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अब किम जोंग से पंगा लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने हजारों सैनिकों की शुरू कर दी मिलिट्री ड्रिल

वासिंगटन. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बीते 10 दिनों से जारी भीषण युद्ध का कोई अंत फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और जंग का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच अब अमेरिका ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उत्तर कोरिया का भड़कना तय है। दरअसल अमेरिका ने सोमवार को दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अभ्यास में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जिससे उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन का पारा चढ़ सकता है। दक्षिण कोरिया के 'ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ' ने जानकारी देते हुए बताया कि लगभग 18,000 कोरियाई सैनिक इस 'फ्रीडम शील्ड' अभ्यास में हिस्सा लेंगे, जो 19 मार्च तक चलेगा। हालांकि अमेरिकी सेना ने दक्षिण कोरिया में इस अभ्यास में शामिल अपने सैनिकों की संख्या नहीं बताई है इन दोनों सहयोगी देशों का यह संयुक्त अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है जब दक्षिण कोरियाई मीडिया में अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिका कुछ सैन्य संसाधनों को दक्षिण कोरिया से हटा कर ईरान के खिलाफ लड़ाई में ले जा रहा है। पैट्रियट मिसाइल सिस्टम पश्चिम एशिया भेजे जाने की खबरें इससे पहले 'यूएस फोर्सेज कोरिया' ने पिछले सप्ताह कहा था कि सुरक्षा कारणों से वह सैन्य संसाधनों की विशिष्ट गतिविधियों पर टिप्पणी नहीं करेगी। वहीं दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने भी इस खबर पर टिप्पणी करने से इनकार किया कि कुछ अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और अन्य उपकरण पश्चिम एशिया भेजे जा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि इससे सहयोगी देशों की संयुक्त रक्षा रणनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। बौखला सकता है उत्तर कोरिया 'फ्रीडम शील्ड' अभ्यास को लेकर उत्तर कोरिया की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। उत्तर कोरिया लंबे समय से सहयोगी देशों के संयुक्त अभ्यासों को आक्रमण का पूर्वाभ्यास बताता रहा है और इसे अपने सैन्य प्रदर्शनों और हथियार परीक्षणों को बढ़ाने का बहाना बनाता रहा है। अमेरिका एवं दक्षिण कोरिया का कहना है कि ये अभ्यास रक्षा उद्देश्य के लिए होते हैं।

