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CJI गवई ने न्यायपालिका में बढ़ाई सामाजिक हिस्सेदारी, जानिए कितने OBC–SC जजों की हुई नियुक्ति

नई दिल्ली  प्रधान न्यायाधीश (CJI) के रूप में न्यायमूर्ति बीआर गवई के लगभग छह महीने के कार्यकाल के दौरान देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के 10 न्यायाधीशों, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और पिछड़ा वर्ग के 11 जजों की नियुक्ति की गई। न्यायमूर्ति गवई देश के पहले बौद्ध और दूसरे दलित प्रधान न्यायाधीश हैं। उन्होंने उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम का नेतृत्व किया, जिसने विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए सरकार को 129 नामों की सिफारिश की, जिनमें से 93 नामों को मंजूरी दी गई।   न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल के दौरान पांच न्यायाधीशों-न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया, न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल मनुभाई पंचोली की भी शीर्ष अदालत में नियुक्ति हुई। उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर 14 मई से लेकर अब तक अपलोड किए गए न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी विवरण के मुताबिक, जब न्यायमूर्ति गवई भारत के प्रधान न्यायाधीश बने, उसके बाद सरकार की ओर से उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए मंजूर किए गए 93 नामों में अल्पसंख्यक समुदायों के 13 न्यायाधीशों और 15 महिला न्यायाधीशों के नाम शामिल थे। विवरण के अनुसार, न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल में जिन न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी गई, उनमें से पांच पूर्व या सेवारत न्यायाधीशों से संबंधित हैं, जबकि 49 न्यायाधीश बार से नियुक्त किए गए और बाकी सेवा संवर्ग से हैं। न्यायमूर्ति गवई रविवार (23 नवंबर) को पदमुक्त हो जाएंगे। उनके उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति सूर्यकांत 24 नवंबर को भारत के अगले प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे। भारत के 52वें प्रधान न्यायाधीश गवई ने अपने छह महीने के कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जिनमें वक्फ कानून के प्रमुख प्रावधानों पर रोक लगाना, न्यायाधिकरण सुधार कानून को रद्द करना और केंद्र को परियोजनाओं को बाद में हरित मंजूरी देने की अनुमति देना शामिल है। शुक्रवार का दिन प्रधान न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति गवई का अंतिम कार्य दिवस था। वह न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन के बाद भारतीय न्यायपालिका का नेतृत्व करने वाले दूसरे दलित न्यायाधीश थे। अपने अंतिम कार्य दिवस पर मिले सम्मान से अभिभूत न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि वह एक वकील और न्यायाधीश के रूप में चार दशकों की यात्रा पूरी करने के बाद “पूर्ण संतुष्टि की भावना के साथ” तथा “न्याय के छात्र” के रूप में संस्थान छोड़ रहे हैं।

