samacharsecretary.com

ईरान-पाकिस्तान वार्ता के बीच अब्बास अराघची का दोबारा इस्लामाबाद दौरा तय

नई दिल्ली अमेरिका के साथ वार्ता की उम्मीदों पर पानी फिरने के बाद ईरान के विदेश मंत्री पाकिस्तान से रवाना हो गए थे। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक ईरान विदेश मंत्री अब्बास अराघची एक बार फिर पाकिस्तान का दौरा करेंगे। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी की खबर। खबर में कहा गया है कि अराघची ओमान और रूस की यात्रा के बाद पाकिस्तान लौटेंगे। खबर के अनुसार वह संभवत: रविवार को इस्लामाबाद लौटकर उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल होंगे जो युद्ध खत्म करने से संबंधित विषयों पर विचार विमर्श के लिए तेहरान गया था। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अब वह अपनी टीम पाकिस्तान नहीं भेजेंगे। वह फोन पर ईरान से वार्ता करने को तैयार हैं। ईरानी राष्ट्रपति से शहबाज शरीफ ने की बात पाकिस्तान पहुंचने के बाद ईरानी विदेश मंत्री पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ से मिले थे। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियां से फोन पर बात की है। शनिवार को उन्होंने फोन किया और कहा कि वह क्षेत्र में शांति के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं। दोनों के बीच करीब 50 मिनट तक वार्ता चली। ट्रंप बोले- खारिज कर दिया ईरान का प्रस्ताव इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। ट्रंप ने शनिवार को फ्लोरिडा से वाशिंगटन आने के लिए एयर फोर्स वन विमान में सवार होने से पहले कहा, "उन्होंने हमें एक प्रस्ताव भेजा, जो बेहतर हो सकता था। दिलचस्प बात यह है कि जब मैंने इसे खारिज कर दिया तो 10 मिनट के अंदर हमें दूसरा प्रस्ताव मिला, जो काफी बेहतर है।' क्यों रद्द कर दी वार्ता? राष्ट्रपति ने यह नहीं बताया कि ताजा प्रस्ताव में क्या है। उन्होंने बस यही कहा कि ईरान ने काफी पेशकश की हैं। ट्रंप ने हालांकि कहा कि उनकी एक शर्त यह है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने ईरान के साथ नए दौर की वार्ता इसलिए रद्द कर दी क्योंकि इसके लिए बहुत सफर करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा उनके वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की मुलाकात "देश के नेता से नहीं होने वाली थी।' खुली है फोनलाइन ट्रंप ने कहा कि अमेरिका टेलीफोन के जरिये समझौता करेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, "वे (ईरान) जब चाहें, हमें कॉल कर सकते हैं।" डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है। बता दें कि इस्लामाबाद में वार्ता फेल होने के बाद अमेरिका ने ईरान के लिए नाकेबंदी कर दी। जब उसने नाकेबंदी नहीं हटाई तो ईरान ने एक बार फिर से होर्मुज को बंद कर दिया है जिससे पूरी दुनिया में तेल का संकट गहरा गया है।

होर्मुज प्रतिबंध को लेकर तनाव बढ़ा, डोनाल्ड ट्रंप बोले—ईरान की ब्लैकमेलिंग नहीं चलेगी

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता। बता दें, शुक्रवार को लेबनान में हुए सीजफायर का स्वागत करते हुए ईरान ने होर्मुज पर लगे प्रतिंबध को हटा दिया था। हालांकि, जब ट्रंप होर्मुज के पास लगे अमेरिकी ब्लाकेड को हटाने से इनकार कर दिया, तो शनिवार को ईरान ने फिर से होर्मुज के दरवाजे बंद कर दिए। होर्मुज पर बदलते हालात पर ट्रंप ने शनिवार को ओवेल ऑफिस में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, "हम उनसे बात कर रहे हैं। वे स्ट्रेट को फिर से बंद करना चाहते हैं। जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे हैं और वे हमें ब्लैकमेल नहीं कर सकते।" इससे पहले ईरानी सेना की कमांड ने एक होर्मुज पर अमेरिकी कमांड को वादाखिलाफी बताया। ईरान की तरफ से कहा गया कि ईरानी बंदरगाहों के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी ब्लाकेड को न हटाकर अमेरिका ने अपना वादा तोड़ा है। बयान में आगे कहा गया, "जब तक अमेरिका ईरान आने वाले सभी जहाजों के लिए आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सख्त नियंत्रण में रहेगी।"

