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डायबिटीज महामारी का रूप ले रही है भारत में, 10 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित, कौन सा राज्य सबसे आगे?

नई दिल्ली डायबिटीज किसी भी उम्र में हो सकती है. आजकल, बिजी लाइफस्टाइल, खराब खान-पान की आदतों और एक्सरसाइज की कमी के कारण, डायबिटीज से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए सही खान-पान बहुत जरूरी है. कुछ लोग मोटापे, वजन बढ़ने या ज्यादा तनाव जैसे कारणों से इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं. एक बार डायबिटीज हो जाने पर, व्यक्ति को जीवन भर इसके साथ जीना पड़ता है. यह एक जेनेटिक बीमारी है जो समय के साथ और बिगड़ती जाती है।  भारत में, डायबिटीज की समस्या अब एक महामारी का रूप ले चुकी है. भारत को अब अक्सर 'डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड' कहा जाता है. इसी संबंध में, इस खबर में जानें कि भारत के किस राज्य में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मरीज हैं और इसके पीछे क्या कारण हैं… भारत के किस राज्य में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मरीज हैं? द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी (जून 2023) में प्रकाशित ICMR-INDIAB के एक डिटेल्ड स्टडी के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, और सबसे ज्यादा डायबिटीज रेट वाला राज्य गोवा है, जहां 26.4 प्रतिशत से ज्यादा आबादी इस बीमारी से प्रभावित है. इसके बाद, ज्यादा दर वाले अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुडुचेरी, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और चंडीगढ़ शामिल हैं. 2025 के एक और विश्लेषण से पता चलता है कि डायबिटीज के लिए सबसे ज्यादा 'आयु-मानकीकृत प्रसार दर' (ASPR) तमिलनाडु में है, जिसके बाद गोवा और कर्नाटक का नंबर आता है. नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया 2023–2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे कम डायबिटीज दर वाला राज्य उत्तर प्रदेश (4.8 प्रतिशत) है।  इस मुद्दे पर डॉक्टर का क्या कहना है? SPARSH हॉस्पिटल, यशवंतपुर, बैंगलोर के इंटरनल मेडिसिन और डायबेटोलॉजी के कंसल्टेंट डॉ. अशोक एम. एन का कहना है कि गोवा में डायबिटीज की दर सबसे ज्यादा बताई गई है, जो लाइफस्टाइल, खान-पान की आदतों और जनसांख्यिकी से जुड़े अलग-अलग फैक्टर्स के मिले-जुले असर को दिखाता है. बहुत ज्यादा शहरी आबादी, आराम पसंद लाइफस्टाइल, और ज्यादा कार्बोहाइड्रेट, चीनी और शराब वाली डाइट, ये सभी इस बढ़ती समस्या की वजह हैं. इसके अलावा, गोवा में बेहतर स्क्रीनिंग और हेल्थ के बारे में ज्यादा जागरूकता जैसे कारण भी दूसरे इलाकों के मुकाबले डायबिटीज का पता लगाने की ज्यादा दर की वजह हो सकते हैं।  डॉ. अशोक एम. एन ने आगे कहा कि केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में भी डायबिटीज की बीमारी में बढ़ोतरी देखी गई है. इन इलाकों में भी शहरीकरण, कम फिजिकल एक्टिविटी और बढ़ता मोटापा जैसे रिस्क फैक्टर्स मौजूद हैं. कई मामलों में, तनाव, सोने-जागने के अनियमित चक्र और आनुवंशिक प्रवृत्तियों के कारण यह खतरा और भी बढ़ जाता है. एक और बड़ी चिंता युवाओं में डायबिटीज के बढ़ते मामले हैं, जिसका मुख्य कारण कम उम्र से ही अनहेल्दी लाइफस्टाइल और खराब खान-पान की आदतों को अपनाना है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि डायबिटीज अक्सर शुरुआती फेज में पता नहीं चल पाता, जिससे शरीर के अंदर गंभीर जटिलताएं चुपचाप पनपने लगती हैं. इस समस्या से निपटने के लिए निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर जोर देना जरूरी है, जिसमें नियमित जांच, स्वस्थ खान-पान की आदतों के बारे में जागरूकता, अधिक फिजिकल एक्सरसाइज और समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप शामिल है. हालांकि किसी इलाके की ज्योग्राफिकल लोकेशन भी डायबिटीज की मौजूदगी पर असर डाल सकती है, लेकिन लाइफस्टाइल ही सबसे अहम फैक्टर बनी हुई है।  National Institutes of Health (.gov) के अनुसार, एक्सपर्ट्स विशेष रूप से गोवा और दक्षिणी राज्यों में डायबिटीज की हाई रेट का श्रेय खराब लाइफस्टाइल, एनवायरमेंटल फैक्टर्स और सोशियो इकोनॉमिक फैक्टर के मेल को जिम्मेदार मानते हैं, जिनमें शामिल है…     हाई रेट ऑफ ओबेसिटी: भारत में डायबिटीज का सबसे आम कारण मोटापा है. नेचर जनर्ल में प्रकाशित ICMR-INDIAB के अध्ययन से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में डायबिटीज का प्रसार अधिक है, वहां अक्सर पेट और सामान्य मोटापे की दरें भी अधिक होती हैं. ये ऐसे फैक्टर्स हैं जिनका टाइप 2 डायबिटीज से गहरा संबंध होता है।      लाइफस्टाइल में बदलाव या अर्बनाइजेशन: गोवा और तमिलनाडु जैसे राज्य बहुत ज्यादा शहरीकृत (Highly Urbanized) हैं, इसके कारण लोगों की लाइफस्टाइल में निष्क्रियता बढ़ी है, फिजिकल एक्टिविटी कम हुई है, और हाई कैलोरी वाले, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ा है।      खान-पान की आदतें: खान-पान की आदतों में बदलाव (विशेष रूप से रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और चीनी का अत्यधिक सेवन) 'मेटाबॉलिक सिंड्रोम' के बढ़ते मामलों का एक प्रमुख कारण है. दरअसल, यह सिंड्रोम विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का एक ग्रुप है, जो मिलकर टाइप 2 डायबिटीज, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक बढ़ा देता है।      जेनेटिक संवेदनशीलता: कई अध्ययनों से पता चलता है कि अन्य आबादी की तुलना में, भारतीयों में आमतौर पर डायबिटीज होने की जेनेटिक प्रवृत्ति अधिक होती है, साथ ही उनमें 'इंसुलिन प्रतिरोध' का लेवल भी अधिक होता है।  आर्थिक रूप से डेवलप राज्यों में, 'नॉन कम्युनिकल डिजीज' (NCDs) (जैसे कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर) की रेट लाइफस्टाइल में बदलावों के कारण बढ़ी हुई दिखाई देती हैं. इसी वजह से केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ये आंकड़े विशेष रूप से हाई हैं. इन क्षेत्रों में आमतौर पर बेहतर हेल्थ केयर इंफ्रास्ट्रक्चर और हाई लेवल ऑफ पब्लिक अवेयरनेस होता है. इसके चलते, कम आय वाले और कम शहरीकृत राज्यों की तुलना में यहां ज्यादा संख्या में मामलों की पहचान की जाती है और उनकी रिपोर्ट की जाती है.. डायबिटीज के मरीजों को किन चीजों से परहेज करना चाहिए? डायबिटीज के मरीजों को नमक का सेवन कम करना चाहिए. नॉन-वेज खाना, डेयरी प्रोडक्ट्स, आइसक्रीम, नारियल का तेल और चिकन में फैट ज्यादा होता है. अगर आपको डायबिटीज है, तो आपको फास्ट फूड और तली-भुनी चीजों से दूर रहना चाहिए. आपको नाश्ते में उपमा, बोंडा, वड़ा या पूरी नहीं खानी चाहिए. डॉ. श्रद्धेय कटियार ने अपने ट्विटर (X) हैंडल पर डायबिटीज के मरीजों के लिए 31 सबसे खराब चीजों की एक लिस्ट शेयर की है, जो इस प्रकार है… आटा या मैदा उबला आलू कम फैट वाली मिठाइयां बिस्कुट अनानास स्किम्ड दूध रस्क तरबूज प्रोटीन बार मैरी बिस्कुट शहद आम दलियां सूजी इडली/चीला … Read more