ट्रंप की करारी शिकस्त, अमेरिका को ₹16 लाख करोड़ का फटका, भारत को मिल रही राहत

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को एक और झटका लगा है। न्यूयॉर्क के एक फेडरल जज ने फैसला सुनाया है कि जो कंपनियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए टैरिफ का पेमेंट कर चुकी हैं, उन्हें रिफंड मिलना चाहिए। एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, U.S. कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने फैसले में लिखा है कि रिकॉर्ड में दर्ज सभी इंपोर्टर्स सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फायदा पाने के हकदार हैं। ट्रंप की तरफ से पिछले साल भारत समेत करीब 60 देशों के खिलाफ जारी किए गए टैरिफ ऑर्डर्स को इस साल फरवरी महीने में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द घोषित कर दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़े लेवी लगाकर अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA), 1977 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी घोषित किया है। इसी के तहत ट्रंप ने पिछले साल टैरिफ लगाए थे। ट्रंप को 16 लाख करोड़ रुपये का झटका   कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार को 175 अरब डॉलर का रिफंड चुकाना पड़ सकता है. न्यूयॉर्क के फेडरल जज रिचर्ड ईटन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार ने जिन भी कंपनियों से अवैध टैरिफ वसूला है, उन्हें अब रिफंड करना होगा. ये कंपनियां अपना पैसा वापस पाने की हकदार हैं. जज ईटन ने कहा कि रिफंड का दायरा सिर्फ अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा,उन आयातकों पर भी लागू होगा, जिन्होंने टैक्स चुकाया है.  कोर्ट के इस फैसले से अमेरिकी खजाने पर करीब 16 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा.बता दें कि अमेरिका ने दिसंबर दिसंबर 2025 तक टैरिफ से 130 अरब डॉलर की कमाई की। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.   क्या भारत को इस फैसले से फायदा मिलेगा ?  टैरिफ हटने के बाद अमेरिका की ओर से कुल इंपोर्ट टैक्स 10 फीसदी का है. जिसका फायदा भारतीय निर्यातकों को मिला. अगर रिफंड की बात करें तो भारत को सीधे तौर पर इसका फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि भारतीय निर्यातकों ने टैरिफ का भुगतान नहीं किया, बल्कि अमेरिकी आयातकों ने भारत पर लगाए गए टैरिफ का भुगतान अमेरिकी सरकार को किया था. इस शुल्क का बोझ आयातकों ने ग्राहकों पर डाला. अमेरिकी बाजार में भारतीय प्रोडक्ट्स के लिए प्रतिस्पर्धा कड़ी हो गई. भारतीय सामान महंगे हो गए . इस टैरिफ के हटने और रिफंड का फायदा भी उन आयातकों को मिलेगा, जिन्होंने शुल्क चुकाया था.  हालांकि अप्रत्यक्ष लाभ भारत को मिलेगा, क्योंकि टैरिफ कम होने से भारत से सामान खरीदना सस्ता और आसान हो जाएगा, अमेरिकी बाजार में भारत के सामान सस्ते हो जाएंगे.  भारतीय कंपनियों को इस फैसले से लाभ मिलेगा, उनका निर्यात बढ़ेगा ईटन खास तौर पर एटमस फिल्ट्रेशन के एक केस पर फैसला सुना रहे थे। यह नैशविले, टेनेसी की एक कंपनी है, जो फिल्टर और दूसरे फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है। कंपनी टैरिफ रिफंड के अधिकार का दावा कर रही है।इस सप्ताह की शुरुआत में एक और फेडरल कोर्ट ने रिफंड प्रोसेस को धीमा करने की ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया। U.S. कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने रिफंड प्रोसेस का अगला फेज शुरू किया और इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजकर इसे सुलझाने के लिए कहा। अब U.S. कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी को रिफंड प्रोसेस करने का कोई तरीका निकालना होगा। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.  

ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है। ट्रंप ने कहा, 'मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।' ट्रंप ने कहा, 'नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।' उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था। पहले भी किया था दावा दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।' खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं। भारत के साथ डील हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच 'ट्रुथ सोशल' पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

अब रूस और ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा भारत

नई दिल्ली. भारत और अमेरिका के बीच अभी कोई ट्रेड डील फाइनल नहीं हो पाई है लेकिन भारत को लेकर दावे करने से डोनाल्ड ट्रंप चूकते नहीं हैं। उन्होंने शनिवार को कहा कि भारत ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा। उन्होंने कहा, हम लोगों ने इसको लेकर डील कर ली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत के सामने वेनेजुएला से तेल खरीदने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि भारत ने उसपर क्या प्रतिक्रिया दी है, यह सामने नहीं आया है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस और ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। जिस वेनेजुएला से आज ट्रंप तेल खरीदने की बात कर रहे हैं, उसी वेनेजुएला से तेल खरीदने पर वह विरोध भी करते थे। हालांकि अब उन्होंने वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति को बंधक बना लिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए चीन का भी स्वागत है। कहां पहुंची है ट्रेड डील की बातचीत भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों देश इसे जल्द पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को यह जानकारी दी उन्होंने भरोसा जताया कि निकट भविष्य में इस मोर्चे पर अच्छी खबर दी जाएगी। गोयल ने कहा, ''हर मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) अपनी शर्तों और खूबियों पर टिका होता है। हमारी बातचीत बहुत अच्छी चल रही है। अमेरिका में मेरे समकक्ष और मेरे बीच बहुत ही शानदार कामकाजी संबंध और व्यक्तिगत मित्रता है। हम इस समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं।'' जब उनसे पूछा गया कि 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (भारत-ईयू समझौता) के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच 'फादर ऑफ ऑल डील्स' कब तक हकीकत बनेगी, तो उन्होंने कहा कि व्यापार समझौतों के लिए कभी कोई समय सीमा तय नहीं की जाती। इन्हें दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए सही समय पर अंतिम रूप दिया जाएगा। अगले सप्ताह वॉशिंगटन की अपनी निर्धारित यात्रा से पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बृहस्पतिवार को अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिजों और रक्षा सहित द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख आयामों पर चर्चा की। उम्मीद है कि वह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। जब गोयल से पूछा गया कि क्या रूसी तेल की खरीद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का कारण है, तो उन्होंने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि यह कोई बाधा या अड़चन है। कुछ गलतफहमियां हो सकती थीं, जिन्हें काफी हद तक सुलझा लिया गया