नाकेबंदी की तरफ आए तो कर देंगे तबाह, ड्रग्स तस्करों जैसा अंजाम भुगतने की डोनाल्ड ट्रंप ने दी चेतावनी

वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को फिर से ईरान को चेतावनी दी। ट्रंप ने कहा है कि होर्मुज में अगर कोई भी ईरानी अमेरिकी नेवी नाकेबंदी की तरफ आया तो उसे तबाह कर दिया जाएगा। बता दें कि ईरान के साथ पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बाद से ही ट्रंप भड़के हुए हैं। वह लगातार ईरान को चेतावनी दे रहे हैं। ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में ट्रंप ने लिखा कि ईरान की नेवी को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। ट्रंप ने लिखा कि ईरानी नेवी समुद्र की तली में पड़ी है। उनके पास 158 जहाज वहां पर हैं। हम इन्हें मार नहीं पाए हैं। यह लोग इसे फास्ट अटैक शिप्स कहते हैं, लेकिन हम लोग इसे बड़ा खतरा नहीं मानते। गौरतलब है कि अमेरिका ने घोषणा की थी कि वह सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे या ईरान के स्थानीय समयानुसार शाम साढ़े पांच बजे से ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी शुरू करेगा। इसमें कहा गया कि ‘यूएस सेंट्रल कमांड' (सेंटकॉम) ने कहाकि यह नाकेबंदी सभी देशों के उन पोतों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी’ जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं या वहां से बाहर जा रहे हैं। सेंटकॉम ने कहाकि गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा करने वाले जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी।

ईरान को ‘पाषाण युग’ में भेजने की तैयारी, अमेरिका ने खाली किए अपने मिसाइल भंडार, नर्क का द्वार खुलने की चेतावनी

वॉशिंगटन  ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के अगले चरण मे JASSM-ER क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाएगा। इन मिसाइलों की युद्धक्षेत्र में तैनाती चल रही है। इन मिसाइलों को उन भंडारों से निकाला जा रहा है जिन्हें दूसरे क्षेत्रों के लिए रखे गए थे। इन मिसाइलों की तैनाती उस वक्त हो रही है जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है और युद्धविराम पर सहमति नहीं बनने पर 'पाषाण युग' में पहुंचाने की धमकी दी है। ईरान ने भी पलटवार करते हुए अमेरिका को 'नर्क का दरवाजा' खोलने की धमकी दी है। इस मामले की सीधी जानकारी रखने वाले एक अधिकारी के हवाले से एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि प्रशांत क्षेत्र के भंडारों से 1.5 मिलियन डॉलर की इस मिसाइल को निकालने का आदेश मार्च के आखिर में जारी किया गया था। उस व्यक्ति ने बताया कि अमेरिका के अन्य ठिकानों (जिनमें मुख्य अमेरिकी भूभाग भी शामिल है) पर मौजूद मिसाइलों को अमेरिकी सेंट्रल कमांड के ठिकानों या UK के फेयरफोर्ड में भेजा जाएगा। संवेदनशील जानकारियों पर चर्चा करने के लिए उस व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। ईरान के खिलाफ अमेरिका की सबसे घातक मिसाइल हालांकि अमेरिका के सामने दिक्कत ये है कि भंडार से इन मिसाइलों के निकाले जाने के बाद युद्ध से पहले के 2300 मिसाइलों के भंडार में से बाकी दुनिया के लिए सिर्फ 425 JASSM-ER मिसाइलें ही उपलब्ध रह जाएंगी। यह संख्या लगभग 17 B-1B बमवर्षक विमानों के एक ही मिशन के लिए काफी होगी। इसके अलावा लगभग 75 अन्य मिसाइलें क्षतिग्रस्त होने या तकनीकी खराबी के कारण "इस्तेमाल के लायक नहीं" हैं। JASSM-ER, जिसका पूरा नाम 'जॉइंट एयर-टू-सरफेस मिसाइल-एक्सटेंडेड रेंज' है उसकी रेंज 600 किलोमीटर से ज्यादा है और इस मिसाइल की क्षमता ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र में तबाही मचाने की है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन की हवाई सुरक्षा से बचते हुए सुरक्षित दूरी से ही अपने लक्ष्यों को भेद सके। हालांकि इसका मतलब ये भी हो सकता है कि जिस तरह से ईरान ने अब अमेरिकी लड़ाकू विमानों को मारना शुरू किया है उसे देखते हुए शायद अब ईरान के एयर डिफेंस क्षेत्र में आए बगैर उसके ठिकानों पर हमला करना हो सकता है। दो तिहाई हिस्से का ईरान युद्ध में होगा इस्तेमाल उस व्यक्ति ने ये भी बताया कि कम दूरी वाली JASSM मिसाइल के साथ-साथ जिसकी मारक क्षमता लगभग 250 मील है, अमेरिका के लगभग दो-तिहाई जखीरे को ईरान युद्ध के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए थे। लेकिन अमेरिका और इजरायल के मिसाइल भंडार में कमी आने की कई रिपोर्ट्स आई हैं। अमेरिका में मिसाइल इंटरसेप्टर और लंबी दूरी के मारक हथियारों की आपूर्ति एक अहम मुद्दा बनी हुई है। इस्तेमाल हो चुके हथियारों की भरपाई करने में मौजूदा उत्पादन दर के हिसाब से कई साल लग जाएंगे। अमेरिका अगर हमलों के लिए JASSM-ER जैसे लंबी दूरी के हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है, तो इससे उसके सैनिकों को होने वाला खतरा तो कम हो जाता है लेकिन चीन जैसे अधिक सक्षम प्रतिद्वंद्वियों के लिए रखे गए हथियारों के जखीरे में कमी आ जाती है। ऐसी स्थिति में ताइवान पर जब चीन हमला करेगा तो अमेरिका के पास गाल बजाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रहेगा।

