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डोनाल्ड ट्रंप का यूरेनियम देने वाला दावा झूठा, ईरान ने किया खंडन

तेहरान  इजरायल और लेबनान के बीच घोषित 10 दिन का युद्धविराम शुरू होते ही लड़खड़ा गया है. जैसे ही सीजफायर लागू हुआ, बेरूत के दक्षिणी इलाकों से गोलियों और रॉकेट दागे जाने की आवाजें आने लगीं, जिसने इस समझौते की स्थिरता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीजफायर लागू होने के कुछ ही देर बाद करीब आधे घंटे तक भारी गोलीबारी और रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) दागे जाने की आवाजें सुनी गईं. आसमान में लाल ट्रेसर बुलेट्स दिखाई दीं, जिससे इलाके में दहशत फैल गई।  यह युद्धविराम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर घोषित किया गया था, जो इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के बीच हफ्तों से चल रही भीषण लड़ाई को रोकने के लिए किया गया था. हालांकि, सीजफायर लागू होते ही हालात फिर बिगड़ते नजर आए. लेबनानी मीडिया के अनुसार, दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में इजरायल की ओर से गोलाबारी जारी रही, जबकि कुछ जगहों पर मशीनगनों से फायरिंग भी सुनाई दी. इससे साफ संकेत मिलता है कि जमीन पर हालात अब भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं हैं।  सीजफायर से पहले भी हुई लड़ाई सीजफायर से ठीक पहले भी दोनों पक्षों के बीच हमले जारी थे. उत्तरी इजरायल में रॉकेट हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई में इजरायली सेना ने हिजबुल्लाह के लॉन्चर ठिकानों को निशाना बनाया था. इस बीच, सीजफायर लागू होते ही बड़ी संख्या में लोग बेरूत के दक्षिणी इलाकों में लौटने लगे. सड़कों पर भीड़, गाड़ियों की कतारें और हिजबुल्लाह के झंडे व पोस्टर दिखाई दिए. हालांकि, हिजबुल्लाह और लेबनानी प्रशासन ने लोगों को चेतावनी दी थी कि वे जल्दबाजी में वापस न लौटें, क्योंकि इलाके में अनफटे बम और अन्य खतरे मौजूद हो सकते हैं।  डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्धविराम को शांति प्रक्रिया की दिशा में पहला कदम बताया था और उम्मीद जताई थी कि यह आगे स्थायी समझौते का रास्ता खोलेगा. उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि इजरायल और लेबनान के नेताओं के बीच ऐतिहासिक बातचीत हो सकती है. लेकिन सीजफायर के पहले ही घंटे में हुई हिंसा ने यह साफ कर दिया है कि जमीन पर हालात बेहद नाजुक हैं और यह समझौता कभी भी टूट सकता है. वहीं ट्रंप ने कहा है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट करने से पीछे हटने को तैयार है।  ईरान क्या कह रहा है? वहीं दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिका के साथ संभावित बातचीत को लेकर अपना रुख और सख्त कर लिया है, जिससे पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर के तेहरान दौरे के बाद ईरान ने साफ संकेत दिया है कि अब बिना ठोस फ्रेमवर्क के कोई भी नई बातचीत बेकार होगी. ईरानी न्यूज एजेंसी तस्नीम के मुताबिक, तेहरान ने कहा कि अमेरिका को पहले अपने वादे पूरे करने होंगे और अपनी ‘अत्यधिक मांगों’ को वापस लेना होगा. यह बयान साफ करता है कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी गहरे हैं और बातचीत की राह आसान नहीं है। 

