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अभ्युदय जैन केस: हाईकोर्ट ने मां के खिलाफ एफआईआर की निरस्त, 360 दिन बाद अलका जैन को राहत

 ग्वालियर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने गुना के बहुचर्चित अभ्युदय जैन मृत्यु प्रकरण में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी मां अलका जैन के खिलाफ दर्ज एफआईआर और समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि केवल अनुमानों और संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा चलाना न्याय का उल्लंघन है। गौरतलब है कि 14 फरवरी 2025 को 14 वर्षीय अभ्युदय जैन का शव घर के बाथरूम में मिला था। घटना के बाद पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उसकी मां अलका जैन को संदेह के दायरे में लिया। 22 फरवरी को कोतवाली थाना में अपराध क्रमांक 115/2025 दर्ज किया गया और 8 मार्च को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। करीब 98 दिन न्यायिक हिरासत में रहने के बाद 17 जून को उन्हें जमानत मिली, लेकिन मामला अदालत में विचाराधीन रहा। इस बीच अभ्युदय के पिता अनुपम जैन ने पुलिस जांच पर असंतोष जताया। उनके आग्रह पर आईजी के निर्देश पर शिवपुरी डीएसपी अवनीत शर्मा के नेतृत्व में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया गया। एसआईटी ने भोपाल स्थित गांधी मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों से मेडिको-लीगल राय प्राप्त की। रिपोर्ट में मृत्यु का कारण फांसी पर लटकना बताया गया। इसके आधार पर एसआईटी ने 5 मई को अदालत में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर अलका जैन को दोषमुक्त माना। हालांकि 9 मई 2025 को गुना की सीजेएम कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट खारिज कर दी और स्वयं संज्ञान लेते हुए हत्या तथा साक्ष्य छिपाने की धाराओं में मुकदमा चलाने का आदेश दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए अलका जैन ने हाईकोर्ट का रुख किया। 9 फरवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।  सुनाए गए निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के निष्कर्ष अनुमानों और अटकलों पर आधारित थे, न कि ठोस और विधिसम्मत साक्ष्यों पर। अदालत ने माना कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किए जाने के बावजूद कार्यवाही जारी रखना विधि का दुरुपयोग होगा। न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 103 और 238 के तहत 9 मई 2025 के सीजेएम आदेश को रद्द करते हुए कोतवाली गुना में दर्ज अपराध से संबंधित सभी आगे की कार्यवाही समाप्त कर दी। करीब 360 दिनों तक हत्या के आरोपों और सामाजिक-मानसिक दबाव का सामना करने के बाद यह फैसला अलका जैन के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सबको फ्री सुविधाएं बांटना गलत, विकास के लिए रोजगार जरूरी

चेन्नई सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु बिजली बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई है। दरअसल, तमिलनाडु बिजली बोर्ड उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने का वादा कर रहा है। वहीं एक मुकदमे पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी की है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यों में अपनाई गई मुफ्त सुविधाओं की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा डालती है।  कोर्ट ने क्या-क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत समेत जजों ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा ज्यादातर राज्य पहले से ही घाटे में हैं, फिर भी विकास को छोड़कर मुफ्त सुविधाएं बांट रहे हैं। कोर्ट ने साफ कहा- जो लोग भुगतान नहीं कर सकते, उन्हें सहायता देना समझ में आता है। लेकिन अमीर-गरीब में फर्क किए बिना सबको मुफ्त देना गलत नीति है। इस दौरान कोर्ट ने चेतावनी दी और कहा अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली मिलती रही तो लोगों में काम करने की भावना कम हो जाएगी। कोर्ट का राज्यों को दी सलाह और पूछा सवाल वहीं कोर्ट ने राज्यों को सलाह दी कि मुफ्त चीजें बांटने के बजाय, रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, भारत में हम कैसी संस्कृति बना रहे हैं? क्या यह वोट पाने की नीति नहीं बन जाएगी? फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब अगली सुनवाई में तय होगा कि ऐसे मुफ्त बिजली योजनाओं पर क्या नियम लागू होंगे। क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा? यह मामला इसलिए बड़ा है क्योंकि कई राज्यों में चुनाव से पहले मुफ्त योजनाएं घोषित होती हैं और इससे सरकारी खर्च बढ़ता है, जिससे आर्थिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहता है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि गरीबों की मदद जरूरी है, लेकिन बिना सोच-समझ सबको मुफ्त सुविधाएं देना देश के विकास के लिए सही नहीं है।  