डोनाल्ड ट्रंप की नियुक्ति: भारतीय मूल के नेता को मिली बोर्ड ऑफ पीस में बड़ी भूमिका

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण और वहां शांति स्थापित करने के उद्देश्य से एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय का गठन किया है। इसे उन्होंने 'बोर्ड ऑफ पीस' नाम दिया गया है। इस बोर्ड के 'फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव बोर्ड' में उन्होंने भारतीय मूल के एक शख्स को बड़ी जिम्मेदारी दी है। उस शख्स का नाम अजय बंगा है। अजय बंगा वर्तमान में वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) हैं। यह नियुक्ति कुछ दिन पहले ही हो गई थी। वाइट हाउस ने बताया कि ट्रंप खुद इस 'बोर्ड ऑफ पीस' के चेयरमैन हैं। यह कदम ट्रंप के 20-सूत्रीय गाजा पीस प्लान के फेज-2 का हिस्सा है।   'बोर्ड ऑफ पीस' क्या है और इसका काम क्या होगा? यह बोर्ड ट्रंप के उस 20-सूत्रीय शांति योजना का हिस्सा है, जिसका मकसद गाजा में चल रहे संघर्ष को समाप्त कर वहां विकास के नए रास्ते खोलना है। इसका मकसद गाजा में इंफ्रास्ट्रक्चर का पुनर्निर्माण करना, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना और प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना है। अजय बंगा की भूमिका की बात करें तो वह एक वित्तीय विशेषज्ञ हैं। वर्ल्ड बैंक के प्रमुख के तौर पर बंगा की भूमिका बेहद अहम होगी। उन्हें गाजा के लिए निवेश आकर्षित करने, बड़ी फंडिंग जुटाने और आर्थिक रणनीतियां बनाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस बोर्ड की अध्यक्षता खुद डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। उनके अलावा इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर जैसे बड़े नाम शामिल हैं। यह नियुक्ति क्यों मायने रखती है? अजय बंगा को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वर्ल्ड बैंक के लिए नॉमिनेट किया था, लेकिन अब रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उन पर भरोसा जता रहे हैं। यह बंगा की वैश्विक स्वीकार्यता और उनकी आर्थिक कूटनीति की क्षमता को दर्शाता है। गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उन्हें शामिल करना यह बताता है कि अमेरिका वहां के पुनर्निर्माण को एक बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट के तौर पर देख रहा है। कौन हैं अजय बंगा? अजय बंगा कॉर्पोरेट जगत और वैश्विक अर्थव्यस्था का एक जाना-माना नाम हैं। मास्टरकार्ड को नई ऊंचाइयों पर ले जाने से लेकर वर्ल्ड बैंक की कमान संभालने तक, उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। उनका पूरा नाम अजयपाल सिंह बंगा है। वे 1959 में महाराष्ट्र के पुणे (खड़की छावनी) में एक सिख परिवार में पैदा हुआ। उनके पिता, हरभजन सिंह बंगा, भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल थे। इस कारण उनकी स्कूली शिक्षा भारत के अलग-अलग शहरों (सिकंदराबाद, शिमला, दिल्ली) में हुई। उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया और फिर IIM अहमदाबाद से मैनेजमेंट (MBA) की डिग्री हासिल की। करियर का सफर बंगा ने 1981 में नेस्ले इंडिया के साथ अपना करियर शुरू किया और वहां 13 साल तक काम किया। इसके बाद वे पेप्सिको से जुड़े, जहां उन्होंने भारत में 'पिज्जा हट' और 'केएफसी' जैसे ब्रांड्स को लॉन्च करने में अहम भूमिका निभाई। 1996 में वे सिटीग्रुप से जुड़े और धीरे-धीरे एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के CEO बने। 2010 में वे मास्टरकार्ड के CEO बने। उनके नेतृत्व में कंपनी ने न सिर्फ भारी मुनाफा कमाया, बल्कि टेक्नोलॉजी और डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में क्रांति ला दी। वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष मई 2023 में वे वर्ल्ड बैंक के 14वें अध्यक्ष चुने गए। वह इस पद पर पहुंचने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी हैं। वर्ल्ड बैंक में उनका फोकस जलवायु परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन और विकासशील देशों को आर्थिक मदद देने पर रहा है। भारत सरकार ने उन्हें 2016 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया था। बराक ओबामा के कार्यकाल में वे साइबर सुरक्षा पर राष्ट्रपति के सलाहकार आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं। कुल मिलाकर ट्रंप ने अजय बंगा को विशेष रूप से आर्थिक रणनीति, फंड मोबिलाइजेशन और रिकंस्ट्रक्शन पोर्टफोलियो में योगदान के लिए चुना गया है, क्योंकि विश्व बैंक के प्रमुख के तौर पर उनके पास वैश्विक विकास फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर का गहरा अनुभव है।