अमेरिका ने ईरान से तेल आयात पर प्रतिबंध छूट को बढ़ाने से मना किया

वॉशिंगटन  बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच अमेरिका के वित्त मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि उसका ईरानी तेल पर लगे बैन में कुछ समय के लिए दी गई छूट को बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है. इसे युद्ध की वजह से सप्लाई में रुकावटों को कम करने के लिए लागू किया गया था।  यह कदम तेहरान पर दबाव बढ़ाने की अमेरिका की बड़ी रणनीति का हिस्सा है. वित्त मंत्रालय का कहना है कि वह ईरान की आर्थिक और ऊर्जा को लेकर गतिविधि पर रोक लगाने के मकसद से 'इकोनॉमिक फ्यूरी' अप्रोच को आगे बढ़ा रहा है।  वित्त मंत्रालय इकोनॉमिक फ्यूरी के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है, ईरान पर ज़्यादा से ज़्यादा दबाव बनाए हुए है. फाइनेंशियल संस्थानों को पता होना चाहिए कि डिपार्टमेंट मौजूद सभी टूल्स और अथॉरिटी का इस्तेमाल कर रहा है और विदेशी कंपनियों के खिलाफ सेकेंडरी बैन लगाने के लिए तैयार है जो ईरान की एक्टिविटीज को सपोर्ट करना जारी रखते हैं।  अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने कहा कि समुद्र में पहले से फंसे ईरानी तेल की बिक्री की इजाजत देने वाला शॉर्ट-टर्म ऑथराइज़ेशन कुछ दिनों में खत्म होने वाला है और इसे रिन्यू नहीं किया जाएगा. इससे पहले 21 मार्च को अमेरिका ने शुक्रवार (लोकल टाइम) को इस साल 19 अप्रैल तक ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर लगी पाबंदियों में कुछ समय के लिए ढील देने का ऐलान किया था. इसमें अमेरिका में ईरानी कच्चे और रिफाइंड प्रोडक्ट्स की बिक्री की इजाजत देना भी शामिल था।  इस फैसले की जानकारी अमेरिकी वित्त मंत्रालय के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल के एक बयान से मिली. इसने 20 मार्च से जहाजों पर लोड किए गए ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की डिलीवरी और बिक्री को मंजूरी दी थी. बयान में 19 अप्रैल, 2026 को वह तारीख बताया गया, जब तक ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर छूट रहेगी।  इसमें कहा गया है कि कुछ अपवादों को छोड़कर, 'ऊपर बताई गई अथॉरिटीज द्वारा मना किए गए सभी ट्रांज़ैक्शन जो आम तौर पर किसी भी जहाज पर लोड किए गए ईरानी मूल के कच्चे तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की बिक्री, डिलीवरी या उतारने के लिए जरूरी है. इसमें ऊपर बताई गई अथॉरिटीज के तहत ब्लॉक किए गए जहाज भी शामिल हैं. 20 मार्च, 2026 को रात 12:01 बजे ईस्टर्न डेलाइट टाइम या उससे पहले, वे 19 अप्रैल, 2026 को रात 12:01 बजे ईस्टर्न डेलाइट टाइम तक मंजूर हैं।  बयान में कहा गया है कि लाइसेंस से मंजूर ट्रांज़ैक्शन में ईरान से आने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट का अमेरिका में इम्पोर्ट भी शामिल है. चूंकि ईरान के साथ लड़ाई अभी भी जारी है, इसलिए यह रणनीतिक जलमार्ग ज्यादातर समुद्री ट्रैफिक के लिए असल में बंद है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और राजनयिक रिश्तों पर दबाव बना हुआ है। 