सुप्रीम कोर्ट ने तय किया बड़ा अंतर: सलवार खोलना नहीं है रेप की कोशिश, HC का आदेश रद्द

 इलाहाबाद यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक बेहद विवादित फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' या 'रेप की तैयारी' नहीं, बल्कि सीधे तौर पर 'रेप का प्रयास' (Attempt to Rape) है। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य को कम गंभीर अपराध मानकर आरोपी को हल्की सजा देना न्याय की भावना के खिलाफ है। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कोर्ट ने इसे केवल महिला की लज्जा भंग करने का मामला माना था। क्या है पूरा मामला? मामला काफी गंभीर था, जिसमें आरोपियों ने महिला के साथ न केवल अश्लील हरकतें कीं बल्कि उसके कपड़े उतारने का प्रयास भी किया। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक अजीबोगरीब तर्क देते हुए इसे 'रेप का प्रयास' मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह कृत्य 'रेप की तैयारी' के अंतर्गत आता है, जिसके लिए सजा कम होती है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद आक्रोश फैल गया था। महिला अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान हाईकोर्ट के इस विवादास्पद फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। यह कदम एनजीओ 'वी द वुमन' की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा लिखे गए एक पत्र के बाद उठाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के साथ-साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की। SC की तीखी टिप्पणी और फैसला सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सिरे से खारिज करते हुए आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत 'रेप के प्रयास' के मूल और सख्त आरोपों को बहाल कर दिया है। फैसला सुनाते हुए CJI सूर्यकांत ने न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि जब कोई न्यायाधीश यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा हो, तो उसे मामले की तथ्यात्मक हकीकत और पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील होना चाहिए। बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा, "कोई भी जज या किसी भी अदालत का फैसला तब तक पूर्ण न्याय नहीं कर सकता, जब तक कि वह मुकदमे के तथ्यों की वास्तविकताओं और अदालत का रुख करने वाली पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील न हो।" अदालत ने यह भी साफ किया कि न्यायाधीशों का प्रयास न केवल संवैधानिक और कानूनी सिद्धांतों के ठोस अनुप्रयोग पर आधारित होना चाहिए, बल्कि उसमें करुणा और सहानुभूति का भाव भी होना चाहिए। इन स्तंभों के अभाव में न्यायिक संस्थान अपने महत्वपूर्ण कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि भविष्य के लिए एक व्यापक सुधार का खाका भी खींचा है। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में जजों को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। इसके लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक और पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का अनुरोध किया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों के लिए 'संवेदनशीलता और करुणा' विकसित करने हेतु दिशा-निर्देश तैयार करेगी। अदालत ने यह विशेष निर्देश दिया कि ये दिशा-निर्देश सरल भाषा में होने चाहिए, न कि विदेशी अदालतों के जटिल कानूनी शब्दों से भरे हुए।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: इस्तीफा नामंजूर करना कानून के खिलाफ, बंधुआ मजदूरी की तरह माना