कानून की उड़ रही धज्जियां, सत्ता का दुरुपयोग; डोनाल्ड ट्रंप पर अपनों ने उठाए सवाल

वॉशिगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी देकर उस यूरोप को अपने खिलाफ एकजुट कर लिया है, जिसे अमेरिका का सहयोगी माना जाता है। यूरोपीय देशों के नेताओं ने खुलकर डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करना शुरू कर दिया है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप ने 8 यूरोपीय देशों पर 10 फीसदी का अतिरिक्त इंपोर्ट टैक्स लगाने की धमकी दी है तो वहीं फ्रांस ने भी जवाबी ऐक्शन की धमकी दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कहना है कि यदि अमेरिका ने ऐसा कोई कदम उठाया तो फिर हम भी ऐसी ही जवाबी कार्रवाई देंगे। इसके अलावा ट्रंप की आलोचना यूरोपीय नेता यह कहते हुए भी कर रहे हैं कि उन्होंने इंटरनेशनल कानूनों को प्रभावित किया है।   इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि आज दुनिया में दबंग राजनीति की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि आज ऐसी स्थिति हो गई है कि विवाद सामान्य हो चुके हैं। उन्होंने कहा, 'आज वैश्विक नीति इस स्थिति में चली गई है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को पैरों तले रौंदा जा रहा है। ऐसा लगता है कि उसी की चल रही है, जो सबसे मजबूत है। बिना सामूहिक सहयोग के ऐसी स्थिति हो जाएगी, जिसमें अप्रत्याशित प्रतिस्पार्धा होगी।' उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि यूरोप को कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि अंतहीन टैरिफ लादे जा रहे हैं, जिन्हें किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैक्रों ने ट्रंप से लेकर व्लादिमीर पुतिन तक की लगाई क्लास यही नहीं मैक्रों ने ट्रंप के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वह भी साम्राज्यवादी विस्तार चाहते हैं। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि 2024 में ही लगभग 60 जंग दुनिया भर में हुईं। इनमें से कुछ ही जंगें खत्म हो सकी हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप किसी के आगे झुकेगा नहीं। यदि कोई हमारे खिलाफ टैरिफ लगाता है तो फिर हम भी जवाबी कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि खेल के नियमों का पालन दूसरी तरफ से नहीं हो रहा है तो फिर हम ही ऐसा क्यों करें। हम भी सख्त कदम उठाने से हिचकेंगे नहीं। ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए ट्रंप ने क्या दी है दलील डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क के अर्धस्वायत्त इलाके ग्रीनलैंड को अमेरिकी कब्जे में लेने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि अमेरिका इस इलाके पर कंट्रोल नहीं करता है तो फिर रूस और चीन ऐसा कर सकते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसा करना जरूरी है। ग्रीनलैंड के पीएम जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने इसका जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल कानून कोई खेल नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप जैसा कर रहे हैं, वह दुनिया के सारे नियमों को तोड़ने वाला है। यदि ऐसा ही जारी रहा तो दुनिया में अलायंस टूट जाएंगे और यह बेहद खराब स्थिति होगी।  