ट्रंप की 6 अप्रैल तक की मोहलत: ईरान के लिए नहीं, खुद के लिए थी ये समयसीमा

न्यूयॉर्क  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सरेंडर करने के लिए उसे छह अप्रैल तक की मोहलत दी थी. लेकिन, अब साफ हो चुका है कि यह मोहलत ईरान के लिए नहीं, बल्कि खुद डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य और राजनीतिक मजबूरी के लिए थी. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध में अमेरिका ने भारी सैन्य तैयारी की, बड़े-बड़े नौसैनिक बेड़े भेजे और नाटो देशों से साथ आने की अपील की, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत साबित हुई कि ट्रंप की सारी रणनीति हांफती नजर आ रही है. अब ट्रंप नाटो सहयोगियों को गरियाने लगे हैं और ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिकी फाइटर जेट व हेलीकॉप्टर मारे जा रहे हैं।  ट्रंप प्रशासन ने शुरू से ही ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई. इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए हमलों में अमेरिका ने ईरान के नेतृत्व, परमाणु सुविधाओं और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना तबाह हो चुकी है. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया. इस समुद्री रास्ते से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की ढुलाई होती है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं।  पहले 48 घंटे का दिया था अल्टीमेटम ट्रंप ने शुरू में ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि होर्मुज खोलो वरना पावर प्लांट तबाह कर देंगे. फिर इसे बढ़ाकर छह अप्रैल कर दी. जानकारों के अनुसार यह विस्तार इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका को अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने का समय चाहिए था. इस दौरान अमेरिका ने फारस की खाडी में बड़े नौसैनिक फ्लीट भेजे, जिनमें सुपर कैरियर जैसे USS जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भी शामिल हैं. साथ ही ट्रंप ने नाटो देशों से अपील की कि वे भी नौसेना भेजकर होर्मुज को खोलने में मदद करें।  लेकिन नाटो सहयोगी इस अपील पर खरे नहीं उतरे. यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि वे अमेरिका-इजराइल युद्ध में सीधे शामिल नहीं होंगे. ट्रंप ने गुस्से में नाटो को कागजी शेर करार दिया और यहां तक कह दिया कि अमेरिका नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब अमेरिका को जरूरत पड़ी तो सहयोगी पीछे हट गए, जबकि अमेरिका सालों से उनका बचाव करता रहा. नाटो महासचिव मार्क रुट्टे ने कुछ समर्थन जताया, लेकिन ज्यादातर यूरोपीय नेता ट्रंप की मांगों से दूर रहे. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तो ट्रंप की रणनीति को अस्थिर बताया. होर्मुज में अमेरिका की स्थिति कमजोर साबित हुई. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता के सामने अमेरिकी नौसेना भी पूरी तरह ईरान को हिला नहीं पाई. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा और कुछ जहाजों को ही गुजरने दिया, जो ज्यादातर ईरान से जुड़े थे. इसमें कुछ भारत और चीन के जहाज थे।  अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज में ईरान की भौगोलिक स्थिति और एंटी-शिप मिसाइलें अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अब युद्ध के करीब पांच हफ्ते बाद अमेरिका को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. एक दिन पहले ही ईरान ने अमेरिकी F-15E फाइटर जेट को मार गिराया. उस जेट का पायलट लापता है. संभवतः वह ईरान के कब्जे में है. सर्च एंड रेस्क्यू के दौरान दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर भी ईरानी गोलीबारी के शिकार हुए, हालांकि वे सुरक्षित लैंड कर गए. एक अन्य A-10 वारथोग विमान को भी कुवैत के ऊपर मार गिराया गया. ये घटनाएं अमेरिकी एयर पावर के दावों पर सवाल खड़े करती हैं. ईरान के आईआरजीसी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है।  डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि युद्ध समाप्ति की ओर है और अगले 2-3 हफ्तों में अमेरिका बहुत जोरदार हमले करेगा. उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना चली गई है, एयर फोर्स तबाह हो चुकी है और मिसाइल स्टॉक खत्म हो रहा है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. ईरान ने जवाबी हमलों में इजराइल और गल्फ देशों पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिकी नौसैनिक अड्डों पर हमलों की भी बात कही गई।  यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर चुनौती बन गया है. ईरान ने अमेरिका की कमजोर नस पकड़ ली है. होर्मुज की बंदी और उसके सटीक जवाबी हमले ने डोनाल्ड ट्रंप को बैकफुट पर ला दिया है. अब ट्रंप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं. अगर छह अप्रैल तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई तो पावर प्लांट पर हमले की धमकी फिर दोहराई जा सकती है, लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा करना और बड़ा संकट पैदा कर सकता है. कुल मिलाकर ट्रंप की मोहलत खुद उनकी हांफती रणनीति का प्रतीक बन गई है. ईरान ने दिखा दिया कि वह आसानी से दबने वाला नहीं है। 

US पायलट की मां की दुआ पर ईरान का पलटवार: ‘हमारे पास सुरक्षित, ट्रंप से नहीं

तेहरान   ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है. शुक्रवार (3 मार्च) को ईरान ने अमेरिका के दो खतरनाक लड़ाकू विमानों (F-15 और A-10) को मार गिराया. इस घटना के बाद एक अमेरिकी पायलट लापता है, जिसकी तलाश में ईरान की सेना ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया है. इस बीच, लापता पायलट की मां ने सोशल मीडिया पर अपने बेटे की सलामती के लिए दुआ मांगी, जिस पर ईरान के दूतावासों ने काफी तीखा जवाब दिया है।  ईरान का पलटवार: ‘ट्रंप से ज्यादा हमारे पास सुरक्षित है आपका बेटा’ पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में मौजूद ईरानी दूतावासों ने पायलट की मां के पोस्ट पर जवाब देते हुए कहा कि उनके बेटे ट्रंप की कमान में रहने से ज्यादा ईरान की कैद में सुरक्षित रहेंगे. ईरानी दूतावास ने ‘एक्स’ पर लिखा कि दुआ कीजिए कि आपका बेटा अमेरिकी रेस्क्यू टीम के हाथ लगने के बजाय ईरान की गिरफ्त में रहे. हम सभ्य लोग हैं और कैदियों के साथ सम्मान से पेश आना जानते हैं. दक्षिण अफ्रीका स्थित दूतावास ने तो यहां तक कह दिया कि वे अमेरिका या उनके साथियों की तरह ‘पाषाण युग’ वाली सोच नहीं रखते।  23 साल बाद अमेरिका को लगा इतना बड़ा झटका वॉल स्ट्रीट जर्नल और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2003 के इराक युद्ध के बाद यह पहली बार है जब किसी जंग में अमेरिकी फाइटर जेट को मार गिराया गया है. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा तेहरान पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुई इस जंग के छठे हफ्ते में यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी सैन्य हार मानी जा रही है. लापता पायलट को खोजने के लिए गए दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों पर भी ईरान ने फायरिंग की, जिसके बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा।  ग्राउंड जीरो के हालात: ईरान में तलाशी अभियान और इनाम का ऐलान ईरानी मीडिया के अनुसार, दक्षिण-पश्चिमी ईरान के क्षेत्रीय गवर्नर ने लापता अमेरिकी पायलट को पकड़ने या मारने वाले के लिए इनाम की घोषणा की है. वहीं, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के जवान पूरे इलाके में छानबीन कर रहे हैं. दूसरी ओर, कुवैत में क्रैश हुए A-10 वॉर्थोग विमान का पायलट सुरक्षित बाहर निकलने में कामयाब रहा. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के डेटा के अनुसार, इस युद्ध में अब तक 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं और 300 से ज्यादा घायल हुए हैं।  न्यूक्लियर प्लांट के पास हमला और आम लोगों की मौत तस्नीम न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के बुशहर न्यूक्लियर प्लांट के पास एक मिसाइल गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई है, हालांकि प्लांट सुरक्षित है. ईरानी स्टेट मीडिया ने बताया कि इस जंग में अब तक ईरान के 4,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें उनके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई भी शामिल हैं. शनिवार को ईरान के पेट्रोकेमिकल जोन और पानी के गोदामों पर भी हवाई हमले हुए हैं।  बातचीत का रास्ता बंद  प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान को ‘पाषाण युग’ में भेजने की धमकी दी थी, लेकिन जमीन पर स्थिति इसके उलट दिख रही है. ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गलीबाफ ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका का मकसद अब ‘सत्ता पलटना’ नहीं बल्कि अपने ‘पायलटों को बचाना’ रह गया है. पाकिस्तान की मध्यस्थता में होने वाली शांति वार्ता भी रुक गई है क्योंकि ईरान ने अमेरिकी अधिकारियों से मिलने से साफ मना कर दिया है। 