Donald Trump के फैसलों से बढ़ा तनाव, इस देश में अमेरिकी सेना हटाने की मांग तेज

वाशिंगटन अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप की सत्ता आने के बाद ज्यादातर सहयोगी देश नाराज नजर आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में नाटो समेत कई सहयोगी देश खुलकर वाशिंगटन का विरोध जता रहे हैं।। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका का सबसे बड़ा मित्र देश जर्मनी में वाशिंगटन के विरोध में सुर बुलंद हुए हैं। वहां की दक्षिणपंथी पार्टी ने देश में तैनात 40 हजार अमेरिकी सैनिकों को भी बाहर निकालने की मांग की है। इसके साथ ही अमेरिकी और सहयोगी देशों के बेस और परमाणु हथियारों को भी देश से बाहर निकालने की बात कही गई है। 'अल्टर्नेटिव फॉर जर्मनी' (AFD) नामक इस पार्टी ने मर्त्ज सरकार से मांग की है कि देश की ‘विदेश नीति’ अब वाशिंगटन से स्वतंत्र होनी चाहिए। पार्टी के नेता टीनो चुपाना ने एक बैठक में कहा कि जर्मनी को सहयोगी देशों के परमाणु ठिकानों और सैन्य अड्डों को भी खत्म कर देना चाहिए। इसकी शुरुआत 40 हजार अमेरिकी सैनिकों को देश से बाहर निकालकर करना चाहिए। दरअसल, अमेरिका भले ही यह कहता रहा हो कि नाटो में उसने ज्यादा खर्च किया है। लेकिन यूरोपीय देशों के मन में यह भाव है कि नाटो में हमेशा ही अमेरिका के हितों को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। यूरोपीय देश इस बात का भी आरोप लगाते रहे हैं कि अमेरिका उन्हें विदेशी युद्धों में जबरदस्ती घसीटता रहता है। ईरान युद्ध को लेकर भी चुपाला ने नाराजगी जाहिर की है। गौरतलब है कि जर्मनी में अमेरिका को लेकर विरोध लगातार तेज हो रहा है। हमेशा विरोध में रहने वाले सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मुद्दे पर काफी हद तक एक राय हैं। चांसलर मर्त्ज ने भी ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका पर हमला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस युद्ध को खत्म करने की बजाय अमेरिका ने इसे बढ़ाने का काम किया है, जिससे वैश्विक तनाव बढ़ गया है। जर्मनी में कितने अमेरिकी सैनिक? दरअसल, रिपोर्ट्स के मुताबिक जर्मनी में अमेरिका के 40 हजार से ज्यादा सैनिक तैनात हैं। इसके अलावा करीब 12 से ज्यादा सैन्य अड्डे मौजूद हैं। वर्तमान में जर्मनी के ‘रामस्टाइन एयरबेस’ से ही ईरान पर हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों का निर्णय लिया जा रहा है। इसकी वजह से जर्मनी को आशंका है कि इसको भी निशाना बनाया जा सकता है। इस एयरबेस के आसपास अमेरिका का कंट्रोल इतना ज्यादा है कि इस क्षेत्र को यूरोप का मिनी अमेरिका तक कहा जाता है। हालांकि पिछले एक साल से अमेरिका और जर्मनी के बीच में तनाव बढ़ने लगा है। ऐसे में खबर सामने आई थी कि ट्रंप जर्मनी से अपने सैनिक निकालने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, अभी तक इस मामले पर कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है। नाटो सदस्य देशों को असहज कर रहे ट्रंप बता दें, जनवरी 2025 में शपथ लेने के साथ ही ट्रंप ने नाटो समेत कई देशों के साथ असहज करने वाला व्यवहार किया है। चाहें, फिर वह कनाडा के प्रधानमंत्री को गवर्नर कहना हो, या फिर जेलेंस्की को सरेआम खरी-खोटी सुनाना हो। यहां तक कि ट्रंप ने यूरोप के ग्रीनलैंड को भी हथियाने की योजना बना दी। विरोध इतना बढ़ गया कि यूरोपी देशों ने इसकी रक्षा के लिए अपने सैनिकों