ट्रंप का ईरान को सख्त संदेश: ‘मेरी हत्या हुई तो अंजाम भुगतना पड़ेगा’

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि अगर ईरान ने उनकी हत्या कराई तो अमेरिका ईरान का नामोनिशान मिटा देगा। इससे पहले ईरान ने ट्रंप को देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई करने पर चेतावनी दी थी। दरअसल ट्रंप ने खामेनेई के लगभग 40 वर्षों के शासन को समाप्त करने का आह्वान किया था जिसके कुछ दिनों बाद ईरान ने ट्रंप को यह चेतावनी दी।   ट्रंप ने ‘न्यूजनेशन’ के कार्यक्रम ‘केटी पॉवलिच टुनाइट’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा, 'मेरे बहुत सख्त निर्देश हैं कि अगर कुछ होता है, तो वे उन्हें नक्शे से मिटा देंगे।’’ ईरान के सशस्त्र बलों के प्रवक्ता जनरल अबुलफजल शेकारची ने कहा, 'ट्रंप जानते हैं कि अगर हमारे नेता की ओर हाथ भी बढ़ाया गया तो हम न केवल उस हाथ को काट देंगे बल्कि उनकी दुनिया में आग लगा देंगे।' ट्रंप ने पूर्व में कहा था कि उन्होंने अपने सलाहकारों को निर्देश दिया है कि अगर ईरान उनकी हत्या कराता है तो ईरान को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। राष्ट्रपति ने भी दी थी चेतावनी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने हाल ही में कहा था, 'अगर ईरान के लोगों को अपने जीवन में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, तो इसकी वजह अमेरिकी सरकार और उसके सहयोगियों की तरफ से लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी और अमानवीय प्रतिबंध हैं। हमारे देश के सुप्रीम लीडर के खिलाफ कोई भी हमाल ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध के बराबर होगा।' अमेरिकी राष्ट्रपति ने शनिवार को ‘पॉलिटिको’ को दिए एक साक्षात्कार में खामेनेई को ‘एक बीमार व्यक्ति’ बताया था और कहा था कि ‘उन्हें अपने देश को ठीक से चलाना चाहिए और लोगों की हत्या करना बंद करना चाहिए’। ट्रंप ने कहा था कि ईरान में नए नेतृत्व की तलाश का समय आ गया है। ईरान की खराब अर्थव्यवस्था को लेकर 28 दिसंबर को शुरू हुए प्रदर्शनों पर अधिकारियों द्वारा की गई हिंसक कार्रवाई के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है।