तिरुवनंतपुरम केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी द्वारा इस्तीफा देने की स्थिति में कंपनी को उसे स्वीकार करना ही होगा। हाईकोर्ट ने इस दौरान कहा है कि अगर कोई एंप्लॉयर कर्मचारी का इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार करता है तो यह ‘बंधुआ मजदूरी’ के समान माना जाएगा। बार एंड बेंच की की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए जस्टिस एन नागरेश ने कहा कि जब कोई कर्मचारी सेवा शर्तों के अनुसार इस्तीफा देता है तो नियोक्ता का कर्तव्य है कि वह उसे स्वीकार करे, बशर्ते अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन ना हुआ हो। अदालत ने साफ किया कि इस्तीफा सिर्फ कुछ खास हालात में ही रोका जा सकता है, जैसे नोटिस पीरियड पूरा ना होना, गुस्से में दिया गया इस्तीफा जिसे वापस लिया जा सकता हो, गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित हो या संस्था को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ हो। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी। कंपनी द्वारा वित्तीय संकट का हवाला देकर कंपनी सेक्रेटरी का इस्तीफा ना मानना कानूनी रूप से सही नहीं है। क्या था मामला? दरअसल यह मामला ट्राको केबल कंपनी लिमिटेड नाम की एक संस्था से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ग्रीवस जॉब पनक्कल कंपनी में सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2022 से उनका वेतन नियमित नहीं मिल रहा था, जिससे वे अपना और अपनी बीमार मां का खर्च नहीं उठा पा रहे थे। उन्होंने मार्च 2024 में इस्तीफा देकर सेवा से मुक्त करने का अनुरोध किया। हालांकि कंपनी बोर्ड ने यह कहकर इस्तीफा खारिज कर दिया कि उनकी भूमिका जरूरी है और कंपनी आर्थिक संकट में है। प्रबंधन ने उन्हें ड्यूटी पर लौटने के निर्देश दिए और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी। अंत में पनक्कल ने इन नोटिस को रद्द करने और इस्तीफा स्वीकार करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने पाया कि कंपनी सेक्रेटरी की नियुक्ति कंपनी अधिनियम 2013 के तहत रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में दर्ज होती है। जब तक कंपनी जरूरी फॉर्म दाखिल नहीं करती, तब तक कर्मचारी दूसरी जगह नौकरी नहीं कर सकता। इससे याचिकाकर्ता के रोजगार के अवसर बाधित हो रहे थे। अनुच्छेद 23 का उल्लंघन कोर्ट ने इस्तीफा अस्वीकार करने और अनुशासनात्मक नोटिस को रद्द कर दिया। साथ ही कंपनी को दो महीने के भीतर इस्तीफा स्वीकार कर सेवा से मुक्त करने और वेतन बकाया, अवकाश समर्पण लाभ तथा अन्य देय राशि का भुगतान जल्द करने का निर्देश दिया। जस्टिस नागरेश ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “वित्तीय समस्या या आपात स्थिति के नाम पर किसी कंपनी सेक्रेटरी को उसकी इच्छा और सहमति के खिलाफ काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी देना उसके इस्तीफा देने के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा स्वीकार ना करना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत प्रतिबंधित बंधुआ मजदूरी जैसा है।

घरेलू विवाद सुलझाने में हाईकोर्ट ने किया फैसला, शौर्य दीदी की निगरानी में पत्नी रहेगी पति के साथ

ग्वालियर  ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने  घरेलू विवाद से जुड़े बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए पत्नी को पति के साथ रहने की अनुमति दे दी। साथ ही महिला की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महिला आरक्षक को छह माह के लिए “शौर्य दीदी” के रूप में नियुक्त किया। यह याचिका आकाश नामक व्यक्ति ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी को बंधक बनाकर रखा गया है और शिकायत के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पति के साथ रहना चाहती है पत्नी सुनवाई के दौरान ग्वालियर के झांसी रोड थाना पुलिस ने महिला को न्यायालय में पेश किया। न्यायालय ने महिला की इच्छा जानने के बाद कहा कि वह घरेलू विवाद के कारण अलग हुई थी, लेकिन अब अपने पति के साथ रहना चाहती है। अदालत ने महिला की सुरक्षा और काउंसलिंग के लिए महिला आरक्षक दुर्गेश शर्मा को छह माह के लिए “शौर्य दीदी” के रूप में नियुक्त किया है। उन्हें महिला की नियमित काउंसलिंग और निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि उसकी सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित किया जा सके।  

1 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी का आरोपी – जमानत खारिज

बड़वानी जिला एवं सत्र न्यायालय बड़वानी ने करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी के मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। प्रकरण पुलिस थाना अंजड़ का है, जिसमें अपराध क्रमांक 444/2025 के तहत धारा 406, 420, 409, 201 भा.दं.सं. में मामला दर्ज है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार आरोपी पर अलग-अलग व्यक्तियों से सोना-चांदी व्यापार एवं निवेश के नाम पर लगभग 1,01,52,000 रुपये से अधिक की राशि प्राप्त कर धोखाधड़ी करने का आरोप है। प्रकरण में बताया गया कि आरोपी ने कई ग्रामीणों और व्यापारियों को ऊंचा मुनाफा दिलाने का झांसा देकर रकम ली, लेकिन राशि वापस नहीं की। न्यायालयीन अभिलेख के अनुसार विभिन्न व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग तिथियों में लाखों रुपये आरोपी को दिए गए। प्रकरण में कई फरियादियों के बयान दर्ज हैं तथा आरोप है कि आरोपी द्वारा विश्वास में लेकर आर्थिक अपराध को अंजाम दिया गया। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं और आरोपी के फरार होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं बचाव पक्ष ने आरोपी के स्थायी निवास एवं जांच पूर्ण होने का हवाला देते हुए जमानत की मांग की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने एवं केस डायरी के अवलोकन के बाद न्यायालय ने माना कि आरोप गंभीर आर्थिक अपराध की श्रेणी में आते हैं और वर्तमान परिस्थितियों में जमानत देना न्यायोचित नहीं है। अतः न्यायालय ने आरोपी का जमानत आवेदन निरस्त कर दिया। प्रकरण में पुलिस द्वारा जांच पूर्ण कर चालान प्रस्तुत किया जा चुका है और मामले की सुनवाई जारी है।

