देखा गया है कि निचली अदालतें और कई बार हाईकोर्ट्स भी यौन अपराधों के फैसलों में ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाती है या जो तकनीकी रूप से इतनी रूखी होती है कि उसमें मानवीय संवेदना खो जाती है. सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य अब एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करना है जो जजों को बताए कि संवेदनशील मामलों में फैसले लिखते समय किन शब्दों का चयन करना है और किन तर्कों से बचना है.

गांव से शिखर तक: जानिए कैसे CJI सूर्यकांत बने देश के 53वें चीफ जस्टिस

हिसार   जस्टिस सूर्यकांत आज, सोमवार को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली । राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह ऐतिहासिक होने जा रहा है। पहली बार किसी सीजेआई के शपथ ग्रहण में 7 देशों के मुख्य न्यायाधीशों की मौजूदगी दर्ज रही । इस कार्यक्रम में ब्राजील, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, भूटान, श्रीलंका और नेपाल के सीजेआई अपने प्रतिनिधिमंडलों के साथ हिस्सा लिया  । सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज भी मौजूद रहें। मौजूदा सीजेआई बीआर गवई का कार्यकाल 23 नवंबर को ही समाप्त हो चुका है। इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत सर्वोच्च न्यायालय का दायित्व संभालेंगे। उनका कार्यकाल 9 फरवरी, 2027 तक रहेगा। कौन हैं जस्टिस सूर्यकांत? जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा में हिसार के पेटवाड़ गांव में हुआ। उनका शुरुआती जीवन एक सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता। हिसार से ग्रेजुएशन (1981) के बाद उन्होंने 1984 में रोहतक से LLB और 2011 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से LLM किया। उनका कानूनी करियर 1984 में हिसार की जिला अदालत से शुरू हुआ। 1985 में वे चंडीगढ़ चले गए और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। जस्टिस सूर्यकांत का करियर 2000: हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल नियुक्त 2001: सीनियर एडवोकेट 2004: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जज 2018: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस 2019: सुप्रीम कोर्ट के जज 2024: सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन 2025: भारत के 53वें CJI जस्टिस सूर्यकांत के अहम फैसले अपने करियर में जस्टिस सूर्यकांत कई संवैधानिक और प्रशासनिक मामलों में अहम बेंचों का हिस्सा रहे। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में वे 1000 से अधिक फैसलों में शामिल रहे। इसमें आर्टिकल 370 पर ऐतिहासिक फैसला (2023) भी शामिल है। वे उस संविधान पीठ में शामिल थे, जिसने केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटाने के फैसले को बरकरार रखा। डेरा हिंसा मामला (2017) में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की फुल बेंच में शामिल रहते हुए, उन्होंने गुरमीत राम रहीम को सजा मिलने के बाद हुई हिंसा के मद्देनजर डेरा सच्चा सौदा को पूरी तरह साफ करने का आदेश दिया। उन्होंने उस फैसले में हिस्सा लिया जिसमें देशद्रोह कानून (IPC 124A) के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई और समीक्षा तक नई FIR दर्ज न करने के निर्देश दिए गए। इसके अलावा बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण, AMU अल्पसंख्यक दर्जा मामला, पेगासस स्पाइवेयर जांच और बिहार SIR मामले में भी उनकी अहम भूमिका रही।