डोनाल्ड ट्रंप के नारे की टोपियां लगाकर ग्रीनलैंड में मजाक बना रहे लोग

कोपेनहेगन. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड से जुड़े बयानों और दावों पर जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क में लोग ट्रंप के प्रसिद्ध MAGA नारे का मजाक उड़ाते हुए लाल रंग की बेसबॉल टोपियां पहन रहे हैं, जिन पर लिखा है। इन टोपियों पर लिखा है- अमेरिका यहां से चले जाओ। यह टोपियां अब विरोध का प्रमुख प्रतीक बन गई हैं, खासकर पिछले कुछ दिनों में कई बड़े प्रदर्शनों हुए हैं। क्या है पूरा मामला? डोनाल्ड ट्रंप का प्रसिद्ध चुनावी नारा 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे वे अपनी लाल टोपी पर लिखकर पहनते हैं। ग्रीनलैंड के प्रदर्शनकारियों ने इसी स्टाइल को कॉपी करते हुए ट्रंप पर तंज कसा है। वहां के लोग अब वैसी ही लाल टोपियां पहन रहे हैं, लेकिन उन पर 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की जगह 'मेक अमेरिका गो अवे' लिखा हुआ है। हिंदी में इसका अर्थ है- अमेरिका यहां से दूर रहे या अमेरिका वापस जाओ। कुछ टोपियों में ग्रीनलैंड की राजधानी Nuuk पर खेलते हुए लिखा है- Nu det NUUK, जिसका मतलब- अब बहुत हो गया। इन पर ग्रीनलैंड का झंडा भी छपा होता है। टोपियों का स्टॉक खत्म हो गया ये टोपियां कोपेनहेगन के एक विंटेज कपड़ों की दुकान के मालिक जेस्पर राबे टोननेसेन ने बनाईं। पिछले साल ये ज्यादा नहीं चलीं, लेकिन ट्रंप की हालिया धमकियों के बाद इनकी मांग इतनी बढ़ गई कि स्टॉक खत्म हो गया और दुकान को सैकड़ों नई छपवानी पड़ीं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ये टोपियां अब चैरिटी के लिए बेची जा रही हैं, और अमेरिका से ही सबसे ज्यादा खरीदारी हो रही है। कोपेनहेगन निवासी एक प्रदर्शनकारी लार्स हरमनसेन ने कहा- मैं ग्रीनलैंड का समर्थन करना चाहता हूं और दिखाना चाहता हूं कि मुझे अमेरिका के राष्ट्रपति पसंद नहीं। ये टोपियां सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं। X पर कई पोस्ट में लोग इसे ट्रंप के खिलाफ मजाकिया लेकिन तीखा तंज बता रहे हैं। ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोग साफ कह रहे हैं- हम अमेरिकी नहीं हैं और कभी नहीं होंगे। विरोध का कारण यह विरोध तब तेज हुआ जब डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दोबारा संकेत दिया कि वे दुनिया के सबसे बड़े द्वीप 'ग्रीनलैंड' को खरीदने में रुचि रखते हैं। ग्रीनलैंड डेनमार्क देश का एक स्वायत्त क्षेत्र है। साल 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार रखा था, जिसे डेनमार्क की सरकार ने बेतुका बताकर खारिज कर दिया था। उस समय ट्रंप ने इसे एक बड़े रियल एस्टेट सौदे की तरह बताया था। अमेरिका ग्रीनलैंड में इसलिए दिलचस्पी रखता है क्योंकि यह आर्कटिक क्षेत्र में है और यहां दुर्लभ खनिज का भंडार है, जो चीन के प्रभुत्व को कम करने के लिए अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण हैं। टोपियों के जरिए दिया कड़ा संदेश ग्रीनलैंड के लोगों का कहना है कि उनका देश कोई बिकाऊ जमीन का टुकड़ा नहीं है। वे अपनी स्वायत्तता और पहचान के साथ खुश हैं। इन लाल टोपियों के जरिए वे ट्रंप को यह संदेश दे रहे हैं कि उनकी डॉलर की ताकत यहां नहीं चलेगी।