क्या लिव-इन पार्टनर पर दहेज का केस संभव? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट इस समय एक बेहद महत्वपूर्ण और जटिल कानूनी प्रश्न पर विचार कर रहा है, जिसमें क्या एक विवाहित पुरुष के खिलाफ उसकी लिव-इन पार्टनर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत मुकदमा दर्ज करा सकती है? मामले की पृष्ठभूमि यह मामला कर्नाटक के एक हृदय रोग विशेषज्ञ, डॉक्टर लोकेश बीएच से जुड़ा है। लोकेश का विवाह साल 2000 में हुआ था, लेकिन एक अन्य महिला ने दावा किया कि उसका विवाह लोकेश से 2010 में हुआ और उसने उन पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने तथा जलाने के प्रयास का आरोप लगाया। लोकेश ने इन आरोपों को नकारते हुए तर्क दिया कि उनके और महिला के बीच कभी कोई वैध विवाह नहीं हुआ, इसलिए धारा 498A लागू ही नहीं होती। हाई कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक हाई कोर्ट ने डॉक्टर की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि धारा 498A के प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू हो सकते हैं। इस फैसले को चुनौती देते हुए डॉक्टर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील का तर्क है कि कानून के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, केवल 'वैध पत्नी' ही पति या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ यह शिकायत दर्ज करा सकती है। सुप्रीम कोर्ट का क्या है रुख? जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने इस सवाल को 'विचारणीय' माना है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस पर जवाब मांगा है और वरिष्ठ अधिवक्ता नीना नरिमन को 'एमिकस क्यूरी' (अदालती सलाहकार) नियुक्त किया है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या "विवाह के समान" (Marriage-like) लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पुरुष पर दहेज प्रताड़ना का मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं।

पंचकूला कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, पुलिस ने परिसर को खाली कराया और सुरक्षा बढ़ाई

पंचकूला  पंचकूला में कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी भरा मेल आने की खबर सामने आ रही है,  जिसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर कोर्ट परिसर को खाली करवाया दिया है। वहीं डॉग स्कवॉयड भी मौके तलाशी अभियान चला रही है।  सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आज पंचकूला कोर्ट के सेशन जज को थ्रेट मेल मिला, जिसमें कोर्ट को बम से उड़ने की धमकी दी गई थी। जिसकी जानकारी उन्होंने तुरंत पुलिस अधिकारियों को दी। पंचकूला डीसीपी सृष्टि गुप्ता ने फोन पर जानकारी देते हुए बताया कि धमकी भरा मेल आने के बाद कोर्ट परिसर में तलाशी अभियान चलाया गया। हालांकि अभी तक जांच में ऐसा कुछ पाया नहीं गया है। यह केवल धमकी का ही मामला है, लेकिन फिर भी उन्होंने एहतियातन पूरे कोर्ट परिसर की जांच की।

6 लाख सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी! HC ने दिया बड़ा फैसला, सर्विस मामले होंगे त्वरित निपटारे के लिए तैयार