चौंकाने वाला खुलासा: डायबिटीज में हार्ट फेलियर की असली वजह दवाएं नहीं, बल्कि फिजिकल एक्टिविटी की कमी

क्या आप जानते हैं कि डायबिटीज के मरीजों में हार्ट फेलियर और दिल की अन्य बीमारियों का एक बहुत बड़ा कारण केवल 'शारीरिक निष्क्रियता' है? हाल ही में हुए एक शोध ने इस बात की पुष्टि की है कि अगर डायबिटीज के मरीज फिजिकली एक्टिव नहीं रहते हैं, तो उनके लिए जानलेवा जोखिम काफी बढ़ जाते हैं। भारत के लिए चिंताजनक आंकड़े 'जर्नल ऑफ स्पोर्ट एंड हेल्थ साइंस' में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, भारत में डायबिटीज के मरीजों में हार्ट फेलियर के 13 प्रतिशत से भी ज्यादा मामलों के पीछे मुख्य वजह शारीरिक गतिविधि की कमी है। यह शोध बताता है कि भारत में डायबिटीज पीड़ितों में: कोरोनरी हृदय रोग के 9.6 प्रतिशत मामले, और हृदय संबंधी अन्य जटिलताओं के 9.4 प्रतिशत मामले केवल इसलिए होते हैं क्योंकि मरीज पर्याप्त शारीरिक व्यायाम या गतिविधि नहीं करते। विशेषज्ञों की क्या है राय? ब्राजील के रियो ग्रांडे डो सुल संघीय विश्वविद्यालय की शोधकर्ता जेन फेटर ने इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि डायबिटीज होने के बाद अन्य जटिल बीमारियां होना तय है, लेकिन यह सच नहीं है। जेन फेटर के अनुसार, "हमारे निष्कर्ष इस पुरानी धारणा को चुनौती देते हैं। यह साफ है कि अगर डायबिटीज के मरीज अपनी शारीरिक गतिविधि को उचित तरीके से बढ़ा लें, तो इन गंभीर बीमारियों के एक बड़े हिस्से को रोका जा सकता है।" 23 लाख लोगों पर हुआ शोध शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए दक्षिण एशिया सहित दुनिया भर के अलग-अलग क्षेत्रों से 23 लाख से अधिक वयस्क डायबिटीज मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ी रक्त वाहिकाओं की समस्याओं और आंखों की बीमारी के दस में से एक मामले का कारण निष्क्रियता ही है। बीमारियों का खतरा कितना ज्यादा? विश्लेषण में यह बात सामने आई कि शारीरिक निष्क्रियता के कारण डायबिटीज मरीजों में कई गंभीर रोगों का खतरा बढ़ जाता है:     स्ट्रोक: 10 प्रतिशत से अधिक मामले     डायबिटिक रेटिनोपैथी : 9.7 प्रतिशत     हार्ट फेलियर: 7.3 प्रतिशत     कोरोनरी हार्ट डिजीज: लगभग 5 से 7 प्रतिशत क्या है बचाव का रास्ता? इस खतरे को कम करने का उपाय बहुत ही सरल है- व्यायाम। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह है कि हर व्यक्ति को प्रति सप्ताह कम से कम 150 मिनट मध्यम से तीव्र शारीरिक गतिविधि जरूर करनी चाहिए। थोड़ी-सी सक्रियता डायबिटीज के मरीजों को हार्ट फेलियर और स्ट्रोक जैसे बड़े खतरों से बचा सकती है।  