10 हजार सैनिक तैयार, अमेरिका और ईरान के बीच खेला जा रहा है डबल गेम? ट्रंप की रणनीति पर सवाल

तेहरान  ईरान-अमेरिका के बीच जंग चल रही है. इसी बीच अब अमेरिका की रणनीति सवालों के घेरे में आ गई है. एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान के साथ बातचीत ‘बहुत अच्छी’ चल रही है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका चुपचाप जमीनी युद्ध की तैयारी भी तेज कर रहा है. यानी अमेरिका ईरान के साथ डबल गेम खेलने में लगा है. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का कहना है कि, व्हाइट हाउस और पेंटागन मिडिल ईस्ट में कम से कम 10,000 अतिरिक्त सैनिक भेजने पर विचार कर रहे हैं. अगर यह फैसला होता है, तो यह सीधे संकेत होगा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ बड़े जमीनी ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है. पहले यह खबर आई थी कि अमेरिका खर्ग आइलैंड पर अटैक की तैयारी में है।  एक तरफ बातचीत, दूसरी तरफ धमकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह सैन्य तैयारी ऐसे समय पर हो रही है जब ट्रंप ने ईरान को 10 दिन की मोहलत दी है और ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोक दिए हैं. ट्रंप का कहना है कि बातचीत जारी है और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है. दरअसल, अमेरिका ने पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये के जरिए ईरान को बातचीत के लिए 15 पॉइंट का प्रस्ताव भेजा था. इसमें जंग खत्म करने के लिए कई शर्तें रखी गई हैं. अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान बातचीत में दिलचस्पी दिखा रहा है, लेकिन अब तक उसने कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. वहीं ईरान ने कहा है कि वह इनमें से किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है।  फाइनल हमले की तैयारी कर रहा अमेरिका? लेकिन इसी बीच पेंटागन की तैयारियां कुछ और कहानी बता रही हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ‘फाइनल ब्लो’ यानी आखिरी बड़े हमले की योजना भी तैयार कर रहा है, जिसमें जमीनी सेना और बड़े स्तर पर बमबारी शामिल हो सकती है. इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में और भी सैनिक, फाइटर जेट स्क्वाड्रन और मरीन यूनिट्स मिडिल ईस्ट भेजे जाने वाले हैं. 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिकों को भी तैनाती के लिए तैयार रखा गया है. यही वजह है कि ईरान को इस पूरे डिप्लोमैटिक प्रोसेस पर शक हो रहा है. ईरान को डर है कि अमेरिका बातचीत का इस्तेमाल सिर्फ समय बर्बाद करने के लिए कर रहा है ताकि सैन्य तैयारी मजबूत की जा सके।   

सत्ता के नशे में ट्रंप? कभी युद्ध की चेतावनी, कभी भारत से ट्रेड डील पर बड़े-बड़े दावे