सिर्फ एक की नहीं जिम्मेदारी! CJI गवई ने विदाई से पहले दिया देश को खास संदेश

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने आह्वान किया है कि लैंगिक समानता (Gender justice) की दिशा में हमारी यात्रा तभी सफल होगी, जब महिलाएँ और पुरुष दोनों मिलकर सहयोग करेंगे और किसी भी चुनौती को पार पाने में समान रूप से योगदान देंगे। इसके साथ ही CJI गवई ने इस बात पर भी जोर दिया कि लैंगिक न्याय हासिल करना सिर्फ महिलाओं की इकलौती जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पुरुषों को यह स्वीकार करना होगा कि उनके पास मौजूद असमान शक्ति को साझा करना नुकसान की बात नहीं है, बल्कि समग्र रूप से समाज की मुक्ति की दिशा में एक कदम है।   CJI ने बुधवार को ये बातें 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान में "सभी के लिए न्याय: लैंगिक समानता और समावेशी भारत का निर्माण" विषय पर देते हुए कहीं। उन्होंने कहा, "लैंगिक न्याय प्राप्त करना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए पुरुषों द्वारा, विशेष रूप से हमारे संस्थानों, कार्यस्थलों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में सत्ता के पदों पर आसीन पुरुषों द्वारा, सत्ता की सक्रिय पुनर्कल्पना की जरूरत है।" उन्होंने कहा, “वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष यह समझेंगे कि सत्ता साझा करना नुकसान नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति का कार्य है। इसलिए, लैंगिक समानता वाले भारत का मार्ग टकराव में नहीं, बल्कि सहयोग में निहित है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ मिलकर हमारे संविधान द्वारा परिकल्पित समानता के नैतिक और संस्थागत ढाँचे का पुनर्निर्माण करते हैं।” 75 वर्षों की प्रगति का भी किया उल्लेख बार एंड बेंच के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने व्याख्यान में 1950 में भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 25-25 वर्षों के तीन चरणों में इस क्षेत्र में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, "1975 के बाद, लैंगिक समानता पर राष्ट्रीय विमर्श औपचारिक अधिकारों के प्रश्नों से आगे बढ़कर, समानता के एक अभिन्न अंग के रूप में गरिमा के गहन विचार की ओर मुड़ने लगा। बातचीत केवल कानूनी समानता से आगे बढ़कर महिलाओं की स्वायत्तता, शारीरिक अखंडता और उनके जीवन के अनुभवों को आकार देने वाली सामाजिक वास्तविकताओं की मान्यता की ओर मुड़ गई।" मानव गरिमा की संरक्षक रहीं अदालतें: CJI उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की दृढ़ता और आम नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाये रखा है। उन्होंने कहा कि मान्यता और समानता के लिए प्रारंभिक संघर्षों से लेकर अंतर्संबंधी और सहभागी न्याय के वर्तमान युग तक, अदालतें अक्सर समानता और मानव गरिमा के संरक्षक के रूप में खड़ी रही हैं। चुनौतियों से भरा रहा है इतिहास जस्टिस गवई ने कहा, ‘‘यह विकासक्रम चुनौतियों से रहित नहीं रहा है। ऐसे कई अवसर आए जब न्यायिक व्याख्याएं महिलाओं के वास्तविक जीवन के अनुभवों को सही तरह नहीं समझ सकीं या संविधान की परिवर्तनकारी भावना पर खरी नहीं उतरीं।” उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की निरंतरता और साधारण नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाए रखा है। यात्रा अभी भी अधूरी इस कार्यक्रम में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी के उपाध्याय और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एम बी लोकुर भी शामिल हुए। प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा, ‘‘अदालतों और लोगों के बीच संवाद भारत की लोकतांत्रिक ताकत के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है, जो हमें याद दिलाता है कि लैंगिक समानता की ओर बढ़ना कोई मंजिल नहीं है, बल्कि यह एक प्रतिबद्धता है जिसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है।’’ हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रगति के बावजूद, वास्तविक लैंगिक समानता की दिशा में यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। बता दें कि जस्टिस गवई इसी महीने 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

भारत को मिलेगा नया मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस सूर्यकांत संभालेंगे CJI का पद