इंदौर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों (Service Matters) को लेकर राज्य सरकार को एक बेहद अहम और कड़ा सुझाव दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ट्रांसफर, प्रमोशन, इंक्रीमेंट और वरिष्ठता जैसे छोटे-छोटे मामलों के लिए कर्मचारियों को अदालत आने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। जस्टिस विनय सराफ की एकल पीठ ने सरकार को 'इन-हाउस डिस्प्यूट रिसोल्यूशन सिस्टम' (विवाद समाधान प्रणाली) विकसित करने के निर्देश दिए हैं। चीफ सेक्रेटरी को आदेश: 50 हजार मामलों का बोझ होगा कम हाई कोर्ट में वर्तमान में कर्मचारियों से जुड़े 50,000 से अधिक मामले लंबित हैं। जस्टिस सराफ ने मंडला के वन रक्षकों की वरिष्ठता से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस आदेश की प्रति मुख्य सचिव (Chief Secretary) को भेजने के निर्देश दिए हैं।     याचिकाकर्ता 30 दिन के भीतर सक्षम अधिकारी को अपना आवेदन दें।     सरकार और संबंधित विभाग इस पर 45 दिन के भीतर अनिवार्य रूप से फैसला लें। 6 लाख कर्मचारियों के लिए 'राहत' का फॉर्मूला यदि सरकार इस सुझाव पर अमल करती है, तो प्रदेश के करीब 6 लाख नियमित अधिकारी-कर्मचारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट के सुझाव के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं…     डेजिग्नेटेड ऑफिसर: हर विभाग में एक नामित अधिकारी हो जो विवादों को सुने।     निष्पक्षता: पारदर्शिता के लिए जरूरत पड़ने पर रिटायर्ड जिला जजों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।     बचत: इससे न केवल अदालतों का बोझ कम होगा, बल्कि सरकार और कर्मचारियों का समय व पैसा भी बचेगा। 'अदालतों में आ गई है सर्विस मामलों की बाढ़' सुनवाई के दौरान जस्टिस सराफ ने चिंता जताते हुए कहा कि हाई कोर्ट में इन दिनों सर्विस मामलों की बाढ़ आ गई है। उन्होंने कहा, "अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच सीधे संवाद की कमी के कारण छोटे-छोटे विवाद भी कोर्ट तक पहुंच रहे हैं। यह सरकार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ़ाता है और कर्मचारियों को मानसिक पीड़ा देता है।" कोर्ट का मानना है कि आपसी संवाद और विभागीय स्तर पर सशक्त प्रणाली से अधिकांश केसों का समाधान बिना मुकदमेबाजी के संभव है।

पूर्व CM गोविंद नारायण सिंह की सतना जमीन के स्वामित्व पर हाईकोर्ट ने जताया संदेह

सतना  हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे गोविन्द नारायण सिंह द्वारा अपने ही बेटे शिव बहादुर सिंह को बेची गई सतना की 11.57 एकड़ जमीन के स्वामित्व को संदेहास्पद माना है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गोविन्द नारायण सिंह ने अपंजीकृत और अपर्याप्त स्टाम्प पर बनी सेल डीड के आधार पर विवादित जमीन बेची थी। ऐसे दस्तावेजों के आधार पर न तो जमीन का स्वामित्व मिलता है और न ही अस्थाई निषेधाज्ञा। हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अपीलीय अदालत के उस आदेश को उचित निरूपित किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अस्थायी रोक को निरस्त कर दिया गया था। इसके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों की ओर से दायर याचिका निरस्त कर दी। याचिकाकर्ता अंबिकापुर, छत्तीसगढ़ निवासी नर्मदेश्वर प्रताप सिंह, रामेश्वर प्रताप सिंह और सतना निवासी माधवी सिंह की ओर से पक्ष रखा गया। दलील दी गई कि उनके पिता शिव बहादुर सिंह ने वर्ष 1992 में अपने पिता गोविन्द नारायण सिंह से अपंजीकृत सेल डीड के जरिए 11.57 एकड़ भूमि खरीदी थी। वह भूमि वर्षों से उनके कब्जे में है। इसी आधार पर स्थायी निषेधाज्ञा चाही गई। अधीनस्थ अदालत ने पांच फरवरी, 2025 को उनके पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा दे दी थी। विवादित जमीन के असली मालिक सेठ मनोहर लाल थे। मनोहर लाल की कथित पावर आफ अटार्नी के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह ने 11.57 एकड़ जमीन अपने बेटे शिव बहादुर सिंह को आठ दिसंबर, 1992 को बेची थी। वर्ष 1998 में जमीन का नामांतरण भी हुआ। ट्रायल कोर्ट द्वारा पांच फरवरी, 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों को दी गई अस्थाई निषेधाज्ञा के विरुद्ध सेठ मनोहर लाल के वारिसों ने जिला अदालत में अपील दायर की। जिला अदालत ने 13 अक्तूबर 2025 को ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त करके अस्थाई निषेधाज्ञा हटा दी थी। इस पर यह मामले पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह के वारिसों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।