वाशिंगटन वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को अपनी बड़ी जीत बताने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब और ज्यादा आक्रामक होते दिख रहे हैं. ताजा बयान में उन्होंने दो देशों को धमकी दी है, जिनमें से एक अमेरिका का पुराना दोस्त है. ट्रंप ने खुले तौर पर कहा है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत है और यह ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मामला है. यह बयान इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि ग्रीनलैंड, अमेरिका का नहीं बल्कि डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और डेनमार्क, अमेरिका का पुराना NATO सहयोगी है. डेनमार्क और ब्रिटेन के बीच में समुद्र है. इस लिहाज से यह ब्रिटेन का पड़ोसी ही हुआ. एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड इस वक्त ‘बेहद रणनीतिक’ है और वहां रूसी व चीनी जहाज मौजूद हैं. ट्रंप के शब्दों में, ‘हमें ग्रीनलैंड चाहिए, डेनमार्क इसे संभाल नहीं सकता.’ उन्होंने यह तक दावा कर दिया कि यूरोपीय संघ भी चाहता है कि अमेरिका ग्रीनलैंड अपने नियंत्रण में ले. क्या ग्रीनलैंड पर हमला करेंगे ट्रंप? ट्रंप की इस टिप्पणी ने यूरोप में खतरे की घंटी बजा दी है. डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका को अपने ‘ऐतिहासिक सहयोगी’ को धमकाना बंद करना चाहिए. ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने भी इसे अपमानजनक करार देते हुए साफ कहा कि ‘हमारा देश बिक्री के लिए नहीं है.’ एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भी बवाल बढ़ाया है. शनिवार देर रात, ट्रंप के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर की पत्नी केटी मिलर ने अपने फेसबुक पेज पर अमेरिकी झंडे के रंगों में रंगे डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र की विवादास्पद तस्वीर पोस्ट की. इसके साथ उन्होंने कैप्शन लिखा, ‘जल्द ही.’ कभी भारत से ट्रेड डील पर बड़ा दावा… कभी टैरिफ बढ़ाने की धमकी बीते पूरे साल 2025 में ट्रंप के टैरिफ से दुनिया के शेयर बाजारों में हलचल जारी रही, तो वहीं तमाम देशों के बीच ट्रेड वॉर के हालात तक बने. US-China Trade Tension ने तो इसे और भी बढ़ाने का काम किया. भारत को लेकर हालांकि ट्रंप बीते कुछ समय से लगातार ये दावा करते नजर आ रहे थे कि India-US Trade Deal को लेकर जल्द ही बहुत सकारात्मक हल निकलने वाला है और दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का दौर जारी है. लेकिन अचानक ही फिर से उन्होंने कुछ वैसा ही कदम उठाने की धमकी दे डाली है, जिसे लेकर भारत-यूएस में डील अटक गई थी.  ट्रंप ने दी Tariff बढ़ाने की वार्निंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक बार फिर भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद का मुद्दा उठाया और कहा कि अगर नई दिल्ली 'रूसी तेल' पर मदद नहीं करता है, तो फिर अमेरिका भारतीय इंपोर्ट पर मौजूदा टैरिफ बढ़ा सकता है. यानी पहले से ही भारत पर 50% US Tariff और भी बढ़ाया जा सकता है.  गौरतलब है कि अप्रैल 2025 में जब Donald Trump ने दुनिया के तमाम देशों पर अपना रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariff) थोपना शुरू किया था, तो भारत पर पहले 25% का टैरिफ लगाया गया था, लेकिन अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने Russian Oil की खरीद को लेकर भारत पर तगड़े आरोप लगाए थे और ये कहते हुए टैरिफ दोगुना यानी 50% कर दिया था कि इस खरीद के जरिए भारत यूक्रेन युद्ध में व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) की आर्थिक मदद कर रहा है.  PM Modi की तारीफ, लेकिन… ट्रंप ने नए बयान में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है और कहा है कि, 'वे (भारत) असल में मुझे खुश करना चाहते थे. PM Modi बहुत अच्छे इंसान हैं और उन्हें पता था कि मैं खुश नहीं था. मुझे खुश करना जरूरी था. लेकिन अगर वे रूस से व्यापार करते हैं, तो हम उन पर बहुत जल्दी टैरिफ बढ़ा सकते हैं.' बता दें कि अमेरिका की ओर से भारत की रूसी तेल की खरीद का लंबे समय से विरोध किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर दबाव डालने के एक कदम के तौर पर देखा जा रहा है.  न सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप, बल्कि उनके प्रशासन के कई अधिकारी और वित्त मंत्री भी रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर निशाना साधते रहे हैं. बता दें कि Russia-Ukraine War के बाद से भारत का रूसी तेल आयात तेजी से बढ़ा था और रूस, भारत को तेल सप्लाई करने वाला बड़ा देश बन गया. यही बात ट्रंप को खटकने लगी.  अब Trade Deal का क्या होगा?  Donald Trump की इन नई टैरिफ धमकी ने एक बार फिर से भारत-अमेरिका ट्रेड डील (India-US Trade Deal) को लेकर असमंजस पैदा कर दिया है. क्योंकि इससे पहले भी जब भारत पर टैरिफ दोगुना किया गया था, तो दोनों देशों के बीच बात अटक गई थी. तब तक दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर पांच दौर की बातचीत हो गई थी और छठे दौर की बात अगस्त महीने में प्रस्तावित थी, लेकिन टैरिफ बढ़ाने के बाद ये रुक गई थी.  हालांकि, इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत का दौर 2025 के आखिर में फिर से शुरू हुआ और उम्मीद जताई जा रही थी नवंबर तक इसे लेकर बड़ा ऐलान हो सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. India-US Trade Deal को लेकर सिर्फ ट्रंप की ओर से ही इसके जल्द फाइनल होने के दावे किए जा रहे थे, बल्कि भारत के केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) ने भी इसकी अच्छी प्रगति की बात कही थी. इसके अलावा मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने भी बड़ा बयान देते हुए कहा था कि अगर वित्तीय वर्ष के अंत तक समझौता नहीं हो पाता है, तो मुझे आश्चर्य होगा. हालांकि, अब Trump New Warning से मामला फिर अटकता हुआ नजर आ रहा है.  क्या एक्टिव होगा NATO का आर्टिकल 5? सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर ट्रंप वाकई ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश करते हैं, तो क्या नाटो का आर्टिकल 5 लागू होगा? NATO का आर्टिकल 5 कहता है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाएगा. चूंकि डेनमार्क NATO का सदस्य है, इसलिए उस पर किसी भी तरह की सैन्य … Read more