की तैनाती शुरू कर दी। ईरान युद्ध के बाद हालात इतने खराब हो गए कि ट्रंप ने नाटो देशों को कायर तक कह दिया। इसके अलावा उन्होंने हाल ही में जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के नेताओं के खिलाफ भी गलत भाषा का उपयोग किया है। ट्रंप की इन हरकतों से दशकों पुरानी अमेरिकी विदेश नीति अब अधर में लटकती नजर आ रही है। पूरे विश्व के ऊपर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने जिस नाटो की स्थापना की थी, ट्रंप उसे ही बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। हाल ही में ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों से अपने रक्षा खर्च को 5 फीसदी तक बढ़ाने की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि अगगर यह देश ऐसा नहीं कर सकते, तो फिर यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद ही उठाए।  

अब किम जोंग से पंगा लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने हजारों सैनिकों की शुरू कर दी मिलिट्री ड्रिल

वासिंगटन. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बीते 10 दिनों से जारी भीषण युद्ध का कोई अंत फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और जंग का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच अब अमेरिका ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उत्तर कोरिया का भड़कना तय है। दरअसल अमेरिका ने सोमवार को दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अभ्यास में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जिससे उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन का पारा चढ़ सकता है। दक्षिण कोरिया के 'ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ' ने जानकारी देते हुए बताया कि लगभग 18,000 कोरियाई सैनिक इस 'फ्रीडम शील्ड' अभ्यास में हिस्सा लेंगे, जो 19 मार्च तक चलेगा। हालांकि अमेरिकी सेना ने दक्षिण कोरिया में इस अभ्यास में शामिल अपने सैनिकों की संख्या नहीं बताई है इन दोनों सहयोगी देशों का यह संयुक्त अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है जब दक्षिण कोरियाई मीडिया में अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिका कुछ सैन्य संसाधनों को दक्षिण कोरिया से हटा कर ईरान के खिलाफ लड़ाई में ले जा रहा है। पैट्रियट मिसाइल सिस्टम पश्चिम एशिया भेजे जाने की खबरें इससे पहले 'यूएस फोर्सेज कोरिया' ने पिछले सप्ताह कहा था कि सुरक्षा कारणों से वह सैन्य संसाधनों की विशिष्ट गतिविधियों पर टिप्पणी नहीं करेगी। वहीं दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने भी इस खबर पर टिप्पणी करने से इनकार किया कि कुछ अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और अन्य उपकरण पश्चिम एशिया भेजे जा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि इससे सहयोगी देशों की संयुक्त रक्षा रणनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। बौखला सकता है उत्तर कोरिया 'फ्रीडम शील्ड' अभ्यास को लेकर उत्तर कोरिया की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। उत्तर कोरिया लंबे समय से सहयोगी देशों के संयुक्त अभ्यासों को आक्रमण का पूर्वाभ्यास बताता रहा है और इसे अपने सैन्य प्रदर्शनों और हथियार परीक्षणों को बढ़ाने का बहाना बनाता रहा है। अमेरिका एवं दक्षिण कोरिया का कहना है कि ये अभ्यास रक्षा उद्देश्य के लिए होते हैं।