ईरान से व्यापार पर ट्रंप का 25% टैरिफ ऐलान, भारत सरकार ने कहा— चिंता की बात नहीं

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान को घेरने के लिए उसके व्यापारिक साझेदार देशों पर 25% टैरिफ (US 25% Iran Tariff) लगाने का ऐलान किया है. इसका बड़ा असर चीन, यूएई समेत भारत पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि ईरान के पांच सबसे बड़े बिजनेस पार्टनर्स में भारत भी शामिल है. लेकिन, ट्रंप के इस 25% Iran Tariff का भारत पर कितना और क्या असर होगा, इसे लेकर मोदी सरकार (Modi Govt On Trump Tariff) की ओर से बयान आ गया है और केंद्र सरकार की ओर से भारतीय निर्यातकों को भरोसा दिलाते हुए कहा गया है कि अमेरिका के इस कदम का देश के निर्यात पर बेहद सीमित असर होगा.  'ट्रंप टैरिफ से भारत पर ज्यादा असर नहीं' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने Trump 25% Tariff Bomb के भारत पर असर को लेकर अपना बयान जारी किया है और इसमें ट्रेड से जुड़े तमाम आंकड़े भी शेयर किए हैं. सरकार ने भारतीय निर्यातकों को आश्वस्त किया है कि ईरान को लेकर अमेरिकी टैरिफ अटैक का भारत पर सीमित प्रभाव पड़ेगा. बयान में कहा गया है कि भारत के अपेक्षाकृत सीमित व्यापारिक संबंधों और विविध निर्यात संबंधों को देखते हुए इस कदम का भारत पर बहुत ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं है.  ये आंकड़े क्या कर रहे इशारा?  भारत पर ट्रंप के ईरान टैरिफ के असर का एक अंदाजा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. FY2024-25 में ईरान को भारतीय निर्यात 1.24 अरब डॉलर और आयात 440 मिलियन डॉलर रहा यानी कुल द्विपक्षीय व्यापार 1.68 अरब डॉलर का था. इस हिसाब से भारत के व्यापारिक साझेदारों की लंबी लिस्ट में ईरान बहुत नीचे 63वें स्थान पर आता है. ट्रेड आंकड़ों के मुताबिक, भारत का ईरान के साथ कारोबार तंजानिया, अंगोला, टोगो, मोजाम्बिक, सेनेगल, घाना जैसी बेहद छोटी अर्थव्यवस्थाओं से भी पीछे है. तेहरान स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत बासमती चावल, चाय, चीनी और दवाइयां निर्यात करता है, जबकि ईरान से सेब, पिस्ता, खजूर और कीवी के अलावा कांच के बर्तनों का आयात करता है. भारत के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर भारत के साथ तमाम देशों के व्यापार की बात करें तो देश के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स में अमेरिका ही टॉप पर है. US के साथ 132 अरब डॉलर से अधिक के कुल द्विपक्षीय व्यापार है, जबकि China 127 अरब डॉलर से अधिक, UAE 100 अरब डॉलर से अधिक, Russia 68 अरब डॉलर से अधिक और सऊदी अरब 41 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार के साथ लिस्ट में आगे हैं.  सरकार का आश्वासन, फिर भी यहां बड़ी चिंता सरकार ने हालांकि, ईरान टैरिफ के सीमित असर की बात कहते हुए Indian Exporters को नो-टेंशन बोला है. इसके बावजूद कुछ सेक्टर्स में निर्यातकों में चिंता है. खासतौर पर बासमती चावल का निर्यात करने वालों में, बता दें कि पारंपरिक रूप से ईरान Indian Basmati Rice के सबसे बड़े खरीदारों की लिस्ट में शामिल रहा है. आंकड़े देखें, तो सालाना 12 लाख टन (करीब 12000 करोड़ रुपये) का निर्यात किया जाता है. ऐसे में भारत ईरान के कुल चावल आयात का करीब दो-तिहाई हिस्सा पहुंचाता है.  सरकार ने बताया- क्यों होगा कम असर? सरकारी अधिकारियों ने US Iran Tariff के असर को लेकर साफ कहा है कि भले ही इसका कुछ निर्यात क्षेत्रों को शॉर्ट टर्म प्रेशर का सामना करना पड़े, लेकिन भारत पर इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव सीमित ही रहेगा. उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि भारतीय निर्यातकों ने पिछले एक दशक में पश्चिम एशिया, अफ्रीका और साउथ-ईस्ट एशिया में अपने बाजारों का लगातार विस्तार किया है, जिससे किसी एक देश पर हमारी निर्भरता काफी कम हुई है.

ट्रंप का 500% टैरिफ अगर लागू हुआ, तो अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, भारत पर क्या असर पड़ेगा?