हमास को मनाने के लिए ट्रंप तुर्की की शरण में, गाजा शांति योजना पर बढ़ा दबाव

न्यूयॉर्क अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर इजरायल और हमास के बीच शांति लाना चाहते हैं. इसके लिए उनका महत्वाकांक्षी गाजा पीस प्लान तैयार है. लेकिन इस प्लान पर हमास की हां-ना, हां-ना के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में ट्रंप ने अब तुर्की की मदद मांगी है. तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने गाजा पीस प्लान को लेकर उनसे मदद मांगी है. ट्रांप चाहते हैं कि हम हमास को रजामंद करें कि वह इस पीस प्लान को बिना किसी शर्त के स्वीकार कर ले. हमास को किसी भी तरह यह प्लान मानने के लिए तैयार किया जाए. उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हम हमास के संपर्क में हैं. हम सभी पक्षों के संपर्क में हैं. हम उन्हें समझा रहे हैं कि सबसे सही तरीका कौन सा है और फिलिस्तीन के लोगों के लिए क्या सही है. अमेरिकी दौरे और ट्रंप के साथ फोन वार्ता में हमने उन्हें समझाया कि किस तरह उद्देश्य को हासिल किया जा सकता है. एर्दोगन ने कहा कि इस दौरान ट्रंप ने अनुरोध किया कि हम हमास से बातचीत करें और उन्हें इस पीस प्लान को मानने के लिए तैयार करें. इसके बाद हम तत्काल इसमें जुट गए. बता दें कि मिस्र में इजरायल और हमास वार्ता के दौरान तुर्की के इंटेलिजेंस चीफ इब्राहिम कालिन भी मौजूद थे. इससे पहले हमास ने कहा कि वह ट्रंप के प्लान को लेकर मिस्र में हो रही बातचीत को लेकर आशान्वित हैं. हमास ने इस दौरान उन इजरायली बंधकों और फिलिस्तीनी कैदियों की सूची भी सौंपी, जिन्हें इस स्वैप डील के तहत छोड़ा जाना है. लेकिन हमास ने इसके लिए कुछ शर्तें रखी हैं. संगठन ने स्पष्ट किया है कि कुछ शर्तें पूरी किए बिना सौदा संभव नहीं है. मिस्र के शर्म अल-शेख में इजरायल और हमास के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता हो रही है. यह वार्ता ट्रंप के 20 प्वॉइंट प्लान पर आधारित है, जिसका मकसद गाजा में स्थायी शांति लाना है.  इजरायल और हमास के बीच दो साल से जंग चल रही है. गाजा से शुरू हुई जंग की आंच मध्यपूर्व के बाकी देशों तक भी पहुंची है. इजरायल की बमबारी से गाजा खंडहर में तब्दील हो चुका है. इस दो साल की जंग में गाजा में 67 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है. संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि इस जंग ने गाजा को 69 साल पीछे धकेल दिया है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, गाजा से मलबा हटाने में ही 21 साल का समय लग जाएगा.