ट्रंप की करारी शिकस्त, अमेरिका को ₹16 लाख करोड़ का फटका, भारत को मिल रही राहत

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को एक और झटका लगा है। न्यूयॉर्क के एक फेडरल जज ने फैसला सुनाया है कि जो कंपनियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए टैरिफ का पेमेंट कर चुकी हैं, उन्हें रिफंड मिलना चाहिए। एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, U.S. कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने फैसले में लिखा है कि रिकॉर्ड में दर्ज सभी इंपोर्टर्स सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फायदा पाने के हकदार हैं। ट्रंप की तरफ से पिछले साल भारत समेत करीब 60 देशों के खिलाफ जारी किए गए टैरिफ ऑर्डर्स को इस साल फरवरी महीने में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द घोषित कर दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़े लेवी लगाकर अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA), 1977 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी घोषित किया है। इसी के तहत ट्रंप ने पिछले साल टैरिफ लगाए थे। ट्रंप को 16 लाख करोड़ रुपये का झटका   कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार को 175 अरब डॉलर का रिफंड चुकाना पड़ सकता है. न्यूयॉर्क के फेडरल जज रिचर्ड ईटन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार ने जिन भी कंपनियों से अवैध टैरिफ वसूला है, उन्हें अब रिफंड करना होगा. ये कंपनियां अपना पैसा वापस पाने की हकदार हैं. जज ईटन ने कहा कि रिफंड का दायरा सिर्फ अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा,उन आयातकों पर भी लागू होगा, जिन्होंने टैक्स चुकाया है.  कोर्ट के इस फैसले से अमेरिकी खजाने पर करीब 16 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा.बता दें कि अमेरिका ने दिसंबर दिसंबर 2025 तक टैरिफ से 130 अरब डॉलर की कमाई की। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.   क्या भारत को इस फैसले से फायदा मिलेगा ?  टैरिफ हटने के बाद अमेरिका की ओर से कुल इंपोर्ट टैक्स 10 फीसदी का है. जिसका फायदा भारतीय निर्यातकों को मिला. अगर रिफंड की बात करें तो भारत को सीधे तौर पर इसका फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि भारतीय निर्यातकों ने टैरिफ का भुगतान नहीं किया, बल्कि अमेरिकी आयातकों ने भारत पर लगाए गए टैरिफ का भुगतान अमेरिकी सरकार को किया था. इस शुल्क का बोझ आयातकों ने ग्राहकों पर डाला. अमेरिकी बाजार में भारतीय प्रोडक्ट्स के लिए प्रतिस्पर्धा कड़ी हो गई. भारतीय सामान महंगे हो गए . इस टैरिफ के हटने और रिफंड का फायदा भी उन आयातकों को मिलेगा, जिन्होंने शुल्क चुकाया था.  हालांकि अप्रत्यक्ष लाभ भारत को मिलेगा, क्योंकि टैरिफ कम होने से भारत से सामान खरीदना सस्ता और आसान हो जाएगा, अमेरिकी बाजार में भारत के सामान सस्ते हो जाएंगे.  भारतीय कंपनियों को इस फैसले से लाभ मिलेगा, उनका निर्यात बढ़ेगा ईटन खास तौर पर एटमस फिल्ट्रेशन के एक केस पर फैसला सुना रहे थे। यह नैशविले, टेनेसी की एक कंपनी है, जो फिल्टर और दूसरे फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है। कंपनी टैरिफ रिफंड के अधिकार का दावा कर रही है।इस सप्ताह की शुरुआत में एक और फेडरल कोर्ट ने रिफंड प्रोसेस को धीमा करने की ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया। U.S. कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने रिफंड प्रोसेस का अगला फेज शुरू किया और इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजकर इसे सुलझाने के लिए कहा। अब U.S. कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी को रिफंड प्रोसेस करने का कोई तरीका निकालना होगा। अमेरिका के लिए डबल झटका क्यों ?  टैरिफ पर अमेरिकी कोर्ट से मिली हार अमेरिका और ट्रंप के लिए डबल झटका है. ट्रंप प्रशासन को भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा. पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा हुआ है. ऐसे  में 16 लाख करोड़ का रिफंड आसान नहीं है. वहीं युद्ध की वजह से खर्च पहले से बढ़ा है. कोर्ट के फैसले ने ट्रंप को दोहरा झटका दे दिया है.  हालांकि ट्रंप बार-बार धमकी दे रहे हैं कि वो टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर देंगे. ट्रंप दावा कर रहे हैं 150 दिनों के बाद वो टैरिफ को वहीं पहुंचा देंगे, जहां वो पहले था.  कुल मिलाकर टैरिफ पर ट्रंप हार मानने को तैयार नहीं हैं.  

ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

वाशिंगटन  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है। ट्रंप ने कहा, 'मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।' ट्रंप ने कहा, 'नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।' उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था। पहले भी किया था दावा दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।' खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं। भारत के साथ डील हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच 'ट्रुथ सोशल' पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

अब रूस और ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा भारत

नई दिल्ली. भारत और अमेरिका के बीच अभी कोई ट्रेड डील फाइनल नहीं हो पाई है लेकिन भारत को लेकर दावे करने से डोनाल्ड ट्रंप चूकते नहीं हैं। उन्होंने शनिवार को कहा कि भारत ईरान की जगह वेनेजुएला से तेल आयात करेगा। उन्होंने कहा, हम लोगों ने इसको लेकर डील कर ली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत के सामने वेनेजुएला से तेल खरीदने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि भारत ने उसपर क्या प्रतिक्रिया दी है, यह सामने नहीं आया है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस और ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। जिस वेनेजुएला से आज ट्रंप तेल खरीदने की बात कर रहे हैं, उसी वेनेजुएला से तेल खरीदने पर वह विरोध भी करते थे। हालांकि अब उन्होंने वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति को बंधक बना लिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए चीन का भी स्वागत है। कहां पहुंची है ट्रेड डील की बातचीत भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों देश इसे जल्द पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को यह जानकारी दी उन्होंने भरोसा जताया कि निकट भविष्य में इस मोर्चे पर अच्छी खबर दी जाएगी। गोयल ने कहा, ''हर मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) अपनी शर्तों और खूबियों पर टिका होता है। हमारी बातचीत बहुत अच्छी चल रही है। अमेरिका में मेरे समकक्ष और मेरे बीच बहुत ही शानदार कामकाजी संबंध और व्यक्तिगत मित्रता है। हम इस समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं।'' जब उनसे पूछा गया कि 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (भारत-ईयू समझौता) के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच 'फादर ऑफ ऑल डील्स' कब तक हकीकत बनेगी, तो उन्होंने कहा कि व्यापार समझौतों के लिए कभी कोई समय सीमा तय नहीं की जाती। इन्हें दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए सही समय पर अंतिम रूप दिया जाएगा। अगले सप्ताह वॉशिंगटन की अपनी निर्धारित यात्रा से पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बृहस्पतिवार को अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिजों और रक्षा सहित द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख आयामों पर चर्चा की। उम्मीद है कि वह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। जब गोयल से पूछा गया कि क्या रूसी तेल की खरीद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का कारण है, तो उन्होंने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि यह कोई बाधा या अड़चन है। कुछ गलतफहमियां हो सकती थीं, जिन्हें काफी हद तक सुलझा लिया गया

डोनाल्ड ट्रंप की नियुक्ति: भारतीय मूल के नेता को मिली बोर्ड ऑफ पीस में बड़ी भूमिका