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने देश के अगले प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। वर्तमान सीजेआई बीआर गवई 23 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में अगले सीजेआई को चुने जाने की प्रक्रिया महीनेभर पहले शुरू कर दी जाती है। सीजेआई गवई के बाद सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जज जस्टिस सूर्यकांत अगले सीजेआई बनने जा रहे हैं। प्रक्रिया और नियम के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और प्रमोशन के नियम को निर्धारित करने वाले डॉक्युमेंट्स में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के सीजेआई के पद पर नियुक्ति उस अदालत के सबसे वरिष्ठ जज की होनी चाहिए, जिन्हें पद धारण के लिए सबसे उपयुक्त समझा जाए। ऐसे में केंद्रीय कानून मंत्री वर्तमान सीजेआई से उनके उत्तराधिकारी के लिए उनकी सिफारिश मांगेंगे। हरियाणा के मिडिल क्लास में लिया जन्म हरियाणा के हिसार के एक मिडिल क्लास परिवार में 10 फरवरी, 1962 को जस्टिस सूर्यकांत का जन्म हुआ था। वह अभी सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई गवई के बाद सबसे सीनियर जज हैं। उन्होंने 1981 में गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, हिसार से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 1984 में रोहतक की महार्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से लॉ की बैचलर डिग्री हासिल की। उन्होंने उसी साल 1984 में ही हिसार के जिला अदालत में प्रैक्टिस शुरू कर दी। बाद में 1985 में वे पंजाब एवं हरियाणा हाइ्र कोर्ट में प्रैक्टिस करने के लिए चंडीगढ़ शिफ्ट हो गए। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के भी चीफ जस्टिस रहे सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत कॉन्स्टिट्यूशनल, सर्विस और सिविल मामलों में स्पेशलाइज्ड हैं। कई यूनिवर्सिटी, बोर्ड, कॉर्पोरेशन, बैंक और खुद हाई कोर्ट को भी रिप्रेजेंट किया है। सात जुलाई 2000 को हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल नियुक्त किए गए। मार्च 2001 में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया। इसके बाद, 9 जनवरी 2004 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होने तक हरियाणा के एडवोकेट जनरल के पद पर रहे। 22 फरवरी 2011 तक लगातार दो कार्यकालों के लिए 23 फरवरी 2007 को राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के शासी निकाय के सदस्य के रूप में चुना गया। पांच अक्टूबर, 2018 से हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। इसके बाद, 24 मई, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में प्रमोट हुए। वे 9 फरवरी, 2027 को रिटायर होंगे।

सरकार ने शुरू की CJI की नियुक्ति प्रक्रिया, अगले चीफ जस्टिस बनने वाले चेहरे पर लगी नज़र

नई दिल्ली  सीजेआई बीआर गवई के बाद देश का अगला चीफ जस्टिस कौन होगा, इसकी प्रक्रिया केंद्र सरकार ने शुरू कर दी है। सीजेआई गवई 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। इससे पहले तक नए सीजेआई के नाम का चयन हो जाना है। जस्टिस सूर्यकांत अगले सीजेआई के रेस में हैं और उनका बनना लगभग तय है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया से वाकिफ लोगों ने बताया कि जस्टिस गवई से उनके उत्तराधिकारी का नाम बताने वाला लेटर आज शाम या शुक्रवार को दिया जाएगा। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के अनुसार, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और पदोन्नति को गाइड करने वाले डॉक्यूमेंट्स का एक सेट है, उसमें कहा गया है कि भारत के चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जज की होनी चाहिए, जिन्हें पद संभालने के लिए फिट माना जाए। केंद्रीय कानून मंत्री सही समय पर भारत के जाने चीफ जस्टिस से उनके अगले चीफ जस्टिस की नियुक्ति के लिए सिफारिश मांगेंगे। आमतौर पर, यह लेटर मौजूदा सीजेआई के 65 साल की उम्र में रिटायर होने से एक महीने पहले भेजा जाता है। जस्टिस सूर्यकांत सीजेआई गवई के बाद सबसे सीनियर जज हैं और अगले सीजेआई बनने की सबसे ज्यादा संभावना है। एक बार नियुक्त होने के बाद, जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर को अगले सीजेआई बन जाएंगे और 9 फरवरी, 2027 तक लगभग 15 महीने तक इस पद पर रहेंगे।  

CJI के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हुई जूता फेंकने की कोशिश, वकील गिरफ्तार