चार्ली कर्क पर जानलेवा हमला: गर्दन पर वार, कैमरे में कैद हुई वारदात

न्यूयॉर्क अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जिगरी दोस्त चार्ली कर्क (Charlie Kirk) की हत्या ने गन वायलेंस और सिक्योरिटी को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है. कर्क की यूटा यूनिवर्सिटी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अब शूटर का मौके से फरार होते एक वीडियो वायरल हो रहा है. कर्क की हत्या की जांच कर रही एफबीआई की टीम ने एक नया वीडिया जारी किया है, जिसमें कर्क की हत्या के कुछ सेकंड बाद ही एक एक संदिग्ध को यूटा यूनिवर्सिटी की छत से भागते देखा जा सकता है. इस वीडियो में देखा जा सकता है कि संदिग्ध पहले तो भागता है और फिर कैंपस से छत से छलांग लगा देता है. कंजरवेटिव चार्ली कर्क की यूटा वैली यूनिवर्सिटी में उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वह छात्रों के सवालों का जवाब दे रहे थे. उन्हें सुनने के लिए कैंपस में लगभग तीन हजार लोग जुटे थे. यह कार्यक्रम कैंपस में खुले में हो रहा था.  एफबीआई का कहना है कि यह काम किसी स्किल्ड शूटर का है, जो काले कपड़ों में छत पर छिपा था. FBI ने इसे प्रोफेशनल हिट बताया, लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं है. एफबीआई ने एक लाख डॉलर का इनाम घोषित किया है.  चार्ली कर्क टर्निंग पॉइंट यूएसए (TPUSA) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे. यह एक छात्र संगठन है जिसका मकसद लिबरल अमेरिकी कॉलेजों में कंजर्वेटिव विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना है. वह 32 साल के थे और ट्रंप के करीबियों में से एक थे. वह अमेरिका के सबसे हाई प्रोफाइल कंजर्वेटिव एक्टिविस्ट और मीडिया पर्सनैलिटीज में से एक थे।. कर्क के पिता आर्किटेक्ट थे. उन्होंने शिकागो के एक कॉलेज से पढ़ाई की लेकिन राजनीति में आने के लिए पढ़ाई छोड़ दी. कर्क ने 2020 में 'The Maga Doctrine' किताब लिखी थी, जिसमें ट्रंप के 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का भी जिक्र था. चार्ली और उनकी टीम ने पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप और रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाने में भी अहम भूमिका निभाई थी.  कर्क अपने विवादित बयानबाजी के लिए हमेशा चर्चा में रहते थे. उनके धुर दक्षिणपंथी विचारों की वजह से वह हमेशा लिबरल्स के निशाने पर रहते थे. वह स्लेवरी से लेकर गर्भपात, महिला विरोधी बयानों और रंगभेद पर की गई अपनी टिप्पणियों की वजह से विवादित थे. कैसे दिया हत्या को अंजाम घटनास्थल के वीडियो में दिख रहा है कि चार्ली एक बड़ी भीड़ को संबोधित कर रहे हैं, तभी एक गोली चलने की आवाज आई. कैमरे के तेजी से हिलने से पहले चार्ली अपनी कुर्सी पर गिरता हुआ दिखे और दर्शकों में घबराहट की आवाजें आने लगीं. जांचकर्ताओं ने कहा कि उनका मानना ​​है कि गोली कैंपस की छत से चली थी, जो काले कपड़े पहने किसी व्यक्ति द्वारा चलाई गई थी. यह एक टारगेट बनाकर हत्या करने का मामला प्रतीत होता है. इस इवेंट में मौजूद यूटाह के पूर्व कांग्रेसी जेसन चाफेट्ज ने फॉक्स न्यूज को बताया कि गोली तब चली जब चार्ली कर्क भीड़ के साथ सवाल-जवाब सेशन कर रहे थे. बुरी तरह से सहमे हुए चाफेट्ज ने नेटवर्क को बताया, "पहला सवाल धर्म के बारे में था. वह लगभग 15-20 मिनट तक बोलते रहे. दिलचस्प बात यह है कि दूसरा सवाल ट्रांसजेंडर शूटर्स, सामूहिक शूटर्स के बारे में था और उसी के बीच में गोली चल गई… जैसे ही वह गोली चली, वह पीछे गिर गया. हर कोई डेक से टकराया… बहुत सारे लोग चिल्लाने लगे और फिर सभी लोग भागने लगे."