डायबिटीज की पहचान अब कलाई पर! दुबई में स्मार्टवॉच से हो रही नई टेस्टिंग

दुबई में एक ऐसी स्मार्टवॉच की टेस्टिंग चल रही है, जो लोगों को डायबटीज रिस्क के बारे में बताएगी। मंगलवार को दुबई में वर्ल्ड हेल्थ एक्सपो (WHX) 2026 का आयोजन किया गया। इसमें डायबिटीज के खतरे का पता लगाने के लिए स्मार्टवॉच टेक्नोलॉजी के बारे में बताया गया है। इसका मकसद बढ़ते डायबिटीज संकट से निपटना है। दुनिया भर में लाखों लोगों को यह भी नहीं पता चल पाता है कि उन्हें डायबटीज का खतरा है। इस कारण स्मार्टवॉच टेक्नोलॉजी के जरिए लोगों की मदद की जा रही है। इसके लिए नए स्टडी हो रही है, जिसमें स्मार्टवॉच की टेस्टिंग हो रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वॉच डायबटीज रिस्क के बारे में कितनी सटीक जानकारी दे सकती है। Huawei Watch GT 6 Pro की हो रही टेस्टिंग आजकल मार्केट में अलग-अलग तरह के गैजेट्स आते हैं। स्मार्टवॉच के जरिए लोग अपनी कई हेल्थ एक्टिविटीज को ट्रैक कर पाते हैं। दुनिया में डायबटीज के मरीज दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इससे निपटने के लिए नई स्मार्टवॉच टेक्नोलॉजी पर काम चल रहा है। Gulf News की रिपोर्ट के अमुसार, दुबई हेल्थ के तहत मोहम्मद बिन राशिद यूनिवर्सिटी (MBRU) में असिस्टेंट प्रोफेसर और एंडोक्राइनोलॉजी डायबिटीज स्पेशलिस्ट डॉ. मरियम अल सईद ने बताया कि रिसर्च में 150 मरीजों और वॉलंटियर्स पर Huawei Watch GT 6 Pro को टेस्ट किया जाएगा। यह टेस्टिंग इसलिए है ताकि यह देखा जा सके कि वॉच बढ़े हुए ब्लड ग्लूकोज लेवल को पहचानने में कितनी सही है। टेस्टिंग में शामिल होंगे कई लोग इस ट्रायल में 50 हेल्दी वॉलंटियर्स, 50 जाने-माने डायबिटीज के मरीज के साथ दुबई हेल्थ हॉस्पिटल और शहर भर के प्राइमरी हेल्थकेयर सेंटर से 50 प्री-डायबिटीज वाले मरीज भी शामिल होंगे। डॉ. सईद ने प्री-डायबिटीज ग्रुप में खास दिलचस्पी दिखाई। बता दें कि यह ग्रुप उन लोगों का है, जिनका ब्लड शुगर लेवल कभी ज्यादा और कभी कम हो सकता है और जिन्हें अपनी हालत के बारे में पता हो भी सकता है और नहीं भी। ​ट्रेडिशनल कैपिलरी ग्लूकोज मॉनिटर से होगी तुलना स्टडी में स्मार्टवॉच की रीडिंग की तुलना ट्रेडिशनल कैपिलरी ग्लूकोज मॉनिटर से की जाएगी। यह वह टेस्ट होता है, जिसमें एक्यूरेसी टेस्ट करने के लिए उंगली पर सुई चुभाते हैं और बल्ड की एक बूंद से टेस्ट किया जाता है। बता दें कि Huawei ने WHX में Huawei Health Strategy and Research Platform इवेंट में Huawei Watch GT 6 Pro के लिए डायबिटीज रिस्क के नए फीचर की घोषणा की थी। इसके बाद यह स्टडी की घोषणा हुई। क्या है टेक्नोलॉजी? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Huawei Watch GTX में फोटोप्लेथिस्मोग्राफी (PPG) का इस्तेमाल होता है। यह एक ऑप्टिकल तरीका है, जो लाइट सेंसर के जरिए ब्लड ग्लूकोज का अंदाजा लगा सकता है। कलाई पर पहना जाने वाले एक बाहरी और नॉन-इनवेसिव डिवाइस होने के कारण यह मिनिमली इनवेसिव कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटर से अलग है, जिन्हें स्किन के नीचे लगाना पड़ता है। डॉ. अल सईद ने कहा कि वॉच यह नहीं बताएगी कि आपको डायबिटीज है, लेकिन यह उन्हें बताएगी कि ग्लूकोज बढ़ा हुआ है। इस तरह वॉच आपको सिग्नल देगी कि शायद आपको अपने डॉक्टर के पास जाकर लैब टेस्ट करवाना चाहिए। जल्दी पता लगाना है जरूरी डॉ. सईद ने कहा कि दुनिया भर में 500 मिलियन से भी ज्यादा लोग टाइप 2 या टाइप 1 डायबिटीज के डायग्नोसिस के साथ जी रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को डायग्नोस नहीं हुआ है, उन्हें ये पता ही नहीं है कि उनको डायबिटीज है, क्योंकि उन्होंने कभी चेकअप ही नहीं करवाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्री-डायबिटीज वाले दो-तिहाई लोगों में कुछ समय बाद यह बीमारी पूरी तरह हो जाती है, इसलिए इसका जल्दी पता लगाना बहुत जरूरी है।

ग्वालियर की पीएचडी स्कॉलर डॉ. ललिता ने बनाई नेचुरल क्रीम, डायबिटीज मरीजों के घाव होंगे जल्दी भरने लगे