नई दिल्ली चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई के सामने कोर्ट में आज एक वकील ने हंगामा करने की कोशिश की. आरोप है कि वकील ने CJI की तरफ जूता फेंकने का प्रयास भी किया. घटना के तुरंत बाद पुलिस ने आरोपी वकील को हिरासत में ले लिया. इस बीच, पूरे घटनाक्रम के दौरान जस्टिस गवई शांत बने रहे और कोर्ट में सुनवाई यथावत जारी रही. उन्होंने कहा कि इन चीजों से "मुझे फर्क नहीं पड़ता." बताया जा रहा है कि वकील डेस्क के पास गया और जूता निकालकर जज की तरफ फेंकने की कोशिश की लेकिन कोर्ट में मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने समय रहते हस्तक्षेप किया और वकील को बाहर ले गए. बाहर जाते समय वकील यह कहते सुना गया, "सनातन का अपमान नहीं सहेंगे." CJI इस घटना से प्रभावित नहीं हुए और कोर्ट में मौजूद अन्य वकीलों से कहा कि अपने तर्क जारी रखें. उन्होंने कहा, “इस सब पर ध्यान मत दें. हम प्रभावित नहीं हैं. ये बातें मुझे प्रभावित नहीं करतीं." मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई की और कोर्ट परिसर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. सीजेआई पर क्यों की गई जूता फेंकने की कोशिश? घटना पर एक वकील ने प्रतिक्रिया दी और कहा कि आज की जो घटना है, वह बहुत ही दुखद है. एक कोर्ट में, वो भी वकील ने अगर असॉल्ट करने का प्रयास किया है, तो हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं. देखिए, हमारे बार के वो मेंबर हैं. अभी हमने जांच किया और पता चला कि वो 2011 के मेंबर हैं." वकील ने कार्रवाई की मांग की वकील ने अपने बयान में कहा, "यह बहुत ही दुखद घटना है. इसलिए हम कह सकते हैं कि जो पता चला है, वह लॉर्ड विष्णु के मैटर्स में आया कमेंट था, हॉनरेबल CJI के उसी पर ही उन्होंने ऐसा प्रयास (वकील ने जूता फेंकने का प्रयास) किया है. यह बहुत ही दुखद घटना है. हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं और अगर यह घटना सच है, तो एक्शन होना चाहिए."

न्यायपालिका में नया इतिहास: 2027 में भारत को मिलेगी पहली महिला CJI, 8 साल में 8 बदलाव

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट को 2033 तक यानी अगले आठ साल में आठ चीफ जस्टिस मिलेंगे. इनके कार्यकाल 36 दिन से लेकर करीब सवा दो साल तक के होंगे.मौजूदा चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई के 23 नवंबर 2025 को रिटायर होने के बाद जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व 9 फरवरी 2027 तक करेंगे. इसके बाद 10 फरवरी से 23 सितंबर तक जस्टिस विक्रम नाथ और 24 सितंबर 2027 से लेकर 29 अक्तूबर 2027 तक की 36 दिनों की अवधि में जस्टिस बीवी नागरत्ना देश की पहली महिला चीफ जस्टिस के तौर पर कार्यभार संभालेंगी. वो पूर्व चीफ जस्टिस इंगलगुप्पे सीतारमैया वेंकटरमैया की बेटी हैं. इसके साथ ही पिता और बेटी के देश के चीफ जस्टिस की कुर्सी संभालने का कीर्तिमान भी बनेगा. अब तक सिर्फ पिता और बेटे के रूप में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बनने का रिकॉर्ड जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ और उनके बेटे जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ का है.  इसके बाद अगले सात महीने यानी 30 अक्टूबर 2027 से 2 मई 28 तक जस्टिस पामिदीघंटम श्री नरसिम्हा चीफ जस्टिस बनेंगे. वो जस्टिस एस एम सीकरी और जस्टिस उदय उमेश ललित के बाद वकालत के पेशे से सीधे सुप्रीम कोर्ट जज बनकर चीफ जस्टिस की कुर्सी संभालने वाले तीसरी हस्ती होंगे.  जस्टिस नरसिम्हा के बाद 2028 में 3 मई को चीफ जस्टिस पद की शपथ लेंगे जस्टिस जमशेद बुर्जोर पारदीवाला. जस्टिस पारदीवाला का कार्यकाल कई दशकों में सबसे बड़ा होगा. वो जस्टिस चंद्रचूड़ से भी अधिक समय तक यानी दो साल तीन महीने सात दिन देश के चीफ जस्टिस रहेंगे. जस्टिस पारदीवाला के 11 अगस्त 2030 को रिटायरमेंट के बाद 12 अगस्त 2030 को जस्टिस केवी विश्वनाथन चीफ जस्टिस बनेंगे. जस्टिस विश्वनाथन सवा नौ महीने यानी 25 मई 2031तक इस पद पर रहेंगे. जस्टिस विश्वनाथन वकालत के पेशे से सीधे सुप्रीम कोर्ट जज बनकर चीफ जस्टिस बनने वाले चौथे शख्स होंगे. इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची 26 मई 2031 से दो अक्टूबर 2031 तक यानी चार महीने से कुछ अधिक देश के चीफ जस्टिस बनेंगे. इनके बाद तीन अक्टूबर 2031 को जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली देश की सर्वोच्च न्यायपालिका की कमान संभालेंगे. जस्टिस पंचोली 27 मई 2033 तक यानी करीब दो साल 19 महीने से अधिक इस पद पर रहेंगे.