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण और वहां शांति स्थापित करने के उद्देश्य से एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय का गठन किया है। इसे उन्होंने 'बोर्ड ऑफ पीस' नाम दिया गया है। इस बोर्ड के 'फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव बोर्ड' में उन्होंने भारतीय मूल के एक शख्स को बड़ी जिम्मेदारी दी है। उस शख्स का नाम अजय बंगा है। अजय बंगा वर्तमान में वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) हैं। यह नियुक्ति कुछ दिन पहले ही हो गई थी। वाइट हाउस ने बताया कि ट्रंप खुद इस 'बोर्ड ऑफ पीस' के चेयरमैन हैं। यह कदम ट्रंप के 20-सूत्रीय गाजा पीस प्लान के फेज-2 का हिस्सा है।   'बोर्ड ऑफ पीस' क्या है और इसका काम क्या होगा? यह बोर्ड ट्रंप के उस 20-सूत्रीय शांति योजना का हिस्सा है, जिसका मकसद गाजा में चल रहे संघर्ष को समाप्त कर वहां विकास के नए रास्ते खोलना है। इसका मकसद गाजा में इंफ्रास्ट्रक्चर का पुनर्निर्माण करना, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना और प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना है। अजय बंगा की भूमिका की बात करें तो वह एक वित्तीय विशेषज्ञ हैं। वर्ल्ड बैंक के प्रमुख के तौर पर बंगा की भूमिका बेहद अहम होगी। उन्हें गाजा के लिए निवेश आकर्षित करने, बड़ी फंडिंग जुटाने और आर्थिक रणनीतियां बनाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस बोर्ड की अध्यक्षता खुद डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। उनके अलावा इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर जैसे बड़े नाम शामिल हैं। यह नियुक्ति क्यों मायने रखती है? अजय बंगा को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वर्ल्ड बैंक के लिए नॉमिनेट किया था, लेकिन अब रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उन पर भरोसा जता रहे हैं। यह बंगा की वैश्विक स्वीकार्यता और उनकी आर्थिक कूटनीति की क्षमता को दर्शाता है। गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उन्हें शामिल करना यह बताता है कि अमेरिका वहां के पुनर्निर्माण को एक बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट के तौर पर देख रहा है। कौन हैं अजय बंगा? अजय बंगा कॉर्पोरेट जगत और वैश्विक अर्थव्यस्था का एक जाना-माना नाम हैं। मास्टरकार्ड को नई ऊंचाइयों पर ले जाने से लेकर वर्ल्ड बैंक की कमान संभालने तक, उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। उनका पूरा नाम अजयपाल सिंह बंगा है। वे 1959 में महाराष्ट्र के पुणे (खड़की छावनी) में एक सिख परिवार में पैदा हुआ। उनके पिता, हरभजन सिंह बंगा, भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल थे। इस कारण उनकी स्कूली शिक्षा भारत के अलग-अलग शहरों (सिकंदराबाद, शिमला, दिल्ली) में हुई। उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया और फिर IIM अहमदाबाद से मैनेजमेंट (MBA) की डिग्री हासिल की। करियर का सफर बंगा ने 1981 में नेस्ले इंडिया के साथ अपना करियर शुरू किया और वहां 13 साल तक काम किया। इसके बाद वे पेप्सिको से जुड़े, जहां उन्होंने भारत में 'पिज्जा हट' और 'केएफसी' जैसे ब्रांड्स को लॉन्च करने में अहम भूमिका निभाई। 1996 में वे सिटीग्रुप से जुड़े और धीरे-धीरे एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के CEO बने। 2010 में वे मास्टरकार्ड के CEO बने। उनके नेतृत्व में कंपनी ने न सिर्फ भारी मुनाफा कमाया, बल्कि टेक्नोलॉजी और डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में क्रांति ला दी। वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष मई 2023 में वे वर्ल्ड बैंक के 14वें अध्यक्ष चुने गए। वह इस पद पर पहुंचने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी हैं। वर्ल्ड बैंक में उनका फोकस जलवायु परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन और विकासशील देशों को आर्थिक मदद देने पर रहा है। भारत सरकार ने उन्हें 2016 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया था। बराक ओबामा के कार्यकाल में वे साइबर सुरक्षा पर राष्ट्रपति के सलाहकार आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं। कुल मिलाकर ट्रंप ने अजय बंगा को विशेष रूप से आर्थिक रणनीति, फंड मोबिलाइजेशन और रिकंस्ट्रक्शन पोर्टफोलियो में योगदान के लिए चुना गया है, क्योंकि विश्व बैंक के प्रमुख के तौर पर उनके पास वैश्विक विकास फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर का गहरा अनुभव है।