ग्वालियर:  आमतौर पर शरीर में घाव होने पर उसे भरने में कई दिन लगते हैं और मरीज को डायबिटीज हो तो घाव भरने की गारंटी तक नहीं होती, लेकिन ग्वालियर की डॉ ललिता ने ऐसी नेचुरल क्रीम तैयार की है. जिसे लगाने पर डायबिटिक मरीजों के घाव एक से तीन महीने में भर जाते हैं. नीम, एलोवेरा जैसे औषधीय गुणों वाले प्लांट्स से तैयार इस नेचुरल क्रीम का उन्होंने 200 वालंटियर मरीजों पर सफल ट्रायल किया. अब सस्ते दाम में बिना साइड इफेक्ट वाला अपना हर्बल ऑइंटमेंट वे मार्केट में उतारने की तैयारी में हैं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को उनकी रिसर्च का फायदा मिल सके. 7 साल की मेहनत और तैयार हुआ पूरी तरह नेचुरल ऑइंटमेंट ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग में गेस्ट फैकल्टी रही पीएचडी स्कॉलर डॉ ललिता कुशवाह ने 7 वर्षों की मेहनत और रिसर्च से एक नेचुरल और हर्बल क्रीम तैयार की है. ये मरहम मुख्यरूप से ऐसे मरीजों के लिए बनाया है, जो डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारी में उनके घाव ठीक कर सकता है. डॉ ललिता ने इसे एलोवेरा, नीम, गेंदे के फूल, करक्यूमिन और घमरा जैसे औषधीय पौधों से तैयार किया है. 'फाइटोकेमिकल' बेस्ड है ऑइंटमेंट, कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं  डॉ ललिता कुशवाह ने बताया कि, "उन्होंने इस प्राकृतिक मरहम को मुख्य रूप से डायबिटिक मरीजों के लिए बनाया है. वे कहती हैं कि, उनका ऑइंटमेंट फाइटोकेमिकल (पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक रसायन) आधारित है. इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है. इससे मरीजों पर इस्तेमाल में किसी तरह की एलर्जी या रिएक्शन का खतरा नहीं होता. आम घाव और डाइबिटिक मरीजों के घाव में क्या फर्क? आमतौर पर जब किसी चोट की वजह से कोई घाव बनता है, तो वह तेजी से हील (ठीक) होता है, लेकिन डायबिटीज के बीमारी होने पर ब्लड शुगर लेवल ज्यादा होने पर जब किसी को कोई घाव या छाले होते हैं, तो वह बहुत धीमी गति से ठीक होते हैं. कई बार कई केसेस में यह ठीक भी नहीं होते और घाव गैंगरीन में तब्दील हो जाता है. जिसका इलाज आसानी से नहीं हो पाता. जिसका नतीजा यह होता है कि, एक छोटा सा घाव डायबिटीज की वजह से इस कदर खराब हो जाता है कि शरीर के उस हिस्से को ही अलग करना पड़ जाता है. एनिमल ट्रायल में 12 दिन में ठीक हुआ डायबिटिक वाउंड ललिता कुशवाह बताती हैं कि, इस ऑइंटमेंट को तैयार करने के बाद इसका ट्रायल भी किया गया था. सबसे पहले इसे सामान्य जानवरों पर टेस्ट किया गया था. इसका रिजल्ट बहुत अच्छा मिला, इसके बाद कुछ टेस्ट में एनिमल्स का ब्लड शुगर बढ़ाया गया और उनके घाव पर जब इसे टेस्ट किया गया तो 400 एमएम स्क्वायर का घाव महज 12 दिनों में हील हो गया. इसके साथ ही अन्य पैरामीटर में भी अच्छे रिजल्ट मिले, इसमें इंफ्लेमेशन रिड्यूस हुआ, स्किन एंड सेल रीजेनरेशन तेज हुआ. कॉलेजिन फास्ट हुआ, ऐसे में कहा जाए तो एनिमल ट्रायल का रिजल्ट बहुत अच्छा मिला. इसी आधार पर फिर ह्यूमन ट्रायल किए गए. 200 मरीजों पर सफल ह्यूमन ट्रायल ह्यूमन ट्रायल के लिए भी हर्बल ऑइंटमेंट अप्लाई कर नॉन डायबिटिक मरीजों के घाव की हीलिंग को डायबिटिक वाउंड्स की हीलिंग से तुलना की गई तो दोनों में ही काफी अच्छे नतीजे मिले. इसके लिए जीआरएमसी कॉलेज की डॉ मनीषा जादौन मेडम ने मरीज उपलब्ध कराए. जीआरएमसी के 200 से ज़्यादा वॉलेंटियर डायबटिक मरीजों पर मेडिकल कॉलेज में जाकर ऑइंटमेंट अप्लाई कर ट्रायल पूरा किया था. 30 से 90 दिनों में ठीक हुआ छोटे से बड़ा घाव टेस्ट रिजल्ट के लिए डायबिटिक मरीजों के घाव तीन कैटेगरी में बांटे गए, क्योंकि घाव कितना बड़ा और गहरा है हीलिंग उस पर निर्भर करती है. छोटे घाव कम समय में जबकी बड़े घाव ठीक होने में ज्यादा समय लगता है. इसलिए इन्हें तीन कैटेगरी में बांटा गया था. स्मॉल वाउंड्स, मीडियम वाउंड्स और मॉडरेट वाउंड्स. जिसमें ऑइंटमेंट लगाने पर स्मॉल वाउंड लगभग 30 दिनों में जबकि उनके आकार के हिसाब से मीडियम और मॉडरेट वाउंड 80 से 90 दिनों के अंदर पूरी तरह ठीक हो गए. जल्द मार्केट में दिखेगा हर्बल ऑइंटमेंट, पेटेंट के लिए भी अप्लाई आगे की प्लानिंग बताते हुए डॉ ललिता कुशवाह ने बताया कि, उनकी कोशिश है की वे अपने इस हर्बल प्रोडक्ट को जल्द से जल्द मार्केट में लेकर आएं, जिससे इसका फायदा समाज और जरूरतमंद मरीजों को मिल सके. उन्होंने अपना हर्बल मरहम तैयार करने के बाद उसके पेटेंट के लिए अप्लाई कर दिया है. जिस पर प्रोसेस चल रही है, पेटेंट मिलने के बाद वे इसे बाजार में भी लॉन्च करेंगी. 'कम से कम दाम में मरीजों को उपलब्ध करा सके दवा डॉ ललिता कहती है कि, जब वे ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में जाती थी, तो वहां वे ऐसे कई मरीजों को देखती थीं. जिनके पास इलाज तक के लिए रुपये नहीं होते थे. इनमें कई मरीज डायबिटीज की वजह से होने वाले शारीरिक समस्याओं से ग्रसित मिलते थे. इसलिए उन्होंने ये फैसला लिया कि, वे ऐसे मरीजों के लिए कम से कम दाम में दवा उपलब्ध कराएंगी. जिससे मरीजों को उसका फायदा मिले, तभी उनकी पीएचडी, रिसर्च और मेहनत सफल हो पाएगी."

डायबिटीज से जूझता भारत, 2030 तक दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनेगा ये रोग