वेनेजुएला जहाज पर अमेरिकी हमला, ड्रग तस्करी के आरोप में 11 की हुई जान

कैरेकस अमेरिका ने वेनेजुएला के जहाज पोत पर सैन्य हमला कर दिया है. इस हमले में 11 की मौत हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट कर खुद इसकी जानकारी दी. ट्रंप ने कहा कि आज सुबह मेरे आदेश पर अमेरिकी सैन्यबलों ने SOUTHCOM क्षेत्र में Tren de Aragua नार्को गैंग पर सैन्य कार्रवाई की. टीडीए एक विदेशी आतंकी संगठन है, जो निकोलस मादुरो के नियंत्रण में काम करता है और जिसने सामूहिक हत्याओं, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और अमेरिका एवं पूरे पश्चिमी गोलार्ध में हिंसा व आतंक की घटनाओं को अंजाम दिया है. ट्रंप ने बताया कि ये सैन्य कार्रवाई उस समय की गई, जब आतंकी अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नशीले पदार्थों की खेप लेकर अमेरिका की ओर जा रहे थे. इस हमले में 11 आतंकियों को मार गिराया गया है. इस कार्रवाई में अमेरिकी सेना को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंची. यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए चेतावनी है, जो अमेरिका में ड्रग्स लाने के बारे में सोच भी रहा है. सावधान हो जाइए! इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद. बता दें कि मौजूदा समय में अमेरिकी नौसेना की एक बड़ी टुकड़ी कैरीबिया में तैनात है, जो उस जगह के पास है, जहां से वेनेजुएला के जहाज पर स्ट्राइक की गई. 4500 नौसैनिकों के साथ चार विध्वंसक और टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों को तैनात किया गया है. मादुरो पर अमेरिका सरकार पर आरोप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने अमेरिका पर उनकी सरकार के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का आरोप लगाया है. उन्होंने एक सितंबर को कहा था कि ट्रंप सरकार सैन्य धमकियों के जरिए वेनेजुएला में सरकार बदलना चाहती है. मादुरो ने कहा था कि हम अमेरिका के किसी भी तरह के हमले का मुकाबा करने के लिए तैयार हैं.

ट्रंप की योजना: गाजा के 20 लाख लोग हटेंगे, लौटने पर मिलेगा फ्लैट

गाजा  डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और इजरायल ने मिलकर गाजा को लेकर प्लान तैयार किया है। इस प्लान की काफी चर्चा है और वॉशिंगटन पोस्ट ने ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों के पास मौजूद दस्तावेजों के हवाले से एक रिपोर्ट छापी है। इसके मुताबिक फिलिस्तीन के बड़े हिस्से गाजा से 20 लाख लोगों को अस्थायी तौर पर हटाया जाएगा। इन लोगों को मिस्र, कतर जैसे देशों में रखा जाएगा या फिर फिलिस्तीन के ही किसी एक क्षेत्र में रखा जाएगा। इन लोगों को तब तक गाजा से बाहर रहना होगा, जब तक इलाके का पुनर्विकास नहीं हो जाता। इस दौरान गाजा छोड़ने वाले फिलिस्तीनियों को डिजिटल टोकन दिए जाएंगे। इसके अलावा कैश पेमेंट किया जाएगा। गाजा से अस्थायी तौर पर हटाए लोग जहां रहेंगे, वहां खानपान की व्यवस्था होगी। इसके अलावा रेंट सब्सिडी भी दी जाएगी। गाजा के लोगों को हटाने के प्लान को वॉलेंट्री डिपार्टर कहा जा रहा है, जिसके तहत वे दूसरे देश में जाएंगे या फिर तय स्थान पर उन्हें रखा जाएगा। गाजा के लोगों को कुल 4 साल तक बाहर रखने के प्लान पर काम चल रहा है। इसके तहत उन्हें 4 साल की रेंट सब्सिडी मिलेगी और एक साल तक खाने की व्यवस्था की जाएगी। अमेरिका और इजरायल के रणनीतिकारों ने इस प्लान का नाम भी बेहद दिलचस्प रखा है– GREAT। यहां ग्रेट से अर्थ है, Gaza Reconstitution, Economic Acceleration, and Transformation। अमेरिकी प्लान के मुताबिक गाजा को टूरिस्ट डेस्टिनेशन में तब्दील करने का प्लान है। यहां Gaza Trump Riviera विकसित किया जाएगा। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस स्मार्ट सिटी बनाए जाएंगे। स्कूल, अस्पताल, इंडस्ट्री, ग्रीन स्पेस जैसी व्यवस्था रहेगी। यहां बड़े पैमाने पर अपार्टमेंट्स बनाने की तैयारी है, जिनके फ्लैट गाजा के उन लोगों को दिए जाएंगे, जिन्हें बाहर भेजा जाएगा। वे अपनी जमीन के बदले मिले डिजिटल टोकन का इस्तेमाल करते हुए फ्लैट हासिल कर सकेंगे। अब तक इस मामले पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई है। अखबार ने लिखा है कि गाजा को लेकर बने इस प्लान में अमेरिकी फंड की जरूरत नहीं होगी बल्कि इससे लाभ ही होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत दुनिया भर से निवेश को आमंत्रित किया जाएगा। यहां इलेक्ट्रिक वीकल प्लांट्स से लेकर डेटा सेंटर्स तक तैयार किए जाएंगे। इसके अलावा हाईराइज इमारतों की भरमार होगी। इस प्रोजेक्ट में कुल 100 अरब डॉलर के शुरुआती निवेश की तैयारी है। इसके बाद यह प्रोजेक्ट खुद ही फंड जनरेट करेगा।