CJI का गुस्सा उफन पड़ा, जमानत रोके जाने पर बोले—व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने सीबीआई से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एक आरोपी की जमानत याचिका पर 43 बार रोक लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई है। CJI गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मामले में अभियुक्त पहले ही साढ़े तीन साल से ज़्यादा का वक्त हिरासत में बिता चुका है, इसलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में इस तरह बार-बार जमानत स्थगन स्वीकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने अभियुक्त रामनाथ मिश्रा को जमानत देते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों में अदालतों को अत्यंत शीघ्रता से विचार करना चाहिए। सीजेआई ने मामले में कहा, “हमने बार-बार यह टिप्पणी की है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों पर अदालतों द्वारा अत्यंत शीघ्रता से विचार किया जाना चाहिए… व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में, हाई कोर्ट्स से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे मामले को इतने लंबे समय तक लंबित रखें और समय-समय पर सुनवाई स्थगित करने के अलावा कुछ न करें।” ऐसी प्रवृति हम पसंद नहीं करते: SC पीठ ने 25 अगस्त के अपने आदेश में कहा, “मौजूदा मामले में 43 बार जमानत स्थगित किया जा चुका है। हम उच्च न्यायालय द्वारा किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामले को इतनी बड़ी संख्या में जमानत स्थगित करने की प्रवृत्ति को पसंद नहीं करते। व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर तुरंत शीघ्रता से गौर किया जाना चाहिए।” CBI ने फिर किया जमानत का विरोध, SC ने नहीं मानी दलील सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय ने इस आधार पर जमानत याचिका का विरोध किया कि हाई कोर्ट में जमानत याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान शीर्ष अदालत द्वारा अगर जमानत दी गई तो इससे एक गलत मिसाल कायम होगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने CBI की इस दलील पर ध्यान नहीं दिया और कहा कि अभियुक्त पहले ही साढ़े तीन साल से ज़्यादा समय हिरासत में बिता चुके हैं और उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई 43 बार स्थगित हो चुकी है। ऐसे में जमानत नहीं देना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। इसी मामले में पहले भी HC को फटकार लगा चुका है SC दिलचस्प बात यह है कि शीर्ष अदालत ने इसी मामले में एक सह-अभियुक्त को 22 मई, 2025 को ज़मानत दे दी थी, जब उसे पता चला था कि उच्च न्यायालय ने उसकी ज़मानत याचिका पर 27 बार सुनवाई स्थगित कर चुका है। शीर्ष अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ता को निचली अदालत की संतुष्टि के लिए ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।"