 नईदिल्ली  भारत डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के टाइम बम पर खड़ा है. लेंसेट इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं. 2030 तक यह आंकड़ा दोगुना होने की आशंका है. अब नेचर जर्नल में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट ने बेहद भयावह भविष्यवाणी की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 30 सालों में यानी मोटा-मोटी 2050 तक डायबिटीज देश के लिए इतना परेशान करने वाला होगा कि यह देश पर अर्थव्यवस्था का दूसरा सबसे बड़ा बोझ बन जाएगा. रिपोर्ट में क्या है इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लायड सिस्टम एनालिसिस और वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनोमिक्स ने मिलकर 204 देशों मे डायबिटीज के बर्डन को लेकर यह अध्ययन किया है. इसी अध्ययन में बताया गया है कि डायबिटीज के कारण अगले 30 सालों में दुनिया की अर्थव्यवस्था पर 10 ट्रिलियन डॉलर का बोझ बढ़ने वाला है. 1 ट्रिलियन एक हजार अरब होता है. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना बड़ा बोझ है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, भारत और चीन पर डायबिटीज का सबसे ज्यादा खर्च होने वाला है. डायबिटीज़ से होने वाला सबसे बड़ा आर्थिक बोझ संयुक्त राज्य अमेरिका पर होगा जहां यह 2.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च होगा. इसके बाद भारत को इस पर 1.6 ट्रिलियन डॉलर खर्च करना होगा और चीन को 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करना होगा. कैसे साल दर साल बढ़ रहे हैं केस दो-तीन दशक पहले भारत में सिर्फ कॉलरा, टायफॉयड, डेंगू मलेरिया जैसी इंफेक्शन वाली बीमारियों के बारे में ही चर्चा होती थी. डायबिटीज के बारे में तो अधिकांश लोग जानते भी नहीं थे लेकिन 2000 के बाद जब शहरीकरण ने तेजी से अपना पैर पसारना शुरू कर दिया, नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों की बाढ़ आ गई है. भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अचानक 2000 में डायबिटीज के 3.2 करोड़ मरीज सामने आ गए. 2007 में यह दोगुना हो गया. 2017 में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में डायबिटीज मरीजों की संख्या बढ़कर 7.3 करोड़ हो गई. फिलहाल यह माना जाता है कि भारत में 10 करोड़ लोग डायबिटीज की बीमारी से पीड़ित हैं लेकिन 10 करोड़ से कहीं ज्यादा प्री-डायबिटीज के शिकार हैं. यह आंकड़ा तो बहुत कम है, असली चिंता इस बात की है कि भारत में अधिकांश लोगों को पता ही नहीं कि उन्हें डायबिटीज की बीमारी है. यही कारण है नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन हम सब के लिए आंख खोलने वाला है. क्यों बढ़ रहे हैं डायबिटीज के मामले     परंपरागत भोजन में कमी-1960 से 70 के दशक तक भारतीयों का भोजन एकदम शुद्ध अनाज पर आधारित था. रिफाइंड, कृत्रिम रुप से बने भोजन, पैकेटबंद फूड, प्रोसेस्ड फूड न के बराबर था. इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होती थी जिसके कारण कई क्रोनिक बीमारियों का खतरा कम रहता था. लेकिन औद्योगिकरण के बाद चावल और गेहूं पॉलिस्ड होने लगा जिसके बाद फाइबर की मात्रा में कमी आने लगी. वहीं रिफाइंड और तेल का प्रयोग ज्यादा होने लगा. इस कारण से हमारे परंपरागत भोजन में कटौती आने लगी.     प्रोसेस्ड फूड-पिछले दो दशक से लोगों के भोजन में प्रोसेस्ड और रिफाइंड फूड का चलन बढ़ा है. रिफाइंड तेल, चीनी, चीज, बटर, मैदा से बनी चीजें आदि खूब खाया जाने लगा है. हर दिन पिज्जा, बर्गर, सॉफ्ट ड्रिंक, सोडा, बिस्किट, चॉकलेट आदि लोगों के जीवन का हिस्सा बनने लगे हैं. अधिकांश चीजों में इन प्रोसेस्ड चीजों को इस्तेमाल होता है और इसे हम खाते हैं. ये प्रोसेस्ड चीजें डायबिटीज, शुगर आदि बीमारियों का सबसे बड़ा कारण है.     फिजिकल एक्टिविटी में कमी-शारीरिक रूप से सक्रिय न होना इन क्रोनिक बीमारियों की बहुत बड़ी वजह है. पहले के लोग हमेशा किसी न किसी तरह के काम में लगे रहते थे. गांवों में खेतों में काम में पूरा परिवार लगा रहता था. मशीनों का इस्तेमाल बहुत कम होता था. किन आज लोगों के पास समय का बहुत अभाव है. अधिकांश लोग ऑफिस में चेयर पर बैठकर काम करते हैं. सुबह से लेकर शाम तक की ड्यूटी होती है जिनकी वजह से समय नहीं मिल पाता. वहीं शहरीकरण शारीरिक गतिविधियों को और अधिक प्रभावित किया है. जब तक आप शारीरिक गतिविधियां नहीं करेंगे डायबिटीज, हार्ट डिजीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का खतरा नहीं घटेगा.     तनाव और डिप्रेशन-आधुनिकरण के बाद लोगों में तनाव और डिप्रेशन की समस्या काफी बढ़ गई है. लोगों के उपर काम का बोझ बहुत ज्यादा रहता है जिसके कारण उनके उपर दबाव बहुत अधिक होता है. वहीं लोगों की महत्वाकांक्षा बहुत बढ़ गई जिसके कारण वह उन चीजों को पाने के लिए वह किसी भी बद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं. तनाव के कारण शरीर में खतरनाक केमिकल की बाढ़ जाती है जो कई क्रोनिक बीमारियों की वजह बनती है.     पॉल्यूशन-क्रोनिक बीमारियों के बढ़ने की बड़ी वजह पॉल्यूशन भी है. औद्योगिकीकरण के बाद लाखों फैक्ट्रियों से खतरनाक रसायन निकल रहे हैं जो हवा में घुलकर हमारी सांसों में आते हैं और हमें बीमार करते हैं. फिर इन बीमारियों से कैसे छुटकारा पाएं इस विषय पर जब हमने मोरेंगो एशिया अस्पताल में डायबेट्स एंड मेटाबोलिक डिसॉर्डर के डायरेक्टर डॉ. पारस अग्रवाल से बात की तो उन्होंने कहा कि डायबिटीज के खतरे को टालना बहुत आसान है. बस जो चीजें डायबिटीज के जोखिम को बढ़ाता है, उन्हें अपने जीवन से निकाल दीजिए. पुराने वाली लाइफस्टाइल अपना लीजिए. जैसा हमारे पूर्वज खाते-पीते और रहते थे, वैसा जीवन अपना लीजिए. मसलन शुद्ध अनाज, हरी सब्जियां, दाल, फल, सीड्स आदि का सेवन कीजिए. आज की जितनी खाने पीने की चीजें और वो प्रोसेस्ड है, उन्हें मत खाइए और अपनी शारीरिक गतिविधियों को बढ़ाइए. रोज कम से कम आधा घंटा एक्सरसाइज कीजिए. खूब वॉक कीजिए. खूब पानी पीजिए, पर्याप्त नींद लीजिए और तनाव को भगाकर खुश रहिए. इन आदतों से सिर्फ डायबिटीज ही नहीं, हार्ट डिजीज, किडनी डिजीज और लिवर डिजीज का जोखिम भी कम हो जाएगा.