नई दिल्ली  डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है, जो रूस से तेल खरीदते हैं. पहली नजर में यह फैसला दूसरे देशों को दबाव में लाने जैसा लगता है, लेकिन व्यापार आंकड़े बताते हैं कि इसका बोझ अमेरिकी ग्राहकों पर ज्यादा पड़ सकता है. अमेरिका कई रोजमर्रा के सामान के लिए भारत जैसे देशों पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में अगर अचानक भारी शुल्क लगा दिया गया, तो वहां के बाजार में सस्ते विकल्प मिलना आसान नहीं होगा. सितंबर के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने अमेरिका को ऐसे उत्पादों की आपूर्ति की, जिनकी कीमत 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा थी. यह उस महीने अमेरिका को किए गए भारत के कुल निर्यात का लगभग 6 प्रतिशत था. कई श्रेणियों में भारत की पकड़ इतनी मजबूत है कि हाई टैरिफ लगने पर कंपनियां तुरंत किसी दूसरे देश से समान गुणवत्ता और मात्रा में सामान नहीं मंगा पाएंगी. इसका सीधा असर अमेरिकी दुकानों में कीमत बढ़ने के रूप में दिख सकता है. घरेलू वस्त्र इसका बड़ा उदाहरण हैं. बिना छपी सूती बेडशीट के मामले में सितंबर में अमेरिका के कुल आयात का लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा भारत से आया, जिसकी कीमत करीब 66.9 मिलियन डॉलर थी. टेबल लिनन में तो भारत की हिस्सेदारी और भी ज्यादा, लगभग 81.5 प्रतिशत रही. पैकेजिंग सामग्री में इस्तेमाल होने वाले फ्लेक्सिबल इंटरमीडिएट बल्क कंटेनर में भी भारत ने करीब 69 प्रतिशत सप्लाई की. इतनी मजबूत हिस्सेदारी के कारण अमेरिका के लिए अचानक सप्लायर बदलना आसान नहीं होगा. तो रूस से यूरेनियम पर बात कौन करेगा? इस पूरे मसले में राजनीतिक पृष्ठभूमि भी अहम है. पिछले हफ्ते अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि ट्रंप ने एक ऐसे बिल को हरी झंडी दी है, जिसमें रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर सख्त दंडात्मक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है. इस बिल के तहत ऐसे देशों से आने वाले सभी सामान और सेवाओं पर शुल्क काफी बढ़ाया जाएगा, ताकि उन्हें रूस से दूरी बनाने के लिए मजबूर किया जा सके. विडंबना यह है कि खुद अमेरिका, यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे बड़े देश भी 2024 में रूस से यूरेनियम के बड़े आयातक रहे हैं. इससे यह साफ होता है कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क कितने जटिल और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. सिर्फ नियम बनाकर इन रिश्तों को तुरंत बदल देना आसान नहीं है. कपड़े और पैकेजिंग में भारत का लगभग एकाधिकार कपड़ा और पैकेजिंग के अलावा कुछ खास उत्पादों में तो भारत की स्थिति लगभग एकाधिकार जैसी है. सितंबर में अरंडी के तेल के आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 99 प्रतिशत थी. कुछ विशेष रसायनों और औद्योगिक इनपुट में भी भारत की पकड़ मजबूत बनी हुई है, जबकि अगस्त में अमेरिका ने इनमें से कुछ वस्तुओं पर पहले ही 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था. खाद्य उत्पादों में भी भारत की भूमिका अहम है. तैयार या संरक्षित खीरे और घेरकिन्स के मामले में सितंबर में अमेरिका के आधे से ज्यादा आयात भारत से आए. एयरटाइट पैकिंग में आने वाले झींगे जैसे समुद्री उत्पादों में भी भारत की हिस्सेदारी लगभग 56 प्रतिशत रही. ऐसे उत्पादों की सप्लाई चेन पहले से सीमित देशों पर निर्भर होती है, इसलिए जल्दी बदलाव करना मुश्किल होता है. भारत के लिए कितना डर? हालांकि आंकड़े भारत के लिए चेतावनी भी देते हैं. हर क्षेत्र में भारत की पकड़ समान नहीं रही है और कुछ जगहों पर हिस्सेदारी घटती दिख रही है. विग बनाने में इस्तेमाल होने वाले बालों के उत्पादों में सितंबर में भारत की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत रही, जबकि साल के पहले सात महीनों में यह लगभग 76 प्रतिशत थी. इसी तरह सिंथेटिक या पुनर्निर्मित हीरों में भी सितंबर की हिस्सेदारी करीब 69 प्रतिशत रही, जो पहले लगभग 93 प्रतिशत तक थी. कुछ बड़े क्षेत्रों में गिरावट और तेज रही. हीरों के आयात में भारत की हिस्सेदारी सितंबर में घटकर करीब 22 प्रतिशत रह गई, जबकि पहले सात महीनों में यह लगभग 51 प्रतिशत थी. ग्रेनाइट में यह हिस्सा लगभग 48 प्रतिशत से गिरकर 9 प्रतिशत तक आ गया. कुछ पत्थर से जुड़े उत्पादों में भी हिस्सेदारी 88 प्रतिशत से घटकर करीब 31 प्रतिशत रह गई. इससे संकेत मिलता है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और भारत को अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए सतर्क रहना होगा.