सल्फोनिल्यूरिया दवा से डायबिटीज कंट्रोल करने में दिक्कत, नई रिसर्च में आया बड़ा खुलासा

 नई दिल्ली डायबिटीज को शुगर की बीमारी कहा जाता है. इसमें शरीर में शुगर यानी ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है. यह दुनिया के साथ-साथ भारत में भी सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में से एक है. टाइप 2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर बढ़ जाती है. इंसुलिन अग्न्याशय की बीटा कोशिकाएं बनाती हैं जो ब्लड शुगर कंट्रोल करती हैं. लेकिन हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना की रिसर्च में सामने आया है कि टाइप 2 डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए आमतौर पर जो दवा दी जाती है, वही दवा लंबे समय में टाइप 2 डायबिटीज को और भी बदतर कर सकती है. क्या कहती हैं रिसर्च? Diabetes, Obesity and Metabolism में पब्लिश हुई रिसर्च के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में सल्फोनिल्यूरिया कैटेगरी की दवाएं जैसे ग्लिबेनक्लामाइड सालों से उपयोग की जा रही हैं. स्टडी के लीड प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या ने समझाया, 'टाइप 2 डायबिटीज में सालों से सल्फोनिल्यूरिया दवाएं दी जाती रही हैं जो बीटा कोशिकाओं को अधिक इंसुलिन रिलीज के लिए स्टिम्युलेट करती हैं.' 'ग्लिबेनक्लामाइड इन्हीं में से एक कॉमन दवा है जो कई देशों में जेनरिक फॉर्म में उपलब्ध है. लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि जब बीटा कोशिकाएं लंबे समय तक ऐसी दवा के संपर्क में रहती हैं तो उनकी सेहत और पहचान दोनों पर नेगेटिव असर पड़ सकता है.' बीटा सेल्स खो रहे हैं अपनी पहचान प्रोफेसर मोंटाण्या के अनुसार, बीटा कोशिकाएं दवाओं के कारण मरती नहीं हैं बल्कि वे अपनी पहचान खो देती हैं. टेस्टिंग में पाया गया है कि ग्लिबेनक्लामाइड के लंबे समय तक प्रयोग से उनकी जीन एक्टिविटी कम हो जाती है जो इंसुलिन प्रोडक्शन के लिए जरूरी होते हैं.' 'रिसर्च में पाया गया कि यह दवाएं कोशिकाओं के भीतर 'एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम' में तनाव पैदा करती है, जिससे उनकी पहचान खत्म होने लगती है.' दवा का असर कम होने की मिली वजह! प्रोफेसर मोंटाण्या ने कहा, 'अक्सर देखा जाता है कि शुरुआत में बेहतर असर दिखाने वाली दवाएं बाद में बेअसर हो जाती हैं और मरीजों को उसके बाद हैवी खुराक या नई दवाएं देनी पड़ती हैं.' 'दरअसल, कोशिकाओं की पहचान खोने से धीरे-धीरे ब्लड शुगर पर कंट्रोल कम होने लगता है जिससे शुगर और बढ़ने लगती है. सेल्स आइडेंटिटी लॉस, सेल डेथ की तरह स्थायी नहीं होती यानी सही ट्रीटमेंट से बीटा कोशिकाओं की पहचान और इंसुलिन बनाने की क्षमता दोबारा लौटाई जा सकती है. दवा की डोज बढा़ने का कारण आया सामने विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना बंद न करें लेकिन यह रिसर्च बताती है कि लंबे समय तक सल्फोनिल्यूरिया इस्तेमाल करने से ब्लड शुगर कंट्रोल धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है. यही वजह है कि कई मरीजों को समय के साथ दवा की खुराक बढ़ानी या दूसरी दवा जोड़नी पड़ती है.

डायबिटीज बिना लक्षण देती है दस्तक, बचाव के लिए ये तीन जरूरी टेस्ट जरूर कराएं

नई दिल्ली डायबिटीज यानी ब्लड शुगर बढ़े रहने की समस्या सभी उम्र के लोगों में आम होती जा रही है। लाइफस्टाइल में गड़बड़ी के कारण होने वाली ये समस्या अब 20 से कम आयु वालों को भी अपना शिकार बनाती जा रही है। जिन लोगों के परिवार में जैसे माता-पिता या करीबी रिश्तेदारों में किसी को हाई शुगर की समस्या रही हो ऐसे लोगों को अपनी सेहत को लेकर विशेष सावधानी बरतते रहने की सलाह ही जाती है। डायबिटीज को लेकर चिंता की बात यह है कि शुरुआती स्थिति में इसके लक्षण इतने हल्के होते हैं, कि लोग समय पर बीमारी की पहचान नहीं कर पाते। अगर ब्लड शुगर लंबे समय तक सामान्य से अधिक बना रहता है तो इसके कारण धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाने लगता है। डॉक्टर कहते हैं, अगर समय रहते शुगर को नियंत्रित करने के उपाय कर लिए जाएं, तो यह कई गंभीर जटिलताओं से बचाव हो सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि आपको अपनी बीमारी के बारे में पता हो। डॉक्टर कहते हैं, अगर समय रहते कुछ जांच करा लिए जाएं तो इससे बहुत आसानी से स्पष्ट हो सकता है कि आपको डायबिटीज है या नहीं? या फिर इसका खतरा तो नहीं है? क्या कहते हैं विशेषज्ञ? अमर उजाला से बातचीत में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ वसीम गौहरी कहते हैं, समय पर डायबिटीज की पहचान मौजूदा समय में बहुत जरूरी है क्योंकि ये बीमारी भारतीय आबादी में तेज रफ्तार से बढ़ती जा रही है। डायबिटीज का समय पर इलाज शुरू करने के लिए कुछ जरूरी टेस्ट सभी लोगों को करा लेने चाहिए। अगर आपको डायबिटीज का शक है या परिवार में पहले से किसी को डायबिटीज की दिक्कत रही है तो समय रहते अपनी जांच जरूर कराएं। कुछ जरूरी जांचों से शुगर की समस्या को समय रहते पकड़ा जा सकता है। फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट, पोस्ट प्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट और HbA1c टेस्ट से शरीर में शुगर की स्थिति का सही आकलन होता है। फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट शरीर में खाली पेट शुगर के स्तर को मापने में मदद करती है। इस जांच के लिए कम से कम 8 से 10 घंटे तक कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। सामान्य ब्लड टेस्ट से यह समझने में मदद मिलती है कि शरीर बिना भोजन के शुगर को कितनी अच्छी तरह नियंत्रित कर पा रहा है। पोस्ट प्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट पोस्ट प्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट भोजन करने के लगभग 2 घंटे बाद किया जाता है। इस टेस्ट से पता चलता है कि खाना खाने के बाद शरीर शुगर को कैसे मैनेज कर रहा है। सामान्य स्थिति में पोस्ट प्रांडियल ब्लड शुगर 140 mg/dL से कम होना चाहिए। 180 या उससे अधिक की रीडिंग होने पर डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। HbA1c टेस्ट HbA1c टेस्ट पिछले 2 से 3 महीनों की औसत ब्लड शुगर की जानकारी देता है। डायबिटीज के मरीजों को हर 3 महीने के अंतराल पर ये टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है। इस टेस्ट का सामान्य स्तर 5.7 प्रतिशत से कम होना चाहिए। 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक होने पर डायबिटीज की पुष्टि होती है। ग्लूकोमीटर और शुगर के अन्य जांच की तुलना में इस टेस्ट को अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इसके लिए फास्टिंग की जरूरत भी नहीं होती और यह रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होता। यह टेस्ट डायबिटीज के कारण होने वाली जटिलताओं के जोखिम को समझने में बेहद उपयोगी साबित होता है।

डायबिटीज मरीज हो जाएं अलर्ट! एक्सपर्ट ने बताया हार्ट अटैक का बड़ा रिस्क

देश में डायबिटीज के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह केवल ब्लड शुगर की समस्या तक सीमित नहीं है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि डायबिटीज धीरे-धीरे शरीर के कई अहम अंगों को प्रभावित करती है, खासकर हार्ट को। World Heart Federation की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में डायबिटीज से पीड़ित लोगों में हार्ट अटैक और अन्य हार्ट संबंधी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर शुरुआती संकेतों को मरीज समझ नहीं पाते, जिससे समस्या गंभीर हो सकती है। आरएमएल हॉस्पिटल के मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. सुभाष गिरि के अनुसार, लंबे समय तक उच्च ब्लड शुगर नसों को नुकसान पहुंचाता है। इससे हार्ट तक खून पहुंचाने वाली नसें कमजोर और संकरी हो सकती हैं, जिससे हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं भी आमतौर पर डायबिटीज मरीजों में जुड़ी रहती हैं, जो जोखिम और बढ़ा देती हैं। डॉ. गिरि बताते हैं कि डायबिटीज के कारण शरीर में सूजन और फैट जमा होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप नसें सख्त हो सकती हैं। इसके अलावा, कई बार हार्ट अटैक के सामान्य लक्षण डायबिटीज मरीजों में साफ नजर नहीं आते, जिससे समय पर इलाज नहीं मिल पाता। लक्षणों में अक्सर सीने में तेज दर्द की जगह हल्का दबाव, जलन या असहजता महसूस होना, सांस फूलना, अचानक थकान, चक्कर आना या पसीना आना शामिल हैं। कुछ मरीजों को जबड़े, गर्दन, कंधे या बाएं हाथ में दर्द भी महसूस हो सकता है। डायबिटीज के कारण नसों की संवेदनशीलता कम हो जाने से ये संकेत अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि डायबिटीज मरीजों को हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनी लाइफस्टाइल पर खास ध्यान देना जरूरी है। ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना, संतुलित और पौष्टिक आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल स्तर पर नजर रखना, तनाव कम करना और पर्याप्त नींद लेना इसके लिए अहम कदम हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी असामान्य लक्षण या बदलाव को अनदेखा न करें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि समय पर इलाज ही डायबिटीज मरीजों के लिए हार्ट अटैक के खतरे को कम करने का सबसे कारगर तरीका है।  

स्टडी में दावा: शुगर के मरीजों की बॉडी में कैंसर सेल्स को मिलती है अतिरिक्त ऊर्जा

लखनऊ डायबिटीज में कैंसर कोशिकाओं को अनुकूल माहौल मिल जाता है। केजीएमयू के अध्ययन में देखा गया कि डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर से एक साथ पीड़ित व्यक्तियों में इंसुलिन और आइजीएफ- 1 का स्तर सामान्य कैंसर रोगियों की तुलना में लगभग दोगुणा होता है। एचबीएसी का बढ़ा हुआ स्तर सीधे तौर पर कैंसर की गंभीरता से जुड़ा पाया गया। लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड) में गड़बड़ी भी कैंसर की आशंका बढ़ा देती है । 300 मरीजों पर अध्ययन शोध में शामिल 100 पुरुष बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) से, 100 केवल प्रोस्टेट कैंसर से और 100 डायबिटीज के साथ प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। इन सभी के हार्मोनल और मेटाबोलिक प्रोफाइल से निष्कर्ष निकाला गया कि डायबिटीज, प्रोस्टेट कैंसर को अधिक आक्रामक बना देता है। कैंसर को बढ़ावा देने वाले तत्व की अधिकता शोधकर्ताओं ने पाया कि डायबिटीज में इंसुलिन, आइजीएफ – 1, एचबीए | सी और पीएसए का स्तर सामान्य पुरुषों से अत्यधिक ऊंचा रहता है। इंसुलिन और आइजीएफ-1 दोनों ही ऐसे हार्मोन हैं, जो कोशिका वृद्धि को उत्तेजित करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी मधुमेह रोगियों को प्रोस्टेट कैंसर नहीं होता, परंतु जोखिम सामान्य पुरुषों की तुलना में काफी अधिक रहता है। यह तभी कम हो सकता है, जब शुगर नियंत्रित रखी जाए, वजन सामान्य हो, भोजन संतुलित हो और जीवनशैली सक्रिय हो। प्रोस्टेट के समस्या लक्षण     बार-बार पेशाब लगना     रात में कई बार उठकर पेशाब जाना     पेशाब का फ्लो धीमा होना     पेशाब रुक-रुक कर आना     पेशाब में जलन     निचले पेट या पेल्विस में भारीपन कई बार प्रोस्टेट कैंसर शुरुआती अवस्था में बिल्कुल लक्षणहीन भी रहता है, इसलिए नियमित जांच सबसे महत्त्वपूर्ण है। कब कराएं प्रोस्टेट की जांच     सामान्य पुरुषों को 50 वर्ष के बाद     डायबिटिक वालों को 45 की उम्र के बाद     जिनके परिवार में इसका इतिहास है, उन्हें 40 वर्ष के बाद     पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जाम (डीआरई) साल में एक बार जरूर कराना चाहिए। यदि शुगर अधिक समय से अनियंत्रित हो या मोटापा अधिक हो तो यह जांच 6-12 महीने में दोहरानी चाहिए। बचाव के आसान तरीके     रोज 30-45 मिनट तेज चाल से चलना     वजन (बीएमआई) के अनुसार रखना     मीठे, तले और प्रोसेस्ड फूड से बचना     फाइबर युक्त भोजन- सलाद, सब्जियां     नियमित ब्लड शुगर और पीएसए जांच विशेषज्ञों का कहना है कि इन उपायों से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम होता है। सही जीनवशैली और समय पर जांच जरूरी हर डायबिटिक पुरुष को 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट की नियमित जांच करानी चाहिए भले ही कोई लक्षण न हों। डायबिटीज के चलते होने वाली सूजन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और डीएनए की मरम्मत प्रणाली को कमजोर करती है। ऐसे में कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने आसानी होती है। डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर का मेल कैंसर को अधिक खतरनाक बना देता है। मोटे पुरुषों में एस्ट्रोजन बढ़ता है, टेस्टोस्टेरोन घटता है और इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है । इस स्थिति को ही 'मेटाबोलिक सिंड्रोम' कहा जाता है। पेट की चर्बी, हाइ ब्लड प्रेशर, हाइ ट्राइग्लिसराइड, कम एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्राल) और हाइ ब्लड शुगर प्रोस्टेट कोशिकाओं के कैंसर में बदलने की आशंका बढ़ाते हैं। कुछ शोधों में पाया गया है कि मेटफार्मिन जैसी दवाएं कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि धीमा कर सकती है। हालांकि जीवनशैली पर नियंत्रण, वजन प्रबंधन और नियमित जांच सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है।  

डायबिटीज का खतरा कम करना है? तो पेट की चर्बी को कहें अलविदा

नई दिल्ली टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित लोगों में गुर्दे की बीमारी, दिल का दौरा या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है और मृत्यु दर भी बढ़ जाती है। कुछ साल पहले तक, टाइप 2 मधुमेह को अपरिवर्तनीय माना जाता था। अब हम जानते हैं कि कुछ रोगियों में, वज़न में भारी कमी लाकर, टाइप 2 मधुमेह को कम किया जा सकता है। इसके बाद, रोगी स्वस्थ हो जाते हैं, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं होते। हालाँकि, यह कमी शायद ही कभी स्थायी होती है: ज़्यादातर रोगियों में 5 साल बाद फिर से टाइप 2 मधुमेह विकसित हो जाता है। इसलिए, डीज़ेडडी के शोधकर्ताओं ने इस बात की जाँच की कि क्या टाइप 2 डायबिटीज़ के शुरुआती चरण, प्रीडायबिटीज़, को उलटना संभव है। प्रीडायबिटीज़ में, रक्त शर्करा का स्तर पहले से ही बढ़ा हुआ होता है, लेकिन अभी इतना ज़्यादा नहीं होता कि टाइप 2 डायबिटीज़ कहा जा सके। लेकिन प्रीडायबिटीज़ से पीड़ित लोगों में हृदय, गुर्दे और आँखों की जटिलताएँ भी विकसित हो सकती हैं। प्रीडायबिटीज़ लाइफस्टाइल इंटरवेंशन स्टडी (पीएलआईएस), जो कि मधुमेह के एक बड़े बहुकेंद्रीय अध्ययन का हिस्सा है, में प्रीडायबिटीज़ से पीड़ित 1,105 लोगों ने एक साल के वज़न घटाने के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसमें स्वस्थ आहार और ज़्यादा शारीरिक गतिविधि शामिल थी। जब शोधकर्ताओं ने उन प्रतिभागियों का अध्ययन किया जिन्होंने कम से कम 5% वज़न कम किया था, तो उन्होंने पाया कि कुछ लोगों में वज़न में कमी आई थी, जबकि कुछ में नहीं – हालाँकि सभी के लिए सापेक्ष वज़न में कमी एक समान थी। पेट की चर्बी कम होने के कारण बेहतर इंसुलिन संवेदनशीलता वज़न कम होना अपने आप में रोगमुक्ति के लिए ज़िम्मेदार नहीं लगता। हालाँकि, जिन लोगों को रोगमुक्ति मिली थी, उनमें इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता और भी बेहतर थी। वे रक्त शर्करा कम करने वाले हार्मोन इंसुलिन के प्रति ज़्यादा संवेदनशील थे। और उन्होंने पेट की आंतरिक चर्बी भी ज़्यादा खोई थी। पेट की आंतरिक चर्बी सीधे उदर गुहा में होती है और आंतों को घेरती है। यह वसा ऊतक में सूजन की प्रतिक्रिया के माध्यम से आंशिक रूप से इंसुलिन संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती है। प्रीडायबिटीज़ में छूट पाने के लिए पेट की आंतरिक चर्बी कम करना बेहद ज़रूरी प्रतीत होता है। डीज़ेडडी शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रीडायबिटीज़ में यही चिकित्सीय लक्ष्य होना चाहिए। अब तक, वज़न कम करने का इस्तेमाल केवल टाइप 2 डायबिटीज़ की शुरुआत को टालने के लिए किया जाता रहा है। लेकिन अध्ययन में जिन लोगों को छूट मिली, उनमें कार्यक्रम समाप्त होने के 2 साल बाद तक टाइप 2 डायबिटीज़ होने का जोखिम काफ़ी कम रहा। उनके गुर्दे की कार्यक्षमता में भी सुधार देखा गया और उनकी रक्त वाहिकाओं की स्थिति भी बेहतर हुई। नए परिणामों के अनुसार, जब शरीर का वजन 5% कम हो जाता है और महिलाओं में पेट की परिधि लगभग 4 सेमी और पुरुषों में 7 सेमी कम हो जाती है, तो छूट की संभावना बढ़ जाती है।